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विश्व फ़िल्म इतिहास की दो बेहद शानदार फिल्मे है आवारा और शोले!

 

 

आवारा : एक युवा मन के जिद और संकल्प से उपजी शानदार कृति.

आवारा : एक युवा मन के जिद और संकल्प से उपजी शानदार कृति.

भारतीय फिल्मो ने मई २०१३ में १०० वर्ष पूरे कर लिए. ये एक लम्बी अवधि होती है किसी भी मीडियम के गुण दोष को परखने के लिए. हमारी फिल्मो ने कई मंजिलो को तय किया लेकिन फिर भी गुणवत्ता की दृष्टि से इसकी रफ्तार बहुत धीमी है. हमारी अधिकांश फिल्मे एक ढर्रे पे बनती है जिनमे प्रयोगवादी फिल्मकारों के लिए बहुत कम स्पेस बचता है कुछ नया करने के लिए. ऐसा नहीं कि उल्लेखनीय काम नहीं हुआ पर इनकी संख्या कम है. आज भी आप देखे कि  सालाना  लगभग 800-900  फिल्मे बालीवूड में बनती है पर उनमे से कितनी याद रख भर पाने के लायक होती है?  इसी तरह फिल्मी संगीत भी खासकर वर्तमान समय में बेसुरें ताल में है कुछ एक अपवाद को छोड़कर. उस पर भी अगर विदेशी स्टैंडर्ड्स से गौर करे तो भारतीय फिल्मे अभी बहुत पीछे है. क्षेत्रीय भाषाओ जैसे बंगाली, मलयाली, इत्यादि में अच्छा काम हुआ लेकिन जिस तरह हिंदी फिल्मो में उतार आया वैसे इन भाषाओ की फिल्मो में भी गुणवत्ता के लिहाज सें गिरावट दर्ज की गयी. खैर इस लेख में मै आवारा और शोले इन दो फिल्मो का जिक्र करना चाहूँगा.

राजकपूर और गुरुदत्त मेरे पसंदीदा फिल्मकार रहे है. जिस संवेदनशीलता से इन्होने फिल्मे बनायीं उसकी मिसाल ढूंढ पाना मुश्किल है. राजकपूर जो कि ज्यादा पढ़ लिख नहीं पाए ने जब आवारा बनाने का निर्णय लिया तो वो एक बोल्ड निर्णय था. फ़िल्म की कहानी ख्वाजा अहमद अब्बास ने लिखी थी जो प्रोग्रेसिव लेखको की जमात से आते थें. फ़िल्म का शीर्षक ही विवादित था लेकिन जिद के पक्के राजकपूर ने शीर्षक बदलने से मना कर दिया. ये यकीन कर पाना मुश्किल है कि इस कम पढ़े शख्स ने भारतीय फ़िल्म इतिहास को उसकी सबसे भव्य फिल्मे दी, सबसे बेहतरीन फिल्मे दी. राजकपूर  की ये विलक्षण निशानी थी कि फ़िल्म के हर पहलू चाहे वो गीत हो या संगीत हो या एडिटिंग हो सब पे पैनी निगाह रखते थे और जितने भी संशोधन वो करते थें वे सब फ़िल्म को नयी उंचाई दे जाते थे. आवारा भी इन्ही सब प्रयोगों से लैस थी.

इतनी कम उम्र में आवारा या आग जैसी फिल्मो का बनाना ये साबित कर देता है कि बुजुर्गो की तोहमत झेलते ये ” कल के लौंडे” ही अंत में अपवाद काम करके जाते है. ये किसी भारी भरकम इंस्टिट्यूट से नहीं निकलते बल्कि जिंदगी की पाठशाला में तप कर निकलते है और ये सिद्ध कर देते है कि “कुछ लोग जो ज्यादा जानते है वो इंसान को कम पहचानते है”. आवारा में नर्गिस के बोल्ड दृश्य थें लेकिन किसी को भी मना लेने का हुनर रखने वाले राजकपूर  ने उस दृश्य को हकीकत में बदल दिया लेकिन इस प्रक्रिया में क्रिएटिविटी के उच्चतम शिखर पे हम राजकपूर को पाते है। आवारा में भारतीय फिल्मो का पहला ड्रीम सीक्वेंस भी है. जब इस पर कई लाख रुपये खर्च करने की बात आई तो सब ने राजकपूर को सनकी कहा क्योकि पूरी फ़िल्म का बजट एक तरफ और इस ड्रीम सीक्वेंस का खर्च एक तरफ रख दे तो इतना बजट काफी होता है एक अन्य फ़िल्म के निर्माण के लिए. लेकिन राजकपूर ने ड्रीम सीक्वेंस के बजट में कोई कटौती नहीं की. आज टाइम मैगज़ीन राजकपूर के आवारा में किये गए अभिनय को 10 सर्वश्रेष्ठ अभिनय कौशल जो फ़िल्म के सुनहरे परदे पे अवतरित हुई उनमे से एक मानती है और आवारा फ़िल्म इतिहास की सौ सर्वश्रेष्ठ फिल्मो में से एक है.

