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खुर्शीद अनवर की आत्महत्या: समाज, कानून और मीडिया के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा!

गम्भीर मुद्दा ये है कि सतही मीडिया ट्रायल के चलते जिस भीषण मानसिक कष्ट से गुजरना होता है और जो सरेआम अपमान सहन करना पड़ता है क्या उसका कोई अस्तित्व नहीं? क्या इसका कोई मोल नहीं? क्या ये बिलकुल उपेक्षित कर देने वाली बात है?

गम्भीर मुद्दा ये है कि सतही मीडिया ट्रायल के चलते जिस भीषण मानसिक कष्ट से गुजरना होता है और जो सरेआम अपमान सहन करना पड़ता है क्या उसका कोई अस्तित्व नहीं? क्या इसका कोई मोल नहीं? क्या ये बिलकुल उपेक्षित कर देने वाली बात है?


खुर्शीद अनवर की आत्महत्या कई गम्भीर सवाल खड़े कर गयी आज के समाज के बारे में, पत्रकारिता के स्तर के बारे में और कानून के उपयोग और दुरुपयोग के सन्दर्भ में. खुर्शीद अनवर एक प्रसिद्ध सामजिक कार्यकर्ता थें जो नई दिल्ली में इंस्टिट्यूट फॉर सोशल डेमोक्रेसी नाम की संस्था चलाते थें. इसके अलावा वे जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय के छात्र भी थें. खुर्शीद अनवर ने पिछले साल १८ दिसम्बर २०१३ को आत्महत्या कर ली थी जब उनपे एक मणिपुरी औरत ने  अपने साथ दुष्कर्म का आरोप लगाया था. ये खबर कुछ एक समाचार चैनलों पर प्रमुखता से दिखायी गयी और इसके बाद सोशल नेटवर्किंग साईटस पर अंतहीन बहस छिड़ गयी. पहले तो खुर्शीद इस आरोप से हिल गए और इसके बाद मीडिया चैनलो द्वारा कीचड़ उछालने के बाद सदमे से ग्रस्त खुर्शीद ने आत्महत्या कर ली. बाद में उनके पास से बरामद सुसाइड नोट में इस बात का उल्लेख था कि मणिपुरी लड़की के साथ उन्होंने बलात्कार नहीं किया था बल्कि आपसी सहमति से शारीरिक सम्बन्ध बनाये थे.

इस घटना ने मुझे श्रीनिवास सिरास के आत्महत्या की याद दिला दी जो प्रोफेसर थे अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में. इस प्रकरण में न्यूज़ चैनलो नें इस प्रोफेसर के निजता के साथ खिलवाड़ किया था और उनकी गोपनीयता को सरेआम उजागर करके उनके समलैंगिक सम्बन्धो को विकृत स्वरूप दे दिया था. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस प्रकरण में सुनवाई करते हुए प्रोफेसर को थोड़ी राहत प्रदान की थी पर मीडिया चैनलो द्वारा की गयी गुस्ताखी उन पर भारी पड़ गयी और उन्होंने आत्महत्या कर लिया. कोर्ट इस तरह के मीडिया ट्रायल पर अक्सर चेतावनी देती रही है पूर्व में कि न्यूज़ चैनल जब केस ट्रायल स्टेज में हो तो किसी भी निष्कर्ष पर अपनी तरफ से पहुचने की हड़बड़ी ना दिखाए और न्यायालय की कार्यवाही को प्रभावित करने की कोशिश ना करे लेकिन बड़े कॉर्पोरेट संस्थानो द्वारा संचालित ये न्यूज़ चैनल न्यायालय के द्वारा इन पारित आदेश को सिर्फ कागज़ का एक टुकड़ा समझते है और उन्हें किसी प्रकरण में निहित संवेदनशीलता से कुछ नहीं लेना देना होता सिवाय इसके कि उसका माखौल किस तरह उड़ाया जाए. ये सही है मीडिया ट्रायल एक जटिल मुद्दा है लेकिन उससे बड़ा सच ये है कि सनसनीखेज मीडिया ट्रायल के चलते किसी के इज्जत और उसके आत्मसम्मान के साथ जो खिलवाड़ होता है और इससे जो अपूर्णीय क्षति होती है उसकी भरपाई असंभव होती है. मीडिया  किसी दोषी व्यक्ति के अधिकारो के हमेशा अतिक्रमण करती आयी है और समय आ गया है कि सही तथ्यात्मक रिपोर्टिंग और रिपोर्टिंग जो गलत इरादो से की गय़ी हो सिर्फ न्यूज़ चैनल के टी आर पी या फिर अखबार की बिक्री बढ़ाने के उद्देश्य से की गयी हो दोनों में एक स्पष्ट रेखा का निर्धारण हो.

“सनसनीखेज रिपोर्टिंग तो हमेशा होगी क्योकि सनसनीखेज घटनाये भारत में हमेशा रहती है. सुप्रीम कोर्ट इस पर लगाम लगाने में असमर्थ है. ये सही है कि रिपोर्टिंग सही होनी चाहिए पर इसका ये मतलब निकालना कि ये मीडिया के द्वारा ट्रायल है एक निन्दात्मक अभिव्यक्ति है. कोर्ट या किसी के पास कोई स्पष्ट मापदंड नहीं है जो ये निर्धारित कर सके कि मीडिया ट्रायल क्या होता है.” (सीनियर अधिवक्ता राजीव धवन, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया). खैर इस बात से इंकार करना असम्भव है कि मीडिया के द्वारा किसी भी दोषी व्यक्ति के अधिकारो का हनन और किसी के भी निजता के साथ खिलवाड़ करने के कृत्य का अपने तरफ से दूषित स्पष्टीकरण कोई भी मतलब नहीं रखता। ये सिर्फ एक व्यर्थ का  प्रलाप होता है, बेवजह अपने को सही ठहराना होता है. उसकी स्पष्टीकरण से उस अपूर्णीय क्षति की भरपाई असम्भव है जो इस वजह से होती है. इन दोनों प्रकरणो में दो व्यक्ति ने अपनी जान ले ली इस वजह से और अब हम ये कभी नहीं जान पाएंगे कि सच्चाई क्या थी. क्या ये दो जाने वापस मिल जाएंगी? क्या खोया सम्मान वापस मिलेगा? शायद कभी नहीं।

वरिष्ठ पत्रकार सईद नक़वी शायद सच के ज्यादा करीब है जब ये कहते है कि “पत्रकारिता में शायद निष्कर्षो पर पहुचने की हड़बड़ी है. ये उसी दिन किसी को मुजरिम ठहरा देता है जिस दिन किसी पे आरोप लगते है, इसके पहले कि कोर्ट किसी बात का निर्धारण करे. ये बहुत दुखी कर देने वाली बात है. कैसे मीडिया इतनी जल्दीबाज़ी में किसी निष्कर्ष पर पहुच सकती है और किसी को इतनी हड़बड़ी में दोषी करार दे सकती है? मीडिया को इस बात का इन्तजार करना चाहिए कि कम से कम प्राथमिक रिपोर्ट तो दर्ज हो, कम से कम जांच तो पूरी हो जाए” (डी एन ए न्यूज़ रिपोर्ट) ये बिलकुल चकित कर देने वाली बात है कि मीडिया कभी भी इस तरह के सनसनीखेज मीडिया ट्रायल के दौरान अपूर्णीय क्षति और इनके अंजामो के बारे में कभी भी ईमानदारी से आकलन नहीं करती. गम्भीर मुद्दा ये है कि सतही मीडिया ट्रायल के चलते जिस भीषण मानसिक कष्ट से गुजरना होता है और जो सरेआम अपमान सहन करना पड़ता है क्या उसका कोई अस्तित्व नहीं? क्या इसका कोई मोल नहीं? क्या ये बिलकुल उपेक्षित कर देने वाली बात है? ये बिलकुल स्पष्ट है कि मीडिया ट्रायल अधिकतर एकतरफा, भ्रामक और तथ्यो के साथ खिलवाड़ होता है जिसमे इस बात की बिलकुल परवाह नहीं की जाती कि कम से कम तथ्यो के असलियत का तो निर्धारण कर लिया जाए सूक्ष्मता से.

इस पूरे प्रकरण में दो बहुत गम्भीर पहलू शामिल है. पहला तो ये कि ये समाज के इस विकृत बदलाव को दर्शाता है कि समाज में हड़बड़ी में निष्कर्षो पर पहुचने की लत लग गयी है अधकचरे दिमाग के साथ. इसे चाहे वो प्रशंसा  हो या फिर आलोचना दोनों को बिना किसी आधार के आत्मसात करने की आदत सी हो गयी है. ना आलोचना का स्तर विकसित हो पाया और ना ही प्रशंसा के आयाम निर्धारित हो पाये. आलोचना अगर हो रही है तो तो वो भी तब जब कि कोई भी तथ्यात्मक या तार्किक आधार आलोचना के पक्ष में मौजूद नहीं है. दूसरा पक्ष ये है कि जिन कानूनो को स्त्री की अस्मिता की रक्षा करने के लिए बनाया गया है वे अब निर्दोष लोगो को प्रताड़ित करने का अस्त्र बन गए है. ये कितने तकलीफ की बात है कि जहा किसी स्त्री के सेक्सुअल हरस्मेंट का मामला उभरता है वही पे समाज का एकपक्षीय भेदभाव ग्रस्त दिमाग उभर कर सामने आ जाता है और मीडिया हमेशा की तरह दोषी के ऊपर हर तरह का लांछन जड़ देता है और इसके पहले वो अपने बेगुनाही को साबित करे वो मुजरिम साबित करार कर दिया जाता है. ये सर्वविदित है कि जो नए कानून की परिभाषा है सेक्सुअल हरस्मेंट को रोकने कि उसके प्रावधान इस तरह के है कि आप तकरीबन मुजरिम ही है और इस बात को गौण कर दिया गया है कि आप के पास भी बचाव के सही रास्ते होने चाहिए. और सबसे घातक ये है कि एकतरफा मीडिया ट्रायल शुरू हो जाने के बाद जो उसके पास अपने को बचाने के जो रास्ते होते है वे भी बंद हो जाते है क्योकि मीडिया आपके विपक्ष में माहौल खड़ा कर देता है हर तरफ.

“भारत में और अन्य देशो में जहा इस तरह के कानून पास हुए है औरतो के साथ होने वाले अपराधो को रोकने के लिए उसमे बर्डेन ऑफ़ प्रूफ को सुनियोजित तरीके से बदल दिया गया है. अब दोषी के ऊपर ये जिम्मा है कि वे अपनी निर्दोषता साबित करे. ये परिवर्तन निहित रूप से बहुत गलत है पर शायद ये इसलिए किया गया है कि ताकि इन प्रकार के अपराधो में स्त्री के पास सामान स्तर के अवसर हो अपने साथ हुए अन्याय के भरपाई के लिए. लेकिन जो अब नए कानून बने है सेक्सुअल हरस्मेंट रोकने के लिए उसमे ये बर्डन ऑफ़ प्रूफ इस सख्त स्वरूप में है कि जहा दोषी (पुरुष) के पास बचाव के सारे रास्ते बंद हो जाते है. अगर एक बार आप पर आरोप लगे तो इस बात की सम्भावना कम है कि आप अपने को निर्दोष साबित कर सके या आपको बेहद मशक्कत के बाद ही कोई रास्ता दिखायी पड़े. ये शायद नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत के विपरीत है.” (वरिष्ठ पत्रकार प्रेम शंकर झा, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया)

संक्षेप में समाज और मीडिया दोनों का स्तर रसातल में चला गया है क्योकि ये दोनों भावनाओ के प्रवाह में बहने के आदी हो गए है और इन दोनों को तथ्यो और तार्किक सोच से कुछ लेना देना नहीं रह गया है. दोनों को इस विकृत खेल में रस आने लगा है जहा किसी निर्दोष के भावनाओ के साथ खिलवाड़ होता है, उसके आत्मसम्मान के जब टुकड़े टुकड़े किये जाते है. लेकिन खेद कि बात ये है कि न्याय परंपरा/व्यवस्था भी इसी विकृत रस का शिकार हो गयी है, इन्ही घातक प्रवित्तियों का शिकार सा हो गयी है, खासकर उन मामलो में जहा स्त्रियों से जुड़े अपराधो के निष्पक्ष अवलोकन की बात आती है. खैर सब की जिम्मेदारी बनती है कि  भावनात्मक प्रवाह में बह कर लिए गए निर्णयो के बजाय सोच समझकर तार्किक रूप से लिए गए निर्णयो को प्राथमिकता दी जाए. ये बहुत आवश्यक हो गया है समाज के बिखराव को रोकने के लिए, एक मूल्य आधारित समाज के निर्माण के लिए.

