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श्रीलाल शुक्ल: रचयिता तो शांत हुआ पर “राग” रह गया है गूंजता सदा के लिए !!

 

श्रीलाल शुक्लजी: एक अनोखा साहित्यकार

श्रीलाल शुक्लजी: एक अनोखा साहित्यकार

शुक्लाजी आप जिस तरह से हमको सच क्या है दिखा देते थे वो हमको सदा याद रहेगा. दुःख की बात है कि सरकार ने आपको अंतिम संस्कार के वक्त राजकीय सम्मान नहीं दिया .अच्छा किया!!!  काहें कि मरते मरते भी आप राग दरबारी  कितना प्रासंगिक है ये आप बता गए. राजकीय सम्मान भ्रष्टाचार में लिप्त मंत्री को मिल सकता है आप या हम जैसे कलम के पुजारी को तो मिलने से रहा. कलम दावत से रुपैय्या बड़ा हो गया है और यही से इस युग के अंत की शुरुवात भी होती है. 

पिछले कुछ एक महीनों से हम कुछ उन लोगो के निधन के बारे में सुन रहे है जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी अलग जगह बनाकर हमारे लिए जीने की राह सरल कर गए.  स्टीव जाब्स, एप्पल के सह संस्थापक और अमेरिका के महानतम आविष्कारको में एक, जिन्होंने  राजा परीक्षित की तरह  मौत की निरर्थकता को साबित किया और  ये साबित किया कि कम आयु कुछ अच्छा करने के  राह में आड़े नहीं आती यदि गुणवत्ता आपकी आदत में शुमार हो तो. स्टीव जाब्स की तरह जगजीत सिंह भी हमको छोड़ कर चले गए.  इतने शुरुवाती झटको के बाद भी इन्होने वही किया जो सोचा. सपने पूरे होते है यदि आप लगन से लगे है तो. जगजीत सिंह ने जिस तरह जिंदगी के मायने बताये अपने ग़ज़लों, गीतों और भजनों से वो उन्हें हमारे बीच स्थापित कर जाता है हमेशा के लिए. 

इस तरह से श्रीलाल शुक्लजी भी थे. इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पढ़े हुए हमारे श्रीलालजी ने सरकारी नौकरी करते हुए भी सरकारी सत्ता के प्रति रुझान को नकारते हुए साहित्य साधना में अपने को रमा लिया. ये अच्छा ही हुआ कि  उनकी पहचान एक लेखक के रूप में बनी वरना लोग अपने को सरकारी सेवक के रूप में पहचान स्थापित करना अपनी शान समझते है. ये हमारे यहाँ के लोगो को एक रोग लगा हुआ बबुआ सरकारी नौकरी करत हउवन !!!! जिसे देखो पूँछ उठाये सरकारी नौकरी का फार्म लेके घूमता रहता है. ये जो उनकी वितृष्णा उपजी सरकारी नौकरी में भ्रष्ट सिस्टम के बीच में रहकर इसने ही राग दरबारी को एक अमरत्व सा प्रदान किया साहित्य जगत में.  इसलिए श्री लाल जी कहते है कि ” राग दरबारी का व्यंग्य साधने के लिए मुझे कोई अतिरिक्त शब्द-साधना नहीं करनी पड़ी क्योंकि वह माहौल मेरा इतना जाना बूझा था कि वह सब कुछ सहज ही संभव हो गया।”  

यद्यपि शुक्लजी ने  “विश्रामपुर का संत”,  “अज्ञातवास”, “सीमाए टूटती है”, “मकान”  जैसे  बेहतरीन उपन्यास लिखे है, “अंगद के पाँव” और “अगली शताब्दी के शहर” जैसी व्यंग्य कृतिया लिखी है, “ये घर मेरा नहीं” और ‘”इस उम्र में”  कहानी संग्रह लिखा है, “मेरा साक्षात्कार” जैसे संस्मरण लिखा है हम उन्हें जानते है राग दरबारी के लिए. इससें साबित यही होता है कि बहुत अच्छा लिखने के बाद भी कुछ एक ऐसी रचनाये बन पड़ती है जो हमारी पहचान बन के रह जाते है. शायद ये रचनामक जगत की पहचान है कि सब रचनाये समान रूप से अच्छी होने के बाद भी समान स्तर कि लोकप्रियता हासिल नहीं कर पाती.  वैसे शुक्लजी को सम्मान भी खूब मिला  साहित्य अकादमी पुरस्कार,पद्म भूषण  और 2009 का भारतीय ज्ञानपीठ सम्मान उनमे से प्रमुख है  पर  मुझे नहीं लगता कि उस आदमी कि जिसकी जीवन को समझने के लालसा तीव्र हो और जिसके अन्दर उम्र के अंतिम पड़ाव में भी यही सूझता हो कि ” जीवन की जटिलताओं को साहित्य द्वारा अभिव्यक्त किए जाने को अभी बहुत कुछ शेष है” उसको इन सम्मान पत्रों से कोई ख़ास लगा रहा होगा. 

बहरहाल ये अपने तरह का एक अनोखा साहित्यकार सबकी तरह एक नयी यात्रा करने को निकल गया पर हमारे लिए छोड़ गया जीवन को समझने के नए समीकरण.

सब रचनाये समान रूप से अच्छी

सब रचनाये समान रूप से अच्छी

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कुछ  अंश  उनकी  कृतियों  से : 

चारों और फैली अव्यवस्था, बेकारी, गरीबी, निर्लज्ज भ्रष्टाचार यह सब देख रंगनाथ जब बहुत परेशान हो गया, दुखी हो गया तो उसने प्रिसिपल से कहा :- घिन आती हे मुझे इस व्यवस्था से, इन लोगों से. मैं कल ही गांव छोड़ चला जाऊंगा. तब प्रिसिपल उसे बोलता हे :- कहाँ जाओगे रंगनाथ जहाँ जाओगे वहीँ ये शिवपालगंज मिलेगा सारा हिंदुस्तान ही शिवपालगंज हे अरे यहाँ सभी चिडिमार हें तुम्ही तीसमारखां बनकर क्या उखाड लोगे.

