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क्या भारतीय समाज में पूर्ण क्रांति या कोई सार्थक बदलाव संभव है? शायद नहीं!!

Satyendra-Dubey

( सत्येन्द्र कुमार दूबे: बदलाव की कीमत  मौत के दरवाजे तक ले गयी )

भारतीय समाज एक विचित्र समाज है! ये बदलाव तो चाहता है लेकिन ये बदलाव का हिस्सा नहीं बनना चाहती. भारतीय समाज एक ढर्रे पे चलने वाला समाज है. ये सही चीजों का हिमायती तो है लेकिन बहुमत फिर भी सार्थक बदलाव के प्रति उदासीनता, आलस और निराशा से भरा है. इसीलिए जयप्रकाश नारायण या वर्तमान में अन्ना हजारे जैसे लोग समाज को झकझोर तो सकते है लेकिन एक सार्थक मूवमेंट को जन्म नहीं दे सकते, लोगो को वैचारिक रूप से उन्नत नहीं कर सकते. गाँधी ने भारत छोड़ो आन्दोलन को गति जरूर प्रदान की लेकिन उसके मूल मे भारत को आज़ाद कराने का संकल्प था, भारतीय समाज के सोचने के तौर तरीके या उसकी कार्यशैली में बदलाव इसके मूल में नहीं था! शायद यही वजह है कि नेहरु के कार्यकाल में ही भ्रष्टाचार के किस्से उभर आये. ये भी उल्लेखनीय है कि गांधी और नारायण जी के आन्दोलन दोनों युवा वर्ग के जोश पे ही आगे बढे लेकिन अंत में या दूरगामी परिणाम “किस्सा कुर्सी का” ही रहा.

ये भारतीय समाज ही है कि आधुनिक काल में भी सरकारी महकमे बनाम प्राइवेट का महत्त्व हावी रहता है. सरकारी चपरासी आपका होनहार दामाद हो सकता है लेकिन एक निपुण कारीगर नहीं!! ये भारतीय समाज ही है जो लड़की की शादी की चिंता से व्यथित रहता है लेकिन दहेज़ के कानून होने के बावजूद हर आदमी शादी में धूमधाम, दहेज़ के लेन देन का सबसे बड़ा उपक्रम करता है सिर्फ और सिर्फ इसलिए कि समाज क्या कहेगा, लोग क्या कहेंगे! ये भारतीय समाज ही है जो अब भी पद की प्रतिष्ठा देखता है, उपरी कमाई देखता है, कलम या कुर्सी कितना फायदा पंहुचा सकती है ये सब देखता है. यही आपके वजूद के मूल्यांकन का पैमाना है और यही पैमाना रहेगा इस भारतीय समाज में. आपकी अच्छाई का कोई मोल नहीं अगर आदमी बिकाऊ नहीं है. इसे आप भौतिकता का तकाज़ा कह ले या फिर उपयोगितावाद का चरम कह ले. साधू संतो से भी मिलते है तो ये भारतीय समाज की दृष्टि है कि वो आश्रम की भव्यता से प्रभावित होता है. वहा की सादगी और दिव्यता असर ही नहीं डालती. ये भारतीय समाज ही है कि फूहड़ क्रिएटिविटी प्रचार का सहारा पाकर ( लेटेस्ट उदाहरण “दिलवाले” का राष्ट्रीय अखबारों में पहले पेज पर फुल साइज़ विज्ञापन देखे ) सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मे बनती है पर वही अच्छी फिल्मो के लिए मल्टीप्लेक्स कल्चर में कोई जगह नहीं!! ना ये फिल्मे रिलीज़ होती है. रिलीज़ होती है तो चलती नहीं, बोरिंग और बकवास कह कर खारिज कर दी जाती है!! इनके कलाकार गुमनामी के अँधेरे में दम तोड़ देते है!!

ये भारतीय समाज की स्याह तस्वीर है कि जो बदलाव, क्रान्ति की बात करते है वे बहुमत द्वारा शक की निगाहों से देखे जाते है! ये बदलाव अगर करते है तो उसका फायदा उठाने की चाह सबमे रहती है लेकिन ऐसे लोगो से लोग दूरी बना कर रखते है! ऐसे लोगो को खुद उसके परिवार वाले और उन्नत भारत का उन्नत समाज “सनकी”, और पागल करार देती है! ये अलग बात है ऐसे “सनकी” और “पागल” लोगो के द्वारा लाये गए बदलाव का हर कोई फायदा उठाता है!! लेकिन ये सबसे बड़ी त्रासदी है इस भारतीय समाज कि बदलाव की बात करने वालो, उसके लिए संघर्षरत रहने वालो के लिए कोई खास स्पेस नहीं. ऐसे लोगो की अंतिम परिणिति या तो असमय मौत में होती है या किसी पागलखाने में उपेक्षित मौत!! ऐसे लोग समाज की नज़रो में जैसा मेरे एक मित्र ने ठीक ही कहा “इरिस्पांसिबल” लोग होते है!! इसलिए इन बदलाव चाहने वालो के पीछे समाज, माफिया या सरकारी व्यवस्था सरकारी इंटेलिजेंस नाम के महकमे के साथ हाथ धोकर पीछे पड़ जाती है.

manjunath

( मंजुनाथ की मौत ये बताती है कि आजादी हमको सिर्फ ब्रिटिश लोगो से मिली. समाज की गंदगी से आजादी अभी बाकी है. )

ऐसी व्यवस्था सिर्फ आम आदमियों को ही नहीं प्रताड़ित करती. खुद अपने ही विद्रोही सरकारी आदमी लोगो को भी नहीं छोडती, विद्रोही सामजिक कार्यकर्ताओ को भी नहीं बख्शती. सो आप सहज ही समझ सकते है कि साधारण पृष्ठभूमि वाले लोग बदलाव के बारे में कैसे सोच सकते है जब एक सरकारी अफसर को माफिया खुले आम जला डालता है, एक माफिया ट्रैक्टर के नीचे युवा IPS अफसर को रौंद डालता है, मंजुनाथ या सत्येन्द्र दुबे भयानक मौत के शिकार होते है या फिर इसी तरह के लोग और भयंकर षड़यंत्र के शिकार होते है. और फिर काल के प्रवाह के चलते ऐसे लोग विस्मृत हो जाते है. भारतीय समाज यथावत अपने समस्त तमाशे के साथ चलता रहता है इस उम्मीद के साथ अच्छे दिन आयेंगे, अच्छे बदलाव होंगे लेकिन हममे से कोई पहल नहीं करेगा, कोई बदलाव की बात नहीं करेगा और हर बदलाव की चाह करने वाले को बुरी तरह प्रताड़ित करना चाहेगा!! बदलाव की इतनी भीषण चाह पर फिर भी बदलाव की राह पे लगे लोगो की इतनी बुरी नियति! सो किसकी शामत आई है जो बदलाव के बारे में सोचे! सिस्टम का हिस्सा बनो और मौज उडाओ. ये सबसे सेफ विकल्प है.

जुडिशियल एक्टिविज्म की बात भी कर ले. वकालत के क्षेत्र से ताल्लुक रखते है तो ये बात क्यों न कहे कि जुडिशियल एक्टिविज्म की सबसे ज्यादा जरुरत तो न्यायालयों के भीतर सबसे ज्यादा है बजाय किसी और क्षेत्र में जहा पेशकार भी पैसा लेता है अगली “डेट” देने के लिए, जहा फैसले केस की मेरिट नहीं आपकी बेंच से प्रगाढ़ ताल्लुकात पे निर्भर है, जहा वकील का रुतबा या चेहरा फैसले पलट देती है, जहा कंटेम्प्ट के कानून का भय इतना है कि सारे वकील लकीर के फकीर बन कर प्रचलित व्यस्था का हिस्सा बन कर अपनी दाल रोटी को सुरक्षित करते है और सारी उम्र बस दाल रोटी को सुरक्षित ही करते रहते है ( और साथ में बदलाव करने वालो को सनकी और पागल कह कर उपहास उड़ाते है ), जहा जज साहिब को सलाम ठोकना आवश्यक है वर्ना आपके हर अच्छे केस का फ्यूचर बस “dismissed” ( खारिज )  होना तय है, और जहा जज साहिब खुद भ्रष्टाचार सहित हर कुकर्म में लिप्त है, जहा डिस्ट्रिक्ट न्यायालयों में हड़ताल/सौदेबाजी  ज्यादा और न्याय कम ही होता है ( पर इसके बाद भी जनता इसी चौखट पे आकर न्याय की गुहार लगाती है और कुछ नक्सली/बागी बन कर अपने से न्याय हासिल करते है !!)

लोग मुझसे अक्सर ये पूछते है अरे समस्याए तो सब गिना देते है, कोई हल हो तो बताइए! हम उनसे यही कहते है हल बहुत साधारण है पर क्या आप जैसे जटिल दिमाग इस साधारण से हल को आत्मसात कर सकते है कि पहले बदलाव की सोच रखने वालो का सम्मान करो और उन्हें उचित सरंक्षण दो. सारे अच्छे बदलाव अपने आप खुद हो जायेंगे!! किसी बदलाव करने वाले को आप शक की निगाहों से देखेंगे, उन्हें मुख्यधारा से बहिष्कृत  कर देंगे, उन्हें प्रताड़ित करेंगे तो किस मुंह से भारतीय समाज बदलाव की आशा रखता है. ये भारतीय समाज खुद सोचे क्या उसे वास्तव में बदलाव की दरकार है? तब कही वो “हल” के बारे में चिंतित हो! हमारे यहाँ तो सभी सिस्टम का हिस्सा बनना चाहते है दिमाग को बंद करके! लकीर का फकीर बने रहना ज्यादा मुनासिब है इस देश में, सिस्टम में सेट होने के जुगाड़ में ही सारी उम्र चली जाती है यहाँ पर! सो क्रांति या असल बदलाव इस देश में इस मानसिकता के चलते संभव नहीं.

इस पोस्ट के आशय को जो हमने दो कविताये अभी पढ़ी वे बहुत अच्छी तरह से उभारती है. पहली कविता तो “अर्द्ध सत्य” फ़िल्म से है और उस चक्रव्यूह की तरफ इशारा करती है जो बदलाव करने वालो को अपनी गिरफ्त में ले लेती है. दूसरी छोटी कविता रमा शंकर यादव “विद्रोही” द्वारा रचित है जो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से निकाल दिए गए थे कैंपस में धरने इत्यादि में शामिल होने के लिए.