सन 1951 में रिलीज़ आवारा कायदे से देखा जाए तो  पहली वो फ़िल्म मानी जायेगी जिसने असल अन्तराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की. चीन, सोवियत संघ, टर्की, रोमानिया, मिडिल ईस्ट और अन्य जगह ये ख़ासा लोकप्रिय रही. इसका गीत संगीत भी इतना लोकप्रिय हुआ कि  “आवारा हूँ” गीत विदेशो के उन हिस्सों में भी बजता था जहा भारतीय फिल्मो की पहुच कुछ नहीं थी. आवारा मैंने पहले पहल 1988 में देखी जब दूरदर्शन ने एक विशेष प्रसारण के तहत इन फिल्मो को दिखाया। राजकपूर जो मशहूर कपूर खानदान से होते हुए भी ने फिल्मी सफ़र की शुरुआत क्लैप बॉय से किया उस ने दिखाया कि हुनर जन्मजात ही आता है. ये किसी स्कूल की देन नहीं होती. ये फ़िल्म चाहे शंकर जयकिशन का संगीत हो, राज-नर्गिस की रूमानी केमिस्ट्री हो, शैलेन्द्र-हसरत के हृदयस्पर्शी गीत हो या राधू कर्माकर का  बेहतरीन छायांकन हो हर लिहाज़ से सर्वोत्तम थी. आवारा इस बात का प्रतीक है कि बदलाव युवा वर्ग ही लाता है अपनी सोच से और अपनी जिद से.

शोले: जिसकी आंच एवरग्रीन हो! गयी

शोले: जिसकी आंच एवरग्रीन हो! गयी!

 

शोले का भी जिक्र हो जाए. जहा आवारा बनते समय एक हलचल महसूस की गयी वही शोले के निर्माण के समय ऐसा कुछ नहीं था. बल्कि हैरान करने वाली बात ये है कि भारतीय फिल्मो के इतिहास में अनोखे आयाम जोड़ने वाली ये फ़िल्म जब प्रदर्शित हुई तो सब तरफ फीका फीका सा माहौल था. ये वो फ़िल्म थी जिसे आज विदेशी आलोचक भी मानते है कि निर्देशन, अभिनय और कैमरा वर्क के हिसाब से ये फ़िल्म बेजोड़ है. शोले की दहक को अजर अमर सरीखा बना देने वाले गब्बर सिंह का रोल पहले डैनी के हिस्से में आया था लेकिन उनके मना कर देने के बाद ये हलकी आवाज़ वाले अमजद खान के हिस्से आया. इससे बहुत से लोगो को इसके निर्माण के दौरान ये महसूस होने लगा कही ये एक वजह ना हो जाए इस फ़िल्म के ना चल पाने का . लेकिन अमजद खान ने जो संवाद अदायगी की वो इतनी बेजोड़ है कि उसके बारे में भारत का हर बच्चा भी जानता है.

आज लगभग 35 सालो बाद भी इस फ़िल्म के किरदारों का जिक्र होता है. रेडियो या टेलीविज़न खोल के देखे आपको जय-वीरू, बसंती और गब्बर के दर्शन होना तय है. मेरा रेडियो जब भी मुंह खोलता है मतलब “चालु”  होता है तो गब्बर की आवाज़ की नक़ल में कोई शख्स जरूर थोड़ी देर में कहता है ” इस घंटे का पैसा कौन दिया है रें”. यहाँ तक कि एक भारतीय बैंक के विज्ञापन में भी  “बसंती” ने ख़ासा योगदान दिया. मुझे याद आते है अपने कॉलेज के दिन. खाली वक्त में हमारे कालेज के कई प्रतिभाशाली कलाकारों से अगर कुछ परफार्म करने को कहा जाता था तो ये लगभग तय होता था कि उनमे से कोई शोले के डायलोग की मिमिक्री जरूर करेगा.  इस फ़िल्म की विलक्षण बात ये है कि इस फ़िल्म के हर किरदार ने शानदार अभिनय किया और जिसका सीधा सम्बन्ध कहानी को नया मोड़ देने सा था. इसका नतीजा ये हुआ कि एक बहुत सामान्य सा दर्शक भी अच्छी तरह याद रखता है कि किस किरदार ने किस वक्त पे क्या संवाद बोला है. सो इस फ़िल्म के मशहूर चरित्र तो लोगो ने याद रखे ही रखे लेकिन इसके गौड़ चरित्र भी उतने ही यादगार साबित हुए. अब जैसे ए के हंगल का बोल हुआ ये संवाद भी लोग बड़ी गंभीरता से याद रखते है ” इतना सन्नाटा क्यों है भाई?”  

महबूब खान दुबारा फिर ना  कभी “मदर इंडिया” जैसी कोई फ़िल्म बना पाए और ना रमेश सिप्पी “शोले” जैसी  कोई और यादगार फ़िल्म दे पाए.  कही ना कही प्रकति में चीज़े अव्यक्त भाव से छुपी रहती है और वक्त आने पे कोई ना कोई उनका माध्यम बन जाता है उनको यथार्थ के धरातल पे लाने का. कम से कम “शोले” जैसी फिल्मे इसी रहस्यमय बात की साक्षी है. शोले चाहे अपने ट्रीटमेंट में विदेशी गुणों से ओतप्रोत रही हो, संगीत भी पाश्चात्य धुनों से प्रभावित था लेकिन ये अन्तत: भारतीय परंपरा के बुराई पर अच्छाई की जीत को दर्शाती है, पवित्र  प्रेम को दर्शाती है और मित्रता के महत्व को प्रक्षेपित करती है.

