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कवि और कविताये: समय से परे होकर भी यथार्थ में नए आयाम जोड़ जाते है!

अदम गोंडवी: सही मायनों में जनकवि

अदम गोंडवी: सही मायनों में जनकवि

कविताओ में बहुत ताकत होती है विचारो के प्रवाह को मोड़ने की, उनको एक नया रूख देने की। ये अलग बात है कि कवि और कविताओ की आज के भौतिकप्रधान समाज में कोई ख़ास अहमियत नहीं, इनकी कोई ख़ास “प्रैक्टिकल” उपयोगिता नहीं। लेकिन उससे भी बड़ा सच ये है कि कविताओ की प्रासंगिकता सदा ही जवान रहेंगी। कवियों को समाज नकार दे लेकिन उनके अस्तित्व की सार्थकता को नकारना समाज के बूते के बस की बात नहीं। उसकी एक बड़ी वजह ये है कि कवि और कविताएं इस क्षणभंगुर संसार और पारलौकिक सत्ता के बीच एक सेतु का काम करते है। ये समाज के विषमताओ के बीच छुपे उन जीवनमयी तत्वो को खोज निकालते जो सामान्य आँखों में कभी नहीं उभरती। इसी वजह से कम से कम मुझे तो बहुत तकलीफ होती है जब कविताओ और कवियों को समाज हेय दृष्टि से देखता है या उपयोगितावादी दृष्टिकोण से इन्हें किसी काम का नहीं मानता। खैर इसे कुदरत का न्याय कहिये कि उपेक्षा की मौत मरने वाले कवि और लेखक भले असमय ही इस संसार को छोड़ कर चले जाते हो उनके शब्द अमर होकर धरा पे रह जाते है। उनके शब्द समय के प्रवाह को मोड़कर नया रास्ता बनाते रहते है। मोटरगाडी में सफ़र करने वाले तो गुमनाम हो जाते है लेकिन जीवन भर गुमनामी और उपेक्षा सहने वाले कवि/लेखक अमर हो जाते है। उनकी आभा धरा पे हमेशा के लिए व्याप्त हो जाती है।

आइये कुछ ऐसी ही कविताओ को पढ़ते है जो गुज़रे वक्त के दस्तावेज सरीखे है।

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अदम गोंडवी की ये कविता मजदूरों के अहमियत को पाठक के मष्तिष्क पटल पर वास्तविक रूप से उकेरती है । उनके यथार्थ को यथावत आपके सामने रख देती है। २२ अक्टूबर १९४७ को गोंडा जिले के आटा गाँव में जन्मे इस क्रन्तिकारी कवि ने समय के पटल पर कुछ ऐसी रचनाये रची जो संवेदनशील ह्रदय में सकारात्मक वेदना को जन्म दे देती है। वैसे इस कविता में देश में व्याप्त दुर्दशा का भी चित्रण है लेकिन प्राम्भिक पंक्तिया मजदूर पर आधारित है जिसको पढ़कर मुझे रामधारी सिंह “दिनकर” जी की ये पंक्तिया स्मरण हो आई:

‘‘मैं मजदूर हूँ मुझे देवों की बस्ती से क्या!, अगणित बार धरा पर मैंने स्वर्ग बनाये,
अम्बर पर जितने तारे उतने वर्षों से, मेरे पुरखों ने धरती का रूप सवारा’’

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वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है
उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है

इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है

कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है

रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है

 -अदम गोंडवी

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बशीर बद्र ने वैसे तो जीवन के कई रंगों का जिक्र किया लेकिन रूमानियत के रंग में डूबी इनकी ग़ज़लों को जगजीत सिंह ने स्वर देकर एक नयी ऊंचाई दे दी।ये ग़ज़ल मैंने पहल पहल जगजीत सिंह की आवाज़ में सुनी जिसे बहुत ही सधे स्वर में जगजीत जी ने गाया है। और अब पढने के बाद बहुत भीतर तक उतर गयी बशीर साहब की ये ग़ज़ल।

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सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा
इतना मत चाहो उसे, वो बेवफ़ा हो जाएगा

हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे, रास्ता हो जाएगा

कितनी सच्चाई से मुझ से ज़िन्दगी ने कह दिया
तू नहीं मेरा, तो कोई दूसरा हो जाएगा

मैं ख़ुदा का नाम लेकर पी रहा हूँ दोस्तो
ज़हर भी इसमें अगर होगा, दवा हो जाएगा

सब उसी के हैं हवा, ख़ुश्बू, ज़मीनो-आसमाँ
मैं जहाँ भी जाऊँगा, उसको पता हो जाएगा

बशीर बद्र

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रमाकांत दूबे जी का नाम शायद लोगो ने कम सुना हो लेकिन इनके द्वारा ग्रामीण लोक में बसी आत्मा में रची ये कविताये कही भी पढ़ी जाई अपना असर दिखा जाती है। ३० अक्टूबर १९१७ को जन्मे इस कवि ने अपनी जड़ो का कभी नहीं छोड़ा और आज़ादी से पहले और आज़ादी के बहुत बाद तक जो भी समय ने दिखाया उसे वैसा ही शब्दों में रच डाला। यकीन मानिए इन पंक्तियों को २०१३ में पढ़ते हुए ऐसा कभी नहीं लगा कि इनको चालीस साल पहले रचा गया होगा। इसकी प्रासंगिकता की अमरता पर हैरानी सी हो रही है। यूँ आभास हो रहा है किसी ने चालीस साल पहले ही २०१३ में क्या व्याप्त होगा ये देख लिया था। इसीलिए तो  मुझे  ये कहने में कोई संकोच नहीं कि कवि संसार में रहते हुएं भी संसारी ना होकर समय से परे रहने वाला एक विलक्षण जीव होता है।