पाठक इस लेख का अंग्रेजी संस्करण यहाँ पढ़े:

Rape Allegation That Led To Suicide of Kurshid Anwar: A Resounding Slap On The Face Of Media!

खुर्शीद अनवर की आत्महत्या: समाज, कानून और मीडिया के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा

खुर्शीद अनवर की आत्महत्या: समाज, कानून और मीडिया के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा

References:

Activist Khurshid Anwar’s suicide: Was media trial responsible?

AMU’s ‘gay’ prof commits suicide

Guilty If Charged

Dainik Bhasker

 

पिक्स क्रेडिट:

तस्वीर प्रथम 

तस्वीर दो

Rape Allegation That Led To Suicide of Kurshid Anwar: A Resounding Slap On The Face Of Media!

 

Can Deaths Caused By Vain Media Trials Be Reversed?

Can Deaths Caused By Vain Media Trials Be Reversed?

 (Also Appeared in Northern India Patrika On January 07, 2014)

The suicide by a prominent social activist Khursid Anwar, executive director of NGO Institute for Social Democracy and also a JNU scholar, has given rise to some pretty disturbing questions. Khurshid Anwar allegedly committed suicide in the aftermath of rape allegation by a Manipuri lady. This news got flashed on several news channels, followed by intense discussion on several social media networking websites including Facebook. Unable to bear this unwarranted media trial, this well known social activist committed suicide by jumping from his third floor residence in Vasant Kunj, New Delhi, on December 18, 2013. As per suicide note found at his home it was not a rape but consensual sex.

This tragic incident reminds me of suicide committed by Sriniwas Siras, who happened to be a professor at Aligarh Muslim University. In this particular case, news channels were found guilty of invading his privacy by making public his homosexual affair in blown out of proportion way. The professor was granted relief by the Allahabad High Court, but he was not able to cope up with harassment in the form of bizarre media coverage. That made him to end his life. Of late, courts have regularly come up with strict reminders for media channels not to indulge in media trials when the case is in its trial phase. However, influential media houses have always adopted care-a-damn, leading to mockery of the sensitivity involved in any issue under trial. It’s true that need to control media trial remains a complicated issue but it’s an undisputed fact that there is no dearth of cases, wherein sensational media trial caused irreparable damage to one’s reputation. The media has always taken for granted “rights of the accused” and it’s high time to make clear demarcation between accurate reporting and reporting done with malicious intent to increase the sale or ensure high TRP ratings.

“Sensational reporting will take place because sensational incidents keep happening in India. The Supreme Court will not be able to stop it. Yes, reporting must be accurate. But to say it amounted to trial by media is only a pejorative expression. Neither the court nor any one has provided parameters to define what constitutes trial by media.” (Senior Advocate Rajeev Dhavan in The Times of India) However, media’s pervert justification of its breach of privacy and rights of accused would never be enough to clear the huge mess caused by its unwanted intervention. Two lives of reputed individuals came to meet untimely end because of media trial. Can it bring them back to life? Can it restore the loss of reputation?

 In fact, senior journalist Saeed Naqvi  has framed a perfect perspective regarding media trail: ” There is a tendency in journalism – it convicts a person on the day allegation is leveled against him, even before the court convicts him. That is sad. How can media reach a conclusion so quickly and start showing one as an accused? At least, it should wait for lodging of an FIR, completion of investigation” (DNA News Report) It’s really amazing that media always never takes into account serious repercussions involved in unfair trial. Is “mental trauma and public humiliation” in the wake of seriously flawed  “media trial” is thing of lesser concern? It’s so evident in media trials that reporting is misleading and one-sided with scant respect for cross-checking of the facts.

 This whole issue involves two other serious concerns. The first one brings to the fore love of the society to reach at conclusions in one go with a prejudiced mindset. It loves to criticize or, for that matter, endorse any issue even if there are no concrete material evidence to support its beliefs. The other aspect involves abuse of laws meant to protect sexual harassment of women. It’s simply not an issue pertaining to rights of men that laws meant to protect women have lead to harassment of innocent men. It’s so pathetic that moment an issue  involving sexual harassment of women gets highlighted, the media enters in caricature of the accused, portraying him guilty. Worse, if you analyze the laws meant to prevent sexual harassment of women, it’s evident that men are virtually assumed to be guilty. Tragically, the attempt of the accused to prove himself innocent becomes further bleak in wake of such pervert media trials.

 “The disconcerting answer is that it will not matter. In India, and several other countries where laws have been passed to punish crimes against women, the burden of proof has been consciously reversed: it is the accused who has to prove his innocence. This reversal is bad in principle, but probably necessary to create a level playing field for women in cases pertaining to sex crimes. But the new rape law has carried the reversal to a point where, if implemented as drafted, it will defeat the very purpose of justice . For once a man is accused, it leaves him with no way whatever of proving his innocence.” (Senior Journalist Prem Shankar Jha in The Times Of India)
 
In nutshell, both society and media have lost the ability to be governed by reason and logic. Both of them have given way to pervert pleasure of playing havoc with the dignity and reputation of individuals. However, it’s baffling that even legal jurisprudence appears to have adopted same line of action, more so in cases involving sexual harassment of women. It’s time for everybody to upheld logical thinking over thinking governed by rash emotions. That’s essential to stop the fragmentation of society, to create a value-oriented society.

Khurshid Anwar: Another Victim Of Media Trial!!

Khurshid Anwar: Another Victim Of Media Trial!!

 
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विवाह कानून (संशोधन) विधेयक 2010: सरकार को पुरुष संघटनो की तरफ से कुछ बेहद महत्त्वपूर्ण सुझाव

इन अपूर्ण, गलत और भ्रामक संशोधनों को वापस लिया जाए. कानून को लिंगभेद से ऊपर रखा जाए (जेंडर न्यूट्रल), पति या पत्नी शब्द को जीवनसाथी (spouse) शब्द से सम्बोधित किया जाए.

इन अपूर्ण, गलत और भ्रामक संशोधनों को वापस लिया जाए. कानून को लिंगभेद से ऊपर रखा जाए (जेंडर न्यूट्रल), पति या पत्नी शब्द को जीवनसाथी (spouse) शब्द से सम्बोधित किया जाए.

पुरुष अधिकार से जुड़े  संघटनो की कुछ प्रमुख चिंताए:

* संशोधन का मूल प्रारूप (मुख्य बिन्दुएँ)- पतियो के खिलाफ पक्षपाती है.

* इस आधार पर तलाक मांग सकती है कि उसका दांपत्य जीवन ऐसी स्थिति में पहुंच गया है, जहां विवाह कायम रहना नामुमकिन है. ‘विवाह सम्बंध टूटने और किसी भी सूरत में रिश्ता बहाल न होने’ को भी तलाक एक आधार के रूप में मान्यता प्रदान किया गया है “हिंदू विवाह अधिनियम”, 1955, और स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 में. 

* पत्नी को हक़ है पति की तरफ से पेश तलाक़ याचिका को विरोध करने का इस आधार पर कि वो गहन आर्थिक संकट से ग्रस्त है. कोर्ट  इस गहन आर्थिक संकट से निज़ात दिलाने के प्रावधान अपने विवेक पर कर सकती है. (पतियो के संग पक्षपाती है)

* उन बच्चो के भरण पोषण का समुचित प्रबंध माता पिता के द्वारा उनकी आर्थिक हैसियत के अनुरूप जो अवैध संतति है.

संसदीय समिति- महिला संघटनो के द्वारा सुझाये गए प्रस्तावो से गलत तरह से प्रभावित है:

* ‘विवाह सम्बंध टूटने और किसी भी सूरत में रिश्ता बहाल न होने’ को भी तलाक एक आधार के रूप में मान्यता प्रदान करने की संस्तुति करना.

* महिला संघटनो के सुझावो से प्रेरित होकर उस वैवाहिक संपत्ति पर भी पत्नियों का अधिकार होगा जो विवाह के उपरांत अर्जित की गयी है दोनों के सहयोग से.

* पुरुष संघटनो के हर सुझावो की उपेक्षा की गयी.

कानून मंत्री द्वारा किये गए अन्य संशोधन- पुरुष हितो के विपरीत प्रावधानो की स्वीकृति:

* पत्नी का हिस्सा  उस संपत्ति पर जो विवाह के पूर्व और उपरान्त अर्जित की गयी है.

* पत्नी का हिस्सा पति के द्वारा अर्जित और अर्जित करने योग्य पैतृक संपत्ति में.

हमारी आपत्तियां: 

* पत्नी का कोई योगदान नहीं होता पति के द्वारा अर्जित पैतृक संपत्ति में और उस संपत्ति पर जो उसने शादी से पूर्व अर्जित की गयी है. उसको संज्ञान में लेकर प्रावधान बनाने की जरूरत नहीं.

* उस संपत्ति के बटवारे में कोई भी फैसला जो पति ने शादी के उपरांत अर्जित की है आँख मूँदकर गलत तरीक़े से नहीं होना चाहिए। पत्नी के योगदान का आकलन करना चाहिए। दो महीने की शादी और बीस साल की शादी की अवधि को एक ही मापदंड से नहीं देखा जा सकता.

* ये तर्क दोष से बाधित संशोधन है कि स्त्रियाँ शादी को नहीं तोड़ती. स्त्रियाँ ना सिर्फ शादी को तोड़ती है बल्कि कई बार शादी कर सकती है और  इस तरह पूर्व में की गयी हर एक शादी से संपत्ति अर्जित कर सकती है. इस तरह के कई उदाहरण आये दिन समाचार पत्रो में प्रकाशित होते रहते है जहा लालची पत्नियों ने धोखधड़ी से शादी करने के बाद संपत्ति पे अपना दावा पेश किया या फिर झूठे 498 A के मुकदमे दर्ज कराये संपत्ति की हवस में.

ये अब एक प्रचलित हथियार बन गया है कि हर नाकाम वैवाहिक सम्बन्धो में स्त्रियाँ  IPC 498 A और घरेलु हिंसा अधिनियम का व्यापक दुरुपयोग कर रही है संपत्ति हथियाने में. अब ये संशोधन भी एक प्रमुख औजार/ज़रिया बन जाएगा समाप्ति अर्जित करने के लिए.

ये अब एक प्रचलित हथियार बन गया है कि हर नाकाम वैवाहिक सम्बन्धो में स्त्रियाँ IPC 498 A और घरेलु हिंसा अधिनियम का व्यापक दुरुपयोग कर रही है संपत्ति हथियाने में. अब ये संशोधन भी एक प्रमुख औजार/ज़रिया बन जाएगा समाप्ति अर्जित करने के लिए.

इन संशोधनों के परिणाम/अंजाम:

* वैवाहिक वादो के गहन अध्ययन के बाद ये बात स्पष्ट उभर कर आई है कि ज्यादातर वैवाहिक विखंडन का कारण पत्नी का जबर्दस्ती उस संपत्ति पर हक़ जताना रहा है जो पति या उसके रिश्तेदारो ने अर्जित की होती है.

* विवाह अपने पवित्र संस्कारो से वंचित हो जायेंगे और ये सिर्फ संपत्ति अर्जित करने का श्रोत बन जायेंगे। ये अब धीरे धीरे एक परंपरा बनती जा रही है कि भौतिक लाभ की लालसा शादी के द्वारा बढ़ती जा रही है और इस तरह के गलत संशोधनों के व्यापक दुष्परिणाम उभर कर सामने आयेंगे। 

* ये अब एक प्रचलित हथियार बन गया है कि हर नाकाम वैवाहिक सम्बन्धो में स्त्रियाँ  IPC 498 A और घरेलु हिंसा अधिनियम का व्यापक दुरुपयोग कर रही है संपत्ति हथियाने में. अब ये संशोधन भी एक प्रमुख औजार/ज़रिया बन जाएगा समाप्ति अर्जित करने के लिए.