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चक्रव्यूह मे घुसने से पहले
कौन था मैं और कैसा था
यह मुझे याद ही ना रहेगा

चक्रव्यूह मे घुसने के बाद
मेरे और चक्रव्यूह के बीच
सिर्फ़ एक जानलेवा निकटता थी
इसका मुझे पता ही न चलेगा

चक्रव्यूह से निकलने के बाद
मैं मुक्त हो जाऊँ भले ही
फ़िर भी चक्रव्यूह की रचना मे
फर्क ही ना पड़ेगा

मरुँ या मारू
मारा जाऊं या जान से मार दूँ
इसका फ़ैसला कभी ना हो पायेगा

सोया हुआ आदमी जब
नींद से उठ कर चलना शुरू करता हैं
तब सपनों का संसार उसे
दुबारा दिख ही नही पायेगा

उस रौशनी में जो निर्णय की रौशनी हैं
सब कुछ समान होगा क्या?

एक पलडे में नपुंसकता
एक पलडे में पौरुष
और ठीक तराजू के कांटे पर
अर्द्ध सत्य

Source: गोविन्द निहलानी की अर्द्ध सत्य

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मैं भी मरूंगा

और भारत के भाग्य विधाता भी मरेंगे

लेकिन मैं चाहता हूं
कि पहले जन-गण-मन अधिनायक मरें
फिर भारत भाग्य विधाता मरें
फिर साधू के काका मरें
यानी सारे बड़े-बड़े लोग पहले मर लें
फिर मैं मरूं- आराम से
उधर चल कर वसंत ऋतु में
जब दानों में दूध और आमों में बौर आ जाता है
या फिर तब जब महुवा चूने लगता है
या फिर तब जब वनबेला फूलती है
नदी किनारे मेरी चिता दहक कर महके
और मित्र सब करें दिल्लगी
कि ये विद्रोही भी क्या तगड़ा कवि था
कि सारे बड़े-बड़े लोगों को मारकर तब मरा॥”

कवि: रमा शंकर यादव “विद्रोही”

Source: Kafila

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narendra kumar
( सरकारी लोग भी माफिया के आतंक से त्रस्त है. नरेन्द्र नाम के इस आईपीएस अफसर की मौत तो यही समझाती है. )

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Suicide Of A Worker In Allahabad: Hope It Does Not Go Unnoticed!!

 

This power plant is generating more controversy than energy!!

This power plant is generating more controversy than energy!!

Shankargarh, an area falling in Allahabad district, has gained notoriety for being in news for all the wrong reasons. This area is infamous for illegal sand mining. If that’s not enough labourers in this area keep dying due to consumption of cheap liquor. We also often hear about fatal road accidents happening in this area, which make many families lose their only bread earner. Very recently, a police officer posted in Bara Tehsil of Allahabad was murdered by dreaded criminals in this region. And now it’s in limelight again after suicide of a worker named Ramesh Tiwari previous week. He was working for Bara Power Project, managed by Prayagraj Power Generation, a subsidiary company under aegis of Jaypee Group,

The exact reason for his suicide remains unknown. It’s learnt that he was working at this power plant since last two years. For past one year, he had allegedly been irregular at work due to medical reasons. His falling physical and mental health did not permit him to gain regularity, leading to financial crisis at his home. Incidentally at the same period a group of farmers, who had previously registered their protest for land acquisition done for construction of this power plant, entered into fresh sit-in-protests at the head office of this company situated at Bara Tehsil. Among many demands the most pressing was regularization of workers who have been working at this power plant. They also demanded for hike in their salary. To avoid the confrontation between management and workers attaining a vulgar shape, a meeting was convened by the company which made workers, management and local government officials sit together to solve the impending crisis arisen out of sit-in-protest. However, the talks failed. That led to pale of gloom among the workers.

It appears that Ramesh Tiwari on hearing about failure of talks became hugely depressed and before anybody could think of making him gain normalcy, he committed suicide. The farmers who were already agitated in regard to sad developments lost their cool on hearing about death of this Ramesh Tiwari-a farmer turned worker! They took possession of the dead body, not allowing the police officials to carry out the regular process. In the form of procession, they all reached to company’s main gate and there they staged a dharna (sit-in-protest) placing the dead body there. They wanted to have dialogue with company’s officials to seek assurances about proper compensation and job guarantee to one member of the deceased family. Strangely none of the officials of this company thought about diffusing the latest crisis. The company officials did not arrive on the spot to have words with the demonstrators.

Farmers make lots of sacrifices and compromises! But what do they finally get? Nothing.

Farmers make lots of sacrifices and compromises! But what do they finally get? Nothing.

Soon huge number of police officials appeared with Sub Divisional Magistrate who first ordered mild lathicharge, followed by the order to forcibly take into possession dead body of the worker. That’s how body was sent for postmortem. It’s a tragic coincidence that few weeks ago at the same power plant a welder named Lal Bahadur Singh met with serious accident. After preliminary treatment at local hospital, he got hospitalized in Allahabad, wherein he succumbed to his injuries. That time too workers had gone berserk, forcing the management to grant compensation of Rs Ten Lakhs.

This is travesty of natural justice that farmers who were first made to give up their lands in name of land acquisition are being made to face this sort of animalistic treatment once they have decided to be part of power plant as workers. They would have never imagined about receiving this sort of discriminatory behaviour, This area is also reeling under environmental crisis after this power plant came into operation. Many serious health issues seem to have started bothering residents of this area. However, people who made many sacrifices to make this power plant a reality, have been left at the mercy of fate!! In case of Ramesh Tiwari, an official of this company, on condition of anonymity, said that this worker had already left this company few months back and thus management can do nothing about him.

This has become order of the day that MNCs and some well-known Indian companies are prone to act of omission and commission in wake of fatal accidents occurring on their premises. Their immediate effort is to sweep the incident under the carpet. At this point I come to remember tragic death of Ambika, who died on 31st October, 2010. She was a permanent employee of Nokia Telecom Special Economic Zone (SEZ) in Sriperumbadur in Kancheepuram district of Tamil Nadu. She met with fatal accident after she was allegedly compelled to work at panel loading machine in the factory. Originally she was handling task assigned to a assembly line worker and she did not at all have the expertise to get involved with technical task associated with panel loading machine. Unfortunately, call her bad luck that she met with terrible accident which killed her. A joint investigation by State Labour Commissioner and Factories Inspectorate swung into action but management at that point of time decided to play safe by engaging in shrewd manipulations.

Coming back to suicide of this worker, I am not sure what’s going to be the fate of this case. However, right now the situation remains tense in Bara Tehsil of Allahabad. Shankargarh area is once again in grip of volatile developments. Let’s hope Ramesh Tiwari gets justice. Let it not be one of the cases wherein death gets unnoticed.

( With inputs from Shri Rajendra Mishra, Human Rights Activist And Senior Journalist,  Kashiwarta,Varanasi )

Negative side of generating power!!

Negative side of generating power!!

 

References:

बारा पॉवर प्रोजेक्ट में कार्यरत मजदूर ने की आत्महत्या: शुरू हुआ लीपापोती का खेल!!

Suicide of a worker in Allahabad: Hope it does not go unnoticed: LinkedIn

Sangharsh Samwad

Dainik Jagaran

Bebak 24

Bara Thermal Power Plant

Death Of Another Worker At Bara Power Project

Death of Ambika: Kafila Publication

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बारा पॉवर प्रोजेक्ट में कार्यरत मजदूर ने की आत्महत्या: शुरू हुआ लीपापोती का खेल!!

बारा पॉवर प्रोजेक्ट : हादसों की उर्जा से ग्रसित!

बारा पॉवर प्रोजेक्ट : हादसों की उर्जा से ग्रसित!

( Also Published On A Prominent Indian Website Related With Cause Of Workers, Sangharsh Samwad, On October 30, 2015 )

इलाहाबाद के शंकरगढ़ क्षेत्र का दुर्भाग्य ये है कि ये अक्सर गलत कारणो से सुर्खियों में रहता है. कभी अवैध खनन की गतिविधियों को लेकर तो कभी सड़क हादसों को लेकर तो कभी दूषित पानी पीने को अभिशप्त लोगो की व्यथा के कारण. जहरीली शराब के कारण होने वाले हादसे भी इस क्षेत्र में अक्सर घटते रहते है. इलाहबाद का चर्चित एसओ हत्याकांड जो बारा में पोस्टेड थें भी इसी शंकरगढ़ क्षेत्र में खूंखार अपराधियों द्वारा दिनदहाड़े कर दी गयी थी. इस बार की घटना बारा पॉवर प्रोजेक्ट जो मिश्रापुरवा गांव में सक्रिय है से जुड़े एक कर्मचारी के कथित रूप से आत्महत्या कर लेने की  है. बारा के मिश्रापुरवा गांव में बारा पॉवर प्रोजेक्ट चल रहा है जिसे जेपी ग्रुप से जुड़े प्रयागराज पॉवर जनरेशन नाम की कंपनी चला रही है. सूत्रों के मुताबिक इसी कंपनी में गाँव कपारी का तीस वर्षीय युवक रमेश तिवारी काम करता था. विगत एक वर्षो से स्वास्थ्य कारणों से वो कंपनी में अपनी उपस्थिति पूर्व की भांति नहीं दर्ज करा पा रहा था. उसकी आर्थिक और मानसिक स्थिति बिगडती जा रही थी.

इसी बीच इस पॉवर प्लांट से प्रभावित आसपास के गाँव के किसान जो कि पहले ही पॉवर प्लांट से जुड़े भूमि अधिग्रहण के लेकर बवाल काट चुके है और इस क्षेत्र में इस पॉवर प्लांट से वातावरण को पहुच रहे नुकसान को लेकर अपनी गंभीर चिंता जता चुके है बारा मुख्यालय पर उन्होंने कुछ दिनों पहले धरना प्रदर्शन किया था. इस धरने प्रदर्शन में कुछ मांगो के अलावा जो किसान इस पॉवर प्रोजेक्ट में कार्यरत थें उन्होंने अपने को स्थायी करने की मांग भी रखी. इसके साथ ही उन्होंने वेतन वृद्धि की भी मांग की. इस बाबत बुलाई गयी वार्ता में कंपनी के अधिकारी, मजदूरो के प्रतिनिधि संघटनो और उपजिलाधिकारी बारा शामिल हुए  पर वार्ता विफल हो गयी. इससे मजदूर वर्ग काफी आहत हुए. इनका आक्रोश अभी ठंडा पड़ता तभी इस किसान ने कथित रूप से आत्महत्या कर ली. बताया जाता है वार्ता विफल होने से ये किसान  अवसाद की स्थिति में पहुच गया था.

किसान की आत्महत्या की खबर ने किसानो में खलबली मचा दी. आक्रोशित किसान शव को लेकर कंपनी के मिश्रापुरवा गेट पर धरने प्रदर्शन पे बैठ गए. वे कंपनी के जिम्मेदार अधिकारियों से वार्ता करना चाहते थें लेकिन मौके पे कम्पनी का कोई भी अधिकारी नहीं आया. प्रदर्शनकारी चाहते थें कि उचित मुवाअजे सहित किसान के परिजनों में से किसी को नौकरी दी जाए. पुलिस के आला अधिकारी क्षेत्राधिकारी बारा सहित घटना स्थल पर तुरंत पहुचे लेकिन प्रदर्शन कर रहे किसानो ने उनकी एक ना सुनी. बाद में उपजिलाधिकारी बारा श्रीमती सुशीला ने हलके लाठीचार्ज के बीच शव को अपने कब्जे में लेकर पोस्टमॉर्टेम के लिए भेज दिया. इस घटनाक्रम में बारा क्षेत्र को अशांत कर दिया है. किसानो में फैले आक्रोश ने स्थिति तनावपूर्ण कर दी है.

