Category Archives: Crime

क्या भारतीय समाज में पूर्ण क्रांति या कोई सार्थक बदलाव संभव है? शायद नहीं!!

Satyendra-Dubey

( सत्येन्द्र कुमार दूबे: बदलाव की कीमत  मौत के दरवाजे तक ले गयी )

भारतीय समाज एक विचित्र समाज है! ये बदलाव तो चाहता है लेकिन ये बदलाव का हिस्सा नहीं बनना चाहती. भारतीय समाज एक ढर्रे पे चलने वाला समाज है. ये सही चीजों का हिमायती तो है लेकिन बहुमत फिर भी सार्थक बदलाव के प्रति उदासीनता, आलस और निराशा से भरा है. इसीलिए जयप्रकाश नारायण या वर्तमान में अन्ना हजारे जैसे लोग समाज को झकझोर तो सकते है लेकिन एक सार्थक मूवमेंट को जन्म नहीं दे सकते, लोगो को वैचारिक रूप से उन्नत नहीं कर सकते. गाँधी ने भारत छोड़ो आन्दोलन को गति जरूर प्रदान की लेकिन उसके मूल मे भारत को आज़ाद कराने का संकल्प था, भारतीय समाज के सोचने के तौर तरीके या उसकी कार्यशैली में बदलाव इसके मूल में नहीं था! शायद यही वजह है कि नेहरु के कार्यकाल में ही भ्रष्टाचार के किस्से उभर आये. ये भी उल्लेखनीय है कि गांधी और नारायण जी के आन्दोलन दोनों युवा वर्ग के जोश पे ही आगे बढे लेकिन अंत में या दूरगामी परिणाम “किस्सा कुर्सी का” ही रहा.

ये भारतीय समाज ही है कि आधुनिक काल में भी सरकारी महकमे बनाम प्राइवेट का महत्त्व हावी रहता है. सरकारी चपरासी आपका होनहार दामाद हो सकता है लेकिन एक निपुण कारीगर नहीं!! ये भारतीय समाज ही है जो लड़की की शादी की चिंता से व्यथित रहता है लेकिन दहेज़ के कानून होने के बावजूद हर आदमी शादी में धूमधाम, दहेज़ के लेन देन का सबसे बड़ा उपक्रम करता है सिर्फ और सिर्फ इसलिए कि समाज क्या कहेगा, लोग क्या कहेंगे! ये भारतीय समाज ही है जो अब भी पद की प्रतिष्ठा देखता है, उपरी कमाई देखता है, कलम या कुर्सी कितना फायदा पंहुचा सकती है ये सब देखता है. यही आपके वजूद के मूल्यांकन का पैमाना है और यही पैमाना रहेगा इस भारतीय समाज में. आपकी अच्छाई का कोई मोल नहीं अगर आदमी बिकाऊ नहीं है. इसे आप भौतिकता का तकाज़ा कह ले या फिर उपयोगितावाद का चरम कह ले. साधू संतो से भी मिलते है तो ये भारतीय समाज की दृष्टि है कि वो आश्रम की भव्यता से प्रभावित होता है. वहा की सादगी और दिव्यता असर ही नहीं डालती. ये भारतीय समाज ही है कि फूहड़ क्रिएटिविटी प्रचार का सहारा पाकर ( लेटेस्ट उदाहरण “दिलवाले” का राष्ट्रीय अखबारों में पहले पेज पर फुल साइज़ विज्ञापन देखे ) सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मे बनती है पर वही अच्छी फिल्मो के लिए मल्टीप्लेक्स कल्चर में कोई जगह नहीं!! ना ये फिल्मे रिलीज़ होती है. रिलीज़ होती है तो चलती नहीं, बोरिंग और बकवास कह कर खारिज कर दी जाती है!! इनके कलाकार गुमनामी के अँधेरे में दम तोड़ देते है!!

ये भारतीय समाज की स्याह तस्वीर है कि जो बदलाव, क्रान्ति की बात करते है वे बहुमत द्वारा शक की निगाहों से देखे जाते है! ये बदलाव अगर करते है तो उसका फायदा उठाने की चाह सबमे रहती है लेकिन ऐसे लोगो से लोग दूरी बना कर रखते है! ऐसे लोगो को खुद उसके परिवार वाले और उन्नत भारत का उन्नत समाज “सनकी”, और पागल करार देती है! ये अलग बात है ऐसे “सनकी” और “पागल” लोगो के द्वारा लाये गए बदलाव का हर कोई फायदा उठाता है!! लेकिन ये सबसे बड़ी त्रासदी है इस भारतीय समाज कि बदलाव की बात करने वालो, उसके लिए संघर्षरत रहने वालो के लिए कोई खास स्पेस नहीं. ऐसे लोगो की अंतिम परिणिति या तो असमय मौत में होती है या किसी पागलखाने में उपेक्षित मौत!! ऐसे लोग समाज की नज़रो में जैसा मेरे एक मित्र ने ठीक ही कहा “इरिस्पांसिबल” लोग होते है!! इसलिए इन बदलाव चाहने वालो के पीछे समाज, माफिया या सरकारी व्यवस्था सरकारी इंटेलिजेंस नाम के महकमे के साथ हाथ धोकर पीछे पड़ जाती है.

manjunath

( मंजुनाथ की मौत ये बताती है कि आजादी हमको सिर्फ ब्रिटिश लोगो से मिली. समाज की गंदगी से आजादी अभी बाकी है. )

ऐसी व्यवस्था सिर्फ आम आदमियों को ही नहीं प्रताड़ित करती. खुद अपने ही विद्रोही सरकारी आदमी लोगो को भी नहीं छोडती, विद्रोही सामजिक कार्यकर्ताओ को भी नहीं बख्शती. सो आप सहज ही समझ सकते है कि साधारण पृष्ठभूमि वाले लोग बदलाव के बारे में कैसे सोच सकते है जब एक सरकारी अफसर को माफिया खुले आम जला डालता है, एक माफिया ट्रैक्टर के नीचे युवा IPS अफसर को रौंद डालता है, मंजुनाथ या सत्येन्द्र दुबे भयानक मौत के शिकार होते है या फिर इसी तरह के लोग और भयंकर षड़यंत्र के शिकार होते है. और फिर काल के प्रवाह के चलते ऐसे लोग विस्मृत हो जाते है. भारतीय समाज यथावत अपने समस्त तमाशे के साथ चलता रहता है इस उम्मीद के साथ अच्छे दिन आयेंगे, अच्छे बदलाव होंगे लेकिन हममे से कोई पहल नहीं करेगा, कोई बदलाव की बात नहीं करेगा और हर बदलाव की चाह करने वाले को बुरी तरह प्रताड़ित करना चाहेगा!! बदलाव की इतनी भीषण चाह पर फिर भी बदलाव की राह पे लगे लोगो की इतनी बुरी नियति! सो किसकी शामत आई है जो बदलाव के बारे में सोचे! सिस्टम का हिस्सा बनो और मौज उडाओ. ये सबसे सेफ विकल्प है.

जुडिशियल एक्टिविज्म की बात भी कर ले. वकालत के क्षेत्र से ताल्लुक रखते है तो ये बात क्यों न कहे कि जुडिशियल एक्टिविज्म की सबसे ज्यादा जरुरत तो न्यायालयों के भीतर सबसे ज्यादा है बजाय किसी और क्षेत्र में जहा पेशकार भी पैसा लेता है अगली “डेट” देने के लिए, जहा फैसले केस की मेरिट नहीं आपकी बेंच से प्रगाढ़ ताल्लुकात पे निर्भर है, जहा वकील का रुतबा या चेहरा फैसले पलट देती है, जहा कंटेम्प्ट के कानून का भय इतना है कि सारे वकील लकीर के फकीर बन कर प्रचलित व्यस्था का हिस्सा बन कर अपनी दाल रोटी को सुरक्षित करते है और सारी उम्र बस दाल रोटी को सुरक्षित ही करते रहते है ( और साथ में बदलाव करने वालो को सनकी और पागल कह कर उपहास उड़ाते है ), जहा जज साहिब को सलाम ठोकना आवश्यक है वर्ना आपके हर अच्छे केस का फ्यूचर बस “dismissed” ( खारिज )  होना तय है, और जहा जज साहिब खुद भ्रष्टाचार सहित हर कुकर्म में लिप्त है, जहा डिस्ट्रिक्ट न्यायालयों में हड़ताल/सौदेबाजी  ज्यादा और न्याय कम ही होता है ( पर इसके बाद भी जनता इसी चौखट पे आकर न्याय की गुहार लगाती है और कुछ नक्सली/बागी बन कर अपने से न्याय हासिल करते है !!)

लोग मुझसे अक्सर ये पूछते है अरे समस्याए तो सब गिना देते है, कोई हल हो तो बताइए! हम उनसे यही कहते है हल बहुत साधारण है पर क्या आप जैसे जटिल दिमाग इस साधारण से हल को आत्मसात कर सकते है कि पहले बदलाव की सोच रखने वालो का सम्मान करो और उन्हें उचित सरंक्षण दो. सारे अच्छे बदलाव अपने आप खुद हो जायेंगे!! किसी बदलाव करने वाले को आप शक की निगाहों से देखेंगे, उन्हें मुख्यधारा से बहिष्कृत  कर देंगे, उन्हें प्रताड़ित करेंगे तो किस मुंह से भारतीय समाज बदलाव की आशा रखता है. ये भारतीय समाज खुद सोचे क्या उसे वास्तव में बदलाव की दरकार है? तब कही वो “हल” के बारे में चिंतित हो! हमारे यहाँ तो सभी सिस्टम का हिस्सा बनना चाहते है दिमाग को बंद करके! लकीर का फकीर बने रहना ज्यादा मुनासिब है इस देश में, सिस्टम में सेट होने के जुगाड़ में ही सारी उम्र चली जाती है यहाँ पर! सो क्रांति या असल बदलाव इस देश में इस मानसिकता के चलते संभव नहीं.

इस पोस्ट के आशय को जो हमने दो कविताये अभी पढ़ी वे बहुत अच्छी तरह से उभारती है. पहली कविता तो “अर्द्ध सत्य” फ़िल्म से है और उस चक्रव्यूह की तरफ इशारा करती है जो बदलाव करने वालो को अपनी गिरफ्त में ले लेती है. दूसरी छोटी कविता रमा शंकर यादव “विद्रोही” द्वारा रचित है जो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से निकाल दिए गए थे कैंपस में धरने इत्यादि में शामिल होने के लिए.

