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A Society Interested In Better Changes Should Stop Taming Good Man And Woman!

Don't tame good individuals. It would lead to greater mess!

Don’t tame good individuals. It would lead to greater mess!

I have noticed few very discouraging trend patterns in our times. Firstly, the moment we notice rise of some good human being in any arena, one dares not to appreciate and honour that person. On the contrary, many negative forces come into operation to tarnish his/ her image. It appears being bad is honourable and glorious in our times! The same society raises hue and cry that we don’t have right people to deal with pertinent issues. But the moment someone makes a valiant attempt to change the corrupt scenario all types of negative forces gather on one platform to paint that individual in wrong colours. This tendency is not only baffling but also discouraging for development of better prospects.

Secondly, the great attempt is made to make such daring individual  realize that you are no different than us: corrupt and rotten from inside. That way a greater lot in the society feels that it did a fine job by coercing that individual to have such great realization! If we look back into past we realize that good souls never got true recognition in their lifetime. It’s only after their death, they got elevated to sainthood sort of status. Instead of paving the path of such conscious individual with glorious possibilities, the path gets filled with chosen obstacles. Amazingly, this all happens in a society which always complains about lack of positive changes in society. Meet young or old, man or woman, all will complain about disorder and lawlessness in the society. However, the same lot is not interested in promoting right developments the right way.

That’s the reason I hate taming of  good people. Taming is crime in my eyes, and so I am not at all fascinated by taming business. Why should those man/woman be tamed who dare to think differently, who dare to introduce new ways of thinking in a society?  Why should  these exceptional souls be made on par with same level of distorted thinking which dominates the common masses? However, we do expect values like sincerity, real love, honesty and etc. from each other. I will surely allow my friends a desired freedom but shall not tolerate that they make mockery of it by indulging in atrocious and absurd behaviour. Liberty should not be mistaken as license to behave in contemptuous way. Sadly, for a modern man/woman freedom/liberty means mental corruptness and unaccountability. Anyway, I hope that modern society learns to honour exceptional souls instead of entering in regressive attitude to tame such souls so as to reduce their impact! A society interested in better changes should have something better to offer such agents of change instead of subjecting them to coercive attempts to make them feel ordinary.


Make Good Individuals Attain New Heights Instead Of Making Attempts To Curb Their Giant Spirit!

Make Good Individuals Attain New Heights Instead Of Making Attempts To Curb Their Giant Spirit!


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Why Do People Avoid A Clear Stance In Critical Issues?

Why are we always hesitant in  taking a  clear stance ?

Why are we always hesitant in taking a clear stance ?

“Life is a system of  half-truths and lies, Opportunistic, convenient evasion.”

(Langston Hughes) 

It’s amusing to note that in any controversial issue the general lot never takes a proper stance. The so-called peacemakers try to convey the impression that various parties involved in any contentious issue do have valid reasons to pursue their respective rights. That’s not called resolving the issue or defending the right of weaker lot-the harassed lot. It’s not hard to sense that when you start playing safe, taking a neutral stance, you are prima facie defending the accused.

 Worse, when the the wrong forces emerge as peacemakers, the situation goes out of control since they never let right arguments to prevail. They see suppression of viewpoints, ideas, beliefs, arguments as a mean to ensure peace! After all, arguments in their eyes, escalate the tension! However, the truth is that shrewd manipulators avoid arguments to prevent themselves from getting exposed. The point is that if people learn to argue well in any issue by deciding well whom they actually represent, the bothering issues would soon get resolved. The issue remains unsolved  because the cowards, the gutless souls, acting as peacemakers play politics in name of offering amicable solutions. 

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पूर्णता की शिकार ये कुछ मैच्योर आत्माये (व्यंग्य लेख)

जय गऊ माता की ...जय कुक्कुर देव की भी।।।

जय गऊ माता की …जय कुक्कुर देव की भी।।।

[सर्वप्रथम 03 जुलाई, 2004 वाराणसी/इलाहाबाद से प्रकाशित सम्मानित दैनिक “आज” में प्रकाशित। ये लेख ऑटोमैटिक रूप से प्रयाग की धरती पर भटकती पूर्णता को प्राप्त रूहों से मिलन के बाद लिखा गया था एक दम फटाफट।]