इसे आप दुखद सयोंग कहिये कि अभी पिछले महीने ही बारा पॉवर प्लांट में कार्यरत एक वेल्डर के घायल हो जाने के बाद काफी हंगामा मचा था. वेल्डर लाल बहादुर सिंह, निवासी ग्राम मड़हान, जिला जौनपुर,  जो कि बॉयलर सेक्शन में था अपने ऊपर लोहे की रॉड गिर जाने के कारण गंभीर रूप से घायल हो गया जिसकी इलाहाबाद में इलाज़ के दौरान मौत हो गयी. मौत के बाद उपजे हंगामे के चलते 10 लाख रूपए मुआवजा राशि दिए जाने के आश्वसन के बाद आक्रोशित मजदूर शांत हुए.

ये खेदजनक है कि भूमि अधिग्रहण की मार झेलते, प्रोजेक्ट से उपजे पर्यावरण में व्याप्त प्रदुषण सहते किसान जो इतना कुछ सह रहे है उन्हें आये दिन कोई ना कोई विपदा कंपनी के गैर जिम्मेदाराना हरकतों की वजह से झेलनी पड़ रही है. कुछ सूत्रों ने जो कंपनी का पक्ष लेने की कोशिश में लगे है ये बताया कि किसान जिसने आत्महत्या की है उसने ढेढ़ साल पहले ही प्लांट में काम करना बंद कर दिया था.

रमेश तिवारी नाम के मजदूर की आत्महत्या से भड़के परिजनों/ ग्रामीणों को समझती पुलिस!!

रमेश तिवारी नाम के मजदूर की आत्महत्या से भड़के परिजनों/ ग्रामीणों को समझती पुलिस!!

ये अक्सर देखा जाता है कि बड़ी बड़ी कंपनिया मजदूरो से जुड़े अहम् मसलो को लेकर बहुत उदासीन और गैर जिम्मेदार रहते है. सबसे ज्यादा आश्चर्यचकित करता है कोई घटना घट जाने के बाद इनके द्वारा लिए जाने वाला रुख. ज्यादातर मामलो में कंपनी के लोग मामले में लीपापोती करके मामले को ठन्डे बस्ते में डाल देते है. मुझे इस तरह के हादसों से जुड़ा एक उल्लेखनीय मामला याद आता है जो अम्बिका नाम के महिला कर्मचारी के दुखद मृत्यु से सम्बंधित है. ये महिला कर्मचारी नोकिया टेलिकॉम स्पेशल जोन ( SEZ ) श्री पेराम्बदुर, जिला कांचीपुरम, तमिलनाडू, में कार्यरत थी. इसकी दर्दनाक मृत्यु पैनल लोडिंग मशीन में हुए एक हादसे में हो गयी. कहा जाता है काम की अधिकता की वजह से इसे इस सेक्शन में जबरन काम करना पड़ा जिसके बारे में इसे अधिक टेक्निकल जानकारी नहीं थी और ये हादसा घट गया.

बारा पॉवर प्रोजेक्ट से जुड़े कंपनी के अधिकारी इस मामले में क्या रुख अपनाते है ये तो वक्त ही बताएगा लेकिन फिलहाल अभी तो किसानो में भारी आक्रोश व्याप्त है घटना को लेकर और घटना के बाद प्रशासन और कंपनी के भ्रामक और गैर जिम्मेदार रुख के कारण. उम्मीद है इस मजदूर के साथ न्याय होगा.

क्या थर्मल पॉवर प्लांट से उपजे प्रदूषण की चिंता है किसी को?

क्या थर्मल पॉवर प्लांट से उपजे प्रदूषण की चिंता है किसी को?

( With Inputs From Sri Rajendra Mishra, Senior Journalist, Kashivarta, Chunar, Mirzapur )

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[ I am really thankful to Mr. Rajendra Mishra, senior journalist, Kashivarta, published from Varanasi, for giving me a chance to work on story pertaining to suicide of worker at power plant run by Jaypee Group. Mr Mishra is also a well known human rights activist. Initially I was reluctant to work on it since writing news reports is not my strength and they are also not my on par with my taste which likes to deal more with features and columns. Today I was informed that news report written by me has found place on a very prominent website of India, “संघर्ष संवाद”, which deals with cause of workers. Feel glad about it. Efforts did not go in vain!!! ]

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References:

Dainik Jagaran

Bebak 24

Bara Thermal Power Plant

Death Of Another Worker At Bara Power Project

Death of Ambika: Kafila Publication

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साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की नौटंकी- तमाशा खूब है यारो!!

कुछ लेखको को देश में इस कदर असहिष्णुता के दर्शन होने लगे कि इन सभी ने पुरस्कार लौटाने की घोषणा कर दी. इस मानसिकता को समझना बहुत जरुरी है कि इनको वाकई बिगड़ते माहौल की फिक्र है या ये किसी तुच्छ राजनीति से प्रेरित है.

कुछ लेखको को देश में इस कदर असहिष्णुता के दर्शन होने लगे कि इन सभी ने पुरस्कार लौटाने की घोषणा कर दी. इस मानसिकता को समझना बहुत जरुरी है कि इनको वाकई बिगड़ते माहौल की फिक्र है या ये किसी तुच्छ राजनीति से प्रेरित है.

ये देश तमाशो और नौटंकी का है. सो ये आश्चर्यचकित नहीं करता कि कुछ ख़ास वर्ग समय समय पर नौटंकी करते रहते है. इसमे से अधिकतर वामपंथी मसखरे होते है. या इनसे संचालित संस्थाए होती है. इस लेख के लिखे जाने तक कम से कम विभिन्न भाषाओ के २५ लेखक अपना  पुरस्कार लौटा चुके है. अगर बिके हुए मीडिया की बात माने तो इन सबको देश में बढ़ते हुए धार्मिक असहिष्णुता के चलते काफी ठेस लगी  है. कन्नड़ चिन्तक एमएम कलबुर्गी, भाकपा के वरिष्ठ नेता गोविंद पानसरे, भारतीय तर्कवादी और महाराष्ट्र के लेखक नरेन्द्र अच्युत दाभोलकर और दादरी काण्ड के चलते इन लेखको को देश में इस कदर असहिष्णुता के दर्शन होने लगे कि इन सभी ने पुरस्कार लौटाने की घोषणा कर दी. इस मानसिकता को समझना बहुत जरुरी है कि इनको वाकई बिगड़ते माहौल की फिक्र है या ये किसी तुच्छ राजनीति से प्रेरित है.

नामवर सिंह की बात इस परिपेक्ष्य में काफी महत्त्वपूर्ण हो जाती है. और जैसा ये तय था कि नामवर सिंह की बात सुनकर इन सब का बिलबिलाना तय था. वही हुआ. “डॉक्टर सिंह ने देश के पच्चीस लेखकों द्वारा अकादमी पुरस्कार लौटाए जाने पर कहा क़ि लेखक अख़बारों में सुर्खियां बटोरने के लिए इस तरह पुरस्कार लौटा रहे हैं। उन्होंने कहा कि मुझे समझ में नहीं आ रहा कि लेखक क्यों पुरस्कार लौट रहे हैं। अगर उन्हें सत्ता से विरोध है तो साहित्य अकादमी पुरस्कार नहीं लौटाने चाहिए, क्योंकि अकादमी तो स्वायत संस्था है और इसका अध्यक्ष निर्वाचित होता है। यह देश की अन्य अकादमियों से भिन्न है। आखिर लेखक इस तरह अपनी ही संस्था को क्यों निशाना बना रहे हैं। अगर उन्हें कलबुर्गी की हत्या का विरोध करना है तो उन्हें राष्ट्रपति, संस्कृति मंत्री या मानव संसाधन मंत्री से मिलकर सरकार पर दबाव बनाना चाहिये और उनके परिवार की मदद के लिए आगे आना चाहिए। उनका यह भी कहना है कि इस मुद्दे पर अकादमी को लेखकों का एक सम्मेलन भी करना चाहिए, जिसमें इन सवालों पर खुल कर बात हो।” नामवर सिंह जी ने बिना लाग लपेट के खरी खरी कह दी. जाहिर सी बात है इस सीधी सी बात का इन पुरस्कार लौटाने की होड़ में लगे हुए लेखको के पास कोई जवाब नहीं. लेखको का राजनीति से यूँ तो काफी घनिष्ठ सम्बन्ध है लेकिन ये भी सड़कछाप राजनीति में मोहरों की तरह इस्तेमाल होंगे ये पता ना था.

नामवर सिंह: मुझे समझ में नहीं आ रहा कि लेखक क्यों पुरस्कार लौट रहे हैं। अगर उन्हें सत्ता से विरोध है तो साहित्य अकादमी पुरस्कार नहीं लौटाने चाहिए, क्योंकि अकादमी तो स्वायत संस्था है और इसका अध्यक्ष निर्वाचित होता है। यह देश की अन्य अकादमियों से भिन्न है। आखिर लेखक इस तरह अपनी ही संस्था को क्यों निशाना बना रहे हैं?

नामवर सिंह: मुझे समझ में नहीं आ रहा कि लेखक क्यों पुरस्कार लौट रहे हैं। अगर उन्हें सत्ता से विरोध है तो साहित्य अकादमी पुरस्कार नहीं लौटाने चाहिए, क्योंकि अकादमी तो स्वायत संस्था है और इसका अध्यक्ष निर्वाचित होता है। यह देश की अन्य अकादमियों से भिन्न है। आखिर लेखक इस तरह अपनी ही संस्था को क्यों निशाना बना रहे हैं?

अगर ये वाकई बुद्धिजीवी वर्ग का प्रतिनिधित्व करते है तो इन्हें विरोध और वो भी एक जेन्युइन विरोध को  बेहतर तरीके से उभारना चाहिए था. लेकिन जब तह में दिखावटी कारण हो तो ये भी तय है कि विरोध भी भांडनुमा ही बन जाएगा. इनसे पूछा जाना चाहिए जब कांग्रेस काल में इतने सुनियोजित तरीके से दंगे हुए, महाराष्ट्र में एक वर्ग गांधी की प्रतिमा का खुले आम निरादर करता है, खुले आम गुंडागर्दी करता है, तस्लीमा नसरीन को खुले आम धमकियाँ दी गयी जिस वजह से उसे एक देश से दुसरे देश में जान बचाने के लिए भागना पड़ रहा है, सलमान रुश्दी का भारत में कार्यक्रम इस वजह से स्थगित हो गया कि उन्हें एक वर्ग विशेष ने पहले ही चेता दिया था कि अंजाम सही नहीं होगा तब क्या इन लेखको की आत्मा मर गयी थी? तब क्या इनका जमीर ख़ाक हो गया था? और आज एक बारगी इन लेखको को देश में फैलते  असहिष्णुता के दर्शन हो गए?