********************

चक्रव्यूह मे घुसने से पहले
कौन था मैं और कैसा था
यह मुझे याद ही ना रहेगा

चक्रव्यूह मे घुसने के बाद
मेरे और चक्रव्यूह के बीच
सिर्फ़ एक जानलेवा निकटता थी
इसका मुझे पता ही न चलेगा

चक्रव्यूह से निकलने के बाद
मैं मुक्त हो जाऊँ भले ही
फ़िर भी चक्रव्यूह की रचना मे
फर्क ही ना पड़ेगा

मरुँ या मारू
मारा जाऊं या जान से मार दूँ
इसका फ़ैसला कभी ना हो पायेगा

सोया हुआ आदमी जब
नींद से उठ कर चलना शुरू करता हैं
तब सपनों का संसार उसे
दुबारा दिख ही नही पायेगा

उस रौशनी में जो निर्णय की रौशनी हैं
सब कुछ समान होगा क्या?

एक पलडे में नपुंसकता
एक पलडे में पौरुष
और ठीक तराजू के कांटे पर
अर्द्ध सत्य

Source: गोविन्द निहलानी की अर्द्ध सत्य

***************************

मैं भी मरूंगा

और भारत के भाग्य विधाता भी मरेंगे

लेकिन मैं चाहता हूं
कि पहले जन-गण-मन अधिनायक मरें
फिर भारत भाग्य विधाता मरें
फिर साधू के काका मरें
यानी सारे बड़े-बड़े लोग पहले मर लें
फिर मैं मरूं- आराम से
उधर चल कर वसंत ऋतु में
जब दानों में दूध और आमों में बौर आ जाता है
या फिर तब जब महुवा चूने लगता है
या फिर तब जब वनबेला फूलती है
नदी किनारे मेरी चिता दहक कर महके
और मित्र सब करें दिल्लगी
कि ये विद्रोही भी क्या तगड़ा कवि था
कि सारे बड़े-बड़े लोगों को मारकर तब मरा॥”

कवि: रमा शंकर यादव “विद्रोही”

Source: Kafila

*****************************

narendra kumar
( सरकारी लोग भी माफिया के आतंक से त्रस्त है. नरेन्द्र नाम के इस आईपीएस अफसर की मौत तो यही समझाती है. )

Pic Credit:

Pic One

Pic Two

Pic Three

बारा पॉवर प्रोजेक्ट में कार्यरत मजदूर ने की आत्महत्या: शुरू हुआ लीपापोती का खेल!!

बारा पॉवर प्रोजेक्ट : हादसों की उर्जा से ग्रसित!

बारा पॉवर प्रोजेक्ट : हादसों की उर्जा से ग्रसित!

( Also Published On A Prominent Indian Website Related With Cause Of Workers, Sangharsh Samwad, On October 30, 2015 )

इलाहाबाद के शंकरगढ़ क्षेत्र का दुर्भाग्य ये है कि ये अक्सर गलत कारणो से सुर्खियों में रहता है. कभी अवैध खनन की गतिविधियों को लेकर तो कभी सड़क हादसों को लेकर तो कभी दूषित पानी पीने को अभिशप्त लोगो की व्यथा के कारण. जहरीली शराब के कारण होने वाले हादसे भी इस क्षेत्र में अक्सर घटते रहते है. इलाहबाद का चर्चित एसओ हत्याकांड जो बारा में पोस्टेड थें भी इसी शंकरगढ़ क्षेत्र में खूंखार अपराधियों द्वारा दिनदहाड़े कर दी गयी थी. इस बार की घटना बारा पॉवर प्रोजेक्ट जो मिश्रापुरवा गांव में सक्रिय है से जुड़े एक कर्मचारी के कथित रूप से आत्महत्या कर लेने की  है. बारा के मिश्रापुरवा गांव में बारा पॉवर प्रोजेक्ट चल रहा है जिसे जेपी ग्रुप से जुड़े प्रयागराज पॉवर जनरेशन नाम की कंपनी चला रही है. सूत्रों के मुताबिक इसी कंपनी में गाँव कपारी का तीस वर्षीय युवक रमेश तिवारी काम करता था. विगत एक वर्षो से स्वास्थ्य कारणों से वो कंपनी में अपनी उपस्थिति पूर्व की भांति नहीं दर्ज करा पा रहा था. उसकी आर्थिक और मानसिक स्थिति बिगडती जा रही थी.

इसी बीच इस पॉवर प्लांट से प्रभावित आसपास के गाँव के किसान जो कि पहले ही पॉवर प्लांट से जुड़े भूमि अधिग्रहण के लेकर बवाल काट चुके है और इस क्षेत्र में इस पॉवर प्लांट से वातावरण को पहुच रहे नुकसान को लेकर अपनी गंभीर चिंता जता चुके है बारा मुख्यालय पर उन्होंने कुछ दिनों पहले धरना प्रदर्शन किया था. इस धरने प्रदर्शन में कुछ मांगो के अलावा जो किसान इस पॉवर प्रोजेक्ट में कार्यरत थें उन्होंने अपने को स्थायी करने की मांग भी रखी. इसके साथ ही उन्होंने वेतन वृद्धि की भी मांग की. इस बाबत बुलाई गयी वार्ता में कंपनी के अधिकारी, मजदूरो के प्रतिनिधि संघटनो और उपजिलाधिकारी बारा शामिल हुए  पर वार्ता विफल हो गयी. इससे मजदूर वर्ग काफी आहत हुए. इनका आक्रोश अभी ठंडा पड़ता तभी इस किसान ने कथित रूप से आत्महत्या कर ली. बताया जाता है वार्ता विफल होने से ये किसान  अवसाद की स्थिति में पहुच गया था.

किसान की आत्महत्या की खबर ने किसानो में खलबली मचा दी. आक्रोशित किसान शव को लेकर कंपनी के मिश्रापुरवा गेट पर धरने प्रदर्शन पे बैठ गए. वे कंपनी के जिम्मेदार अधिकारियों से वार्ता करना चाहते थें लेकिन मौके पे कम्पनी का कोई भी अधिकारी नहीं आया. प्रदर्शनकारी चाहते थें कि उचित मुवाअजे सहित किसान के परिजनों में से किसी को नौकरी दी जाए. पुलिस के आला अधिकारी क्षेत्राधिकारी बारा सहित घटना स्थल पर तुरंत पहुचे लेकिन प्रदर्शन कर रहे किसानो ने उनकी एक ना सुनी. बाद में उपजिलाधिकारी बारा श्रीमती सुशीला ने हलके लाठीचार्ज के बीच शव को अपने कब्जे में लेकर पोस्टमॉर्टेम के लिए भेज दिया. इस घटनाक्रम में बारा क्षेत्र को अशांत कर दिया है. किसानो में फैले आक्रोश ने स्थिति तनावपूर्ण कर दी है.

इसे आप दुखद सयोंग कहिये कि अभी पिछले महीने ही बारा पॉवर प्लांट में कार्यरत एक वेल्डर के घायल हो जाने के बाद काफी हंगामा मचा था. वेल्डर लाल बहादुर सिंह, निवासी ग्राम मड़हान, जिला जौनपुर,  जो कि बॉयलर सेक्शन में था अपने ऊपर लोहे की रॉड गिर जाने के कारण गंभीर रूप से घायल हो गया जिसकी इलाहाबाद में इलाज़ के दौरान मौत हो गयी. मौत के बाद उपजे हंगामे के चलते 10 लाख रूपए मुआवजा राशि दिए जाने के आश्वसन के बाद आक्रोशित मजदूर शांत हुए.

ये खेदजनक है कि भूमि अधिग्रहण की मार झेलते, प्रोजेक्ट से उपजे पर्यावरण में व्याप्त प्रदुषण सहते किसान जो इतना कुछ सह रहे है उन्हें आये दिन कोई ना कोई विपदा कंपनी के गैर जिम्मेदाराना हरकतों की वजह से झेलनी पड़ रही है. कुछ सूत्रों ने जो कंपनी का पक्ष लेने की कोशिश में लगे है ये बताया कि किसान जिसने आत्महत्या की है उसने ढेढ़ साल पहले ही प्लांट में काम करना बंद कर दिया था.

रमेश तिवारी नाम के मजदूर की आत्महत्या से भड़के परिजनों/ ग्रामीणों को समझती पुलिस!!

रमेश तिवारी नाम के मजदूर की आत्महत्या से भड़के परिजनों/ ग्रामीणों को समझती पुलिस!!

ये अक्सर देखा जाता है कि बड़ी बड़ी कंपनिया मजदूरो से जुड़े अहम् मसलो को लेकर बहुत उदासीन और गैर जिम्मेदार रहते है. सबसे ज्यादा आश्चर्यचकित करता है कोई घटना घट जाने के बाद इनके द्वारा लिए जाने वाला रुख. ज्यादातर मामलो में कंपनी के लोग मामले में लीपापोती करके मामले को ठन्डे बस्ते में डाल देते है. मुझे इस तरह के हादसों से जुड़ा एक उल्लेखनीय मामला याद आता है जो अम्बिका नाम के महिला कर्मचारी के दुखद मृत्यु से सम्बंधित है. ये महिला कर्मचारी नोकिया टेलिकॉम स्पेशल जोन ( SEZ ) श्री पेराम्बदुर, जिला कांचीपुरम, तमिलनाडू, में कार्यरत थी. इसकी दर्दनाक मृत्यु पैनल लोडिंग मशीन में हुए एक हादसे में हो गयी. कहा जाता है काम की अधिकता की वजह से इसे इस सेक्शन में जबरन काम करना पड़ा जिसके बारे में इसे अधिक टेक्निकल जानकारी नहीं थी और ये हादसा घट गया.

बारा पॉवर प्रोजेक्ट से जुड़े कंपनी के अधिकारी इस मामले में क्या रुख अपनाते है ये तो वक्त ही बताएगा लेकिन फिलहाल अभी तो किसानो में भारी आक्रोश व्याप्त है घटना को लेकर और घटना के बाद प्रशासन और कंपनी के भ्रामक और गैर जिम्मेदार रुख के कारण. उम्मीद है इस मजदूर के साथ न्याय होगा.

क्या थर्मल पॉवर प्लांट से उपजे प्रदूषण की चिंता है किसी को?

क्या थर्मल पॉवर प्लांट से उपजे प्रदूषण की चिंता है किसी को?

( With Inputs From Sri Rajendra Mishra, Senior Journalist, Kashivarta, Chunar, Mirzapur )

———————-

[ I am really thankful to Mr. Rajendra Mishra, senior journalist, Kashivarta, published from Varanasi, for giving me a chance to work on story pertaining to suicide of worker at power plant run by Jaypee Group. Mr Mishra is also a well known human rights activist. Initially I was reluctant to work on it since writing news reports is not my strength and they are also not my on par with my taste which likes to deal more with features and columns. Today I was informed that news report written by me has found place on a very prominent website of India, “संघर्ष संवाद”, which deals with cause of workers. Feel glad about it. Efforts did not go in vain!!! ]

———-

References:

Dainik Jagaran

Bebak 24

Bara Thermal Power Plant

Death Of Another Worker At Bara Power Project

Death of Ambika: Kafila Publication

Pics Credit:

Pic One

Pic Two

Pic Three

Lawyer’s Referencer: A Prefect Book For The Upcoming Lawyers

Launching Moment Of

Launching Moment Of “Lawyer’s Referencer”: ( From left to right on dais) D K Tiwari, Advocate & Author ; Ashok Mehta, Additional Solicitor General of India; Justice Rajesh Tandon, Chairman, Human Rights Commission, Uttarakhand; Dharam Pal Singh, Criminal Expert , and B B Paul, Expert, Revenue Matters.