* संपत्ति का अर्जन कई वर्षो की मेहनत का परिणाम होते है ना कि कुछ वर्षो के वैवाहिक संग का. असफल वैवाहिक सम्बन्धो के चलते अपनी गाढ़ी कमाई से अर्जित संपत्ति से हाथ धोने के वजह से पतियो के आत्महत्या के दर में खासी वृद्धि देखी जायेगी जो कि पहले से ही पत्नियों के आत्महत्या के दर की दुगनी है. अपराध दर में भी इस वजह से वृद्धि देखी जायेगी।  

हमारे प्रस्ताव/सुझाव:

* इन अपूर्ण, गलत और भ्रामक संशोधनों को वापस लिया जाए. कानून को लिंगभेद से ऊपर रखा जाए (जेंडर न्यूट्रल), पति या पत्नी शब्द को जीवनसाथी (spouse) शब्द से सम्बोधित किया जाए.

* संपत्ति में हिस्सा पति और पत्नी के वित्तीय योगदान के आधार पर किया जाए.

* अगर वित्तीय योगदान शून्य है तो एक फॉर्मूले का ईज़ाद किया जाए जो शादी की न्यूनतम अवधि का आकलन करे संपत्ति के बॅटवारे के हेतु और उस एक फॉर्मूले का ईज़ाद हो जो योगदान के बारे में सही रूप से निरूपण कर सके.

* शादी से पूर्व इक़रारनामे (pre-nuptial agreement) को कानूनी मान्यता दी जाए. 

* इस बात को बहुत तीव्रता से महसूस किया जाता रहा है कि असफल वैवाहिक सम्बन्धो के चलते पत्नियों को गहरे वित्तीय संकट का सामना करना पड़ता है. विवाह एक संस्था है जो अगर ना चले तो एक लिए पुरस्कार (पत्नी) और एक लिए सजा नहीं होना चाहिए (पति). अगर पत्नी गहरे वित्तीय संकट का सामना कर रह है तो उसकी दूरी के लिए व्यापक प्रबंध किया जाना चाहिए ना कि निरीह पति को इसके लिए दण्डित किया जाना चाहिए. इस सन्दर्भ में हमारा सुझाव ये है है कि: 

# हिन्दू विवाह उत्तराधिकार एक्ट 2005 का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए. स्त्री का हिस्सा जो उसके माता-पिता के घर बनता है उसको या तो शादी के दौरान या तलाक़ की अर्जी देने के समय (किसी भी पक्ष के द्वारा) अपने आप दे देना चाहिए.  

# अगर स्त्री बेरोजगार है या जिसका कैरियर एक लम्बे अंतराल से बाधित हो गया हो तो इस तरह के महिलाओ के भरण पोषण की जिम्मेदारी और उन्हें रोजगार मुहैय्या कराने की जिम्मेदारी सरकार की होनी चाहिए बजाय इसके कि पति पर इस तरह का भार डाला जाए. इस तरह की पत्नियों के वित्तीय संकट दूर करने के लिए “तलाकशुदा पत्नी कल्याण कोष” का गठन किया जाना चाहिए।

Reference/Credit: 

This is Hindi version of a letter addressed to the Parliamentarians prepared by the Men’s Rights Association.The Hindi version has been prepared by the author of this blog post.

 संपत्ति का अर्जन कई वर्षो की मेहनत का परिणाम होते है ना कि कुछ वर्षो के वैवाहिक संग का. असफल वैवाहिक सम्बन्धो के चलते अपनी गाढ़ी कमाई से अर्जित संपत्ति से हाथ धोने के वजह से पतियो के आत्महत्या के दर में खासी वृद्धि देखी जायेगी जो कि पहले से ही पत्नियों के आत्महत्या के दर की दुगनी है. अपराध दर में भी इस वजह से वृद्धि देखी जायेगी।

संपत्ति का अर्जन कई वर्षो की मेहनत का परिणाम होते है ना कि कुछ वर्षो के वैवाहिक संग का. असफल वैवाहिक सम्बन्धो के चलते अपनी गाढ़ी कमाई से अर्जित संपत्ति से हाथ धोने के वजह से पतियो के आत्महत्या के दर में खासी वृद्धि देखी जायेगी जो कि पहले से ही पत्नियों के आत्महत्या के दर की दुगनी है. अपराध दर में भी इस वजह से वृद्धि देखी जायेगी।

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अंतराष्ट्रीय पुरुष दिवस मनाने की जरुरत क्यों आन पड़ी? अंतराष्ट्रीय पुरुष दिवस की सार्थकता और उपयोगिता.

Take Men More Seriously!

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अंतराष्ट्रीय पुरुष दिवस उन्नीस नवंबर को सत्तर से अधिक देशो में मनाया जाता है जिसमे त्रिनिदाद एंड टोबैगो, जमैका, ऑस्ट्रेलिया, भारत, चीन, यूनाइटेड स्टेट्स, रोमानिया, सिंगापुर, माल्टा, यूनाइटेड किंगडम, साउथ अफ्रीका, तंज़ानिया, ज़िम्बाब्वे, बोत्सवाना, हंगरी, आयरलैंड,घाना, कनाडा, डेनमार्क, नॉर्वे, ऑस्ट्रिया, बोस्निआ एंड हेर्ज़ेगोविना, फ्रांस, इटली, पाकिस्तान, अंटीगुआ एंड बारबुडा, सेंट किट्स एंड नेविस, सेंट लूसिया, ग्रेनेडा एंड केमन आइलैंड्स आदि देश शामिल है प्रमुख रूप से। इस सन्दर्भ में व्यापक ग्लोबल समर्थन हासिल हुआ इस दिवस को.

अंतराष्ट्रीय पुरुष दिवस का आयोजन सर्वप्रथम त्रिनिदाद एंड टोबैगो में 1999 से शुरू हुआ डॉक्टर जेरोम टिलक सिंह के द्वारा जिनके लिए उनके पिता एक रोल मॉडल थें.

अंतराष्ट्रीय पुरुष दिवस की जरूरत क्यों?

अंतराष्ट्रीय पुरुष दिवस मनाने का मुख्य प्रयोजन पुरुषत्व और पुरुष होने की भावना का सम्मान करना है.

ये इस वजह से भी मनाया जाना आवश्यक है कि ताकि पुरुषो ने समाज के उत्थान और विकास के लिए जो सहयोग दिया उसको मान्यता मिले; वे जो बलिदान देते है अपनों के लिए उसको महसूस किया जा सके; और वे जिन समस्यायों से ग्रसित है उसके बारे में समाज और औरो को अवगत कराया जा सके.

इस दिवस को मनाने का एक प्रमुख कारण ये भी है कि कुछ प्रमुख समस्याएँ जो पुरुष वर्ग के सामने उभर के आती है उनके बारे में समाज में चेतना जाग्रत किया जा सके.

पुरुष वर्ग को अक्सर समाज के हाथो उपहासत्मक, नकारात्मक और उपेक्षा से ग्रसित मानसिकता का सामना करना पड़ता है जिसकी वजह से अक्सर वे कई प्रकार के मानसिक विकृतियों का शिकार हो जाते है और ऐसा इसलिए होता है क्योकि वे अक्सर अपने समस्याओं को लोगो से नहीं बाँटते है और उन्हें अपने तक ही सीमित रखते है. इस ना बांटने के वजह से ये भ्रम पैदा हो जाता है कि पुरुषों की जिंदगी बिल्कुल चिकनी सड़क के सामान है जिसपे कोई अवरोध नहीं है जबकि हकीकत ये है कि इनकी राहे कांटो से भरी रहती है. और इस अज्ञानता के कारण समाज सही ढंग से कभी भी पुरुषो के अधिकारो पर नहीं  गौर करता है और ना ही उनके हितो को प्राथमिकता देता है.

इस दिवस पर ये एक दिन इस बात को समर्पित है कि हम पुरुषो के प्रति अपनी कृतज्ञता जता सके, जिन्होंने दुनिया जो बेहतर बनाने के खातिर अपने पसंदगी और नापसंदगी और अपने हितो को ताक पर रख दिया।थीम 2013:इस बार का अंतराष्ट्रीय पुरुष दिवस इस बात को समर्पित है कि पुरुषो को बोलना चाहिए ( अपने समस्याओ के सन्दर्भ में) और लोगो के बीच अपनी बाते बांटनी चाहिए।

आज पुरुष के ऊपर कार्य को उत्कृष्ट तरीके से करने का अत्यधिक दबाव है जो पुरुषत्व की भावना के प्रधान होने के कारण उन्हें जड़ और कठोर बना दे रहा है. पुरुष होने के नाते ये अपमानजनक सा लगता है अगर वे अपने समस्यायों के बारे में लोगो से बात करते है और औरो को इससे अवगत कराते है. बांटने का खतरा ये रहता है कि इन बातो कि वजह से वो उपहास का बिंदु बन सकता है और अगर वो ना बांटे तो वो अहंकारग्रस्त करार दे दिया जाता है.

पुरुष होना आज के युग में अपने कुछ नए मायने लेके आया है, कुछ नए लक्ष्य लेके आया है. अंतराष्ट्रीय पुरुष दिवस पर पुरुष इस बात के लिए प्रेरित होते है कि वे पुरुष होने के महत्व और चुनौतियों पर बात कर सकते है.

पुरुष के पास अपनी समस्याएँ रखने का कोई उचित मंच या स्पेस नहीं है. पुरुषो के समस्याओं पर मुख्यधारा के मीडिया में शायद ही चर्चा होती हो. उसकी एक वजह ये है कि पुरुष कभी नहीं अपने दुखो, चिंताओ और तनाव पर लोगो के बीच विचार विमर्श करते है.  

अपने में सीमित रहने कि एक वजह ये है कि बचपन से इन्हे गलत संस्कारो के बीच पाला पोसा जाता है जहा बहुत ज्यादा अपने बारे में बोलने को पुरुषत्व के विपरीत माना जाता है. सो ये अक्सर सुनने में आता है जहा पे एक लड़के को ये कहा जाता है कि क्यों लड़कियो की तरह रो रहे हो … मर्द बनो!

इस तरह के गलत सुझाव् जो बचपन से पुरुषो के मन पर थोप दिए जाते है उनकी वजह से ये होता है कि वो कभी भी खुलकर अपनी बाते बांटने में झिझकता है और कतराता है. अपनी तमाम समस्यायों और उलझनो को अपने में कैद करके रखता है जिसकी वजह से मनोवैज्ञानिक रूप से उसका सही विकास अवरुद्ध हो जाता है.

इस वजह से सारी  समस्याएं इस प्रकार से उसके अंदर फँस जाती है जिस तरह एक नाली में सें गंदे पानी का बहाव का रुक जाना। इस वजह से वे कई प्रकार की बीमारियो का शिकार हो जाते है. समाज को आगे बढ़कर पुरुषो की इन समस्याओं को समझना पड़ेगा। इनके भावनाओ और जस्बातों को ठीक ठीक समझना होगा।

वे दिन शायद अब सिर्फ किसी सपने के समान है जब समस्या से दो चार होने पर पुरुष एकांतवास ले लेते थे किसी गुफा में.

इस वजह से पुरुषो को ना सिर्फ अपने को बेहतर तरीके से अपने को अभिव्यक्त करना सीखना पड़ेगा बल्कि अपने साथी पुरुष मित्रो के भावनाओ, समस्याओ और दुखो को सही सही समझने की कला विकसित करनी  पड़ेगा। अक्सर हम अपने साथी पुरुष मित्रो के समस्याओं को कमतर करके आंकते है. इस गलत प्रवत्ति पर अंकुश लगाना पड़ेगा। सो इस बार के अंतराष्ट्रीय पुरुष दिवस का विषय है कि पुरुष मुखर हो ( अपने समस्याओ के सन्दर्भ में) और लोगो के बीच अपनी बाते रखे.

The Society Should Stop Undermining The Contributions Made By Men!

The Society Should Stop Undermining The Contributions Made By Men!

पुरुषो के मुख्य मुद्दे:

पुरुष कई प्रकार के समस्याओ से जूझ रहे है जिनके बारे में लोगो को जानकारी ना होने के कारण, चेतना के अभाव के कारण समाज में पुरुष विरोधी माहौल व्याप्त रहता है. कुछ प्रमुख मुद्दे इस प्रकार से है:

पुरुषो के साथ अक्सर भेद भाव होता है पारिवारिक न्यायालयों में.

इस बात की सम्भावना नब्बे प्रतिशत तक है कि अगर तलाक होता है तो पिता अक्सर बच्चे पर अपना कानूनी हक़ खो देते है.

विवाहित पुरुष विवाहित स्त्रियो के मुकाबले दुगने रफ़्तार से आत्महत्या करते है.

सरकार और न्यायालयों के पास विवाहित पुरुषो के आत्महत्या को रोकने की कोई नीति नहीं है.

