Category Archives: Poets

वैलेंटाइन डे: लो आया मौसम प्यार के बिक्री का!

क्या प्रेम आज भी इतना ही मासूम है इस फूल की तरह?

क्या प्रेम आज भी इतना ही मासूम है इस फूल की तरह?

कल तथाकथित प्यार करने वालो का परम पुनीत दिवस है। कुछ कहने की जरूरत नहीं है कि फर्जी इमोशंस के साथ बहुत सारे गुलाबो का आदान प्रदान होगा। गुलाब का तो पता नहीं पर वो अगर समझदार लड़की होगी तो उसका काम तो लह गया क्योकि गुलाब तो मुरझा जायेंगे, चाकलेट उदर में समा जायेंगे लेकिन गिफ्ट हो सकता है अगले साल भी किसी और को देने में काम आ सकते है। क्योकि एक साल में बहुत से इस साल वैलेंटाइन डे मनाने वालो लड़कियों के बॉयफ्रेंड इनके द्वारा ऐक्स्ड (axed ) कर देने के कारण एक्स-बॉयफ्रेंड हो जाते है। एक्स- गर्लफ्रेंड भी अस्तित्व में आ जाती है। खैर ये सब पुराने प्रेमी नहीं कि जाके किसी सॉलिड रॉक के ऊपर कोई दुखांत सा गीत गाये। इतने संवेदनशील नहीं कि शोक मनाये। कुछ एक जो थोड़े दुखी होंगे वो जरूर सॉलिड रॉक कुक्कुर धुन में रचे गीत जैसे” जो भी मै कहना चाहू बर्बाद करे अल्फाज़ मेरे को गाने या सुनने के बाद “तू नहीं सही कोई और सही” को चरितार्थ करते हुएँ किसी नए के दामन से लिपट जायेंगें। अब कितने सारे आप्शन माने विकल्प  “जोड़ी ब्रेकर” के रूप में भटक रह होते है। वो तो पुराने प्रेमी थे जो बेचारे कितने साल महीने आंसू टपकाते थें प्यार की आग में तन बदन जल गया” गाते थें। अब तो आप इतने व्यापक विकल्पों वाले है कि मौका मिले तो “मेरे ब्रदर की दुल्हन” भी आपकी हो सकती है।

बाज़ार में देख रहा हूँ कि भोजपुरी गीतों के रोमांटिक एल्बम भी बहुत सारे आ गए है जिसके ऊपर “लभ” वाले चिन्ह बने हुएं है। मतलब प्यार का व्यापार ग्रामीण संस्कृति में गहनता से व्याप्त हो गया है। अहसास तो यही होता है। वर्ना ये अजंता-एलोरा की आधुनिक संस्करण तो भोजपुरी वाले “लभ” में इंटरेस्ट दिखाने से  रही। जितनी तेज़ी से भारत ग्लोबल हुआ उतनी तेज़ी से लव का ग्राफ भी बढ़ा ये तय है। दोनों में समानुपाती रिश्ता सा लगता है। खैर एक चीज़ ये है कि इंडिया ने अब इतनी फ्रीडम जरूर दी है कि अगर इतने सारे आप्शनस लॉन्ग टर्म, शार्ट टर्म, लिव-इन के बावजूद भी आप अगर अकेले रह गए तो आप अपने सेक्स के साथ भी लव कर सकते है। इससे आप का कॉन्फिडेंस लेवल तो बढेगा ही और साथ में आप सब पे धौंस जमा सकते है प्रोग्रेसिव बन कर। कम से कम लोगो को अपने अनुभव से उत्पन्न प्रोग्रेसिव लेक्चर तो झाड़ ही सकते है। थोडा अच्छा लिख लेते हो तो क्या पता आप एक दो नोवेल भी लिख दे और पुरस्कार वगैरह मिल गया, जो ऐसे थीम पे अन्तराष्ट्रीय या राष्ट्रीय जगत में कुछ न कुछ मिलना तय ही है, तो युवा वर्ग की नब्ज़ पकड़ने वाले तमगो सहित आप की लेखक के रूप में उभार तय है। 

वैलेंटाइन डे के ठीक एक दिन के बाद भट्ट कैम्प की मर्डर थ्री रिलीज़ हो रही है। ये सीरिज मैंने नहीं देखी है और ना मै चाहता हूँ कि इस सीरिज की कोई फ़िल्म देखने का सौभाग्य कभी भविष्य में बने लेकिन इस नयी फ़िल्म के पोस्टर में लिखी पंच लाइन आज के लव की हकीकत बयान कर देती है। लिखा है कि आप अपने प्रेमी को कितना जानते है? मतलब साफ़ है कि अगर आप सचेत नहीं है तो लव के बाद धोखा अवश्य है। वैसे अच्छा है वैलेंटाइन डे के ठीक एक दिन के बाद ही बहुत सारे नए नए प्रेमी भूतपूर्व प्रेमी हो जायेंगे। एक्सपीरियंस बढेगा युवाओं का। कैसी संस्कृति है कि वफ़ा की सोच भी रखना जुर्म से कम नहीं। सब में मिलावट, सब में खोट है चाइनीज़ माल की तरह। कब फुस्स हो जाए पता नहीं। एक युग था कि सरल और सीधा होना सम्मानजनक था। आज आप के नाकाबिलियत का परिचायक है। आप के विरुद्ध निकम्मेपन का तमगा है। शातिर दिमाग होना ही बुद्धिमानी बन गया है। खैर ये लव करने वाले प्रेमी उगते रहे, पनपते रहे। लेकिन चूँकि गाँव में “लभ” पाँव पसार चूका है इसलिए सरकार को जैसे शहर में लव के डाक्टर माने साइकोलोजिस्टस है जो प्यार के साइड इफेक्ट्स डिप्रेशन या टीनेज प्रेगनेंसी के केसेस को देखते है ऐसे कुछ डाक्टरों को ग्रामीण क्षेत्रो में नियुक्त किये जाए। ताकि कम से कम प्रेम के बाद जो शॉक्स झेंले पड़े उनका निदान वैज्ञानिक तरीके से हो। खैर मेरी तरफ से सब प्रेमी जनों को शुभकामनायें। 

मेरे अन्दर तो साहिर की यही पंक्तियाँ उभर रही है:

हर चीज़ ज़माने की जहाँ पर थी वहीं है,
एक तू ही नहीं है

नज़रें भी वही और नज़ारे भी वही हैं
ख़ामोश फ़ज़ाओं के इशारे भी वही हैं
कहने को तो सब कुछ है, मगर कुछ भी नहीं है

हर अश्क में खोई हुई ख़ुशियों की झलक है
हर साँस में बीती हुई घड़ियों की कसक है
तू चाहे कहीं भी हो, तेरा दर्द यहीं है

हसरत नहीं, अरमान नहीं, आस नहीं है
यादों के सिवा कुछ भी मेरे पास नहीं है
यादें भी रहें या न रहें किसको यक़ीं है

 

प्रेम का एक एक स्वरूप ये भी है!

