हिंदी एक रुका हुआ ट्रक किसी व्यस्त रास्ते पर!

 

हिंदी: अपनों के बीच ही अजनबी सी

हिंदी: अपनों के बीच ही अजनबी सी

हिंदी दिवस पर हिंदी के उत्थान की  बात करना मुझको बेमानी बात लगती  है.  सिर्फ एक रस्म अदायगी भर लगती है.  जब साल भर इसके उत्थान के बारे में फिक्र नहीं तो एक दिन इसके बारे में बतिया लेने से कोई ख़ास फर्क आएगा ऐसा मै नहीं समझता. ये देश जिस रस्ते पर चल पड़ा है उसमे  हिंदी प्रेम के बारे में बात करना मतलब गधे की सींग तलाशना है.  फादर बुल्के कहते थे संस्कृत महारानी, हिंदी बहूरानी और अंग्रेजी नौकरानी है। आज कौन सी भाषा कौन से पायदान पर है ये बताने की जरुरत नहीं.  इस देश में चांडाल बुद्धिजीवियों  का एक ऐसा वर्ग है जो संस्कृत को एक मृत भाषा बताता है और अंग्रेजी के उत्थान को हमारे विकास के लिए आवश्यक मानता है. गाँधी बाबा लगता है  फाल्तुये बोल गए कि ” मेरा यह विश्वास है कि राष्ट्र के जो बालक अपनी मातृभाषा के बजाय दूसरी भाषा में शिक्षा प्राप्त करते हैं,  वे आत्महत्या ही करते हैं. यह उन्हें अपने जन्मसिद्ध अधिकार से वंचित करती है. विदेशी माध्यम से बच्चों पर अनावश्यक जोर पडता है . वह उनकी सारी मौलिकता का नाश कर देता है. विदेशी माध्यम से उनका विकास रुक जाता है और अपने घर और परिवार से अलग पड जाते हैं . इसलिए मैं इस चीज को पहले दरजे का राष्ट्रीय संकट मानता हू.”
 
गाँधी बाबा के हिसाब से हिंदी को ना आगे बढ़ाना एक राष्ट्रीय संकट है पर आजकल के धूर्त और मक्कार बुद्धिजीवियों की नज़र में  ऐसा कुछ नहीं बल्कि हिंदी या संस्कृत के विकास के बारे में बात करना देश को बैलगाड़ी युग में ले जाने के समान है. लिहाजा आज का युवा वर्ग चाहे वो ग्रामीण पृष्ठभूमि से हो या शहरी  टूटी फूटी अंग्रेजी में गिटपिट करना अपनी शान समझता है. हिंदी का दायरा सिमटता जा रहा है और बीबीसी  हिंदी   के प्रसारण  के सहित हिंदी को प्रोत्साहित करने वाली तमाम गतिविधियों पर लगाम लगती चली जा रही है. हिंदी को इन्टरनेट पर हो या मोबाइल पर अपनी उपस्थिति जताने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है जबकि ये विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओ में से एक है. वही स्पैनिश या अंग्रेजी का प्रचलन आधुनिक संचार माध्यमो में बढ़ा है वजनदार तरीको से. आपको यदि उच्च स्तर की  शोध सामग्री चाहिए वो अंग्रेजी में उपलब्ध है पर हिंदी में आप इन्टरनेट पे ढूँढते रह जाइए आपको नहीं मिलेगी.
 
ये तो भला हो हिंदी फिल्मो का (जिसमे अंग्रेजी में बात करने वाले कलाकार काम करते है)  जो सतही ही सही पर हिंदी को जनसामान्य में प्रचारित कर रहे है ” चिल  मारो  ” तरीकें से.  नहीं तो हिंदी का ख्याल अक्सर रेलवे स्टेशन पर याद आता है जहा पर महापुरुषों के हिंदी प्रयोग को लेकर कथन हर दीवार पर टाँगे गए है. पता नहीं वो कौन महान बन्दा है जिसको रेलवे स्टेशन पर हिंदी के बारे में बात करने का विचार जमा पर कम से कम मेरी नज़र तो एक बार ऐसे वाक्यों पर पड़ ही जाती है. हिंदी संस्थान या हिंदी के साहित्यकार आज के युग में हिंदी की कैसी सेवा कर रहे है ये हम सबको पता है. या तो ये गुटबाजी में व्यस्त है या फिर उस क्लिष्ट भाषा में बात करेंगे जो जनसामान्य की समझ से परे हो. ऐसी कहानियां लिखेंगे जिसका विषय  ही इतना अपरिचित सा होगा कि भाषा पर गौर करने की हिम्मत ही नहीं होंगी.