Young lawyers are often haunted by so many misapprehensions, when they enter inside the premises of any High Court for first time. The complex relationship between young lawyers and senior lawyers gets added to the woes of fresh, young lawyers arriving at High Court after enrollment at Bar Council. This lack of information regarding the code of conduct and sheer ignorance about rules and regulations governing High Court play a spoilsport with future of young lawyers. That kills their precious moments, which if saved, could have been used in deeper studying of various cases. As a result of that, initial years of any young lawyer is usually a saga of frustration and gloom. He not only runs short of financial resources, but also gets bereft of  proper knowledge which ensures greater frustration. I am really happy that Dr. Devendra Kumar Tiwari, a  very experienced lawyer at Allahabad High Court, Allahabad, who owns a doctorate degree in law, gave a serious thought to this pertinent issue. His deep concerns for the new lawyers made him pen the book titled ” Lawyer’s Referencer”. It’s a terrific condensation of important details sought by any lawyer who wishes to be familiar with proceedings at High Court.

A Perfect Evening.....

A Perfect Evening…..

The book launch saw gathering of some high-profile lawyers, who shared their experiences with audience which comprised of eminent legal hawks belonging to Allahabad. Of course, Devendra Kumar Tiwari, being the host and author of the recently launched book, had a lot to share. I must say that despite  being a very influential lawyer, he maintained a very low profile. He exhibited a humility, which is rarely noticed in a lawyer who attains a high position at High Court! His initial days of academic career was marred by unspeakable problems and since he belonged to rural world, the world dominated by elites offered a little solace! However, he carved a niche for himself largely because of his grit and determination. He penned many law books in Hindi, which got awarded by Indian government. Medical Jurisprudence & Toxicology and Law of Pleadings, are two such prominent books written by him. In his welcome note, he stated it categorically that lawyers who made significant contributions at Allahabad High Court were the ones who belonged to rural world. It’s these lawyers, who ensured justice to litigants at low cost!

However, what hurt him most, was abusive behaviour targeted at young lawyers. The young lawyers are being constantly harassed by senior lawyers and judges for want of required knowledge. Everybody expects these young lawyers to be efficient during the legal proceedings, but, at the same time, nobody ensures that they can have access to details that matter. That’s why  he feels that his book, which has necessary “practical” tips besides terminologies, regularly used in High Court, would come in handy for new legal practitioner!

Advocate Devendra Kumar Tiwari Addressing The Audience.

Advocate Devendra Kumar Tiwari Addressing The Audience.

Ashok Mehta, Additional Solicitor General of India, in his lecture delivered on this occasion as a special guest, lambasted the Bar Council for playing with the future of young lawyers by keeping them in dark about necessary details!! His insightful lecture thrilled the listeners to a great extent. He is wonderful orator and so he used this opportunity to express his heartfelt sentiments. He was shocked that the task of creating awareness among young lawyers was being done by lawyers like Devendra Kumar Tiwari, which is primarily the task of Bar Coucil of India. He wished to know what is preventing Bar Council to use its financial resources to sensitize fresh lawyers? He was also pretty unhappy about lack of quality books in Hindi and what dismayed him  was that even after so many years of Independence “the spirit of Macaulay”  haunted High Courts. All the proceedings of High Court are conducted in  English, which ensures huge problem for both lawyers and litigants. Anyway, he felt that juniors of Allahabad High Court are the best ones in Indian landscape. He ensured them a great future, provided they worked hard and, above all, if lady luck favoured them at right turns of life!!

Additional Solicitor General of India, Ashok Mehta, addressing the participants!

Additional Solicitor General of India, Ashok Mehta, addressing the participants!

Justice Rajesh Tandon, Chairman, Human Rights Commission, Uttarakhand,  who attended the event as a Chief Guest, spoke at length about utility of this book. He felt that lack of knowledge of frequently used terminologies at High Court creates an embarrassing situation. It’s something which could be avoided. In his opinion, this book is not only useful for young lawyers but it’s also serves a huge purpose for senior lawyers. Dharampal Singh, noted criminal lawyer, who shared the dais as a distinguished guest, felt that this tussle between young lawyers and senior lawyers would always exist. In reality, no senior lawyer is ever interested in making a junior lawyer pretty informed. However, a senior lawyer like him, is always ready to provide help by encouraging all the initiatives aimed at brightening the future of young lawyers. B B Paul, expert in revenue matters at Board of Revenue,  who attended the glittering evening as one of the special guests, also spoke about documentation about proceedings,related to High Court, which in his eyes would make the legal affairs bearable for fresh entrants at High Court.

Writer of this post i.e. myself,  Arvind K. Pandey, Writer & Advocate,  with Devendra Kumar Tiwari, author of the recently launched book.

Writer of this post i.e. myself, Arvind K. Pandey, Writer & Advocate, with Devendra Kumar Tiwari, author of the recently launched book.

I would like to highlight some interesting aspects about this book. For instance, this book speaks about “plea bargaining” . This is a very important portion of Criminal proceeding wherein there is provision of out of the court settlement of criminal affairs provided the punishment does not exceed beyond seven years. The senior lawyers expressed grave concern about little usage of this provision which if frequently applied would lessen the burden on trial courts. In fact, criminal experts were of the opinion that courts should first ensure that whether or not there is scope of “plea bargaining” at the start of trial. They should come to proceed in usual way only when there is no scope! In rent and control cases, often lawyers, make a grave blunder of not mentioning about “mesne profit” while filing suits and as a result of this blunder they cannot avail necessary benefit. ” Mesene profits” are the profits which a person in wrongful possession of the property actually recovered or might with ordinary diligence have received therefrom together with interest on such profits excluding the profits due to improvement made by the person in wrongful possession. Interestingly, the book refers to usage of simple term “status quo” which is often wrongly used! In case of re-gaining  the possession, the aggrieved party, who has been deprived of the possession, should ask for “anti-status quo” instead of seeking “status quo”!!

Myself with Ashok Mehta, Additional Solicitor General of India.

Myself with Ashok Mehta, Additional Solicitor General of India.

It was a perfect star-studded evening for both young lawyers and senior lawyers at the conference hall of popular big  hotel at Allahabad. Luckily, it was not confined to merry-making!  On the contrary, the evening ensured that lawyers further enriched their legal knowledge by imbibing rich legal insights shared by expert lawyers present on this occasion including Shailendra Awasthi, Advocate & Author, and Uma Sharnkar Tiwari, prominent Advocate at District Court, Allahabad.  I need to refer to my friend, Shashikant Kushwaha, Advocate, Allahabad High Court, Allahabad, who played an instrumental role in coordinating the event quite successfully. He has also written law books meant for competitive students. In fact, he has been awarded by Allahabad Bar Association for promoting Hindi.

Lawyer's Referencer: A Good Book For Legal Hawks!

Lawyer’s Referencer: A Good Book For Legal Hawks!

Some More Images:

Dharam Pal Singh, Criminal Law Expert.

Dharam Pal Singh, Criminal Law Expert.

My one of the best friends since college days. Too happy to see his progress!!

My one of the best friends since college days. Too happy to see his progress!!

 

क्या यही प्यार है?

तेज़ाब के हमले की  शिकार लक्ष्मी: हौसला जिन्दा है!

तेज़ाब के हमले की शिकार लक्ष्मी: हौसला जिन्दा है!

प्रेम के शुद्ध स्वरूप को आज के युग में वर्णन करना या उसकी तलाश करना बेमानी सा लगता है।  प्रेम कहानियो के नाम पर आज हम को दिल दहला देने वाली दास्ताने मिलती है। जहा प्रेम अपने अगले चरण तक पहुचता है मसलन शादी तक वहा भी वो यथार्थ के कडुवे सागर में विलीन हो जाता है। प्रेम या तो रुपहले परदे पे भला लगता है या तो मुंगेरीलाल की तरह मन के लैंडस्केप पर हसींन लगता है। इसके परे प्रेम एक वीभत्स अफ़साना सा है। जहा तथाकथित प्रेम मिला वहा भी तमाशा हुआ और जहा नहीं मिला वहा भी जिंदगानिया बर्बाद हुई। बहुत साल पहले मुंबई स्टेशन पर एक लड़की को ट्रैन से उतरते ही उसके प्रेमी ने चाक़ू घोप कर हत्या कर दी। इधर बीच कई खतरनाक ट्रेंड उभरे है प्रेमिका को सबक सिखाने के और उनमे से एक है तेज़ाब फ़ेंक देने का।  पता नहीं प्रेम का ये कौन सा सिद्धांत है कि प्रेमिका को प्रेम के नाम पे दिल दहला देने वाले तरीको से प्रताड़ित किया जाए !!

भारतीय सरकार ने एक कठोर कदम उठाते हुए इंडियन पेनल कोड में 326 A & 326 B दो नए प्रावधानों को जोड़ा जिसके तहत १० साल या उससे ऊपर तक के सजा की व्यवस्था है। ऐसे हादसों के शिकार लोगो को दो लाख रुपये तक के मुआवज़े का प्रावधान किया जो कि अपर्याप्त सा लगता है।  ऐसी घटनाएं ना किसी वर्ग विशेष तक सीमित है और ना ही ये किसी एक देश का मामला है। पाकिस्तान में एक संभ्रांत वर्ग (एलीट क्लास) से ताल्लुक रखने वाली एक महिला को उसके राजनीतिज्ञ पति ने तेज़ाब से इसलिए जला दिया क्योकि उसने तलाक माँगने की जुर्रत की। अब एक ही तरीका बचता है और वो है कि इनसे जुड़े कानूनों का सख्ती से पालन किया जाए, मुआवज़े की राशि बढ़ाई जाए और उसे पेंशन के समान किया जाए ताकि मेडिकल खर्च आसानी से वहन हो सके और ऐसे हादसों के शिकार लोगो को एक बेहतर स्पेस मिले जीवन जीने के लिए।

ये एक मार्मिक कविता पढ़ने को मिली जो पर्याप्त है ये बताने को कि ऐसे हादसों के शिकार लोगो पर क्या गुजरती है ! ये कविता मुझे सोशल मीडिया पे पहले पहल धीरेन्द्र पाण्डेय के मार्फ़त पढ़ने को मिली लेकिन यही कविता एसिड हमलो के प्रति जागरूकता प्रदान करने हेतु बनायी  गयी फेसबुक पेज पर भी प्रमुखता से पढ़ने को मिली।

***************************

चलो, फेंक दिया
सो फेंक दिया….
अब कसूर भी बता दो मेरा

तुम्हारा इजहार था
मेरा इन्कार था
बस इतनी सी बात पर
फूंक दिया तुमने
चेहरा मेरा….