प्रेम का एक स्वरूप ये भी है!


Reference:

Kavita Kosh

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भारतीय गणतंत्र: गुंडों और अय्याशो पे टिका एक भीड़तंत्र

कवि सुदामा पाण्डेय 'धूमिल': यहां, सिर्फ, वह आदमी, देश के करीब है जो या तो मूर्ख है....या फिर गरीब है"

कवि सुदामा पाण्डेय ‘धूमिल’: यहां, सिर्फ, वह आदमी, देश के करीब है जो या तो मूर्ख है….या फिर गरीब है”


कहते तो है कि भारतीय गणतंत्र बड़ी उम्मीदें जगाता है विश्व के उन कोनो में जहाँ और सरकारें तमाम तरीको के विरोधाभासों में लिपटी हुई है। उनके लिए भारत में गणतंत्र का लोप एक खतरे के घंटी से कम नहीं है। खासकर जब चीन से तुलना की जाती है तो ये जरूर दर्शा दिया जाता है कि वह पे कितनी दमनकारी व्यवस्था है जहा लोगो पे जुर्म तो होते है, लोगो को  सताया तो जाता है लेकिन सेंसरशिप की वजह से कुछ सामने नहीं आ पाता। पडोसी मुल्क पाकिस्तान में फैली अराजकता को देखे जो वैश्विक आतंकवाद का पालन पोषण करने वाला है तो अपना देश किसी स्वर्ग से कम नहीं लगता। तो क्या परिस्थितयां वाकई इस देश में इतनी सुधरी है? लगता तो नहीं है अगर हम सूक्ष्म निगाहों से देखे तो।

इसकी एक वजह ये है कि इस देश में सरकार जरूर आम लोगो के दम से बनती है लेकिन उसका आम लोगो के दुःख दर्द से इसका कोई सरोकार नहीं। एक दिखावटी लगाव जरूर है लेकिन वह मूलतः अपने को सत्ता में बनाये रखने भर का जुगाड़ भर है बस। ये कैसी बिडम्बना है कि जिस सरकार ने गरीबी हटाओ का लक्ष्य दिया उसी ने इमरजेंसी भी थोपी इस देश में। सारी संवैधानिक संस्थाओ को जानबूझकर कमजोर किया गया। ये उस सरकार के द्वारा किया गया जिसके नुमाइन्दे आज लोगो के सुरक्षा का दम भरते है। हमारी भोली जनता जनार्दन फटी शर्ट में हाथ में मोबाईल लिए ये समझती है कि हम किसी सुनहरी दुनिया में प्रवेश करने वाले है भविष्य में। इस मृग मरीचिका में भारत वासी उलझे हुए है। क्रिकेट, लौंडिया, बेतहाशा पैसा कमाने का जूनून किसी भी कीमत पर ये हमारे देश के नेशनल पैशन है। लोगो को की इस बात से परवाह नहीं है कि उनकी चमचमाती गाड़ी गाली गलौज, खुले मैनहोल और गड्ढो में सड़क पर चल रही है बढ़ी हुई पेट्रोल के कीमतों के साथ ही बढती रफ़्तार के साथ।

मार्कंडेय काटजू, भूतपूर्व सुप्रीम कोर्ट जज, लोगो को मूढ़ तो मानते है लेकिन ये जरूर दर्शा देते है कि साहब इस देश में असल शासन तो सिर्फ आम जनता का ही है। उनके हिसाब से यहाँ राजशाही नहीं प्रजातन्त्र है जहा हर अधिकारी जिसमे नेता और जज भी शामिल है आम आदमी का गुलाम भर है। ये नौकर है और आम आदमी उनका “मास्टर” है। जैसे  काटजू साहब लोगो की क्षुद्र मानसिकता पर सवाल उठाते है उसी तरह मुझे भी समझ में नहीं आता कि इनके इतने हसीन इंटरप्रिटेशन को, इतने सिम्प्लिस्टिक अप्प्रोच को किस निगाहों से देखा जाए जहा पे किसी ख़ास पार्टी के गुंडे  इसलिए पुलिस अधिकारी को अपनी जीप के पीछे लखनऊ के सडको पर घसीटते हुए ले गए थें कि उसने प्रतिरोध किया था उनके गलत तरीको का। या कोई अदना सा पुलिस का कांस्टेबल भी किसी प्रोफेसर को सडको पर माँ बहन की गालिया दे सकता है जरा सी बात पर। तो आम आदमी को क्या इज्ज़त मिलती होगी सरकारी चमचो से ये सहज ही सोचा जा सकता है। आप भी सोचे कि हमारा गणतंत्र कितना वास्तविक है जो मेरी नज़रो में अय्याशो और गुंडों पे टिका भीड़तंत्र है । धूमिल की ये पंक्तिया आज भी बहुत सटीक बैठती है:

“हर तरफ धुआं है
हर तरफ कुहासा है
जो दांतों और दलदलों का दलाल है
वही देशभक्त है

अंधकार में सुरक्षित होने का नाम है-
तटस्थता। यहां
कायरता के चेहरे पर
सबसे ज्यादा रक्त है।
जिसके पास थाली है
हर भूखा आदमी
उसके लिए, सबसे भद्दी
गाली है

हर तरफ कुआं है
हर तरफ खाईं है
यहां, सिर्फ, वह आदमी, देश के करीब है
जो या तो मूर्ख है
या फिर गरीब है”

 

जस्टिस काटजू: आम आदमी मास्टर है और सरकारी अफसर/नेता उसके ग़ुलाम है प्रजातंत्र/गणतंत्र में। कितना सही है वो वास्तविक धरातल पर?

