Tag Archives: Jagjit Singh

कवि और कविताये: समय से परे होकर भी यथार्थ में नए आयाम जोड़ जाते है!

अदम गोंडवी: सही मायनों में जनकवि

अदम गोंडवी: सही मायनों में जनकवि

कविताओ में बहुत ताकत होती है विचारो के प्रवाह को मोड़ने की, उनको एक नया रूख देने की। ये अलग बात है कि कवि और कविताओ की आज के भौतिकप्रधान समाज में कोई ख़ास अहमियत नहीं, इनकी कोई ख़ास “प्रैक्टिकल” उपयोगिता नहीं। लेकिन उससे भी बड़ा सच ये है कि कविताओ की प्रासंगिकता सदा ही जवान रहेंगी। कवियों को समाज नकार दे लेकिन उनके अस्तित्व की सार्थकता को नकारना समाज के बूते के बस की बात नहीं। उसकी एक बड़ी वजह ये है कि कवि और कविताएं इस क्षणभंगुर संसार और पारलौकिक सत्ता के बीच एक सेतु का काम करते है। ये समाज के विषमताओ के बीच छुपे उन जीवनमयी तत्वो को खोज निकालते जो सामान्य आँखों में कभी नहीं उभरती। इसी वजह से कम से कम मुझे तो बहुत तकलीफ होती है जब कविताओ और कवियों को समाज हेय दृष्टि से देखता है या उपयोगितावादी दृष्टिकोण से इन्हें किसी काम का नहीं मानता। खैर इसे कुदरत का न्याय कहिये कि उपेक्षा की मौत मरने वाले कवि और लेखक भले असमय ही इस संसार को छोड़ कर चले जाते हो उनके शब्द अमर होकर धरा पे रह जाते है। उनके शब्द समय के प्रवाह को मोड़कर नया रास्ता बनाते रहते है। मोटरगाडी में सफ़र करने वाले तो गुमनाम हो जाते है लेकिन जीवन भर गुमनामी और उपेक्षा सहने वाले कवि/लेखक अमर हो जाते है। उनकी आभा धरा पे हमेशा के लिए व्याप्त हो जाती है।

आइये कुछ ऐसी ही कविताओ को पढ़ते है जो गुज़रे वक्त के दस्तावेज सरीखे है।

*******************************************************************************

अदम गोंडवी की ये कविता मजदूरों के अहमियत को पाठक के मष्तिष्क पटल पर वास्तविक रूप से उकेरती है । उनके यथार्थ को यथावत आपके सामने रख देती है। २२ अक्टूबर १९४७ को गोंडा जिले के आटा गाँव में जन्मे इस क्रन्तिकारी कवि ने समय के पटल पर कुछ ऐसी रचनाये रची जो संवेदनशील ह्रदय में सकारात्मक वेदना को जन्म दे देती है। वैसे इस कविता में देश में व्याप्त दुर्दशा का भी चित्रण है लेकिन प्राम्भिक पंक्तिया मजदूर पर आधारित है जिसको पढ़कर मुझे रामधारी सिंह “दिनकर” जी की ये पंक्तिया स्मरण हो आई:

‘‘मैं मजदूर हूँ मुझे देवों की बस्ती से क्या!, अगणित बार धरा पर मैंने स्वर्ग बनाये,
अम्बर पर जितने तारे उतने वर्षों से, मेरे पुरखों ने धरती का रूप सवारा’’

***********************************

वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है
उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है

इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है

कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है

रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है

 -अदम गोंडवी

*****************************************

बशीर बद्र ने वैसे तो जीवन के कई रंगों का जिक्र किया लेकिन रूमानियत के रंग में डूबी इनकी ग़ज़लों को जगजीत सिंह ने स्वर देकर एक नयी ऊंचाई दे दी।ये ग़ज़ल मैंने पहल पहल जगजीत सिंह की आवाज़ में सुनी जिसे बहुत ही सधे स्वर में जगजीत जी ने गाया है। और अब पढने के बाद बहुत भीतर तक उतर गयी बशीर साहब की ये ग़ज़ल।

*************************

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा
इतना मत चाहो उसे, वो बेवफ़ा हो जाएगा

हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे, रास्ता हो जाएगा

कितनी सच्चाई से मुझ से ज़िन्दगी ने कह दिया
तू नहीं मेरा, तो कोई दूसरा हो जाएगा

मैं ख़ुदा का नाम लेकर पी रहा हूँ दोस्तो
ज़हर भी इसमें अगर होगा, दवा हो जाएगा

सब उसी के हैं हवा, ख़ुश्बू, ज़मीनो-आसमाँ
मैं जहाँ भी जाऊँगा, उसको पता हो जाएगा

बशीर बद्र

*******************

रमाकांत दूबे जी का नाम शायद लोगो ने कम सुना हो लेकिन इनके द्वारा ग्रामीण लोक में बसी आत्मा में रची ये कविताये कही भी पढ़ी जाई अपना असर दिखा जाती है। ३० अक्टूबर १९१७ को जन्मे इस कवि ने अपनी जड़ो का कभी नहीं छोड़ा और आज़ादी से पहले और आज़ादी के बहुत बाद तक जो भी समय ने दिखाया उसे वैसा ही शब्दों में रच डाला। यकीन मानिए इन पंक्तियों को २०१३ में पढ़ते हुए ऐसा कभी नहीं लगा कि इनको चालीस साल पहले रचा गया होगा। इसकी प्रासंगिकता की अमरता पर हैरानी सी हो रही है। यूँ आभास हो रहा है किसी ने चालीस साल पहले ही २०१३ में क्या व्याप्त होगा ये देख लिया था। इसीलिए तो  मुझे  ये कहने में कोई संकोच नहीं कि कवि संसार में रहते हुएं भी संसारी ना होकर समय से परे रहने वाला एक विलक्षण जीव होता है।

******************************

खाके किरिया समाजवाद के खानदानी हुकूमत चले
जैसे मस्ती में हाथी सामंती निरंकुश झूमत चले
खाके गोली गिरल परजातंतर कि मुसकिल इलाज़ हो गइल
चढ़के छाती पे केहू राजरानी, त केहू जुवराज हो गइल

– रमाकांत दूबे

***********************************

अदम गोंडवी: जो उलझ कर रह गयी है फाइलों के जाल में गाँव तक वह रौशनी आएगी कितने साल में

अदम गोंडवी: जो उलझ कर रह गयी है फाइलों के जाल में गाँव तक वह रौशनी आएगी कितने साल में!


कुछ अच्छी कवितायेँ आप यहाँ पढ़ सकते है: कविता कोष 

Pic Credit: 

Pic One 

 

जगजीत सिंह: तुम चले गए तो गुमसुम सा ये जहाँ है !!!

जीवन क्या है ? चलता फिरता एक खिलौना है..

जीवन क्या है ? चलता फिरता एक खिलौना है..

“अब  यादों  के  कांटे  इस  दिल  में  चुभते  हैं  
ना  दर्द  ठहरता  है  ना  आँसूं   रुकते  हैं” .

इस वक्त जगजीत सिंह के सुननेवालो और चाहनेवालो का यही हाल होगा. सबको अपने गीतों, ग़ज़लों और भजनों से एक रूहानी शान्ति प्रदान करने वाले की आत्मा आज खुद इंसानी चोला छोड़कर परम शान्ति में विलीन हो गयी. इस सत्य से हम सब परिचित है कि एक दिन हम सबको जाना है पर सब के दिलो पे राज करने वाले का यूँ चले जाना तकलीफ देता है. कोई  जड़ भरत की तरह इतना निर्लिप्त तो नहीं रह सकता ना कि कोई अपना चला जाए और आप की आँख से दो आंसू भी ना गिरे. गुलज़ार जी कहना बिल्कुल सही है कि “जगजीत का जाना, एक पूरी दुनिया का उठ जाना है इक पूरे दौर का उठ जाना है .” उनके चले जाने के बाद जिस रिक्तता का अनुभव हम सब को हो रहा है उसकी पूर्ती करना आसान नहीं. 