ये क्या सुनियोजित नहीं लगता? क्या ये महज संयोग है कि पुरस्कार लौटाने वाले अधिकतर किसी ना किसी रूप में वामपंथी विचारधारा से संचालित है. और क्या हम नहीं जानते ज्यादातर  वामपंथियों ने इस देश की जड़ खोदने का ही काम किया है. ये कहने में भी गुरेज़ नहीं कि ये सब विदेशी ताकतों से संचालित है. कडवी बात ये है कि उन्हें इस सरकार को घेरने का कोई मुद्दा ही नहीं मिल रहा है. सो मुद्दे अंग्रेजी में कहे तो “concocted” किये जा रहे. बात बस इतनी सी है. वो कहावत है ना कि कीचड फेंकते रहो कुछ ना कुछ तो चिपक ही जाएगा. ये सारे राष्ट्र विरोधी ताकते इस वक्त इसी फिराक में लगी है. लेखको कि एक जमात भी इसी  खेल में मोहरों की तरह फिट हो गयी. मुझे इसी बात का खेद है.

ऐसा नहीं कि मुझे विचारको या चिंतको के मारे जाने का दुःख नहीं लेकिन जब इस को एक घिनौने रूप से गन्दी राजनीति को आगे बढाने के लिए एक औजार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है तब तकलीफ होती है. ये पुरस्कार लौटाने वाले भाई लोग चाहे कुछ भी जताने की कोशिश करे, और चाहे दोगली मीडिया इनको कितना महिमंडित करे असल कहानी सिर्फ और सिर्फ यही रहेगी कि कुछ लोग जो इस सरकार की स्थिरता से बौखलाए है खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचे की तर्ज पर सरकार को अस्थिर करने का कारण ढूंढ रहे है. लेखक जो प्रबुद्धता की निशानी होते है वे भी इस गंदे खेल में शामिल हो गए ये जरुर खलेगा. लेकिन फिर भी हम ये ना भूले कि इसमें अधिकतर वामपंथ से पोषित
है और वामपंथी इस देश के प्रति कैसी निष्ठां रखते है ये किसी से नहीं छुपी!  इलाहाबाद में भी साहित्यकार बंधू जुटे और इनमे ज्यादातर वामपंथ समर्थित अप्रासंगिक हो चुके लेखको की एक लम्बी फौज थी जिनकी समझ ये है कि ओसामा बिन लादेन में भी ये महानता के गुण ढूंढ लेंगे लेकिन नरेन्द्र मोदी में सिर्फ और सिर्फ हिटलर और मुसोलिनी के ही दर्शन होंगे!!

कुछ एक साल पहले लखनऊ में एक प्रेस कांफ्रेंस में जामा मस्जिद के इमाम सैयद अहमद बुखारी ने एक पत्रकार को सरे आम धमकी दी और बुरी तरह पीटा भी लेकिन इस खबर को कोई अहमियत नहीं मिली. कुल मिला के मामला ये है कि असहिष्णुता के मायने इस देश में ये है कि जब सिर्फ एक वर्ग विशेष को किसी भी वजह से तकलीफ पहुंचे तो सब जगह इस बात को बढ़ा चढ़ा कर बताओ कि देश में असहिष्णुता पनप रही है! दादरी हत्याकांड के तह में मत जाओ, उसकी असल वजह मत जानो लेकिन ये सब जगह फैला दो कि एक मुसलमान की मौत हो गयी! कल को शायद सडक हादसों में मरने वाले मुसलमान को भी सांप्रदायिक हिंसा का शिकार बता दिया जाए!!

अंत में सिर्फ ये जानना चाहेंगे स्वामी लक्ष्मणानन्द जी की हत्या जब क्रिस्चियन मिशनरीज के षड़यंत्र के चलते जन्माष्टमी समारोह के दौरान उड़ीसा में हुई थी तब क्या किसी लेखक ने ( अभी तक  के इन २५ लेखको को मिलाकर जिन्होंने पुरस्कार लौटाए है) असहिष्णुता के चलते अपना पुरस्कार लौटाया था? या लौटाने का सोचा था? और नहीं लौटाया ना ही लौटाने का सोचा तो उन्होंने ऐसा क्यों किया? तब आपको समझ में आ जाएगा कि वे आज ऐसा असल में क्यों कर रहे है! या इन लेखको की आत्मा तब क्यों नहीं डोली जब सामूहिक नरसंहार झेलते झेलते कश्मीरी पंडित जम्मू और कश्मीर से लगभग पूरी तरह से पलायन कर गए!!  ये तो कई वर्षो से इनके साथ हो रहा है!  इतने सालो में इन लेखकों की नजर इन पर एक बार भी नहीं पड़ी. इन कश्मीरी विस्थापितों के दुःख दर्द से क्यों नहीं इन लेखको की आत्मा डोली?

अंत में सिर्फ ये जानना चाहेंगे स्वामी लक्ष्मणानन्द जी की हत्या जब क्रिस्चियन मिशनरीज के षड़यंत्र के चलते उड़ीसा में हुई थी तब क्या किसी लेखक ने ( अभी तक के इन २५ लेखको को मिलाकर जिन्होंने पुरस्कार लौटाए है) असहिष्णुता के चलते अपना पुरस्कार लौटाया था? या लौटाने का सोचा था? और नहीं लौटाया ना ही लौटाने का सोचा तो उन्होंने ऐसा क्यों किया? तब आपको समझ में आ जाएगा कि वे आज ऐसा असल में क्यों कर रहे है!

अंत में सिर्फ ये जानना चाहेंगे स्वामी लक्ष्मणानन्द जी की हत्या जब क्रिस्चियन मिशनरीज के षड़यंत्र के चलते उड़ीसा में हुई थी तब क्या किसी लेखक ने ( अभी तक के इन २५ लेखको को मिलाकर जिन्होंने पुरस्कार लौटाए है) असहिष्णुता के चलते अपना पुरस्कार लौटाया था? या लौटाने का सोचा था? और नहीं लौटाया ना ही लौटाने का सोचा तो उन्होंने ऐसा क्यों किया? तब आपको समझ में आ जाएगा कि वे आज ऐसा असल में क्यों कर रहे है!

References:

नामवर सिंह
साहित्य अकादमी पुरस्कार
स्वामी लक्ष्मणानन्द जी की हत्या
अवार्ड विवाद

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The Politics Of Rape In India

Mulayam Singh Yadav: Sometimes even wrong people say right things!

Mulayam Singh Yadav: Sometimes even wrong people say right things!



In early 80s one of the popular Hindi flicks revolved around a sensational theme wherein a girl accused a boy of attempting to rape her when she got caught during the seduction stage. As a result of that false accusation, the boy became victim of deep psychological disorder for lifelong. Similarly, a blockbuster Hindi movie released in early 90s shows the protagonist teaching a fitting lesson to her ladylove, who tries to take a revenge by feigning rape! The protagonist makes her very clear that a lady should not stoop down at this level wherein a sexual offence becomes a weapon to settle personal grudges. Not a long back ago the Supreme Court refused to grant relief to a girl who had feigned rape, which led to trial of two innocent youths. They had to ‘suffer the ignominy’ of being involved in such a serious offence!

The Supreme Court in his verdict, without mincing words, stated that  ‘evil of perjury’ has assumed alarming proportions and, therefore, girl deserves no sympathy for maliciously setting the law in motion. “It was a settled position in law that so far as sexual offences are concerned, sanctity is attached to a victim’s statement and that the evidence of victim alone is sufficient for the purpose of conviction if it is found to be reliable, cogent and credible.” It’s ludicrous that an absurd hue and cry is being made over Mulayam Singh Yadav’s alleged rape remarks. Before entering into interpretation of his remarks, it would not be offensive to state that there are few takers, including myself, of type of caste-ridden politics played by Mulyam Singh Yadav, Lalu Yadav and Mayawati. They are icons of regressive tendencies in Indian politics, who never allowed their followers to truly embrace progressive ideals. That’s the reason why Uttar Pradesh is still struggling hard to emerge as a developed state!

One needs to be sufficiently cautious while interpreting remarks of Mulyam Singh Yadav. True, his statement “boys…make mistakes” need to be severely condemned as it trivializes the gravity of a serious offence like rape. However, that’s not the only remark he made. One of the flaws committed by Indian and foreign journalists is that they tend to rely more on sensationalism and as a result of that they misquote and misinterpret serious remarks. That’s not only against the spirit of ethics based journalism but such tendencies also lead to volatile situation in various circles of society. I am sure that an ace politician like Mulyam Singh Yadav would have got his intent right when he pointed out a disturbing trend in Indian society, wherein sexual offences have become a tool to serve vested interests.

 If law makers are truly interested in equity based legal system then their prime task should be to make laws gender neutral!

If law makers are truly interested in equity based legal system then their prime task should be to make laws gender neutral!

The mainstream media eager to cash-in-on the controversial remark failed to highlight the other portion of his speech wherein he stated that “those filing false reports will also be taken to task” so as to stop the misuse of anti-rape law. The mainstream media, controlled by the feminist forces, very shrewdly suppressed this part of the alleged speech. He was demanding a change in anti-rape law not because “boys make mistake” but because its misuse has attained alarming proportions: “Boys and girls fall in love but due to differences they fall apart later on. When their friendship ends, the girl complains she has been raped.” This statement needs to be interpreted in light of  scenario prevailing in present day Indian society marred by perverse tendencies even if one has no place for brand of politics played by likes of Mulayam and Mayawati! This time a wrong person has said a right thing. Why are we hell bent to ignore a harsh reality of present age wherein women are not hesitant to put at stake their own dignity if that suits their interests?
 

Interestingly, cinema is said to be the mirror of society. The filmmakers were far ahead unlike the lawmakers, having their mindset caught in time-warp, in anticipating the disturbing changes in approach of modern Indian women. Unlike the lawmakers who remained glued to perception of “abla nari” (a woman is too innocent and weak to commit any wrong), the filmmakers were bold enough to depict newer trends emerging among women fraternity (refer to movies like Undertrial, Aitraaz, Corporate and etc.). It’s a very recent phenomenon that Supreme Court has taken cognizance of misuse of dowry laws besides being worried about growing trend of perjury cases while dealing with sexual offences. However, it’s quite ironical and travesty of present day grim tendencies that new anti-rape law has no place for gender-neutral provisions. That’s quite shocking. That means law still believes that only men could be perpetrators! How long are the lawmakers going to behave like ostriches having their heads buried in sand?