 

क्यों पूछने की हिम्मत है किसी की: अब तेरा क्या होगा कालिया :P :P :P

क्यों पूछने की हिम्मत है किसी की: अब तेरा क्या होगा कालिया 😛 😛 😛

रेफरेन्सेस:

शोले 

शोले 

आवारा 

आवारा 

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भारतीय फिल्मो में नायिकाओ का रोल मार्फ़त मनीषा कोईराला और उर्मिला मातोंडकर

मनीषा कोईराला: इस बेहद प्रतिभाशाली अभिनेत्री को भी खराब समझौते करने पड़े और फिर भी हाशिये में जाना पड़ा!

मनीषा कोईराला: इस बेहद प्रतिभाशाली अभिनेत्री को भी खराब समझौते करने पड़े और फिर भी हाशिये में जाना पड़ा!

भारतीय फिल्मो ने सौ सालो का फासला तय कर लिया है। ये अवधि काफी है इसके कुछ गुण दोषों पर नज़र डालने के लिये। भारतीय फिल्मी नायिकाओ के उत्थान पतन का जिक्र करना जरूरी है। भारतीय नायिकाओ के इस चरित्र को आधुनिक काल के दो अभिनेत्रियों मनीषा कोईराला और उर्मिला मातोंडकर के अभिनय ग्राफ पर नज़र डालने से बेहतर समझा जा सकता है। इसके पहले इस बात का जिक्र करना जरूरी हो जाता है कि जबसे भारतीय फिल्मे बन रही है तब से नायिकाओ का काम केवल पेड़ के आस पास टहल घूम कर नाचने कूदने का भर का ही था। अब भी कुछ नहीं बदला है। झरने की जगह स्विमिंग पूल आ  गया है। पहले नायिकाएं कूल थी अभिव्यक्ति के मामले में पर जब से “वुमन ऑफ़ सब्सटेंस” का अवतरण हुआ तब से वो और अधिक बोल्ड हो चली है। कम कपड़ो में भी शालीनता की रक्षा की वकालत हो रही है। पहले महिला निर्देशकों, गीतकारो का अकाल सा था लेकिन अब ऐसा नहीं है। लेकिन इसके बाद भी ये कहा नहीं जा सकता कि नायिकाओ के स्पेस में कोई गुणात्मक परिवर्तन आया हो। जो स्थिति पहले थी वो अब भी है। या यूँ कहे कि अब जब पैसा बनाने की हवस, कॉर्पोरेट और माफियाओ का गठजोड़ अपने चरम उफान पर है तो गुणात्मक परिवर्तन की अपेक्षा रखना तारो का दिन में उगने का ख्वाब देखने के सामान है।

उर्मिला मातोंडकर और मनीषा कोईराला के करियर पर दृष्टि डालने से फ़िल्म में नायिकाओ के महत्त्व की एक दिलचस्प तस्वीर उभर कर आती है। मै मूलतः मेनस्ट्रीम सिनेमा की बात कर रहा हूँ। कला फिल्मो में तो हम देखते है शबाना आज़मी, स्मिता पाटिल, सुहासिनी मूले इत्यादि अभिनेत्रियों ने अच्छा काम किया और इसके साथ ही मेनस्ट्रीम सिनेमा में अच्छा काम किया। ये अलग बात है स्टार वैल्यू प्रधान मुख्य धारा के सिनेमा में इनके लिए ज्यादा कुछ करने के लिए था नहीं। सुष्मिता सेन जो कि एक्टिंग टैलेंट में ऐश्वर्या  से कही आगे थी उनको तो आज के महिला निर्देशकों के उपस्थिति के बाद ज्यादा कुछ करने को नहीं मिला लेकिन फूहड़ अभिनय करने वाली ऐश्वर्या राय की झोली में कई बड़े बैनर की फिल्मे आयी। हर फ़िल्म में बकवास अभिनय करने के बाद भी आप बदन उघाड़े ऐश्वर्या को कैनंस फ़िल्म समारोह में देख सकते है। इसी से समझ में आ जाता है कि पॉपुलर सिनेमा में टैलेंट कम काम आता है कुछ और सतही समीकरण ज्यादा काम आता है।

उर्मिला ने मुमताज़ की तरह ही बचपन से फिल्मो में काम करना शुरू कर दिया। पिंजर और सत्या जैसी फिल्मो में काम कर चुकी उर्मिला एक बेहद समर्थ अभिनेत्री है लेकिन कैसी बिडम्बना है कि हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री ने इन्हें बदन प्रधान अभिनेत्रियों में अग्रिम पंक्तियों ला खड़ा किया। इसके बाद वो राम गोपाल वर्मा कैम्प तक ही सिमट के रह गयी है। लेकिन आप उर्मिला की फिल्मे देखे तो समझ में आएगा कि वेस्टर्न वर्ल्ड ने जो एक्टिंग के मापदंड तय किये है उनमे उर्मिला शानदार रूप से खरी उतरती है। बल्कि उनसे बीस ही है क्योकि डांसिंग टैलेंट में अभी विदेशी अभिनेत्रियाँ इतनी सक्षम नहीं है जितनी की उर्मिला है। ये आपको तब दिखता है जब आप  चमत्कार फ़िल्म में ट्रेन कम्पार्टमेंट में फिल्माया बिच्छू गीत देखते है।