जस्टिस काटजू: आम आदमी मास्टर है और सरकारी अफसर/नेता उसके ग़ुलाम है प्रजातंत्र/गणतंत्र में। कितना सही है वो वास्तविक धरातल पर?


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Death Is More Honest Than Life!

In  Conversation With Life And Death

In Conversation With Life And Death

I met lots of people in this short life, who preached me in pompous tone that ego is bad, money is filth, ladies are evil and etc. That I have had heard umpteen times since childhood, and, interestingly, I came to live a more realistic and down-to-earth life than those who talked about such values publicly in glittering company of like minded souls! I found people, talking about life devoid of ego, the most egocentric souls, chasing name and fame with greater passion than anyone else. I met shrewdness disguised as faithfulness. Friend or beloved, they turned out to be more like poison placed in silver cup.  

And still, having seen such worst contradictions, I feel life is a beautiful affair. Life’s canvas still motivates me to live life fully. May be life has some more cruel lessons to offer me! But I am now no more interested in life’s equations similar to one which we notice on chessboard-you win I lose types. In fact, its cruel maneuvers never appealed to my sense instinctively. Precisely, that’s why I have never been passionate admirer of life’s idiotic episodes. My philosophy, until now, has been to deal sincerely with whatever came to cross my path. For me, the very fact that you have arrived in this world of human beings is a big mistake- a divine joke. May be for a greater lot, these changing facets of life turn out to be as important as a life and death issue, but in my eyes, the life mired in deceptiveness at its every turn, does not evoke great concern. I find even the most beautiful episodes of life, have their genesis in some sort of deception. So as I suffer pain, when I come to hear about loss of loved ones, or when I anticipate a blissful episode, the nothingness of life keeps me in state of peace.     

Sometimes back I read  powerful arguments in favour of death. And one of them stated that death is very much needed since if you continued living, you would realize that people who lived around you as picture of faithfulness were nothing but beings mired in selfishness! Death arrives to retain your illusion. It does you a great favour by keeping your faith intact in flawed people. I am sure had life allowed a legitimate route to embrace death all by oneself, I am sure many would have adopted that path. India’s great revolutionary Bhagat Singh had made a remarkable comment- hanged to death by the British Government in the pre-Independence era- that had he been living, life would have heaped upon him some more chosen scandals. So he is so happy that death has embraced him in the prime of his youth; that death kept his so many vices secret. That’s why he was more happy than sad when hanged to death order was delivered to him. In my eyes, he was the ideal example of these words: “Those whom the gods love die young.”

 
It’s pathetic that laws of this nation-may be elsewhere too-are strange. They treat suicide a crime. However, the same lawmakers, being devoid of accountability, fail to ensure that people who abetted suicide of innocent person should not go scot-free. The policymakers take no measures to keep away those scenarios, which compel anybody to think about killing oneself. Paradoxically, aiding and abetting suicide, becomes a cause of concern only when someone brings the issue in the court. It’s easy to understand that why it’s never the case. The case in court drags for years and in the end we find the accused denied punishment in want of concrete evidences. So it’s really amusing, and tragic as well, that society first promotes crime and then the same society delivers verdicts. Isn’t that height of absurdity? 

Anyway, the pretenders, who unfortunately claim to be my close friends- the ones who are guilty of complicating my simple life, dare to ask me as to why I am not a public figure, why I am not that involved in life’s silly episodes the way they are? Interestingly,  they are like the conspirators, standing by your side as a mute spectator, just like you, witnessing the tragedy given birth by them. Since they often dare to ask me such a question with straight face, I need to quote these lines by well known poet Sahir Ludhianvi  as a reply to these curious souls-the conspirators:

“क्या मिलिए ऐसे लोगो से जिनकी फ़ितरत छुपी रहे,
 नकली चेहरा सामने आये असली सूरत छुपी रही
 खुद से भी जो खुद को छुपाये क्या उनसे पहचान करे,
  क्या उनके दामन से लिपटे क्या उनका अरमान करे,
  जिनकी आधी नीयत उभरे आधी नीयत छुपी रहे।”   

“Is there any point in meeting with people, having dubious intentions?
  Who project their unreal image, but keep the real one hidden
  People, who have kept secret from themselves, too, their own real image
  Why should I embrace them, and seek them ?
  People who half disclose their intentions, keeping close to their hearts the actual intentions.” 

Another brilliant poet, Nida Fazli, has exposed the real elements, which constitute the so-called beautiful episodes of life. These verses in my eyes reveal the reality of life. For a simple person like me, I don’t think that such a cruel world can ever elicit deep attention on my part. It’s another thing that for people of the world, I might look like living, but internally I am on par with dead.

“हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी,
               फिर भी तनहाइयों का शिकार आदमी,

                सुबह से शाम तक बोझ ढ़ोता हुआ,
                 अपनी लाश का खुद मज़ार आदमी,

                 हर तरफ भागते दौड़ते रास्ते,
                 हर तरफ आदमी का शिकार आदमी,

                रोज़ जीता हुआ रोज़ मरता हुआ,
                हर नए दिन नया इंतज़ार आदमी,

                 जिन्दगी का मुक्कदर सफ़र दर सफ़र,
                   आखिरी साँस तक बेकरार आदमी”                    

“Everywhere there is sea of people 
   Yet a person suffers from isolation
  
   Carrying the burdens from morning till evening 
   Human being has become some sort of moving tomb

   Everywhere you find busy roads
   Wherein one person becomes victim of other person

    Every day a person wakes up only to die a bit more
    And still greets each day with great expectations

    The destiny of human life from its one episode to another
    Is to remain anxious till last breath.”

P.S.: Translation Of The Verses Done By The Author Of This Post.

