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खुर्शीद अनवर की आत्महत्या: समाज, कानून और मीडिया के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा!

गम्भीर मुद्दा ये है कि सतही मीडिया ट्रायल के चलते जिस भीषण मानसिक कष्ट से गुजरना होता है और जो सरेआम अपमान सहन करना पड़ता है क्या उसका कोई अस्तित्व नहीं? क्या इसका कोई मोल नहीं? क्या ये बिलकुल उपेक्षित कर देने वाली बात है?

गम्भीर मुद्दा ये है कि सतही मीडिया ट्रायल के चलते जिस भीषण मानसिक कष्ट से गुजरना होता है और जो सरेआम अपमान सहन करना पड़ता है क्या उसका कोई अस्तित्व नहीं? क्या इसका कोई मोल नहीं? क्या ये बिलकुल उपेक्षित कर देने वाली बात है?


खुर्शीद अनवर की आत्महत्या कई गम्भीर सवाल खड़े कर गयी आज के समाज के बारे में, पत्रकारिता के स्तर के बारे में और कानून के उपयोग और दुरुपयोग के सन्दर्भ में. खुर्शीद अनवर एक प्रसिद्ध सामजिक कार्यकर्ता थें जो नई दिल्ली में इंस्टिट्यूट फॉर सोशल डेमोक्रेसी नाम की संस्था चलाते थें. इसके अलावा वे जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय के छात्र भी थें. खुर्शीद अनवर ने पिछले साल १८ दिसम्बर २०१३ को आत्महत्या कर ली थी जब उनपे एक मणिपुरी औरत ने  अपने साथ दुष्कर्म का आरोप लगाया था. ये खबर कुछ एक समाचार चैनलों पर प्रमुखता से दिखायी गयी और इसके बाद सोशल नेटवर्किंग साईटस पर अंतहीन बहस छिड़ गयी. पहले तो खुर्शीद इस आरोप से हिल गए और इसके बाद मीडिया चैनलो द्वारा कीचड़ उछालने के बाद सदमे से ग्रस्त खुर्शीद ने आत्महत्या कर ली. बाद में उनके पास से बरामद सुसाइड नोट में इस बात का उल्लेख था कि मणिपुरी लड़की के साथ उन्होंने बलात्कार नहीं किया था बल्कि आपसी सहमति से शारीरिक सम्बन्ध बनाये थे.

इस घटना ने मुझे श्रीनिवास सिरास के आत्महत्या की याद दिला दी जो प्रोफेसर थे अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में. इस प्रकरण में न्यूज़ चैनलो नें इस प्रोफेसर के निजता के साथ खिलवाड़ किया था और उनकी गोपनीयता को सरेआम उजागर करके उनके समलैंगिक सम्बन्धो को विकृत स्वरूप दे दिया था. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस प्रकरण में सुनवाई करते हुए प्रोफेसर को थोड़ी राहत प्रदान की थी पर मीडिया चैनलो द्वारा की गयी गुस्ताखी उन पर भारी पड़ गयी और उन्होंने आत्महत्या कर लिया. कोर्ट इस तरह के मीडिया ट्रायल पर अक्सर चेतावनी देती रही है पूर्व में कि न्यूज़ चैनल जब केस ट्रायल स्टेज में हो तो किसी भी निष्कर्ष पर अपनी तरफ से पहुचने की हड़बड़ी ना दिखाए और न्यायालय की कार्यवाही को प्रभावित करने की कोशिश ना करे लेकिन बड़े कॉर्पोरेट संस्थानो द्वारा संचालित ये न्यूज़ चैनल न्यायालय के द्वारा इन पारित आदेश को सिर्फ कागज़ का एक टुकड़ा समझते है और उन्हें किसी प्रकरण में निहित संवेदनशीलता से कुछ नहीं लेना देना होता सिवाय इसके कि उसका माखौल किस तरह उड़ाया जाए. ये सही है मीडिया ट्रायल एक जटिल मुद्दा है लेकिन उससे बड़ा सच ये है कि सनसनीखेज मीडिया ट्रायल के चलते किसी के इज्जत और उसके आत्मसम्मान के साथ जो खिलवाड़ होता है और इससे जो अपूर्णीय क्षति होती है उसकी भरपाई असंभव होती है. मीडिया  किसी दोषी व्यक्ति के अधिकारो के हमेशा अतिक्रमण करती आयी है और समय आ गया है कि सही तथ्यात्मक रिपोर्टिंग और रिपोर्टिंग जो गलत इरादो से की गय़ी हो सिर्फ न्यूज़ चैनल के टी आर पी या फिर अखबार की बिक्री बढ़ाने के उद्देश्य से की गयी हो दोनों में एक स्पष्ट रेखा का निर्धारण हो.

