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मुजफ्फरनगर के दंगे: कुछ कडवे भयानक सच जिनका जिक्र ना हुआ!

ये सब कहा छुपा के रखे जाते है?

ये सब कहा छुपा के रखे जाते है?

अखिलेश यादव  जब भारतीय राजनीति में अहम् किरदार अदा करने वाले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो कुछ लोगो में शायद ये झूठी आस जाग उठी कि शायद एक युवा चेहरा कुछ बेहतर परिवर्तन ला दें. लेकिन सिर्फ चेहरे बदलने से चाहे वो युवा ही क्यों ना हो तब तक बात नहीं बनती जब तक आप के पास स्पष्ट नीति ना हो. हुआ भी वही लोक लुभावनी योजनाओं के दम पर बनी ये सरकार आज ना सिर्फ विवादों में फँस गयी है जहा नौकरशाह सहमे से है बल्कि नित नए दंगो ने प्रदेश को अशांत क्षेत्र बना दिया है. मुज़फ्फरनगर के दंगे वीभत्स तस्वीर पेश करते है और ये बताते है कि राजनेता किस हद तक गिर सकते है अपने प्रभाव को बचाने के लिए. 

हम कानून राज की बात करते है और दामिनी बलात्कार काण्ड पर इस देश में बहुत उबाल उठा लेकिन मुजफ्फरनगर में इस दंगे से पहले कितने बलात्कार हिन्दू औरतो के साथ मुस्लिमो ने किये उसको किसी सरकार ने संज्ञान में लेने की जरुरत क्यों नहीं महसूस की? इसकी वजह से सात सितम्बर को जाट समुदाय ने एक पंचायत बुलाई  गयी बहु बेटियों के सुरक्षा के लिए. इसमें शामिल होने के लिये जा रहे लोगो पे हमले हुए और उसके बाद स्थिति बेकाबू हो गयी.  जब किसी सरकार के पास नीति नहीं होती तो ताकतवर चेहरे कठपुतली की तरह सरकार को नचाते है. यही हाल इस वर्तमान सरकार का भी है. दंगे किस कारण से हुए ये तो कई खबरों का विषय बन गयी है लेकिन इस जरूरी तथ्य पर शायद चर्चा ना हुई हो कि किस तरह खतरनाक हथियारों का जमावाड़ा जिसमे ऐ के 47 बंदूके तक शामिल है मुस्लिम वर्ग में इकठ्ठा है! हैरानगी की बात है कि मस्जिद जो इबादत का ठिकाना होना चाहिए इन हथियारों को छुपाने का केंद्र बनती जा रही है. इंटेलिजेंस विभाग क्या सिर्फ छूरी कट्टे की तफ्तीश के लिए बनी है? 

ये केंद्र सरकार और राज्य सरकार के इन विभागों से पूछा जाना चाहिए कि जब धार्मिक स्थल इस तरह के आतंकी गतिविधियों का ठिकाना बन जाए तो उसके पास क्या रास्ते है इनको समाप्त करने के? या अल्पसंख्यक वर्ग के लोग मनमानी करे और प्रशासन  खामोश रहे तो उसके क्या नतीजे होंगे? क्योकि ये तय है कि अगर कार्यवाही हुई तो वही मुस्लिमो के साथ भेदभाव हो रहा है, उन्हें सताया जा रहा है, फँसाया जा रहा है इस तरह का शोर हर तरफ से उठेगा। इसलिए अगर सरकार के पास हिम्मत ना हो तो कम से कम सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट इस तरह के भयानक सच को  स्वतः संज्ञान में लेकर केंद्र और राज्य सरकार को विवश करे ये बताने के लिए कि इसके रोकथाम के लिए इनके पास क्या तरीके है और अब तक इन्होने क्या किया है?