अगर महिला पुरुष का शोषण करती भी है तो भी समाज ऐसी महिलाओ को सजा  नहीं देता है.

स्त्रियो की अपेक्षा पुरुष चार गुना अधिक रफ़्तार से हादसो में मरते है.

समाज ने पुरुष को इस सांचे में ढाल रखा है कि वे सब तरह का जोखिम उठाते है, अपनी जाने गंवाते है और वो भी ज्यादातर अवैतनिक मजदूर की तरह.

पुरुष जो आहुति देते है, जो बलिदान करते है उनका कोई मोल नहीं होता और वे मात्र उनका कर्तव्य मान लिया जाता है.

पुरूष जो समाज के उत्थान में अपना सहयोग देते है वे अक्सर चर्चा का विषय नहीं बनती और ये सहयोग इतिहास के पन्नो में कही दब सा जाता है.

ये तो केवल कुछ ही मुद्दे है जो अभी उभर कर आये है. अभी बहुत से मुद्दे है जो तह में दबे हुए है और जिन पर अभी चर्चा होनी बाकी है.

पिताओ के मुख्य मुद्दे:

पिता भी कई मुद्दो से रूबरू है जो संक्षेप में इस प्रकार है:

अलगाव के उपरान्त अगर पिता अपने बच्चे से मिलना चाहे या उनके साथ समय बिताना चाहे तो उसे कई प्रकार से अपमानित होना पड़ता है.

ऐसे कई पिता है जिनको अपनी अत्याचारी पत्नियों के हाथो कई प्रकार की मानसिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ता है, इमोशनल ब्लैकमेल होना पड़ता है अगर वे अलगाव के बाद अपने बच्चो से मिलने का प्रयास करते है.

अगर क़ानूनी तौर पे अलगाव हो गया है तो अक्सर पिता को अपने बच्चो से मिलने नहीं दिया जाता, उन्हें एक दूसरे के साथ समय नहीं व्यतीत करने दिया जाता।

न्यायालय और समाज के द्वारा पिता को सिर्फ “एटीएम मशीन” और “स्पर्म डोनर” मान लिया गया है जिसकी वजह से भारतीय समाज “फ़ादरलेस सोसाइटी” की तरफ बढ़ चला है.

अंतराष्ट्रीय स्तर पर हुए शोधो और अध्ययन से ये पता चला है कि “फ़ादरलेस सोसाइटी” में निम्नलिखित बाते प्रधान है:

पिता के अस्तित्व से वंचित समाज में बच्चे:

पांच गुना अधिक आत्महत्या करते है.

बत्तीस गुना अधिक सम्भावना रहती है उनके घर से भागने की.

बीस गुना अधिक  इस बात कि सम्भावना है कि उनमे व्यवहार सम्बधित दोष उत्पन्न हो जाए.

चौदह गुना इस बात कि सम्भावना है कि वे बलात्कार करे.

नौ गुना अधिक वे हाई स्कूल की पढाई से वंचित रह जायेंगे मतलब अधूरी छोड़ देंगे।

१० गुना इस बात कि अधिक सम्भावना है कि वे ड्रग्स लेने के आदि हो जाए.

नौ गुना इस बात कि सम्भावना है कि वे राज्य द्वारा स्थापित संस्थानो के भरोसे रह जाए जीवन यापन के लिए.

बीस गुना इस बात कि सम्भावना है कि वे जेल जाने को मजबूर हो जाए.

इस प्रकार के समाज में तीन मिलियन लड़किया सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिसीसेस से पीड़ित है और इस प्रकार के समाज में चार में से एक टीनेजर बच्चा सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिसीसेस से पीड़ित है.

सिफ्फ़ और क्रिस्प के बारे में:

सेव इंडियन फॅमिली फाउंडेशन एक गैर सरकारी संगठन (NGO) है जो पुरुषो के अधिकारो के लिए लड़ रही है, लिंगभेदी कानूनो के खात्मे के लिए प्रयासरत है और समाज में व्याप्त पुरुषो के प्रति घृणा के खात्मे के प्रति प्रतिबद्ध है. ये भारत में शुरू पहला ऐसा संगठन है जो पुरुषो को एक मंच प्रदान करता है अपनी बात रखने का, अपने चुनौतियों का जिक्र करने का और जिन विपरीत परिस्थितयो में वे काम कर रहे है खासकर वैवाहिक समस्याओं के सन्दर्भ में उनके बारे में खुलकर अपनी बाते रखने के लिए. सिफ्फ़ रिश्तो के उलझाव में फंसे पुरुषो को उनसे निदान पाने के बारे में रास्ते दिखाता है, उन्हें प्रक्षिक्षण देता है और ऐसा कॉर्पोरेट संस्थाओ के लिए काम करने वाले पुरुषो के लिए भी किया जा रहा है. अब तक हज़ारो पीड़ित पुरुषो ने सिफ्फ़ से जुड़कर समस्यायों से निज़ात पाने में कामयाबी पायी है.

चिल्ड्रन राइट्स इनिशिएटिव फॉर शेयर्ड पैरेंटिंग (CRISP) एक गैर सरकारी संघटन (NGO) है जो पिताओ को अपने बच्चो से तादात्म्य स्थापित करने में सहयोग प्रदान करता है खासकर उस स्थिति में जहाँ माता पिता के बीच अलगाव हो गया हो. क्रिस्प ने कई अवसरों पर विधि आयोग से संवाद स्थापित किया है और सांसदो से मुलाकात कर पिताओ के बच्चे के प्रति लगाव को अधिक संवेदनशीलता से देखे जाने का अनुग्रह किया है. अब क्योंकि ज्यादा से ज्यादा पुरुष सरंक्षक की भूमिका का निर्वाहन करने में सलंग्न है क्रिस्प का कहना ये है कि अलगाव की स्थिति में शेयर्ड पैरेंटिंग मतलब संयुक्त रूप से पालन पोषण को अनिवार्य कर दिया जाए.

Is Violence Against Men At Hands Of Women Not An Issue?

Is Violence Against Men At Hands Of Women Not An Issue?

The post also got extensive coverage in leading Hindi Newspapers, courtesy Rajesh Vakahariaji, President, Save India Family Foundation, Nagpur, Maharashtra:

The post got featured in Navbharat which is a leading newspaper in Maharashtra :-)

The post got featured in Navbharat which is a leading newspaper in Maharashtra 🙂

 

 

Reference: 

The article is based on literature provided by SIFF and CRISP

Pics Credit: 

Pic One 

Pic Two 

Pic Three 

Beginning Of A New Era: Men’s Rights News Reports Which Featured In Newspapers Published From Lucknow And Allahabad

Author Of This Post At Fifth Men's Rights National Conference Held In Nagpur, Maharashtra,  From August 16- August 18, 2013.

Author Of This Post At Fifth Men’s Rights National Conference Held In Nagpur, Maharashtra, From August 16- August 18, 2013.


The Fifth Men’s Rights  National Conference, held in Nagpur in the second week of August 2013,  got tremendous coverage in mainstream media in Allahabad and Lucknow. It’s matter of self-pride since newspapers in this region are still not that familiar with concept of men’s rights. It’s a new phenomenon for them. In fact, issues pertaining to rights of men are still taken in lighter vein. Even the ones who are supposed to be more informed than ordinary class of people like reporters, editors and lawyers remain nonchalant when they come to hear about exploitation of men.

Fortunately, the extensive coverage of news related with Men’s Rights National Conference held in Nagpur marks a beginning of new era in this part of India. I am sure in coming days talks related with rights of men will not evoke irresponsible remarks. Have a look at the various news reports which appeared in Allahabad region’s prominent newspapers. It proved to be a herculean task to make them find meaning in talks related with men’s issues.I am happy that I was able to shatter the inertness prevalent in the minds of people who are supposed to be the custodians of human rights and made them understand the seriousness attached with cause of men.  Many thanks to those reporters, editors and lawyers who responded positively as I spoke about the rights of men. Hope the cause of men’s attain new heights in coming days

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1. The Times Of India

The Times Of India, September 01, 2013

The Times Of India, September 01, 2013

Link Related To This News Report: The Times Of India, Allahabad Edition

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2. Northern India Patrika 

Northern India Patrika: Oldest English Newspaper In Allahabad Region Gave Enough Coverage To Rights Of Men...

Northern India Patrika: Oldest English Newspaper In Allahabad Region Gave Enough Coverage To Rights Of Men…

Link To This News Report:  Northern India Patrika

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3.  Daily News Activist Published From Lucknow

Daily News Activist Published This News Report On September 26, 2013.

Daily News Activist Published This News Report On September 26, 2013.

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4. Jansandesh Times Published From Allahabad, Varanasi, Gorakhpur And Lucknow. 

This News Report  Published In  Jansandesh Times Created Huge Sensation In Various Important Circles.

This News Report Published In Jansandesh Times Created Huge Sensation In Various Important Circles.

Links Related To This News Report Published On October 03, 2013:  Visit The Archives Section Of Jandsandesh Times

And yes, many thanks to Amlesh Vikram Singh,  Correspondent associated with Jansandesh Times,  who made sincere efforts to get this news report published.  

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An Important News Item Related With Rights Of Men:

Deciphering The Significance Of Men’s Rights On Indowaves

Deciphering The  Significance Of Men’s Rights Movement Published In Northern India Patrika 

Deciphering The Significance Of Men’s Rights Movement On Website 498.in 

It's Not Bad To Aware Of One's Worth And Contributions..Many thanks to The Lord Almighty...

It’s Not Bad To Be Aware Of One’s Worth And Contributions..Many thanks to The Lord Almighty…

 


समाज की दशा और दिशा तब सुधरेगी जब पुरुषो का उत्पीडन बंद होगा, पुरुष विरोधी कानूनों का खात्मा होगा!!

नागपुर  अधिवेशन में आये पुरुष अधिकारों को जाग्रत करने ये समर्पित कार्यकर्ता

नागपुर अधिवेशन में आये पुरुष अधिकारों को जाग्रत करने ये समर्पित कार्यकर्ता 🙂

नागपुर में पिछले महीने पुरुष अधिकारों के प्रति समर्पित सेव इंडिया फॅमिली फाउंडेशन (SIFF) ने अपने पांचवे राष्ट्रीय सम्मलेन का भव्य और सफल आयोजन किया। मुख्य समारोह जो तीन दिनों का था, १६ अगस्त से लेकर १८ अगस्त तक, का  आयोजन नागपुर से १०० किलोमीटर दूर पेंच टाइगर रिज़र्व के शांत और रमणीक स्थल पर हुआ. पेंच के जंगल नोबेल पुरस्कार विजेता रुडयार्ड किपलिंग से सम्बन्ध रखता है जहा पे उन्होंने मशहूर किरदार मोगली को जन्म दिया। बहरहाल इसी जगह पे तीन दिनों तक वैचारिक कसरत में सलंग्न रहना एक संवेदनशील मुद्दे पर एक सुखद और यादगार अनुभव रहा. ये कहने में कोई सकोच नहीं कि पुरुष अधिकारों के प्रति अभी भी बहुत बड़ा वर्ग उदासीन है लिहाज़ा ऐसे आयोजन समय की मांग बन गए है जो इस मुद्दे पे देश और देश के बाहर एक उपयुक्त भूमि का निर्माण कर सके.

इस सम्मलेन का आयोजन राजेश वखारिया और नागपुर की SIFF टीम ने नागपुर में अन्य महत्तवपूर्ण संस्थाओ के साथ मिलकर किया जिनमे रविन्द्र दरक का योगदान सराहनीय था. इस राष्ट्रीय सम्मलेन में  SIFF की देश भर में फैली शाखाओ ने शिरकत की जिसमे बेंगालूरू , पुणे, मुंबई, लखनऊ, कन्याकुमारी, चेन्नई, इलाहबाद, हैदराबाद, नई  दिल्ली और अन्य जगहों से आये सत्रह राज्यों के कुल १५० से अधिक् जुझारु कार्यकर्ताओ ने अपनी सहभागिता दर्ज करायी जिन्होंने देश भर में फैले 40,000 एक्टिविस्ट्स का प्रतिनिधित्व किया। इसके साथ ही कुछ प्रसिद्ध विदेशी संस्थाओ जिसमे मैरिटल जस्टिस, यूनाइटेड किंगडम और  इन्साफ, यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ अमेरिका, प्रमुख थे ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। उल्लेखनीय बात ये रही कि जर्मनी, जापान, ऑस्ट्रेलिया, रूस, सिंगापुर और मिडिल ईस्ट से भी एक्टिविस्टस का आगमन हुआ.