जगजीत सिंह ने जब गायकी की दुनिया में प्रवेश किया तो उनको भी उन्ही मुसीबतों का सामना करना पड़ा जो हर एक सच्चे कला के पुजारी के सामने आ खड़ी होती है.  नाकामी और असफलताओ से खिन्न आकर वे अपने घर जालंधर को लौट आये मुंबई से जहा पे वे उस वक्त पढ़ते थे और एक प्रोफेशनल  गायक के तौर पे रेडिओ से जुड़े भी थे. पर किस्मत ने इनके लिए कुछ और ही सोच रखा था. कुछ अंतराल के बाद ये फिर मुंबई लौटे और  एच एम वी के साथ कुछ एक दो गाने रिकार्ड कराने के बाद इसी कंपनी द्वारा इनका पहला एल पी  “द अनफ़ोरगैटेबल्स ” ( The Unforgettables) निकला. इसके बाद जगजीत ने पीछे मुड़ के नहीं देखा और मौत के पहले तक इतना काम किया कि गुलज़ार ने अपनी श्रद्धांजली में इस बात को महसूस किया कि शायद जगजीत सिंह ने अपने शरीर को आराम नहीं दिया.

जगजीत सिंह ने भोजपुरी, उर्दू,  पंजाबी आदि भाषाओ में खूब गया. एक समाचार पत्र  के हवाले से मुझे पता चला कि इलाहाबाद से उनका लगाव बहुत गहरा था क्योकि यही से उन्होंने भारतीय संगीत संस्थान प्रयाग संगीत समिति से गायन में प्रभाकर की डिग्री प्राप्त की थी. अभी मौत से कुछ महीनों पहले ही इलाहाबाद में एक कार्यक्रम करके गए थे. ये अपने में एक विलक्षण बात थी कि जिस ऊंचाई को उन्होंने पहले एल्बम से हासिल किया वे अंत तक बरक़रार रही. कला के दुनिया में ये एक विलक्षण घटना है .क्योकि सत्तर के दशक से अब तक के संगीत में ना जाने कितने बदलाव हुए और लोगो के पसंद और नापसंद करने का तरीका भी बहुत बदला. मगर इन सब के बीच अविचलित से जगजीत सिंह एक के बाद एक ह्रदय को झकझोर कर रख देने वाले एल्बम निकालते चले गए. ये कहना गलत नहीं होंगा कि चित्राजी का उनके जीवन में जीवन संगिनी के रूप में आना उनके संगीत यात्रा को एक नयी ऊंचाई दे गया. इन दोनों के संयुक्त रूप से जारी एल्बम श्रोताओ के बीच खासे लोकप्रिय हुए.
 
ऐ साउंड अफैअर (A Sound Affair),  पैशन्स (Passions) बियोंड टाइम (Beyond Time) , होप (Hope)  , इन सर्च (In Search) , इनसाईट (Insight) , फेस टू  फेस (Face To Face) , मरासिम (Marasim ) , मिराज (Mirage) , विशंस (Visions) , लव इस ब्लाइंड ( Love Is Blind) , सजदा (Sajda) , सहर ( Saher)   और चिराग (Chirag)  ऐसे कई हिट एल्बम जगजीत सिंह के आये जिनमे चित्राजी और जगजीत सिंह की गायी  ग़ज़लों ने लोगो का मनमोह लिया. जगजीत सिंह की  लम्बी पारी खेलने की वजह ये रही कि जो संगीत यात्रा उन्होंने बेगम अख्तर , मेहँदी हसन और ग़ुलाम अली के दौर से शुरू की उसको हमेशा वो साधना से मांजते रहे. उन्होंने ग़ज़ल को बोझिल परंपराओ से, उसके अपने सीमित दायरों से बाहर निकालकर साधारण जन में लोकप्रिय बनाया. सुनने में आसान लगता है पर वास्तव में ये एक बहुत कठिन कार्य था.  खासकर उस पीढ़ी में जो ग़ज़ल सुनने या सुनाने  के नाम पे नाक भौ सिकोड़ने लगती है. आप ये समझिये कि जगजीत साहब ने बिल्कुल नए पैमाने और तौर तरीको को जन्म दिया जिसमे ग़ज़ल गायिकी सतही मैखानो और जाम से मुक्त हुई.  उन्होंने अपनी लगन से आधुनिक वाद्य यन्त्र और प्राचीन वाद्य यन्त्र दोनों का बेहतरीन संगम करके यादगार धुनें दी जिन्होंने ग़ज़ल को लोकप्रिय तत्त्व प्रदान किया. जगजीत सिंह के बारे में ये कहा जाता है कि इन्हें मधुर धुनें तैयार करने  में कोई ख़ास दिक्कत नहीं आती थी.  इसके पीछे वजह यही थी इनको संगीत की समझ गहरी थी और इस गहरी समझ के बाद भी ये रियाज में कंजूसी नहीं करते थे. लिहाज़ा जो भी काम इन्होने किया वो अपनी एक अलग छाप छोडता चला गया. 
 