“सनसनीखेज रिपोर्टिंग तो हमेशा होगी क्योकि सनसनीखेज घटनाये भारत में हमेशा रहती है. सुप्रीम कोर्ट इस पर लगाम लगाने में असमर्थ है. ये सही है कि रिपोर्टिंग सही होनी चाहिए पर इसका ये मतलब निकालना कि ये मीडिया के द्वारा ट्रायल है एक निन्दात्मक अभिव्यक्ति है. कोर्ट या किसी के पास कोई स्पष्ट मापदंड नहीं है जो ये निर्धारित कर सके कि मीडिया ट्रायल क्या होता है.” (सीनियर अधिवक्ता राजीव धवन, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया). खैर इस बात से इंकार करना असम्भव है कि मीडिया के द्वारा किसी भी दोषी व्यक्ति के अधिकारो का हनन और किसी के भी निजता के साथ खिलवाड़ करने के कृत्य का अपने तरफ से दूषित स्पष्टीकरण कोई भी मतलब नहीं रखता। ये सिर्फ एक व्यर्थ का  प्रलाप होता है, बेवजह अपने को सही ठहराना होता है. उसकी स्पष्टीकरण से उस अपूर्णीय क्षति की भरपाई असम्भव है जो इस वजह से होती है. इन दोनों प्रकरणो में दो व्यक्ति ने अपनी जान ले ली इस वजह से और अब हम ये कभी नहीं जान पाएंगे कि सच्चाई क्या थी. क्या ये दो जाने वापस मिल जाएंगी? क्या खोया सम्मान वापस मिलेगा? शायद कभी नहीं।

वरिष्ठ पत्रकार सईद नक़वी शायद सच के ज्यादा करीब है जब ये कहते है कि “पत्रकारिता में शायद निष्कर्षो पर पहुचने की हड़बड़ी है. ये उसी दिन किसी को मुजरिम ठहरा देता है जिस दिन किसी पे आरोप लगते है, इसके पहले कि कोर्ट किसी बात का निर्धारण करे. ये बहुत दुखी कर देने वाली बात है. कैसे मीडिया इतनी जल्दीबाज़ी में किसी निष्कर्ष पर पहुच सकती है और किसी को इतनी हड़बड़ी में दोषी करार दे सकती है? मीडिया को इस बात का इन्तजार करना चाहिए कि कम से कम प्राथमिक रिपोर्ट तो दर्ज हो, कम से कम जांच तो पूरी हो जाए” (डी एन ए न्यूज़ रिपोर्ट) ये बिलकुल चकित कर देने वाली बात है कि मीडिया कभी भी इस तरह के सनसनीखेज मीडिया ट्रायल के दौरान अपूर्णीय क्षति और इनके अंजामो के बारे में कभी भी ईमानदारी से आकलन नहीं करती. गम्भीर मुद्दा ये है कि सतही मीडिया ट्रायल के चलते जिस भीषण मानसिक कष्ट से गुजरना होता है और जो सरेआम अपमान सहन करना पड़ता है क्या उसका कोई अस्तित्व नहीं? क्या इसका कोई मोल नहीं? क्या ये बिलकुल उपेक्षित कर देने वाली बात है? ये बिलकुल स्पष्ट है कि मीडिया ट्रायल अधिकतर एकतरफा, भ्रामक और तथ्यो के साथ खिलवाड़ होता है जिसमे इस बात की बिलकुल परवाह नहीं की जाती कि कम से कम तथ्यो के असलियत का तो निर्धारण कर लिया जाए सूक्ष्मता से.

इस पूरे प्रकरण में दो बहुत गम्भीर पहलू शामिल है. पहला तो ये कि ये समाज के इस विकृत बदलाव को दर्शाता है कि समाज में हड़बड़ी में निष्कर्षो पर पहुचने की लत लग गयी है अधकचरे दिमाग के साथ. इसे चाहे वो प्रशंसा  हो या फिर आलोचना दोनों को बिना किसी आधार के आत्मसात करने की आदत सी हो गयी है. ना आलोचना का स्तर विकसित हो पाया और ना ही प्रशंसा के आयाम निर्धारित हो पाये. आलोचना अगर हो रही है तो तो वो भी तब जब कि कोई भी तथ्यात्मक या तार्किक आधार आलोचना के पक्ष में मौजूद नहीं है. दूसरा पक्ष ये है कि जिन कानूनो को स्त्री की अस्मिता की रक्षा करने के लिए बनाया गया है वे अब निर्दोष लोगो को प्रताड़ित करने का अस्त्र बन गए है. ये कितने तकलीफ की बात है कि जहा किसी स्त्री के सेक्सुअल हरस्मेंट का मामला उभरता है वही पे समाज का एकपक्षीय भेदभाव ग्रस्त दिमाग उभर कर सामने आ जाता है और मीडिया हमेशा की तरह दोषी के ऊपर हर तरह का लांछन जड़ देता है और इसके पहले वो अपने बेगुनाही को साबित करे वो मुजरिम साबित करार कर दिया जाता है. ये सर्वविदित है कि जो नए कानून की परिभाषा है सेक्सुअल हरस्मेंट को रोकने कि उसके प्रावधान इस तरह के है कि आप तकरीबन मुजरिम ही है और इस बात को गौण कर दिया गया है कि आप के पास भी बचाव के सही रास्ते होने चाहिए. और सबसे घातक ये है कि एकतरफा मीडिया ट्रायल शुरू हो जाने के बाद जो उसके पास अपने को बचाने के जो रास्ते होते है वे भी बंद हो जाते है क्योकि मीडिया आपके विपक्ष में माहौल खड़ा कर देता है हर तरफ.

