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कांची के शंकराचार्य की रिहाई इस बात को दर्शाती है कि वर्तमान समय में दुष्प्रचार ज्यादा ताकतवर है बजाय सत्य के!

कांची के शंकराचार्य अंततः निर्दोष और निष्पाप होकर उभरे लेकिन इस नौ साल लम्बे ड्रामे की वजह से इस अति प्राचीन हिन्दू मठ पर जो दाग लगे उसको मिटने में कई वर्ष लगेंगे.

कांची के शंकराचार्य अंततः निर्दोष और निष्पाप होकर उभरे लेकिन इस नौ साल लम्बे ड्रामे की वजह से इस अति प्राचीन हिन्दू मठ पर जो दाग लगे उसको मिटने में कई वर्ष लगेंगे.


इस नए युग के इंडिया यानि “भारत” के अगर हाल के घटनाओ को देखे तो ये आसानी से समझ आ जाएगा कि धर्मनिरपेक्ष सरकारो ने सबसे ज्यादा जुल्म ढाया है हिन्दू संतो पर. ये धर्मनिरपेक्ष सरकारे मुग़लकाल के बाद्शाहो और ब्रिटिश काल के शासको से भी ज्यादा क्रूर रही है हिन्दू धर्मं से जुड़े प्रतीकों को ध्वस्त करने और इनसे जुड़े लोगो को अपमानित करने के मामले में. हिन्दू संतो को निराकरण ही प्रताड़ित किया जा रहा है और इन्हे यौन अपराधो से लेकर देशद्रोह जैसे जघन्य अपराधो में बेवजह घसीटा जा रहा है. बिकी हुई मीडिया इन प्रकरणो का एक पक्ष 
दिखाती  है अपने देश में और देश के बाहर विदेशी अखबारो में. ये आपको अक्सर देखने को मिलेगा कि इस प्रकार के खबरो में ज्यादातर झूठ होता है या अर्धसत्य का सहारा लेकर एक भ्रामक कहानी गाढ़ी जाती है. कोई भी मुख्यधारा का समाचार पत्र तस्वीर के दोनों पहलू दिखाने में दिलचस्पी नहीं रखता.

एक सबसे बड़ी वजह ये है कि ज्यादातर  भारतीय मीडिया समूह का कण्ट्रोल विदेशी ताकतो के हाथो में है. सबके विदेशी हित कही ना कही शामिल है तब हम किस तरह से इनसे ये आशा रखे कि ये सच बोलेंगे? ये वही मुख्यधारा के समाचार पत्र है जो साध्वी प्रज्ञा के गिरफ्तारी को तो खूब जोर शोर से दिखाते है लेकिन साध्वी के साथ जेल के अंदर हुए अमानवीय कृत्यो को जो बंदियो के अधिकारो का सरासर उल्लंघन था उसको दिखाने या बताने से साफ़ मुँह मोड़ गए. ये वही मुख्यधारा के समाचार पत्र है जिन्होंने देवयानी प्रकरण में देवयानी का साथ इस तरह से दिया जैसी कि उसने भारत के नाम विदेशो में ऊँचा किया हो, जैसे उसने कोई जुर्म ही नहीं किया हो. वो इसलिए से क्योकि इसका सरकार से सीधा सरोकार है और सिस्टम इसके पक्ष में है लेकिन हर वो आदमी जिसने भी सरकार ये सिस्टम के विपक्ष में कुछ कहा उसे इस तरह की  सरकारे या सिस्टम सुनियोजित तरीको से अपराधी घोषित कर देता है.