अब देखिये कि उनकी इस लम्बी पारी के इस अवधि में कितने अच्छे  ग़ज़ल  गाने वाले आये मगर वो बदलते दौर में अपने को ढाल नहीं पाए और कुछ एक दो एल्बम को देकर वो गुमनामी में खो गए पर जगजीत सिंह के साथ ऐसा नहीं हुआ. क्योकि वे हद से अधिक सचेत थें. उन्होंने श्रोताओ के मूड को हमेशा ध्यान में  रखा पर साथ में ये भी ध्यान रखा कि वे इतना परिवर्तनशील ना हो जाए कि गुणवत्ता कही खो जाए. जगजीत सिंह के सफल होने का  राज ये भी था कि वे एक सच्चे कलाकार की तरह बेहद संवेदनशील थे लिहाजा उन्होंने बहुत ही बेहतर शायरी का चाहे वो किसी गुमनाम शायर की हो या किसी मशहूर बन्दे के कलम से निकली हो का इस्तेमाल किया. निदा फ़ाज़ली , सुदर्शन फाकिर, गुलज़ार , ग़ालिब , फिराक गोरखपुरी जैसे शायरों की सुंदर ग़ज़लों को बेहतरीन धुनों में सजाकर जो लड़ी उन्होंने बनायीं वो हर भावुक इंसान के दिलो दिमाग पर अपनी एक अमिट छाप छोड़ गया. जगजीत सिंह ग़ज़लों के चुनाव में  कितना सजग रहते थे सुनिए उनके ही शब्दों में  जो  बी बी सी को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा : ” सबसे पहले तो देखता हूँ की ग़ज़ल की भाषा सरल हो और जो शायर कहना चाहता है कहने में सफल हुआ हो. ग़ज़ल प्रेम पर हो या फिर उनमे कोई चौंकाने वाला तत्व हो, ज़िंदगी के क़रीब हो, उस में अश्लीलता नहीं होनी चाहिए. मुख्यतः मैं इन्हीं बातों का ध्यान रखता हूँ.”
 
जगजीत सिंह के बारे में शुरू शुरू में लोग कहते थें कि फिल्मो में आवाज उनकी  नहीं सूट करती. इस भ्रम को उन्होंने अर्थ, साथ साथ, प्रेमगीत और बाद के सालो में दुश्मन,  तुम बिन, जॉगर्स पार्क और सरफ़रोश में एक से बढ़कर एक ग़ज़ले गाकर तोडा. अगर हम छोटे परदे की बात करे तो दूरदर्शन के लिए “मिर्ज़ा ग़ालिब” और नीम का पेड़ धारावाहिक के लिए उनका योगदान उनके संगीत सफ़र में खासा महत्त्व रखता है.  उल्लेखनीय बात ये है कि जिस तरह डूब के वे ग़ज़ले गाते थे उसी तरह से वे भजन भी गाते थे..अक्सर ये होता है कि ग़जल गानेवाले भजन गायिकी में इतने उभर के नहीं आ पाते पर जगजीत सिंह ने ये भी कर दिखाया  एक से बढ़कर एक आत्मिक शांति  देने वाले भजन संग्रह  निकल के. कृष्ण भज़नो पे आधारित इनकी भजन श्रंखला काफी लोकप्रिय हुई जैसे मोक्ष,  जय  राधा  माधव ,  सांवरा समर्पण ,  हरे  कृष्ण  हरे  राम ,  हरे  कृष्ण , राधा  बल्लभ  कुञ्ज  बिहारी .  इसके आलावा ध्यान योग पे आधारित एल्बम और माँ के भजनों का एक संग्रह “माँ  ” जो अरबिंदो सोसाइटी से सम्बद्ध है  भी काफी प्रसिद्ध हुआ..
अंखिया  हरी दर्शन की प्यासी !!

