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साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की नौटंकी- तमाशा खूब है यारो!!

कुछ लेखको को देश में इस कदर असहिष्णुता के दर्शन होने लगे कि इन सभी ने पुरस्कार लौटाने की घोषणा कर दी. इस मानसिकता को समझना बहुत जरुरी है कि इनको वाकई बिगड़ते माहौल की फिक्र है या ये किसी तुच्छ राजनीति से प्रेरित है.

कुछ लेखको को देश में इस कदर असहिष्णुता के दर्शन होने लगे कि इन सभी ने पुरस्कार लौटाने की घोषणा कर दी. इस मानसिकता को समझना बहुत जरुरी है कि इनको वाकई बिगड़ते माहौल की फिक्र है या ये किसी तुच्छ राजनीति से प्रेरित है.

ये देश तमाशो और नौटंकी का है. सो ये आश्चर्यचकित नहीं करता कि कुछ ख़ास वर्ग समय समय पर नौटंकी करते रहते है. इसमे से अधिकतर वामपंथी मसखरे होते है. या इनसे संचालित संस्थाए होती है. इस लेख के लिखे जाने तक कम से कम विभिन्न भाषाओ के २५ लेखक अपना  पुरस्कार लौटा चुके है. अगर बिके हुए मीडिया की बात माने तो इन सबको देश में बढ़ते हुए धार्मिक असहिष्णुता के चलते काफी ठेस लगी  है. कन्नड़ चिन्तक एमएम कलबुर्गी, भाकपा के वरिष्ठ नेता गोविंद पानसरे, भारतीय तर्कवादी और महाराष्ट्र के लेखक नरेन्द्र अच्युत दाभोलकर और दादरी काण्ड के चलते इन लेखको को देश में इस कदर असहिष्णुता के दर्शन होने लगे कि इन सभी ने पुरस्कार लौटाने की घोषणा कर दी. इस मानसिकता को समझना बहुत जरुरी है कि इनको वाकई बिगड़ते माहौल की फिक्र है या ये किसी तुच्छ राजनीति से प्रेरित है.

नामवर सिंह की बात इस परिपेक्ष्य में काफी महत्त्वपूर्ण हो जाती है. और जैसा ये तय था कि नामवर सिंह की बात सुनकर इन सब का बिलबिलाना तय था. वही हुआ. “डॉक्टर सिंह ने देश के पच्चीस लेखकों द्वारा अकादमी पुरस्कार लौटाए जाने पर कहा क़ि लेखक अख़बारों में सुर्खियां बटोरने के लिए इस तरह पुरस्कार लौटा रहे हैं। उन्होंने कहा कि मुझे समझ में नहीं आ रहा कि लेखक क्यों पुरस्कार लौट रहे हैं। अगर उन्हें सत्ता से विरोध है तो साहित्य अकादमी पुरस्कार नहीं लौटाने चाहिए, क्योंकि अकादमी तो स्वायत संस्था है और इसका अध्यक्ष निर्वाचित होता है। यह देश की अन्य अकादमियों से भिन्न है। आखिर लेखक इस तरह अपनी ही संस्था को क्यों निशाना बना रहे हैं। अगर उन्हें कलबुर्गी की हत्या का विरोध करना है तो उन्हें राष्ट्रपति, संस्कृति मंत्री या मानव संसाधन मंत्री से मिलकर सरकार पर दबाव बनाना चाहिये और उनके परिवार की मदद के लिए आगे आना चाहिए। उनका यह भी कहना है कि इस मुद्दे पर अकादमी को लेखकों का एक सम्मेलन भी करना चाहिए, जिसमें इन सवालों पर खुल कर बात हो।” नामवर सिंह जी ने बिना लाग लपेट के खरी खरी कह दी. जाहिर सी बात है इस सीधी सी बात का इन पुरस्कार लौटाने की होड़ में लगे हुए लेखको के पास कोई जवाब नहीं. लेखको का राजनीति से यूँ तो काफी घनिष्ठ सम्बन्ध है लेकिन ये भी सड़कछाप राजनीति में मोहरों की तरह इस्तेमाल होंगे ये पता ना था.