सम्मलेन में चलती रही ऐसी कई परिचर्चाये सम्मानित सदस्यों के बीच !!

सम्मलेन में चलती रही ऐसी कई परिचर्चाये सम्मानित सदस्यों के बीच !!

समारोह में मैंने एक लेखक/ब्लॉगर की हैसियत से अपनी सहभागिता दर्ज कराई। चूंकि पुरुष अधिकारों में बहुत पहले से विचार विमर्श में सलंग्न रहा हूँ जो मेरे कई लेखो में उभर कर सामने आये है लिहाज़ा इस समारोह के जरिये मुझे कई और पहलुओ को बारीकी से समझने का अवसर प्राप्त हुआ.यद्धपि इस सम्मलेन में हुई चर्चाओ का फलक, विषय विन्दु कुछ सीमित सा रह गया, कुछ जरूरी सन्दर्भ जो परिवार के विघटन के प्रमुख कारण होते है जैसे उपभोक्तावाद, सांस्कृतिक हमले, इन पर कोई ख़ास चर्चा नहीं हुई और इसके अलावा संचालन में प्रक्रियागत ख़ामिया भी रह गयी लेकिन इसके बावजूद कई मुद्दों पर सार्थक चर्चा हुई. डॉ पोनप्पा, जो कि मैसूर से पधारे सर्जन थें, ने सही व्यक्त किया कि जिन मुद्दों को हम लेकर चल रहे है वे एक गहन गंभीरता की मांग करते है जो अगर इस तरह के समरॊह में भी अगर न दिखे तो तकलीफ होती है.

ये सर्वविदित है कि  IPC 498a, डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट जैसे घातक कानूनो ने समाज की कमर तोड़कर रख दी है. इनका जिस तरह से व्यापक दुरुपयोग हुआ है उसको सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी आतंकवाद की संज्ञा दी है. ये बेहद अफ़सोसजनक है कि कांग्रेस अपने वोट बैंक के चलते इस स्थिति में कोई सुधार नहीं कर पा रही. उलटे महिलाओ का वोट पक्का करने के लिए हिंदी विवाह अधिनियम (संशोधन) बिल, २०१०, पारित करा रही है जिसके पास हो जाने के बाद पुरुषो को आपसी सहमती से हासिल तलाक के उपरान्त अपनी गाढ़ी कमाई से अर्जित संपत्ति से हाथ धोना पड़ेगा। इस लाचार और पंगु सरकार के पास अपने अस्तित्व को बचाने के लिए सिवाय इस तरह के आत्मघाती कदमो के अलावा कोई और कदम नहीं सुझाई पड़ता है. सरकार में बैठे शामिल मंत्री और महत्त्वपूर्ण संस्थाओ को चला रहे अफसर शायद रेत में शुतुरमुर्ग की तरह सर गाड कर बैठे है कि उनको ये सरकारी आंकड़े जो कि ये दर्शाते है 242 पुरुष और 129 स्त्री हर दिन आत्महत्या करते है ( NCRB) की नाजुकता और गंभीरता समझ में नहीं  आती है. इसको और बारीकी से देखे तो 71 प्रतिशत के लगभग शादी शुदा पुरुष आत्महत्या करते है तो लगभग 67 प्रतिशत शादी शुदा महिलाये आत्महत्या करती है.

और सब बुनते रहे नए सपने, नए मकाम पुरुषो को उनका अधिकार दिलाने के लिए

और सब बुनते रहे नए सपने, नए मकाम पुरुषो को उनका अधिकार दिलाने के लिए

कितने अफ़सोस की बात है कि जहा महिलाओ का पक्ष सुनने के लिए कई संस्थान है वही पुरुष को सड़ने गड़ने को छोड़ दिया जाता है उसको अपनी तमाम समस्याओ के साथ. खैर आधुनिक सभ्यता अपने उस मकाम पर आ गयी है जब पुरुषो का हर तरीके से शोषण बंद हो चाहे वो किसी भी रूप में हूँ और किसी स्तर पर हो. उनके योगदान का सही रूप से मूल्यांकन हो. लेकिन तमाशा देखिये कि कांग्रेस सरकार ना केवल परिवार संस्था को तहस नहस करने में लगी है बल्कि कानूनी आतंकवाद के जरिये पुरुषो को लाचार और अक्षम बनाने पर तुली है. आखिर हिन्दू विवाह अधिनियम (संशोधन) बिल, २०१०, जैसे अपूर्ण और भ्रामक कानून को बनाने का उद्देश्य क्या है जो संविधान के कई मूल पहलुओं की उपेक्षा करता है? जेंडर इक्वलिटी के दायरे में में क्या पुरुषो को आपत्ति करने का कोई अधिकार नहीं है? फिर ऐसा कानून लाने की क्या जरूरत है जो सिर्फ हिन्दू संपत्ति के बटवारे की बात करता हूँ? ऐसा ही संशोधन मुस्लिम पर्सनल कानून पर क्यों नहीं लागू होता? कितने खेद की बात है कि कांग्रेस की अक्षम सरकार ने विवाह नाम की संस्था की धज्जिया उड़ा दी पर हिन्दू खामोश है और नर के भेस में नारी समान पुरुष खामोश है.

इसलिए नागपुर में आयोजित राष्ट्रीय सम्मलेन ख़ासा महत्व रखता है. ये एहसास दिलाता है कि इस तरह के आयोजन अनिवार्य हो गए है सरकार को शीशा दिखाने के लिए और समाज में एक सार्थक बदलाव लाने के लिये. इस सम्मलेन में कुछ महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किये गए जिनमे प्रमुख है पुरुषो के लिए अलग मंत्रालय बनाने के लिए ताकि उनके समस्याओ पर बेहतर चिंतन हो सके; पुरुषो की जिंदगी को खतरनाक धंधो में भागिरदारी कम की जाए; वैवाहिक कानून जो कि  आज समानता के कानून की  अवहेलना करते है उनको “जेंडर इक्वल” बनाया जाए कानून की चौखट में; पिता को भी समान रूप से शेयर्ड पेरेंटिंग के भावना के अंतर्गत बच्चो को पालन पोषण करने की छूट दी जाए तलाक मंजूर होने के उपरान्त ताकि बच्चो को माता पिता का सामान रूप से सरंक्षण प्राप्त हो. इसके अलावा इस बात पे भी बल दिया गया कि पुरुषो की स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं का निराकरण करने की एक सार्थक पहल हो सरकार और समाज दोनों द्वारा।

सम्मलेन का समापन हिन्दू  विवाह अधिनियम (संशोधन) बिल, २०१० को तुरंत वापस मांग लेने के साथ हुआ. सम्मलेन में बहुत से लोगो को पुरुषो के अधिकार के प्रति चेतना जगाने लिए सम्मानित भी किया गया जिसमे इस लेख के लेखक हिस्से में भी ये सम्मान आया, जिनका इलाहाबाद में इलाहाबाद हाई कोर्ट के वकीलों ने एक समारोह आयोजित कर इस उपलब्धि के लिए सम्मानित किया। बहुत जरूरी है ऐसे सम्मलेन, इस तरह के सम्मान समाज का अस्तित्व बचाने के लिए और इस बात को बल देने के लिए कि पुरुष भी स्त्री की तरह समाज की एक प्रमुख इकाई है. SIFF और इससे जुड़े लोग बधाई के पात्र है इस तरह के क्रांतिकारी पहल के लिए. उम्मीद है इस तरह के संस्थान समय के साथ नयी ऊंचाई को प्राप्त कर समाज को नयी दशा और दिशा देने में निश्चित रूप से कामयाव होंगे।

नागपुर में कुछ इस तरह हुआ सम्मान इस पोस्ट के लेखक का  पुरुष अधिकारों के प्रति समर्पित रहने पर!!

नागपुर में कुछ इस तरह हुआ सम्मान इस पोस्ट के लेखक का पुरुष अधिकारों के प्रति समर्पित रहने पर!!

....और इलाहाबाद में सम्मलेन से लौटने पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के वकीलों ने सम्मान किया

….और इलाहाबाद में सम्मलेन से लौटने पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के वकीलों ने सम्मान किया

References:

The Times Of India

Northern India Patrika

P.S.: Media Persons Are Permitted To Publish This Article In Their Respective Publications. However,  They Are Requested To Give Due Credit To The Author/Blog Page Apprising Him Of Its Publication As Early As Possible. 

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फोटो जो हमने और अन्य साथी मित्रो ने खींची सम्मलेन की, और कुछ फोटो फुरसत के पलो की!!!

 

मैसूर से पधारे डॉ पोनप्पा को सुनना और मिलना एक सुखद अनुभव रहा

मैसूर से पधारे डॉ पोनप्पा को सुनना और मिलना एक सुखद अनुभव रहा

 

सुरेशराम जो चेन्नई से आये थें उनसे कानूनी पेंचो को समझने में काफी आसानी हुई

सुरेशराम जो चेन्नई से आये थें उनसे कानूनी पेंचो को समझने में काफी आसानी हुई

स्वरुप सरकार  से तो काफी मुलाकाते हुए थी आभासी जगत में लेकिन यथार्थ के धरातल पर मिलन रोचक रहा. जिस अंदाज़ में ये बोलते है फेमिनिस्ट ब्रिगेड को कुछ ऐसे ही एग्रेसिव हथौड़ो की जरूरत थी :P

स्वरुप सरकार से तो काफी मुलाकाते हुए थी आभासी जगत में लेकिन यथार्थ के धरातल पर मिलन रोचक रहा. जिस अंदाज़ में ये बोलते है फेमिनिस्ट ब्रिगेड को कुछ ऐसे ही एग्रेसिव हथौड़ो की जरूरत थी 😛

मेरे संवेदनशील मित्र जोयंतो जो अपने इलाहाबाद के होते हुए भी नागपुर में पहले पहल मिले :-) बीच में शायद राजेश वखारिया जी ही जैसा कोई शख्स दिख रहा है :-) बगल में हम है और उसके बाद शम्मी जी है जिनसे सम्मलेन समाप्ति पर कार में काफी रोचक बाते हुई!

मेरे संवेदनशील मित्र जोयंतो जो अपने इलाहाबाद के होते हुए भी नागपुर में पहले पहल मिले 🙂 बीच में शायद राजेश वखारिया जी ही जैसा कोई शख्स दिख रहा है 🙂 बगल में हम है और उसके बाद शम्मी जी है जिनसे सम्मलेन समाप्ति पर कार में काफी रोचक बाते हुई!

विराग से मिलकर काफी प्रसन्नता हुई और उसकी एक वजह ये थी कि हम इन्टरनेट पर अक्सर बातचीत करते रहते है..और ये सिलसिला काफी पुराना है

विराग से मिलकर काफी प्रसन्नता हुई और उसकी एक वजह ये थी कि हम इन्टरनेट पर अक्सर बातचीत करते रहते है..और ये सिलसिला काफी पुराना है

स्वर्णकार जी जो शायद विलासपुर से पधारे थें मेरे कमरे में ही रुके थे। अध्यात्म और अधिकारों का गठजोड़ बहुत हुआ फुरसत के क्षणों में इनके साथ

स्वर्णकार जी जो शायद विलासपुर से पधारे थें मेरे कमरे में ही रुके थे। अध्यात्म और अधिकारों का गठजोड़ बहुत हुआ फुरसत के क्षणों में इनके साथ

राजेश जी मिलना होगा सोचा ना था। बहुत पुराने साथी है मेरे।  खैर दिल्ली और इलाहाबाद के वकील मिले तो आपस में :-)

राजेश जी मिलना होगा सोचा ना था। बहुत पुराने साथी है मेरे। खैर दिल्ली और इलाहाबाद के वकील मिले तो आपस में 🙂

गोकुल से मेरी पहली मुलाक़ात वर्षो पहले हुई थी  इन्टरनेट पे अपने ही किसी पोस्ट पर चर्चा के दौरान। और मिलना सालो बाद नागपुर में हुआ

गोकुल से मेरी पहली मुलाक़ात वर्षो पहले हुई थी इन्टरनेट पे अपने ही किसी पोस्ट पर चर्चा के दौरान। और मिलना सालो बाद नागपुर में हुआ

अनाडी" जी जो लखनऊ से पधारे ने जो "चाय" पिलाई कि उसकी मिठास अभी भी बनी हुई है. इन्होने ये तो साबित ही कर दिया कि हास्य और व्यंग्य वो विधा है कि जिसकी मार बहुत गहरी होती है

अनाडी” जी जो लखनऊ से पधारे ने जो “चाय” पिलाई कि उसकी मिठास अभी भी बनी हुई है. इन्होने ये तो साबित ही कर दिया कि हास्य और व्यंग्य वो विधा है कि जिसकी मार बहुत गहरी होती है

 

मन में जगह कर गया. आप जैसे और लोगो की जरुरत है जो देश में बेहतर सोच को जन्म दे सके

पांडुरंग कट्टी से मै पहले कभी नहीं मिला था सो मिलना मन में जगह कर गया. आप जैसे और लोगो की जरुरत है जो देश में बेहतर सोच को जन्म दे सके

अर्नब गांगुली से भी मेरी ये पहली मुलाक़ात थी !