Needless to state that nobody is suggesting, or rather no one wants that people guilty of sexual offences of serious types should remain above stringent punishment. However, at the same time, it’s also pertinent that fair sex involved in  unfair practise of misusing laws should not be allowed to get off scot free. At the same time if law makers are truly interested in equity based legal system then their prime task should be to make laws gender neutral. What’s the point in nurturing illusions of medieval ages? They need to take clue from filmmakers, who are at least honest enough to portray real face of Indian society as it is (even if they do so to ensure flow of cash)! And the journalistic circle should better restrain themselves from viewing everything from political angle. That would augur well for the welfare of Indian society. The media should be more governed by truth than by falsehood, confusion, and twisted truth sponsored by the corrupt feminist forces! It’s really pathetic that biased mainstream media is averse to anything remotely serving the cause of men and is quick to nasty interpretations of well-meaning sentiments. And it’s even more sadder to notice that even social media remained concentrated on personal attacks rather than framing a more logical perspective!

Justice Dhingra: New Anti-rape law could be misused!

Justice Dhingra: New Anti-rape law could be misused!

References:

The Times of India

New York Daily News

Anti-rape law

False Rape Case

Supreme Court On Misuse of Rape Law

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Khushwant Singh: The Writer Who Made Reading An Interesting Affair!

I would not remember Khushwant Singh as a writer who dealt with women, wine, kisses and sex in his writings, but I would always remember him as a writer who made it easy for me to write simple English in an age when writing has got wedded to complexities!

I would not remember Khushwant Singh as a writer who dealt with women, wine, kisses and sex in his writings, but I would always remember him as a writer who made it easy for me to write simple English in an age when writing has got wedded to complexities!

I have always been a great fan of writings of Khushwant Singh. That’s because his style of writing made reading an interesting affair, an engrossing episode. In fact, I did not subscribe to his ideological leanings but, nevertheless, I always found enough time to have a look at his write-ups. In literary circles, he was known for bringing forth history of Sikhs. It was a voluminous affair and he did that with perfection. Besides that novels like Train to Pakistan substantiated his fame as a writer.

I remember well that I had habit of reading novels in college days but slow reading never allowed me to finish the novels in one go. Being student of English Literature my bond with English novels deepened with each passing moment in those years. One of my classmates, who loved to buy novels in his limited pocket money, bought this novel but kept it a secret, knowing well that if by chance I came to know about the whole thing, the novel would soon become a history for him. Unfortunately, all things hidden secretly are spotted easily by me. I carried this novel to my home, much against his desire, but I returned this novel to him just after few days. It came as a huge surprise for him since I was infamous for keeping novels for months at my home. I told him that this novel was written in such a lucid way that it made reading a pleasant affair.

Train to Pakistan records tragic events related with Partition of India. It was a complex theme of which I had become aware of through TV serials like Tamas. And so I was not interested in reading again anything related with same theme but once I started reading this novel not for a moment I found reading becoming a dull task. It was written in such a soul-stirring manner that you were left with no other alternative other than to read from start to finish, devoid of long breaks! That explains as to why he emerged as such a popular writer among all the class of people. His writings were devoid of flamboyant and bombastic expressions. He wrote in simple English- something that you also notice when you are reading works of R K Narayan- which attracted even those readers having aversion for anything written in English!

Nowadays I meet many readers who complain that reading has become such a difficult task because modern day writers, especially award-winners, have given way to complex phrases, weird expressions, and meandering sentence constructions which more often than not leave them confused and irritated. However, this was not the case with Khushwant Singh. His column “With Malice towards One and All” which featured in English dailies and “Na Kahu Se Dosti Na Kahu Se Bair” which found space in Hindi newspapers broke all records of popularity. The anecdotes, and daily dose of humour which marked these columns served as life-line for many readers besides ensuring a respectable circulation.

Now having turned writer myself, I feel grateful to writers like Khushwant Singh, R K Narayan and Ruskin Bond, who taught me the art of writing simple English. I mean they taught me how to narrate serious episodes in easy language without compromising with seriousness inherent in them! I would not remember Khushwant Singh as a writer who dealt with women, wine, kisses and sex in his writings, but I would always remember him as a writer who made it easy for me to write simple English in an age when writing has got wedded to complexities!

One of the most important works of Khushwant Singh!

One of the most important works of Khushwant Singh!

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कांची के शंकराचार्य की रिहाई इस बात को दर्शाती है कि वर्तमान समय में दुष्प्रचार ज्यादा ताकतवर है बजाय सत्य के!

कांची के शंकराचार्य अंततः निर्दोष और निष्पाप होकर उभरे लेकिन इस नौ साल लम्बे ड्रामे की वजह से इस अति प्राचीन हिन्दू मठ पर जो दाग लगे उसको मिटने में कई वर्ष लगेंगे.

कांची के शंकराचार्य अंततः निर्दोष और निष्पाप होकर उभरे लेकिन इस नौ साल लम्बे ड्रामे की वजह से इस अति प्राचीन हिन्दू मठ पर जो दाग लगे उसको मिटने में कई वर्ष लगेंगे.


इस नए युग के इंडिया यानि “भारत” के अगर हाल के घटनाओ को देखे तो ये आसानी से समझ आ जाएगा कि धर्मनिरपेक्ष सरकारो ने सबसे ज्यादा जुल्म ढाया है हिन्दू संतो पर. ये धर्मनिरपेक्ष सरकारे मुग़लकाल के बाद्शाहो और ब्रिटिश काल के शासको से भी ज्यादा क्रूर रही है हिन्दू धर्मं से जुड़े प्रतीकों को ध्वस्त करने और इनसे जुड़े लोगो को अपमानित करने के मामले में. हिन्दू संतो को निराकरण ही प्रताड़ित किया जा रहा है और इन्हे यौन अपराधो से लेकर देशद्रोह जैसे जघन्य अपराधो में बेवजह घसीटा जा रहा है. बिकी हुई मीडिया इन प्रकरणो का एक पक्ष 
दिखाती  है अपने देश में और देश के बाहर विदेशी अखबारो में. ये आपको अक्सर देखने को मिलेगा कि इस प्रकार के खबरो में ज्यादातर झूठ होता है या अर्धसत्य का सहारा लेकर एक भ्रामक कहानी गाढ़ी जाती है. कोई भी मुख्यधारा का समाचार पत्र तस्वीर के दोनों पहलू दिखाने में दिलचस्पी नहीं रखता.

एक सबसे बड़ी वजह ये है कि ज्यादातर  भारतीय मीडिया समूह का कण्ट्रोल विदेशी ताकतो के हाथो में है. सबके विदेशी हित कही ना कही शामिल है तब हम किस तरह से इनसे ये आशा रखे कि ये सच बोलेंगे? ये वही मुख्यधारा के समाचार पत्र है जो साध्वी प्रज्ञा के गिरफ्तारी को तो खूब जोर शोर से दिखाते है लेकिन साध्वी के साथ जेल के अंदर हुए अमानवीय कृत्यो को जो बंदियो के अधिकारो का सरासर उल्लंघन था उसको दिखाने या बताने से साफ़ मुँह मोड़ गए. ये वही मुख्यधारा के समाचार पत्र है जिन्होंने देवयानी प्रकरण में देवयानी का साथ इस तरह से दिया जैसी कि उसने भारत के नाम विदेशो में ऊँचा किया हो, जैसे उसने कोई जुर्म ही नहीं किया हो. वो इसलिए से क्योकि इसका सरकार से सीधा सरोकार है और सिस्टम इसके पक्ष में है लेकिन हर वो आदमी जिसने भी सरकार ये सिस्टम के विपक्ष में कुछ कहा उसे इस तरह की  सरकारे या सिस्टम सुनियोजित तरीको से अपराधी घोषित कर देता है.

ये कहने में कोई संकोच नहीं कि आज के युग मे सत्य से ज्यादा असरदार किसी के खिलाफ सुनियोजित तरीके से फैलायी गयी मनगढंत बाते है. समाचार पत्रो का काम होता है सत्य को सामने लाना सही रिपोर्टिंग के जरिये लेकिन हो इसका ठीक उल्टा रहा है: मीडिया आज सबसे बड़ा हथियार बन गयी है झूठ और भ्रम को विस्तार देने हेतु. इसका केवल इतना काम रहा गया है कि हर गलत ताकतो को जो सत्ता में है उनको बचाना, उनको बल देना. एक बाजारू औरत की तरह अपनी निष्ठा को हर बार बदलते रहना मीडिया का एकमात्र धर्मं बन गया है. साधारण शब्दो में ये सत्ता पे आसीन शासको की भाषा बोलता है. कांची के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी की गिरफ्तारी के प्रकरण के रौशनी में इस प्रकरण को देखे जिन्हे २००४ में बेहद शर्मनाक तरीके से शंकर रमण के हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था. शंकर रमण कांची के एक मंदिर में मैनेजेर थें. उस वक्त के तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने अपने को धर्मनिरपेक्ष साबित करने के लिए और ये जताने के लिए कि कानून से ऊपर कोई नहीं होता इनकी गिरफतारी सुनिश्चित की. कांची के शंकराचार्य के ऊपर “आपराधिक षड्यंत्र, अदालत को गुमराह करने गलत सूचना के जरिये, धन का आदान प्रदान आपराधिक गतिविधि को क्रियांवित करने के लिये” आदि आरोप लगाये गए.

इस एक हज़ार साल से भी ऊपर अति प्राचीन ब्राह्मणो के अत्यंत महत्त्वपूर्ण केंद्र के मुख्य संचालक को इस तरह अपमानजनक तरीके से एक दुर्दांत अपराधी के भांति गिरफ्तार करना और फिर मुख्यधारा के समाचार पत्रो के द्वारा अनर्गल बयानो के आधार पर उनको दोषी करार कर देना अपने आप में मीडिया की सच्चाई बयान कर देता है. ये बता देना आवश्यक रहेगा कि कांची कामकोटि पीठ हिन्दुओ का अति प्राचीन मठ है जिसको हिन्दू समुदाय में दुनिया भर में बेहद श्रद्धा के साथ देखा जाता है. कांची के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी बहुत सम्मान की दृष्टि से देखे जाते रहे है हिन्दू शास्त्रो के मर्मज्ञ होने के कारण. इन्होने  नवी शताब्दी में स्थापित कांची कामकोटि पीठ के गरिमा को नयी ऊंचाई प्रदान की, जिसकी हिन्दू समुदाय में वेटिकन चर्च सरीखी पकड़ है. जयललिता और ब्राह्मण विरोधी नेता डीएमके प्रमुख करूणानिधि के आपसी मतभेदों के चलते इस हिन्दू मठ के माथे पर कालिख लग गयी.