नामवर सिंह: मुझे समझ में नहीं आ रहा कि लेखक क्यों पुरस्कार लौट रहे हैं। अगर उन्हें सत्ता से विरोध है तो साहित्य अकादमी पुरस्कार नहीं लौटाने चाहिए, क्योंकि अकादमी तो स्वायत संस्था है और इसका अध्यक्ष निर्वाचित होता है। यह देश की अन्य अकादमियों से भिन्न है। आखिर लेखक इस तरह अपनी ही संस्था को क्यों निशाना बना रहे हैं?

नामवर सिंह: मुझे समझ में नहीं आ रहा कि लेखक क्यों पुरस्कार लौट रहे हैं। अगर उन्हें सत्ता से विरोध है तो साहित्य अकादमी पुरस्कार नहीं लौटाने चाहिए, क्योंकि अकादमी तो स्वायत संस्था है और इसका अध्यक्ष निर्वाचित होता है। यह देश की अन्य अकादमियों से भिन्न है। आखिर लेखक इस तरह अपनी ही संस्था को क्यों निशाना बना रहे हैं?

अगर ये वाकई बुद्धिजीवी वर्ग का प्रतिनिधित्व करते है तो इन्हें विरोध और वो भी एक जेन्युइन विरोध को  बेहतर तरीके से उभारना चाहिए था. लेकिन जब तह में दिखावटी कारण हो तो ये भी तय है कि विरोध भी भांडनुमा ही बन जाएगा. इनसे पूछा जाना चाहिए जब कांग्रेस काल में इतने सुनियोजित तरीके से दंगे हुए, महाराष्ट्र में एक वर्ग गांधी की प्रतिमा का खुले आम निरादर करता है, खुले आम गुंडागर्दी करता है, तस्लीमा नसरीन को खुले आम धमकियाँ दी गयी जिस वजह से उसे एक देश से दुसरे देश में जान बचाने के लिए भागना पड़ रहा है, सलमान रुश्दी का भारत में कार्यक्रम इस वजह से स्थगित हो गया कि उन्हें एक वर्ग विशेष ने पहले ही चेता दिया था कि अंजाम सही नहीं होगा तब क्या इन लेखको की आत्मा मर गयी थी? तब क्या इनका जमीर ख़ाक हो गया था? और आज एक बारगी इन लेखको को देश में फैलते  असहिष्णुता के दर्शन हो गए?

ये क्या सुनियोजित नहीं लगता? क्या ये महज संयोग है कि पुरस्कार लौटाने वाले अधिकतर किसी ना किसी रूप में वामपंथी विचारधारा से संचालित है. और क्या हम नहीं जानते ज्यादातर  वामपंथियों ने इस देश की जड़ खोदने का ही काम किया है. ये कहने में भी गुरेज़ नहीं कि ये सब विदेशी ताकतों से संचालित है. कडवी बात ये है कि उन्हें इस सरकार को घेरने का कोई मुद्दा ही नहीं मिल रहा है. सो मुद्दे अंग्रेजी में कहे तो “concocted” किये जा रहे. बात बस इतनी सी है. वो कहावत है ना कि कीचड फेंकते रहो कुछ ना कुछ तो चिपक ही जाएगा. ये सारे राष्ट्र विरोधी ताकते इस वक्त इसी फिराक में लगी है. लेखको कि एक जमात भी इसी  खेल में मोहरों की तरह फिट हो गयी. मुझे इसी बात का खेद है.

ऐसा नहीं कि मुझे विचारको या चिंतको के मारे जाने का दुःख नहीं लेकिन जब इस को एक घिनौने रूप से गन्दी राजनीति को आगे बढाने के लिए एक औजार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है तब तकलीफ होती है. ये पुरस्कार लौटाने वाले भाई लोग चाहे कुछ भी जताने की कोशिश करे, और चाहे दोगली मीडिया इनको कितना महिमंडित करे असल कहानी सिर्फ और सिर्फ यही रहेगी कि कुछ लोग जो इस सरकार की स्थिरता से बौखलाए है खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचे की तर्ज पर सरकार को अस्थिर करने का कारण ढूंढ रहे है. लेखक जो प्रबुद्धता की निशानी होते है वे भी इस गंदे खेल में शामिल हो गए ये जरुर खलेगा. लेकिन फिर भी हम ये ना भूले कि इसमें अधिकतर वामपंथ से पोषित
है और वामपंथी इस देश के प्रति कैसी निष्ठां रखते है ये किसी से नहीं छुपी!  इलाहाबाद में भी साहित्यकार बंधू जुटे और इनमे ज्यादातर वामपंथ समर्थित अप्रासंगिक हो चुके लेखको की एक लम्बी फौज थी जिनकी समझ ये है कि ओसामा बिन लादेन में भी ये महानता के गुण ढूंढ लेंगे लेकिन नरेन्द्र मोदी में सिर्फ और सिर्फ हिटलर और मुसोलिनी के ही दर्शन होंगे!!