कवि नागार्जुन: सही मायनों में एक जनकवि

 प्रेमचंद अगर लोगो के बीच पहचाने गए तो इसकी एक वजह यह थी कि उनकी  कृतिया आम बोलचाल की भाषा में थी और “मैकू”, “होरी” और “धनिया” जैसे पात्र हमारे ही बीच के लोग थें. ये ऐसी एकेडेमिक या क्लिष्ट भाषा नहीं बोलते थें कि लोगो के पल्ले ही ना पड़े. इसका नतीजा ये हुआ है कि हिंगलिश के प्रयोग को ही वाह वाही मानकर हिंदी के बढ़ते प्रभाव के समकक्ष रख दिया गया. लिहाजा शुद्ध हिंदी जिसके बोलने से संस्कृत से घनिष्टता से प्रदर्शित हो इसकी संभावना बिल्कुल ही खत्म हो गयी है. हालात तो यह है कि अगर आप कठिन शब्दों का प्रयोग कर दे तो शायद आपको हिंदी डिक्शनरी की भी भूमिका का निर्वाहन करना पड़ सकता है.
 
चलते चलते मै इतना कहूँगा कि हिंदी की दशा किसी संस्थान के भरोसे सुधरने से रही ना कि उन हिंदी के उन साहित्यकारों से  जिनका काम है केवल दोष निकालकर हर उस प्रयोग को विफल कर देना जो कि हिंदी के प्रयोग से जुडी हो. हिंदी की दशा तब सुधरेगी जब हम खुद इसके प्रयोग को लेकर सचेत रहेंगे अन्यथा आप कितनी बड़ी बड़ी बाते कर लें हिंदी दिवस पर हिंदी एक वयस्त सड़क पर जाम ट्रक के सिवा कुछ नहीं रहेगी.
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 कुछ इधर से कुछ उधर सें. हिंदी में दो कविता भी पेश कर रहा हू. एक  तो बाबा  नागार्जुन ने लिखी  है. और दूसरी कविता श्री राकेश गुप्ताजी ने लिखी है. नितीश कुमार के द्वारा  कामिल  बुल्के   पर लिखा एक छोटा  सा  आलेख भी प्रस्तुत  है. 
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गुलाबी चूड़ियाँ

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प्राइवेट बस का ड्राइवर है तो क्या हुआ,
सात साल की बच्ची का पिता तो है!
सामने गियर से उपर
हुक से लटका रक्खी हैं
काँच की चार चूड़ियाँ गुलाबी
बस की रफ़्तार के मुताबिक
हिलती रहती हैं…
झुककर मैंने पूछ लिया
खा गया मानो झटका
अधेड़ उम्र का मुच्छड़ रोबीला चेहरा
आहिस्ते से बोला: हाँ सा’ब
लाख कहता हूँ नहीं मानती मुनिया
टाँगे हुए है कई दिनों से
अपनी अमानत
यहाँ अब्बा की नज़रों के सामने
मैं भी सोचता हूँ
क्या बिगाड़ती हैं चूड़ियाँ
किस ज़ुर्म पे हटा दूँ इनको यहाँ से?
और ड्राइवर ने एक नज़र मुझे देखा
और मैंने एक नज़र उसे देखा
छलक रहा था दूधिया वात्सल्य बड़ी-बड़ी आँखों में
तरलता हावी थी सीधे-साधे प्रश्न पर
और अब वे निगाहें फिर से हो गईं सड़क की ओर
और मैंने झुककर कहा –
हाँ भाई, मैं भी पिता हूँ
वो तो बस यूँ ही पूछ लिया आपसे
वर्ना किसे नहीं भाएँगी?
नन्हीं कलाइयों की गुलाबी चूड़ियाँ!