 ये बता देना आवश्यक रहेगा कि कांची कामकोटि पीठ हिन्दुओ का अति प्राचीन मठ है जिसको हिन्दू समुदाय में दुनिया भर में बेहद श्रद्धा के साथ देखा जाता है. कांची के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी बहुत सम्मान की दृष्टि से देखे जाते रहे है हिन्दू शास्त्रो के मर्मज्ञ होने के कारण. इन्होने  नवी शताब्दी में स्थापित कांची कामकोटि पीठ के गरिमा को नयी ऊंचाई प्रदान की, जिसकी हिन्दू समुदाय में वेटिकन चर्च सरीखी पकड़ है. जयललिता और ब्राह्मण विरोधी नेता डीएमके प्रमुख करूणानिधि के आपसी मतभेदों के चलते इस हिन्दू मठ के माथे पर कालिख लग गयी.

ये बता देना आवश्यक रहेगा कि कांची कामकोटि पीठ हिन्दुओ का अति प्राचीन मठ है जिसको हिन्दू समुदाय में दुनिया भर में बेहद श्रद्धा के साथ देखा जाता है. कांची के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी बहुत सम्मान की दृष्टि से देखे जाते रहे है हिन्दू शास्त्रो के मर्मज्ञ होने के कारण. इन्होने नवी शताब्दी में स्थापित कांची कामकोटि पीठ के गरिमा को नयी ऊंचाई प्रदान की, जिसकी हिन्दू समुदाय में वेटिकन चर्च सरीखी पकड़ है. जयललिता और ब्राह्मण विरोधी नेता डीएमके प्रमुख करूणानिधि के आपसी मतभेदों के चलते इस हिन्दू मठ के माथे पर कालिख लग गयी.

उस वक्त के प्रमुख समाचार पत्रो ने ये दर्शाया कि पुलिस इस तरह से गिरफ्तार करने का साहस बिना पुख्ता सबूतो के कर ही नहीं सकती. उस वक्त अभियोजन पक्ष के वकील इस बात से पूरी तरह आश्वस्त थे कि शंकराचार्य को दोषी साबित करने के लिए उनके पास पर्याप्त पुख्ता सबूत थें. विवेचना अधिकारी प्रेम कुमार का ये बयान प्रमुखता से छपा कि हमारे पास ठोस साक्ष्य है स्वामी जयेन्द्र सरस्वती के खिलाफ और ये कि शंकर रमण और इनके बीच करीब चार सालो से आपसी मनमुटाव था जिसको सिद्ध करने के लिए पर्याप्त सबूत इकठ्ठा किये जा रहे है.

खैर ईश्वर के यहाँ देर भले हो पर अंधेर नहीं है. सत्य की अंततः विजय हुई जब पांडिचेरी की विशेष अदालत ने सत्ताइस नवंबर २०१३ को उन सभी लोगो को जो शंकर रमण हत्याकांड में आरोपी बनाये गए थें उनको बाइज्जत बरी कर दिया. इसी के साथ नौ साल से हो रहे ड्रामे का पटाक्षेप हो गया. उन पर लगाये गए सभी आरोपो से उन्हें मुक्त कर दिया गया. जितने भी प्रमुख गवाह थें उन्होंने अभियोजन पक्ष के वर्णन को समर्थन देने से इंकार कर दिया। अभियोजन पक्ष के विरोध में करीब ८० से अधिक गवाहो ने अपने बयान दर्ज कराये।

कांची के शंकराचार्य अंततः निर्दोष और निष्पाप होकर उभरे लेकिन इस नौ साल लम्बे ड्रामे की वजह से इस अति प्राचीन हिन्दू मठ पर जो दाग लगे उसको मिटने में कई वर्ष लगेंगे. हिन्दुओ के आस्था और प्रतीक के साथ जो बेहूदा मजाक हुआ उसके निशान कई वर्षो तक संवेदनशील मनो को कटोचते रहेंगे. लेकिन हिन्दू ब्राह्मण के उदार मन को देखिये कि इतना होने के बाद भी किसी के प्रति कोई कटुता नहीं. इस परिपेक्ष्य में शंकराचार्य के वक्तव्य को देखिये जो उन्होंने बरी होने के बाद दिया: ” धर्म की विजय हुई. सत्य की जीत हुई. सब कुछ खत्म हो जाने के बाद अंत में केवल यही बात मायने रखती है. मुझे मेरे गुरु ने सब कुछ सहन करने को कहा है. इसलिए ये कहना उचित नहीं होगा कि हालात मेरे लिए असहनीय थें. हा कुछ दिक्कते जरूर आयी वो भी उस वजह सें कि हम लोग नयी तरह की परिस्थितयो का सामना कर रहे थें. हमने पूर्व में देखा है कि किस तरह आक्रमणकारियों ने हिन्दू मंदिरो पर हमले कर उनको विध्वंस किया। आज जब हम मंदिरो पर पड़े उन हमलो की निशानियाँ देखते है तो  हमे वे आक्रमणकारी और उनकी क्रूरता याद आती है. आज जो कुछ भी मठ के साथ हुआ ( मेरे पर जो  आरोप लगे) वे बहुतो की नज़र में पूर्व में किये गए आक्रमणकारियों के द्वारा किये गए विध्वंस सरीखे ही है.”

ये बहुत दुःख की बात है कि जैसे ही किसी हिन्दू संत पर कोई आरोप लगते है सारे मुख्यधारा के मीडिया समूह उस संत को बदनाम करने की कवायद में जुट जाते है पूरी ताकत से इस बात से बिल्कुल बेपरवाह होकर कि मीडिया का मुख्य काम किसी भी घटना की सही-२ रिपोर्टिंग करनी होती है ना कि न्यायिक ट्रायल करना। उससे भी बड़ी बिडम्बना ये है कि अगर संत पर लगे आरोप निराधार और झूठे पाये जाते है तो जो अखबार या फिर न्यूज़ चैनल आरोप लगने के वक्त पूरे जोर शोर से संत को दोषी ठहरा रहे थे वे ही अखबार और न्यूज़ चैनल पूरी तरह से कन्नी काट लेते है. संत को बेगुनाह साबित करने वाली खबर कब आती है और कब चली जाती है ये पता भी नहीं चलता है. यही वजह है कि कांची के शंकराचार्य की बेगुनाही और बाइज्ज़त बरी होना किसी भी शीर्ष अखबार के सुर्खियो में नहीं आया. शायद सेकुलर मीडिया ने ये सोच कर इस खबर को प्रमुखता से नहीं बताया क्योकि हिन्दुओ से जुडी कोई भली खबर सेक्युलर भावना के विपरीत होती है!

मेनस्ट्रीम मीडिया को प्रोपगेंडा ज्यादा रास आता है बजाय सत्य के. सेक्युलर ताकतो ने और इनके द्वारा संचालित मीडिया समूहो ने कांची के शंकराचार्य के गिरफ्तारी के वक्त ये बहुत जोरदार तरीके से ये दर्शाया कि कोई भी कानून से ऊपर नहीं होता. तो क्या यही सेक्युलर ताकते जो कानून की बात करती है शाही ईमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी को गिरफ्तार करने की हिम्मत रखते है जिन पर कई धाराओ में देश के विभिन्न थानो में एफ आई आर दर्ज है? क्या यही सेक्युलर ताकते उन क्रिस्चियन मिशनरीज को बेनकाब करने की ताकत रखती है जो देश के पिछड़े और दूर दराज के इलाको में लोगो को बहला फुसला कर उनका धर्म परिवर्तन कर रही है? लेकिन ये सबको पता है कि सेक्युलर मीडिया ऐसा कभी नहीं करेगा. ऐसा इसलिए कि इन सेक्युलर लोगो की निगाह में कानून के लम्बे हाथ केवल हिन्दू संतो के गर्दन तक पहुंचती है. ये हिन्दू संतो को केवल बदनाम करने तक ही सीमित है और हिन्दू आस्था को खंडित और विकृत करने भर के लिए है. ये दुष्प्रचार के समर्थक है सत्य के नहीं.

हिन्दू संत अपनी जाने गंवाते रहे है लेकिन ये खबरे कभी भी सेक्युलर मीडिया की सुर्खिया नहीं बनी. ये स्वामी लक्ष्मणानन्द जी की तस्वीर है जिनकी हत्या क्रिस्चियन ताकतो ने कर दी थी.

हिन्दू संत अपनी जाने गंवाते रहे है लेकिन ये खबरे कभी भी सेक्युलर मीडिया की सुर्खिया नहीं बनी. ये स्वामी लक्ष्मणानन्द जी की तस्वीर है जिनकी हत्या क्रिस्चियन ताकतो ने कर दी थी.


References:

IBN Live

The Hindu

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खुर्शीद अनवर की आत्महत्या: समाज, कानून और मीडिया के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा!

गम्भीर मुद्दा ये है कि सतही मीडिया ट्रायल के चलते जिस भीषण मानसिक कष्ट से गुजरना होता है और जो सरेआम अपमान सहन करना पड़ता है क्या उसका कोई अस्तित्व नहीं? क्या इसका कोई मोल नहीं? क्या ये बिलकुल उपेक्षित कर देने वाली बात है?

गम्भीर मुद्दा ये है कि सतही मीडिया ट्रायल के चलते जिस भीषण मानसिक कष्ट से गुजरना होता है और जो सरेआम अपमान सहन करना पड़ता है क्या उसका कोई अस्तित्व नहीं? क्या इसका कोई मोल नहीं? क्या ये बिलकुल उपेक्षित कर देने वाली बात है?


खुर्शीद अनवर की आत्महत्या कई गम्भीर सवाल खड़े कर गयी आज के समाज के बारे में, पत्रकारिता के स्तर के बारे में और कानून के उपयोग और दुरुपयोग के सन्दर्भ में. खुर्शीद अनवर एक प्रसिद्ध सामजिक कार्यकर्ता थें जो नई दिल्ली में इंस्टिट्यूट फॉर सोशल डेमोक्रेसी नाम की संस्था चलाते थें. इसके अलावा वे जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय के छात्र भी थें. खुर्शीद अनवर ने पिछले साल १८ दिसम्बर २०१३ को आत्महत्या कर ली थी जब उनपे एक मणिपुरी औरत ने  अपने साथ दुष्कर्म का आरोप लगाया था. ये खबर कुछ एक समाचार चैनलों पर प्रमुखता से दिखायी गयी और इसके बाद सोशल नेटवर्किंग साईटस पर अंतहीन बहस छिड़ गयी. पहले तो खुर्शीद इस आरोप से हिल गए और इसके बाद मीडिया चैनलो द्वारा कीचड़ उछालने के बाद सदमे से ग्रस्त खुर्शीद ने आत्महत्या कर ली. बाद में उनके पास से बरामद सुसाइड नोट में इस बात का उल्लेख था कि मणिपुरी लड़की के साथ उन्होंने बलात्कार नहीं किया था बल्कि आपसी सहमति से शारीरिक सम्बन्ध बनाये थे.