सच ही तो है हिंदुस्तान एक रेल्वे स्टेशन का वेटिंग हाल हे अपनी-अपनी जगह बनाओ अखबार बिछाओ. हगो,मूतो,थूको अपनी गाड़ी पकड़ो और निकल लो अपने को कहाँ यहाँ दुबारा आना हे 
[ सच हे किन्तु दुखद ]

…….कोई काम करना नही चाहता और करें भी क्यों अरे सरकारी नोकरी में भी आकर अगर काम करना पड़े तो लानत हे ऐसी जिंदगी पे इसीलिये समझदार लोग गम का घुंट पिके रह जाते हें उन्हें मालुम हे किसके पास जाओगे किसको शिकायत करोगे साला जिस किसी कि भी पूंछ उठाओगे मादा निकलेगा

(राग दरबारी)

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प्रिंसिपल ने आख़िरी धक्का दिया, “प्रधान कोई गबडू-घुसडू ही हो सकता है। भारी ओहदा है। पूरे गाँव की जायदाद का मालिक! चाहे तो सारे गाँव को 107 में चालान करके बन्द कर दे। बड़े-बड़े अफ़सर आकर उसके दरवाज़े बैठते हैं! जिसकी चुगली खा दे, उसका बैठना मुश्किल। काग़ज़ पर ज़रा-सी मोहर मार दी और जब चाहा, मनमाना तेल-शक्कर निकाल लिया। गाँव में उसके हुकुम के बिना कोई अपने घूरे पर कूड़ा तक नहीं डाल सकता। सब उससे सलाह लेकर चलते हैं। सबकी कुंजी उसके पास है। हर लावारिस का वही वारिस है। क्या समझे?”

वह एक प्रेम पत्र था)

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यह सही है कि वैद्यजी को छोड़कर कालिज के गुटबन्दों में अभी अनुभव की कमी थी। उनमें परिपक्वता नहीं थी, पर प्रतिभा थी। उसका चमत्कार साल में एकाध बार जब फूटता, तो उसकी लहर शहर तक पहुचती। वहां कभी-कभी ऎसे दांव भी चले जाते जो बड़े-बड़े पैदायशी गुटबन्दों को भी हैरानी में डाल देते। पिछले साल रामाधीन ने वैद्यजी पर एक ऎसा ही दांव फ़ेका था। वह खाली गया, पर उसकी चर्चा दूर-दूर तक हुई। अखबारों में जिक्र आ गया। उससे एक गुटबन्द इतना प्रभावित हुआ कि वह शहर से कालिज तक सिर्फ़ दोनों गुटों की पीठ ठोकनें को दौड़ा चला आया। वह एक सीनियर गुटबन्द था और अक्सर राजधानी में रहता था। पिछले चालीस साल से वह अपने चौबीसों घण्टे केवल गुटबन्दी के नाम अर्पित किये हुए था। वह अखिल भारतीय स्तर का आदमी था और उसके बयान रोज अखबार में पहले पन्नों पर छपते थे, जिसमें देश-भक्ति और गुटबन्दी का अनोखा संगम होता था। उसके एक बार कालिज में आ चुकने के बाद लोगों को इत्मीनान हो गया था कि यहां अब कालिज भले ही खत्म हो जाय, गुटबन्दी खत्म नहीं होगी।

सवाल है: गुटबन्दी क्यों थी?

यह पूछना वैसा ही है जैसे पानी क्यों बरसता है? सत्य क्यों बोलना चाहिए? वस्तु क्या है और ईश्वर क्या हैं? वास्तव में यह एक सामाजिक मनोवैज्ञानिक यानी लगभग दार्शानिक सवाल है। इसका जवाब जानने के लिए दर्शन-शास्त्र जानने की जरुरत है और दर्शन-शास्त्र जानने के लिए हिन्दी का कवि या कहानीकार होने की जरुरत है।

( क्या यही इन्सानियत है? )

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रंगनाथ ने कहा,” वे दफ्तरवाले बड़े शरारती हैं। कैसी-कैसी गलतियाँ निकालते हैं।”

जैसे गाँधीजी अपनी प्रार्थना-सभा में समझा रहे हों कि हमें अंग्रेजों से घृणा नहीं करनी चाहिए, उसी वजह पर लंगड़ ने सिर हिलाकर कहा, “नहीं बापू, दफ्तरवाले तो अपना काम करते हैं। सारी गड़बड़ी अर्जीनवीस ने की है। विद्या का लोप हो रहा है। नये-नये अर्जीनवीस गलत-सलत लिख देते हैं।”

( कभी न उखड़ने वाला गवाह)

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किसी भी सामान्य शहराती की तरह उसकी भी आस्था थी कि शहर की दवा और देहात की हवा बराबर होती है। इसलिए वह यहां रहने के लिए चला आया था। किसी भी सामान्य मूर्ख की तरह उसने एम.ए करने के बाद तत्काल नौकरी न मिलने के कारण रिसर्च शुरु कर दी थी, पर किसी भी सामान्य बुद्धिमान की तरह वह जानता था कि रिसर्च करने के लिए विश्वविद्यालय में रहना और नित्यप्रति पुस्तकालय में बैठना जरुरी नहीं है। इसलिए उसने सोचा था कि कुछ दिन वह गांव मे रहकर आराम करेगा, तन्दुरुस्ती बनायेगा, अध्ययन करेगा, जरुरत पड़ने पर शहर जाकर किताबों की अदला-बदली कर आयेगा और वैद्यजी को हर स्टेज पर शिष्ट भाषा में यह कहने का मौका देगा कि काश ! हमारे नवयुवक निकम्मे न होते तो हम बुजुर्गो को ये जिम्मेदारियां न उठानी पड़तीं।

पुरुष बली नहिं होत है


राग दरबारी का व्यंग्य साधने के लिए मुझे कोई अतिरिक्त शब्द-साधना नहीं करनी पड़ी

राग दरबारी का व्यंग्य साधने के लिए मुझे कोई अतिरिक्त शब्द-साधना नहीं करनी पड़ी

 

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हिन्दुओ की अपने देश में ही क़द्र नहीं. सिर्फ मै नहीं कहता सब कह रहे है.

