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एक दिन जब हम नहीं होंगे ( रहस्यवादी प्रेम कविता )

 

सब से दूर जहाँ दुनियाँ के साये नहीं है, जहा सिवाय प्रेम के कुछ नहीं :-) :-) :-)

सब से दूर जहाँ दुनियाँ के साये नहीं है, जहा सिवाय प्रेम के कुछ नहीं 🙂 🙂 🙂


आओ चले हम उस जहाँ में

जहा वक्त रुका रुका सा हो
थमा थमा सा हो
वहा बैठे हुए एक दूसरे के साये तले
फिर ये सोचे उन दिनों क्या होगा
जब हम तो नहीं होंगे
पर ये हसींन नज़ारे तब भी होंगे
और यूँ  दे अपने अस्तित्व को नए मायने
उस मौन में जो तेरे और मेरे
मौन से मिलकर बना  हो
जिसमे हम धीमे धीमे घुलते जाए
साथ ही समाते जाए उस परम मौन में
जो लम्हा लम्हा हमारे पास खिसकता रहा
चोरी चोरी से चुपके चुपके से
और निगलता रहा दोनों के एक हुए मौन को
मिल गया हमारा मौन उस परम मौन से
मिट गाये सारे भेद
और अपना एकत्व
अनित्य के दायरे से दूर
अखंड हो गया
पूर्ण हो गया।

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English Version Of The Poem:

When I Be Absent In This World ( Mystical Love Poem )

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Information About The Picture:

The picture clicked by me depicts a spot located at my village situated in Mirzapur District, Uttar Pradesh, India.  It’s related with my childhood memories.

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वो जो तुमसे जोड़ता एक पुल है!

वो जो तुमसे जोड़ता एक पुल है!

वो जो तुमसे जोड़ता एक पुल है!

कही न कही तेरे मेरे बीच
में एक पुल है
जिस पर से गुज़र कर मै
अक्सर पहुच जाता हूँ तुम तक

हां वो पुल दिखता नहीं है
इस यथार्थ से भरी दुनियाँ में
ठीक ही तो है कि दिखता नहीं
या फिर मैंने ठीक ही तो किया
जब मैंने इसे सच्ची दुनिया में  
दोष बाधा से बंधी नज़रो से उलझती
हर इस तरह के तिकड़मो से ऊपर रखा
और नहीं बनाया सबको दिखने वाला पुल

वो एक पुल
जिस पर से गुज़र कर मै
अक्सर पहुच जाता हूँ तुम तक

बनता या बनाता इसे दुनियाँ में
तो निश्चित था कि वो ढह जाता
छल कपट से भरी हर निगाहो से
निकलती हर एक उतरन सें
और मिट जाता वो एक सहारा भी
जो  अभी मेरे जीने की एक वजह है

वो एक पुल
जिस पर से गुज़र कर मै
यथार्थ के बीच से होता हुआ
अक्सर पहुच जाता हूँ तुम तक
हर रोज, हर एक गुजरते लम्हे में!
उस दुनियाँ में जहा कोई नही होता
सिवाय तेरे और मेरे अस्तित्व के.

For Non-Hindi Readers:

English Version Of The Same Poem

 Pics Credit:

Pic One


Pain Is The True Vitalizer Of My Soul!

Pain Serving As Panacea!

Pain Serving As Panacea!

Listen my beloved 
Love is never put on scale

In love do you measure the 
Worth of emotions, desires and wishes?

Why do you wish to heal the pain
Emanating from injuries you fail to see?

Pain which nature wants to heal
Shall always get healed

And sometimes unhealed injuries 
Refine the soul further 

Or let them remain unhealed 
Floating in the ocean of heart as insoluble capsules of pain!

It’s an unbearable dishonesty on your part my beloved
An act unfair to dilute the pain simmering inside

Listen I have learnt lessons
To move from one pain to another 

In the company of light 
It’s time for you my beloved to touch new horizons 

And leave me far behind 
To walk all alone on the isolated path 

For I have also learnt 
How to remain alive with no trace of life inside!

When Ways Get Separated!