बाबा नागार्जुन

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बड़ा ही खतरनाक रहा, बढ़ना  तेरा विकास,
मुफलिसी के तन से तूने, खींची चादर लाज की…….
झोपड़ियां मिटा के कैसे, पांच सितारा हो खड़े,
गरीबी की रोटी पे तूने, रखी नजर बाज की
हरे भरे बन काट तूने, कंक्रीट के बनाये जंगल,
है खबर इक बड़ी कीमत, हमे चुकानी है इस काज की
दूसरों का पेट भरने, खेत खटता बैल बन जो,
मुद्दत से किसान की बेटी, नही देखी शक्ल प्याज की.
सारा परिवार साथ बैठ, देखता सी ग्रेड फ़िल्में,
ये कौन सी है संस्क्रती, ये कैसी बात आज की?  

संध्या वन्दन भूल बैठे, भूल बैठे जोत बाती,

शोर को संगीत समझे, ना बात करें साज की………

बलशाली के पाँव पकड़ो, तलुवे चाटो नाक रगडो,
भूखे को लात मारो, ना फ़िक्र कोई मोहताज की………

बेशक पैर तले अपनों की लाश, बढ़ना लेकिन है जरूरी, 
तन का हो या मन का सौदा, ना बात करो राज की…


श्री राकेश गुप्ताजी
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 तुलसी के अनन्य भक्त बुल्केफादर कामिल बुल्के रामकथा के मर्मज्ञ तो थे ही, तुलसी के अनन्य भक्त भी थे। वह अपनी मातृभाषा से उतना ही प्रेम करते जितना हिंदी से। जितनी उन्हें अपनी मिट्टी से लगाव था उतना ही भारत से भी। बेल्जियम से भारत आकर मृत्युपर्यंत हिंदी, तुलसी और वाल्मीकि की भक्ति में रमे रहे। साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में उनके अप्रतिम योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने सन 1974 में पद्मभूषण से उन्हें सम्मानित किया गया। फादर का जन्म एक सितंबर 1909, बेल्जियम के प:िमी फ्लैंडर्स स्टेट के रम्सकपैले गांव में हुआ था। शिक्षा यूरोप के यूवेन विश्र्वविद्यालय से इंजीनियरिंग पास की। 1930 में संन्यासी बनने का निर्णय लिया। नवंबर 1935 में भारत, बंबई पहुंचे। वहां से रांची आ गए। गुमला जिले के इग्नासियुस स्कूल में गणित के अध्यापक बने। वहीं पर हिंदी, ब्रज व अवधी सीखी। 1938 में, सीतागढ/हजारीबाग में पंडित बदरीदत्त शास्त्री से हिंदी और संस्कृत सीखा। 1940 में हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग से विशारद की परीक्षा पास की। 1941 में पुरोहिताभिषेक हुआ, फादर बन गए। 1945 कलकत्ता विश्र्वविद्यालय से हिंदी व संस्कृत में बीए पास किया। 1947 में इलाहाबाद विश्र्वविद्यालय से एमए किया। 1949 में डी. फिल उपाधि के लिए इलाहाबाद में ही उनके शोध रामकथा : उत्पत्ति और विकास को स्वीकृति मिली। 1950 में पुन: रांची आ गए। संत जेवियर्स महाविद्यालय में उन्हें हिंदी व संस्कृत का विभागाध्यक्ष बनाया गया। सन् 1950 ई. में ही बुल्के ने भारत की नागरिकता ग्रहण की। इसी वर्ष वे बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् की कार्यकारिणी के सदस्य बने। सन् 1972 ई. से 1977 ई. तक भारत सरकार की केंद्रीय हिंदी समिति के सदस्य बने रहे। वर्ष 1973 ई. में उन्हें बेल्जियम की रॉयल अकादमी का सदस्य बनाया गया। 17 अगस्त 1982 में गैंगरीन के कारण एम्स, दिल्ली में इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हुई। फादर बुल्के कहते थे संस्कृत महारानी, हिंदी बहूरानी और अंग्रेजी नौकरानी है। एक विदेशी होने के बावजूद फादर ने हिंदी की सम्मान वृद्धि, इसके विकास, प्रचार-प्रसार और शोध के लिए गहन कार्य कर हिंदी के उत्थान का जो मार्ग प्रशस्त किया, और हिंदी को विश्र्वभाषा के रूप में प्रतिष्ठा दिलाने की जो कोशिशें कीं, वह हम भारतीयों के लिये प्रेरणा विषय है।