 

हिमालय : तुमसे है एक गहरा रिश्ता

हिमालय : तुमसे है एक गहरा रिश्ता

 

कभी कभी कुछ चीजों का समझने के लिए आपको बड़ी बड़ी किताबो के साए में  नहीं रहना पड़ता. लोगो के बीच रहिये बड़े बड़े कडुवे सच आपको सुनने को मिलेंगे. मै चाहता तो पूर्व की भाँति बौद्धिक गिटपिट कर सकता मार्क्स के चेलो की तरह ये समझाने के लिए कि किस तरह से हिन्दुओ की आस्था, उनके मूल्यों या उनके प्रतीकों को बार बार मटियामेट किया जा रहा है. बौद्धिक विमर्श की एक कमजोरी मैंने ये देखी है कि बात सिर्फ बौद्धिक लोगो के बीच ही सिमट के रह जाती है. उसका सन्देश बहुत दूर तक जनमानस में घुस नहीं पाता. लिहाजा ये जरुरी हो गया है कि आम लोगो तक बात आम तरीके से ही पहुचे. या  दूसरे  शब्दों  में उनकी ही कही हुई बात को उनके बीच साफ़ सुथरे तरीके से रखी जाए. बहुत ज्यादा बौद्धिक आंच दे देने से बात का मूल तत्त्व जल के ख़ाक हो जाता है.लिहाजा कुछ बात मै यथावत वैसे ही रख रहा हूँ जो इधर कुछ दिनों में पढने को मिले. इनको आप क्लिष्ट समस्याओं का सरलीकरण ना समझे. ये समझे कि जब एक आदमी किसी बिंदु को समझता है तो कैसे समझता है.  बौद्धिक वर्ग जो इस लेख को पढ़े वो चाहे तो इन्ही बिन्दुओ का विस्तृत रूप अपने संदर्भो की रौशनी में पढ़ सकते है. वैसे ये अच्छा है कि एक आम हिन्दू अब सचेत हो रहा है उस राजनीति को लेकर जो उसके नाम से खेली जा रही है.  हिन्दुओ के अपने अष्मिता से खिलवाड़ का बोध हो चला है.  ये देश के अस्तित्व के लिए सुखद सन्देश है. 

पढ़े और देखे कि साधारण  हिन्दू क्या प्रश्न खड़े कर रहे है जिनसे हमारा बिका हुआ मीडिया हमेशा बचता है. मीडिया में  दलालनुमा पत्रकार  या लंठ मीडिया विशेषज्ञ आश्चर्य है कि कभी इन मुद्दों पे खुल कर नहीं बोलते सिवाय परदे के पीछे छुपे भेड़ियानुमा लोगो के स्वार्थ सिद्ध करने के सिवाय. 

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अल्पसंख्यक के नाम पर चलनेवाली राजनीति  को समझना  जरूरी है.  मुसलमान या इसाई ही क्यों अल्पसंख्यक माने जाते है? 

अल्पसंख्यक किसे कहते है? जिसकी आबादी ४९% हो उसे ? जिसकी आबादी १०% से कम हो उसे या जिसकी आबादी १८% हो…

क्या है परिभाषा…. जैन लोग अल्पसंख्यक है या मुस्लिम समाज? सिख  अल्पसंख्यक है या बुद्धिस्ट ? क्या पारसी (TATA) लोग अल्पसंख्यक है? 

कौन है अल्पसंख्यक?


 Simran Rock

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जरा इन  बयानों को देखिये: 

हजारों सिखों का कत्लेआम – एक गलती
कश्मीर में हिन्दुओं का नरसंहार – एक राजनैतिक समस्या

गुजरात में कुछ हजार लोगों द्वारा मुसलमानों की हत्या – एक विध्वंस 
बंगाल में गरीब प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी – गलतफ़हमी 

गुजरात में “परजानिया” पर प्रतिबन्ध – साम्प्रदायिक 
“दा विंची कोड” और “जो बोले सो निहाल” पर प्रतिबन्ध – धर्मनिरपेक्षता

कारगिल हमला – भाजपा सरकार की भूल
चीन का 1962 का हमला – नेहरू को एक धोखा

जातिगत आधार पर स्कूल-कालेजों में आरक्षण – सेक्यूलर
अल्पसंख्यक संस्थाओं में भी आरक्षण की भाजपा की मांग – साम्प्रदायिक 

सोहराबुद्दीन की फ़र्जी मुठभेड़ – भाजपा का सांप्रदायिक चेहरा
ख्वाजा यूनुस का महाराष्ट्र में फ़र्जी मुठभेड़ – पुलिसिया अत्याचार

गोधरा के बाद के गुजरात दंगे – मोदी का शर्मनाक कांड
मेरठ, मलियाना, मुम्बई, मालेगाँव आदि-आदि-आदि दंगे – एक प्रशासनिक विफ़लता

हिन्दुओं और हिन्दुत्व के बारे बातें करना – सांप्रदायिक
इस्लाम और मुसलमानों के बारे में बातें करना – सेक्यूलर

संसद पर हमला – भाजपा सरकार की कमजोरी
अफ़जल गुरु को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद फ़ाँसी न देना – मानवीयता 

भाजपा के इस्लाम के बारे में सवाल – सांप्रदायिकता
कांग्रेस के “राम” के बारे में सवाल – नौकरशाही की गलती

यदि कांग्रेस लोकसभा चुनाव जीती – सोनिया को जनता ने स्वीकारा
मोदी गुजरात में चुनाव जीते – फ़ासिस्टों की जीत

सोनिया मोदी को कहती हैं “मौत का सौदागर” – सेक्यूलरिज्म को बढ़ावा
जब मोदी अफ़जल गुरु के बारे में बोले – मुस्लिम विरोधी

क्या इससे बड़े विरोधाभास उत्पन्न किये जा सकते है ?

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Shwetank Tyagi

भारत में आतंकवाद करने के फायदे-

१.स्केच ऐसा बनेगा आपका की आप खुद ही अपनेको नहीं पहचान पाओगे..

२.अगर पकडे गए तो बिरयानी खाने को मिलेगी

३.हमारे गूंगे प्रधानमंत्री से अधिक मीडिया में दिखेंगे..!!

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In
1947
Hindu – 33 crore (94%)
Muslim – 3 crore (5%)
Others – 1 crore (1% )

In 2008:Hindu – 82 crore (75%) i.e.
growth rate in 61 years 249% @
4.07% per year
Muslim – 25 crore (23%) i.e.
growth rate in 61 years 833%
@13.7% per year
Others (Christians) – 3 crore (2%)

Situation in 2035 would be:

Muslim – 92.5 crore (46.8%)
Hindu – 90.2 crore (45.6 %) that
too if not a single convert to other
religion
Others – 7.6 crore (7.6% )

By 2040 ALL HNIDU FESTIVAL WILL
BE STOPPED
Situation in 2050 would be:
Muslim – 189.62 crore (64%)

INDIA WILL BE DECLARED ISLAMIC
COUNTRY

Hindu – 95.7 crore (32.3%)
Others -10.7 crore (3.6%)

It Doesnt include
Victims of Love Jehad.( Posted  on Facebook Wall )

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Simran Rock:मुस्लमान वन्दे मातरम न बोले तो ये उन का धार्मिक मामला है…..
नरेन्द्र मोदी टोपी ना पहने तो ये उन का सांप्रदायिक मामला है……

डेनमार्क में अगर कोई फोटो बन गयी तो उस का सर कलम ….
श्रीराम की जमीन पर अगर मंदिर बना तो हिन्दू बेशर्म. ….