आज का मनुष्य विरोधाभासों का पुतला बन के रह गया है। जिधर भी देखिये आज ऐसे ही मनुष्यों का समूह पायेंगे। तमाम तरह की विरोधाभासी प्रवृत्तियों को इस तरह अपने में समेटे रहते है कि ऐसा लगता है कि व्यंग्य की कृतियों ने मनुष्य का चोला धारण करना आरम्भ कर दिया है। कुछ उदहारण देने से बात समझ में आ जायेगी। आज के अधिकांश राजनैतिक दल जो क्रन्तिकारी परिवर्तनों की बात करते है अगर हम उनको ध्यान से देखे तो पायेंगे कि गली में घूमने वाले टामियों, मोतियों और शेरूओ और इन दलों के बीच का फर्क बिलकुल समाप्त हो गया है। अब इन कुत्तो को देखिये। दूसरी गली में कोई कुत्ता किसी कारण से भौंक रहा हों तो मेरे दरवाजे के पास बैठे काले कुत्ते को भौकना ना जाने किस वजह से अनिवार्य हो जाता है।

फिर तुरंत ही सारे कुत्ते इकट्ठे होकर सामूहिक रूप से अपनी उर्जा समाप्त करके अपनी अपनी जगह लौट जाते है फिर ऐसी किसी प्रक्रिया को क्षणिक विश्राम  के बाद दुहराने के लिए। कोई कुत्ता यदि भिन्नता लिए हो या फिर कोई कुत्ता अजनबी गली से आउटसोर्सिंग की वजह से गुजर रहा हो तो वह अन्य कुत्तो की आलोचना का अर्थात “भौकन  क्रिया” का शिकार हो जाएगा। वह आगे आगे और अन्य गलियों के काले, भूरे, सफ़ेद, चितकबरे आदि रंग के तमाम कुत्ते उत्तेजक रूप से भौकते उसे गति पकड़ने पर मजबूर कर देंगे। कुछ इसी बीच नई माडल की गाडियों पर टांग उठाते चलेंगे।

आप संसद या विधानसभा की कार्यवाही पर गौर करे तो लगेगा कि आप ये सब पहले कही देख चुके है! बात निवेश की हो या आर्थिक सुधारो की कुछ लोग जो ऊँघते या अनुपस्थित न होंगे तो आप उन्हें हरदम “साम्प्रदायिक सरकार नहीं चलेगी, नहीं चलेगी” या “फ़ासिस्ट हाय-हाय” आपको नियमित रूप से उच्चारित करते हुए मिलेंगे। अब पता नहीं किन अनुभवों के आधार पर आर्थिक सुधारो को साम्प्रदायिकता से जोड़ लेते है ये तो खैर इनकी प्रोग्रेसिव आत्मा ही बता सकती है। और इस उच्चारण को जब और सारे दल सुर में सुर मिलाते  है तो वाकआउट नाम का जिन्न प्रकट होता है जो तत्काल सबको एक बराबरी पर ला पटकता है। और इसके बाद कुछ मुद्दों पर इधर-उधर की कह कर अर्थात टांग उठाकर अपने ठिकाने की तरफ बढ़ चलते है। विरोधाभासों के मंच के सशक्त केंद्र बन गए है संसद आदि स्थल।

अपने इलाहाबाद शहर के एक व्यस्त चौराहे पर अखबार की रसीली दुकान है। विरोधाभासों के कई सशक्त हस्ताक्षर यहाँ दिन भर डेरा डाले रहते है। ऐसे ही एक सज्जन कई अखबारों के पन्नो को यूँ ही उल्टा पल्टी करने के बाद टीका टिपण्णी के बाउन्सर फेकने लगते है। एक दिन मुझसे ये बोले हिंदी में जरा आप लिखे तो कुछ बात बने वर्ना अंग्रेजी लेखन के जरिये तो आप कभी राष्ट की  चेतना से सम्बन्ध नहीं बना पायेंगे। पता नहीं अंग्रेज़ क्यों अपनी अंग्रेजी कुछ लोगो के हवाले करके चले गए। अपनी मिसाईल दाग कर वो चलते बने। अफ़सोस इस बात का नहीं था कि अंग्रेजी लेखन को निशाना बनाया गया था पर इस बात का था कि अपनी दिमागी जड़ता को राष्ट्र की चेतना के विकास से जोड़ गए। क्योकि मै अच्छी तरह जानता हूँ कि अगर मै इनसे ये कहता कि मुझे हिंदी की श्रेष्ठ कृतियों से लगाव है तो मुझे ये संस्कृत से जुड़ने की सीख देते, संस्कृत से भी अगर जुड़ा पाते तो फिर ये कहते आप भोजपुरी से क्यों नहीं गठबंधन करते आदि आदि। खैर मै आपको विरोधाभासों के बारे में, विचित्र प्रवृत्तियों के बारे में कुछ बता सा रहा था।

