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तुगलकी और शुतुरमुर्गी मानसिकता से बाधित मोहम्मद रफ़ी प्रेमी विविध भारती!

विविध भारती ने अपनी पहुँच की क़द्र नहीं की बल्कि उल्टा अपनी सबसे ज्यादा पहुँच के होने के दंभ ने इसके अन्दर ऐरोगेन्स का समावेश कर दिया है. ये इसी का नतीजा है कि ये जानते हुए भी कि हर कार्यक्रम में रफ़ी के गीत बजाने से इनका श्रोता वर्ग एक नीरसता का अनुभव कर रहा है ये अपनी मनमानी पे कायम है. इनका बस चले तो ये चित्रलोक कार्यक्रम में भी रफ़ी का ही गीत बजाये!

विविध भारती ने अपनी पहुँच की क़द्र नहीं की बल्कि उल्टा अपनी सबसे ज्यादा पहुँच के होने के दंभ ने इसके अन्दर ऐरोगेन्स का समावेश कर दिया है. ये इसी का नतीजा है कि ये जानते हुए भी कि हर कार्यक्रम में रफ़ी के गीत बजाने से इनका श्रोता वर्ग एक नीरसता का अनुभव कर रहा है ये अपनी मनमानी पे कायम है. इनका बस चले तो ये चित्रलोक कार्यक्रम में भी रफ़ी का ही गीत बजाये!

विविध भारती देश की सुरीली धड़कन है. ऐसा आप महसूस करते है. ऐसा ही इसका प्रोमो जो अक्सर बजता रहता है वो भी यही बात कहता है. लेकिन हकीकत कुछ और ही तस्वीर बयान करती है!!  विविध भारती अपनी तुगलकी नीति के चलते एकरसता का शिकार हो चला है. ऊपर से कार्यक्रमों के प्रस्तुतीकरण में पक्षपातपूर्ण नीति, नवीनता का अभाव और मौलिकता से कट्टर द्वेष ने विविध भारती को प्राइवेट चैनल के सापेक्ष हाशिये पे ला खड़ा कर दिया. आज लोग विविध भारती से भावनात्मक लगाव से ज्यादा जुड़े है इसलिए नहीं कि इनके कार्यक्रमों में कोई नयी बात है. ये कहते हुए कोई संकोच नहीं रेडियो सीलोन अपनी दमदार प्रस्तुति,  उद्घोषको की मौलिकता और विविधता के प्रति जबरदस्त समर्पण और नवीनता के प्रति रुझान के चलते विविध भारती से मीलो आगे है!! विविध भारती ने अपनी पहुँच की क़द्र नहीं की बल्कि उल्टा अपनी सबसे ज्यादा पहुँच के होने के दंभ ने इसके अन्दर ऐरोगेन्स का समावेश कर दिया है. ये इसी का नतीजा है कि ये जानते हुए भी कि हर कार्यक्रम में रफ़ी के गीत बजाने से इनका श्रोता वर्ग एक नीरसता का अनुभव कर रहा है ये अपनी मनमानी पे कायम है. इनका बस चले तो ये चित्रलोक कार्यक्रम में भी रफ़ी का ही गीत बजाये! यही एक कार्यक्रम है जिसमे रफ़ी के गीत नहीं बजते और क्या पता विविध भारती के अन्दर बैठे शुतुरमुर्गी मानसिकता के लोगो के ये बात बहुत ही अखर रही हो!!

बल्कि इसी बात पे विविध भारती के एक घनघोर प्रशंसक ने हताश होकर इस पर इस्लामीकरण का लेबल चस्पा कर दिया!! मोहम्मद रफ़ी के गीत को हर हाल पर श्रोताओ पर थोपने के चस्के चलते इस पर देर सबेर ये लेबल लगना तय था. पहले शायद हमें ये लगता था की शायद ये अपना भ्रम है या कोई हसीन इत्तेफाक है जो  रफ़ी के गीत शायद ज्यादा ही बज रहे हो लेकिन जिस अनुपात में रफ़ी के गीत बजते है उससे ये शक गहरा गया है कि रफ़ी साहब के गीतों को हर हाल में बजाते रहने के पीछे कोई और ही समीकरण काम कर रहा है. चाहे ये किसी बंद दिमाग की हरकत हो या फिर इसके पीछे रोयल्टी वजह हो इससे घनघोर नुकसान हम जैसे विविध भारती के परम रसिको का ही हो रहा है.