गलती शायद मेरी थी
प्यार तुम्हारा देख न सकी
इतना पाक प्यार था
कि उसको मैं समझ ना सकी….

अब अपनी गलती मानती हूँ
क्या अब तुम … अपनाओगे मुझको?
क्या अब अपना … बनाओगे मुझको?

क्या अब … सहलाओगे मेरे चहरे को?
जिन पर अब फफोले हैं
मेरी आंखों में आंखें डालकर देखोगे?
जो अब अन्दर धस चुकी हैं
जिनकी पलकें सारी जल चुकी हैं
चलाओगे अपनी उंगलियाँ मेरे गालों पर?
जिन पर पड़े छालों से अब पानी निकलता है

हाँ, शायद तुम कर लोगे….
तुम्हारा प्यार तो सच्चा है ना?

अच्छा! एक बात तो बताओ
ये ख्याल ‘तेजाब’ का कहाँ से आया?
क्या किसी ने तुम्हें बताया?
या जेहन में तुम्हारे खुद ही आया?
अब कैसा महसूस करते हो तुम मुझे जलाकर?
गौरान्वित..???
या पहले से ज्यादा
और भी मर्दाना…???

तुम्हें पता है
सिर्फ मेरा चेहरा जला है
जिस्म अभी पूरा बाकी है

एक सलाह दूँ!
एक तेजाब का तालाब बनवाओ
फिर इसमें मुझसे छलाँग लगवाओ
जब पूरी जल जाऊँगी मैं
फिर शायद तुम्हारा प्यार मुझमें
और गहरा और सच्चा होगा….

एक दुआ है….
अगले जन्म में
मैं तुम्हारी बेटी बनूँ
और मुझे तुम जैसा
आशिक फिर मिले
शायद तुम फिर समझ पाओगे
तुम्हारी इस हरकत से
मुझे और मेरे परिवार को
कितना दर्द सहना पड़ा है।
तुमने मेरा पूरा जीवन
बर्बाद कर दिया है।

Source Attributed To Poem: The Facebook Page Named “Stop Acid Attacks‬” Informs That This Poem Is Outburst Of Girl Who Became Victim Of Acid Attack!

*****************************

शरीर ही जलता है! रूह बच जाती है!!

शरीर ही जलता है! रूह बच जाती है!!

Reference:
Law Commission India On Acid Attacks

India Today

Laws Related To Acid Attack In India

Wall Street Journal

Hindustan Times 

The Guardian

Pics Credit:

Pic One

Pic Two: Azhar Khan And Others

Learn To Embrace Sex And Sexuality In A Positive Way

Aavartan: A  research journal published from Gorakhpur, Uttar Pradesh, by Ishwar Saran Memorial Trust.

Aavartan: A research journal published from Gorakhpur, Uttar Pradesh, by Ishwar Saran Memorial Trust.

( First Published In Spring & Summer Edition Of  Aavartan, 2014. It’s A Research Journal Published From Gorakhpur, Uttar Pradesh)

India is melting pot of most beautiful philosophies. On one hand we have lofty themes embedded in Advaitic domain, which expand our limited consciousness, and on the other, we have principles related with Kama, explored beautifully in Vatsayana’s Kama Sutra. However, having said that, I must say we have strayed away from these concepts, leading to disturbed living patterns at various level of human existence. Neither we have been able to act as Grihastha (householder) nor able to emerge as a perfect Yogi. At this point, it’s better to stick to distortions that have trespassed into healthy sexual beliefs.

One should not forget that sex is a powerful force, which can even shake the beliefs of yogis lost in deep meditation. The stories of Indra sending Apsaras to distract the sages are quite well known- a fact which mythological TV serials have cashed-in so well! Osho comes to describe the impact of sexual power in his inimitable style. He says, “Ninety percent of our thinking is sexual. Whatsoever you are doing outside, inside sex is a constant concern – you may not even be aware of it. You are sitting in a room and a woman enters: your posture changes suddenly. Your spine is more erect, your breathing changes, your blood pressure is different. You may not be aware at all of what has happened, but your whole body has reacted sexually. You were a different person when the woman was not there; now again you are a different person.”

That’s being the case, it’s really baffling average human being has been taught to remain in denial mode about it. Now that’s not only strange but also a dangerous state of affair. It leads to unhealthy suppression of one of the most basic instincts. Why do we forget that such unhealthy denial would prove suicidal for the greater good of human society? It would only lead to negative manifestation of sexual energies. Worse, self-proclaimed Gurus in field of spirituality have created huge mess by proclaiming that sexual beliefs are obstacle in attainment of realization. Kama has been portrayed as villain. That’s not true. Had it been villain, it would not have attained a dignified position as one of the aims associated with Purusartha (aims considered vital for human existence). The truth is not what these commercial Gurus are preaching.  What we need to remember is that sex need to be enjoyed but not at the cost of cherished human values. It needs to be honoured but in a dignified way.

So now we come to an altogether different aspect. We are living in age of technological boom. Sexting is so common, pornographic materials are available at one click and women and men are now being hailed progressive in such matters, but still an enlightened understanding is missing. Mind you, bundle of information cannot ensure a conscious approach. We need a proper mindset, a proper approach to develop a mature understanding in this regard. This “mature understanding” is something which has not made its presence felt. It’s not going to come through titillating advertisement, wherein particular flavour of condom is being preferred. Nor it can be achieved by witnessing gyrating bodies in Bollywood movies. Most of the henious crimes we are witnessing have some sexual misconception as their primary cause. Imagine infants are being raped and even older women are also being raped! Rapes are not only about man exerting his power over woman in wrong way as preached by feminists, but it’s more about sexual miseducation.

Jeremy Seabrook, a prominent British author, expressing his concerns about sexual miseducation rightly states that “if it’s true that silence over sexuality risks blighting lives, it is certain that leaving instructions of the young in sexual matters to the free market is a disaster…..It is clear that new forms of ignorance can be conjured out of the very knowingness which the newly initiated into the secrets of sex they have gained.” If that sort of so-called knowledge about sex is lethal, one could easily imagine that restrictions imposed by society on having access to fulfillment of sexual desires would be cause of greater sorrow. That’s because digital era has made transfer of sexual knowledge and explicit images a very commonplace affair. So if you are not proving it smooth outlet, you are simply creating world of perverts. It’s hard to imagine how can tough laws ensure prevention of sex-related crimes? They can act as deterrent, leading to lesser number of crimes, but they cannot eliminate the desire.

Mahasatvaa Ma Ananda Sarita unfolds this dilemma more succinctly: “Because of the destructive idea propounded by some spiritual traditions, that spiritual fulfillment is only possible if one denies sex, there is a great lack of any kind of intelligent sexual education. And because our species’ survival depends on sex, of course our bodies make it a priority.” The message is loud and clear: Make room for sex in intelligent way. It’s better to channelize our sexual desires in conscious way, but, at the same time, not forsaking principles related with honourable life.

Ironically, in another arena, the law commission, the courts and law enforcing agencies do not see sex related crimes in wider aspect. They treat it as a sexual offence wherein a man is a “dangerous criminal” and woman the “most helpless victim”. Rape in my eyes is representative of the collective failure of the society! Rape is seen as one of the most heinous crimes, and, indeed, it should be the case. However, does that ensure one accused of such a crime be treated in barbaric manners. In a nation which cares damn about prison reforms, one can imagine that those found guilty of sexual crimes or under-trials are treated in most miserable way. They also conveniently forget that when laws were framed the situations were quite different. The attitude of women was not brazen as it has now become and when one says one is not suggesting that a woman’s modesty needs to be outraged simply because she dared to display bizarre traits. It’s being suggested to merely show the changes that have occurred with the passage of time, wherein vulnerability has increased due to many complex developments which until now were quite unknown to Indian society. Earlier, there was lesser generation of porn movies but now in USA almost 211 porn movies are being made in every week. Needless to state, the Asian countries offer great market. The point which I wish to prove is that in given scenario the way we look at sex and sex related crimes needs to change.

Sadly, the Indian landscape is marred by contradictions in this regard. It’s open to Reebok shoes, Ray Ban sunglasses and Wrangler Jeans, but it tries hard to ignore the impact of permissiveness, and licentiousness too, these items have unleashed. Why there is so much ambiguity when it comes to having a candid opinion regarding the worth of sex in Indian society? It’s high time we  have a proper mindset and clinical approach to deal with sex related crimes. Let’s not treat one guilty of sexual crime merely as “sick pervert” and treated to legal process in most cruel fashion, but subject him to greater reforms which help him emerge as good human being. We have borrowed from West so many lesser aspects, but failed to borrow their methodological approach encircling complex issues. One cannot emerge as good human being by merely highlighting on one’s T-shirt “Being Human” message.  One need to go beyond such cosmetic gestures.

It’s not merely enough that sex education gets introduced. There has to be a greater space for assimilation of sexual beliefs besides channelization of sexual desires. After all, celibacy is abnormal and outdated in both progressive and orthodox societies! For progressive thinkers it’s akin to introduction of Hindutva! Against this backdrop, the only path that remains is to provide space to unleash sexual desires. Is Indian society really prepared for that? However, the harsh truth is that it has no other way left. So let’s have proper sex education; introduce state-of-the-art sex clinics in villages and smaller cities to deal with sexual disorders/sex related diseases, and, above all, improvise the legal mechanism to deal with sex related crimes. It’s still marred by archaic methods. It’s never too late to give way to better ways, ideas and beliefs. Let’s accept the new changes in a wise way before the damage becomes irreparable!

List of Articles In Spring and Summer Edition, 2014.

List of Articles In Spring and Summer Edition, 2014.

  "Learn To Embrace Sex And Sexuality In A Positive Way"by Arvind K.Pandey; Aavartan, Spring & Summer Edition, 2014.

“Learn To Embrace Sex And Sexuality In A Positive Way”by Arvind K.Pandey; Aavartan, Spring & Summer Edition, 2014.

  "Learn To Embrace Sex And Sexuality In A Positive Way"by Arvind K.Pandey; Aavartan, Spring & Summer Edition, 2014.

“Learn To Embrace Sex And Sexuality In A Positive Way”by Arvind K.Pandey; Aavartan, Spring & Summer Edition, 2014.

  "Learn To Embrace Sex And Sexuality In A Positive Way"by Arvind K.Pandey; Aavartan, Spring & Summer Edition, 2014.

“Learn To Embrace Sex And Sexuality In A Positive Way”by Arvind K.Pandey; Aavartan, Spring & Summer Edition, 2014.