अगले दिन मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ जब मैंने इन सज्जन को फेमिना, कास्मोपोलिटन इत्यादि अंग्रेज़ी मैग्जीनों के पन्नो को पलटते देखा। मैंने उनसे कहा कि लगता है आपने अपना पाला पलट लिया है। अभी आप कल ही तो स्वाभिमान वाली बात कर रहे थें। उन्होंने ये सुनकर कहा कि आपको लगता  है तो लगे पर मै स्पष्ट कर दूँ  कि मै पढ़ नहीं सिर्फ इन्हें सिर्फ देख रहा हूँ। आप की अंग्रेजी पर इतनी पकड़ नहीं तो फिर आप इन्हें देखकर क्या प्राप्त कर रहे है? इस सवाल पर उनका  चेहरा तमतमा उठा पर झेंप को छुपाते हुए बोले देखिये निरुत्तर बनकर मुझे अपूर्णता का शिकार तो होना नहीं है। इनके पन्ने पलटने से तो ही मैचोरिटी आती है। संक्षेप में मंत्र इन्होने ये दिया कि राष्ट्र की चेतना का विकास भले हिंदी में लिखने से होता हों पर पूर्णता अंग्रेजी के मैग्जीनों के पलटने से ही आती है।

अगर सेंट्रल लाइब्रेरी में घटी घटना का उल्लेख न करू तो बात अधूरी रह जायेगी। मै वाचनालय में किसी लेख को पढने में पूरी तल्लीनता से रमा हुआ था कि किसी के कदमो की आहट ने मेरा ध्यान भंग कर दिया। देखा कि एक साहब आदिमकाल के मनुष्यों में पाए जाने वाले गुणों को अभिव्यक्त करते हुए चले आ रहे थें। दुर्भाग्य से ये आके मेरे बगल में खड़े हो गए। आँखे इनकी अभी भी दरवाजे की तरफ ही थी पर इनके हाथो में अंग्रेजी का अखबार आ चुका था। फिर जिस तरह कैशिअर नोटों को गिनता है इन्होने इसी अंदाज़ में पन्नो को तेज़ी सें पलटना आरम्भ किया। केवल मुंह की तरफ हाथ थूंक लगाने के लिए उठता था। कुछ ही सेकेण्ड में भारत का नंबर एक अंग्रेजी का राष्ट्रीय दैनिक अखबार पढ़ा जा चुका था।मुझे इनकी शक्ल कुछ जानी पहचानी सी लगी। भाई साहब लगता है मैंने आपको पहले कही देखा है। इन्होने मेरी तरफ देखा फिर अटपटे लहजे में पूछा कि  आप क्या करते है? इससें पहले कि मै इनसे कुछ कह पाता ये जिस तरह मेरे पास चल के आये थें उसी तरह से ये दरवाजे की तरफ बढ़ चले थें। चलिए ठीक है अब मै किसी जानी पहचानी शक्ल से मिलूँगा तो यही से शुरुआत करूँगा कि आप क्या करते है ? आप की शक्ल कुछ जानी पहचानी रही है। अब तो ठीक है न। शायद मै परिपक्व और पूर्ण हो चला हूँ।


बस इसी रोड पर कुछ कदम और आगे बढ़कर है एक अखबार की  दूकान!

बस इसी रोड पर कुछ कदम और आगे बढ़कर है एक अखबार की दूकान!

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तस्वीर प्रथम 

तस्वीर दितीय

डी के बोस उर्फ़ आमिर खान: भ्रूण हत्या सत्यमेव जयते की !!

भ्रूण हत्या सत्यमेव जयते की !

भ्रूण हत्या सत्यमेव जयते की !

मै अगर कुछ कहता हूँ तो उसके आशय बहुत सारे निकल लिए जाते है.  इसलिए मै कुछ कहने के बजाय अब तक मौन ही था इस सत्यमेव जयते तमाशे पर. अखरता बहुत है जब देखता हूँ भांड टाइप के लोगो को संवेदनशील विषयो पर बोलते हुए.  उस पर भी ये और ज्यादा अखरता है कि जो मीडिया आलोचक की मुद्रा में आ जाता है जब कोई विशेषज्ञ इन विषयो पर अपनी राय प्रकट करता है आज इस सतही आयोजन को बहुत सराह रहा है गोया इसके पहले कभी किसी ने इन मुद्दों पर गौर ही ना किया हो?