अभिनय की जिस बारीकियो को उर्मिला ने “कौन” फ़िल्म में प्रदर्शित किया वो किसी साधारण टैलेंट से ओतप्रोत अभिनेत्री के बूते के बाहर है। इसलिए खेद होता है कि इतनी सक्षम अभिनेत्री को मुख्यधारा सिनेमा में बदन दिखाऊ दौड़ में शामिल होना पड़ा। एक सक्षम अभिनेत्री को रेस में बने रहने के लिए क्यों बदन दिखाने की कला में आगे रहना पड़ता है? ये परिपाटी किसने स्थापित की? आप कह सकते है बाज़ार की बड़ी पूँजी लगी होती है पर पूँजी तो हालीवुड की फिल्मो में हमसे अच्छी लगती है पर टैलेंट से वो तो समझौता नहीं करते! खैर आज की नयी अभिनेत्रियों को देखे तो कुछ एक नामो को छोड़ दे तो अधिकतर के पाद टैलेंट तो कुछ नहीं लेकिन बिकनी पहनने में संकोच ना करने के कारण वो मुख्य धारा में कामयाब है। यहाँ तक कि एक हाल की अभिनेत्री ने जिसने पहली फ़िल्म में साधारण औरत का किरदार किया था उसने भी अपनी अगली ही एक अन्य फ़िल्म में बिकनी में आगाज़ किया!

मनीषा कोईराला  के उदाहरण से आपको ये समझ में आ जाएगा कि हमारे यहाँ टैलेंट की समझ और परख कितनी है। मनीषा ख़ामोशी, बॉम्बे, गुप्त, मन  और अकेले हम और अकेले तुम में शानदार अभिनय करने के बाद हाशिये पर चले गयी। यहाँ तक कि उनको अपने को सुर्खियों में रहने के लिए निम्न स्तर की फिल्मो में काम करना पड़ा। साफ़ है कि उगते सूरज को सलाम करने वाली इस इंडस्ट्री ने मनीषा को तज दिया। आज कैंसर से जूझती मनीषा को इंडस्ट्री संज्ञान में लेना उचित नहीं समझती। स्पष्ट है ग्लोबल वर्ल्ड में जो पैसा पैदा कर सकता है चाहे चमड़ी बेचकर ही क्यों न बस उसी की क़द्र है। टैलेंट है तो ठीक और नहीं है तब भी ठीक अगर आप पैसा पैदा करने के समीकरण में फिट बैठते है तो। सनी लियोन और वीना मालिक का चमकता सितारा तो यही बताता है। उर्मिला और मनीषा के प्रतिभा को सलाम कि इस अंधे युग में भी टैलेंट के महत्त्व को बरकरार रखा।

उर्मिला मातोंडकर : एक अभिनेत्री जो घिसे पिटे मापदंडो में उलझ कर रह गयी!

उर्मिला मातोंडकर : एक अभिनेत्री जो घिसे पिटे मापदंडो में उलझ कर रह गयी!

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दीप्ति नवल को हम हमेशा, रैकेट चलाने वाली के रूप में नही, वरन एक बेहद प्रतिभाशाली अभिनेत्री के रूप में याद रखेंगे।

हम आपको हमेशा एक बेहद प्रतिभाशाली अभिनेत्री के रूप में याद रखेंगे।

हम आपको हमेशा एक बेहद प्रतिभाशाली अभिनेत्री के रूप में याद रखेंगे।

दीप्ति नवल प्रकरण से मुझे काफी झुंझलाहट हुई। ये समझ में आने लगा है कि मीडिया का स्तर ना सिर्फ रसातल में चला गया है बल्कि ये अब किसी के साफ़ सुथरे दामन में कीचड पोतने का सबसे कारगर तरीका बन गया है। नहीं तो मीडिया को क्या जरुरत थी कि इस बात को प्रचारित करने कि दीप्ति को  आख़िरकार “प्रोष्टिट्यूशन डेन” से मुक्ति मिली।  जबकि मामला सिर्फ ये था कि उसने अपना पुराना घर कालोनी की सोसिएटी के कर्ता-धर्ता लोगो की बदसलूकी की वजह से छोड़ा जो उसकी निजता का सम्मान नहीं कर रहे थें।

दीप्ति नवल ने शायद बातो ही बातो में अपना दुखड़ा किसी पत्रकार सें क्या शेयर किया कि उसकी बाते तोड़ मरोड़कर मीडिया की सुर्खियाँ बन गयी। आप कह सकते है कि ऐसी बात  चश्मे-बद्दूर के दौरान होने का सीधा सा मतलब ये है कि फ़िल्म को प्रमोट करने का ये स्टंट  भर था। इस सरलीकरण के पीछे तर्क सिर्फ ये हो सकता है कि पब्लिसिटी कैसी भी हो फलदायी होती है। तो क्या एक समर्थ अदाकारा के इतने बुरे दिन आ गए कि चाहे सही में या झूठ में उसे अपने अस्तित्व के लिए ऐसे खबरों के दम पर निर्भर रहना पड़े?