Life and Death Are Always Inseparable

Life and Death Are Always Inseparable

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Songs For Beloved Moon Embracing Clouds: Hiding, Smiling And Crying

Moon And Romance! It's Commonplace  :P

Moon And Romance! It’s Commonplace 😛


Well, for past few days, I was bit taken aback by some sad developments. I wanted to finish the English version of one of my well read posts in Hindi. However, lack of concentration on my part was delaying it. By dint of  fortune, I came to participate in conversation on a prominent Radio Forum, Shrota Biradari,dominated by oldies, which was involved in making of document related with Hindi movie songs based on moon. Moon has always appealed to my senses. I am a night watcher since childhood and to gaze at stars and moon has been my favourite past time. Even now in my village, when I am all alone, surrounded by nothing but stillness of night, penetrated by chirping of cricket etc., I sit hours in open to gaze at the moon. Neil Armstrong had to visit moon to end up as philosophical human being but my passion for moon is deep enough that it does not require a trip to moon to admire its beauty.

Anyway, the forum involved in preparation of songs missed  some of my favourite songs. I wanted to add these songs to the document but I thought let’s share the same songs for readers and friends, having taste for refined music, narrating my own personal connection with the songs. Don’t forget that popular numbers already got included in that document and these are the ones which are close to my heart, but, sadly, these did not appear in that document. The silver hairs got trapped in age which produced gems like “O  Raat Ke Musafir” (Miss Mary),  “NaYe Chand Hoga” ( Shart) and “Ye Raat Ye Chandni Phir Kaha( Jaal), to name a few. So let me include some of the songs they failed to take note of.

“I’ve tried the new moon tilted in the air
Above a hazy tree-and-farmhouse cluster
As you might try a jewel in your hair.
I’ve tried it fine with little breadth of luster,
Alone, or in one ornament combining
With one first-water start almost shining.

I put it shining anywhere I please.
By walking slowly on some evening later,
I’ve pulled it from a crate of crooked trees,
And brought it over glossy water, greater,
And dropped it in, and seen the image wallow,
The color run, all sorts of wonder follow.”

( The Freedom of the Moon by Robert Frost)

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1. Badalo Me Chup Raha Hai Chaand Kyo

That’s a charming song from movie directed by Mahesh Bhatt’s “Phir Teri Kahani Yaad Aayi”. The best thing about Mahesh Bhatt  is that no matter what’s the theme of his movies, he gives brilliant songs. The camera angles employed in his songs make the songs look so terrific. Just  remember “Tumhe apana banane ki kasam khayi hai” from Sadak – a well picturized song which depicts the state of mind of woman trapped in world of prostitution, trying to come to terms with new-found freedom. Anyway, this song is also well shot. And like always, the movie involves doomed romance. For me, the songs brings back the memories of  90s and this movie’s almost all the numbers were simply too good. Lyricist Qateel Shifai and musician Annu Malik did a wonderful  job. Interestingly, as a student, I had limited access to money, and thus, buying cassettes always meant sacrificing the last few notes found in my pocket. So I had to doubly assure whether or not all the songs were melodious in cassette. That meant taking “panga” (starting a fight) with the shopkeepers as they were often reluctant to make you listen all the numbers in bits and pieces. Anyway, these type of cassettes did full justice to few bucks (paisa vasool) which I managed to save those days.

2. Dhanno Ki  Ankhon Mein Raat  Ka  Surma 

Amazing song!  No wonder R D Burman is hailed as a true genius. Look at the sound employed in the travel song with folk touch. Talking of this sound effect, he told to Gulzar that when he first played this instrument, flanger, it produced a very harsh noise. The people around him were bit skeptical about its effect in ensuring melody. It was not so easy to make use of it. But watch this superbly picturized train song and you would realize that  how well R D Burman  used this instrument to create rhythm effect produced by train as it travelled through the valley. Hey, the song talks about Dhanno but this Dhanno is totally different from Basanti’s Dhanno! Like always imagery employed by Gulzar mesmerizes us. The song is visual delight as well. Never before train song produced such a romantic appeal. Above all, it’s “Chand Ka Chumma” (Moon’s Kiss) which kills us!

3. Chaand Chura Ke Laya Hoon

Again R D Burman and Gulzar come together to produce this great number. I like the song because the moment it refers to stealing of moon and love birds spending time behind some building like church, it brings into my mind the great buildings of British period. Although, this song does not feature Church but images of majestic buildings from previous eras appear before the eyes. By the way, tell me how many times have you seen Church being used as a spot to promote romance? But anything was possible if two souls, always out of their minds, Gulzar and R D Burman sat together to compose songs. These two always hailed themselves as crazy souls. Oh yes, crazy souls alone made some sense in world turned into hell by intelligent souls!

4. Khoobsurat Hai Wo Itna 

This song from movie “Rog” has two versions. One is sung by M M Kreem, the music director who composed this song. Another  one is sung by Udit Narayan. However, Kreem’s version is  close to my heart. I need to say few words about Kreem. This techie music composer, hugely underrated in Bollywood, is one of the few music composers, who know how to really compose a song using modern instruments, without copying anything from Western world, in name of inspiration. These are some of the hard working musicians who have kept the dignity of Bollywood music world intact. How sad, people talk about A  R Rahman but they fail to take note of gems composed by such lesser heard names. I came to hear him first in my college days, when out of curiosity, I came to buy this cassette, seeing new names on the flap of the cassette as unheard names always fascinated me. Now lend ears to  this moving number, which talks about pangs of falling in love with beloved belonging to someone else legally! That’s why the song says ” moon is dotted with rough spots yet one cannot resist its beauty”!

For movie version to notice the picturization one can visit this link.

5. Mera Chand Mujhe Aaaya Hai Nazar

The tragedy with Bollywood is that if movie bombs at the box office, the songs also fail to create impact. I am sure very few movie lovers would have heard the name of this movie released in the middle of the 90s. Mercifully, Jatin Lalit was at its peak in those days. This innovative duo managed to give some beautiful numbers, which managed to find the ears despite movie doing average business. Since this movie is by-product of Bhatt Camp, rest assured that song must be aesthetically shot! I love this song because it takes me to college days, wherein I realized that moon in youth leaves the sky and gets placed in some beautiful face!

6. Chamakte Chand Ko Toota Hua Tara Bana Daala 

Whenever Ghulam Ali came to sing for Indian movies, the song turned out to be defining moment in world of Indian movie music. Be it “Dil Ye Pagal Dil” or ” Chupke Chupke Raat Din”, the songs always managed to stay in the hearts and minds for forever. So it  was not unexpected that this song became representative song for broken dreams. What stunning lines the verses have! Just listen  to it and you would be bound to play it for more time. Anu Malik was not very popular in those days, but with such movies, he managed to build a position for himself. The  bold sequences in the this song have the stamp of Mahesh Bhatt’s vision!