इस घटना ने मुझे श्रीनिवास सिरास के आत्महत्या की याद दिला दी जो प्रोफेसर थे अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में. इस प्रकरण में न्यूज़ चैनलो नें इस प्रोफेसर के निजता के साथ खिलवाड़ किया था और उनकी गोपनीयता को सरेआम उजागर करके उनके समलैंगिक सम्बन्धो को विकृत स्वरूप दे दिया था. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस प्रकरण में सुनवाई करते हुए प्रोफेसर को थोड़ी राहत प्रदान की थी पर मीडिया चैनलो द्वारा की गयी गुस्ताखी उन पर भारी पड़ गयी और उन्होंने आत्महत्या कर लिया. कोर्ट इस तरह के मीडिया ट्रायल पर अक्सर चेतावनी देती रही है पूर्व में कि न्यूज़ चैनल जब केस ट्रायल स्टेज में हो तो किसी भी निष्कर्ष पर अपनी तरफ से पहुचने की हड़बड़ी ना दिखाए और न्यायालय की कार्यवाही को प्रभावित करने की कोशिश ना करे लेकिन बड़े कॉर्पोरेट संस्थानो द्वारा संचालित ये न्यूज़ चैनल न्यायालय के द्वारा इन पारित आदेश को सिर्फ कागज़ का एक टुकड़ा समझते है और उन्हें किसी प्रकरण में निहित संवेदनशीलता से कुछ नहीं लेना देना होता सिवाय इसके कि उसका माखौल किस तरह उड़ाया जाए. ये सही है मीडिया ट्रायल एक जटिल मुद्दा है लेकिन उससे बड़ा सच ये है कि सनसनीखेज मीडिया ट्रायल के चलते किसी के इज्जत और उसके आत्मसम्मान के साथ जो खिलवाड़ होता है और इससे जो अपूर्णीय क्षति होती है उसकी भरपाई असंभव होती है. मीडिया  किसी दोषी व्यक्ति के अधिकारो के हमेशा अतिक्रमण करती आयी है और समय आ गया है कि सही तथ्यात्मक रिपोर्टिंग और रिपोर्टिंग जो गलत इरादो से की गय़ी हो सिर्फ न्यूज़ चैनल के टी आर पी या फिर अखबार की बिक्री बढ़ाने के उद्देश्य से की गयी हो दोनों में एक स्पष्ट रेखा का निर्धारण हो.

“सनसनीखेज रिपोर्टिंग तो हमेशा होगी क्योकि सनसनीखेज घटनाये भारत में हमेशा रहती है. सुप्रीम कोर्ट इस पर लगाम लगाने में असमर्थ है. ये सही है कि रिपोर्टिंग सही होनी चाहिए पर इसका ये मतलब निकालना कि ये मीडिया के द्वारा ट्रायल है एक निन्दात्मक अभिव्यक्ति है. कोर्ट या किसी के पास कोई स्पष्ट मापदंड नहीं है जो ये निर्धारित कर सके कि मीडिया ट्रायल क्या होता है.” (सीनियर अधिवक्ता राजीव धवन, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया). खैर इस बात से इंकार करना असम्भव है कि मीडिया के द्वारा किसी भी दोषी व्यक्ति के अधिकारो का हनन और किसी के भी निजता के साथ खिलवाड़ करने के कृत्य का अपने तरफ से दूषित स्पष्टीकरण कोई भी मतलब नहीं रखता। ये सिर्फ एक व्यर्थ का  प्रलाप होता है, बेवजह अपने को सही ठहराना होता है. उसकी स्पष्टीकरण से उस अपूर्णीय क्षति की भरपाई असम्भव है जो इस वजह से होती है. इन दोनों प्रकरणो में दो व्यक्ति ने अपनी जान ले ली इस वजह से और अब हम ये कभी नहीं जान पाएंगे कि सच्चाई क्या थी. क्या ये दो जाने वापस मिल जाएंगी? क्या खोया सम्मान वापस मिलेगा? शायद कभी नहीं।

वरिष्ठ पत्रकार सईद नक़वी शायद सच के ज्यादा करीब है जब ये कहते है कि “पत्रकारिता में शायद निष्कर्षो पर पहुचने की हड़बड़ी है. ये उसी दिन किसी को मुजरिम ठहरा देता है जिस दिन किसी पे आरोप लगते है, इसके पहले कि कोर्ट किसी बात का निर्धारण करे. ये बहुत दुखी कर देने वाली बात है. कैसे मीडिया इतनी जल्दीबाज़ी में किसी निष्कर्ष पर पहुच सकती है और किसी को इतनी हड़बड़ी में दोषी करार दे सकती है? मीडिया को इस बात का इन्तजार करना चाहिए कि कम से कम प्राथमिक रिपोर्ट तो दर्ज हो, कम से कम जांच तो पूरी हो जाए” (डी एन ए न्यूज़ रिपोर्ट) ये बिलकुल चकित कर देने वाली बात है कि मीडिया कभी भी इस तरह के सनसनीखेज मीडिया ट्रायल के दौरान अपूर्णीय क्षति और इनके अंजामो के बारे में कभी भी ईमानदारी से आकलन नहीं करती. गम्भीर मुद्दा ये है कि सतही मीडिया ट्रायल के चलते जिस भीषण मानसिक कष्ट से गुजरना होता है और जो सरेआम अपमान सहन करना पड़ता है क्या उसका कोई अस्तित्व नहीं? क्या इसका कोई मोल नहीं? क्या ये बिलकुल उपेक्षित कर देने वाली बात है? ये बिलकुल स्पष्ट है कि मीडिया ट्रायल अधिकतर एकतरफा, भ्रामक और तथ्यो के साथ खिलवाड़ होता है जिसमे इस बात की बिलकुल परवाह नहीं की जाती कि कम से कम तथ्यो के असलियत का तो निर्धारण कर लिया जाए सूक्ष्मता से.

इस पूरे प्रकरण में दो बहुत गम्भीर पहलू शामिल है. पहला तो ये कि ये समाज के इस विकृत बदलाव को दर्शाता है कि समाज में हड़बड़ी में निष्कर्षो पर पहुचने की लत लग गयी है अधकचरे दिमाग के साथ. इसे चाहे वो प्रशंसा  हो या फिर आलोचना दोनों को बिना किसी आधार के आत्मसात करने की आदत सी हो गयी है. ना आलोचना का स्तर विकसित हो पाया और ना ही प्रशंसा के आयाम निर्धारित हो पाये. आलोचना अगर हो रही है तो तो वो भी तब जब कि कोई भी तथ्यात्मक या तार्किक आधार आलोचना के पक्ष में मौजूद नहीं है. दूसरा पक्ष ये है कि जिन कानूनो को स्त्री की अस्मिता की रक्षा करने के लिए बनाया गया है वे अब निर्दोष लोगो को प्रताड़ित करने का अस्त्र बन गए है. ये कितने तकलीफ की बात है कि जहा किसी स्त्री के सेक्सुअल हरस्मेंट का मामला उभरता है वही पे समाज का एकपक्षीय भेदभाव ग्रस्त दिमाग उभर कर सामने आ जाता है और मीडिया हमेशा की तरह दोषी के ऊपर हर तरह का लांछन जड़ देता है और इसके पहले वो अपने बेगुनाही को साबित करे वो मुजरिम साबित करार कर दिया जाता है. ये सर्वविदित है कि जो नए कानून की परिभाषा है सेक्सुअल हरस्मेंट को रोकने कि उसके प्रावधान इस तरह के है कि आप तकरीबन मुजरिम ही है और इस बात को गौण कर दिया गया है कि आप के पास भी बचाव के सही रास्ते होने चाहिए. और सबसे घातक ये है कि एकतरफा मीडिया ट्रायल शुरू हो जाने के बाद जो उसके पास अपने को बचाने के जो रास्ते होते है वे भी बंद हो जाते है क्योकि मीडिया आपके विपक्ष में माहौल खड़ा कर देता है हर तरफ.

“भारत में और अन्य देशो में जहा इस तरह के कानून पास हुए है औरतो के साथ होने वाले अपराधो को रोकने के लिए उसमे बर्डेन ऑफ़ प्रूफ को सुनियोजित तरीके से बदल दिया गया है. अब दोषी के ऊपर ये जिम्मा है कि वे अपनी निर्दोषता साबित करे. ये परिवर्तन निहित रूप से बहुत गलत है पर शायद ये इसलिए किया गया है कि ताकि इन प्रकार के अपराधो में स्त्री के पास सामान स्तर के अवसर हो अपने साथ हुए अन्याय के भरपाई के लिए. लेकिन जो अब नए कानून बने है सेक्सुअल हरस्मेंट रोकने के लिए उसमे ये बर्डन ऑफ़ प्रूफ इस सख्त स्वरूप में है कि जहा दोषी (पुरुष) के पास बचाव के सारे रास्ते बंद हो जाते है. अगर एक बार आप पर आरोप लगे तो इस बात की सम्भावना कम है कि आप अपने को निर्दोष साबित कर सके या आपको बेहद मशक्कत के बाद ही कोई रास्ता दिखायी पड़े. ये शायद नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत के विपरीत है.” (वरिष्ठ पत्रकार प्रेम शंकर झा, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया)

संक्षेप में समाज और मीडिया दोनों का स्तर रसातल में चला गया है क्योकि ये दोनों भावनाओ के प्रवाह में बहने के आदी हो गए है और इन दोनों को तथ्यो और तार्किक सोच से कुछ लेना देना नहीं रह गया है. दोनों को इस विकृत खेल में रस आने लगा है जहा किसी निर्दोष के भावनाओ के साथ खिलवाड़ होता है, उसके आत्मसम्मान के जब टुकड़े टुकड़े किये जाते है. लेकिन खेद कि बात ये है कि न्याय परंपरा/व्यवस्था भी इसी विकृत रस का शिकार हो गयी है, इन्ही घातक प्रवित्तियों का शिकार सा हो गयी है, खासकर उन मामलो में जहा स्त्रियों से जुड़े अपराधो के निष्पक्ष अवलोकन की बात आती है. खैर सब की जिम्मेदारी बनती है कि  भावनात्मक प्रवाह में बह कर लिए गए निर्णयो के बजाय सोच समझकर तार्किक रूप से लिए गए निर्णयो को प्राथमिकता दी जाए. ये बहुत आवश्यक हो गया है समाज के बिखराव को रोकने के लिए, एक मूल्य आधारित समाज के निर्माण के लिए.

पाठक इस लेख का अंग्रेजी संस्करण यहाँ पढ़े:

Rape Allegation That Led To Suicide of Kurshid Anwar: A Resounding Slap On The Face Of Media!

खुर्शीद अनवर की आत्महत्या: समाज, कानून और मीडिया के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा

खुर्शीद अनवर की आत्महत्या: समाज, कानून और मीडिया के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा

References:

Activist Khurshid Anwar’s suicide: Was media trial responsible?