Spring and Summer Edition In PDF format:

Aavartan’s Spring And Summer Edition, 2014.

References:

Aavartan

Jeremy Seabrook: Article Titled “Sexual Miseducation”  

Mahasatvaa Ma Ananda Sarita: Paradigm Shift; Nov-Dec.2010

Osho’s Literature

The Politics Of Rape In India

Mulayam Singh Yadav: Sometimes even wrong people say right things!

Mulayam Singh Yadav: Sometimes even wrong people say right things!



In early 80s one of the popular Hindi flicks revolved around a sensational theme wherein a girl accused a boy of attempting to rape her when she got caught during the seduction stage. As a result of that false accusation, the boy became victim of deep psychological disorder for lifelong. Similarly, a blockbuster Hindi movie released in early 90s shows the protagonist teaching a fitting lesson to her ladylove, who tries to take a revenge by feigning rape! The protagonist makes her very clear that a lady should not stoop down at this level wherein a sexual offence becomes a weapon to settle personal grudges. Not a long back ago the Supreme Court refused to grant relief to a girl who had feigned rape, which led to trial of two innocent youths. They had to ‘suffer the ignominy’ of being involved in such a serious offence!

The Supreme Court in his verdict, without mincing words, stated that  ‘evil of perjury’ has assumed alarming proportions and, therefore, girl deserves no sympathy for maliciously setting the law in motion. “It was a settled position in law that so far as sexual offences are concerned, sanctity is attached to a victim’s statement and that the evidence of victim alone is sufficient for the purpose of conviction if it is found to be reliable, cogent and credible.” It’s ludicrous that an absurd hue and cry is being made over Mulayam Singh Yadav’s alleged rape remarks. Before entering into interpretation of his remarks, it would not be offensive to state that there are few takers, including myself, of type of caste-ridden politics played by Mulyam Singh Yadav, Lalu Yadav and Mayawati. They are icons of regressive tendencies in Indian politics, who never allowed their followers to truly embrace progressive ideals. That’s the reason why Uttar Pradesh is still struggling hard to emerge as a developed state!

One needs to be sufficiently cautious while interpreting remarks of Mulyam Singh Yadav. True, his statement “boys…make mistakes” need to be severely condemned as it trivializes the gravity of a serious offence like rape. However, that’s not the only remark he made. One of the flaws committed by Indian and foreign journalists is that they tend to rely more on sensationalism and as a result of that they misquote and misinterpret serious remarks. That’s not only against the spirit of ethics based journalism but such tendencies also lead to volatile situation in various circles of society. I am sure that an ace politician like Mulyam Singh Yadav would have got his intent right when he pointed out a disturbing trend in Indian society, wherein sexual offences have become a tool to serve vested interests.

 If law makers are truly interested in equity based legal system then their prime task should be to make laws gender neutral!

If law makers are truly interested in equity based legal system then their prime task should be to make laws gender neutral!

The mainstream media eager to cash-in-on the controversial remark failed to highlight the other portion of his speech wherein he stated that “those filing false reports will also be taken to task” so as to stop the misuse of anti-rape law. The mainstream media, controlled by the feminist forces, very shrewdly suppressed this part of the alleged speech. He was demanding a change in anti-rape law not because “boys make mistake” but because its misuse has attained alarming proportions: “Boys and girls fall in love but due to differences they fall apart later on. When their friendship ends, the girl complains she has been raped.” This statement needs to be interpreted in light of  scenario prevailing in present day Indian society marred by perverse tendencies even if one has no place for brand of politics played by likes of Mulayam and Mayawati! This time a wrong person has said a right thing. Why are we hell bent to ignore a harsh reality of present age wherein women are not hesitant to put at stake their own dignity if that suits their interests?
 

Interestingly, cinema is said to be the mirror of society. The filmmakers were far ahead unlike the lawmakers, having their mindset caught in time-warp, in anticipating the disturbing changes in approach of modern Indian women. Unlike the lawmakers who remained glued to perception of “abla nari” (a woman is too innocent and weak to commit any wrong), the filmmakers were bold enough to depict newer trends emerging among women fraternity (refer to movies like Undertrial, Aitraaz, Corporate and etc.). It’s a very recent phenomenon that Supreme Court has taken cognizance of misuse of dowry laws besides being worried about growing trend of perjury cases while dealing with sexual offences. However, it’s quite ironical and travesty of present day grim tendencies that new anti-rape law has no place for gender-neutral provisions. That’s quite shocking. That means law still believes that only men could be perpetrators! How long are the lawmakers going to behave like ostriches having their heads buried in sand?

Needless to state that nobody is suggesting, or rather no one wants that people guilty of sexual offences of serious types should remain above stringent punishment. However, at the same time, it’s also pertinent that fair sex involved in  unfair practise of misusing laws should not be allowed to get off scot free. At the same time if law makers are truly interested in equity based legal system then their prime task should be to make laws gender neutral. What’s the point in nurturing illusions of medieval ages? They need to take clue from filmmakers, who are at least honest enough to portray real face of Indian society as it is (even if they do so to ensure flow of cash)! And the journalistic circle should better restrain themselves from viewing everything from political angle. That would augur well for the welfare of Indian society. The media should be more governed by truth than by falsehood, confusion, and twisted truth sponsored by the corrupt feminist forces! It’s really pathetic that biased mainstream media is averse to anything remotely serving the cause of men and is quick to nasty interpretations of well-meaning sentiments. And it’s even more sadder to notice that even social media remained concentrated on personal attacks rather than framing a more logical perspective!

Justice Dhingra: New Anti-rape law could be misused!

Justice Dhingra: New Anti-rape law could be misused!

References:

The Times of India

New York Daily News

Anti-rape law

False Rape Case

Supreme Court On Misuse of Rape Law

Pics Credit:

Pic One

Pic Two

Pic Three

Is Aadhaar (Unique Identification Number) Too Dangerous?

Aadhaar: A Gate To Disaster?

Aadhaar: A Gate To Disaster?

 

The Aadhaar project started with great fanfare, but it’s now on the verge of meeting an untimely death. It became the converging point of great expectations, to an extent that it was hailed as image of “new and modern India”. That’s why  it created great chaos among middle classes, which like always, showed vain excitement to have it by hook or by crook, bothering least about the pros and cons of owning unique identity (UID). This project, bearing close resemblance to similar scheme in United Kingdom, was mired in contradictions right from the beginning. On the top of it, continuous conflicting statements from government, regarding its utility, kept the average mass guessing about its actual worth.

It needs to be informed that several experts in the West have already given enough signals that such project of this type having sensitive data based on biometrics could be used in a wrong way. In fact, they could be used to eliminate and target a large community not serving the interest of people in power. However, in countries like India, where we know how government agencies function, it’s always a great possibility that data could be misused, even if there is no such threat of this magnitude as apprehended by experts in West. It would be interesting to know that similar project in United Kingdom met tough resistance on part of British citizens for many years, which left British government with no other option other than to quash it. A report prepared by London School of Economics made mockery of  tall claims made by the government about its significance and it revealed that “biometrics was not a reliable method of de-duplication.”

However, neither the government nor Nandan Nilekani made Indian citizens aware of such serious flaws inherent in this project. On the contrary, it created tension by giving the impression that not owning it meant losing benefits and subsidies involved in various government run schemes. Ironically, just visit any camp where Aadhaar cards are being prepared and one would be taken aback by the mess which prevails there. It’s hard to believe that government has enough will power (forget about enough infrastructure)  to keep the data safe! I am sure ones whose data get stored either in wrong way or with wrong sorts of details would definitely face huge issues in coming days. Even at infrastructure level, the picture that emerges is quite threatening since its budget has increased phenomenally from nearly 32 billion rupees to over 88 billion rupees for coming phases.

That’s why Supreme Court’s judgement came as a whiff of fresh air. It directed the government not to make it mandatory for Indian citizens, and that it could not be a ground to deny services introduced by government. Above all, it made it clear that details collected by Unique Identification Authority of India (UIDAI) would not be shared by it with any other government agency without prior permission of the concerned individual. At this point, it would not be out of place to refer to Social Security Number (SSN) used in USA, which does not compromises with right to privacy. The most shocking thing is that despite strict provisions there to stop identity theft such cases keep happening there leading to huge revenue loss. Now imagine the state of affairs in India where rules can be easily manipulated to benefit the vested interests! Who would guarantee that data protection and privacy would always remain a top priority in India?

The Supreme Court made this observations in PIL filed by retired Karnataka High Court judge Justice KS Puttaswamy and Maj Gen (retd) SG Vombatkere which dealt with constitutional validity of Aadhaar. As per their counsel even if there was any statute to provide validity to this project, it would still be violation of Fundamental Rights under Articles 14 (right to equality) and 21 (right to life and liberty) of the Constitution. The project facilitating surveillance of individuals was a direct assault on the dignity of any individual. The main arguments rested upon these concerns: “…the (Aadhaar) project is also ultra vires because there is no statutory guidance (a) on who can collect biometric information; (b) on how the information is to be collected; (c) on how the biometric information is to be stored; (d) on how throughout the chain beginning with the acquisition of biometric data to its storage and usage, this data is to be protected; (e) on who can use the data; (f) on when the data can be used.” (As quoted in moneylife)

In fact, Goa case had already made it clear how could biometric data be used against the interests of any individual. In this case UIDAI had challenged  a decision of Goa Bench of Bombay High Court. It had  asked it to share biometric data with the Central Bureau of Investigation (CBI) so that the case involving gang rape of a seven year old girl in Vasco reached to its logical culmination.

Anyway, the Supreme Court’s decision to not to make it mandatory is enough to make Indian citizens heave a sigh of relief. It’s high time that before government embarks upon sensitive project it needs to take enough measures to ensure its appropriateness, relevance and significance quite well.

How will it keep intact the privacy of an individual in such a huge country devoid of infrastructure?

How will it keep intact the privacy of an individual in such a huge country devoid of infrastructure?

आमिर खान: गम्भीर समस्याओ को समोसा चटनी न बनाये तो बेहतर होगा!

देश की फिक्र के लिए क्या बस ऐसे ही लोग मिले थें?

देश की फिक्र के लिए क्या बस ऐसे ही लोग मिले थें?