गुजरात के दंगो पे गोधरा का सच भुलाकर सेक्युलर मीडिया ने इस बात का बहुत रोना रोया कि गुजरात सरकार ने समय रहते कार्यवाही नहीं की तो अब उत्तर प्रदेश में जो हमने देरी देखी, तथ्यों को नष्ट करके मुस्लिम वर्ग को राहत पहुचाने की कोशिश देखी उसके क्या मतलब निकाले जाए? यहाँ तक कि केंद्र सरकार भी ये कह रही है कि दंगो के भयावहता के बारे में प्रदेश सरकार ने उसे अँधेरे में रखा. खैर इस देश की राजनीति ये हो गयी है कि महिलाओ और अल्पसंख्यको को लुभाओ। उनके हर कुकर्मो पे पर्दा डाल दो. हो सकता है तात्कालिक रूप से महिलाओ और अल्संख्यको को ये सब भला लगे. लेकिन इसका दूरगामी परिणाम ये होगा कि उन महिलाओ और मुस्लिमों को तकलीफ झेलनी पड़ेगी जिनका इस गन्दी राजनीति से कोई वास्ता नहीं होगा। और सबसे बड़ा नुक्सान तो इस देश को होगा जिसने आज़ादी के बाद इस तरह के अलगाववादी  और आसुरी नेताओ के उदय की कल्पना तक ना की होगी।  

दंगे सुनियोजित और प्रायोजित होते है

दंगे सुनियोजित और प्रायोजित होते है

References: 

Firstpost

Zee News 

 
Series of Rapes  

Pics Credit:

Pic One ( Internet) 

Pic Two

हिन्दुओ की अपने देश में ही क़द्र नहीं. सिर्फ मै नहीं कहता सब कह रहे है.

 

हिमालय : तुमसे है एक गहरा रिश्ता

हिमालय : तुमसे है एक गहरा रिश्ता

 

कभी कभी कुछ चीजों का समझने के लिए आपको बड़ी बड़ी किताबो के साए में  नहीं रहना पड़ता. लोगो के बीच रहिये बड़े बड़े कडुवे सच आपको सुनने को मिलेंगे. मै चाहता तो पूर्व की भाँति बौद्धिक गिटपिट कर सकता मार्क्स के चेलो की तरह ये समझाने के लिए कि किस तरह से हिन्दुओ की आस्था, उनके मूल्यों या उनके प्रतीकों को बार बार मटियामेट किया जा रहा है. बौद्धिक विमर्श की एक कमजोरी मैंने ये देखी है कि बात सिर्फ बौद्धिक लोगो के बीच ही सिमट के रह जाती है. उसका सन्देश बहुत दूर तक जनमानस में घुस नहीं पाता. लिहाजा ये जरुरी हो गया है कि आम लोगो तक बात आम तरीके से ही पहुचे. या  दूसरे  शब्दों  में उनकी ही कही हुई बात को उनके बीच साफ़ सुथरे तरीके से रखी जाए. बहुत ज्यादा बौद्धिक आंच दे देने से बात का मूल तत्त्व जल के ख़ाक हो जाता है.लिहाजा कुछ बात मै यथावत वैसे ही रख रहा हूँ जो इधर कुछ दिनों में पढने को मिले. इनको आप क्लिष्ट समस्याओं का सरलीकरण ना समझे. ये समझे कि जब एक आदमी किसी बिंदु को समझता है तो कैसे समझता है.  बौद्धिक वर्ग जो इस लेख को पढ़े वो चाहे तो इन्ही बिन्दुओ का विस्तृत रूप अपने संदर्भो की रौशनी में पढ़ सकते है. वैसे ये अच्छा है कि एक आम हिन्दू अब सचेत हो रहा है उस राजनीति को लेकर जो उसके नाम से खेली जा रही है.  हिन्दुओ के अपने अष्मिता से खिलवाड़ का बोध हो चला है.  ये देश के अस्तित्व के लिए सुखद सन्देश है. 

पढ़े और देखे कि साधारण  हिन्दू क्या प्रश्न खड़े कर रहे है जिनसे हमारा बिका हुआ मीडिया हमेशा बचता है. मीडिया में  दलालनुमा पत्रकार  या लंठ मीडिया विशेषज्ञ आश्चर्य है कि कभी इन मुद्दों पे खुल कर नहीं बोलते सिवाय परदे के पीछे छुपे भेड़ियानुमा लोगो के स्वार्थ सिद्ध करने के सिवाय. 

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अल्पसंख्यक के नाम पर चलनेवाली राजनीति  को समझना  जरूरी है.  मुसलमान या इसाई ही क्यों अल्पसंख्यक माने जाते है? 

अल्पसंख्यक किसे कहते है? जिसकी आबादी ४९% हो उसे ? जिसकी आबादी १०% से कम हो उसे या जिसकी आबादी १८% हो…

क्या है परिभाषा…. जैन लोग अल्पसंख्यक है या मुस्लिम समाज? सिख  अल्पसंख्यक है या बुद्धिस्ट ? क्या पारसी (TATA) लोग अल्पसंख्यक है? 