“भारत में और अन्य देशो में जहा इस तरह के कानून पास हुए है औरतो के साथ होने वाले अपराधो को रोकने के लिए उसमे बर्डेन ऑफ़ प्रूफ को सुनियोजित तरीके से बदल दिया गया है. अब दोषी के ऊपर ये जिम्मा है कि वे अपनी निर्दोषता साबित करे. ये परिवर्तन निहित रूप से बहुत गलत है पर शायद ये इसलिए किया गया है कि ताकि इन प्रकार के अपराधो में स्त्री के पास सामान स्तर के अवसर हो अपने साथ हुए अन्याय के भरपाई के लिए. लेकिन जो अब नए कानून बने है सेक्सुअल हरस्मेंट रोकने के लिए उसमे ये बर्डन ऑफ़ प्रूफ इस सख्त स्वरूप में है कि जहा दोषी (पुरुष) के पास बचाव के सारे रास्ते बंद हो जाते है. अगर एक बार आप पर आरोप लगे तो इस बात की सम्भावना कम है कि आप अपने को निर्दोष साबित कर सके या आपको बेहद मशक्कत के बाद ही कोई रास्ता दिखायी पड़े. ये शायद नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत के विपरीत है.” (वरिष्ठ पत्रकार प्रेम शंकर झा, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया)

संक्षेप में समाज और मीडिया दोनों का स्तर रसातल में चला गया है क्योकि ये दोनों भावनाओ के प्रवाह में बहने के आदी हो गए है और इन दोनों को तथ्यो और तार्किक सोच से कुछ लेना देना नहीं रह गया है. दोनों को इस विकृत खेल में रस आने लगा है जहा किसी निर्दोष के भावनाओ के साथ खिलवाड़ होता है, उसके आत्मसम्मान के जब टुकड़े टुकड़े किये जाते है. लेकिन खेद कि बात ये है कि न्याय परंपरा/व्यवस्था भी इसी विकृत रस का शिकार हो गयी है, इन्ही घातक प्रवित्तियों का शिकार सा हो गयी है, खासकर उन मामलो में जहा स्त्रियों से जुड़े अपराधो के निष्पक्ष अवलोकन की बात आती है. खैर सब की जिम्मेदारी बनती है कि  भावनात्मक प्रवाह में बह कर लिए गए निर्णयो के बजाय सोच समझकर तार्किक रूप से लिए गए निर्णयो को प्राथमिकता दी जाए. ये बहुत आवश्यक हो गया है समाज के बिखराव को रोकने के लिए, एक मूल्य आधारित समाज के निर्माण के लिए.

पाठक इस लेख का अंग्रेजी संस्करण यहाँ पढ़े:

Rape Allegation That Led To Suicide of Kurshid Anwar: A Resounding Slap On The Face Of Media!

खुर्शीद अनवर की आत्महत्या: समाज, कानून और मीडिया के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा

खुर्शीद अनवर की आत्महत्या: समाज, कानून और मीडिया के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा

References:

Activist Khurshid Anwar’s suicide: Was media trial responsible?

AMU’s ‘gay’ prof commits suicide

Guilty If Charged

Dainik Bhasker

 

पिक्स क्रेडिट:

तस्वीर प्रथम 

तस्वीर दो

Rape Allegation That Led To Suicide of Kurshid Anwar: A Resounding Slap On The Face Of Media!

 

Can Deaths Caused By Vain Media Trials Be Reversed?

Can Deaths Caused By Vain Media Trials Be Reversed?