मुझे सत्यमेव जयते कार्यक्रम के फॉर्मेट से बेहद आपत्ति है. इस तरह के कार्यक्रम जटिल समस्यायों को सिर्फ समोसा -चटनी के सामान चटपटा बनाकर पेश करने का माध्यम बन गए है. इस से गम्भीर समस्या के और जटिल संस्करण उभर के आते है. आमिर टाइप के कलाकारो का क्या नुक्सान हुआ? कुछ नहीं: महँगी फीस बटोरो और तथाकथित जागरूक इंसान का अपने ऊपर ठप्पा लगवाकर चलते बनो और जा पहुचो देश की फिक्र करने किसी कोक-शोक की दूकान पर. ठेस और चोट उनको पहुचती है जिनकी संवेदनशीलता का भद्दा मजाक बनाकर इस तरह के कार्यक्रम सफलता के पायदान चढ़ते है. आमिर टाइप के लोग कलाकारी अगर बड़े परदे पर करे वही उनको शोभा देता है. गम्भीरता का पुतला बनने की कोशिश छोड़ दे. कम से कम आमिर टाइप के कलाकार ये कोशिश ना ही करे तो बेहतर होगा.

संवेदनशील मुद्दो की या देश की फिक्र करने के लिए इस देश में वास्तविक गम्भीर दिमागो की कोई कमी नहीं. फिर ये समझ से परे है कि दूरदर्शन जैसे सम्मानित सरकारी माध्यम क्यों इस तरह के सतही लोगो को गम्भीर मुद्दो पर विचार विमर्श करने के लिए बुलवाते है? एक बात और समझना बेहद जरूरी है: क्या गम्भीर समस्याओ को ग्लैमरस रूप देना जरूरी है? क्या यही एक सार्थक तरीका बचा है गम्भीर मुद्दो के साथ न्याय करने का? कुल मिला कर इस बात को महसूस करना बेहद जरूरी है कि अगर आप वाकई देश की फिक्र करते है तो उनका सम्मान करे जो सम्मान के योग्य है. इनको बुलाये और ये आपको बताएँगे कि किसी संवेदनशील मुद्दे पर क्या रूख रखना चाहिए. और अगर सही लोगो को बुलाकर चीज़ो को सही सन्दर्भ में समझने का धैर्य नहीं है तो कम से कम आमिर जैसे लोगो को बुलाकर गम्भीरता का मज़ाक ना बनवाये. इतना तो किया जा सकता है कि नहीं?

 अगर सही लोगो को बुलाकर चीज़ो को सही सन्दर्भ में समझने का धैर्य नहीं है तो कम से कम आमिर जैसे लोगो को बुलाकर गम्भीरता का मज़ाक ना बनवाये। इतना तो किया जा सकता है कि नहीं?

अगर सही लोगो को बुलाकर चीज़ो को सही सन्दर्भ में समझने का धैर्य नहीं है तो कम से कम आमिर जैसे लोगो को बुलाकर गम्भीरता का मज़ाक ना बनवाये। इतना तो किया जा सकता है कि नहीं?

पिक्स क्रेडिट:

तस्वीर प्रथम

कांची के शंकराचार्य की रिहाई इस बात को दर्शाती है कि वर्तमान समय में दुष्प्रचार ज्यादा ताकतवर है बजाय सत्य के!

कांची के शंकराचार्य अंततः निर्दोष और निष्पाप होकर उभरे लेकिन इस नौ साल लम्बे ड्रामे की वजह से इस अति प्राचीन हिन्दू मठ पर जो दाग लगे उसको मिटने में कई वर्ष लगेंगे.

कांची के शंकराचार्य अंततः निर्दोष और निष्पाप होकर उभरे लेकिन इस नौ साल लम्बे ड्रामे की वजह से इस अति प्राचीन हिन्दू मठ पर जो दाग लगे उसको मिटने में कई वर्ष लगेंगे.


इस नए युग के इंडिया यानि “भारत” के अगर हाल के घटनाओ को देखे तो ये आसानी से समझ आ जाएगा कि धर्मनिरपेक्ष सरकारो ने सबसे ज्यादा जुल्म ढाया है हिन्दू संतो पर. ये धर्मनिरपेक्ष सरकारे मुग़लकाल के बाद्शाहो और ब्रिटिश काल के शासको से भी ज्यादा क्रूर रही है हिन्दू धर्मं से जुड़े प्रतीकों को ध्वस्त करने और इनसे जुड़े लोगो को अपमानित करने के मामले में. हिन्दू संतो को निराकरण ही प्रताड़ित किया जा रहा है और इन्हे यौन अपराधो से लेकर देशद्रोह जैसे जघन्य अपराधो में बेवजह घसीटा जा रहा है. बिकी हुई मीडिया इन प्रकरणो का एक पक्ष 
दिखाती  है अपने देश में और देश के बाहर विदेशी अखबारो में. ये आपको अक्सर देखने को मिलेगा कि इस प्रकार के खबरो में ज्यादातर झूठ होता है या अर्धसत्य का सहारा लेकर एक भ्रामक कहानी गाढ़ी जाती है. कोई भी मुख्यधारा का समाचार पत्र तस्वीर के दोनों पहलू दिखाने में दिलचस्पी नहीं रखता.

एक सबसे बड़ी वजह ये है कि ज्यादातर  भारतीय मीडिया समूह का कण्ट्रोल विदेशी ताकतो के हाथो में है. सबके विदेशी हित कही ना कही शामिल है तब हम किस तरह से इनसे ये आशा रखे कि ये सच बोलेंगे? ये वही मुख्यधारा के समाचार पत्र है जो साध्वी प्रज्ञा के गिरफ्तारी को तो खूब जोर शोर से दिखाते है लेकिन साध्वी के साथ जेल के अंदर हुए अमानवीय कृत्यो को जो बंदियो के अधिकारो का सरासर उल्लंघन था उसको दिखाने या बताने से साफ़ मुँह मोड़ गए. ये वही मुख्यधारा के समाचार पत्र है जिन्होंने देवयानी प्रकरण में देवयानी का साथ इस तरह से दिया जैसी कि उसने भारत के नाम विदेशो में ऊँचा किया हो, जैसे उसने कोई जुर्म ही नहीं किया हो. वो इसलिए से क्योकि इसका सरकार से सीधा सरोकार है और सिस्टम इसके पक्ष में है लेकिन हर वो आदमी जिसने भी सरकार ये सिस्टम के विपक्ष में कुछ कहा उसे इस तरह की  सरकारे या सिस्टम सुनियोजित तरीको से अपराधी घोषित कर देता है.

ये कहने में कोई संकोच नहीं कि आज के युग मे सत्य से ज्यादा असरदार किसी के खिलाफ सुनियोजित तरीके से फैलायी गयी मनगढंत बाते है. समाचार पत्रो का काम होता है सत्य को सामने लाना सही रिपोर्टिंग के जरिये लेकिन हो इसका ठीक उल्टा रहा है: मीडिया आज सबसे बड़ा हथियार बन गयी है झूठ और भ्रम को विस्तार देने हेतु. इसका केवल इतना काम रहा गया है कि हर गलत ताकतो को जो सत्ता में है उनको बचाना, उनको बल देना. एक बाजारू औरत की तरह अपनी निष्ठा को हर बार बदलते रहना मीडिया का एकमात्र धर्मं बन गया है. साधारण शब्दो में ये सत्ता पे आसीन शासको की भाषा बोलता है. कांची के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी की गिरफ्तारी के प्रकरण के रौशनी में इस प्रकरण को देखे जिन्हे २००४ में बेहद शर्मनाक तरीके से शंकर रमण के हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था. शंकर रमण कांची के एक मंदिर में मैनेजेर थें. उस वक्त के तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने अपने को धर्मनिरपेक्ष साबित करने के लिए और ये जताने के लिए कि कानून से ऊपर कोई नहीं होता इनकी गिरफतारी सुनिश्चित की. कांची के शंकराचार्य के ऊपर “आपराधिक षड्यंत्र, अदालत को गुमराह करने गलत सूचना के जरिये, धन का आदान प्रदान आपराधिक गतिविधि को क्रियांवित करने के लिये” आदि आरोप लगाये गए.

इस एक हज़ार साल से भी ऊपर अति प्राचीन ब्राह्मणो के अत्यंत महत्त्वपूर्ण केंद्र के मुख्य संचालक को इस तरह अपमानजनक तरीके से एक दुर्दांत अपराधी के भांति गिरफ्तार करना और फिर मुख्यधारा के समाचार पत्रो के द्वारा अनर्गल बयानो के आधार पर उनको दोषी करार कर देना अपने आप में मीडिया की सच्चाई बयान कर देता है. ये बता देना आवश्यक रहेगा कि कांची कामकोटि पीठ हिन्दुओ का अति प्राचीन मठ है जिसको हिन्दू समुदाय में दुनिया भर में बेहद श्रद्धा के साथ देखा जाता है. कांची के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी बहुत सम्मान की दृष्टि से देखे जाते रहे है हिन्दू शास्त्रो के मर्मज्ञ होने के कारण. इन्होने  नवी शताब्दी में स्थापित कांची कामकोटि पीठ के गरिमा को नयी ऊंचाई प्रदान की, जिसकी हिन्दू समुदाय में वेटिकन चर्च सरीखी पकड़ है. जयललिता और ब्राह्मण विरोधी नेता डीएमके प्रमुख करूणानिधि के आपसी मतभेदों के चलते इस हिन्दू मठ के माथे पर कालिख लग गयी.

 ये बता देना आवश्यक रहेगा कि कांची कामकोटि पीठ हिन्दुओ का अति प्राचीन मठ है जिसको हिन्दू समुदाय में दुनिया भर में बेहद श्रद्धा के साथ देखा जाता है. कांची के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी बहुत सम्मान की दृष्टि से देखे जाते रहे है हिन्दू शास्त्रो के मर्मज्ञ होने के कारण. इन्होने  नवी शताब्दी में स्थापित कांची कामकोटि पीठ के गरिमा को नयी ऊंचाई प्रदान की, जिसकी हिन्दू समुदाय में वेटिकन चर्च सरीखी पकड़ है. जयललिता और ब्राह्मण विरोधी नेता डीएमके प्रमुख करूणानिधि के आपसी मतभेदों के चलते इस हिन्दू मठ के माथे पर कालिख लग गयी.

ये बता देना आवश्यक रहेगा कि कांची कामकोटि पीठ हिन्दुओ का अति प्राचीन मठ है जिसको हिन्दू समुदाय में दुनिया भर में बेहद श्रद्धा के साथ देखा जाता है. कांची के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी बहुत सम्मान की दृष्टि से देखे जाते रहे है हिन्दू शास्त्रो के मर्मज्ञ होने के कारण. इन्होने नवी शताब्दी में स्थापित कांची कामकोटि पीठ के गरिमा को नयी ऊंचाई प्रदान की, जिसकी हिन्दू समुदाय में वेटिकन चर्च सरीखी पकड़ है. जयललिता और ब्राह्मण विरोधी नेता डीएमके प्रमुख करूणानिधि के आपसी मतभेदों के चलते इस हिन्दू मठ के माथे पर कालिख लग गयी.