हम आपको उदाहरण दे रहे है. “आज के फनकार”  कार्यक्रम में अगर प्रोग्राम मीना कुमारी पे चल रहा हो तो भी गीत का जो अंश बजेगा वो फीमेल संस्करण ना होकर रफ़ी का संस्करण होगा? क्यों ? मुझे अच्छी तरह याद है “दिल जो ना कह सका” ( भींगी रात )  इसका रफ़ी वाला हिस्सा बजा पर लता का हिस्सा जैसे ही शुरू हुआ गीत कट गया !! इनका एक कार्यक्रम आता है रात को साढ़े दस बजे “आपकी फरमाईश”. कुल मिलाकर लगभग छह गीत बजते है और बिना रोक टोक सभी गीत ज्यदातर रफ़ी के ही बजते है. बहुत हुआ तो एक गीत किसी और कलाकार का बजा दिया.  दोपहर में ये “मनचाहे गीत” बजाते है पर समझिये इस मनचाहा कुछ नहीं! पूरा का पूरा प्रोग्राम ही रफ़ी के महिमामंडन में लगा रहता है.

इस प्रोग्राम के ख़त्म होने के बाद ढाई बजे से “सदाबहार नगमे” बजेगा. सिर्फ और सिर्फ एक क्रम से रफ़ी के ही गीत बजते है. छाया गीत उद्घोषक का अपना प्रोग्राम होता है लेकिन वशीकरण के शिकार इनके अधिकतर उद्घोषक  रफ़ी के गीत बजाते है!!  हेमंत कुमार, मुकेश, किशोर कुमार, तलत महमूद, सुरैय्या, नूरजहाँ, सहगल. मन्ना डे, सुमन कल्यानपुर, महेंद्र कपूर और सुरेश वाडकर जैसे बेहतरीन गायक इनकी प्राथमिकता में है ही नहीं! एक कार्यक्रम ये बारह से एक बजे के बीच सुनवाते है “एसएमएस के बहाने VBS के तराने” उसमे भी ये रफ़ी-प्रधान फिल्मे रख देंगे तो जाहिर है  गीत रफ़ी का ही ना बजेगा!! प्रसार भारती का लगता है  इस संस्था पे नियंत्रण ना के बराबर रह गया है तभी इसमें मनमानी चल रही है.

इनके लोकल स्टेशन का तो हाल इसलिए भी बुरा है कि लोकल स्टेशन अभी तक ये नहीं समझ पाए है कि युग बदल गया है. लोकल स्टेशन के उद्घोषक तो सामन्ती प्रवित्ति के जीव है जो हर हाल में अपने  को श्रोता से सुपीरियर समझते है. ये गीत रफ़ी के ज्यादा नहीं बजाते लेकिन इनका प्रस्तुतीकरण अभी भी बहुत उबाऊ है और कर्कश है. गीत के बीच में कब विज्ञापन बजना शुरू हो जाएगा कोई कह नहीं सकता!! इनके पास संसाधन का रोना तो है ही एक ग्लोबल मानसिकता का अभाव भी है! या यूँ कहे अपनी संस्कृति को नए अंदाज़ में पेश करने की कला नहीं है, तमीज नहीं है!

उम्मीद है विविध भारती श्रोताओ की नब्ज पहचानकर अपने तौर तरीको में सुधार लाएगा. वो ये ना भूले श्रोताओ की पसंद से ऊपर कुछ नहीं. रफ़ी के एक महान गायक थें पर उनके सापेक्ष अन्य गायक भी उतने ही सुरीले और वजनी थे. आप और गायकों की उपेक्षा क्यों कर रहे है? देश में फैले विभिन्न श्रोता फोरमो को मेरी ये सलाह है कि प्रसार भारती के अधिकारियो को “रफ़ी की बरफी” काट रहे विविध भारती के कुछ संदिध तत्त्वों के बारे में खबर करे नहीं तो जो विविध भारती की थोड़ी सी  लोकप्रियता बची है वो भी इससे छिनते देर ना लगेगी.

इतने अच्छे गायक गायिकाएं हमारे पास है तो सिर्फ रफ़ी के हे गीत बजाने का क्या तुक है?

इतने अच्छे गायक गायिकाएं हमारे पास है तो सिर्फ रफ़ी के हे गीत बजाने का क्या तुक है?

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सोशल मीडिया पे हमने एक चर्चा का आयोजन किया. उस पर कुछ श्रोताओ ने ये बात कही:

विनय धारद:

विविध भारती कब इस्‍लामीकरण से दूर होकर किशोर कुमार के गीत सुनाएगा!!