 (Also Appeared in Northern India Patrika On January 07, 2014)

The suicide by a prominent social activist Khursid Anwar, executive director of NGO Institute for Social Democracy and also a JNU scholar, has given rise to some pretty disturbing questions. Khurshid Anwar allegedly committed suicide in the aftermath of rape allegation by a Manipuri lady. This news got flashed on several news channels, followed by intense discussion on several social media networking websites including Facebook. Unable to bear this unwarranted media trial, this well known social activist committed suicide by jumping from his third floor residence in Vasant Kunj, New Delhi, on December 18, 2013. As per suicide note found at his home it was not a rape but consensual sex.

This tragic incident reminds me of suicide committed by Sriniwas Siras, who happened to be a professor at Aligarh Muslim University. In this particular case, news channels were found guilty of invading his privacy by making public his homosexual affair in blown out of proportion way. The professor was granted relief by the Allahabad High Court, but he was not able to cope up with harassment in the form of bizarre media coverage. That made him to end his life. Of late, courts have regularly come up with strict reminders for media channels not to indulge in media trials when the case is in its trial phase. However, influential media houses have always adopted care-a-damn, leading to mockery of the sensitivity involved in any issue under trial. It’s true that need to control media trial remains a complicated issue but it’s an undisputed fact that there is no dearth of cases, wherein sensational media trial caused irreparable damage to one’s reputation. The media has always taken for granted “rights of the accused” and it’s high time to make clear demarcation between accurate reporting and reporting done with malicious intent to increase the sale or ensure high TRP ratings.

“Sensational reporting will take place because sensational incidents keep happening in India. The Supreme Court will not be able to stop it. Yes, reporting must be accurate. But to say it amounted to trial by media is only a pejorative expression. Neither the court nor any one has provided parameters to define what constitutes trial by media.” (Senior Advocate Rajeev Dhavan in The Times of India) However, media’s pervert justification of its breach of privacy and rights of accused would never be enough to clear the huge mess caused by its unwanted intervention. Two lives of reputed individuals came to meet untimely end because of media trial. Can it bring them back to life? Can it restore the loss of reputation?

 In fact, senior journalist Saeed Naqvi  has framed a perfect perspective regarding media trail: ” There is a tendency in journalism – it convicts a person on the day allegation is leveled against him, even before the court convicts him. That is sad. How can media reach a conclusion so quickly and start showing one as an accused? At least, it should wait for lodging of an FIR, completion of investigation” (DNA News Report) It’s really amazing that media always never takes into account serious repercussions involved in unfair trial. Is “mental trauma and public humiliation” in the wake of seriously flawed  “media trial” is thing of lesser concern? It’s so evident in media trials that reporting is misleading and one-sided with scant respect for cross-checking of the facts.

 This whole issue involves two other serious concerns. The first one brings to the fore love of the society to reach at conclusions in one go with a prejudiced mindset. It loves to criticize or, for that matter, endorse any issue even if there are no concrete material evidence to support its beliefs. The other aspect involves abuse of laws meant to protect sexual harassment of women. It’s simply not an issue pertaining to rights of men that laws meant to protect women have lead to harassment of innocent men. It’s so pathetic that moment an issue  involving sexual harassment of women gets highlighted, the media enters in caricature of the accused, portraying him guilty. Worse, if you analyze the laws meant to prevent sexual harassment of women, it’s evident that men are virtually assumed to be guilty. Tragically, the attempt of the accused to prove himself innocent becomes further bleak in wake of such pervert media trials.

 “The disconcerting answer is that it will not matter. In India, and several other countries where laws have been passed to punish crimes against women, the burden of proof has been consciously reversed: it is the accused who has to prove his innocence. This reversal is bad in principle, but probably necessary to create a level playing field for women in cases pertaining to sex crimes. But the new rape law has carried the reversal to a point where, if implemented as drafted, it will defeat the very purpose of justice . For once a man is accused, it leaves him with no way whatever of proving his innocence.” (Senior Journalist Prem Shankar Jha in The Times Of India)
 
In nutshell, both society and media have lost the ability to be governed by reason and logic. Both of them have given way to pervert pleasure of playing havoc with the dignity and reputation of individuals. However, it’s baffling that even legal jurisprudence appears to have adopted same line of action, more so in cases involving sexual harassment of women. It’s time for everybody to upheld logical thinking over thinking governed by rash emotions. That’s essential to stop the fragmentation of society, to create a value-oriented society.

Khurshid Anwar: Another Victim Of Media Trial!!

Khurshid Anwar: Another Victim Of Media Trial!!

 
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विवाह कानून (संशोधन) विधेयक 2010: सरकार को पुरुष संघटनो की तरफ से कुछ बेहद महत्त्वपूर्ण सुझाव

इन अपूर्ण, गलत और भ्रामक संशोधनों को वापस लिया जाए. कानून को लिंगभेद से ऊपर रखा जाए (जेंडर न्यूट्रल), पति या पत्नी शब्द को जीवनसाथी (spouse) शब्द से सम्बोधित किया जाए.