अंखिया हरी दर्शन की प्यासी !!

जगजीत सिंह काफी सचेत रहते थे और इसलिए वे काफी बेबाक भी थे. उन्होंने एक विदेशी चैनल को दिए साक्षात्कार में इस बात को साफ़ साफ़ कहा कि ग़ज़ल गायिकी का स्तर भारत और अन्य जगह काफी गिर रहा है और जिस तरह से हर माध्यम से घटिया चीज़ संगीत के नाम पे बांटी जा रही है उससें समझ में आता है कि कुछ ना कुछ गलत तो है ज़रूर. वे आजकल के संगीत को शोर मानते थे. यही वजह है कि ऐ आर रहमान के यांत्रिक संगीत की उन्होंने साफ़ तौर पे आलोचना की. और ये सच भी है कि आइटम नंबर के दौर में कम्पूटर आधारित संगीत बिल्कुल  टीन कनस्तर पीटने के समान हो गया है. संगीत की आत्मा लगता है इस लोक से निकलकर दूसरे लोक में चली गयी है..

चलते चलते अपने अंतर्मन में दबी  गहरी संवेदनाओ  को उभारना चाहूँगा जिसको निखारने में जगजीत सिंह की गज़लों ने उत्प्रेरक का काम किया. जगजीत सिंह की गज़ले सम्पूर्ण जीवन दर्शन को अच्छी  तरह से परिभाषित करती है. बचपन से शुरू करे तो क्या आपको लगता है ” वो कागज़ की कश्ती” से भी बेहतर कोई संगीतमय रचना हो सकती है जो बचपन को इतना यादगार बनाती हो ? ये रचना देखी जाये तो अलग से मील का पत्थर है. यौवन काल की तरफ बढे तो उस दौर को याद करे जब हम प्रेम के पहले अहसास को महसूस करते है और उसे प्रेम पत्र के रूप में उभारते है तो क्या हमको ये ग़ज़ल नहीं याद आती “प्रेम का पहला ख़त लिखने में वक्त तो लगता है ”  या ये बात नहीं याद आती ” तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है ” . दोस्ती के ही बदले हुए स्वरूप को हम याद करे तो क्या इस ग़ज़ल में जो सीख है  उसकी हम उपेक्षा कर सकते है “दोस्ती जब किसी से की जाये, दुश्मनों की भी राय  ली जाये” ..और जब ये दोस्ती टूट जाए तो क्या हम ये ग़ज़ल नहीं गुनगुनाते : “ तुमने दिल की बात कह दी ये बड़ा अच्छा किया, हम तुम्हे अपना समझते थे बड़ा धोखा  हुआ“. 

जीवन  में जब हम और आगे बढ़ते है और जीवन की कडुवी सच्चाइयो से आमना सामना होने पर हमारे सपने टूट कर बिखरते है तो क्या हम ये नहीं महसूस करते ”  दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है मिल जाये तो मिट्टी है खो जाये तो सोना है ” और फिर यही एहसास हमारे साथ रह जाता है ” शायद मै ज़िन्दगी की सहर लेके आ गया…अंजाम  ये  के  गर्दे  सफ़र  ले  के  आ  गया“.  इन आत्माओ के संपर्क में रहने से ही शायद मै आज कह पाने में  सक्षम हूँ  “बदला ना अपने आपको जो थे वोही रहे” 

इस बहुत भली सी आत्मा को मेरी भावभीनी श्रद्धांजलि ..आपके लिए जगजीतजी इस वक्त मेरे मन में कुछ और नहीं बस आपकी यही ग़ज़ल कबसे गूँज रही है : “ सदमा तो है मुझे भी कि तुझसे जुदा हूँ  मै” 

********************************

इसमें मैंने बहुत सी ग़ज़लों का जिक्र किया है. ये सब तो मेरे दिल के करीब है पर ये रहे कुछ और ग़ज़ल /भजन जो मुझे बहुत पसंद है. 