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आनंद शर्मा, मुंबई:

मो. रफ़ी बेशक बहुत सुरीले और बहुमुखी गायकी प्रतिभा के धनी थे लेकिन केवल वे ही एकमात्र श्रेष्ठ गायक थे ऐसा कहना उसी मूर्ख को शोभा देता है जिसने उनके समय के किसी अन्य गायक को न सुना हो.

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वीरेन्द्र मिश्र, मुंबई:

मुंबई में रहते हुए बहुत ही निकट से फिल्मी दुनिया से परिचित रहा हूँ। कुछ समय पत्रकारिता भी की है। इतना तो आप भी स्वीकारें कि हिन्दी फिल्मोद्योग अनेकानेक वर्षों से अंडरवर्ल्ड और विशेषकर मुस्लिम परस्त रहा है। आप पायेंगे कि घटिया से भी घटिया मुस्लिम कलाकार हिन्दी फिल्मोद्योग में जोड़ तोड़ के बलबूते बडी ही जल्द प्रचार पाकर स्टारडम के शीर्ष पर पहुंच जाता है।

रफी साहब व्यक्तिगत रूप से अच्छे व्यक्ति थे लेकिन यह वह समय था जब नौशाद-दिलीप कुमार गैंग येन-केन-प्रकारेण मुस्लिम कलाकारों को स्थापित करने के लिए एडी चोटी का जोर लगा रहे थे। इसी कडी में रफी साहब की प्रशस्ति में आकाश पाताल एक कर दिया गया और वही किशोर दा का नाम बिगाडने का भयानक कुचक्र रचा गया जिसमे यह गैंग अति सफल रही। इन्हें कुछ ऐसे राजनेताओं का संरक्षण भी प्राप्त था जो सेक्युलर थे, जिनका काम हिन्दू विरोध था। इन्ही काम षड्यंत्र था कि किशोर दा को ‘अंडर प्ले’ किया जाये। उस समय के जो संगीत मनीषी कहलाते थे वे भी किसी न किसी कारणवश ऐसी चाटुकारिता में लिप्त रहते थे। बहुत महान गायक होने के उपरांत भी रफी साहब के कुछ गीत ऐसे हैं जिन्हें सुनकर खीज और उकताहट होती है।

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सुधीर द्विवेदी, नयी दिल्ली:

जहा तक मुझे लगता है रफ़ी साहब ने बाकी गायको की तुलना में ज्यादा गीत गाये है और वो भी क्लासिक दौर में अर्थात 50 से 70 के दशक के बीच तो स्वाभाविक है की रफ़ी साहब के गीत ज्यादा सुनाई देंगे। और विविध भारती क्लासिक पीरियड को ज्यादा महत्व देता है। अब प्राइवेट फम चैनल्स को ले लीजिये पुराने गीत के नाम पे वो सिर्फ किशोर कुमार और आर डी बर्मन के कॉम्बिनेशन के गीत ही बजाते है। 1 घंटे के प्रोग्राम् में अगर 10 गाने बजते है तो उसमे 7 गाने किशोर दा के होते और बाकी 3 गानो में रफ़ी साहब मुकेश जी और कभी कभी दूसरे गायको के गाने बज जाते है। बरहाल जो भी हो मेरे  हिसाब से गीत  श्रोताओ की विविधतापूर्ण  पसंद को ध्यान में रखते हुए ही बजाने चाहिए। जिस हिसाब से गानो की फरमाइश हो उसी अनुपात में गायको के गाने बजने चाहिए। इस बात की जांच होनी चाहिए कि रफ़ी के गीत क्यों कर ज्यादा बजते है. किसी ख़ास गायक के गीतों को थोपना ठीक बात नहीं!

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हरीश सेठ, औसा, महाराष्ट्र:

नमस्कार! मैंने भी विनंती की थी कि हर कार्यक्रम में किशोर के कुछ नग़्मों को याद कीजियेगा. मुकेश, येसुदास और  मनहर जैसे कई सुरसम्राट जो विविध भारती के प्रोग्रामो में रफी जी के मुकाबले कम ही पेश होते हैं. रफी जी का स्थान दुनिया का कोई गायक नहीं ले पाएगा. वो सर्वोत्तम ही थे. मगर बहुत से श्रोता चाहते रहे है कि सुरों के संसार में हरदम सभी सितारों की गूँज सुनाई दे. गायिकाओं के बारे में भी इसी बात को लेकर विचार हो..ये प्रार्थना है हमारी.