ये कहने में कोई संकोच नहीं कि आज के युग मे सत्य से ज्यादा असरदार किसी के खिलाफ सुनियोजित तरीके से फैलायी गयी मनगढंत बाते है. समाचार पत्रो का काम होता है सत्य को सामने लाना सही रिपोर्टिंग के जरिये लेकिन हो इसका ठीक उल्टा रहा है: मीडिया आज सबसे बड़ा हथियार बन गयी है झूठ और भ्रम को विस्तार देने हेतु. इसका केवल इतना काम रहा गया है कि हर गलत ताकतो को जो सत्ता में है उनको बचाना, उनको बल देना. एक बाजारू औरत की तरह अपनी निष्ठा को हर बार बदलते रहना मीडिया का एकमात्र धर्मं बन गया है. साधारण शब्दो में ये सत्ता पे आसीन शासको की भाषा बोलता है. कांची के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी की गिरफ्तारी के प्रकरण के रौशनी में इस प्रकरण को देखे जिन्हे २००४ में बेहद शर्मनाक तरीके से शंकर रमण के हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था. शंकर रमण कांची के एक मंदिर में मैनेजेर थें. उस वक्त के तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने अपने को धर्मनिरपेक्ष साबित करने के लिए और ये जताने के लिए कि कानून से ऊपर कोई नहीं होता इनकी गिरफतारी सुनिश्चित की. कांची के शंकराचार्य के ऊपर “आपराधिक षड्यंत्र, अदालत को गुमराह करने गलत सूचना के जरिये, धन का आदान प्रदान आपराधिक गतिविधि को क्रियांवित करने के लिये” आदि आरोप लगाये गए.

इस एक हज़ार साल से भी ऊपर अति प्राचीन ब्राह्मणो के अत्यंत महत्त्वपूर्ण केंद्र के मुख्य संचालक को इस तरह अपमानजनक तरीके से एक दुर्दांत अपराधी के भांति गिरफ्तार करना और फिर मुख्यधारा के समाचार पत्रो के द्वारा अनर्गल बयानो के आधार पर उनको दोषी करार कर देना अपने आप में मीडिया की सच्चाई बयान कर देता है. ये बता देना आवश्यक रहेगा कि कांची कामकोटि पीठ हिन्दुओ का अति प्राचीन मठ है जिसको हिन्दू समुदाय में दुनिया भर में बेहद श्रद्धा के साथ देखा जाता है. कांची के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी बहुत सम्मान की दृष्टि से देखे जाते रहे है हिन्दू शास्त्रो के मर्मज्ञ होने के कारण. इन्होने  नवी शताब्दी में स्थापित कांची कामकोटि पीठ के गरिमा को नयी ऊंचाई प्रदान की, जिसकी हिन्दू समुदाय में वेटिकन चर्च सरीखी पकड़ है. जयललिता और ब्राह्मण विरोधी नेता डीएमके प्रमुख करूणानिधि के आपसी मतभेदों के चलते इस हिन्दू मठ के माथे पर कालिख लग गयी.

 ये बता देना आवश्यक रहेगा कि कांची कामकोटि पीठ हिन्दुओ का अति प्राचीन मठ है जिसको हिन्दू समुदाय में दुनिया भर में बेहद श्रद्धा के साथ देखा जाता है. कांची के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी बहुत सम्मान की दृष्टि से देखे जाते रहे है हिन्दू शास्त्रो के मर्मज्ञ होने के कारण. इन्होने  नवी शताब्दी में स्थापित कांची कामकोटि पीठ के गरिमा को नयी ऊंचाई प्रदान की, जिसकी हिन्दू समुदाय में वेटिकन चर्च सरीखी पकड़ है. जयललिता और ब्राह्मण विरोधी नेता डीएमके प्रमुख करूणानिधि के आपसी मतभेदों के चलते इस हिन्दू मठ के माथे पर कालिख लग गयी.

ये बता देना आवश्यक रहेगा कि कांची कामकोटि पीठ हिन्दुओ का अति प्राचीन मठ है जिसको हिन्दू समुदाय में दुनिया भर में बेहद श्रद्धा के साथ देखा जाता है. कांची के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी बहुत सम्मान की दृष्टि से देखे जाते रहे है हिन्दू शास्त्रो के मर्मज्ञ होने के कारण. इन्होने नवी शताब्दी में स्थापित कांची कामकोटि पीठ के गरिमा को नयी ऊंचाई प्रदान की, जिसकी हिन्दू समुदाय में वेटिकन चर्च सरीखी पकड़ है. जयललिता और ब्राह्मण विरोधी नेता डीएमके प्रमुख करूणानिधि के आपसी मतभेदों के चलते इस हिन्दू मठ के माथे पर कालिख लग गयी.