उस वक्त के प्रमुख समाचार पत्रो ने ये दर्शाया कि पुलिस इस तरह से गिरफ्तार करने का साहस बिना पुख्ता सबूतो के कर ही नहीं सकती. उस वक्त अभियोजन पक्ष के वकील इस बात से पूरी तरह आश्वस्त थे कि शंकराचार्य को दोषी साबित करने के लिए उनके पास पर्याप्त पुख्ता सबूत थें. विवेचना अधिकारी प्रेम कुमार का ये बयान प्रमुखता से छपा कि हमारे पास ठोस साक्ष्य है स्वामी जयेन्द्र सरस्वती के खिलाफ और ये कि शंकर रमण और इनके बीच करीब चार सालो से आपसी मनमुटाव था जिसको सिद्ध करने के लिए पर्याप्त सबूत इकठ्ठा किये जा रहे है.

खैर ईश्वर के यहाँ देर भले हो पर अंधेर नहीं है. सत्य की अंततः विजय हुई जब पांडिचेरी की विशेष अदालत ने सत्ताइस नवंबर २०१३ को उन सभी लोगो को जो शंकर रमण हत्याकांड में आरोपी बनाये गए थें उनको बाइज्जत बरी कर दिया. इसी के साथ नौ साल से हो रहे ड्रामे का पटाक्षेप हो गया. उन पर लगाये गए सभी आरोपो से उन्हें मुक्त कर दिया गया. जितने भी प्रमुख गवाह थें उन्होंने अभियोजन पक्ष के वर्णन को समर्थन देने से इंकार कर दिया। अभियोजन पक्ष के विरोध में करीब ८० से अधिक गवाहो ने अपने बयान दर्ज कराये।

कांची के शंकराचार्य अंततः निर्दोष और निष्पाप होकर उभरे लेकिन इस नौ साल लम्बे ड्रामे की वजह से इस अति प्राचीन हिन्दू मठ पर जो दाग लगे उसको मिटने में कई वर्ष लगेंगे. हिन्दुओ के आस्था और प्रतीक के साथ जो बेहूदा मजाक हुआ उसके निशान कई वर्षो तक संवेदनशील मनो को कटोचते रहेंगे. लेकिन हिन्दू ब्राह्मण के उदार मन को देखिये कि इतना होने के बाद भी किसी के प्रति कोई कटुता नहीं. इस परिपेक्ष्य में शंकराचार्य के वक्तव्य को देखिये जो उन्होंने बरी होने के बाद दिया: ” धर्म की विजय हुई. सत्य की जीत हुई. सब कुछ खत्म हो जाने के बाद अंत में केवल यही बात मायने रखती है. मुझे मेरे गुरु ने सब कुछ सहन करने को कहा है. इसलिए ये कहना उचित नहीं होगा कि हालात मेरे लिए असहनीय थें. हा कुछ दिक्कते जरूर आयी वो भी उस वजह सें कि हम लोग नयी तरह की परिस्थितयो का सामना कर रहे थें. हमने पूर्व में देखा है कि किस तरह आक्रमणकारियों ने हिन्दू मंदिरो पर हमले कर उनको विध्वंस किया। आज जब हम मंदिरो पर पड़े उन हमलो की निशानियाँ देखते है तो  हमे वे आक्रमणकारी और उनकी क्रूरता याद आती है. आज जो कुछ भी मठ के साथ हुआ ( मेरे पर जो  आरोप लगे) वे बहुतो की नज़र में पूर्व में किये गए आक्रमणकारियों के द्वारा किये गए विध्वंस सरीखे ही है.”

ये बहुत दुःख की बात है कि जैसे ही किसी हिन्दू संत पर कोई आरोप लगते है सारे मुख्यधारा के मीडिया समूह उस संत को बदनाम करने की कवायद में जुट जाते है पूरी ताकत से इस बात से बिल्कुल बेपरवाह होकर कि मीडिया का मुख्य काम किसी भी घटना की सही-२ रिपोर्टिंग करनी होती है ना कि न्यायिक ट्रायल करना। उससे भी बड़ी बिडम्बना ये है कि अगर संत पर लगे आरोप निराधार और झूठे पाये जाते है तो जो अखबार या फिर न्यूज़ चैनल आरोप लगने के वक्त पूरे जोर शोर से संत को दोषी ठहरा रहे थे वे ही अखबार और न्यूज़ चैनल पूरी तरह से कन्नी काट लेते है. संत को बेगुनाह साबित करने वाली खबर कब आती है और कब चली जाती है ये पता भी नहीं चलता है. यही वजह है कि कांची के शंकराचार्य की बेगुनाही और बाइज्ज़त बरी होना किसी भी शीर्ष अखबार के सुर्खियो में नहीं आया. शायद सेकुलर मीडिया ने ये सोच कर इस खबर को प्रमुखता से नहीं बताया क्योकि हिन्दुओ से जुडी कोई भली खबर सेक्युलर भावना के विपरीत होती है!

मेनस्ट्रीम मीडिया को प्रोपगेंडा ज्यादा रास आता है बजाय सत्य के. सेक्युलर ताकतो ने और इनके द्वारा संचालित मीडिया समूहो ने कांची के शंकराचार्य के गिरफ्तारी के वक्त ये बहुत जोरदार तरीके से ये दर्शाया कि कोई भी कानून से ऊपर नहीं होता. तो क्या यही सेक्युलर ताकते जो कानून की बात करती है शाही ईमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी को गिरफ्तार करने की हिम्मत रखते है जिन पर कई धाराओ में देश के विभिन्न थानो में एफ आई आर दर्ज है? क्या यही सेक्युलर ताकते उन क्रिस्चियन मिशनरीज को बेनकाब करने की ताकत रखती है जो देश के पिछड़े और दूर दराज के इलाको में लोगो को बहला फुसला कर उनका धर्म परिवर्तन कर रही है? लेकिन ये सबको पता है कि सेक्युलर मीडिया ऐसा कभी नहीं करेगा. ऐसा इसलिए कि इन सेक्युलर लोगो की निगाह में कानून के लम्बे हाथ केवल हिन्दू संतो के गर्दन तक पहुंचती है. ये हिन्दू संतो को केवल बदनाम करने तक ही सीमित है और हिन्दू आस्था को खंडित और विकृत करने भर के लिए है. ये दुष्प्रचार के समर्थक है सत्य के नहीं.

हिन्दू संत अपनी जाने गंवाते रहे है लेकिन ये खबरे कभी भी सेक्युलर मीडिया की सुर्खिया नहीं बनी. ये स्वामी लक्ष्मणानन्द जी की तस्वीर है जिनकी हत्या क्रिस्चियन ताकतो ने कर दी थी.

हिन्दू संत अपनी जाने गंवाते रहे है लेकिन ये खबरे कभी भी सेक्युलर मीडिया की सुर्खिया नहीं बनी. ये स्वामी लक्ष्मणानन्द जी की तस्वीर है जिनकी हत्या क्रिस्चियन ताकतो ने कर दी थी.


References:

IBN Live

The Hindu

The Hindu

Wiki


Pics Credit:

Pic One

Pic two

Pic Three

खुर्शीद अनवर की आत्महत्या: समाज, कानून और मीडिया के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा!

गम्भीर मुद्दा ये है कि सतही मीडिया ट्रायल के चलते जिस भीषण मानसिक कष्ट से गुजरना होता है और जो सरेआम अपमान सहन करना पड़ता है क्या उसका कोई अस्तित्व नहीं? क्या इसका कोई मोल नहीं? क्या ये बिलकुल उपेक्षित कर देने वाली बात है?

गम्भीर मुद्दा ये है कि सतही मीडिया ट्रायल के चलते जिस भीषण मानसिक कष्ट से गुजरना होता है और जो सरेआम अपमान सहन करना पड़ता है क्या उसका कोई अस्तित्व नहीं? क्या इसका कोई मोल नहीं? क्या ये बिलकुल उपेक्षित कर देने वाली बात है?


खुर्शीद अनवर की आत्महत्या कई गम्भीर सवाल खड़े कर गयी आज के समाज के बारे में, पत्रकारिता के स्तर के बारे में और कानून के उपयोग और दुरुपयोग के सन्दर्भ में. खुर्शीद अनवर एक प्रसिद्ध सामजिक कार्यकर्ता थें जो नई दिल्ली में इंस्टिट्यूट फॉर सोशल डेमोक्रेसी नाम की संस्था चलाते थें. इसके अलावा वे जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय के छात्र भी थें. खुर्शीद अनवर ने पिछले साल १८ दिसम्बर २०१३ को आत्महत्या कर ली थी जब उनपे एक मणिपुरी औरत ने  अपने साथ दुष्कर्म का आरोप लगाया था. ये खबर कुछ एक समाचार चैनलों पर प्रमुखता से दिखायी गयी और इसके बाद सोशल नेटवर्किंग साईटस पर अंतहीन बहस छिड़ गयी. पहले तो खुर्शीद इस आरोप से हिल गए और इसके बाद मीडिया चैनलो द्वारा कीचड़ उछालने के बाद सदमे से ग्रस्त खुर्शीद ने आत्महत्या कर ली. बाद में उनके पास से बरामद सुसाइड नोट में इस बात का उल्लेख था कि मणिपुरी लड़की के साथ उन्होंने बलात्कार नहीं किया था बल्कि आपसी सहमति से शारीरिक सम्बन्ध बनाये थे.

इस घटना ने मुझे श्रीनिवास सिरास के आत्महत्या की याद दिला दी जो प्रोफेसर थे अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में. इस प्रकरण में न्यूज़ चैनलो नें इस प्रोफेसर के निजता के साथ खिलवाड़ किया था और उनकी गोपनीयता को सरेआम उजागर करके उनके समलैंगिक सम्बन्धो को विकृत स्वरूप दे दिया था. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस प्रकरण में सुनवाई करते हुए प्रोफेसर को थोड़ी राहत प्रदान की थी पर मीडिया चैनलो द्वारा की गयी गुस्ताखी उन पर भारी पड़ गयी और उन्होंने आत्महत्या कर लिया. कोर्ट इस तरह के मीडिया ट्रायल पर अक्सर चेतावनी देती रही है पूर्व में कि न्यूज़ चैनल जब केस ट्रायल स्टेज में हो तो किसी भी निष्कर्ष पर अपनी तरफ से पहुचने की हड़बड़ी ना दिखाए और न्यायालय की कार्यवाही को प्रभावित करने की कोशिश ना करे लेकिन बड़े कॉर्पोरेट संस्थानो द्वारा संचालित ये न्यूज़ चैनल न्यायालय के द्वारा इन पारित आदेश को सिर्फ कागज़ का एक टुकड़ा समझते है और उन्हें किसी प्रकरण में निहित संवेदनशीलता से कुछ नहीं लेना देना होता सिवाय इसके कि उसका माखौल किस तरह उड़ाया जाए. ये सही है मीडिया ट्रायल एक जटिल मुद्दा है लेकिन उससे बड़ा सच ये है कि सनसनीखेज मीडिया ट्रायल के चलते किसी के इज्जत और उसके आत्मसम्मान के साथ जो खिलवाड़ होता है और इससे जो अपूर्णीय क्षति होती है उसकी भरपाई असंभव होती है. मीडिया  किसी दोषी व्यक्ति के अधिकारो के हमेशा अतिक्रमण करती आयी है और समय आ गया है कि सही तथ्यात्मक रिपोर्टिंग और रिपोर्टिंग जो गलत इरादो से की गय़ी हो सिर्फ न्यूज़ चैनल के टी आर पी या फिर अखबार की बिक्री बढ़ाने के उद्देश्य से की गयी हो दोनों में एक स्पष्ट रेखा का निर्धारण हो.