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हेमंत कुमार और लता की आवाज़ में ये “नागिन” चलचित्र का बेहद सुंदर गीत सुने. संगीत हेमंत कुमार का है .गीत को लिखा राजिंदर कृष्ण ने है.

Pics Credit:

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The Compositions Of Lesser Heard Indian Music Directors

Indian Film Industry Gave Recognition To Many  Talented Souls But There Were Many Great Souls Who Failed To Get Due Credit!

Indian Film Industry Gave Recognition To Many Talented Souls But There Were Many Great Souls Who Failed To Get Due Credit!

Indian movies are incomplete without music. Music in Indian movies provide them a distinguished appeal making them stand apart from Western movies relying heavily on storyline. In fact, movie named Indrasabha which was released in 1932 had more than 70 songs! It holds the world record for maximum number of songs in any musical. Let’s not forget that it was the second year after Alam Ara -the first movie to have sound in 1931.  And in the very second year of introduction of sound we created record number of songs in one feature film! That substantiates our craze for songs! Anyway, we are now living in ultra-modern age wherein Indian film music differs hugely from days when it first came into existence in 30’s. The musical journey which began in first half of 1930  witnessed  until now host of talented music directors who provided listeners haunting tunes set upon Indian classical music. Some of them gained huge popularity but there were unfortunate ones as well who despite providing real good music failed to shine brightly. However, the few songs which they came to compose remain evergreen in memories. They are priceless gems for any music lover who has got refined taste for music.

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This song is from movie “Aag” (1948).  Raj Kapoor made his directorial debut with this movie. It was made on complex theme that true beauty is more than skin deep! Raj Kapoor was pretty young when he directed this movie but his mature treatment of this complex subject proved beyond doubt that India was about to see rise of great film maker. Ram Ganguly gave memorable music in this movie. The song sung by Mukesh” Dil Jalta Hai To Jalne De” and “Dekh Chand Ki Aur” sung by Sailesh Mukherji and Meena Kapoor left listeners spellbound. Mukesh virtually imitated K L Saigal while rendering “Dil Jalta Hai To Jalne De” but he went on to develop his own style of singing in later years. Ram Ganguly gave fabulous music in this movie but he failed to strike rapport with Raj Kapoor. That ensured arrival of Shankar- Jaikshan in Raj Kapoor’s life. This song sung by Shamshad Begum is picturized on Nargis.


This song from movie Saranga (1961) composed by Sardar Malik and penned by Bharat Vyas. It’s based on Raga Yaman Kalyan- a raga sung in night hours. Saradar Malik was a very talented music director  but unfortunately he belonged to era wherein great composers ruled the roost. The period between 1950 and 1960 set high standards in field of Indian music with likes of Shankar Jaikishan, Hemant Kumar, Naushad, Ravi and Madan Mohan, to name a few,  delivered their best work. It was a Herculean task  for a new composer to make itself known in that period since not much space existed. However, some of the songs composed by Sardar Malik have managed to retain their charm even after so many decades. They are “Aye Gham-E-Dil Kya Karu” (Talat Mahmood in Thokar), “Ha Diwana Hoon Main” (Mukesh in Saranga) and “Mai Gareebo Ka Dil Hoon Watan Ki Zubaan” (Hemant Kumar in Ab-E-Hyaat). He died in 2006 after battling with long disease. And yes, he was  father of Anu Malik- the talented musician of current era.


This song composed by Snehal Bhatkar was written by Kidar Nath Sharma. Kidar Nath Sharma was a genius in a sense that he introduced giants in Indian movie landscape like Raj Kapoor, Madhubala and Geeta Bali! He was also a lyricist besides being a legendary movie maker. Anyway, this song sung by Mubarak Begum received a lukewarm response at initial stages. However, it’s mesmeric haunting tune and brilliant picturization ensured that it became a huge hit. It’s one of the few songs which did not let Snehal Bhatkar and Mubarak Begum fade into oblivion. This song is picturized on gorgeous Tanuja who was then struggling hard to ensure her place in film industry. This movie finally let her had desired stardom. Snehal Bhatkar mainly worked for the production of Kidar Nath Sharma. Besides this song, this number “Lehron Pe Lahar Ulfat Hai Jawan” (Chhabili released in year 1960)  in voice of Heman Kumar made Snehal Bhatkar a household name in his era.