. या तो मिट जाइए या मिटा दीजिये 

. तेरे आने की जब खबर महके 

.उस मोड शुरू करे फिर ये ज़िन्दगी 

. आदमी आदमी को क्या देगा 

 
 
 
 
 
Pics Credit:

Pic One

Pic Two 

Jagjit Singh: The Musical Peacemaker Merges In Eternal Peace!!!

Jagjit Singh: The Musical Peacemaker Merges In Eternal Peace!!!

It’s never an easy task to pay tribute to great maestros. They have so many shades, which remains elusive from the normal human eyes. Jagjit Singh, the legendary Ghazal singer with infinite beautiful shades, left the world quietly, leaving his fans caught in the fervour of celebrations virtually stunned. It’s hard to believe that he is no more with us. He was recovering fast but ultimately death like always had the last laugh. The icy hands of death prevailed over the wishes of his lovers, proving that nature wanted this singer to give eternal peace. The same peace which his ghazals, songs and bhazans provided to millions of listeners spread across the globe.

Jagjit Singh burst upon the ghazal scene like a whiff of fresh air in the seventies and shattered the established norms associated with the ghazal singing. There were big names like Mehadi Hassan, Ghulam Ali, Farida Khanum and Noorjehan but their appeal was restricted to certain class. Let’s also not forget that seventies was age of transition for music world. The western beats were fast replacing traditional appeal and, therefore, making room for qualitative singing was a difficult task. In fact, the early experiences of Jagjit Singh, were bitter ones in the world of Mumbai. This man who sang shabads in Gurudwaras in his early days of singing met with series of bad happenings in an attempt to carve a niche for himself in the Mumbai. He went back to his hometown with heavy heart but he was born to become successful so after a gap he made fresh attempts. The big break came in form of ” ‘The Unforgettables’ and after that there was no looking back for him. Happily he found a sweet partner in form of Chitra Singh. This highly popular duet team gave us number of popular albums like “Someone Somewhere”, “Ecstasies” , “Emotions” , ” A Sound Affair”, “Live at Wimbley” and ” A Milestone”, to name a few.

We need to understand what made them gain such a terrific mass appeal. It was their intimate deep bond with music which made them make a permanent inroad in the hearts of the listeners. They came to be aware of the fact that unless ghazal singing is subjected to new changes both content wise and music wise it would be hard to retain the existence of ghazal among the listeners. However, in the name of changes, he didn’t gave way to gimmicks. His subtle understanding of the music prevented him giving way to lesser traits. Ultimately, he roped in better poetry from both well known names and lesser known names. However, he ensured that selected ghazals conveyed their emotions in simpler language.

As a result of his fine selection, the fine poetry from some well known names like Dr. Bashir Badr, Sudarshan Fakir, Qateel Shifai, Gulzar and Javed Akhtar became hot favourite in Indian households. However, the ghazals became everlasting because of his unique ability to synthesize modern beats with traditional Indian instruments. He has the uncanny ability to create catchy tunes. Probably, his rigorous musical sadhana (practice) paid him rich dividends as he moved ahead in the musical journey.

Remember his ghazal Woh Kagaz Ki Kashti“? This masterpiece became a darling of the masses. Now anybody interested in taking a step back in time to his childhood had to anticipate this ghazal. For love birds, his ghazals served as surest means to convey their emotions. In fact, I am myself guilty of reaching to conclusions if I hear a young person listening his ghazals that he/she is in love!! One need not forget that ghazals gained prominence in Hindi movie world with his arrival. The albums “Saath Saath” and “Arth” are still the most sought after albums in the music stores across the globe. A fact that I came to be aware of when I interviewed many music shop owners way back in late nineties for one of my articles.

Jagjit Singh: The Musical Peacemaker Merges In Eternal Peace!!!