(नितीश कुमार**************************

हिंदी प्रेमी: कामिल  बुल्के

हिंदी प्रेमी: कामिल बुल्के

रेफेरेंस:

 

6 responses

  1. मेरे इस लेख पर यह एक सोचने को मजबूर कर देने वाली प्रतिक्रिया प्राप्त हुई LinkedIn पर:

    यह स्थिति हमारे तथाकथित बुद्धिजीवियों ने ही निर्मित की है। जितने भी हिन्दी की रोटी खाने वाले हैं उनमें से अधिकांश के बच्चे हिन्दी नही जानते बल्कि अंग्रेजी में ही काम करते हैं ज्यादातर के व्यवसाय भी उनके बच्चों ने ऐसे चुने हैं,जिनमें हिन्दी का कोई स्थान नही होता। हिन्दी के प्राध्यापको /पत्रकारो/राजभाषा अधिकारियो के घरो में जा कर देख लीजिए। बुल्के जैसे विद्वान की कौन सुनता है। यहाँ हिन्दी को बाजार ने बचाया है अन्यथा..

    -भारतेंदु मिश्रा , हिन्दी लेखक मंच् ; समंवयक, शिक्षा विभाग, ‘दिल्ली

    *************************

    ‎@ भारतेंदु मिश्रा

    आप से शत प्रतिशत सहमत हूँ भारतेंदु मिश्राजी..ऐसी स्थिती अगर ना होती तो गली गली में कॉन्वेंट स्कूल ना खुले होते..सबसे बड़ी बात तो यही है कि एक बड़ा फर्क हमने बना रखा है “हिंदी मीडियम” और “अंग्रेजी मीडियम” के नाम पर .. शुरू से ही बच्चे के अन्दर हीन भावना घर कर जाती है और जैसे हम उम्र के कई पड़ाव पार करते है तो यही कुत्सित विभाजन हमे अलग अलग तरीकें से दिखता है. ये विभाजन हमारे ऐसे ही कई सर वाले बुद्धिजीवियों ने बना रखा है.

    एक बात तो यह है कि चलिए हम मान लेते है कि आज के ग्लोबल युग में दोनों भाषाएँ आनी चाहिए ..मगर खल तब जाता है जब एक विदेशी भाषा आपके अस्तित्व को परिभाषित करने लगती है. भाषा पे पकड़ अलग बात है और उसको अपने ऊपर इस कदर हावी होने देना कि वो आपको मशीन की तरह नियंत्रित करने लगे एक नए प्रकार के संस्कारो से तो समझिये खतरे की घंटी बज चुकी है. शायद ये विकास के लिए अंग्रेज़ी को आवश्यक बताने वाले कभी समझ नहीं पायेंगे.

    ****************************

  2. वन्दे मातरम बंधुवर,
    आपने मेरी रचना (मुफलिसी के तन से तूने, खींची चादर लाज की…….) का जिक्र अपने लेख में किया इसके लिए मैं आपका आभार व्यक्त करता हूँ ……… साथ ही अपने आपको बेहद खुशनसीब भी समझ रहा हूँ ………
    हिंदी की इस देश में क्या दुर्दशा है …….. इस पर आपका लेख वास्तव में महत्व पूर्ण है
    सादर
    राकेश गुप्ता