इन अपूर्ण, गलत और भ्रामक संशोधनों को वापस लिया जाए. कानून को लिंगभेद से ऊपर रखा जाए (जेंडर न्यूट्रल), पति या पत्नी शब्द को जीवनसाथी (spouse) शब्द से सम्बोधित किया जाए.

पुरुष अधिकार से जुड़े  संघटनो की कुछ प्रमुख चिंताए:

* संशोधन का मूल प्रारूप (मुख्य बिन्दुएँ)- पतियो के खिलाफ पक्षपाती है.

* इस आधार पर तलाक मांग सकती है कि उसका दांपत्य जीवन ऐसी स्थिति में पहुंच गया है, जहां विवाह कायम रहना नामुमकिन है. ‘विवाह सम्बंध टूटने और किसी भी सूरत में रिश्ता बहाल न होने’ को भी तलाक एक आधार के रूप में मान्यता प्रदान किया गया है “हिंदू विवाह अधिनियम”, 1955, और स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 में. 

* पत्नी को हक़ है पति की तरफ से पेश तलाक़ याचिका को विरोध करने का इस आधार पर कि वो गहन आर्थिक संकट से ग्रस्त है. कोर्ट  इस गहन आर्थिक संकट से निज़ात दिलाने के प्रावधान अपने विवेक पर कर सकती है. (पतियो के संग पक्षपाती है)

* उन बच्चो के भरण पोषण का समुचित प्रबंध माता पिता के द्वारा उनकी आर्थिक हैसियत के अनुरूप जो अवैध संतति है.

संसदीय समिति- महिला संघटनो के द्वारा सुझाये गए प्रस्तावो से गलत तरह से प्रभावित है:

* ‘विवाह सम्बंध टूटने और किसी भी सूरत में रिश्ता बहाल न होने’ को भी तलाक एक आधार के रूप में मान्यता प्रदान करने की संस्तुति करना.

* महिला संघटनो के सुझावो से प्रेरित होकर उस वैवाहिक संपत्ति पर भी पत्नियों का अधिकार होगा जो विवाह के उपरांत अर्जित की गयी है दोनों के सहयोग से.

* पुरुष संघटनो के हर सुझावो की उपेक्षा की गयी.

कानून मंत्री द्वारा किये गए अन्य संशोधन- पुरुष हितो के विपरीत प्रावधानो की स्वीकृति:

* पत्नी का हिस्सा  उस संपत्ति पर जो विवाह के पूर्व और उपरान्त अर्जित की गयी है.

* पत्नी का हिस्सा पति के द्वारा अर्जित और अर्जित करने योग्य पैतृक संपत्ति में.

हमारी आपत्तियां: 

* पत्नी का कोई योगदान नहीं होता पति के द्वारा अर्जित पैतृक संपत्ति में और उस संपत्ति पर जो उसने शादी से पूर्व अर्जित की गयी है. उसको संज्ञान में लेकर प्रावधान बनाने की जरूरत नहीं.

* उस संपत्ति के बटवारे में कोई भी फैसला जो पति ने शादी के उपरांत अर्जित की है आँख मूँदकर गलत तरीक़े से नहीं होना चाहिए। पत्नी के योगदान का आकलन करना चाहिए। दो महीने की शादी और बीस साल की शादी की अवधि को एक ही मापदंड से नहीं देखा जा सकता.

* ये तर्क दोष से बाधित संशोधन है कि स्त्रियाँ शादी को नहीं तोड़ती. स्त्रियाँ ना सिर्फ शादी को तोड़ती है बल्कि कई बार शादी कर सकती है और  इस तरह पूर्व में की गयी हर एक शादी से संपत्ति अर्जित कर सकती है. इस तरह के कई उदाहरण आये दिन समाचार पत्रो में प्रकाशित होते रहते है जहा लालची पत्नियों ने धोखधड़ी से शादी करने के बाद संपत्ति पे अपना दावा पेश किया या फिर झूठे 498 A के मुकदमे दर्ज कराये संपत्ति की हवस में.

ये अब एक प्रचलित हथियार बन गया है कि हर नाकाम वैवाहिक सम्बन्धो में स्त्रियाँ  IPC 498 A और घरेलु हिंसा अधिनियम का व्यापक दुरुपयोग कर रही है संपत्ति हथियाने में. अब ये संशोधन भी एक प्रमुख औजार/ज़रिया बन जाएगा समाप्ति अर्जित करने के लिए.

ये अब एक प्रचलित हथियार बन गया है कि हर नाकाम वैवाहिक सम्बन्धो में स्त्रियाँ IPC 498 A और घरेलु हिंसा अधिनियम का व्यापक दुरुपयोग कर रही है संपत्ति हथियाने में. अब ये संशोधन भी एक प्रमुख औजार/ज़रिया बन जाएगा समाप्ति अर्जित करने के लिए.