अर्नब गांगुली से भी मेरी ये पहली मुलाक़ात थी !

अमर्त्य का लगाव देखकर प्रसन्नता हुई. अमर्त्य में अच्छा ये लगा कि कम से कम कुछ लोग तो पढने में यकीन रखते है गहरे में जाकर। दीपिका जी का योगदान इस मामले में महत्त्वपूर्ण है कि डाक्यूमेंट्री विधा को एक ऐसे मुद्दे में इस्तेमाल कर रही है जिसको वाकई विस्तार की जरूरत है. बहरहाल दोनों लोगो से मिलकर ख़ुशी हुई.

अमर्त्य का लगाव देखकर प्रसन्नता हुई. अमर्त्य में अच्छा ये लगा कि कम से कम कुछ लोग तो पढने में यकीन रखते है गहरे में जाकर। दीपिका जी का योगदान इस मामले में महत्त्वपूर्ण है कि डाक्यूमेंट्री विधा को एक ऐसे मुद्दे में इस्तेमाल कर रही है जिसको वाकई विस्तार की जरूरत है. बहरहाल दोनों लोगो से मिलकर ख़ुशी हुई.

श्रीनिवास से मिला तो समझ में आया कि इस फेमिनिज्म ने कितना नुक्सान पहुचाया है घरो को उजाड़कर

श्रीनिवास से मिला तो समझ में आया कि इस फेमिनिज्म ने कितना नुक्सान पहुचाया है घरो को उजाड़कर

प्रकाश ने जो सहूलियत प्रदान की सम्मलेन में और सम्मलेन के खत्म होने के बाद बारिश में भीगते हुए कुछ दूर तक छोड़ना याद आता है. पहले भी नागपुर आया था तो तब भी मिलना इनसे अच्छा लगा था. प्रकाश में सम्मलेन मेंकोई पेपर तो नहीं पढ़ा लेकिन अगर ये कुछ कहते तो उसको सुनना दिलचस्प रहता।

प्रकाश ने जो सहूलियत प्रदान की सम्मलेन में और सम्मलेन के खत्म होने के बाद बारिश में भीगते हुए कुछ दूर तक छोड़ना याद आता है. पहले भी नागपुर आया था तो तब भी मिलना इनसे अच्छा लगा था. प्रकाश में सम्मलेन मेंकोई पेपर तो नहीं पढ़ा लेकिन अगर ये कुछ कहते तो उसको सुनना दिलचस्प रहता।

रविन्द्र दरक से पहले मै नहीं मिला था लेकिन इस उम्र में एक गंभीर मुद्दे पर इतनी सक्रियता देखकर मन में बल का उदय हुआ

रविन्द्र दरक से पहले मै नहीं मिला था लेकिन इस उम्र में एक गंभीर मुद्दे पर इतनी सक्रियता देखकर मन में बल का उदय हुआ

गंभीर चर्चा बिना खाए पिए कैसे हो सकती है :P

गंभीर चर्चा बिना खाए पिए कैसे हो सकती है 😛

पारंपरिक मीडिया में नागपुर अधिवेशन सुर्खियों में रहा

पारंपरिक मीडिया में नागपुर अधिवेशन सुर्खियों में रहा

पारंपरिक मीडिया कब तक हमको इग्नोर करती!!

पारंपरिक मीडिया कब तक हमको इग्नोर करती!!

नागपुर का टाइम्स ऑफ़ इंडिया क्यों पीछे रहता भला

नागपुर का टाइम्स ऑफ़ इंडिया क्यों पीछे रहता भला


Fighting For The Rights Of Men Can Also Bring Honours!

 

Author Of This Blog Post Being Awarded At Men's Rights  Conference Held In August, 2013, in Nagpur.

Author Of This Blog Post Being Hnoured At Men’s Rights Conference Held In August, 2013, in Nagpur.

A High Court lawyer Arvind Kumar Pandey was felicitated by a section of lawyers for receiving an award at fifth National Men’s Rights Conference held in Nagpur recently, for outstanding contribution in championing the cause of men in national and International arena, during a programme organized at Indian Coffee House on Saturday.

Addressing the lawyers, Arvind Kumar Pandey said, “Biased criminal laws have spoiled the lives of many men charged under the Dowry Act. The laws like Domestic Violence Act, IPC 498 a, and Maintenance Act, to name a few are heavily tilted in favour of women and have done more harm than producing good effects.”

The Men’s Rights National conference, held at Pench Tiger Reserve in Nagpur was attended by more than 150 men’s rights activists, who represented 40,000 activists spread across India and other parts of the globe.

This year’s national conference was held under the aegis of Nagpur Chapter of Save Indian Family Foundation (SIFF), now being run by Rajesh Vakharia. Few prominent International Men’s Rights Associations like Marital Justice from United Kingdom and INSAAF from USA besides Men’s Rights activists from Germany, Singapore, Japan, Australia, South Africa, Middle East, Japan and Russia also attended the conference.

Informing about the resolutions passed at fifth Men’s Rights conference Arvind Kumar Pandey, who attended the conference as a writer and blogger said, “The first resolution was aimed at formation of Men’s Welfare Ministry while the next resolution aimed at reducing the number of men involved in hazardous professions and another important resolution dealt with creation of gender-neutral treatment in legal aspects. Recognition of the rights of fathers, making shared parenting necessary in wake of separation was another major demand made on the occasion. The activists were unanimous in rejecting the highly biased Marriage Law Amendment Bill, 2010, and demanded its roll back. Lastly, the need to make huge investment in areas of Men’s health was deeply felt.”

The felicitation ceremony at Coffee House, Allahabad, was attended by advocates including Neeraj Shukla, Sampanna Kumar Srivastava, Ashish Nigam, Satyadhar Dubey, Arvind Kushwaha, Pintu Jaiswal, Shubhranshu Pandey, Arun Prakash Srivastava, Mohit Kesarwani and few others.

 

A section of lawyers belonging to Allahabad High Court, Allahabad, Felicitating Me At Historic Indian Coffee House in Allahabad...

A section of lawyers belonging to Allahabad High Court, Allahabad, Felicitating Me At Historic Indian Coffee House in Allahabad…

Some More Pics From The Felicitation Held In Allahabad On August 27, 2013.

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The News Got Captured By Prominent Newspapers Like The Times of India..

The News Got Captured By Prominent Newspapers Like The Times of India..

Another Newspaper Published From Allahabad, Northern India Patrika, Also Published The News ....

Another Newspaper Published From Allahabad, Northern India Patrika, Also Published The News ….

Rajesh Kumar Pandey, Legal Correspondent, Did Not Hesitate To Offer Me This Bouquet :P

Rajesh Kumar Pandey, Legal Correspondent, Did Not Hesitate To Offer Me This Bouquet 😛

This Picture Is A Proof That We Also Came To Eat Something :P :P :P

This Picture Is A Proof That We Also Came To Eat Something 😛 😛 😛

The Entrance Of Historic Indian Coffee House In Allahabad. It's Associated With Leading Writers/Intellectuals Since 1950...

The Entrance Of Historic Indian Coffee House In Allahabad. It’s Associated With Leading Writers/Intellectuals Since 1950…

And That's Why It Has Become Necessary To Talk About Rights Of Men!!

And That’s Why It Has Become Necessary To Talk About Rights Of Men!!

References: 

This news item also got published in these two newspapers:

The Times Of India

Northern India Patrika

P.S. : Advocate Altaf Ahamad, practicing at District Court, Allahabad, also attended the felicitation ceremony held at Coffee House, Allahabad on August 27. His name failed to find mention in the news reports. I regret the error.

प्रस्तावित तलाक कानून: पुरुषो की बर्बादी और हिन्दू घरो की तबाही का औजार है!

 

Flawed Amendments In Hindu Marriage Laws Are Destroying Hindu Families!

Flawed Amendments In Hindu Marriage Laws Are Destroying Hindu Families!


हिन्दू विवाह अधिनियम को संशोधित करने में कांग्रेस सरकार जो अति सक्रियता दिखा रही है वो परेशानी और अचम्भे में डालती है. इस सरकार का कार्यकाल एक साल के भीतर ही ख़त्म होने वाला है लिहाज़ा ये अति सक्रियता आत्मघाती है. सम्पति के बटवारे के बारे में इसकी टेढ़ी चाल भारतीय परिवारों के विघटन का कारण बन सकती है. प्रस्तावित क़ानून में बटवारे वाले सेक्शन को लेकर जो उहापोह वाली स्थिति उत्पन्न हो गयी है सरकार के भीतर उससे स्पष्ट है कि इस सरकार के मंत्री खुद भ्रम के स्थिति में है और इस कानून में निहित संपत्ति बंटवारे और मुआवजे से सम्बंधित बिन्दुओ पर वो एकमत रूख नहीं रखते है. हिंदू विवाह अधिनियम’ की धारा 13-बी और ‘विशेष विवाह अधिनियम’ की धारा 28 आपसी सहमति से तलाक के अंतर्गत संपत्ति बंटवारे/ मुआवज़े पर जो सरकार के भीतर अन्तर्विरोध उभर कर आये है उससे ये समझ में आता है कि इस कानून के मूल तत्वों के बारे में सरकार में शामिल मंत्रियो से लेकर अन्य पार्टी के सांसदों को ज्यादा कुछ नहीं पता है . इससे ये सहज ही समझा जा सकता है कि जनता जिसका वो प्रतिनिधित्व करते है उनमे कितना भ्रम व्याप्त होगा। फिर भी ये सरकार इस संशोधन को इतनी जल्दबाजी में कानूनी जामा पहनाना चाहती है ये हैरान करता है.

ये बताना आवश्यक रहेगा कि सरकार ने संशोधन को पास कराने की हड़बड़ी में लॉ कमिशन और संसदीय स्थायी समिति को पूरी प्रक्रिया से बाहर रखा है. इसके खतरनाक दुष्परिणाम होंगे और इस तरह के कानूनों से भारत के युवक-युवतियों का भविष्य अँधेरे के गर्त में जा सकता है. ये निश्चित है कि अगर ये बिल अपने प्रस्तावित स्वरूप में पास हो गया तो ये एक और उदाहरण होगा गैर जिम्मेदाराना तरीके से प्रक्रियागत खामियों से लैस कानून को अस्तित्व में लाने का। पुरुषो एक अधिकारों का प्रतिनिधित्व करने वाली अग्रणी संस्था सेव इंडिया फॅमिली फाउंडेशन (SIFF) ने इस हिंदी विवाह अधिनियम (संशोधन) बिल, २०१०, को अपने वर्तमान स्वरुप में पारित कराने की कोशिशो की तीखी आलोचना करते हुए इस खतरनाक संशोधन को पूरी तरीके से नकार दिया है.

सेव इंडिया फॅमिली फाउंडेशन (SIFF) का ये भी कहना है कि न्यायधीशो को इस कानून के तहत असीमित अधिकार देना किसी तरह से भी जायज नहीं है खासकर महिलाओ से संबधित प्रतिमाह गुज़ारा भत्ता /मुआवज़े के निर्धारण में.

क्या कहता है ये कानून:

विवाह अधिनियम (संशोधन) विधेयक 2010’ “असुधार्य विवाह भंग’ को हिंदू विवाह अधिनियम 1955 और विशेष विवाह अधिनियम 1954 के तहत तलाक मंजूर करने के एक आधार के रूप में स्वीकार करता है. इसके साथ ही तलाक के मामले में अदालत पति की पैतृक संपत्ति से महिला के लिए पर्याप्त मुआवजा तय कर सकती है. विधेयक में पति द्वारा अर्जित की गई संपत्ति में से पत्नी को हिस्सा देने का प्रावधान है.