माना कि ये भी एक कडवी सच्चाई है कि फ़िल्म एक्ट्रेस या एक्टर्स को बुरे दिनों में हर तरह के समझौते करने पड़ते है लेकिन ये स्वीकारने में बेहद तकलीफ है कि नियति ने दीप्ति को भी गलत राहो पर धकेल दिया। दीप्ति की कठोर प्रतिक्रिया मिलने के बाद ये समझ  में आ रहा है कि ऐसा कुछ भी नहीं जैसा मीडिया दर्शा रहा है। ये मीडिया का सुर्खिया बटोरने की  कला का नमूना भर था। दीप्ति नवल हमेशा साफ़ सुथरी फिल्मो  में बहुत शशक्त अभिनय के लिए ही याद रखी जायेंगी। ये वाकई कलियुग है कि कोई किसी के उजले चरित्र से कुछ सीखता तो नहीं लेकिन उसके उजले दामन में कालिख पॊतने के सौ  बहाने ढूंढ लेता है। ऐसे पत्रकार  जो दूसरों की बदनामी पर पलते है ऐसे लोगो को पत्रकारिता जगत से बाहर कर देना चाहिए। इनसे पत्रकार नाम से उपजने वाले समस्त सरोकारों से कोई सम्बन्ध  ना रखने दिया जाए। अगर मार्कंडेय काटजू कि बात माने तो ऐसे लोगो से उनके पत्रकार सम्बन्धी लाइसेंस को खारिज कर देना चहिये। बहरहाल पत्रकारिता के नाम पर  जो तमाशे हो रहे है वो दुखद है।

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Songs For Beloved Moon Embracing Clouds: Hiding, Smiling And Crying

Moon And Romance! It's Commonplace  :P

Moon And Romance! It’s Commonplace 😛


Well, for past few days, I was bit taken aback by some sad developments. I wanted to finish the English version of one of my well read posts in Hindi. However, lack of concentration on my part was delaying it. By dint of  fortune, I came to participate in conversation on a prominent Radio Forum, Shrota Biradari,dominated by oldies, which was involved in making of document related with Hindi movie songs based on moon. Moon has always appealed to my senses. I am a night watcher since childhood and to gaze at stars and moon has been my favourite past time. Even now in my village, when I am all alone, surrounded by nothing but stillness of night, penetrated by chirping of cricket etc., I sit hours in open to gaze at the moon. Neil Armstrong had to visit moon to end up as philosophical human being but my passion for moon is deep enough that it does not require a trip to moon to admire its beauty.

Anyway, the forum involved in preparation of songs missed  some of my favourite songs. I wanted to add these songs to the document but I thought let’s share the same songs for readers and friends, having taste for refined music, narrating my own personal connection with the songs. Don’t forget that popular numbers already got included in that document and these are the ones which are close to my heart, but, sadly, these did not appear in that document. The silver hairs got trapped in age which produced gems like “O  Raat Ke Musafir” (Miss Mary),  “NaYe Chand Hoga” ( Shart) and “Ye Raat Ye Chandni Phir Kaha( Jaal), to name a few. So let me include some of the songs they failed to take note of.

“I’ve tried the new moon tilted in the air
Above a hazy tree-and-farmhouse cluster
As you might try a jewel in your hair.
I’ve tried it fine with little breadth of luster,
Alone, or in one ornament combining
With one first-water start almost shining.

I put it shining anywhere I please.
By walking slowly on some evening later,
I’ve pulled it from a crate of crooked trees,
And brought it over glossy water, greater,
And dropped it in, and seen the image wallow,
The color run, all sorts of wonder follow.”

( The Freedom of the Moon by Robert Frost)

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1. Badalo Me Chup Raha Hai Chaand Kyo

That’s a charming song from movie directed by Mahesh Bhatt’s “Phir Teri Kahani Yaad Aayi”. The best thing about Mahesh Bhatt  is that no matter what’s the theme of his movies, he gives brilliant songs. The camera angles employed in his songs make the songs look so terrific. Just  remember “Tumhe apana banane ki kasam khayi hai” from Sadak – a well picturized song which depicts the state of mind of woman trapped in world of prostitution, trying to come to terms with new-found freedom. Anyway, this song is also well shot. And like always, the movie involves doomed romance. For me, the songs brings back the memories of  90s and this movie’s almost all the numbers were simply too good. Lyricist Qateel Shifai and musician Annu Malik did a wonderful  job. Interestingly, as a student, I had limited access to money, and thus, buying cassettes always meant sacrificing the last few notes found in my pocket. So I had to doubly assure whether or not all the songs were melodious in cassette. That meant taking “panga” (starting a fight) with the shopkeepers as they were often reluctant to make you listen all the numbers in bits and pieces. Anyway, these type of cassettes did full justice to few bucks (paisa vasool) which I managed to save those days.

2. Dhanno Ki  Ankhon Mein Raat  Ka  Surma 

Amazing song!  No wonder R D Burman is hailed as a true genius. Look at the sound employed in the travel song with folk touch. Talking of this sound effect, he told to Gulzar that when he first played this instrument, flanger, it produced a very harsh noise. The people around him were bit skeptical about its effect in ensuring melody. It was not so easy to make use of it. But watch this superbly picturized train song and you would realize that  how well R D Burman  used this instrument to create rhythm effect produced by train as it travelled through the valley. Hey, the song talks about Dhanno but this Dhanno is totally different from Basanti’s Dhanno! Like always imagery employed by Gulzar mesmerizes us. The song is visual delight as well. Never before train song produced such a romantic appeal. Above all, it’s “Chand Ka Chumma” (Moon’s Kiss) which kills us!