When Ways Get Separated!


The same poem in Hindi with a slight  modification in style and treatment.

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सुन मेरे मीत: तू कुछ जख्मो को हरा ही रहने दे! 

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जो इश्क करते है वो 
इश्क को तराजू में नहीं तौलते 

अरमानो, ख्वाहिशों, जस्बातो 
का लेखा जोखा कैसा मीत!

जो जख्म दीखते नहीं उन 
पर मरहम लगाना कैसा? 

जिन जख्मो को भरना होता है 
वो अपने आप ही भर जाते है 

या वक़्त के साए में ढलकर 
रूह को थोडा और निखार जाते है 

या नासूर बनते है 
तो नासूर ही बन जाने दें?

सो लिहाज़ा तेरा तडपना, आज़माना 
अब बेमानी सा लगता है 

कि एक जख्म से दूसरे जख्म तक 
का फासला तय करना हमने सीख लिया है

सो बेहतर है कि तू आगे बढ़ चल 
रौशनी के कारवां संग 

और छोड़ दे पीछे मुझे 
अजनबी सी राहो पे तन्हा चलते रहने को  

कि अब मर के भी हमने
जीते सा दीखते रहने का हुनर सीख लिया है।

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Trying  To Be On A Different  Path But Like Always All Alone!

Trying To Be On A Different Path But Like Always All Alone!

Pics Credit:
 

Pic Two

Pic Three

 

फेसबुक वाला इश्क: इसको बौड़मपने का माध्यम ना बनाये !!

फेसबुक: क्यों नहीं हम किसी माध्यम का सही  इस्तेमाल करते कभी?

फेसबुक: क्यों नहीं हम किसी माध्यम का सही इस्तेमाल करते कभी?

अलबर्ट आइंस्टाईन की तमन्ना थी कि एक ऐसा जहां हम बनाएं जहाँ मानवीय दुर्गुण न पहुच सके। जो इसके प्रभाव से परे हो। लेकिन शायद ये बहुत ही आदर्श स्थिति है जिसकी परिकल्पना तो ठीक है इसको असल जिंदगी में रूपांतरित करना शायद संभव नहीं। इसको फेसबुक पर व्याप्त नौटंकी से समझे।  इस  पहले ये देखे कि इस दुनिया में देखिये क्या हो रहा है। कोई भी अच्छा आदमी हो। उसके बारे में इतने सारे भ्रम फैला देंगे कि और तो और वो आदमी खुद भी भ्रमित हो जाएगा कि उसका असल चरित्र क्या है। ये दुनिया के लोग प्रमोट तो नहीं करेंगे पर हा सामूहिक रूप से मिलकर उसके इज्ज़त का चीरहरण जरूर कर देंगे। और ऐसे ही लोग किसी भी संस्था, फोरम को गिराने के पीछे भी होते। और ऐसा नहीं कि ये बिना दिमाग वाले लोग है। इनके पास बहुत दिमाग है लेकिन जैसे कि होता है कि भारी भरकम ओहदे और ऊंची डिग्री वालो के पास सिर्फ अहम होता है सो ये ना जिंदगी जी पाते है और ना ही किसी भी फ़ोरम की आदर्श स्थिति को ये बरकरार रहने देते है। मटियामेट करना ही इनको आता है, सब अच्छे खूबसूरत चेहरों और गतिविधियों को इनको सिर्फ विकृत करना ही आता है। हर साधारण चीज़ को ये जटिल बना देते है जिसको सुलझाने की तमीज इनके पास नहीं होती। आइये फेसबुक के माध्यम से समझे। लोग मानते है कि ऑनलाइन जगत सच्ची दुनिया से अलग है। बिलकुल अलग नहीं है। बल्कि ये आपके ही गुणों अवगुणों का आइना है। आप माने ये ना माने ये अलग बात है।

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                                  *फेसबुक स्टेटस की महिमा* 