कुछ आवश्यक बिंदु:

इस कानून को महिलाओ के पक्ष में बताना खतरनाक है क्योकि भारत में सत्तर प्रतिशत परिवार गरीब वर्ग में है जो ज्यादातर क़र्ज़ में डूबे है और जिनके पास संपत्ति नाम की कोई चीज़ नहीं है, जिनके ऊपर पहले से ही बेटी बेटो के भरण पोषण और उनके शादी ब्याह जैसी जिम्मेदारियां है. ये कानून केवल एक ख़ास वर्ग में सिमटी सम्पन्न महिलाओ को ध्यान में रखकर अस्तित्व में आया है लिहाज़ा मुख्य धारा के राजनैतिक दलों को इसके विरोध में खड़े होकर इसके खिलाफ वोटिंग करनी चाहिए। ऐसा इसलिए कि इस कानून के पारित होने के बाद तलाक के प्रतिशत में अगले दस सालो में लभग तीस प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी हो सकती है.

प्रस्तावित हिन्दू विवाह संशोधन को सम्पूर्णता में देखे जाने की जरूरत है जैसे कि संयुक्त रूप से बच्चो का पालकत्व या बच्चों की जिम्मेदारियों के वित्तीय वहन से सम्बंधित कानून की इसमें क्या भूमिका रहेगी. सिर्फ मासिक भत्ते के निर्धारण में सक्रियता दिखाना उचित नहीं। क्या पति ताउम्र भत्ता गुज़ारा देता रहेगा संपत्ति बंटवारे के बाद भी जिसका हिस्सा खुद की संपत्ति और विरासत में मिली संपत्ति से मिलकर बनता है? ये कुछ अति महत्त्वपूर्ण बिंदु है जिनको संज्ञान में लेना आवश्यक है और इन्हें उनके बीच चर्चा में शामिल करना है जो इन कानूनों से प्रभावित हो रहे है. अव्यवस्थित रूप से निर्धारित बिन्दुओ को कानून बना के पास करना बेहद गलत है.

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 सेव इंडिया फॅमिली फाउंडेशन (SIFF) का सरकार को निम्नलिखित सुझाव:

सरकार इस कानून को तुरंत वापस लें और मौजूदा संसदीय अधिवेशन में इसे ना पेश करे. सरकार इस कानून की भाषा में परिवतन करे और इस लिंग आधारित भेदों से ऊपर करे जिसमे पति (husband) और पत्नी (wife) को ” जीवनसाथी” ( spouse) और स्त्री (man) और पुरुष (woman) को ” व्यक्ति” (person) में परिवर्तित किया जाए. इसके साथ ही किसी भी जीवनसाथी को तलाक़ अर्जी का विरोध करने की छूट हो कानून की समानता के रौशनी में. सरकार इस बात का भी निर्धारण करे कि अर्जित संपत्ति के निर्माण में पत्नी का क्या सहयोग रहा है या पति के परिवार के भौतिक सम्पदा के विस्तार में क्या योगदान है. इसको निर्धारित करने का सूत्र विकसित किया जाए. इसके निर्धारण में शादी के अवधि को ध्यान में रखा जाए, बच्चो की संख्या का ध्यान रखा जाए, और क्या स्त्री कामकाजी है या घरेलु. अगर स्त्री तीन बच्चो की माता है, वृद्ध सदस्यों की देखरेख का जिम्मा ले रखा है, तो उसका योगदान अधिक है बजाय उस स्त्री के जो कामकाजी है और जिसके कोई बच्चे नहीं है एक साल की अवधि में.

इस सूत्र के मुताबिक ही किसी व्यवस्था को संचालित किया जाए जीवनसाथी को प्रतिमाह भत्ते के सन्दर्भ में, मुआवज़े के सन्दर्भ में या किसी और समझौते के सन्दर्भ में. न्यायधीश महोदय इस सूत्र की रौशनी में अपने विवेक का इस्तेमाल कर उचित फैसले लें. लिहाज़ा इस सूत्र के अंतर्गत अगर स्त्री के सहयोग का अनुपात पति या उसके परिवार के संपत्ति के अर्जन में पूरी संपत्ति के मूल्य से अधिक है तो उसे पूरी संपत्ति पर हक दिया जा सकता है. अगर पत्नी इसको लेने से इनकार कर सकती है तो वो मासिक गुज़ारे भत्ते वाले विकल्प को अपना सकती है. कहने का तात्पर्य ये है कि संपत्ति में हिस्सेदारी के बाद उसका मासिक गुज़ारे भत्ते को लेते रहने का अधिकार ख़त्म हो जाता है. दोनों विकल्पों का लाभ लेने का हक जीवनसाथी को नहीं मिलना चहिये.

सरकार को इस सूत्र को अस्तित्व में लाने के लिए एक कमेटी या योजना आयोग का गठन करना चाहिए.

सरकार को सयुंक्त भरण पोषण का अधिकार बच्चे के बायोलॉजिकल अभिभावक द्वारा और बच्चे के ग्रैंड पेरेंट्स से स्थायी संपर्क को अनिवार्य कर दिया जाए, जब तक कि कोर्ट इसके विपरीत राय ना रखती हो. इसके अनुपालन के अभाव को आपराधिक जुर्म के श्रेणी में रखा जाए। अगर कोई अभिभावक इस सयुंक्त  के जिम्मेदारी से मुंह मोड़ रहा है या ग्रैंड पेरेंट्स से संपर्क में बाधा डाल रहा है तो इसको अपराध माना जाए.

सरकार ये सुनिश्चित करे कि न्यायालय को अपने विवेक के अधिकार का इस्तेमाल करने की सीमित आज़ादी हो संपत्ति बटवारे के निर्धारण में, मासिक गुज़ारे भत्ते के सन्दर्भ में और बच्चे के पालन पोषण सम्बन्धी मामलो में. बहुत ज्यादा अधिकार न्यायालय को देने का मतलब ये होगा कि कोर्ट का अवांछित हस्तक्षेप मामले को और जटिल बना देगा या कोर्ट का गैर जिम्मेदाराना रूख स्थिति को और विकृत कर देगा। अधिकतर पुरुष फॅमिली कोर्ट पे भरोसा नहीं करते, क्योकि इस तरह की कोर्ट पुरुषो के अधिकार के प्रति असंवेदनशील रही है. न्यायालय वर्षो लगा देती है पति को अपने बच्चो से मिलने का फैसला देने में और तब तक बच्चे की स्मृति पिता के सन्दर्भ में धूमिल पड़ जाती है.

सरकार ये सुनिश्चित करे कि महिला पैतृक संपत्ति और वहा अर्जित संपत्ति में जो हिस्सेदारी बनती हो उसे अधिग्रहित करे. उसे अपने कब्जे में लें. सरकार को हिन्दू विवाह अधिनियम में संशोधन करके महिला को अपने पिता के घर में रहने का स्थान सुनिश्चित करे , ताकि कम अवधि वाली शादी में अलगाव की सूरत में उसे रहने की जगह उपलब्ध हो. अगर माता पिता इस सूरत में उसे पति के घर जाने के लिये विवश करते है तो इसे अपराध की श्रेणी में रखा जाए. इसी प्रकार अगर महिला के माता पिता या महिला के भाई उसे पैतृक संपत्ति/ अर्जित संपत्ति में हिस्सा देने से इनकार करते है तो इसे असंज्ञेय प्रकार का अपराध माना जाए.

उन्होंने कहा कि अगर पति-पत्नी में से कोई भी एक व्यक्ति अगर संयुक्त आवेदन देने से इनकार करता है, तो दूसरे को आपसी सहमति के बजाय अन्य आधार पर तलाक के लिए आवेदन देने की अनुमति दी जानी चाहिए.

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इस देश में कानून बना देने ही को सब समस्यायों का हल मान लिया गया है. और इस तरह के दिशाविहीन कानून जो प्रक्रियागत कमियों से लैस है उनका अस्तित्व में आना तो और भी खतरनाक है. वो इसलिए कि न्यायालय हमारे यहाँ किन दुराग्रहो से अधीन होकर काम करते है वो सब को पता है. एक तो सिस्टम गलत तरीके से काम करता है और दूसरा न्याय के रास्ते में इतने दुराग्रह मौजूद है कि सिर्फ लिखित कानून बना देने से सही न्याय मिल जाएगा ये सिर्फ एक विभ्रम है. इस तरह के पक्षपाती कानून सिर्फ भारतीय परिवार का विनाश ही करेंगे जैसा कि  दहेज कानून के दुरुपयोग से हुआ है. सिर्फ मंशा का सही होना ही  काफी नहीं बल्कि आप किस तरह से उनका सही अनुपालन करते है ये आवश्यक है. ये तो सब थानों में बड़े बड़े अक्षरों में लिखा रहता है कि गिरफ्तार व्यक्ति के क्या अधिकार है पर क्या थानेदार साहब इन सब बातो की परवाह करके कभी थाने में काम करते है? नहीं ना!  यही वजह है कि इस तरह के अपूर्ण कानून न्याय का रास्ता नहीं वरन तबाही का मार्ग खोलते है. हिन्दू विवाह अधिनियम में इस लापरवाही से संशोधन करके पहले से इन कानूनों से त्रस्त हिन्दू परिवारों पर एक और घातक प्रहार ना करे.

( प्रस्तुत लेख सेव इंडिया फॅमिली फाउंडेशन के नागपुर शाखा के अध्यक्ष श्री राजेश वखारिया से बातचीत पर आधारित है) 

Flawed Marriage Laws Are Supporting Abusive Wives!

Flawed Marriage Laws Are Supporting Abusive Wives!

References:

विवाह कानून (संशोधन) विधेयक

आसान तलाक के लिए ‘हिंदू विवाह अधिनियम’ में बदलाव

‘दाम्पत्य जीवन की विफलता में तलाक मिले’


Pics Credit:

Pic One

Pic Two

Feminists Believe That A Woman Cannot Harass A Man !!!

Harassed By The Fair Sex !!

Harassed By The Fair Sex !!

The feminists are so amused and baffled the moment one speaks about harassment of men.Why ? They believe only women are the harassed.Only their harassment is real.The harassment of men is fictitious and figment of imagination. They lack explanation for the fact that when one can discuss about the harassment of females ,about problems pertaining to female world then in the same way why one cannot discuss about the harassment of men and about their problems ? Why is that the very reference to it makes feminists get engaged in sarcastic references ? Some people become uncomfortable and they are quick enough to call people referring to harassment of men as people living on a planet of ignorance ? Isn’t it a plain hypocrisy and double standard ? Even the most open minded feminists accuse people talking about rights of women as people mired in prejudices.

Let me put it bluntly that if one can discuss about the pains of women then in this era of “gender-equality” it’s no crime to refer to harassment of men whether or not one present facts to counter sarcastic notions of open minded feminists.India is male dominated society.I will love to know how many laws are there to protect the interests of men ? ” There is nothing special done or legally enacted for Men ever, however, on the other side Women has over the decades special legislation for women, upliftment schemes, monetary & social support, reservation etc. and even then if one believes India is a male dominating society then that male really deserves to be dominating.” It’s beyond rational thinking that the ghost of the past be brought on the fore to shed tears over the poor state of affairs of women when so many laws and legislation have equipped them live life with dignity.

However, the myth that women have always been oppressed in the past continues till date.I don’t know for how long they be shedding tears for that. They are weak but they are also equal at the same time.Great paradox,indeed. So women can have all the pleasures in name of equality but when it comes to ensure the rights of men and about their troubles everybody is tight lipped.No grants. No legislation. What about National Commission For Men in era of equality ? Oh ! Men are superheros and superhuman .They cannot be harassed and they cannot be in pains.They are the eternal culprits.They kept women inside homes since ages and all the time had pleasures in outside world. Now its payback time.The women should come out of homes and enjoy the pleasures which men had all these years in external world.

However, here comes the mother of all tamasha. They are equals and they are not a weaker sex but when they come out of home and be part of external world they need to have “special corner” everywhere.And so special laws that treat women as holy cow have also come in existence. They never lie.So the moment they deliver any statement it should be treated as gospel truth. There should be no discussion about its falsehood as that’s anti-female. So even if they are trapped in immoral activities it should be held as “expression of sexual freedom ” and thus if they are get caught in Pune’s late night beer party that should should be seen as trespassing on part of government machinery.

If women cannot harass men why the number of fakes cases filed under IPC 498A is increasing with each passing day ? Some say that women cannot lie and cannot heap charge of rape unless that has actually taken place. Look at these two cases that appeared in news item published in DNA on 19 June 2009.