Hansraj Behl
started giving music in late 40’s and  managed to carve indelible impressions on minds of music lovers. Although he stayed in world of music for nearly three decades, he did not get much chance to explore his talent. His music appeared in movies which failed to do good business. As a result of that not much opportunity came his way, leading to manifestation of just few good songs on his part. However, songs like “Bheega Bheega Pyar Ka Sama” ( Sawan released in 1959), “Zindagi Bhar Gham Judaai Ka” ( Miss Bombay released in 1957) and “Jahan Daal-2 Par Sone Ki Chidiya” (Sikandar-E-Azam released in 1965). This song is from movie Changez Khan released in 1957 and is  written by Qamar Jalalabadi. It has such a soulful prelude that it makes the song immortal. The unusual depth exhibited by Rafi in this song makes this song very special at least in my eyes!



Iqbal Qureshi
did not get much opportunity to exhibit his talent in Indian movies but he still managed to carve a niche for himself by composing beautiful songs which refuse to part ways from memories of listeners. Love In Shimla, Panchayat, Yeh Dil Kisko Doon, Cha Cha Cha, Umar Qaid and Banarasi Thug, to name a few, were some of the prominent movies which featured his music. “Do Badan Pyar Ki Aag Me Jal Gaye Ek Chameli Ke Mandave Tale” is technically a Nazm which is different than a Ghazal. Famous Urdu poet Shahryar speaking about Nazm says that in Nazm poet deals specifically with the theme while Ghazal is more a generalized take on a certain theme. In movies we so often find Ghazals but Nazms are a rarity. This “Nazm” which appeared in movie Cha Cha Cha (1964) was penned by famous Urdu poet Makhdoom Mohiuddin. Chandrashekhar and Helen played the lead roles in this movie.

6. S. Mohinder: Guzra Hua Zamana Aata Nahi Doobara


To understand the depth of his music one needs to listen songs from movie Shirin Farhad released in 1956. S. Mohinder who became associated with Filmistan Studio learnt the basics of Indian classical music in Varanasi. He was born in Pakistan but later migrated to India. The movies in which he gave music were commercially not successful  which prevented this talented musician from attaining desired fame. However, he got National Award in 1970 for movie Nanak Naam Jahaz Hai (1969). This sad number  sung by Lata Mangeshkar has been written by Tanveer Naqvi.

Ramlal Choudhry, Ganesh, Dan Singh,  Lachhiram Tamar and G.S. Kohli:

The common link among all these talented music directors is that despite exhibiting their talent in exceptional way, they just could not withstand the dirty politics played by vested interests in film industry. Ramlal Chaudhary who gave  memorable songs in Sehra (1963) and Geet Gaya Pattharon Ne (1964) was unhappy the way well-known music directors of his age campaigned against him in vicious manner. That forced him to start his own production but this did not augur well for him.

Dan Singh also became victim of negative publicity done by powerful music directors who felt threatened by his talent. In his later years, he could not hide his pain and brought in light the dirty tricks employed by reputed music directors to crush the emerging talents in film industry. He accused few well-known music directors of stealing his compositions. Anyway, Dan Singh’s melodious numbers in My Love (1970) made his presence immortal. “Zikra Hota Hai Jab Qayamat Ka” sung by Mukesh makes any good listener go into trance!

G.S Kohli assisted music director O P Nayyar in many of his hit movies before giving music independently. His career as independent music director did not last for long. After giving music in movies like Shikari, Faulad, Mr. India (1961) and Bhai-Bahen, to name a few, he faded into oblivion. However,  anybody who comes to listen this Shikari song “Tumko Piya Dil Diya Kitne Naaz Se” is bound to become curious about maker of this evergreen song!

Ganesh gave beautiful songs in movies like Kundan, Anjam, Thakur Jarnail Singh, Husn Aur Ishq , Badnaam and Chalak, to name a few. However, this song picturized on Helen made his name eternal in Hindi film music: Hum Tere Bin Jee Na Sakenge (Thakur Jarnail Singh). Interestingly, Shikari’s (music by G.S. Kohli) famous song also features Helen!

Lachhiram Tamar made his presence quite early in Indian film industry. Champa which was made in (1945) was followed by  Badnami, Kahan Gaye, Shalimar, Mohini, Ameer, Razia Sultana and Mai Suhagan Hun (1964) He gave music in as many as twenty movies. His fame rests upon songs he composed for  Mai Suhagan Hun (1964). The songs like “Aye dil machal machal ke yun rota hai zar zar kya” (Lata) and “Dhalti Jayen Raat Kahle Dil Ki Baat” ( Asha/Rafi in Razia Sultana {1961} ) enchant the listeners even in this age marred by loud music!

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