उस वक्त के प्रमुख समाचार पत्रो ने ये दर्शाया कि पुलिस इस तरह से गिरफ्तार करने का साहस बिना पुख्ता सबूतो के कर ही नहीं सकती. उस वक्त अभियोजन पक्ष के वकील इस बात से पूरी तरह आश्वस्त थे कि शंकराचार्य को दोषी साबित करने के लिए उनके पास पर्याप्त पुख्ता सबूत थें. विवेचना अधिकारी प्रेम कुमार का ये बयान प्रमुखता से छपा कि हमारे पास ठोस साक्ष्य है स्वामी जयेन्द्र सरस्वती के खिलाफ और ये कि शंकर रमण और इनके बीच करीब चार सालो से आपसी मनमुटाव था जिसको सिद्ध करने के लिए पर्याप्त सबूत इकठ्ठा किये जा रहे है.

खैर ईश्वर के यहाँ देर भले हो पर अंधेर नहीं है. सत्य की अंततः विजय हुई जब पांडिचेरी की विशेष अदालत ने सत्ताइस नवंबर २०१३ को उन सभी लोगो को जो शंकर रमण हत्याकांड में आरोपी बनाये गए थें उनको बाइज्जत बरी कर दिया. इसी के साथ नौ साल से हो रहे ड्रामे का पटाक्षेप हो गया. उन पर लगाये गए सभी आरोपो से उन्हें मुक्त कर दिया गया. जितने भी प्रमुख गवाह थें उन्होंने अभियोजन पक्ष के वर्णन को समर्थन देने से इंकार कर दिया। अभियोजन पक्ष के विरोध में करीब ८० से अधिक गवाहो ने अपने बयान दर्ज कराये।

कांची के शंकराचार्य अंततः निर्दोष और निष्पाप होकर उभरे लेकिन इस नौ साल लम्बे ड्रामे की वजह से इस अति प्राचीन हिन्दू मठ पर जो दाग लगे उसको मिटने में कई वर्ष लगेंगे. हिन्दुओ के आस्था और प्रतीक के साथ जो बेहूदा मजाक हुआ उसके निशान कई वर्षो तक संवेदनशील मनो को कटोचते रहेंगे. लेकिन हिन्दू ब्राह्मण के उदार मन को देखिये कि इतना होने के बाद भी किसी के प्रति कोई कटुता नहीं. इस परिपेक्ष्य में शंकराचार्य के वक्तव्य को देखिये जो उन्होंने बरी होने के बाद दिया: ” धर्म की विजय हुई. सत्य की जीत हुई. सब कुछ खत्म हो जाने के बाद अंत में केवल यही बात मायने रखती है. मुझे मेरे गुरु ने सब कुछ सहन करने को कहा है. इसलिए ये कहना उचित नहीं होगा कि हालात मेरे लिए असहनीय थें. हा कुछ दिक्कते जरूर आयी वो भी उस वजह सें कि हम लोग नयी तरह की परिस्थितयो का सामना कर रहे थें. हमने पूर्व में देखा है कि किस तरह आक्रमणकारियों ने हिन्दू मंदिरो पर हमले कर उनको विध्वंस किया। आज जब हम मंदिरो पर पड़े उन हमलो की निशानियाँ देखते है तो  हमे वे आक्रमणकारी और उनकी क्रूरता याद आती है. आज जो कुछ भी मठ के साथ हुआ ( मेरे पर जो  आरोप लगे) वे बहुतो की नज़र में पूर्व में किये गए आक्रमणकारियों के द्वारा किये गए विध्वंस सरीखे ही है.”

ये बहुत दुःख की बात है कि जैसे ही किसी हिन्दू संत पर कोई आरोप लगते है सारे मुख्यधारा के मीडिया समूह उस संत को बदनाम करने की कवायद में जुट जाते है पूरी ताकत से इस बात से बिल्कुल बेपरवाह होकर कि मीडिया का मुख्य काम किसी भी घटना की सही-२ रिपोर्टिंग करनी होती है ना कि न्यायिक ट्रायल करना। उससे भी बड़ी बिडम्बना ये है कि अगर संत पर लगे आरोप निराधार और झूठे पाये जाते है तो जो अखबार या फिर न्यूज़ चैनल आरोप लगने के वक्त पूरे जोर शोर से संत को दोषी ठहरा रहे थे वे ही अखबार और न्यूज़ चैनल पूरी तरह से कन्नी काट लेते है. संत को बेगुनाह साबित करने वाली खबर कब आती है और कब चली जाती है ये पता भी नहीं चलता है. यही वजह है कि कांची के शंकराचार्य की बेगुनाही और बाइज्ज़त बरी होना किसी भी शीर्ष अखबार के सुर्खियो में नहीं आया. शायद सेकुलर मीडिया ने ये सोच कर इस खबर को प्रमुखता से नहीं बताया क्योकि हिन्दुओ से जुडी कोई भली खबर सेक्युलर भावना के विपरीत होती है!

