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भीड़ का मनोविज्ञान: अन्धो के देश में काने राजा बन कर उभरते है!

 इस का मतलब ये नहीं कि मै बाल ठाकरे की नीति या राजनीति का समर्थक हूँ। कतई नहीं। लेकिन एक ठाकरे को कोसना मै  जायज़ नहीं मानता क्योकि इस हमाम में कौन नंगा नहीं? तो सिर्फ ठाकरे से घृणा क्यों? सिर्फ ठाकरे से दूरी क्यों?

इस का मतलब ये नहीं कि मै बाल ठाकरे की नीति या राजनीति का समर्थक हूँ। कतई नहीं। लेकिन एक ठाकरे को कोसना मै जायज़ नहीं मानता क्योकि इस हमाम में कौन नंगा नहीं? तो सिर्फ ठाकरे से घृणा क्यों? सिर्फ ठाकरे से दूरी क्यों?


इसके पहले मै बाल ठाकरे की शोक यात्रा में उमड़ी भीड़ के बारे में कुछ कहूँ ये समझ लेना आवश्यक रहेगा कि प्रजातंत्र में  संख्या बल बड़ा मायने रखता है।प्रजातंत्र का आधार ही यही है कि जिसके पीछे जनता वही हीरो बाकी सब जीरो अब चाहे उसने नंगा करके अपने को भीड़ जुटाई है या सबको दारू रुपैय्या बाँट कर। पर भीड़ के दम पर ही लोकतंत्र चलता है अब चाहे जनप्रिय नेता की बात भीड़ के बीच में बैठे कल्लू को या मंच पे बैठे सेठ किरोड़ीमल को समझ में आ रही हो या ना आ रही हो इससें किसी को क्या मतलब। भीड़ में है यही बहुत है। यही लोकतंत्र का माडल है जिसकी लाठी उसकी भैंस, और जिसके पास सबसे ज्यादा लाठी उसके पास पूरा देश। 

इस तर्क के हिसाब से चले तो अल्पसंख्यको के दम पर राजनीति करने वालो के मुंह पर ठाकरे साहब मर कर भी कस कर तमाचा लगाने से नहीं चूँके। बाल ठाकरे का मै कोई प्रशंसक नहीं क्योकि मूलतः मै उग्र विचारधारा का समर्थक नहीं  हूँ क्योकि उग्रता इस देश का स्वभाव कभी नहीं रहा है। लेकिन आसुरी प्रवत्ति से लैस बढ़ते लोगो का झुण्ड, अल्पसंख्यको के नाम पर होते रोज तमाशे, हिन्दुओ में फैलती कायरता के चलते तहत ये आवश्यक हो गया है कि कुछ शेरदिल नेता पैदा तो हो जो अपनी दहाड़ से कम से कम हिन्दुओ का उत्साह तो कायम रख सके नहीं तो कोई लालटेन जलाकर, कोई हाथी भागकर, कोई साइकिल दौड़ाकर जनता को नित प्रतिदिन बेवकूफ बना कर भीड़ जुटा रहा है। ऐसे में कोई देश को बाटने वाली विभाजनकारी ताकतों को को उनकी ही भाषा में जवाब देकर भीड़ जुटा गया तो इसमें हो हल्ला मचाने की क्या जरूरत है। इसमें इतना आश्चर्यचकित कर देने वाली क्या बात है। 

क्या इसके पहले भीड़ जुटते नहीं देखी किसी ने? आप ने चुनाव की रैली नहीं देखी क्या? मुफ्त में लखनऊ आयेंगे और नेताजी का भाषण सुने ना सुने चिड़ियाघर में शेर के दर्शन करना नहीं भूलेंगे। अगले दिन अखबार में नेताजी का कहिन और भीड़ की फोटु दोनों मौजूद होंगे। और पीछे जाए भारत छोड़ो आन्दोलन में लगभग पूरा देश उमड़ पड़ा था। जय प्रकाश नारायण के आहवान पर क्या भीड़ नहीं उमड़ी थी? खैर उस भीड़ के तत्त्व अलग थें। इस इक्कीसवी सदी के भारत में जब सब नेता स्विस बैंक प्रेमी हो गए है, जब नेता गरीबी को नहीं गरीब को ही हटा दे रहे है, आतंकवादी नेताओ का शह पाकर सलाखों के पीछे बिरयानी काट रहे है तो ऐसे में भीड़ के होने के मायने भी बदल गए है।  