“सनसनीखेज रिपोर्टिंग तो हमेशा होगी क्योकि सनसनीखेज घटनाये भारत में हमेशा रहती है. सुप्रीम कोर्ट इस पर लगाम लगाने में असमर्थ है. ये सही है कि रिपोर्टिंग सही होनी चाहिए पर इसका ये मतलब निकालना कि ये मीडिया के द्वारा ट्रायल है एक निन्दात्मक अभिव्यक्ति है. कोर्ट या किसी के पास कोई स्पष्ट मापदंड नहीं है जो ये निर्धारित कर सके कि मीडिया ट्रायल क्या होता है.” (सीनियर अधिवक्ता राजीव धवन, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया). खैर इस बात से इंकार करना असम्भव है कि मीडिया के द्वारा किसी भी दोषी व्यक्ति के अधिकारो का हनन और किसी के भी निजता के साथ खिलवाड़ करने के कृत्य का अपने तरफ से दूषित स्पष्टीकरण कोई भी मतलब नहीं रखता। ये सिर्फ एक व्यर्थ का  प्रलाप होता है, बेवजह अपने को सही ठहराना होता है. उसकी स्पष्टीकरण से उस अपूर्णीय क्षति की भरपाई असम्भव है जो इस वजह से होती है. इन दोनों प्रकरणो में दो व्यक्ति ने अपनी जान ले ली इस वजह से और अब हम ये कभी नहीं जान पाएंगे कि सच्चाई क्या थी. क्या ये दो जाने वापस मिल जाएंगी? क्या खोया सम्मान वापस मिलेगा? शायद कभी नहीं।

वरिष्ठ पत्रकार सईद नक़वी शायद सच के ज्यादा करीब है जब ये कहते है कि “पत्रकारिता में शायद निष्कर्षो पर पहुचने की हड़बड़ी है. ये उसी दिन किसी को मुजरिम ठहरा देता है जिस दिन किसी पे आरोप लगते है, इसके पहले कि कोर्ट किसी बात का निर्धारण करे. ये बहुत दुखी कर देने वाली बात है. कैसे मीडिया इतनी जल्दीबाज़ी में किसी निष्कर्ष पर पहुच सकती है और किसी को इतनी हड़बड़ी में दोषी करार दे सकती है? मीडिया को इस बात का इन्तजार करना चाहिए कि कम से कम प्राथमिक रिपोर्ट तो दर्ज हो, कम से कम जांच तो पूरी हो जाए” (डी एन ए न्यूज़ रिपोर्ट) ये बिलकुल चकित कर देने वाली बात है कि मीडिया कभी भी इस तरह के सनसनीखेज मीडिया ट्रायल के दौरान अपूर्णीय क्षति और इनके अंजामो के बारे में कभी भी ईमानदारी से आकलन नहीं करती. गम्भीर मुद्दा ये है कि सतही मीडिया ट्रायल के चलते जिस भीषण मानसिक कष्ट से गुजरना होता है और जो सरेआम अपमान सहन करना पड़ता है क्या उसका कोई अस्तित्व नहीं? क्या इसका कोई मोल नहीं? क्या ये बिलकुल उपेक्षित कर देने वाली बात है? ये बिलकुल स्पष्ट है कि मीडिया ट्रायल अधिकतर एकतरफा, भ्रामक और तथ्यो के साथ खिलवाड़ होता है जिसमे इस बात की बिलकुल परवाह नहीं की जाती कि कम से कम तथ्यो के असलियत का तो निर्धारण कर लिया जाए सूक्ष्मता से.

इस पूरे प्रकरण में दो बहुत गम्भीर पहलू शामिल है. पहला तो ये कि ये समाज के इस विकृत बदलाव को दर्शाता है कि समाज में हड़बड़ी में निष्कर्षो पर पहुचने की लत लग गयी है अधकचरे दिमाग के साथ. इसे चाहे वो प्रशंसा  हो या फिर आलोचना दोनों को बिना किसी आधार के आत्मसात करने की आदत सी हो गयी है. ना आलोचना का स्तर विकसित हो पाया और ना ही प्रशंसा के आयाम निर्धारित हो पाये. आलोचना अगर हो रही है तो तो वो भी तब जब कि कोई भी तथ्यात्मक या तार्किक आधार आलोचना के पक्ष में मौजूद नहीं है. दूसरा पक्ष ये है कि जिन कानूनो को स्त्री की अस्मिता की रक्षा करने के लिए बनाया गया है वे अब निर्दोष लोगो को प्रताड़ित करने का अस्त्र बन गए है. ये कितने तकलीफ की बात है कि जहा किसी स्त्री के सेक्सुअल हरस्मेंट का मामला उभरता है वही पे समाज का एकपक्षीय भेदभाव ग्रस्त दिमाग उभर कर सामने आ जाता है और मीडिया हमेशा की तरह दोषी के ऊपर हर तरह का लांछन जड़ देता है और इसके पहले वो अपने बेगुनाही को साबित करे वो मुजरिम साबित करार कर दिया जाता है. ये सर्वविदित है कि जो नए कानून की परिभाषा है सेक्सुअल हरस्मेंट को रोकने कि उसके प्रावधान इस तरह के है कि आप तकरीबन मुजरिम ही है और इस बात को गौण कर दिया गया है कि आप के पास भी बचाव के सही रास्ते होने चाहिए. और सबसे घातक ये है कि एकतरफा मीडिया ट्रायल शुरू हो जाने के बाद जो उसके पास अपने को बचाने के जो रास्ते होते है वे भी बंद हो जाते है क्योकि मीडिया आपके विपक्ष में माहौल खड़ा कर देता है हर तरफ.

“भारत में और अन्य देशो में जहा इस तरह के कानून पास हुए है औरतो के साथ होने वाले अपराधो को रोकने के लिए उसमे बर्डेन ऑफ़ प्रूफ को सुनियोजित तरीके से बदल दिया गया है. अब दोषी के ऊपर ये जिम्मा है कि वे अपनी निर्दोषता साबित करे. ये परिवर्तन निहित रूप से बहुत गलत है पर शायद ये इसलिए किया गया है कि ताकि इन प्रकार के अपराधो में स्त्री के पास सामान स्तर के अवसर हो अपने साथ हुए अन्याय के भरपाई के लिए. लेकिन जो अब नए कानून बने है सेक्सुअल हरस्मेंट रोकने के लिए उसमे ये बर्डन ऑफ़ प्रूफ इस सख्त स्वरूप में है कि जहा दोषी (पुरुष) के पास बचाव के सारे रास्ते बंद हो जाते है. अगर एक बार आप पर आरोप लगे तो इस बात की सम्भावना कम है कि आप अपने को निर्दोष साबित कर सके या आपको बेहद मशक्कत के बाद ही कोई रास्ता दिखायी पड़े. ये शायद नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत के विपरीत है.” (वरिष्ठ पत्रकार प्रेम शंकर झा, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया)

संक्षेप में समाज और मीडिया दोनों का स्तर रसातल में चला गया है क्योकि ये दोनों भावनाओ के प्रवाह में बहने के आदी हो गए है और इन दोनों को तथ्यो और तार्किक सोच से कुछ लेना देना नहीं रह गया है. दोनों को इस विकृत खेल में रस आने लगा है जहा किसी निर्दोष के भावनाओ के साथ खिलवाड़ होता है, उसके आत्मसम्मान के जब टुकड़े टुकड़े किये जाते है. लेकिन खेद कि बात ये है कि न्याय परंपरा/व्यवस्था भी इसी विकृत रस का शिकार हो गयी है, इन्ही घातक प्रवित्तियों का शिकार सा हो गयी है, खासकर उन मामलो में जहा स्त्रियों से जुड़े अपराधो के निष्पक्ष अवलोकन की बात आती है. खैर सब की जिम्मेदारी बनती है कि  भावनात्मक प्रवाह में बह कर लिए गए निर्णयो के बजाय सोच समझकर तार्किक रूप से लिए गए निर्णयो को प्राथमिकता दी जाए. ये बहुत आवश्यक हो गया है समाज के बिखराव को रोकने के लिए, एक मूल्य आधारित समाज के निर्माण के लिए.

पाठक इस लेख का अंग्रेजी संस्करण यहाँ पढ़े:

Rape Allegation That Led To Suicide of Kurshid Anwar: A Resounding Slap On The Face Of Media!

खुर्शीद अनवर की आत्महत्या: समाज, कानून और मीडिया के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा

खुर्शीद अनवर की आत्महत्या: समाज, कानून और मीडिया के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा

References:

Activist Khurshid Anwar’s suicide: Was media trial responsible?

AMU’s ‘gay’ prof commits suicide

Guilty If Charged

Dainik Bhasker

 

पिक्स क्रेडिट:

तस्वीर प्रथम 

तस्वीर दो

Bhavanajagat

Welcome to Noble Thoughts from All Directions to promote the well-being of man and to know the purpose in Life.

Serendipity

Was I born a masochist or did society make me this way? I demand unconditional love and complete freedom. That is why I am terrible.

John SterVens' Tales

Thee Life, Thee Heart, Thee Tears

Indowaves's Blog

Just another WordPress.com weblog

Una voce nonostante tutto

Ognuno ha il diritto di immaginarsi fuori dagli schemi

Personal Concerns

My Thoughts and Views Frankly Expressed

I love a lot

Just another WordPress.com site

the wuc

a broth of thoughts, stories, wucs and wit.

A Little Bit of Monica

My take on international politics, travel, and history...

Atlas of Mind

Its all about Human Mind & Behavior..

Peru En Route

Tips to travel around Perú.

Health & Family

A healthy balance of the mind, body and spirit

मानसिक हलचल

ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं यह ब्लॉग लिखने के अलावा गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। रेलवे से ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर्ड अफसर।

Monoton+Minimal

travel adventures

Stand up for your rights

Gender biased laws

The Bach

Me, my scribbles and my ego

Tuesdays with Laurie

"Whatever you are not changing, you are choosing." —Laurie Buchanan

The Courage 2 Create

This is the story of me writing my first novel...and how life keeps getting in the way.

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

Join 656 other followers