कुछ एक साल पहले लखनऊ में एक प्रेस कांफ्रेंस में जामा मस्जिद के इमाम सैयद अहमद बुखारी ने एक पत्रकार को सरे आम धमकी दी और बुरी तरह पीटा भी लेकिन इस खबर को कोई अहमियत नहीं मिली. कुल मिला के मामला ये है कि असहिष्णुता के मायने इस देश में ये है कि जब सिर्फ एक वर्ग विशेष को किसी भी वजह से तकलीफ पहुंचे तो सब जगह इस बात को बढ़ा चढ़ा कर बताओ कि देश में असहिष्णुता पनप रही है! दादरी हत्याकांड के तह में मत जाओ, उसकी असल वजह मत जानो लेकिन ये सब जगह फैला दो कि एक मुसलमान की मौत हो गयी! कल को शायद सडक हादसों में मरने वाले मुसलमान को भी सांप्रदायिक हिंसा का शिकार बता दिया जाए!!

अंत में सिर्फ ये जानना चाहेंगे स्वामी लक्ष्मणानन्द जी की हत्या जब क्रिस्चियन मिशनरीज के षड़यंत्र के चलते जन्माष्टमी समारोह के दौरान उड़ीसा में हुई थी तब क्या किसी लेखक ने ( अभी तक  के इन २५ लेखको को मिलाकर जिन्होंने पुरस्कार लौटाए है) असहिष्णुता के चलते अपना पुरस्कार लौटाया था? या लौटाने का सोचा था? और नहीं लौटाया ना ही लौटाने का सोचा तो उन्होंने ऐसा क्यों किया? तब आपको समझ में आ जाएगा कि वे आज ऐसा असल में क्यों कर रहे है! या इन लेखको की आत्मा तब क्यों नहीं डोली जब सामूहिक नरसंहार झेलते झेलते कश्मीरी पंडित जम्मू और कश्मीर से लगभग पूरी तरह से पलायन कर गए!!  ये तो कई वर्षो से इनके साथ हो रहा है!  इतने सालो में इन लेखकों की नजर इन पर एक बार भी नहीं पड़ी. इन कश्मीरी विस्थापितों के दुःख दर्द से क्यों नहीं इन लेखको की आत्मा डोली?

अंत में सिर्फ ये जानना चाहेंगे स्वामी लक्ष्मणानन्द जी की हत्या जब क्रिस्चियन मिशनरीज के षड़यंत्र के चलते उड़ीसा में हुई थी तब क्या किसी लेखक ने ( अभी तक के इन २५ लेखको को मिलाकर जिन्होंने पुरस्कार लौटाए है) असहिष्णुता के चलते अपना पुरस्कार लौटाया था? या लौटाने का सोचा था? और नहीं लौटाया ना ही लौटाने का सोचा तो उन्होंने ऐसा क्यों किया? तब आपको समझ में आ जाएगा कि वे आज ऐसा असल में क्यों कर रहे है!

अंत में सिर्फ ये जानना चाहेंगे स्वामी लक्ष्मणानन्द जी की हत्या जब क्रिस्चियन मिशनरीज के षड़यंत्र के चलते उड़ीसा में हुई थी तब क्या किसी लेखक ने ( अभी तक के इन २५ लेखको को मिलाकर जिन्होंने पुरस्कार लौटाए है) असहिष्णुता के चलते अपना पुरस्कार लौटाया था? या लौटाने का सोचा था? और नहीं लौटाया ना ही लौटाने का सोचा तो उन्होंने ऐसा क्यों किया? तब आपको समझ में आ जाएगा कि वे आज ऐसा असल में क्यों कर रहे है!

References:

नामवर सिंह
साहित्य अकादमी पुरस्कार
स्वामी लक्ष्मणानन्द जी की हत्या
अवार्ड विवाद

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