7. Mere Roothe Hue Balma

This song is departure from the songs I have mentioned in  this post. It’s from a classic produced in 1950 “Bawre Nain”, featuring Raj Kapoor and Geetabali. The song would let you know that how simple and innocent gesture have given way to nothing left for imagination gestures of Sunny Leone. Anyway, this song has remarkable innocent gestures of Geetabali, who is trying to please  her moon. I am happy that silver hairs failed to mention this good number, dedicated to moon, sung by Rajkumari, and allowed me to talk about this song..ha..ha..ha. This beautiful singer sang few songs but these few songs have become unforgettable numbers.

8. Chanda Dekhe Chanda To Chanda Sharmaayein

This song has a very pleasant tune and some excellent from verses from Maya Govind- a very talented female lyricist from Lucknow.  How often we notice female lyricist in Bollywood or elsewhere? My friend Sagar Nahar, who is prominent song collector  from Hyderabad, very rightly points out that this Bappi  Lahiri’s composition sounds very similar to S D Burman’s composition in Abhiman ” Tere Mere Milan Ki  Raina”. Interestingly,  both the  movies Jhoothi and Abhiman were directed by  Hrishikesh Mukherjee. And, above all, it’s picturized on stunningly beautiful Rekha!  What else can eyes crave for!

For Rekha lovers, here is a clearer video, but unfortunately, the song is incomplete.

9. Kolaveri Di  

Well, I need not to say anything about this song. I have already written a post on it, which you can read here. I have to mention this song for one more time because first it belongs to current period, making you all know the changes that have hit the Indian film music, and secondly,  it talks about moon in hilarious way. A song meant for heart broken guys but the approach involved is refreshingly unique. Anyway, for me, it means a greater involvement with moon instead of nurturing hatred for distance moon.

References: 

Dealing With A Breakup In Love Relationship Kolaveri Di Way

Rajkumari Dubey

M. M Kreem

Maya Govind

Pics Credit:

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Shri Radha: Paragon Of Love And Virtue

Sri Radha: The Supreme Teacher

Sri Radha: The Supreme Teacher

(Today we are celebrating the birthday of Shri Radhaji. I am posting this article, an ode to female power, to mark the occasion. The article has been previously published in Northern India Patrika, 2001; Soham, bilingual International magazine, 2005; British edition of Indowaves)   

Radha holds a special place in the hearts of Radha-Krishna devotees. Krishna without Radha can never be meditated upon, and that explains why Janmashtmi is incomplete without Radhashtmi’s celebrations in full fervour. On this day devotees plunge into a state of euphoria in Vraja where it is celebrated with grandeur. Radharani, daughter of Brishabhanu and Kalawati, was born in Barsaane fifteen days after Krishna’s birth in Mathura. Radha being hladinishakti’ (the power of bliss) of Shri Krishna always remains in unison with him. Radhashtmi, her appearance day, is viewed by the devotees as a day that leads an aspirant on to the path of bhakti and bliss—a step closer towards absolute merging of the lover in the beloved. Radha’s grace alone provide as supreme Bhakti  (devotion)  and it is she who makes a seeker’s  union with Krishna a reality.

According to Padma Purana, Gopis (cow-herd girls) were Rishis of Dandakarnya who had expressed their desire to be in intimate service of Lord Rama. Lord Rama had then told them to wait till his next incarnation as Krishna takes place in Dvapar age. Upanishads, too, appeared in the form of Gopis to participate in Leelas (divine gestures) of Krishna. Gopis who embraced the lotus feet of Lord Krishna have been classified into several categories due to difference in attitude and service. Some are sadhna –oriented i.e. they have attained Gopi bhava because of austerities performed in their earlier births whereas some are in service of Krishna from beginning (Nitya-priya). It is said that a jeeva( worldly soul)  attains Gopi bhava through intense tapas. Radha, Chandraravali Visakha, Lalita, Shyama and Padma were prominent Gopis. Shri Radharani is of Mahabhava Swaroopa and, therefore, she stands apart from others as the Chief Gopika.

Tears In Love Are So Commonplace!

Tears In Love Are So Commonplace!

Raadhika possesses infinite qualities prominent among them being twenty five, which includes chief among Krishna-priyas, soft-spoken, clever, and adept in classical form of music, Rasaswaroopa kind-hearted, owner of pious smile and unusual depth within. Her actions are borne out of desire to serve and please Govinda.

Surdas gives a loving detail of the first meeting of Radha and Krishna. One day Shri Krishna while engaged in the Bal Leela (childhood gesture) happens to reach the bank of Yamuna. He is surprised, as well as delighted, to find there a new face which was glowing with supreme beauty. Krishna, left dumb struck by such a beauty could not resist himself from asking her name, “I have never seen you before in Brija.Who are you?” he asked. “Why should I come to ever come to Brija, I have too many friends to play with at my place. I have come to know that Nanda’s son is a big trouble­-maker who excels in the art of stealing,” she shot back. Krishna, determined to get her company said, “What do you possess that I am going to steal from you and which you fear to lose? Come let’s play together. We would form an excellent pair.” Poor Radha she didn’t realize that what she was going to lose—heart the most valuable possession of any woman.

The conjugal relationship between Radha and Krishna is pinnacle of Madhurya Bhava (the bliss oriented state). At this point it is necessary to mention that Parmatma (Supreme Self) is one-without-a-second! Therefore no leela (divine act) is possible in this state. In the madhurya bhava,  Nirguna Parabrahman is supposed to have a form with which a bhakta can establish a relationship. Gradually moving through five principle bhavas a stage comes when a bhakta cares little for worldly obligations and principles. This is the peak point popularly known as “Kanta Bhava’in Vaishnava literature. Something that separates Rasa leela from ordinary leelas is whereas the former takes place at yoga maya level, the latter is performed at Mahamaya level (highest plane of consciousness). Surdas considers total surrendering and forgetfulness of body consciousness essential for maturity of Madhurya Bhava. Bhagvan Ramakrishna said, “I have spent a few days in Radha Bhava. On those occasions I use to dress like woman. It is indeed impossible to sing the glory of Radha who is embodiment of refined virtue and supreme love.”