कौन है अल्पसंख्यक?


 Simran Rock

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जरा इन  बयानों को देखिये: 

हजारों सिखों का कत्लेआम – एक गलती
कश्मीर में हिन्दुओं का नरसंहार – एक राजनैतिक समस्या

गुजरात में कुछ हजार लोगों द्वारा मुसलमानों की हत्या – एक विध्वंस 
बंगाल में गरीब प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी – गलतफ़हमी 

गुजरात में “परजानिया” पर प्रतिबन्ध – साम्प्रदायिक 
“दा विंची कोड” और “जो बोले सो निहाल” पर प्रतिबन्ध – धर्मनिरपेक्षता

कारगिल हमला – भाजपा सरकार की भूल
चीन का 1962 का हमला – नेहरू को एक धोखा

जातिगत आधार पर स्कूल-कालेजों में आरक्षण – सेक्यूलर
अल्पसंख्यक संस्थाओं में भी आरक्षण की भाजपा की मांग – साम्प्रदायिक 

सोहराबुद्दीन की फ़र्जी मुठभेड़ – भाजपा का सांप्रदायिक चेहरा
ख्वाजा यूनुस का महाराष्ट्र में फ़र्जी मुठभेड़ – पुलिसिया अत्याचार

गोधरा के बाद के गुजरात दंगे – मोदी का शर्मनाक कांड
मेरठ, मलियाना, मुम्बई, मालेगाँव आदि-आदि-आदि दंगे – एक प्रशासनिक विफ़लता

हिन्दुओं और हिन्दुत्व के बारे बातें करना – सांप्रदायिक
इस्लाम और मुसलमानों के बारे में बातें करना – सेक्यूलर

संसद पर हमला – भाजपा सरकार की कमजोरी
अफ़जल गुरु को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद फ़ाँसी न देना – मानवीयता 

भाजपा के इस्लाम के बारे में सवाल – सांप्रदायिकता
कांग्रेस के “राम” के बारे में सवाल – नौकरशाही की गलती

यदि कांग्रेस लोकसभा चुनाव जीती – सोनिया को जनता ने स्वीकारा
मोदी गुजरात में चुनाव जीते – फ़ासिस्टों की जीत

सोनिया मोदी को कहती हैं “मौत का सौदागर” – सेक्यूलरिज्म को बढ़ावा
जब मोदी अफ़जल गुरु के बारे में बोले – मुस्लिम विरोधी

क्या इससे बड़े विरोधाभास उत्पन्न किये जा सकते है ?

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Shwetank Tyagi

भारत में आतंकवाद करने के फायदे-

१.स्केच ऐसा बनेगा आपका की आप खुद ही अपनेको नहीं पहचान पाओगे..

२.अगर पकडे गए तो बिरयानी खाने को मिलेगी

३.हमारे गूंगे प्रधानमंत्री से अधिक मीडिया में दिखेंगे..!!

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In
1947
Hindu – 33 crore (94%)
Muslim – 3 crore (5%)
Others – 1 crore (1% )

In 2008:Hindu – 82 crore (75%) i.e.
growth rate in 61 years 249% @
4.07% per year
Muslim – 25 crore (23%) i.e.
growth rate in 61 years 833%
@13.7% per year
Others (Christians) – 3 crore (2%)

Situation in 2035 would be:

Muslim – 92.5 crore (46.8%)
Hindu – 90.2 crore (45.6 %) that
too if not a single convert to other
religion
Others – 7.6 crore (7.6% )

By 2040 ALL HNIDU FESTIVAL WILL
BE STOPPED
Situation in 2050 would be:
Muslim – 189.62 crore (64%)

INDIA WILL BE DECLARED ISLAMIC
COUNTRY

Hindu – 95.7 crore (32.3%)
Others -10.7 crore (3.6%)

It Doesnt include
Victims of Love Jehad.( Posted  on Facebook Wall )

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Simran Rock:मुस्लमान वन्दे मातरम न बोले तो ये उन का धार्मिक मामला है…..
नरेन्द्र मोदी टोपी ना पहने तो ये उन का सांप्रदायिक मामला है……

डेनमार्क में अगर कोई फोटो बन गयी तो उस का सर कलम ….
श्रीराम की जमीन पर अगर मंदिर बना तो हिन्दू बेशर्म. ….