गोधरा में जो ५६ हिन्दू पहले जले वो भेड़ बकरी…..
और उस बाद जो मुस्लिम मरे वो देश के सच्चे प्रहरी,,,,,

१५ साल पहले ही कश्मीर हो गयी हिन्दुओ  से खाली…..
देश की बढती मुस्लिम आबादी हमारी खुशहाली…….

पठानी सूत,, नमाजी टोपी में वो ख़ूबसूरत…
हम सिर्फ राम कह दे तो आतंक की मूरत

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PATRIOTISM OF INDIAN

MUSLIMS – A BALANCED
PERSPECTIVE1) India Muslims are so patriot
that they are worried about
Laden’s (who has declared jihad
against India) burial given by
American Government so much
so that the Muslim Newspaper of
India criticized America for it and
sent their stooge Digvijay Singh to
express their sentiments.

2) India Muslims are so patriot
that anybody who allows illegal
Bangladeshi Muslims in India they
will give their votes to them and
anybody who is against
Bangladeshi illegal immigrants
will lose their votes.

3) Anybody who supports Laden
and criticize Hindus is their
messiah like Digvijay Singh. 

4) Many Indian Muslims in

Mumbai are diehards supporters
of Dawood and Indian Mujaheddin.
Muslim ghettos or “Mini pakistan”
in Mumbai provide support to
them.

5) Indian Muslims are so patriot
that ATS of many states say that
they are not getting any support
from Indian Muslim community
and on contrary are facing
harassment from them by using
Human rights violation case
against them.

6) Indian Muslims call pakistanis
as Hum watan brothers and have
sympathies for pakistan.

7) When Pakistani terrorists
attacked Mumbai in 26/11 many
Indian Muslims leaders came with
theories that it is RSS, CIA,
MOSSAD black operations so that
their dear pakistan does not get
entangled in International Row.
Many Indian Muslim leaders
tried to force Indian Government
not to sign Nuclear Treaty with
America because their beloved
Islamic Nation Pakistan will get
weakened compared to India.

9) A Muslim Journalist himself
has revealed in his book BLACK
FRIDAY that it was Indian Muslim
Woman of Mumbai who provoked
DAWOOD to kill innocent Hindus.

10) Many Muslims Imams of UP
and Bihar openly say that they are
ISI agents.

Not every Indian Muslim is traitor
but to take Indian Muslims
Patriotism as granted is also
foolishness.

BEWARE!

by: Hindutva-Vasudhaiva Kutumbakam ********************

कहा मुसलमान खुश नहीं हैं! ??

वे गाजा में खुश नहीं हैं.
वे मिस्र में खुश नहीं हैं.
वे लीबिया में खुश नहीं हैं.
वे मोरक्को में खुश नहीं हैं.
वे ईरान में खुश नहीं हैं.
वे इराक में खुश नहीं हैं.
यमन में वे खुश नहीं हैं.
वे अफगानिस्तान में खुश नहीं हैं.
वे पाकिस्तान में खुश नहीं हैं.
वे सीरिया में खुश नहीं हैं.
वे लेबनान में खुश नहीं हैं.
……………………….. तो, जहां वे खुश हैं?

वे इंग्लैंड में खुश हैं.
वे फ्रांस में खुश हैं.
वे इटली में खुश हैं.
वे जर्मनी में खुश हैं.
वे स्वीडन में खुश हैं.
वे संयुक्त राज्य अमेरिका में खुश हैं.
वे नॉर्वे में खुश हैं.
वे हर देश है जो मुस्लिम नहीं है उसमें खुश हैं.

………………………………….. और वे किसे दोष नहीं है?

इस्लाम नहीं.
उनके नेतृत्व नहीं.
खुद को नहीं.

………… वे देशों जिसमे खुश हैं वे उसे दोष देते है

बहुत खूब और इतना सच

विरासत में मिली कट्टरता

विरासत में मिली कट्टरता

Pics Credit:Pic One


जगजीत सिंह: तुम चले गए तो गुमसुम सा ये जहाँ है !!!

जीवन क्या है ? चलता फिरता एक खिलौना है..

जीवन क्या है ? चलता फिरता एक खिलौना है..

“अब  यादों  के  कांटे  इस  दिल  में  चुभते  हैं  
ना  दर्द  ठहरता  है  ना  आँसूं   रुकते  हैं” .

इस वक्त जगजीत सिंह के सुननेवालो और चाहनेवालो का यही हाल होगा. सबको अपने गीतों, ग़ज़लों और भजनों से एक रूहानी शान्ति प्रदान करने वाले की आत्मा आज खुद इंसानी चोला छोड़कर परम शान्ति में विलीन हो गयी. इस सत्य से हम सब परिचित है कि एक दिन हम सबको जाना है पर सब के दिलो पे राज करने वाले का यूँ चले जाना तकलीफ देता है. कोई  जड़ भरत की तरह इतना निर्लिप्त तो नहीं रह सकता ना कि कोई अपना चला जाए और आप की आँख से दो आंसू भी ना गिरे. गुलज़ार जी कहना बिल्कुल सही है कि “जगजीत का जाना, एक पूरी दुनिया का उठ जाना है इक पूरे दौर का उठ जाना है .” उनके चले जाने के बाद जिस रिक्तता का अनुभव हम सब को हो रहा है उसकी पूर्ती करना आसान नहीं. 

जगजीत सिंह ने जब गायकी की दुनिया में प्रवेश किया तो उनको भी उन्ही मुसीबतों का सामना करना पड़ा जो हर एक सच्चे कला के पुजारी के सामने आ खड़ी होती है.  नाकामी और असफलताओ से खिन्न आकर वे अपने घर जालंधर को लौट आये मुंबई से जहा पे वे उस वक्त पढ़ते थे और एक प्रोफेशनल  गायक के तौर पे रेडिओ से जुड़े भी थे. पर किस्मत ने इनके लिए कुछ और ही सोच रखा था. कुछ अंतराल के बाद ये फिर मुंबई लौटे और  एच एम वी के साथ कुछ एक दो गाने रिकार्ड कराने के बाद इसी कंपनी द्वारा इनका पहला एल पी  “द अनफ़ोरगैटेबल्स ” ( The Unforgettables) निकला. इसके बाद जगजीत ने पीछे मुड़ के नहीं देखा और मौत के पहले तक इतना काम किया कि गुलज़ार ने अपनी श्रद्धांजली में इस बात को महसूस किया कि शायद जगजीत सिंह ने अपने शरीर को आराम नहीं दिया.