Gross mundane realities prevent us from having a glimpse of Rasa leela of Radha and Krishna but bhaktas like Surdas are always absorbed in their Madhurya. Explaining the reason of deep love between Radha and Krishna Surdas cites chidhod fancies. He feels a bond of friendship formed in the childhood contains in it the seeds of deep love, which under favourable circumstances get converted into life-long commitment. Gaudiya cult provides an absolutely a different explanation. Here love already exists in their hearts and its growth is not dependant on outside influences. Similarly Radha conceived by Chandidas is too sensitive whose heart aches on hearing the name of Madhava.

Perhaps differences in their outlook are the result of bhava that captivated their hearts, which is in each case unique. So Radha of Surdas has egocentric tendencies. She not only humiliates Krishna but even rebukes him on trivial issues. So what if in isolation she weeps for Krishna, her heart always aching for intimate moments. It is this duality in her behavior and paradoxical approach that keeps Krishna guessing whenever He meets her. On the other hand, Vidyapati’s Radha too has ego but it subsides when she faces Krishna. Radha perceived by Chandidas is completely devoid of ego. She neither reacts nor retaliates but remains absorbed in His thoughts.

Vaishnavaas have carved unique image of Radha, which has no parallel. It is so because Vaishnavas don’t consider Bhakti to be bhava, Bahakti is ‘Rasa’ to them. Though Radha does not figure in clearly in Bhagavat Purana, she is the prime character of Brahma Vaivarta and Padma Purana. Jaideva’s appearance on the scene in 12th century makes Radharani comes into limelight. It is believed that these two Puranas and Geeta Govinda of Jayadeva established her as paragon of love and virtue. But it was Nimbakacharya who first revealed philosophical aspects of Shri Radha’s various dimensions. Lord has two powers namely Kriyashakti (power to perform) and Gyanaskati (power to seek knowledge). Satyabhama (Bhudevi) represents the former while the Rukamani(Sridevi) stands for the latter. In Radha, these two powers get unified and she thus becomes Parashakti (supreme power) of the Lod. In this form these two powers attain a non –dual relationship with the Lord but in their individual state retain their particular relationship. Thus, exists a distinction when one fails to identify with Sri Radha. Sri Nimabakacharya provides a much elevated status to Radha. She becomes Bhakti or Brahman Vidya (Knowledge of self) which liberates jeeva from bondage of Maya. In other words, she becomes a Supreme Master.

Shri Krishna, who always remains one with her, is called “Atma Rama”. Krishna states in Padma Purana: ‘Know Radhika to be best of teachers of the Highest Knowledge—Knowledge of Brahman.’ Let us pray that she appears on the earth again and again. If Radha arrives how can  Krishna remain far behind? May we get devotion for her so that our hearts get purified to receive her grace. And, thus, we become one of the participants of ever happening grand ‘Rasa leela of Radha and Krishna ’.

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Some Popular Bhajans Associated With Her: 

1. Jai Radha Madhav 

2. Radha Aisi Bhai Shyam Ki Diwani

3. Vrindavan Dham Apar 

4. Hamaro Dhan Radha Shri Radha

5. Yashomati Maiyya Se Bole Nandlala

Radha And Krishna: Always In Intimate Union

Radha And Krishna: Always In Intimate Union

Reference:

Surdas 

Gopis

Jaideva’s

hladinishakti

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वर्तमान हिंदी फिल्मी गीत यूँ कि जैसे ढेला खाए कुत्ते की चीख पुकार

मुकेश: आत्मा से उठती आवाज

मुकेश: आत्मा से उठती आवाज


कल सत्ताईस अगस्त को महान गायक मुकेश और ऋषिकेश मुखर्जी  दोनों की पुण्यतिथि थी. दोनों ही उस सादगी का प्रतिनिधित्व करते है जो आजकल के दौर में लुप्तप्राय सी हो चली है. मुकेश आत्मा में डूबकर गीत गाते थे तो ऋषिकेश दा आत्मा में डूबकर फिल्मे बनाते थे. जाहिर है इन दोनों के संगम के बाद आनंद की उत्पत्ति होनी ही थी. इस गहरी सोच को जन्म लेना ही था कि जिंदगी कैसी है पहेली. जब ऐसे लोगो कि याद रखकर हम आज के दौर में नज़र डालते है तो आनंद दुःख के सागर में विलीन हो जाता है. आज के गीतों को आप सुनिए तो लगता है जैसे किसी ने कुत्ते को ईंट का ढेला खीच कर मार दिया हो. या कोई कुत्ते का गला दबा रहा हो. या सूअर के बच्चे को बोरी में बंद कर के कही ले जा रहे हो! अजीब सी ध्वनियाँ की बोर्ड और ड्रम बीट्स के मिलन से पैदा की जा रही है जिनका कोई मतलब नहीं  सिवाय इसके कि युवा कदमो को नाईट क्लब में झूमने में आसानी हो. 

आश्चर्य इस बात पर है कि ये सब तमाशा प्रयोगवाद  के नाम पर स्पांसर हो रहा है. इस में बहुत से मूढ़ लोगो को आधुनिकता का सम्मान सा होता दिख रहा है. आप इन गीतों की आलोचना कर के देखिये तो आपको समझाया जाएगा, आप के अन्दर इस बात को जबरदस्ती ठूंसा जायगा कि वक्त बदलता है और बदलते वक्त के साथ कदम मिला के चलना ही अक्लमंदी है. तो बदलते वक्त कि मेहरबानी क्या है देखे तो? ऐसी वाहियात बोल और धुन कि आप लाख सर पटक ले आप  बहुत बार सुनने के बाद भी सही सही ना समझ पायेंगे कि गीत में आखिर है क्या. पहले जहां गीत सर दर्द की दवा की आवश्यकता को कम करते थे आज इन दवाओं की बिक्री में सहायक है. एक बात तो तय है कि आज के गीत मार्केट के हिसाब से बन रहे है और मार्केट पे युवा हावी है तो गीत भी इनके टेस्ट के हिसाब से भड़भड़िया हथौड़ाछाप  हो गए है. फिर गीत मार्केट में आये नए म्यूजिक सिस्टम के हिसाब से बन रहे है. 