मेनस्ट्रीम मीडिया को प्रोपगेंडा ज्यादा रास आता है बजाय सत्य के. सेक्युलर ताकतो ने और इनके द्वारा संचालित मीडिया समूहो ने कांची के शंकराचार्य के गिरफ्तारी के वक्त ये बहुत जोरदार तरीके से ये दर्शाया कि कोई भी कानून से ऊपर नहीं होता. तो क्या यही सेक्युलर ताकते जो कानून की बात करती है शाही ईमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी को गिरफ्तार करने की हिम्मत रखते है जिन पर कई धाराओ में देश के विभिन्न थानो में एफ आई आर दर्ज है? क्या यही सेक्युलर ताकते उन क्रिस्चियन मिशनरीज को बेनकाब करने की ताकत रखती है जो देश के पिछड़े और दूर दराज के इलाको में लोगो को बहला फुसला कर उनका धर्म परिवर्तन कर रही है? लेकिन ये सबको पता है कि सेक्युलर मीडिया ऐसा कभी नहीं करेगा. ऐसा इसलिए कि इन सेक्युलर लोगो की निगाह में कानून के लम्बे हाथ केवल हिन्दू संतो के गर्दन तक पहुंचती है. ये हिन्दू संतो को केवल बदनाम करने तक ही सीमित है और हिन्दू आस्था को खंडित और विकृत करने भर के लिए है. ये दुष्प्रचार के समर्थक है सत्य के नहीं.

हिन्दू संत अपनी जाने गंवाते रहे है लेकिन ये खबरे कभी भी सेक्युलर मीडिया की सुर्खिया नहीं बनी. ये स्वामी लक्ष्मणानन्द जी की तस्वीर है जिनकी हत्या क्रिस्चियन ताकतो ने कर दी थी.

हिन्दू संत अपनी जाने गंवाते रहे है लेकिन ये खबरे कभी भी सेक्युलर मीडिया की सुर्खिया नहीं बनी. ये स्वामी लक्ष्मणानन्द जी की तस्वीर है जिनकी हत्या क्रिस्चियन ताकतो ने कर दी थी.


References:

IBN Live

The Hindu

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Acquittal of Kanchi Seers: A Sad Reminder Of The Fact That Propaganda Is More Powerful Than Truth!

The Acquittal Of Kanchi Seer: Truth has won over propaganda!

The Acquittal Of Kanchi Seer: Truth has won over propaganda!

Any close observer of the happenings in modern India would easily confirm that secular governments have unleashed a sort of war against Hindu saints. They have been framed in number of heinous crimes right from sexual crimes to crimes against national security. The paid media ensures that one-sided coverage gets highlighted not only within Indian landscape but also in International arena. In such matters wherein Hindu saints are involved, a striking feature is that news coverage is full of lies and twisted truths spread by secular press. None of the mainstream media dares to reveal both sides of the story in an impartial way.

One important reason is that most of the Indian media houses are in some way controlled by hidden powers in Western nations. How can we then expect truth to make its presence felt? After all, the mainstream media which harps about involvement of Sadhvi Pragya in blasts never found it important enough to report in same candid fashion about severe violation of rights of prisoners, about inhuman treatment meted out to her inside the jail! The same media is so hyper-sensitive about rights of Devyani who made mockery of India’s honour in West but yet she is being portrayed as if she committed no crime at all! That’s because she is part of the system. But anybody who dared to expose the misdeeds of government was branded as criminal in a well-planned manner!

What I am trying to ascertain that we have given way to era wherein propaganda has become more powerful than version close to truth. One of the most important job of media is to reveal the real picture but exactly opposite has taken place: Media has become carrier of falsehood and distorted versions. It’s main agenda has become to shield dubious powers in rule. Like a prostitute it keep changing its loyalty or, in other words, it generally speaks the language of rulers! Remember the arrest of Kanchi Shankaracharya Swami Jayendra Saraswati in year 2004 in most humiliating manner for allegedly playing a role in murder of Sankararaman, manager of the Sri Varadarajaswamy Temple. The then Chief Minister of Tamil Nadu,J Jayalalithaa, in an attempt to appear more secular than others and to give an impression that no one is above law ensured his arrest! The Kanchi seers were charged with” criminal conspiracy, misleading the court by giving false information, criminal trespass and supply of funds to carry out the criminal activity.”