Apart from making ghazals popular in movies, the T V portrait related with great Urdu poet Mirza Ghalib attained huge popularity when Ghalib’s ghazals rendered in soulful manner attained a new dimension. May be his golden voice did justice to whatever he came to sang- something that kept him a busy soul till the end of his life’s journey. It’s no secret that how many great ghazal singers lost their relevance in age dominated by cheap gimmicks. So if Jagjit Singh, managed to dictate the rules and worked on his own terms with no compromise, then that in itself is a great achievement.

The tribute would be incomplete if I fail to mention about his bhazans. His tender mellifluous voice gave birth to innumerable beautiful bhazans. His Krishna series with Chitra Singh including albums like Bhajan (HMV), Hare Krishna Hare Rama,Hare Krishna..Hare Krishna, Jai Radha Madhav, Mokasha-Sri Krishna, Saanwara, Hare Krishna and Radha Ballabh Kunj Bihari, to name a few, became great hits. For a huge section of listeners he is more popular as a bhazan singer than a ghazal singer. The wonderful synthesis of western and Indian musical notes worked wonders in bhazan singing as well.

This man was a fearless in his confessions as well. He was not reluctant in admitting that in our age music has gone to the dogs. The media’s devastating role in promoting worthless people has led to demise of good singing. He was also highly critical of A R Rahman’s musical abilities. He found him an incompetent soul, who relied heavily on computerized beats !! He sounds so true because when one listens the songs of A R Rahaman it’s strikingly clear to any conscious listener that there is huge lack of completeness or totality. Jagjit Singh was conscious of the fact that the present age listeners as well as the new age composers have lost hold over refined musical sensibilities. Still , he did not fail to shower compliments upon new talents like Kumar Shanu when Shanu was new in the movie world. In our times, he appreciated the singing of Kay Kay.

In the end, I must reiterate the cliche that artists enjoy an advantage over other souls. While other souls are soon forgotten after their deaths, the creative geniuses like Jagjit Singh always make their presence felt. I am sure he would always make his presence felt in form of his ghazals, bhazans and songs. I am holding back my tears as ”

Ishq meiN GHairat-e-jazbaat ne rone na diyaa
Warna kyaa baat thi kis baat ne rone na diyaa
.

( In love my fear of being shamed/exposed did not allow me to cry )
Otherwise, what reason/thing was it that did not allow me to cry)

Some of my favourites:

Shayad Mai Zindagi Ki Shahar

Us Mod Se Shuru Kare Phir Ye Zindagi

Tere Aane Ki Jab Khabar Mahke

Jai Radha Madhav Kunj Bihari

Tum Meri Rakho Laaj Hari

Tum Dhoondho Mujhe Gopal

A Memorable Interview In Two Parts:

Part One

Part Two

Jagjit Singh: The Musical Peacemaker Merges In Eternal Peace!!!

References:


The Economic Times

Wiki

Firstpost

Pics Credit:

Pic one

Pic Two

Pic Three

The great Rudolf Steiner Quotes Site

Quotes and fragments from the work of the great visionary, thinker and reformer Rudolf Steiner

Bhavanajagat

Welcome to Noble Thoughts from All Directions to promote the well-being of man through Self-Discovery.

Serendipity

Was I born a masochist or did society make me this way?

SterVens' Tales

Thee Life, Thee Heart, Thee Tears

Indowaves's Blog

Just another WordPress.com weblog

Una voce nonostante tutto

Ognuno ha il diritto di immaginarsi fuori dagli schemi

Personal Concerns

My Thoughts and Views Frankly Expressed

the wuc

a broth of thoughts, stories, wucs and wit.

A Little Bit of Monica

My take on international politics, travel, and history...

Peru En Route

Tips to travel around Perú.

Health & Family

A healthy balance of the mind, body and spirit

मानसिक हलचल

ज्ञान दत्त पाण्डेय का ब्लॉग (Gyan Dutt Pandey's Blog)। मैं गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर रेलवे अफसर।

Monoton+Minimal

travel adventures

Stand up for your rights

Gender biased laws

The Bach

Me, my scribbles and my ego

Tuesdays with Laurie

"Whatever you are not changing, you are choosing." —Laurie Buchanan

The Courage 2 Create

This is the story of me writing my first novel...and how life keeps getting in the way.

A Magyar Blog

Mostly about our semester in Pécs, Hungary.