ऋषिकेश मुखर्जी: सादगी की अनमोल विरासत

ऋषिकेश मुखर्जी: सादगी की अनमोल विरासत

अब ये बताये जब गीत इस प्रकार से जन्म लेंगे तो इनमे आत्मा को छूने की ताकत क्या ख़ाक पैदा होगी?  इक्का दुक्का अपवाद  गिना देने से कि साहब ये देखिये फला ने कितना बढ़िया काम किया है से काम नहीं चलने वाला. ये बात सही है कि हर युग का अपना  अलग रंग ढंग होता है, एक अलग मिजाज़ होता है, अपने प्रतीक होते है इसके बावजूद भी ये साबित नहीं किया जा सकता या ये महसूस करने के बहुत कारण नहीं है कि  आज के हिंदी फिल्मी गीत उत्कृष्ट कोटि के है. भाई जस्टिफाय करने वाले तो गालीनुमा शब्दों के समूह को भी गीत साबित कर देंगे तो क्या साबित कर देने से गीत एक अच्छे गीत या सिर्फ गीत की श्रेणि में आ जाएगा? आज के गीतों को सुन के ही समझ में आ जाएगा कि गीत पूंजीवादी संस्कृति के संरक्षक है और मुंबई के मंडी में बैठे दलालनुमा दिमागों की उपज है. तो ऐसे गीतों से तौबा जिनसे दिमाग का दही बनने में जरा भी देर ना लगे.

शाम के धुंधलके में बैठे हुए  मुझे तो आनंद का ये  गीत “कहीं दूर जब दिन ढल जाए”  याद आ रहा है जो मै मुकेश और ऋषिकेश मुखर्जी को श्रद्धांजलि स्वरूप भेंट कर रहा हूँ और ये महसूस कर रहा हूँ कि हम ये कहा आ गए है.

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राजेश खन्ना: सबके नैनो को सावन भादो करके चले गए तुम

 

राजेश खन्ना : अब क्षितिज के उस पार

राजेश खन्ना : अब क्षितिज के उस पार


राजेश खन्ना का यूँ  ही अचानक क्षितिज के उस पार चले जाना दुखी करता है. अभी उनकी उम्र ही क्या हुई थी लेकिन कलाकारों की मौत का जो सिलसिला पिछले साल से शुरू हुआ है वो अब तक बना हुआ है. जगजीत सिंह, शहरयार,  मशहूर संगीतकार रविजी, हिंदी के लेखक श्रीलाल शुक्ल, शम्मी कपूर, फिर हमारे चहेते हनुमान दारा सिंह और अब राजेश खन्ना. ऐसा लगता है कि देवलोक का माहौल बहुत ग़मगीन हो गया है तभी पृथ्वी के सभी बड़े कलाकार एक के बाद  ऊपर के लोको में चले जा रहे है. खैर राजेश खन्ना की मौत के बाद  ये एहसास मुझे हो चला है कि मौत भी कोई चीज़ होती है जो “आनंद” को भी शोक में   परिवर्तित कर सकता है. हिंदी फ़िल्म जगत को पहला सुपरस्टार देने वाला अब यादो का हिस्सा बन गया है. ये सुपरस्टार क्या चीज़ होती है मुझे ज्यादा नहीं पता पर राजेश खन्ना का जादू  सत्तर के दशक में यूँ चढ़ा कि माएं अपने बच्चो का नाम राजेश रखने लगी, युवतियों के अन्दर का पागलपन थोडा और बढ़  चला और नाई के दुकान पे एक और हेयर स्टाइल का उदय हो गया. बुरा हो एंग्री यंगमैन अमिताभ के अवतार का जिसने राजेश की आभा को ग्रहण लगा दिया बहुत जल्द ही पर तब तक राजेश का जादू एक अमरता को प्राप्त कर चला था.

जैसा सब अच्छे  कलाकारों के साथ होता है राजेश को भी आरंभिक दिनों में सब ने नकार दिया. चोटी की अभिनेत्रियों ने काम करने से मना कर दिया. शुरुआती फिल्मे पिट गयी बाक्स ऑफिस पे. फिर जाके आराधना मिली जिसको लेके राजेश खन्ना खुद ही सशंकित थे क्योकि नायिका प्रधान फ़िल्म में इनके लिए कुछ ख़ास नहीं था. पर जब सफलता मिलनी  होती है तो मिल के रहती है यूँ ही जैसे रेगिस्तान में झरने का फूट  पड़ना. कम से कम बालीवुड में सफलता का सिलसिला ऐसे ही शुरू हो जाता है सब  तर्कों  को धता बता के.  तो एक नायिका प्रधान फ़िल्म ने भारतीय रजत पटल को उसका पहला सुपरस्टार दिया.

बालीवुड में वैसे सुपरस्टार को कुछ ख़ास एक्टिंग नहीं करनी पड़ती. कम से कम आज कल के तथाकथित “खान” सुपरस्टारों को देख तो यही समझ में आता है. अमिताभ का भी यही दुखड़ा रहा है कि उनसे किसी ने ढंग की एक्टिंग नहीं करवाई  सिवाय ढिशुम ढिशुम के. खैर राजेश खन्ना के हाथ कुछ अच्छी फिल्मे आई जिनमे उन्हें एक्टिंग के अपने कुछ ख़ास शेड्स दिखाने का मौका मिला. ये एक महज सयोंग ही है कि ऋषिकेश मुखर्जी ने ही राजेश खन्ना और अमिताभ दोनों को कुछ फिल्मे प्रदान कि जिनमे उन्हें वास्तविक अभिनय से दो चार होना पड़ा. ये भी क्या अद्भुत  संयोग है कि इन दो फिल्मो “आनंद” और “नमक हराम” में दोनों ने साथ काम किया. आनंद एक कालजयी फ़िल्म बन के उभरी. आनंद तो अमर हुआ ही पर बाबु मोशाय भी कभी ना मरने वाली लोकप्रियता को प्राप्त हो चला. आनंद उपनिषद् के इस सत्य को प्रतिपादित करता था कि इंसान कभी नहीं मरता है. मौत एक तमाशा है जिसमे आत्मा को नए कपडे लत्ते मिल जाते है. इस भाव को राजेश खन्ना ने अद्भुत तरीके से परदे पे प्रस्तुत किया.