The Truth Had The Last Laugh!

The Truth Had The Last Laugh!

The head of a 1,000-year-old Brahmin monastic order was presented as petty criminal in mainstream media and even before case was put to trial he was portrayed as accused. Let’s remember that Kanchi Kamakoti Peetham is one of the oldest Hindu mutts in the country and Shankarcharyas belonging to this mutt command a great respect among Hindu communities across the globe. In fact, Swami Jayendra Saraswati is a highly respected figure having profound knowledge of Hindu scriptures. He like his predecessors provided new heights to this mutt established in 9th century by Sri Adi Shankaracharya, enjoying similar status the way Vatican enjoys amid Christians. However, clash of interests between J Jayalalithaa and DMK chief Karunanidhi, who represented anti- Brahminical movments, ensured that this highly revered pontiff got disgraced.

Prominent media analysts of that period conveyed the impression that “police would not have acted unless they had sufficient evidence.” Ironically, the prosecution at that time was supremely confidant about involvement of Kanchi seers in abetting murder of Sankararaman, claiming that it had “incriminating evidence”. The investigating officer Prem Kumar came out with version that made mutt head appear guilty: “We have strong evidence about the involvement of Sri Jayendra Saraswathi in Sankararaman’s murder. There has been animosity between the two for the past four years and further investigation is on to corroborate the evidence collected on the involvement of the Kanchi Acharya.” The allegations had deepened with revelations of  Tamil magazine Nakkeeran. Amid these bizarre turn of events, the case got transferred to Pondicherry to ensure fair trial. To make the matters worse for Kanchi mutt head, even allegations of sexual exploitation surfaced. (The Hindu)

However, the truth had the last laugh when verdict delivered by a special court in Pondicherry acquitted all the accused involved in this sensational murder. The verdict was delivered on November 27, 2013 after nine years of suspense and drama of all sorts. They were acquitted of all the charges which included “criminal conspiracy, misleading the court by giving false information, criminal trespass and supply of funds to carry out the criminal activity.” The main witnesses failed to corroborate the prosecution’s theory. More than 80 witnesses went against the story presented by the prosecution.

Well, it’s true that Kanchi seers got acquitted but in the process it caused irreparable damage to the reputation of an institution, which represented the collective psyche of Hindus. This “collective psyche” of Hindus made its presence felt again the way Kanchi Mutt Head responded to this verdict: ” Dharma has prevailed. Truth has won. That is what matters…I have been trained by my Guru to bear everything. There is no question of situation being tough. Times were challenging because we were facing completely new set of situations. ..There are several invaders who vandalized our temples. Today when you see the disfigured temples you remember the invaders and their acts of vandalism. What was perpetrated on the mutt has been termed as an act of vandalism by several people.” (Kanchi Sathya Org)

Swami Shraddhanand:  Killed By A Muslim Fanatic in 1926.  He Was Part Of The Movement To Reconvert Muslims Back To Hinduism!

Swami Shraddhanand: Killed By A Muslim Fanatic in 1926. He Was Part Of The Movement To Reconvert Muslims Back To Hinduism!

It’s really saddening that moments allegations against Hindu saints surfaces, the whole mainstream media goes berserk and paints them in wrong colours, forgetting that its main task is to report the incident and not to conduct trials. Worse, when the allegations are found false and saints get acquitted the same news item does not get prominence. Acquittal is never important than false stories planted by vested interests. No wonder acquittal of Kanchi’s Shankracharya did not get the same coverage. After all, it strengthens cause of Hindus, which is antithetical to secular spirit of this nation. The mainstream media is more interested in propaganda than emergence of truth.

The secular forces always convey the impression that no one is above law.  And so will they dare to arrest Shahi Imam Syed Ahmad Bukhari against whom so many cases have been registered? Will they dare to bring in open and convict Christian missionaries involved in conversion of tribals in remote corners of India? That will never take place. The law exists only for Hindu saints. It’s an instrument of oppression for Hindus and all that which represents self-pride of Hindus. It’s there to support propaganda and not to sustain truth.