मै अब भी कुछ नहीं कहता अगर मेरे पत्रकार मित्र आवेश तिवारीजी, एडिटर इन चीफ नेटवर्क सिक्स, के फेसबुक पेज पर मुझे ये शीबा असलम फहमी का लिखा हुआ सन्देश ना पढने को मिला होता. बिल्कुल ठीक प्रतिक्रिया दी है शीबा ने.  मुझे सिर्फ इतना ही कहना है कि कम से कम सतही लोग संवेदनशील मसलो   से अपने को दूर रखे क्योकि उनकी नीयत पे यकीन करना बिल्कुल असंभव काम है.  आमिर एक अच्छे अभिनेता है लिहाज़ा फिल्मो पे ध्यान दे. गंभीर विषयो पे विचार विमर्श करने के लिए अभी इस देश में विद्वानों का अकाल नहीं पड़ा   है जो हम डी के बोस टाइप के लोगो को गंभीरता से सुनने का प्रयास करे.  ये काम मीडिया में फैले दलालनुमा पत्रकार करते रहे.

शीबा असलम फहमी ने ये कहा:

” बोस डी के, आमिर!

ये वही आमिर खान हैं ना जिन्होंने अपनी एक फ़िल्म में कामयाबी का मसाला डालने के लिए महिला जननांग को दी जानेवाली भद्दी गाली पर एक गाना बनाया और उस गाने को फ़िल्म की पब्लिसिटी में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल किया था ? आमिर खान से मेरा सवाल है की कोई कैसे एक महिला का बाप या भई बनने की हिम्मत करे जब इसी कारण उसे गाली से नवाज़े जाने की संभावना बनती हो? आज वे 3 करोड़ प्रति एपिसोड की दर से नारी-चिंता में कामयाबी के झंडे गाड़ रहे हैं. महिलाओं के ज़रिये कामयाब होना है बस, ‘वैसे’ नहीं तो ‘ऐसे’! पहले गाली दे कर, अब गाली दी गई औरत पर ग्लीसरीन बहा कर! ताज्जुब ये की बड़े-बड़े पत्रकार और लेखक भी इस आमिर-गान में पीछे नहीं! बोस डी के, याद आया ! “

इस पर मधुकर पाण्डेय ने ये जोरदार टिप्पणी दी:

” अब मेरे ख्याल में इन्हें अगला एपिसोड उस विषय पर करना चाहिए जिसमें दो-दो तीन तीन बच्चे पैदा करने के बाद एक मर्द अपनी पत्नी को तलाक तलाक तलाक कह कर … उन्हें अंधेरों में भटकने को छोड़ देता है…. और किसी दूसरी औरत से शादी रचा लेता है…….

यह और कुछ नहीं बाजारवाद और राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं (राज्य सभा ) का एक खेल है…..जिसमें भोली जनता बेवकूफ बनायीं जा रही है पर अब लोग ज्यादा मूर्ख नहीं बन सकते…..क्या आमिर खान कश्मीर से पलायन को विवश हुए कश्मीरी पंडितों की समस्याओं को भी इसी शिद्दत से उठायेंगे…क्या वे गोधरा की ट्रेन में मारे गए उन ५० से अधिक मृतकों के घर जाकर हाल चाल पूछेंगे….? सब माया है…सब बाज़ार है…


Dainik Bhaskar

Satyamev Jayate

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A Prostitute Is Better Than A Political Creature Of Our Times !

A Prostitute Is Better Than A Political Creature Of Our Times !

It’s no secret that one of the political parties has mastered the art of superimposing their lies over the truths. Their “Dabangai” (Hooliganism) is well known.   No body can beat them when it comes to distortion of truths.  More or less, all political parties enter in concoction of facts but the people belonging to this political party excel at this art of lying.

Not only that, like a prostitute, they are ready to sleep with anyone and when their interest is over ready to discard them within a second but not without justifying their act with help of heavy terminology. In other words, even a sex worker is in league with some morals but leaders belonging to this party are devoid of even that much sense of morality.

“Hum to Jhooth Bolega Satta Satta Karega” (We shall lie always for the sake of power) is the mantra that they repeat often. No need to ask the name. Anyway, what’s in a name? Enough hint has already been given !The truth is that  the political parties have mastered the art of deceiving people ! Politics has become worse than a sex industry.

Pic Credit: Samantha Harvey

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Was I born a masochist or did society make me this way?

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मैं, ज्ञानदत्त पाण्डेय, गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश (भारत) में ग्रामीण जीवन जी रहा हूँ। मुख्य परिचालन प्रबंधक पद से रिटायर रेलवे अफसर। वैसे; ट्रेन के सैलून को छोड़ने के बाद गांव की पगडंडी पर साइकिल से चलने में कठिनाई नहीं हुई। 😊


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