गोधरा में जो ५६ हिन्दू पहले जले वो भेड़ बकरी…..
और उस बाद जो मुस्लिम मरे वो देश के सच्चे प्रहरी,,,,,

१५ साल पहले ही कश्मीर हो गयी हिन्दुओ  से खाली…..
देश की बढती मुस्लिम आबादी हमारी खुशहाली…….

पठानी सूत,, नमाजी टोपी में वो ख़ूबसूरत…
हम सिर्फ राम कह दे तो आतंक की मूरत

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PATRIOTISM OF INDIAN

MUSLIMS – A BALANCED
PERSPECTIVE1) India Muslims are so patriot
that they are worried about
Laden’s (who has declared jihad
against India) burial given by
American Government so much
so that the Muslim Newspaper of
India criticized America for it and
sent their stooge Digvijay Singh to
express their sentiments.

2) India Muslims are so patriot
that anybody who allows illegal
Bangladeshi Muslims in India they
will give their votes to them and
anybody who is against
Bangladeshi illegal immigrants
will lose their votes.

3) Anybody who supports Laden
and criticize Hindus is their
messiah like Digvijay Singh. 

4) Many Indian Muslims in

Mumbai are diehards supporters
of Dawood and Indian Mujaheddin.
Muslim ghettos or “Mini pakistan”
in Mumbai provide support to
them.

5) Indian Muslims are so patriot
that ATS of many states say that
they are not getting any support
from Indian Muslim community
and on contrary are facing
harassment from them by using
Human rights violation case
against them.

6) Indian Muslims call pakistanis
as Hum watan brothers and have
sympathies for pakistan.

7) When Pakistani terrorists
attacked Mumbai in 26/11 many
Indian Muslims leaders came with
theories that it is RSS, CIA,
MOSSAD black operations so that
their dear pakistan does not get
entangled in International Row.
Many Indian Muslim leaders
tried to force Indian Government
not to sign Nuclear Treaty with
America because their beloved
Islamic Nation Pakistan will get
weakened compared to India.

9) A Muslim Journalist himself
has revealed in his book BLACK
FRIDAY that it was Indian Muslim
Woman of Mumbai who provoked
DAWOOD to kill innocent Hindus.

10) Many Muslims Imams of UP
and Bihar openly say that they are
ISI agents.

Not every Indian Muslim is traitor
but to take Indian Muslims
Patriotism as granted is also
foolishness.

BEWARE!

by: Hindutva-Vasudhaiva Kutumbakam ********************

कहा मुसलमान खुश नहीं हैं! ??

वे गाजा में खुश नहीं हैं.
वे मिस्र में खुश नहीं हैं.
वे लीबिया में खुश नहीं हैं.
वे मोरक्को में खुश नहीं हैं.
वे ईरान में खुश नहीं हैं.
वे इराक में खुश नहीं हैं.
यमन में वे खुश नहीं हैं.
वे अफगानिस्तान में खुश नहीं हैं.
वे पाकिस्तान में खुश नहीं हैं.
वे सीरिया में खुश नहीं हैं.
वे लेबनान में खुश नहीं हैं.
……………………….. तो, जहां वे खुश हैं?

वे इंग्लैंड में खुश हैं.
वे फ्रांस में खुश हैं.
वे इटली में खुश हैं.
वे जर्मनी में खुश हैं.
वे स्वीडन में खुश हैं.
वे संयुक्त राज्य अमेरिका में खुश हैं.
वे नॉर्वे में खुश हैं.
वे हर देश है जो मुस्लिम नहीं है उसमें खुश हैं.

………………………………….. और वे किसे दोष नहीं है?

इस्लाम नहीं.
उनके नेतृत्व नहीं.
खुद को नहीं.

………… वे देशों जिसमे खुश हैं वे उसे दोष देते है

बहुत खूब और इतना सच

विरासत में मिली कट्टरता

विरासत में मिली कट्टरता

Pics Credit:Pic One


कब तक कसाब और अफज़ल पुलाव बिरयानी खायेंगे हमारे पैसो की?

गोधरा का सच एक झूठ है!

गोधरा का सच एक झूठ है!