इन संशोधनों के परिणाम/अंजाम:

* वैवाहिक वादो के गहन अध्ययन के बाद ये बात स्पष्ट उभर कर आई है कि ज्यादातर वैवाहिक विखंडन का कारण पत्नी का जबर्दस्ती उस संपत्ति पर हक़ जताना रहा है जो पति या उसके रिश्तेदारो ने अर्जित की होती है.

* विवाह अपने पवित्र संस्कारो से वंचित हो जायेंगे और ये सिर्फ संपत्ति अर्जित करने का श्रोत बन जायेंगे। ये अब धीरे धीरे एक परंपरा बनती जा रही है कि भौतिक लाभ की लालसा शादी के द्वारा बढ़ती जा रही है और इस तरह के गलत संशोधनों के व्यापक दुष्परिणाम उभर कर सामने आयेंगे। 

* ये अब एक प्रचलित हथियार बन गया है कि हर नाकाम वैवाहिक सम्बन्धो में स्त्रियाँ  IPC 498 A और घरेलु हिंसा अधिनियम का व्यापक दुरुपयोग कर रही है संपत्ति हथियाने में. अब ये संशोधन भी एक प्रमुख औजार/ज़रिया बन जाएगा समाप्ति अर्जित करने के लिए.

* संपत्ति का अर्जन कई वर्षो की मेहनत का परिणाम होते है ना कि कुछ वर्षो के वैवाहिक संग का. असफल वैवाहिक सम्बन्धो के चलते अपनी गाढ़ी कमाई से अर्जित संपत्ति से हाथ धोने के वजह से पतियो के आत्महत्या के दर में खासी वृद्धि देखी जायेगी जो कि पहले से ही पत्नियों के आत्महत्या के दर की दुगनी है. अपराध दर में भी इस वजह से वृद्धि देखी जायेगी।  

हमारे प्रस्ताव/सुझाव:

* इन अपूर्ण, गलत और भ्रामक संशोधनों को वापस लिया जाए. कानून को लिंगभेद से ऊपर रखा जाए (जेंडर न्यूट्रल), पति या पत्नी शब्द को जीवनसाथी (spouse) शब्द से सम्बोधित किया जाए.

* संपत्ति में हिस्सा पति और पत्नी के वित्तीय योगदान के आधार पर किया जाए.

* अगर वित्तीय योगदान शून्य है तो एक फॉर्मूले का ईज़ाद किया जाए जो शादी की न्यूनतम अवधि का आकलन करे संपत्ति के बॅटवारे के हेतु और उस एक फॉर्मूले का ईज़ाद हो जो योगदान के बारे में सही रूप से निरूपण कर सके.

* शादी से पूर्व इक़रारनामे (pre-nuptial agreement) को कानूनी मान्यता दी जाए. 

* इस बात को बहुत तीव्रता से महसूस किया जाता रहा है कि असफल वैवाहिक सम्बन्धो के चलते पत्नियों को गहरे वित्तीय संकट का सामना करना पड़ता है. विवाह एक संस्था है जो अगर ना चले तो एक लिए पुरस्कार (पत्नी) और एक लिए सजा नहीं होना चाहिए (पति). अगर पत्नी गहरे वित्तीय संकट का सामना कर रह है तो उसकी दूरी के लिए व्यापक प्रबंध किया जाना चाहिए ना कि निरीह पति को इसके लिए दण्डित किया जाना चाहिए. इस सन्दर्भ में हमारा सुझाव ये है है कि: 

# हिन्दू विवाह उत्तराधिकार एक्ट 2005 का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए. स्त्री का हिस्सा जो उसके माता-पिता के घर बनता है उसको या तो शादी के दौरान या तलाक़ की अर्जी देने के समय (किसी भी पक्ष के द्वारा) अपने आप दे देना चाहिए.  

# अगर स्त्री बेरोजगार है या जिसका कैरियर एक लम्बे अंतराल से बाधित हो गया हो तो इस तरह के महिलाओ के भरण पोषण की जिम्मेदारी और उन्हें रोजगार मुहैय्या कराने की जिम्मेदारी सरकार की होनी चाहिए बजाय इसके कि पति पर इस तरह का भार डाला जाए. इस तरह की पत्नियों के वित्तीय संकट दूर करने के लिए “तलाकशुदा पत्नी कल्याण कोष” का गठन किया जाना चाहिए।

Reference/Credit: 

This is Hindi version of a letter addressed to the Parliamentarians prepared by the Men’s Rights Association.The Hindi version has been prepared by the author of this blog post.