मेरे एक मित्र है। थोडा बीमार पड़ गए है। पता नहीं किन ग्रह नक्षत्रो के चलते इसका उल्लेख फेसबुक पर कर दिया। कर दिया सो कर दिया पर देखता हूँ कि कई बुडबक उस स्टेटस को लाइक करके निकल गए है। इसी बेहायी के चलते फेसबुक का स्टेटस लोग गिरा रहे है। जब दिमाग का इतना वाहियात इस्तेमाल फेसबुक पर कर रहे है तो मन डरता है ये सोचकर कि असल जिंदगी में ये कितने सुलझे हुएँ होंगे। किसी भी अच्छे प्लेटफार्म/ फोरम का ऐसे लोग ही स्तर गिराने के पीछे होते है।ये तो अच्छा हुआ एक पुरुष मित्र बीमार पड़ा। स्त्री जात का स्टेटस होता तो और नौटंकी होती। लाइक्स कही अधिक होती। ठीक होने की शुभकामनाएं भी अधिक होती।

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                               *फेसबुक पर तर्कों का औचित्य* 

कानून का विद्यार्थी रहा हूँ इसलिए आर्ग्यूमेंट्स का महत्त्व औरो से बेहतर समझता हूँ लेकिन होता ये है कि जहा भेड़िया धसान सरीखा माहौल हो, कोई बुडबक कुछ भी बक सकता है वहा क्या तर्क करे और क्यों करे। खैर कुल मिला के बात सिर्फ है कि अपनी बात कहने का हौसला रखे कैसा भी माहौल हो जब तक आत्मा गंवारा करे खासकर तब जब बोलना ख़ामोशी से बेहतर हो। और उसके बाद ख़ामोशी से कट ले। हम तो यही करते है। आप का मै कह नहीं सकता।

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                                            *कैसे कैसे ग्रुप्स*  

ना जाने किन वाहियात लोगो ने कैसे कैसे ग्रुप बना रखे है और बिना अनुमति लोगो को जोड़ते घटातें रहते है। इसमें एक सनकी मॉडरेटर रहता है। जिसको ना जोड़ने की तमीज है और ना ही ग्रुप की गतिविधियों को मानिटर करने की  तमीज। कहने को ये खुले दिमाग का होता है पर ये किसी के आधीन होकर एक ख़ास तरीकें ही की बात को प्रमोट करता है। तो जब कोई गतिविधि ना हो। और एक ख़ास दिमाग-गलत दिमाग- जब आपकी सारी बातो का अनर्थ कर डाले तो ग्रुप्स का औचित्य क्या है?

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                                 *फेसबुक वाला इश्क़ एंड फोटोशाप* 

इश्क़ जात पाँत  का भेद नहीं देखता। उम्र का फासला भी नहीं देखता। असल जिन्दगी में इश्क के इस फ़लसफ़े का सही रूप भी देखने को मिलता है और गलत रूप भी देखने को मिलता है। फेसबुक का यही हाल है। यहाँ भी यही फ़लसफा विद्यमान है अपने सही गलत प्रकार में। सो तो फेसबुक पर भी लोग असली नकली चेहरो के साथ विद्यमान है। किस चेहरे के पीछे कौन है ये आप ठीक ठीक नहीं बता सकते है। कोई थुलथुल महिला भी जूलिया रोबर्ट्स सा फिगर पा सकती है फोटोशाप के जरिये और फील गुड कर सकती है और करा सकती है। एक अधेड़ उम्र का गया गुजरा व्यक्ति भी शाहरुख खान की तस्वीर लगा कर कुछ भी एहसास करा सकता है। जाहिर है कम उम्र की लौंडिया ही पटायेगा बकवास बात करने के लिए। अब इस तरह तो वो गहरा इश्क वाला लव करने से रहा।

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शायद असल जिंदगी की तरह ये आभासी जगत भी अच्छे बुरे लोगो से भरा है।  जो सावधानी आप असल जिंदगी में बरतते है वो ऑनलाइन में भी बरतते है। लेकिन मुद्दा ये नहीं है। सावधानी बरतने वाला। तकलीफ ये है कि इस नौटंकी मतलब अच्छे बुरे के फर्क में भेद करने के उपक्रम के चलते अच्छे लोगो का जो प्रताड़ना झेलनी पड़ती है उसकी भरपाई कोई नहीं कर सकता। अच्छे बुरे के बीच  संघर्ष तो हमेशा ही चलता आया है और चलता रहेगा। ये कब रुका है। लेकिन अच्छे लोगो की बलि देने का सिलसिला इस संघर्ष के चलते कभी रुकेगा कि नहीं। क्या अच्छे लोग सिर्फ बेवजह बलि चढ़ने के लिए दुनिया में आते है? बताएं कोई?