3. Chaand Chura Ke Laya Hoon

Again R D Burman and Gulzar come together to produce this great number. I like the song because the moment it refers to stealing of moon and love birds spending time behind some building like church, it brings into my mind the great buildings of British period. Although, this song does not feature Church but images of majestic buildings from previous eras appear before the eyes. By the way, tell me how many times have you seen Church being used as a spot to promote romance? But anything was possible if two souls, always out of their minds, Gulzar and R D Burman sat together to compose songs. These two always hailed themselves as crazy souls. Oh yes, crazy souls alone made some sense in world turned into hell by intelligent souls!

4. Khoobsurat Hai Wo Itna 

This song from movie “Rog” has two versions. One is sung by M M Kreem, the music director who composed this song. Another  one is sung by Udit Narayan. However, Kreem’s version is  close to my heart. I need to say few words about Kreem. This techie music composer, hugely underrated in Bollywood, is one of the few music composers, who know how to really compose a song using modern instruments, without copying anything from Western world, in name of inspiration. These are some of the hard working musicians who have kept the dignity of Bollywood music world intact. How sad, people talk about A  R Rahman but they fail to take note of gems composed by such lesser heard names. I came to hear him first in my college days, when out of curiosity, I came to buy this cassette, seeing new names on the flap of the cassette as unheard names always fascinated me. Now lend ears to  this moving number, which talks about pangs of falling in love with beloved belonging to someone else legally! That’s why the song says ” moon is dotted with rough spots yet one cannot resist its beauty”!

For movie version to notice the picturization one can visit this link.

5. Mera Chand Mujhe Aaaya Hai Nazar

The tragedy with Bollywood is that if movie bombs at the box office, the songs also fail to create impact. I am sure very few movie lovers would have heard the name of this movie released in the middle of the 90s. Mercifully, Jatin Lalit was at its peak in those days. This innovative duo managed to give some beautiful numbers, which managed to find the ears despite movie doing average business. Since this movie is by-product of Bhatt Camp, rest assured that song must be aesthetically shot! I love this song because it takes me to college days, wherein I realized that moon in youth leaves the sky and gets placed in some beautiful face!

6. Chamakte Chand Ko Toota Hua Tara Bana Daala 

Whenever Ghulam Ali came to sing for Indian movies, the song turned out to be defining moment in world of Indian movie music. Be it “Dil Ye Pagal Dil” or ” Chupke Chupke Raat Din”, the songs always managed to stay in the hearts and minds for forever. So it  was not unexpected that this song became representative song for broken dreams. What stunning lines the verses have! Just listen  to it and you would be bound to play it for more time. Anu Malik was not very popular in those days, but with such movies, he managed to build a position for himself. The  bold sequences in the this song have the stamp of Mahesh Bhatt’s vision!

7. Mere Roothe Hue Balma

This song is departure from the songs I have mentioned in  this post. It’s from a classic produced in 1950 “Bawre Nain”, featuring Raj Kapoor and Geetabali. The song would let you know that how simple and innocent gesture have given way to nothing left for imagination gestures of Sunny Leone. Anyway, this song has remarkable innocent gestures of Geetabali, who is trying to please  her moon. I am happy that silver hairs failed to mention this good number, dedicated to moon, sung by Rajkumari, and allowed me to talk about this song..ha..ha..ha. This beautiful singer sang few songs but these few songs have become unforgettable numbers.

8. Chanda Dekhe Chanda To Chanda Sharmaayein

This song has a very pleasant tune and some excellent from verses from Maya Govind- a very talented female lyricist from Lucknow.  How often we notice female lyricist in Bollywood or elsewhere? My friend Sagar Nahar, who is prominent song collector  from Hyderabad, very rightly points out that this Bappi  Lahiri’s composition sounds very similar to S D Burman’s composition in Abhiman ” Tere Mere Milan Ki  Raina”. Interestingly,  both the  movies Jhoothi and Abhiman were directed by  Hrishikesh Mukherjee. And, above all, it’s picturized on stunningly beautiful Rekha!  What else can eyes crave for!

For Rekha lovers, here is a clearer video, but unfortunately, the song is incomplete.

9. Kolaveri Di  

Well, I need not to say anything about this song. I have already written a post on it, which you can read here. I have to mention this song for one more time because first it belongs to current period, making you all know the changes that have hit the Indian film music, and secondly,  it talks about moon in hilarious way. A song meant for heart broken guys but the approach involved is refreshingly unique. Anyway, for me, it means a greater involvement with moon instead of nurturing hatred for distance moon.

References: 

Dealing With A Breakup In Love Relationship Kolaveri Di Way

Rajkumari Dubey

M. M Kreem

Maya Govind

Pics Credit:

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शैलेन्द्र: मायावी जगत को अर्थ देने वाला एक बेहतरीन गीतकार

सिगरेट का कश लेते शैलेन्द्र अपने मीत राजकपूर के साथ!

सिगरेट का कश लेते शैलेन्द्र अपने मीत राजकपूर के साथ!