 संपत्ति का अर्जन कई वर्षो की मेहनत का परिणाम होते है ना कि कुछ वर्षो के वैवाहिक संग का. असफल वैवाहिक सम्बन्धो के चलते अपनी गाढ़ी कमाई से अर्जित संपत्ति से हाथ धोने के वजह से पतियो के आत्महत्या के दर में खासी वृद्धि देखी जायेगी जो कि पहले से ही पत्नियों के आत्महत्या के दर की दुगनी है. अपराध दर में भी इस वजह से वृद्धि देखी जायेगी।

संपत्ति का अर्जन कई वर्षो की मेहनत का परिणाम होते है ना कि कुछ वर्षो के वैवाहिक संग का. असफल वैवाहिक सम्बन्धो के चलते अपनी गाढ़ी कमाई से अर्जित संपत्ति से हाथ धोने के वजह से पतियो के आत्महत्या के दर में खासी वृद्धि देखी जायेगी जो कि पहले से ही पत्नियों के आत्महत्या के दर की दुगनी है. अपराध दर में भी इस वजह से वृद्धि देखी जायेगी।

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A Stunning Love Story That Culminated Into Suicide!

Shouldn't The Lovers Meet Better Fate?

Shouldn’t The Lovers Meet Better Fate?

“The course of true love never did run smooth.” (Shakespeare). This became evident in cruel fashion in case of Divya and Ilavarasan.  Ilavarasan and Divya belonged to different castes. Ilavarasan belonged to Dalit community and Divya came from a higher Vanniyar community. When their love story attained pinnacle, it did not evoke sweet episodes as one witnesses in Hollywood/Bollywood candyfloss movies. Last year, the girl’s father, unable to digest the vituperative remarks of people belonging to his community committed suicide. And now the news arrives that Ilavarasan, after Divya came to disown the marriage in blatant fashion, has committed suicide by jumping before the train.  

Their love story from the very beginning was marred by series of unfortunate developments. It first resulted in a typical caste bigotry, which this time did not remain confined to a small section. The mounting tension took in its grip whole Tamil Nadu. They got married amid unprecedented developments.” I was on my way to Trichy for a football match. When I was in Omalur, I got a call from Divya saying that people in her house are trying to get her married to someone else. She asked me to take her with me. We went to Andhra Pradesh and got married there.” ( Ilavarasan in an interview to Tamil Edition of India Today).

The Society's Evil Ways Had The Last Laugh!

The Society’s Evil Ways Had The Last Laugh!

When they got married, it led to huge tension in whole Tamil Nadu. A political party named Pattali Makkal Katchi entered into a campaign, triggering the impression that marriages between Dalit boys and non-Dalit brides were mainly for the purpose of extorting money. Fake cases got filed against Ilavarasan so as to block his appointment into police department in which he got newly selected. The issue further deteriorated when girl’s father committed suicide last November. Many colonies in  Naikkankottai village got burnt- the village of boy’s father.

For Divya, these developments seemed a bolt from the blue. After her father’s suicide, she went into state of depression and decided to separate from Ilavarasan. Naturally, her decision left Ilavarsan in a state of shock, who was determined to seek better days. Just a day before his suicide, it’s learnt that Divya categorically informed the reporters inside the Madras High Court campus about her decision to disown the marriage and not to return to Ilavarasan at all. Unable to withstand this dejection, the very next day Ilavarsan jumped before the train and ended his life.

Divya might have decided to disassociate with Ilavarsan but Ilavarsan remained true to her till his last breath. The only thing found in his possession, near the railway track, were the letters which he wrote to her during 2011.

 Ilavarsan:  This Courageous Boy Tried To Fight To The Finish But  Divya Proved To Be Made Of Lesser Mettle!

Ilavarsan: This Courageous Boy Tried To Fight To The Finish But Divya Proved To Be Made Of Lesser Mettle!

References: 

The Hindu 

Kafila

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Death Is More Honest Than Life!

In  Conversation With Life And Death

In Conversation With Life And Death

I met lots of people in this short life, who preached me in pompous tone that ego is bad, money is filth, ladies are evil and etc. That I have had heard umpteen times since childhood, and, interestingly, I came to live a more realistic and down-to-earth life than those who talked about such values publicly in glittering company of like minded souls! I found people, talking about life devoid of ego, the most egocentric souls, chasing name and fame with greater passion than anyone else. I met shrewdness disguised as faithfulness. Friend or beloved, they turned out to be more like poison placed in silver cup.  