 

फील गुड करने के लिए ये असल जूलिया रोबर्ट्स की असल सौम्यता ही काफी है। ये फोटोशाप वाली माया की क्या जरूरत है?

फील गुड करने के लिए ये असल जूलिया रोबर्ट्स की असल सौम्यता ही काफी है। ये फोटोशाप वाली माया की क्या जरूरत है?

 

Pics Credit:

Pic One

Pic Two

वैलेंटाइन डे: लो आया मौसम प्यार के बिक्री का!

क्या प्रेम आज भी इतना ही मासूम है इस फूल की तरह?

क्या प्रेम आज भी इतना ही मासूम है इस फूल की तरह?

कल तथाकथित प्यार करने वालो का परम पुनीत दिवस है। कुछ कहने की जरूरत नहीं है कि फर्जी इमोशंस के साथ बहुत सारे गुलाबो का आदान प्रदान होगा। गुलाब का तो पता नहीं पर वो अगर समझदार लड़की होगी तो उसका काम तो लह गया क्योकि गुलाब तो मुरझा जायेंगे, चाकलेट उदर में समा जायेंगे लेकिन गिफ्ट हो सकता है अगले साल भी किसी और को देने में काम आ सकते है। क्योकि एक साल में बहुत से इस साल वैलेंटाइन डे मनाने वालो लड़कियों के बॉयफ्रेंड इनके द्वारा ऐक्स्ड (axed ) कर देने के कारण एक्स-बॉयफ्रेंड हो जाते है। एक्स- गर्लफ्रेंड भी अस्तित्व में आ जाती है। खैर ये सब पुराने प्रेमी नहीं कि जाके किसी सॉलिड रॉक के ऊपर कोई दुखांत सा गीत गाये। इतने संवेदनशील नहीं कि शोक मनाये। कुछ एक जो थोड़े दुखी होंगे वो जरूर सॉलिड रॉक कुक्कुर धुन में रचे गीत जैसे” जो भी मै कहना चाहू बर्बाद करे अल्फाज़ मेरे को गाने या सुनने के बाद “तू नहीं सही कोई और सही” को चरितार्थ करते हुएँ किसी नए के दामन से लिपट जायेंगें। अब कितने सारे आप्शन माने विकल्प  “जोड़ी ब्रेकर” के रूप में भटक रह होते है। वो तो पुराने प्रेमी थे जो बेचारे कितने साल महीने आंसू टपकाते थें प्यार की आग में तन बदन जल गया” गाते थें। अब तो आप इतने व्यापक विकल्पों वाले है कि मौका मिले तो “मेरे ब्रदर की दुल्हन” भी आपकी हो सकती है।