ये  अक्सर खल जाता है कि बहुत सुलझे हुए लोग भी  जब शिष्टतावश गलत को खुल के गलत नहीं कह पाते. तब या तो वो चुप्पी साध लेते है या फिर एक चतुर सा वाक्य बोल कर मामले को घुमा देते है. ऐसे तो कोई  सुधार  होने से रहा. अगर हम खुल के गलत को गलत भी ना कह पाए तो कोई कैसे ये सोच सकता है कि वक्त पड़ने पर आप कोई मजबूत कदम उठा लेंगे? चलिए सब क्रान्तिकारी नहीं हो सकते. सब भगत सिंह के चेले नहीं बन सकते गृहस्थ आश्रम की बाध्यता के कारण पर ये कहा कि अक्लमंदी है कि आप गलत का मुखर होके विरोध भी ना दर्ज करा सके साफ़ स्पष्ट शब्दों में.

 अक्लमंदी ये भी नहीं कि हम सब सांप जहरीले नहीं होते तो लगे आस्तीन के सांप पालने!  जहरीलें सांपो को दूध पिलाना ये कौन सी नीति है भाई ? क्या जहरीलें सांपो को दूध पिलाने से वो पालतू हो जायेंगे या काटना छोड़ देंगे ? सब सांप जहरीलें  नहीं होते तो हम जहरीलें  सांपो को गले में लटका के घूमे भोले बाबा की तरह? मतलब आम जनता गाज़र मूली की तरह कटे और कसाब और अफज़ल हमारे ही पैसे पे मौज करे? क्या सन्देश आप दे रहे है भाई ? नतीजा यही होगा कि भीड़ अपने हिसाब से न्याय करेगी और फिर गेहू के साथ घुन भी पिस जायेंगे. उस वक्त  रेसनैलिटी की दुहाई लोग  मत ही दे .आज अन्ना हजारे या बाबा रामदेव के मांगो को ये कहकर खारिज किया जा रहा है कि ये संवैधानिक  प्रावधानों के विपरीत है. मै पूछना ये चाहता हू सत्ताधीशो से कि उन्होंने ऐसा आचरण ही क्यों किया कि संविधान के भीतर से रहकर काम करने वाली व्यवस्था से लोगो का विश्वास ही उठ गया? अब क्यों लगता है लोगो को कि संविधान से इतर व्यवस्था ही न्याय दिला पाएगी? अब बताईये केंद्र के सब बड़े मंत्री भ्रष्टाचार में लिप्त है पर वे कुछ दिनों के लिए जेल में जाकर मौज पानी लेकर बाहर निकल आते है. कई प्रदेशो के “मायावी मुख्यमंत्री सत्ता की  माया में लिप्त  होकर हर तरह का कुकर्म कर रहे है पर सब खामोश है कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे? वोही पे एक मामूली से कर्मचारी जो कुछ रकमों कि हेरफेर के खातिर पकड़ लिया गया उसके पीछे पूरी सरकारी मशीनरी हाथ धोके पीछे पड़ जायेगी जैसे इस वक्त रामदेव के पीछे केंद्र सरकार पड़ी है. लो बेटा तुम हमारी पोल खोलने चले थें अब हम तुम्हारा बैंड बजा देंगे क्योकि हम सत्तासीन है.
 
इस वक्त कुछ सिरफिरे लोग हिन्दू आतंकवाद के नाम से “शैडो बाक्सिंग” कर रहे है ? काहे?  इसीलिए कि एक तो असली तस्वीर छिप जायेगी और फिर सत्ता के मद में अंधे लोग अल्पसंख्यको के पास जाकर वोट मांग सके. इसीलिए बाहरी बड़े लोगो से हम हिन्दू आतंकवाद पर चर्चा तो करते है पर इस्लामी आतंकवाद के बढ़ते कदमो पर मौन साध लेते है. उसी अमेरिका से हम हिन्दू आतंकवाद की चर्चा करते है जिसने इस्लामोफोबिया के जड़ में जाकर अपने देश में हर वो कानून लागू किया जो उसे इस्लामी आतंक से मुक्ति दिला सके. अपने दुश्मनों को घुस के मारा चाहे वो कही भी छुपे हो. हम केवल हिन्दू आतंकवाद का झुनझुना बजा रहे है और कसाब और अफज़ल को बिरयानी पुलाव खिला रहे है जेल में!  हमारे यहाँ के बुद्धिजीवी तो बस ये साबित करने तुले है कि अगर कुछ है तो हिन्दू आतंकवाद बाकी सब इस्लामोफोबिया है!  अरे भाई  इस्लामोफोबिया का उदय क्यों हुआ इस पर सोचिये बजाय इसके कि लोग इस्लामोफोबिया से ग्रस्त क्यों है अगर इस्लामोफोबिया जैसी चीज़ वाकई में कुछ है तो!  इस फोबिया के आधार में कोई इलूसनरी कारण नहीं बल्कि कटु सच्चाई है. जरुरत है इन कारणों की ईमानदारी से अवलोकन करने की और हो सके तो दूर करने की कठोर कदमो से  बजाय सच्चाई से मुह मोड़ने की. ये वक्त “पोलेटकली करेक्ट साउंड” होने का नहीं कठोर कदमो का है एक वास्तविक समीक्षा के साथ. जो इस्लामोफोबिया से बचने की दुहाई देते है वो भूल जाते है कि अमेरिका या मुंबई या विश्व के हर कोने में हो रहे हमले एक सच्चाई है कोई सपना नहीं.