And still, having seen such worst contradictions, I feel life is a beautiful affair. Life’s canvas still motivates me to live life fully. May be life has some more cruel lessons to offer me! But I am now no more interested in life’s equations similar to one which we notice on chessboard-you win I lose types. In fact, its cruel maneuvers never appealed to my sense instinctively. Precisely, that’s why I have never been passionate admirer of life’s idiotic episodes. My philosophy, until now, has been to deal sincerely with whatever came to cross my path. For me, the very fact that you have arrived in this world of human beings is a big mistake- a divine joke. May be for a greater lot, these changing facets of life turn out to be as important as a life and death issue, but in my eyes, the life mired in deceptiveness at its every turn, does not evoke great concern. I find even the most beautiful episodes of life, have their genesis in some sort of deception. So as I suffer pain, when I come to hear about loss of loved ones, or when I anticipate a blissful episode, the nothingness of life keeps me in state of peace.     

Sometimes back I read  powerful arguments in favour of death. And one of them stated that death is very much needed since if you continued living, you would realize that people who lived around you as picture of faithfulness were nothing but beings mired in selfishness! Death arrives to retain your illusion. It does you a great favour by keeping your faith intact in flawed people. I am sure had life allowed a legitimate route to embrace death all by oneself, I am sure many would have adopted that path. India’s great revolutionary Bhagat Singh had made a remarkable comment- hanged to death by the British Government in the pre-Independence era- that had he been living, life would have heaped upon him some more chosen scandals. So he is so happy that death has embraced him in the prime of his youth; that death kept his so many vices secret. That’s why he was more happy than sad when hanged to death order was delivered to him. In my eyes, he was the ideal example of these words: “Those whom the gods love die young.”

 
It’s pathetic that laws of this nation-may be elsewhere too-are strange. They treat suicide a crime. However, the same lawmakers, being devoid of accountability, fail to ensure that people who abetted suicide of innocent person should not go scot-free. The policymakers take no measures to keep away those scenarios, which compel anybody to think about killing oneself. Paradoxically, aiding and abetting suicide, becomes a cause of concern only when someone brings the issue in the court. It’s easy to understand that why it’s never the case. The case in court drags for years and in the end we find the accused denied punishment in want of concrete evidences. So it’s really amusing, and tragic as well, that society first promotes crime and then the same society delivers verdicts. Isn’t that height of absurdity? 

Anyway, the pretenders, who unfortunately claim to be my close friends- the ones who are guilty of complicating my simple life, dare to ask me as to why I am not a public figure, why I am not that involved in life’s silly episodes the way they are? Interestingly,  they are like the conspirators, standing by your side as a mute spectator, just like you, witnessing the tragedy given birth by them. Since they often dare to ask me such a question with straight face, I need to quote these lines by well known poet Sahir Ludhianvi  as a reply to these curious souls-the conspirators:

“क्या मिलिए ऐसे लोगो से जिनकी फ़ितरत छुपी रहे,
 नकली चेहरा सामने आये असली सूरत छुपी रही
 खुद से भी जो खुद को छुपाये क्या उनसे पहचान करे,
  क्या उनके दामन से लिपटे क्या उनका अरमान करे,
  जिनकी आधी नीयत उभरे आधी नीयत छुपी रहे।”   

“Is there any point in meeting with people, having dubious intentions?
  Who project their unreal image, but keep the real one hidden
  People, who have kept secret from themselves, too, their own real image
  Why should I embrace them, and seek them ?
  People who half disclose their intentions, keeping close to their hearts the actual intentions.” 

Another brilliant poet, Nida Fazli, has exposed the real elements, which constitute the so-called beautiful episodes of life. These verses in my eyes reveal the reality of life. For a simple person like me, I don’t think that such a cruel world can ever elicit deep attention on my part. It’s another thing that for people of the world, I might look like living, but internally I am on par with dead.

“हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी,
               फिर भी तनहाइयों का शिकार आदमी,

                सुबह से शाम तक बोझ ढ़ोता हुआ,
                 अपनी लाश का खुद मज़ार आदमी,

                 हर तरफ भागते दौड़ते रास्ते,
                 हर तरफ आदमी का शिकार आदमी,

                रोज़ जीता हुआ रोज़ मरता हुआ,
                हर नए दिन नया इंतज़ार आदमी,

                 जिन्दगी का मुक्कदर सफ़र दर सफ़र,
                   आखिरी साँस तक बेकरार आदमी”                    

“Everywhere there is sea of people 
   Yet a person suffers from isolation
  
   Carrying the burdens from morning till evening 
   Human being has become some sort of moving tomb

   Everywhere you find busy roads
   Wherein one person becomes victim of other person

    Every day a person wakes up only to die a bit more
    And still greets each day with great expectations

    The destiny of human life from its one episode to another
    Is to remain anxious till last breath.”

P.S.: Translation Of The Verses Done By The Author Of This Post.

Life and Death Are Always Inseparable

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ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर रेलवे अफसर।

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