वैसे आश्चर्य है कि बहुत से लोग ठाकरे को साम्प्रदायिक राजनीति करने वाला, उकसाने वाली राजनीति करने का आरोपी मानते है इसलिए अछूत मानते हुए अल्संख्यको की नज़रो में सेक्युलर बनने के लिए शोक यात्रा में नहीं शामिल हुएँ। मै इन विवेकी नेताओ से ये जानना चाहूँगा कि कौन सा नेता सही राजनीति कर रहा है? कौन नहीं राजनीति की दूकान चला रहा है? तो शुचिता का पाठ ठाकरे या मोदी जैसे हिन्दू नेताओ पर ही क्यों लागू होता है? तो क्या  अलगाववादी नेता जो कश्मीर में पंडितो को मारकर, भगाकर आज़ादी मांग रहे है इनके नेता के शोक सभा में होना चाहिए? या इन नेताओ के शोक सभा में होना चाहिए जो सबसे मेहनती मजदूर के नाम पर राजनीति कर रहे है। मजदूर तो वही झुग्गी झोपड़ी वाले रहे लेकिन ट्रेड यूनियन के नेता एयर कंडिशन्ड केबिनो में जा पहुंचे। तो इन नेताओ के मरने पर भीड़ जुटनी चाहिये? या इन “हाथ की सफाई” वाले नेताओ के मरने पर मजमा लगना चाहिए जिनके कुकर्मो की लिस्ट इतनी  लम्बी है कि यमराज के आफिसवाले वाले भी ना पढ़ पाए अगर चाहे तो। या राम लला के नाम पर सत्ता पाने वाले वाले पर राम को ही पीछे  धकिया कर राजनीति करने वाले नेताओ के मरने पे भीड़ होनी चाहिए? तो ये बाल ठाकरे की शोकयात्रा   में उमड़ी भीड़ पर जलने वाले, कुढने वाले, दूर रहने वाले जलते रहे, कुढ़ते रहे, सर नोचते रहे है।     

बाल ठाकरे इन धर्म निरपेक्ष नेताओ से अच्छा नेता था। कम से कम उसका असली चेहरा सामने था। उसने नकाब ओढ़कर राजनीति नहीं की। पीठ  पीछे घात लगाकर हमला  नहीं किया। जो भी किया खुल कर सामने किया। यहाँ का खाकर कठमुल्लों की तरह विदेशी ताकतों की जय नहीं करता था। धर्म निरपेक्ष बनकर बिरयानी तो नहीं काटता था उन आतंकवादियों के साथ जो निरीह लोगो को हलाक करते थें। इस का मतलब ये नहीं कि मै बाल ठाकरे की नीति या राजनीति का समर्थक हूँ। कतई नहीं। लेकिन एक ठाकरे को कोसना मै  जायज़ नहीं मानता क्योकि इस हमाम में कौन नंगा नहीं? तो सिर्फ ठाकरे से घृणा क्यों? सिर्फ ठाकरे से दूरी क्यों? 

रही भीड़ की बात। तो मेरी नज़रो में भीड़ का आना ख़ास महत्त्व नहीं। कल शाहरुख खान इलाहाबाद में रंडी टाइप का ठुमका लगा जाए तो उजड्ड नौजवानों की बेकाबू भीड़ लगेगी चीखने चिल्लाने? तो क्या शाहरूख खान को मै इस भीड़ प्रदर्शन के बल पर पर बहुत बड़ा अभिनेता मान लूं? या कल को कोई ईमानदार आदमी मर जाए और सौ पचास तो छोड़िये दस आदमी भी न शामिल हो तो क्या मै उस आदमी को कमीना मान लूं और इस शोकयात्रा को भी फ्लाप या हिट शो मानने की कवायद में जुट जाऊं ?

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