 

 आप देखिये कि आतंकवाद निरोधक  कानून सख्त करने के बजाय और ढीला कर दिया गया. पोटा लागु होने के बाद लोगो ने शोर मचाना कर दिया गया कि भाई  बड़ा दुरूपयोग हो रहा है. मामला फिर टाय टाय फिस्स हो गया और पोटा  पिट  गया मतलब हटा लिया गया. अब भाई लोग मतलब कानूनविद एक बार फिर सठिया गए है. अब फिर कह रहे है कि सख्त कानून की सख्त  जरुरत है अगर हमे आतंक का जड़ से सफाया करना है तो.  तो यही नौटंकी हमारे यहाँ होती है. ढंग का काम इस देश में कतई नहीं हो सकता. एक आधार प्रोजेक्ट बना है. बड़ा प्रचार हो रहा है कि एक जादुई नंबर मिलेगा पर भाईलोग ये बताने को तैयार नहीं कि जिस देश में डाटा थेफ्ट इतना आसान है उस देश में किसी के ख़ास डीटेल्स लीक नहीं होंगे और उनका दुरुपयोग नहीं होगा.लेकिन इससें  आपको क्या आपको जादुई नंबर मिल रहा है कि नहीं. नंबर लो और खुश हो जाओ बस.  ज्यादा भेजा फ्राय मत करो ये कहना है माई बाप मतलब सरकार का. 

लेकिन हमारे यहाँ उलटी गंगा बहती है.  नेशनल एडवायजरी काउंसिल नाम कि एक विचित्र संस्था है.  इसने एक विधेयक का मसौदा का मसौदा तैयार किया है जिसका सार ये है कि  दंगे हमेशा बहुसंख्यक फैलाते है और पीड़ित पक्ष केवल अल्पसंख्यक होता है.  अब अगर वोट बैंक सॉलिड रखना है तो ऐसा विधेयक आ जाए  कोई आश्चर्य नहीं. मतलब गुजरात में गोधरा करने वाले ने जो किया वो कुछ नहीं था बस केवल जरा सा गरबा नृत्य था. हां जो दंगे हुए गुजरात में  वो वीभत्स थे अपनी सेकुलर देशी विदेशी मीडिया और सरकार दोनों के लिए लेकिन गोधरा नहीं. ऐसा मै नहीं ये विधेयक कहता है. अब तीस्ता  सीतलवाड़ जिन्होंने इस मसौदे को तैयार  किया है जैसो से क्या उम्मीद रख सकते है. ये जनाब जाहिर शेख  झूठी गवाही के मामले में सुप्रीम कोर्ट के द्वारा जम के  लताडी जा चुकी है और दोषी करार दी चुकी है. आश्चर्य मुझे ये सोचकर होते है कि ऐसे  संदिग्ध लोग एक महत्त्वपूर्ण संस्था में कैसे शामिल हो सकते है ? क्यों नहीं हो सकता. बिनायक सेन जब प्लानिंग कमीशन में हो सकते है तो तीस्ता क्यों नहीं? अब क्या कहें ? जब दरिन्दे  हिफाज़त करने लगे तो मासूमो  को तो मरना ही है ना!  सच है इस देश को भगवान् ही चला रहे है या सिर्फ भगवान् ही चला सकते है.

मौज कसाब और अफज़ल ही उठाते है और पल पल मरता है आम आदमी

मौज कसाब और अफज़ल ही उठाते है और पल पल मरता है आम आदमी

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