Swamy Lakshmanananda Saraswathi and four of his disciples namely Sadhvi Bhaktimayee, Baba Amritanand, Kishor Baba and Puranjan Ganthi at his Ashram in Jaleshpatta of Kandhamal district in Orissa by a group of Christian zealots on the Janmashtami day, 23 August, 2008.  But the mainstream media made no uproar!

Swamy Lakshmanananda Saraswathi and four of his disciples namely Sadhvi Bhaktimayee, Baba Amritanand, Kishor Baba and Puranjan Ganthi at his Ashram in Jaleshpatta of Kandhamal district in Orissa by a group of Christian zealots on the Janmashtami day, 23 August, 2008. But the mainstream media made no uproar!

References:

The Hindu

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Indian Democracy: Governed By The Contradictions, And Not By The Will Of People!

RIP Kargil Saheed Capt. Amit Bhardwaj

RIP Kargil Saheed Capt. Amit Bhardwaj.


The Indian democracy is said to be governed by the will of people. It’s not the entire truth. In reality, it’s governed by chosen contradictions. They make us sad, frustrated and gloomy. This time I would not enter into any sort of complicated analysis. Just presenting two news items side-by-side. That would be suffice to make Indians realize that not all is well with this country. The first news item is related with Saheed Capt. Amit Bhardwaj’s birth anniversary. The second news item is related with murder of a Deputy Superintendent of police, Zia ul Haq in Deoria, in Uttar Pradesh.

By means of contrast I wish to know are our soldiers sacrificing their lives for such rulers who appear to be no better than murderers? And secondly, do our citizens, which include judges and bureaucrats too, have no other option other than to live under shadow of such criminals posing as rulers? Anyway, RIP Kargil Saheed Capt. Amit Bhardwaj/Zia ul Haq. We shall always remain indebted to your glorious sacrifice. And for such rulers, it’s better that they get punished instead of making an attempt to define their worth. 

Now the mother of all questions: If that’s the fate of high ranked police officials, how can the judiciary expect a common man to act as whistle blower? Any answers?

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Capt. Amit Bhardwaj was leading the reinforcement column of 35 men when they were ambushed en route by Pakistani soldiers armed with light & medium weaponry. With the help of Havildar Rajbir Singh, he decided to divert the attention of the enemy & ordered his Second-in-Command to get the men out of the battle area. The two gallant men were killed, the others survived, though all were wounded. Capt. Bharadwaj saved nearly 30 of his men and killed more than 10 infiltrators, though he himself was hit twice fighting till the last breath. His body lay in deep valley of Himalayas, till it was retrieved on July 13, 1999. The bodies of Captain Bhardwaj and Havildar Singh 57 days later.

Respect

Jai Hind

Source: “Remembering Kargil Shaheed Capt. Amit Bhardwaj on his 41st Birth Anniversary”

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“I demand that the Chief Minister come here and resolve this issue. I demand Raja Bhaiya be subject to a police investigation, and the CBI should also intervene. If the CM does not come here I will not bury my husband. He will have to come or I will commit suicide…….He was under a lot of pressure. He was constantly being threatened and didn’t want to stay here. If justice is not served then I will go to Akhilesh Yadav’s house and kill myself,” ( Wife of murdered police officer)

And who is Raja Bhaiyya? A ruling Minister in UP’s present government against whom  48 criminal cases are pending.

“But this is not the first time that Raja Bhaiya is finding himself under scrutiny for death of a policeman. In 2007, DSP Ram Shiromani Pandey, the investigating officer in the POTA case against Raja Bhaiya, died in a road accident on the eve of his approaching the Allahabad high court seeking action against him. Questions were raised, but nothing could be proven and Raja Bhaiya remained as powerful as ever.”

 If that's the fate of high ranked police officials, how can the judiciary expect a common man to act as whistle blowers? Any answers?

If that’s the fate of high ranked police officials, how can the judiciary expect a common man to act as whistle blower? Any answers?

Source Links:

Akhilesh leaves for Deoria to meet murdered DSP’s family 

Raja Bhaiya

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ज्ञान दत्त पाण्डेय का ब्लॉग (Gyan Dutt Pandey's Blog)। मैं गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर रेलवे अफसर।

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