फ़िल्म का चलना या ना चलना एक अलग मसला होता है. मूल बात ये थी कि फ़िल्म वास्तव में कैसी बनी थी. तो तीसरी कसम वाकई अच्छी बनी थी. लेकिन ये बात जरूर है कि इस फ़िल्म ने शैलेन्द्र को ये बता दिया कि फ़िल्म जगत उन जैसे सीधे अच्छे लोगो के लिए कभी नहीं बना था. इस फ़िल्म ने उनके  करीब के लोगो के चेहरे से मुखौटे को हटा दिया. शैलेन्द्र के नजदीकी लोगो की बात पढ़िए आपको पता चलेगा कि किसी ने शैलेन्द्र के लिए मुफ्त काम नहीं किया. सब ने पैसे लिए. दूसरी बात मै इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता कि राजकपूर ने हीरामन के किरदार के साथ न्याय किया. वो इस वजह से कि राजकपूर जिस परिवेश में ढले थें, उनकी अरबन इंस्टिंकट्स (urban instincts)  बहुत बड़ी बाधक थी  इस किरदार की जरूरतों के साथ. ये शैलेन्द्र की सबसे  बड़ी गलती थी राजकपूर को इस रोल के लिए चुनना.

ये अलग बात थी  राजकपूर एक अच्छे अभिनेता थे. सो उन्होंने भरसक कोशिश कि अपना सर्वोत्तम देने कि लेकिन आप इतने बड़े मिसमैच को कैसे पाट सकते थे. सो आप ध्यान से देखे राजकपूर को इस फ़िल्म में आपको उनके अभिनय में नाटकीयता जरूर दिखेगी. तो मेरी नजरो में ये एक बड़ी गलती थी शैलेन्द्र कि जो राजकपूर को उन्होंने लिया. इस बात पे गौर करना आवश्यक है कि मुम्बईया सिने जगत में ग्रामीण जगत को या भारत के गाँवों को कभी भी यथार्थ स्वरूप में परदे पे लाने की कोशिश नहीं की गयी. सब में गाँव के नाम पर मसाला तत्त्व डाला गया. जैसा मिसमैच राजकपूर का तीसरी कसम में था वैसे ही नर्गिस का मदर इंडिया में था. ये अलग बात है दोनों अच्छे कलाकारों  ने जान डाला अपने अभिनय से पर वास्तविकता से तो दूर ही था ना.

तीसरी कसम: भारतीय फ़िल्म इतिहास में मील का पत्थर

तीसरी कसम: भारतीय फ़िल्म इतिहास में मील का पत्थर

खैर बात तीसरी कसम की हो रही है. तीसरी कसम और साहब बीवी और गुलाम दोनों फिल्मे साहित्यिक कृतियों पर बनी है. तीसरी कसम   फणीश्वरनाथ रेणु  की कहानी “मारे गए गुलफाम” और साहब बीवी और ग़ुलाम बिमल मित्र के  इसी नाम के उपन्यास पर बनी थी. एक तो हमारे हिंदी फ़िल्म जगत में   साहित्यिक कृतियों पर फिल्मे बनाने का चलन नहीं और बनती भी है तो मूल कृति के साथ न्याय नहीं करती. सो दोनों फिल्मो का कृति के साथ लगभग पूरा सा न्याय करना बहुत संतोष प्रदान करते है. हा मेरे जैसे जाहिल जो मूल कृति को पढ़ कर फ़िल्म देखने की भूल कर बैठते है वो ये हमेशा जानते रहते है कि पढने में  कृति के बहुत से पक्ष उभर कर आते है. परदे पर मामला बहुत सीमित हो जाता है. पर तीसरी कसम, गाइड, साहब बीवी और ग़ुलाम, परिणीता, काबुलीवाला कुछ एक ऐसी फिल्मे रही जिन्होंने मूल कृति के साथ बहुत अत्याचार नहीं किया.

चलते चलते शैलेन्द्र के बारे में कुछ कहना बहुत जरूरी है. शैलेन्द्र जैसा बेहतरीन इंसान फिल्मो की दुनिया में आने की गलती कर बैठा पर इनकी इसी गलती की वजह से हमे इतने अच्छे गीत सुनने को मिले. मेरे ये सबसे पसंदीदा गीतकार है और इनका कोई भी गीत चाहे वो “टूटे हुए ख्वाबो  नें” या “दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समा” या “तेरे मेरे सपने अब एक रंग है” आपको एक दूसरी दुनिया में ले जाता है.  पर रूहानी ख़ूबसूरती से लैस इस बेहद नाजुक मिजाज इंसान को तीसरी कसम के बनने के दौरान पैदा हुई कडुवी सच्चाइयो ने आखिरकार इनको विशाल  अजगर की तरह नील लिया. पैसा ही खुदा है या पैसा ही ईश्वर है इस दुनिया का इनके नाजुक ह्रदय पर गहरा आघात कर गया. फिर भी दुनिया शैलेन्द्र जैसे सुंदर आत्माओ की वजह से अस्तित्व में रहती है, दुनिया रहने के काबिल बनी रह पाती है. श्वेत श्याम सी जिंदगी में रंग भरने वाले   शैलेन्द्र  ( August 30, 1923 – December 14, 1966 ) को मेरी तरफ से विनम्र श्रद्धांजलि.