बाज़ार में देख रहा हूँ कि भोजपुरी गीतों के रोमांटिक एल्बम भी बहुत सारे आ गए है जिसके ऊपर “लभ” वाले चिन्ह बने हुएं है। मतलब प्यार का व्यापार ग्रामीण संस्कृति में गहनता से व्याप्त हो गया है। अहसास तो यही होता है। वर्ना ये अजंता-एलोरा की आधुनिक संस्करण तो भोजपुरी वाले “लभ” में इंटरेस्ट दिखाने से  रही। जितनी तेज़ी से भारत ग्लोबल हुआ उतनी तेज़ी से लव का ग्राफ भी बढ़ा ये तय है। दोनों में समानुपाती रिश्ता सा लगता है। खैर एक चीज़ ये है कि इंडिया ने अब इतनी फ्रीडम जरूर दी है कि अगर इतने सारे आप्शनस लॉन्ग टर्म, शार्ट टर्म, लिव-इन के बावजूद भी आप अगर अकेले रह गए तो आप अपने सेक्स के साथ भी लव कर सकते है। इससे आप का कॉन्फिडेंस लेवल तो बढेगा ही और साथ में आप सब पे धौंस जमा सकते है प्रोग्रेसिव बन कर। कम से कम लोगो को अपने अनुभव से उत्पन्न प्रोग्रेसिव लेक्चर तो झाड़ ही सकते है। थोडा अच्छा लिख लेते हो तो क्या पता आप एक दो नोवेल भी लिख दे और पुरस्कार वगैरह मिल गया, जो ऐसे थीम पे अन्तराष्ट्रीय या राष्ट्रीय जगत में कुछ न कुछ मिलना तय ही है, तो युवा वर्ग की नब्ज़ पकड़ने वाले तमगो सहित आप की लेखक के रूप में उभार तय है। 

वैलेंटाइन डे के ठीक एक दिन के बाद भट्ट कैम्प की मर्डर थ्री रिलीज़ हो रही है। ये सीरिज मैंने नहीं देखी है और ना मै चाहता हूँ कि इस सीरिज की कोई फ़िल्म देखने का सौभाग्य कभी भविष्य में बने लेकिन इस नयी फ़िल्म के पोस्टर में लिखी पंच लाइन आज के लव की हकीकत बयान कर देती है। लिखा है कि आप अपने प्रेमी को कितना जानते है? मतलब साफ़ है कि अगर आप सचेत नहीं है तो लव के बाद धोखा अवश्य है। वैसे अच्छा है वैलेंटाइन डे के ठीक एक दिन के बाद ही बहुत सारे नए नए प्रेमी भूतपूर्व प्रेमी हो जायेंगे। एक्सपीरियंस बढेगा युवाओं का। कैसी संस्कृति है कि वफ़ा की सोच भी रखना जुर्म से कम नहीं। सब में मिलावट, सब में खोट है चाइनीज़ माल की तरह। कब फुस्स हो जाए पता नहीं। एक युग था कि सरल और सीधा होना सम्मानजनक था। आज आप के नाकाबिलियत का परिचायक है। आप के विरुद्ध निकम्मेपन का तमगा है। शातिर दिमाग होना ही बुद्धिमानी बन गया है। खैर ये लव करने वाले प्रेमी उगते रहे, पनपते रहे। लेकिन चूँकि गाँव में “लभ” पाँव पसार चूका है इसलिए सरकार को जैसे शहर में लव के डाक्टर माने साइकोलोजिस्टस है जो प्यार के साइड इफेक्ट्स डिप्रेशन या टीनेज प्रेगनेंसी के केसेस को देखते है ऐसे कुछ डाक्टरों को ग्रामीण क्षेत्रो में नियुक्त किये जाए। ताकि कम से कम प्रेम के बाद जो शॉक्स झेंले पड़े उनका निदान वैज्ञानिक तरीके से हो। खैर मेरी तरफ से सब प्रेमी जनों को शुभकामनायें। 

मेरे अन्दर तो साहिर की यही पंक्तियाँ उभर रही है:

हर चीज़ ज़माने की जहाँ पर थी वहीं है,
एक तू ही नहीं है

नज़रें भी वही और नज़ारे भी वही हैं
ख़ामोश फ़ज़ाओं के इशारे भी वही हैं
कहने को तो सब कुछ है, मगर कुछ भी नहीं है

हर अश्क में खोई हुई ख़ुशियों की झलक है
हर साँस में बीती हुई घड़ियों की कसक है
तू चाहे कहीं भी हो, तेरा दर्द यहीं है

हसरत नहीं, अरमान नहीं, आस नहीं है
यादों के सिवा कुछ भी मेरे पास नहीं है
यादें भी रहें या न रहें किसको यक़ीं है

 

प्रेम का एक एक स्वरूप ये भी है!

प्रेम का एक स्वरूप ये भी है!


Reference:

Kavita Kosh

Pics Credit: 

Internet

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ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर रेलवे अफसर।

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