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खाके किरिया समाजवाद के खानदानी हुकूमत चले
जैसे मस्ती में हाथी सामंती निरंकुश झूमत चले
खाके गोली गिरल परजातंतर कि मुसकिल इलाज़ हो गइल
चढ़के छाती पे केहू राजरानी, त केहू जुवराज हो गइल

– रमाकांत दूबे

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अदम गोंडवी: जो उलझ कर रह गयी है फाइलों के जाल में गाँव तक वह रौशनी आएगी कितने साल में

अदम गोंडवी: जो उलझ कर रह गयी है फाइलों के जाल में गाँव तक वह रौशनी आएगी कितने साल में!


कुछ अच्छी कवितायेँ आप यहाँ पढ़ सकते है: कविता कोष 

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मुझसा अंग्रेजी का लेखक हिंदी में क्यों लिखता है जी?

 

हिंदी से गहरा प्रेम बचपन सें है

हिंदी से गहरा प्रेम बचपन सें है


हिंदी से गहरा प्रेम बचपन सें है, संस्कृत और उर्दू से भी है. आप मेरे ब्लाग पर फिर से जाए तो ये सही है अंग्रेजी में अधिकतर लेख है क्योकि मुख्यतः वो अंग्रेजी लेखो के लिए बना है एक अंग्रेजी के लेखक के रोल निर्वाहन के कारण. हिंदी में लिखना प्रारंभ  इसी हिंदी प्रेम और हिंदी सेवा के खातिर किया. इस के लिए अंग्रेजी के मंचो पर भी विद्वान् लोगो से काफी बहस की. तो बात साफ़ है अंग्रेजी का लेखक होने के बाद भी, समयाभाव होते हुए भी हिंदी में लेख अंग्रेजी के ब्लाग पर लिख ले रहा हूँ,  या ऐसे मंचो पे हिंदी लेख पोस्ट कर देता हूँ जहाँ हिंदी पर कुछ कहने सुनने पर प्रतिबन्ध है तो किसी को मेरे हिंदी प्रेम पर कोई  शक-सुबहा नहीं होना चाहिए. ये जानकर आपको आश्चर्य होगा किसी अंग्रेजी फोरम पे जहा हिंदी पे  पाबन्दी  थी उसी  मंच पर इन्टरनेट जगत में हिंदी के राष्ट्रभाषा सम्बन्धी सवाल पर एक सबसे लम्बी बहस का आयोजन किया. लिहाजा यथाशक्ति  मेरी  तरफ से जो हो सकता है वो मेरी तरफ से हो रहा है जबकि ना मेरे पास आर्थिक बल है और ना ही संसाधन. मेरे बहुत से लेखो का लोगो ने जब हिंदी अनुवाद चाहा मैंने उन्हें उपलब्ध करा दिया. कितने हिंदी के पत्रकार बंधुओ के पास  अपने ही अंग्रेजी लेख का अपना ही किया अनुवाद पड़ा  है जो उनके आग्रह पर मैंने उनको दिया है. अब देखिये आपके ये हिंदी मित्र कब तक इसे पब्लिश कर हरियाली फैलाते है!      

लेकिन इसके बाद भी मै रहूँगा अंग्रेजी का लेखक ही. उसके कई कारण है. एक तो हिंदी जगत में व्याप्त  गन्दी राजनीति जिससें मुझे घिन्न आती  है.  एक लेखक होने के नाते मुझे लिखने में दिलचस्पी है  ना कि राजनीति में जिसका हिंदी जगत से बड़ा गहरा याराना है. राजनीति मै बेहतर कर सकता हूँ पर तब लिखने के लिए समय कहा मिलेगा? खैर जो सबसे बड़ा कारण है वो आपकी व्यापक पहचान. अंग्रेजी में ना लिखता तो शायद विभिन्न देशों में मुझे इतने प्रतिभवान लेखको, मित्रो का प्रेम मुझे ना मिलता. अंग्रेजी में लिखने का सबसे बड़ा फायदा ये है कि अनुवाद का भय खत्म हो जाता है क्योकि अनुवादित होते ही साहित्य रसहीन हो जाता है ऐसा मेरा मानना है. अनुवादित चीज़े मै केवल मजबूरी में पढता हूँ. सो मेरे साथ ये तो भय नहीं ना रहा कि अपनी बात सही सही लोगो तक पहुच रही है कि नहीं. किसी की इस बात से मै इत्तेफाक मै नहीं रखता कि मेरे लेखो के विषय देश काल से बाधित है. फिर से देखे मेरे लेख और आपको उसमे ग्लोबल मिलेगा लोकल की बाहें  थामे.