जगजीत सिंह ने भोजपुरी, उर्दू,  पंजाबी आदि भाषाओ में खूब गया. एक समाचार पत्र  के हवाले से मुझे पता चला कि इलाहाबाद से उनका लगाव बहुत गहरा था क्योकि यही से उन्होंने भारतीय संगीत संस्थान प्रयाग संगीत समिति से गायन में प्रभाकर की डिग्री प्राप्त की थी. अभी मौत से कुछ महीनों पहले ही इलाहाबाद में एक कार्यक्रम करके गए थे. ये अपने में एक विलक्षण बात थी कि जिस ऊंचाई को उन्होंने पहले एल्बम से हासिल किया वे अंत तक बरक़रार रही. कला के दुनिया में ये एक विलक्षण घटना है .क्योकि सत्तर के दशक से अब तक के संगीत में ना जाने कितने बदलाव हुए और लोगो के पसंद और नापसंद करने का तरीका भी बहुत बदला. मगर इन सब के बीच अविचलित से जगजीत सिंह एक के बाद एक ह्रदय को झकझोर कर रख देने वाले एल्बम निकालते चले गए. ये कहना गलत नहीं होंगा कि चित्राजी का उनके जीवन में जीवन संगिनी के रूप में आना उनके संगीत यात्रा को एक नयी ऊंचाई दे गया. इन दोनों के संयुक्त रूप से जारी एल्बम श्रोताओ के बीच खासे लोकप्रिय हुए.
 
ऐ साउंड अफैअर (A Sound Affair),  पैशन्स (Passions) बियोंड टाइम (Beyond Time) , होप (Hope)  , इन सर्च (In Search) , इनसाईट (Insight) , फेस टू  फेस (Face To Face) , मरासिम (Marasim ) , मिराज (Mirage) , विशंस (Visions) , लव इस ब्लाइंड ( Love Is Blind) , सजदा (Sajda) , सहर ( Saher)   और चिराग (Chirag)  ऐसे कई हिट एल्बम जगजीत सिंह के आये जिनमे चित्राजी और जगजीत सिंह की गायी  ग़ज़लों ने लोगो का मनमोह लिया. जगजीत सिंह की  लम्बी पारी खेलने की वजह ये रही कि जो संगीत यात्रा उन्होंने बेगम अख्तर , मेहँदी हसन और ग़ुलाम अली के दौर से शुरू की उसको हमेशा वो साधना से मांजते रहे. उन्होंने ग़ज़ल को बोझिल परंपराओ से, उसके अपने सीमित दायरों से बाहर निकालकर साधारण जन में लोकप्रिय बनाया. सुनने में आसान लगता है पर वास्तव में ये एक बहुत कठिन कार्य था.  खासकर उस पीढ़ी में जो ग़ज़ल सुनने या सुनाने  के नाम पे नाक भौ सिकोड़ने लगती है. आप ये समझिये कि जगजीत साहब ने बिल्कुल नए पैमाने और तौर तरीको को जन्म दिया जिसमे ग़ज़ल गायिकी सतही मैखानो और जाम से मुक्त हुई.  उन्होंने अपनी लगन से आधुनिक वाद्य यन्त्र और प्राचीन वाद्य यन्त्र दोनों का बेहतरीन संगम करके यादगार धुनें दी जिन्होंने ग़ज़ल को लोकप्रिय तत्त्व प्रदान किया. जगजीत सिंह के बारे में ये कहा जाता है कि इन्हें मधुर धुनें तैयार करने  में कोई ख़ास दिक्कत नहीं आती थी.  इसके पीछे वजह यही थी इनको संगीत की समझ गहरी थी और इस गहरी समझ के बाद भी ये रियाज में कंजूसी नहीं करते थे. लिहाज़ा जो भी काम इन्होने किया वो अपनी एक अलग छाप छोडता चला गया. 
 
अब देखिये कि उनकी इस लम्बी पारी के इस अवधि में कितने अच्छे  ग़ज़ल  गाने वाले आये मगर वो बदलते दौर में अपने को ढाल नहीं पाए और कुछ एक दो एल्बम को देकर वो गुमनामी में खो गए पर जगजीत सिंह के साथ ऐसा नहीं हुआ. क्योकि वे हद से अधिक सचेत थें. उन्होंने श्रोताओ के मूड को हमेशा ध्यान में  रखा पर साथ में ये भी ध्यान रखा कि वे इतना परिवर्तनशील ना हो जाए कि गुणवत्ता कही खो जाए. जगजीत सिंह के सफल होने का  राज ये भी था कि वे एक सच्चे कलाकार की तरह बेहद संवेदनशील थे लिहाजा उन्होंने बहुत ही बेहतर शायरी का चाहे वो किसी गुमनाम शायर की हो या किसी मशहूर बन्दे के कलम से निकली हो का इस्तेमाल किया. निदा फ़ाज़ली , सुदर्शन फाकिर, गुलज़ार , ग़ालिब , फिराक गोरखपुरी जैसे शायरों की सुंदर ग़ज़लों को बेहतरीन धुनों में सजाकर जो लड़ी उन्होंने बनायीं वो हर भावुक इंसान के दिलो दिमाग पर अपनी एक अमिट छाप छोड़ गया. जगजीत सिंह ग़ज़लों के चुनाव में  कितना सजग रहते थे सुनिए उनके ही शब्दों में  जो  बी बी सी को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा : ” सबसे पहले तो देखता हूँ की ग़ज़ल की भाषा सरल हो और जो शायर कहना चाहता है कहने में सफल हुआ हो. ग़ज़ल प्रेम पर हो या फिर उनमे कोई चौंकाने वाला तत्व हो, ज़िंदगी के क़रीब हो, उस में अश्लीलता नहीं होनी चाहिए. मुख्यतः मैं इन्हीं बातों का ध्यान रखता हूँ.”
 
जगजीत सिंह के बारे में शुरू शुरू में लोग कहते थें कि फिल्मो में आवाज उनकी  नहीं सूट करती. इस भ्रम को उन्होंने अर्थ, साथ साथ, प्रेमगीत और बाद के सालो में दुश्मन,  तुम बिन, जॉगर्स पार्क और सरफ़रोश में एक से बढ़कर एक ग़ज़ले गाकर तोडा. अगर हम छोटे परदे की बात करे तो दूरदर्शन के लिए “मिर्ज़ा ग़ालिब” और नीम का पेड़ धारावाहिक के लिए उनका योगदान उनके संगीत सफ़र में खासा महत्त्व रखता है.  उल्लेखनीय बात ये है कि जिस तरह डूब के वे ग़ज़ले गाते थे उसी तरह से वे भजन भी गाते थे..अक्सर ये होता है कि ग़जल गानेवाले भजन गायिकी में इतने उभर के नहीं आ पाते पर जगजीत सिंह ने ये भी कर दिखाया  एक से बढ़कर एक आत्मिक शांति  देने वाले भजन संग्रह  निकल के. कृष्ण भज़नो पे आधारित इनकी भजन श्रंखला काफी लोकप्रिय हुई जैसे मोक्ष,  जय  राधा  माधव ,  सांवरा समर्पण ,  हरे  कृष्ण  हरे  राम ,  हरे  कृष्ण , राधा  बल्लभ  कुञ्ज  बिहारी .  इसके आलावा ध्यान योग पे आधारित एल्बम और माँ के भजनों का एक संग्रह “माँ  ” जो अरबिंदो सोसाइटी से सम्बद्ध है  भी काफी प्रसिद्ध हुआ..
अंखिया  हरी दर्शन की प्यासी !!