    1. श्री राकेश गुप्ताजी आपकी ये कविता बहुत ही सरल तरीकें से आज के युग की विसंगतियों को प्रदर्शित करती है ..सो मै प्रेरित हुआ इसें अपनी पोस्ट का हिस्सा बनाने के लिए..मेरी वैसे भी कोशिश रहती है कि जो नए लोग अच्छा लिख रहे है उनकी कृतियों को सबके सामने लाना..आप ऐसे ही ह्रदय से कविता लिखते रहे..ये बहुत जरुरी है आज के समय में जब हमारे आस पास समस्याएं कुकुरमुत्ते की तरफ हर ओर उग आई है कविता एक पुल का काम कर सकती है.

      अंत में यही कहूँगा कि आपने मेरी रचना की प्रशंसा की इसके लिए धन्यवाद. सचेत रहेंगे तो हिंदी की दशा आज से बेहतर रहेगी…उम्मीद है आगे भी आपकी प्रतिक्रिया मिलती रहेगी..

      –अरविन्द

  3. एक सन्देश प्रशंसक के नाम जिसने इस लेख को पसंद किया:

    श्रीकांत सक्सेनाजी आप ने मेरे लेख को पसंद किया ये देखकर मुझे प्रसन्नता हुई..आप से वैसे तो मुलाक़ात नहीं हुई ..लेकिन इन्टरनेट बाबा को धन्यवाद कि आपकी कविताओ को पढने का मौका मिलता रहता है..कई बार मैंने आपकी कवितायेँ शेयर की है अपने फेसबुक पेज पर और अन्य जगह. उम्मीद है ऐसी ही आपसे मुलाक़ात होती रहेगी इन्टरनेट के आभासी जगत में ! वैसे हमारा जगत भी आभासी ही है 🙂

  4. एक चर्चा उर्मिला हरितजी के साथ फेसबुक पर जो Indian Institute of Mass Communication (IIMC) में अध्ययन कर चुकी है और अब सरकारी सेवा में है:

    अरविंद जी ऐसा इसलिये है कि हिंदी पत्रकारों/हिंदी अध्यापकों/राजभाषा अधिकारियों के साथ उनके कार्यस्थलों पर दौयम दर्जे का व्यावहार किया जाता है.

    *********************
    उर्मिलाजी इसी बात को तो मुझे समझना है कि “हिंदी पत्रकारों/हिंदी अध्यापकों/राजभाषा अधिकारियों के साथ उनके कार्यस्थलों पर दौयम दर्जे का व्यावहार ” क्यों होता है ? यही तो मुझे जानना है!! क्या हिंदी से जुड़े लोग दोयम दर्जे के लोग होते है या हिंदी से जुड़ना दोयम दर्जे का काम है ?

    क्या आपको ये खतरनाक नहीं लगता कि जिस भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा प्राप्त हो उसको चाहने वाले उसी ही देश में हीनता से ग्रस्त हो जिसमे इस भाषा का उदय हुआ हो ?

    चलिए होनोलूलू (Honolulu ) में हिंदी प्रेम को लेकर आपकी क़द्र नहीं हुई ये तो समझ में आता है पर अपने ही देश में आप लोगो की नज़रो में गिर गए हिंदी प्रेम की वजह से तो ये समझ से परे है ? इससे अच्छा तो मारीशस और सूरीनाम है.

    **********************

  5. Urmila Harit

    अरविंद जी कुछ अपवादों के अलावा हिंदी से जुड़े लोग दोयम दर्जे के नहीं है हिंदी से जुड़ना दोयम दर्जे का काम माना जा रहा है.

    *****************

    @ Urmila Haritji

    ठीक बात है ..ये तो सब अच्छी तरह से जानतें है कि जो हिंदी से जुड़े है वो दोयम दर्जे के नहीं ..पर दून और ऑक्सफोर्ड से निकले लोगो ने जिन्होंने देश चलाने का ठेका ले रखा है और इनके चमचो को शायद हिंदी वाले वैसे ही लगते है है जैसे किसी पांच सितारा होटल के बगल में कोई झुग्गी झोपड़ी….

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