AMU’s ‘gay’ prof commits suicide

Guilty If Charged

Dainik Bhasker

 

पिक्स क्रेडिट:

तस्वीर प्रथम 

तस्वीर दो

Rape Allegation That Led To Suicide of Kurshid Anwar: A Resounding Slap On The Face Of Media!

 

Can Deaths Caused By Vain Media Trials Be Reversed?

Can Deaths Caused By Vain Media Trials Be Reversed?

 (Also Appeared in Northern India Patrika On January 07, 2014)

The suicide by a prominent social activist Khursid Anwar, executive director of NGO Institute for Social Democracy and also a JNU scholar, has given rise to some pretty disturbing questions. Khurshid Anwar allegedly committed suicide in the aftermath of rape allegation by a Manipuri lady. This news got flashed on several news channels, followed by intense discussion on several social media networking websites including Facebook. Unable to bear this unwarranted media trial, this well known social activist committed suicide by jumping from his third floor residence in Vasant Kunj, New Delhi, on December 18, 2013. As per suicide note found at his home it was not a rape but consensual sex.

This tragic incident reminds me of suicide committed by Sriniwas Siras, who happened to be a professor at Aligarh Muslim University. In this particular case, news channels were found guilty of invading his privacy by making public his homosexual affair in blown out of proportion way. The professor was granted relief by the Allahabad High Court, but he was not able to cope up with harassment in the form of bizarre media coverage. That made him to end his life. Of late, courts have regularly come up with strict reminders for media channels not to indulge in media trials when the case is in its trial phase. However, influential media houses have always adopted care-a-damn, leading to mockery of the sensitivity involved in any issue under trial. It’s true that need to control media trial remains a complicated issue but it’s an undisputed fact that there is no dearth of cases, wherein sensational media trial caused irreparable damage to one’s reputation. The media has always taken for granted “rights of the accused” and it’s high time to make clear demarcation between accurate reporting and reporting done with malicious intent to increase the sale or ensure high TRP ratings.

“Sensational reporting will take place because sensational incidents keep happening in India. The Supreme Court will not be able to stop it. Yes, reporting must be accurate. But to say it amounted to trial by media is only a pejorative expression. Neither the court nor any one has provided parameters to define what constitutes trial by media.” (Senior Advocate Rajeev Dhavan in The Times of India) However, media’s pervert justification of its breach of privacy and rights of accused would never be enough to clear the huge mess caused by its unwanted intervention. Two lives of reputed individuals came to meet untimely end because of media trial. Can it bring them back to life? Can it restore the loss of reputation?

 In fact, senior journalist Saeed Naqvi  has framed a perfect perspective regarding media trail: ” There is a tendency in journalism – it convicts a person on the day allegation is leveled against him, even before the court convicts him. That is sad. How can media reach a conclusion so quickly and start showing one as an accused? At least, it should wait for lodging of an FIR, completion of investigation” (DNA News Report) It’s really amazing that media always never takes into account serious repercussions involved in unfair trial. Is “mental trauma and public humiliation” in the wake of seriously flawed  “media trial” is thing of lesser concern? It’s so evident in media trials that reporting is misleading and one-sided with scant respect for cross-checking of the facts.

 This whole issue involves two other serious concerns. The first one brings to the fore love of the society to reach at conclusions in one go with a prejudiced mindset. It loves to criticize or, for that matter, endorse any issue even if there are no concrete material evidence to support its beliefs. The other aspect involves abuse of laws meant to protect sexual harassment of women. It’s simply not an issue pertaining to rights of men that laws meant to protect women have lead to harassment of innocent men. It’s so pathetic that moment an issue  involving sexual harassment of women gets highlighted, the media enters in caricature of the accused, portraying him guilty. Worse, if you analyze the laws meant to prevent sexual harassment of women, it’s evident that men are virtually assumed to be guilty. Tragically, the attempt of the accused to prove himself innocent becomes further bleak in wake of such pervert media trials.

 “The disconcerting answer is that it will not matter. In India, and several other countries where laws have been passed to punish crimes against women, the burden of proof has been consciously reversed: it is the accused who has to prove his innocence. This reversal is bad in principle, but probably necessary to create a level playing field for women in cases pertaining to sex crimes. But the new rape law has carried the reversal to a point where, if implemented as drafted, it will defeat the very purpose of justice . For once a man is accused, it leaves him with no way whatever of proving his innocence.” (Senior Journalist Prem Shankar Jha in The Times Of India)
 
In nutshell, both society and media have lost the ability to be governed by reason and logic. Both of them have given way to pervert pleasure of playing havoc with the dignity and reputation of individuals. However, it’s baffling that even legal jurisprudence appears to have adopted same line of action, more so in cases involving sexual harassment of women. It’s time for everybody to upheld logical thinking over thinking governed by rash emotions. That’s essential to stop the fragmentation of society, to create a value-oriented society.

Khurshid Anwar: Another Victim Of Media Trial!!

Khurshid Anwar: Another Victim Of Media Trial!!

 
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Ship Of Theseus: Moving Swiftly In The Ocean Of Perspectives (Movie Review)

Ship Of Theseus: A Nice Take On Perspectives!

Ship Of Theseus: A Nice Take On Perspectives!


I curiously awaited the screening of the movie Ship of Theseus, which had managed to elicit great remarks from leading directors of Indian cinema landscape. The film festival in Allahabad, organised by Dainik Jagran, provided me an opportunity to watch this movie. In eyes of Shekhar Kapoor, the movie marked the arrival of “a brilliant new filmmaker” while Shyam Benegal could not resist himself from stating that it’s a “rare film that engages your mind, emotions and senses in equal measure providing the viewer a cinematic experience that is both hugely entertaining and stimulating”. The movie was inspired from the dilemma whether or not the object remains  same if its components undergo total replacement. In this movie the promising young director, Anand Gandhi, has interconnected three different short stories, each dealing with a different issue, but underlying theme remains the same. The first one dealt with visually impaired photographer, who lost her intuitive ability to capture striking images after a successful cornea transplant operation. The second story depicted an ailing monk, questioning life and death via his ongoing fight for rights of animals meant for conducting experiments during preparation of medicines. The third and the final story highlighted corrupt practices prevalent in medical world, wherein a stockbroker tries to place in dock persons involved in organ trade racket.

I am not the sort of person to go entirely by the rave reviews by big names from the world of cinema. In fact, even the sentiments of well-known directors fail to impress me. “Seeing is believing” has always been the principle which defined my approach, especially while anticipating the worth of a movie. And thus, contrary to the general consensus, I found the acting of  Aida El-Kashef ( Aliya in movie as visually impaired photographer) and Farza Khan (Aliya’s live-in-boyfriend in the movie) absolutely horrible. The exhibition of emotions was synthetic and loud. Great movies do not begin that way. The agony that should have hit her, in the aftermath of loss of her intuitive abilities, never got reflected in her mannerism. The saving grace came in the form of crispy thought provoking dialogues: “Does reality exist when no one is looking?” It’s the deep concerns which the characters portray compensates the poor acting.


The movie gained substance with the arrival of crazy monk Maitreya (Neeraj Kabi). Not only humour element got elevated but even the thematic shortcomings got balanced due to superb acting skills demonstrated by Neeraj Kabi and Vinay Shukla ( Carvaka in the movie). This part of the movie successfully conveyed that contradictions rules the lives and a perfect life is healthy assimilation of contradictions. A person should not be too rigid while pursuing noble cause since it comes in the way of fulfillment of goals. It might also limit one’s ability to make better choices. The rigidity displayed by Maitreya is in the eyes of Carvaka- the lawyer who believed in learning arguments of both the sides- was not very different than fundamentalism exhibited by a suicide bomber! This lawyer, follower of  Pastafarianism, induces great deal of pragmatism when he tries to create a fitting place for the contradictions. Anyway, Maitreya does impress us all when he places reasons above crude sentimentality!

Ship of Theseus: The First Story Marred By Poor Acting!

Ship of Theseus: The First Story Marred By Poor Acting!

Well, it’s crude sentimentality which always makes its presence felt in Indian movies. It’s not always the case that movies devoid of melodramatic elements manage to evoke mass attention. The average Indian cinema lover’s connection with melodrama is so intense that a director’s take on critical issue without this element is akin to self-goal in football! Anand Gandhi, at least, need to be credited for the fact that he manages to tell the story for Indians without being in awe of sentimentality! The last scene of the story showing the monk’s decision to live the life fully proves one thing quite well that healthy compromises for an elevated cause is not a bad thing. Well, the monk didn’t talk of Krishna’s Bhagvad Geeta but I feel the realization of monk is on par with view of Lord Krishna who in Bhagvad Gita stated that “every profession is world is tainted by some flaw”. So the summum bonum is: Healthy compromise should not prick the conscience!

The stockbroker’s case in the movie is pretty interesting but I need to differ from the reviews which have appeared in mainstream media and elsewhere that humour element in this part delight us. That’s not true. The humour appears as some sort of forced entry into a well structured plot. It also baffles me that reviewers have ignored some greater aspects related with this part of the movie wherein an young stockbroker trails the missing recipient of the stolen kidney! The reviewers failed to remember the heated conversation between stockbroker and his maternal grandmother, who happens to be progressive thinker, confined to ideological orientations spread in progressive literature churned out by the leftist. The impression she generates, and which irritates this guy working for American companies, is that one can pursue a noble cause only when one is in tune with such literature. The young stockbroker hits hard at her this “fallacious notion” when he tries to ensure justice for the poor labourer. The another myth which gets shattered ( and I really found it pretty interesting) is that fight for greater cause leads to its perfect attainment. Ask a real life hero and you would realize that he/she often feels cheated. The people for whom he/she comes to fight often leave their saviour in the lurch. The stockbroker wanted justice in real terms for this unfortunate labourer whose kidney got stolen for a rich foreigner ( the recipient). The labourer retracts from his promises after his petty interests get fulfilled. The protagonist has to remain contend with limited achievement.

In real life also we find that similar dilemma occurs. For instance, the moment one tries to make the purpose of education an extension of values, one has to face stiff resistance for all quarters of society, which feels that only purpose of education is to earn huge money, no matter if it means adoption of unethical means. The film does not end with a specific message but it does symbolically shows via the passage through the cave that life is full of immense possibilities, which allows nurturing of different perspectives. Hope we come to choose the one which best serves the cause of not only humanity but also our own personal causes close to heart!

The Crazy Monk Who Added New Dimensions In The Philosophical Paradoxes!

The Crazy Monk Who Added New Dimensions In The Philosophical Paradoxes!

References: 

DNA

Ship Of Theseus IMDB

Friday Times

Firstpost 

Pics Credit:

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ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं यह ब्लॉग लिखने के अलावा गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। रेलवे से ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर्ड अफसर।

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