अंखिया हरी दर्शन की प्यासी !!

जगजीत सिंह काफी सचेत रहते थे और इसलिए वे काफी बेबाक भी थे. उन्होंने एक विदेशी चैनल को दिए साक्षात्कार में इस बात को साफ़ साफ़ कहा कि ग़ज़ल गायिकी का स्तर भारत और अन्य जगह काफी गिर रहा है और जिस तरह से हर माध्यम से घटिया चीज़ संगीत के नाम पे बांटी जा रही है उससें समझ में आता है कि कुछ ना कुछ गलत तो है ज़रूर. वे आजकल के संगीत को शोर मानते थे. यही वजह है कि ऐ आर रहमान के यांत्रिक संगीत की उन्होंने साफ़ तौर पे आलोचना की. और ये सच भी है कि आइटम नंबर के दौर में कम्पूटर आधारित संगीत बिल्कुल  टीन कनस्तर पीटने के समान हो गया है. संगीत की आत्मा लगता है इस लोक से निकलकर दूसरे लोक में चली गयी है..

चलते चलते अपने अंतर्मन में दबी  गहरी संवेदनाओ  को उभारना चाहूँगा जिसको निखारने में जगजीत सिंह की गज़लों ने उत्प्रेरक का काम किया. जगजीत सिंह की गज़ले सम्पूर्ण जीवन दर्शन को अच्छी  तरह से परिभाषित करती है. बचपन से शुरू करे तो क्या आपको लगता है ” वो कागज़ की कश्ती” से भी बेहतर कोई संगीतमय रचना हो सकती है जो बचपन को इतना यादगार बनाती हो ? ये रचना देखी जाये तो अलग से मील का पत्थर है. यौवन काल की तरफ बढे तो उस दौर को याद करे जब हम प्रेम के पहले अहसास को महसूस करते है और उसे प्रेम पत्र के रूप में उभारते है तो क्या हमको ये ग़ज़ल नहीं याद आती “प्रेम का पहला ख़त लिखने में वक्त तो लगता है ”  या ये बात नहीं याद आती ” तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है ” . दोस्ती के ही बदले हुए स्वरूप को हम याद करे तो क्या इस ग़ज़ल में जो सीख है  उसकी हम उपेक्षा कर सकते है “दोस्ती जब किसी से की जाये, दुश्मनों की भी राय  ली जाये” ..और जब ये दोस्ती टूट जाए तो क्या हम ये ग़ज़ल नहीं गुनगुनाते : “ तुमने दिल की बात कह दी ये बड़ा अच्छा किया, हम तुम्हे अपना समझते थे बड़ा धोखा  हुआ“. 

जीवन  में जब हम और आगे बढ़ते है और जीवन की कडुवी सच्चाइयो से आमना सामना होने पर हमारे सपने टूट कर बिखरते है तो क्या हम ये नहीं महसूस करते ”  दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है मिल जाये तो मिट्टी है खो जाये तो सोना है ” और फिर यही एहसास हमारे साथ रह जाता है ” शायद मै ज़िन्दगी की सहर लेके आ गया…अंजाम  ये  के  गर्दे  सफ़र  ले  के  आ  गया“.  इन आत्माओ के संपर्क में रहने से ही शायद मै आज कह पाने में  सक्षम हूँ  “बदला ना अपने आपको जो थे वोही रहे” 

इस बहुत भली सी आत्मा को मेरी भावभीनी श्रद्धांजलि ..आपके लिए जगजीतजी इस वक्त मेरे मन में कुछ और नहीं बस आपकी यही ग़ज़ल कबसे गूँज रही है : “ सदमा तो है मुझे भी कि तुझसे जुदा हूँ  मै” 

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इसमें मैंने बहुत सी ग़ज़लों का जिक्र किया है. ये सब तो मेरे दिल के करीब है पर ये रहे कुछ और ग़ज़ल /भजन जो मुझे बहुत पसंद है. 

. या तो मिट जाइए या मिटा दीजिये 

. तेरे आने की जब खबर महके 

.उस मोड शुरू करे फिर ये ज़िन्दगी 

. आदमी आदमी को क्या देगा 

 
 
 
 
 
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Prashant Bhushan: Please Remove Corruption And Not Play Politics In Its Name!!

Prashant Bhushan: Please Remove Corruption And Not Play Politics In Its Name!!

It’s extremely unfortunate that Prashant Bhushan was roughed up at his chamber. Though the whole incident smacks of conspiracy, it’s clear that such examples set a bad precedent in a mature democracy. However, I need to know who has given the right to likes of Prashant Bhushan to make controversial statement in matters extremely sensitive in nature? Why they believe in flaring up the conflict with such a crass remark?

Why people making lots of noises over Prashant Bhushan’s beating kept quite when a journalist was publicly manhandled in front of many prominent journalist at a conference organized by a prominent Muslim leader? Prashant Bhushan should concentrate on eliminating corruption and not enter in cheap politics, which is already the prime task of so many other prominent leaders !!

The Team Anna is here to ensure a better mechanism to eliminate corruption and not to enter in cheap gimmicks. The waywardness on part of Prashant Bhushan is giving a bad name to Team Anna and also raises doubt over the motives of Team Anna. If the members can give way to such insensitive remarks at this stage when they are out of power, it’s not hard to imagine that they can too give way to atrocious policies by joining hands with wrong elements once they are in power

It’s better that Team Anna should ensure a better image for itself by being true to the hopes they have unleashed by committing to the task of elimination of corruption. The message on the wall is clear: Eliminate corruption but let’s not play politics in name of removing corruption. We have produced enough leaders to play politics. Let’s not Team Anna strengthen the tribe of corrupt leaders by playing in the hands of wrong elements.

Prashant Bhushan: Please Remove Corruption And Not Play Politics In Its Name!!