ये बात भी महत्त्वपूर्ण है कि नीति निर्माता चाहे लोकल स्तर पे हो या ग्लोबल स्तर पर हगते मूतते कैसे भी हो पर समझते अंग्रेजी में ही है. सो जब तक आप इनसे अंग्रेजी में बकैती नहीं करेंगे तब तक ये आप की बात समझने से रहे. ये भी जानना उचित रहेगा कि अंग्रेजी मातृभाषा ना होने के कारण भाव के सम्प्रेषण के लिए कम से कम मेरे लिए तो बहुत सही नहीं लगती और भाषा की शुद्धता को ऊँचे स्तर तक ले जाने के बाद भी भाषा  सम्बन्धी गलतियां रह जाती है. इसके बाद भी मुझे बहुत स्नेह मिला है विदेशी भूमि पर गुणीजन लोगो के द्वारा. और ऐसा भी नहीं कि यहाँ राजनीति नहीं हुई. जम के हुई, मेरा विरोध हुआ, भाषा प्रयोग पर कुछ वर्ग विशेष की तरफ से आपत्ति हुई, सम्मान देने के बाद मेरे साईट को ब्लाक करने जैसी अपमानजनक बाते हुई पर ईश्वर की कृपा से पूर्व में अच्छा काम इतना हो चुका था कि मेरी छवि  को कुछ नुकसान नहीं पंहुचा. खैर ये सब तो लेखन जगत में आम बात है. मैंने जब डेढ़ दशक पहले लिखना शुरू किया तभी देशी विदेश अखबारों मैग्जीनो में छप चुका था, अच्छे विदेशी संपादको और लेखको से काफी विचार विमर्श कर चुका था, जिसमे जेरेमी सीब्रुक (द स्टेट्समैन, कलकत्ता से सम्बंधित स्तंभकार), रामचंद्र गुहा( द टेलीग्राफ, कलकत्ता) और बिल किर्कमैन ( द हिन्दू, मद्रास) कुछ उल्लेखनीय नाम है  इसलिए जब ऑनलाइन हुआ तब ऐसी सतही बातो का मुझ पर कोई ख़ास असर नहीं हुआ. हाँ थोड़ी तकलीफ जरूर हुई.

अब  इतना  आगे बढ़ चुका हूँ कि पीछे देखनें का कोई मतलब नहीं. अंग्रेजी में लिखना सहज और मधुर लगता है अब.  मेरी हिंदी सेवा वाली बात से आप सब निश्चिंत रहे. हिंदी के लिए काम करने वाले सरकारी अफसरों से हम संसाधन विहीन अंग्रेजी के लेखक बेहतर काम कर रहे है बिना नाम-वाम के मोह या मुद्रा के लालच में पड़े. चलते चलते राज की बात सुनते चले कि ईमानदार हिंदी या अंग्रेजी बुद्धिजीवी लेखक कम से कम एक मामले में बराबर है: इनको ढंग का पैसा ना तो हिंदी के प्रकाशक देते है और ना ही अंग्रेजी जगत के प्रकाशक!

हिंदी के लिए काम करने वाले सरकारी अफसरों से हम संसाधन विहीन अंग्रेजी के लेखक बेहतर काम कर रहे है

हिंदी के लिए काम करने वाले सरकारी अफसरों से हम संसाधन विहीन अंग्रेजी के लेखक बेहतर काम कर रहे है

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Please Don’t Hail Distortion Of Hindi In The Name Of Evolution Of Language !

Please Don't  Hail Distortion Of Hindi In The Name Of Evolution Of Language !

Nobody seems to be seriously interested in retaining the glory of Hindi in its pure form.  Right from the so-called celebrations on ‘Hindi Divas’, falling on September 14, and sketchy efforts to provide Hindi its due at United Nations, the hopes to make Hindi essence of India have not been backed up by substantial policies.  As a result of this myopic attitude of government towards its promotion ,the newer distorted form ” Hinglish ” has made its presence felt.  Ironically, there are only few left in Doordarshan and AIR having total command over right pronunciation of Hindi words .

Well, one can’t expect present day youths, having spent early years in convent school, to show any interest in Hindi. Our filmmakers and lyricists have their commercial interests ,which come in the promotion of Hindi. Gone are the days when legendary news-reader Devaki Nandan Pandey or, for that matter, lyricist Pradeep evoked a sense of wonder by unleashing magic of Hindi.Yes, we have covered a long distance from ” Chandan sa badan chanchal chitavan” to ” Thanda-Thanda Cool-Cool Effect“.  Can this transformation (read degradation) be hailed as evolution of language?

Please Don't  Hail Distortion Of Hindi In The Name Of Evolution Of Language !

Reference:

Hindustan Times Blog

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The great Rudolf Steiner Quotes Site

Quotes and fragments from the work of the great visionary, thinker and reformer Rudolf Steiner

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Welcome to Noble Thoughts from All Directions to promote the well-being of man through Self-Discovery.

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