References:

फणीश्वरनाथ रेणु 

शैलेन्द्र

बिमल मित्र  

 शैलेन्द्र 

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किस्मत के खेल निराले मेरे भईय्या !!!

ravi

कहते है वक्त किसी के लिए नहीं रुकता और ना इस वक्त की परवाह करता है किसी के उपलब्धियों की. वो नियत समय पे सबको इतिहास बना के ही छोड़ता है. इधर कई महीनों से ऐसा प्रतीत हो रहा कि जैसे किसी ने इश्वर की दुनिया में किसी ने कान्ट्रेक्ट ले लिया है मृत्युलोक से सभी रचनात्मक लोगो को एक के बाद अपनी दुनिया में वापस बुलाने को. अब इसे देखिये इस खबर से पहले कि महान संगीतकार रवि अब नहीं रहे मै उन्ही के जन्मदिन पर विविध भारती पर उन पर केन्द्रित कार्यक्रम सुन रहा था जिसमे वे अपने साहिर साहेब से संबंधो पर विस्तार से चर्चा कर रहे थे. ये कितनी बड़ी बिडम्बना है कि जिनकी बात आप कुछ देर पहले सुन रहे होते है वे कुछ ही पल के बाद हमेशा के लिए खामोश हो जाते है.

रविजी का मै कद्रदान रहा हूँ. इन्होने जब भी साज छेड़ा दिल के तारो में एक कम्पन सी पैदा हो जाती थी. जो भी इनके संगीत से परचित है उसको पता होगा कि इनके संगीत में जरा सा भी पेंच नहीं था. इनकी धुनें बहुत ही सहज होती थी हर एक खूबसूरत अफ़साने की तरह. इसलिए जब भी इनका गीत बजता है आप कुछ समय के लिए इस मायावी जगत के उलझनों से ऊपर उठ जाते है. इस तरह के कुछ गुणी संगीतकारों ने कम से कम इस बात कि पुष्टि कर दी कि अच्छे संगीत के लिए एक विशाल आर्केस्ट्रा की जरूरत नहीं होती. कम साजो के इस्तमाल से भी बहुत दुर्लभ गीत बन सकते है. रविजी उस युग का प्रतिनिधित्व करते थे जिसमे संगीत अपने शुद्धतम स्तर पे मौजूद था. मतलब एक अच्छे संगीत के तत्त्वों से लोग अच्छी तरह से परिचित थे. साठ के दौर के एक खासियत ये भी थी कि अगर अच्छे संगीतकार मौजूद थे तो उस अच्छे संगीत के सापेक्ष अच्छे गीतकार भी थे. इन दोनों के बेहतरीन मिलन ने उस दौर को कभी ना मिटा पाने वाला युग बना दिया.

जरा आज देखिये क्या होता है. नाम बड़े और दर्शन छोटे. हर कोई अजीबो गरीब प्रयोग कर रहा है उन शब्दों पर जो शायद एक वर्ग ही समझ पाता है. पर गुजरे वक्त में शायद ऐसा नहीं होता था. मानवीय भावनाओं को सही सही गीतकार व्यक्त करते थें और फिर उन पर संगीतकार कितने घंटो बैठकर उसे एक अच्छी धुन में पिरोते थे. ऐसा नहीं था कि पैसे का मोल उन्हें ना पता था पर रचनात्मकता का स्तर पैसो की जरुरत से प्रभावित नहीं था. शायद यही वजह थी कि इनका संगीत वक्त के प्रवाह के शायद बहता रहा. इनकी चमक कभी धूमिल नहीं हुई. कल ही किसी शादी में मै ” ऐ मेरी जोहराजबीं” को रीमिक्स में ढला हुआ सुन रहा था. कहने के मतलब यही है कि जिन्होंने लगन और अपनी समझ को पैसो तले गिरवी नहीं रखा वे वक्त के प्रवाह से ऊपर उठ गए. ये भी मै बता दूँ रवि ही एक ऐसे संगीतकार रहे जिन्होंने कम से कम चालीस वर्षो तक संगीत दिया पर किसी भी युग में यह नहीं लगा कि जैसे इनका संगीत चुक गया है या ये कि ये वक्त के साथ  एडजस्ट नहीं कर पा रहे है. आप साठ के दशक में आई गुमराह का संगीत सुने और अस्सी के दौर में आई इनकी फिल्मे तवायफ, निकाह,दहलीज़ और आज की आवाज़ के गीत सुनिए आप को वही मोहकता और मादकपन मिलेंगा इनके संगीत में.

bharosa 1963

हमराज, दो बदन, गुमराह, वक्त, एक फूल दो माली, आँखें, आदमी और इंसान, भरोसा, घूंघट और चौदहवी का चाँद  जैसी क्लास्सिक फिल्मो में अद्भुत संगीत देने वाला आज हमारे बीच से चला गया. यकीन नहीं होता मुझे. खैर इनका ही रचा एक गीत है जिसने सिर्फ मुझे ही नहीं बहुतो को विपरीत समय में भी कैसे रहना है इसकी सीख देता है आज बार बार मेरे अन्दर प्रकट हो रहा है. आज मुझे फिर इस गीत ” ना मुंह छुपा के जियो और ना सर झुका के जियो” की शरण में जाना पड़ रहा है थोड़ी सी मुस्कान के लिए. इस महान आत्मा को प्रभु शान्ति प्रदान करे.

इनके कुछ गीत जो मुझे बहुत पसंद है:

१. तुम अगर साथ देने का वादा करो

२. चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाए हम दोनों

३. तुझे सूरज कहू या चंदा

४. हम जब सिमट के आप के बाहों में

५. बहुत देर से दर पे आँखे लगी थी


६. ज़िन्दगी इत्तेफाक है

७. दिल ही दिल में ले लिया

८. एक अधूरी सी मुलाक़ात हुई थी जिनसे

९. दिल की ये आरजू थी

१०. गैरो पे करम अपनों पे सितम

gumrah_1963

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ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर रेलवे अफसर।

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