References:

The Times Of India

 

Journalist Beaten By Muslim Leader

Video Of Journalist Beaten

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Jagjit Singh: The Musical Peacemaker Merges In Eternal Peace!!!

Jagjit Singh: The Musical Peacemaker Merges In Eternal Peace!!!

It’s never an easy task to pay tribute to great maestros. They have so many shades, which remains elusive from the normal human eyes. Jagjit Singh, the legendary Ghazal singer with infinite beautiful shades, left the world quietly, leaving his fans caught in the fervour of celebrations virtually stunned. It’s hard to believe that he is no more with us. He was recovering fast but ultimately death like always had the last laugh. The icy hands of death prevailed over the wishes of his lovers, proving that nature wanted this singer to give eternal peace. The same peace which his ghazals, songs and bhazans provided to millions of listeners spread across the globe.

Jagjit Singh burst upon the ghazal scene like a whiff of fresh air in the seventies and shattered the established norms associated with the ghazal singing. There were big names like Mehadi Hassan, Ghulam Ali, Farida Khanum and Noorjehan but their appeal was restricted to certain class. Let’s also not forget that seventies was age of transition for music world. The western beats were fast replacing traditional appeal and, therefore, making room for qualitative singing was a difficult task. In fact, the early experiences of Jagjit Singh, were bitter ones in the world of Mumbai. This man who sang shabads in Gurudwaras in his early days of singing met with series of bad happenings in an attempt to carve a niche for himself in the Mumbai. He went back to his hometown with heavy heart but he was born to become successful so after a gap he made fresh attempts. The big break came in form of ” ‘The Unforgettables’ and after that there was no looking back for him. Happily he found a sweet partner in form of Chitra Singh. This highly popular duet team gave us number of popular albums like “Someone Somewhere”, “Ecstasies” , “Emotions” , ” A Sound Affair”, “Live at Wimbley” and ” A Milestone”, to name a few.

We need to understand what made them gain such a terrific mass appeal. It was their intimate deep bond with music which made them make a permanent inroad in the hearts of the listeners. They came to be aware of the fact that unless ghazal singing is subjected to new changes both content wise and music wise it would be hard to retain the existence of ghazal among the listeners. However, in the name of changes, he didn’t gave way to gimmicks. His subtle understanding of the music prevented him giving way to lesser traits. Ultimately, he roped in better poetry from both well known names and lesser known names. However, he ensured that selected ghazals conveyed their emotions in simpler language.

As a result of his fine selection, the fine poetry from some well known names like Dr. Bashir Badr, Sudarshan Fakir, Qateel Shifai, Gulzar and Javed Akhtar became hot favourite in Indian households. However, the ghazals became everlasting because of his unique ability to synthesize modern beats with traditional Indian instruments. He has the uncanny ability to create catchy tunes. Probably, his rigorous musical sadhana (practice) paid him rich dividends as he moved ahead in the musical journey.

Remember his ghazal Woh Kagaz Ki Kashti“? This masterpiece became a darling of the masses. Now anybody interested in taking a step back in time to his childhood had to anticipate this ghazal. For love birds, his ghazals served as surest means to convey their emotions. In fact, I am myself guilty of reaching to conclusions if I hear a young person listening his ghazals that he/she is in love!! One need not forget that ghazals gained prominence in Hindi movie world with his arrival. The albums “Saath Saath” and “Arth” are still the most sought after albums in the music stores across the globe. A fact that I came to be aware of when I interviewed many music shop owners way back in late nineties for one of my articles.

Jagjit Singh: The Musical Peacemaker Merges In Eternal Peace!!!

Apart from making ghazals popular in movies, the T V portrait related with great Urdu poet Mirza Ghalib attained huge popularity when Ghalib’s ghazals rendered in soulful manner attained a new dimension. May be his golden voice did justice to whatever he came to sang- something that kept him a busy soul till the end of his life’s journey. It’s no secret that how many great ghazal singers lost their relevance in age dominated by cheap gimmicks. So if Jagjit Singh, managed to dictate the rules and worked on his own terms with no compromise, then that in itself is a great achievement.

The tribute would be incomplete if I fail to mention about his bhazans. His tender mellifluous voice gave birth to innumerable beautiful bhazans. His Krishna series with Chitra Singh including albums like Bhajan (HMV), Hare Krishna Hare Rama,Hare Krishna..Hare Krishna, Jai Radha Madhav, Mokasha-Sri Krishna, Saanwara, Hare Krishna and Radha Ballabh Kunj Bihari, to name a few, became great hits. For a huge section of listeners he is more popular as a bhazan singer than a ghazal singer. The wonderful synthesis of western and Indian musical notes worked wonders in bhazan singing as well.

This man was a fearless in his confessions as well. He was not reluctant in admitting that in our age music has gone to the dogs. The media’s devastating role in promoting worthless people has led to demise of good singing. He was also highly critical of A R Rahman’s musical abilities. He found him an incompetent soul, who relied heavily on computerized beats !! He sounds so true because when one listens the songs of A R Rahaman it’s strikingly clear to any conscious listener that there is huge lack of completeness or totality. Jagjit Singh was conscious of the fact that the present age listeners as well as the new age composers have lost hold over refined musical sensibilities. Still , he did not fail to shower compliments upon new talents like Kumar Shanu when Shanu was new in the movie world. In our times, he appreciated the singing of Kay Kay.

In the end, I must reiterate the cliche that artists enjoy an advantage over other souls. While other souls are soon forgotten after their deaths, the creative geniuses like Jagjit Singh always make their presence felt. I am sure he would always make his presence felt in form of his ghazals, bhazans and songs. I am holding back my tears as ”

Ishq meiN GHairat-e-jazbaat ne rone na diyaa
Warna kyaa baat thi kis baat ne rone na diyaa
.

( In love my fear of being shamed/exposed did not allow me to cry )
Otherwise, what reason/thing was it that did not allow me to cry)

Some of my favourites:

Shayad Mai Zindagi Ki Shahar

Us Mod Se Shuru Kare Phir Ye Zindagi

Tere Aane Ki Jab Khabar Mahke

Jai Radha Madhav Kunj Bihari

Tum Meri Rakho Laaj Hari

Tum Dhoondho Mujhe Gopal

A Memorable Interview In Two Parts:

Part One

Part Two

Jagjit Singh: The Musical Peacemaker Merges In Eternal Peace!!!