“Case 1: An executive in a Delhi PR company spent two months in Tihar jail for rape. Later, investigations established that he was having an affair with the woman for two years and she wanted him to marry her. When he refused, she filed rape charges which she later withdrew as ‘false’.”

Case 2: In Bhayandar last year, a 17-year-old girl falsely accused her father of rape.”

Can one imagine the damaging consequences when one gets trapped in false accusations ? However,the blind feminists of our times see such dangerous trend pattern involving fake cases as an insignificant development. The harassment of men at hands of women is unreal.Okay.Anything related with men is unreal.The lies sponsored by the feminists is the only truth available. in one news item in prominent local daily the women murdered her new born infant to elope with her lover in Pratapgarh .She cleverly framed the relatives of her husband as a result whole family got trapped.An investigation later revealed the real story how the woman used her devilish brains to materialize her dreams.

In another case, a married man murdered by his wife in Rajroopur locality of Allahabad with the help of her lover.She claimed that to be act of robbers.However ,the investigation brought the truth on fore. The list of such tales is endless.These news items create no sensation as they are not related with high profile people. So women can never harass men !!! Read the affidavits filed by so called harassed women in family courts.I don’t say all of them are false but most of them are mere concoctions.But for feminists of India that’s non existent !!!

No one should assume that I am trying to prove that women’s world is devoid of pains.That there is no need of women’s organizations working cause of women. I am sure the moment a feminist will accuse me of ignoring the lives of a great section of women.A feminists shall say that these are just ” few cases” ? I wish to tell them that I am only trying to prove that harassment of men is real. It matters the least that it’s “few ” or “many”.The cases are enough to open the eyes of feminists who are all the time in absolute denial mode about anything that refers to problems of men.They dilute it by making them “just few cases”

Look at their perverted logic. As per their logic if one man is killed it’s no news.The killing of 100 men makes news.I got it right !! The men should wait till the water starts flowing above the head.However,now let me tell feminists that whole world does not sleep like feminists calling it “just few cases” ? I wish to tell them what’s the result of just few fake dowry cases. That’s because they involve innocent women as well.If the harassment of men is so unreal how come so many conscious people are today a worried lot ? Look what they have to say.

“Noted activist Madhu Kishwar acknowledged that IPC Section 498A is heavily misused, and that a significant proportion of individuals who approach “Manushi” these days are mothers-in-law and husbands who are falsely accused. ”

 

“Renowned IPS officer Kiran Bedi admitted that many poor and illiterate mothers-in-law and sisters-in-law, who are falsely charged under IPC Section 498A are languishing in prison every year. ”

 

“The Supreme Court of India has labeled the misuse of IPC Section 498A as “legal terrorism”.”

 

“The Delhi High Court recently stated that IPC Section 498A is the most abused provision.”

 

“The World Health Organization, in its report on India clearly cited Section 498A as one of the major reasons for the “Increasing Abuse of the Elderly in India”.

 

“Recently, the National Human Rights Commission noted that the Tihar jail is overflowing with people falsely accused under dowry cases.”

Sadly,the consciousness among women has gone against the large section of women. That has given rise to several important considerations.

“Is protection of women’s rights synonymous with gross violation of basic human rights?

“Is legal terrorism the solution to all women’s problems?”

“Does penalizing innocent mothers and sisters under false cases bring justice to genuinely abused women?

“A look at the crime records shows that every 20 minutes an innocent woman is arrested under IPC Section 498A.”

” Forget about men’s harassment I am trying to know that does law meant to ensure the rights of women topple the very base of Indian society ?

“Aren’t mothers and sisters women? Don’t they deserve a life of dignity and respect?

Does women’s empowerment mean destroying family harmony and creating a fatherless society?

That’s the paradox involved.The strange sense of consciousness provided by feminists theories has led to individualistic tendencies and anything that promotes collective consciousness is a great evil for modern women in league with her rights.Anyway, it has started toppling the lives of women whom many are interested under the women’s organization to empower them.

“Recently, a 92 year old woman was dragged to police station and the court, when a criminal case is filed against her. She was considered “guilty till proven innocent”. Another woman was arrested in a dowry case and is taken in train from Delhi to Lucknow along with her 6 month old kid. Is this empowerment of women? In another occasion, police reached to a school to arrest a class 9th school girl, who was listed as an accused in a dowry case. Is this what President calls about initiatives for “girl child” in India?”

The men are not harassed.If that’s true then what’s the reason for married men to commit suicide ? What’s the need to establish counseling cells for harassed husbands.

A news report says : “According to the statistics of National Crime Records Bureau (NCRB), nearly 22,000 Indian men had committed suicide because of dowry harassment in the last three to four years. Whereas during the same period, only 6,800 women committed suicide.”

“The most startling fact is that out of the 22,000 suicides by men, only six cases were registered against their wives and only one of them was called for questioning. In the last three years, 7,000 men were put behind bars and 68 percent were later found innocent.” Analyzing the suicide rate in 2008 as per report published in The Times of India the NCRB stated that “the overall male:female ratio of suicide victims for the year was 64:36.” in year 2008 and that it was not poverty that caused this suicides but ” more number of people committed suicide due to family (23.8%) “.

A news item from The Telegarph :

“If there should be a law like 498A to protect housewives from cruel husbands
and in-laws, there should also be a law to protect them from the hands of cruel
women like my daughter-in-law.”

(Suicide note of Prasanta Kumar Ghosh, 71.A septuagenarian father has taken his own life to save his son and other
tortured husbands. )

Here’s the suicide figures as per NCRB records.

2008 suicide figures are published.

Suicide of Married Man:

2006 – 55452
2007 – 57593
2008 -57639

Suicide of Married Women:

2006 – 29869
2007 – 30064
2008 – 30224

Let me refer to Domestic Violence Act.That takes care to women from violence women face at home.I am not anti feminist but I will love to know what are the provisions to protect husband if they face harassment at hands of wife ? The law is blank.It assumes only men beat women. In reality we know-at least in our times- they are no longer holy cows. Not only can they beat ,not only they can harass but they can also cry rape to settle scores.Though I agree with SC latest observation that women will not file a fake rape case because lot is at stake but SC realizes that times have changed and even this eternal truth that woman can never lie in such matters is questionable.I have already presented few cases.I cannot refer to American society but in brief I must say that rape as an industry prevails In US and other countries leading to at least 41 percent cases filed there as false.That because it ensures them huge money under many schemes.Anyway, I am talking about harassment of men. Interestingly, some feminist claim that their brand of feminism takes care of interests yet call stories related with harassment of men as figment of imagination and treat them as “just few cases.

Even assuming that tales of harassment of men is unreal what are the provisions to save men from violent and hysterical wives or for that matter from cruelty of women.Isn’t the law of natural justice demands that law should be equal for both?Harassed wives need protection but what about rights of harassed men ?What about the law to punish women who lie on oath ? The law to protect women from domestic violence act is silent. Why’s that ? After all, this law is the outcome of women’s organization/Women’s Commission recommendation to the Law commission.Ironically, when a harassed wife(read woman ) files a case against the husband (read man) why’s that other females like mother in law and sister in law gets punished ? So the law to protect women does not include women that’s associated with men !!!!

” This Act bears the name as if this Act is meant to provide protection to all women in India(i.e 48-50%population). Whereas, in India, almost 48-50 % is the total women population out of which if we exclude unmarried girls, old aged women, mother-in laws and sister-in-laws (which are not covered under this Act) I am sure this Act is made to protect only 10-20 % of women in the society. Whereas the misuse of this Act can very well drastically affect almost 80 % of total society. So, How justifiable is the wisdom of our Government or law makers ?”

“When a special Act(PWDVA) which lacks the balance of natural justice and is direct violative of fundamental right of life & liberty can be enforced for fairly very small section of society why not any genuine amendment, penalty clause for misuse or new law can be framed.”

Let’s realize that harassment of men is real. The harassment of men is real, more so when in our times we find that how in one high profile case a young women with her lover brutally murders her former love , cut the dead body into many pieces and packs it and then dumps it. I sincerely believe that there are that issues grave and worrisome in nature that have come to hit lives of modern women like growing sexual assault.However, having said that, I must say that these cannot be the base to harass men and to frame anti male laws.That cannot be the base to promote anti family and anti society gender biased laws. I mean spew venom against men.

That cannot be the base to sponsor propaganda of feminists that all men are potential rapists.My point is that to fight for the cause of women one need not be feminists. These are genuine problems of women’s world and I am not against the role of women’s organization to curb such crimes.Sadly, I am aware of the propaganda machinery run by the feminists.One that’s hell bent on treating all men as potential rapists; all men as potential criminals who are on this planet either to rape women or harass women.Or for that matter,all the ills happening to women is direct result of men.The women are the holy cows who are incompetent to give rise to any problem.The world is hell because of men.

Anyway, one need not to take Avatara as feminist to understand the problems of women.In short,all men and women need to be just extra conscious to understand each other’s problem and that means they can do that without following borrowed ideals of any “ism “.Some feminists proclaim that that their brand of feminism ensures a better relationship with women but how my dear friend ? By holding men guilty of all the wrongs happening to men. They don’t realize the great blunder you are making. The feminists of India are in grip of most standard paradox that governs feminists worldwide.They talk about interests of women while all the time widening the gulf between the opposite sexes. That makes me believe that one can work better for the cause of women without being a feminist !

The feminists talk about growing sexual assault on women and try to confirm relevance of feminism .Yes,it’s a heinous crime that men commit upon women.Well, women can also sexually assault men might appear stupid to them.However, now that’s a reality in Western word like the false 41 percent fake rape cases on par with rape industry that prevails there to have compensation etc.Anyway, I should only talk in Indian context.True, the assaults have grown.But in the same proportion the legislation that control it have also grown. The methods to prevent them have also become better. It’s other thing that lack of resources and infrastructure makes it difficult to provide a speedy justice.The culprits need to be punished.There has to be better atmosphere for them. There is no if and but in this regard. Everything required to control it is being done. Though I am not a feminist I am still pretty much conscious about it.

However, will anyone answer why at all the sexual assault has become so frequent in our times that even younger girls are its victim? You can held men as guilty and that’s easy but one needs to take few steps more to understand what’s the reasons that have led to increase in such incidents. Merely stating like the Feminists that sexual crime on women has increased will not serve the answers.Let’s come out with real causes instead of treating all men as potential rapists something that our feminists have used this fact to feed their propaganda.

It’s really that feminists of India claim that they are working for the cause of woman and they believe in healthy relationship between man and woman yet they go berserk when on refers about right of men.They talk about totality.But their version of totality means that women have all the rights but men have no rights !! As per the definition of feminism ” Feminism refers to political, cultural, and economic movements aimed at establishing greater, equal, or, some argue, superior rights and participation in society for women and girls, including legal protection and inclusion in politics, business, and scholarship, and recognition and building of women’s cultures and power.” Who is representing the cause of men the same way ? Why the one’s who discuss the rights of men with same passion are “misogynist” and not seen as ones who are ensuring that totality that you talk about becomes toatlity in real sense !!

So when feminist say that they view “society” in totality does that include rights of men ? Does that include reference to cases wherein men have become victim of tyrannical attitude of women ? If they say yes,then why are they so restless and anxious the moment anyone refers to harassment of men ? Does the idea of your totality is restricted to happenings in female world only ? If not ,how come the reference to rights of men irks feminists to great extent ? Have I made a blunder in referring to sufferings of men ? Is that reference to issues of men is outside the purview of idea of totality as understood by the feminists ? Do they wish to say that sufferings of women is real and sufferings of men is unreal ?

Who runs the system ? It’s men and women. What’s a system ? The tale of men and women. However, in this system one can refer to oppression of women and rights of women but one cannot refer to oppression of men and their rights . That’s indeed totality in all its totality. Like to present with what sort of ideas the feminist are trying to create healthy relationship between man and woman.

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“I feel that ‘man-hating’ is an honorable and viable political act, that the oppressed have a right to class-hatred against the class that is oppressing them.” — Robin Morgan, (editor of MS magazine)

 “Who cares how men feel or what they do or whether they suffer? They have had over 2000 years to dominate and made a complete hash of it. Now it is our turn. My only comment to men is, if you don’t like it, bad luck – and if you get in my way I’ll run you down.” — Letter to the Editor: “Women’s Turn to Dominate” — Signed: Liberated Women, Boronia — Herald-Sun, Melbourne, Australia – 9 February 1996

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ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर रेलवे अफसर।

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