References:


The Economic Times

Wiki

Firstpost

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Radio And Vividh Bharati: My Two Extremely Lovable and Sincere Friends

Radio And Vividh Bharati:  My Two Extremely Lovable and Sincere Friends

Exhibiting love for Radio and Vividh Bharati in age of amazing gizmos may make me appear a strange creature in the eyes of readers but that’s a reality and I am not at all ashamed in disclosing my eternal love for them. Why should I hide my feelings for them when they have been my side in good and bad times with right sort of vibes ? At least, they shared my feelings in a genuine way. It’s time to share some memories associated with both of them and so I take a trip down memory lane.

The occasion is quite fitting one as we are celebrating the birth anniversary of Vividh Bharati, which came in existence on October 3, 1957. It would be interesting to state that Vividh Bharati is brainchild of Pt. Narendra Sharma, who conceived it to curb the growing popularity of Radio Ceylon. Anyway, it soon turned out to be one of the most wonderful sarkari (government) institution, which struck an intimate chord with masses. We all know that masses remain at a safe distance from anything labeled sarkari be it sarkari hospital or sarkari school!!

I was raised in a family of radio lovers, which has developed a unique samskara (tendency) of spending few qualitative hours in presence of radio. My maternal grandfather was very serious listener of Akashvani ( All India Radio) News. In fact, he was such a serious listener that there was a spare radio set apart from the one which he carried with him all the time only to ensure that news item does not get disrupted in case the radio stopped functioning. Above all, he had also a cute, huge as well, Philips Valve Radio set , which was the cynosure of all the eyes. This set in those times was a prize possession. We naughty kids made this elegant set attain a colourful identity by listening latest movie songs secretly in Nanaji’s absence!! After all, the inventors of radio did not introduce radio only for the sake of listening news!! That’s the way I came in touch with radio in early 80s.

I still remember stopping at every shop, playing the cricket commentary be it paanwalah’s shop or garage owner’s shop, after returning to home from the school. I don’t think that pleasure I gained imagining Marshal’s bouncers and Kapil Dev sixers after listening the stylish descriptions of it in the radio commentary would ever be gained again. Listen the dull and pathetic present age Hindi or English commentary on Doordarshan to realize that we are living in Kaliyuga !! You will feel start feeling about getting moksha( liberation ) as early as possible!! Anyway, we all today have TV sets but there was a time when T V set was not that common sight and in those times it was mother of all the questions for any radio listener: ” Score kya hua hai ?” ( what’s the score? ).

In my childhood, after finishing the homework I spent my most of the time before the radio which was placed on my study table. It was small elegant red coloured Murphy radio set. It was my darling and soulmate in those days. Anyone daring to move near it in my absence was brutally punished by me when news of trespassing was informed to me later, usually by a person denied an opportunity by the trespasser to share the pleasure of listening the radio. By the way, did I tell you all that radio, watch and bicycle were the prominent dowry items in yesteryear marriages. Many of the silver hairs turn nostalgic when asked about their bicycle!!

Radio And Vividh Bharati:  My Two Extremely Lovable and Sincere Friends

How can I forget the Sanskrit news, which I listened each morning even though it was beyond my comprehension? Samprati vaartaaha shruyantam… ” (You are listening to the news.). Just before penning this article I came to read about Baldeva Nand Sagar- the eminent Sanskrit news reader. This real gentleman has done a lot to promote the cause of Sanskrit in other parts of the globe. How can I forget the impressive voice of Devakinandan Pandey delivering Hindi news with such a perfection? I still remember how the radio did the time check at regular intervals with a mind blowing tring tring beat. It was an usual habit to set the time in our watches once the radio confirmed the hours, minutes and seconds !!

Those were the days when programmes like Chitraloka, Manchahe Geet, Sangit Sarita, Chaaya Geet, Jayamala, Hava Mahal and Binaca Geet Mala presented by Ameen Sayani were the hot favourites. They were always in the minds of listeners and it was no less than a result of bad karma to miss anyone of these programmes. These programmes in their newer versions are still part and parcel of my life. They help me mitigate the sorrows of life and being a loner I find myself very close to these programmes. I think going by the letters of listeners in “Patravali”, I can easily intercept this great truth that it’s not only me but there are many listeners who have established a deep intimate bond with Vividh Bharati or radio to rise above the ironies of life.

I am not against rise of newer modes of entertainment nor I am against the introduction of new radio channels but I still feel gone are the days when radio programmes evoked sheer joy. May be the life in those times was not as complicated as it has now become. May be the music in those days was not incoherent pieces of computer generated beats!! May be the radio broadcasters in those days had better knowledge of Hindi language !! They had better capability to strike a bond with listeners as these broadcasters remained tuned to the happenings of ordinary life in a conscious way.

The radio broadcasters of present age like Kamal Sharma, Nimmi Mishra, Mamta Singh, Yunus Khan, Ashok Sonavade, Amarkantji, and Rajendra Tripathi, to name a few, have set high standards in an age when it’s tough to remain above commercial interests or , for that matter, remain above populist measures. Vividh Bharati has made lots of changes not to lose its relevance. It’s still “Desh Ki Surili Dhadkan” (Melodious beat of the nation). However, I must say that commercial interests are fast overtaking the interests of listeners. There are unwanted commercials in the middle of the song and when the commercials end the song has given way to another song!! Even the Havamahal is not able to live up to expectations with fresh jhalkis (radio drama). However, the programmes like Ujaale Unki Yadon Ke , Vishesh Jayamala and etc. are coming up with interesting episodes related with legendary movie personalities.

I must say that Vividh Bharati is instrumental in refining my taste related with music. Where else can you listen Bhimsen Joshi, Manna Dey, Shobha Gurtu, Parveen Sultana, Chhaya Ganguli and Talat Mahmood so frequently other than on Vividh Bharati ? It’s still a best place not only to listen “Bhoole Bisre Geet” (rare forgotten songs) but also to take note of forgotten words of Hindi. It’s still promoting good Hindi in a silent way. That’s the reason why I have kept my intimate bond with radio in a good shape. It’s my first love. Though I now own newer version of Philips after my previous Murphy Two-in-One became virtually irreparable, the love never changed its intensity. Love for radio and Vividh Bharati would remain the same. After all, the love for beloved keeps increasing with each passing day. Long live Vividh Bharati and radio.

Radio And Vividh Bharati:  My Two Extremely Lovable and Sincere Friends

References:

All India Radio

Vividh Bharati

Vividh Bharati

Binaca Geet Mala

Pt. Narendra Sharma

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मैं, ज्ञानदत्त पाण्डेय, गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश (भारत) में ग्रामीण जीवन जी रहा हूँ। मुख्य परिचालन प्रबंधक पद से रिटायर रेलवे अफसर। वैसे; ट्रेन के सैलून को छोड़ने के बाद गांव की पगडंडी पर साइकिल से चलने में कठिनाई नहीं हुई। 😊

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