राजेश खन्ना के एक्टिंग में एक ख़ास तरीकें की नाटकीयता थी मगर जब कभी सधा हुआ अभिनय करने का मौका मिला उन्होंने कर दिखाया.  शुरुआती दौर में नंदा के साथ आई  यश चोपड़ा की “इत्तेफाक” इस बात की पुष्टि करती है. खैर अमर प्रेम, कटी पतंग, कुदरत, सौतन, थोड़ी सी बेवफाई, अवतार, डोली, रोटी और आन मिलो सजना इनकी कुछ उल्लेखनीय फिल्मे है. इनकी सफलता के बारे में बात करना और किशोर कुमार, आर डी बर्मन, मजरूह, आनंद बक्षी, एस डी बर्मन,  लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, कल्यानजी आनंदजी, हेमंत कुमार और खैय्याम इत्यादि का जिक्र ना करना मतलब दाल में से नमक का गायब कर देना है. किशोर कुमार ने ही रूमानियत के सुपरस्टार राजेश खन्ना और यंग्री यंग मैन अमिताभ को वो दर्जा दिलवाया जो किसी के लिए दुर्लभ  होता है. किशोर कुमार के चले जाने के बाद ये दोनों  धडाम से नीचे आ गिरे.  सोचिये अगर किशोर ना होते तो “मेरे सपनो की रानी” कहा से आती इस शानदार तरीके सें ? सोचिये अगर  “ओ मेरे दिल के चैन” के चैन किशोर ना होते तो क्या राजेश तनूजा को इम्प्रेस कभी कर पाते!  और रोटी में गाया ये गीत “ये जो पब्लिक है ये सब जानती है”  तो एक कालजयी मुहावरा ही बन गया. और इस फ़िल्म में किशोर कुमार का गोरे रंग पे कटाक्ष ” गोरे रंग पे ना इतना गुमान कर” सिर्फ मुमताज़ पर ही नहीं सिमट के रह गया वरन  इस गीत के बाद भारत में पैदा हुई हर गोरी लड़की के व्यक्तित्व को बेधता चला गया.

खैर ईश्वर इनकी आत्मा को शांति प्रदान करे. कहते है जाने वाले कभी लौट के नहीं आते. सिर्फ इनकी याद रह जाती है. सही बात है ” कुछ लोग जो बिछुड़ जाते है वो हजारो के आने से मिलते नहीं“. पर “आनंद” कभी मरते नहीं बस इसी रंगमंच पर  रूप बदल के आ जाते है और ये बोध  इस दुःख में एक मुस्कान की लहर तो पैदा ही कर देता है. पुनर्मिलन की उम्मीद तो बंधा ही देता है.

मेरे कुछ पसंदीदा गीत राजेश खन्ना पे फिल्माए हुए:

१. मेरे नैना सावन भादो ( मेहबूबा)

२. कुछ तो लोग कहेंगे  (अमर प्रेम)

३. जिंदगी प्यार का गीत है  (सौतन)

४. हज़ार राहे मुड़ के देखी (थोड़ी से बेवफाई)

५. वादा तेरा वादा (दुश्मन)

६. सजना  साथ निभाना (डोली)

७. प्यार दीवाना होता है ( कटी  पतंग)

८. ये रेशमी जुल्फे  ( दो रास्ते)

९. जीवन से भरी तेरी आँखें (सफ़र)

१०. जुबान  पे दर्द भरी दास्ताँ( मर्यादा)

११.  वो शाम कुछ अजीब थी  (खामोशी)

१२. यूँ ही तुम मुझसे बात करती  हो  (सच्चा झूठा)

१३. मेरे दिल में आज क्या है (दाग)

१४. कही दूर जब दिन ढल जाए (आनंद)

१५. जिंदगी एक सफ़र है सुहाना   (अंदाज़)

आनंद मरा नहीं करते!!!

आनंद मरा नहीं करते!!!

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भूख और बचपन से एक साक्षात्कार !!!

अभाव में भी मुस्कुराता बचपन !!

अभाव में भी मुस्कुराता बचपन !!

कुछ दिन पहले अपने मित्र प्रखर पाण्डेय जो ग्वालिअर में बसे एक बहुत शानदार कवि है से एक संवाद के दौरान पंकज रामेन्दू मानव जी की कुछ कवितायेँ सामने उभर कर आई. पढ़ते ही ये दो कविताये मेरे मन के बहुत अन्दर तक समा गयी. तभी सोच लिया था की इसे अपने इस वेबसाइट पर इनको जगह दूंगा ताकि ये कुछ और उर्वर दिमागों तक पहुच सके. शायद आदमी को इस कदर झकझोर कर रख देने की ताकत सिर्फ कविता में ही होती है. पंकज जी की इस अति सूक्ष्म संवेदनशीलता को सराहने के लिए शब्द कम है.

ये बताना आवश्यक है कि इसमें से पहली कविता “बचपन” जो कि एक पुरस्कृत कविता है और कवि का परिचय, जो कविता के नीचे मैंने दिया है, पहले पहल हिंदी युग्म नाम के वेबसाइट पर पर प्रकाशित हुई है. हिंदी युग्म इस वजह से विशेष साभार का अधिकारी है.

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    बचपन

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हंसता बचपन, गाता बचपन
जगता और जगाता बचपन,
धूल मिट्टी से सना हुआ
जीने के गुर सिखाता बचपन.
जोश जुनूं से भरा हुआ,
सबसे प्यार जताता बचपन।

कई और रूप हैं बचपन के
द्रवित स्वरूप हैं बचपन के
कबाड़ी बचपन, दिहाड़ी बचपन
कपड़ा सिलता बचपन, कचरा बीनता बचपन
किताब बेचता बचपन, हिसाब सीखता बचपन
हाथ फैलाता बचपन, दूत्कार खाता बचपन
पान खिलाता बचपन, चौराहे की तान सुनाता बचपन
लुटा हुआ सा बचपन, पिटा हुआ सा बचपन
दो जून की जुगाड़ में जुटा हुआ सा बचपन

बचपन रिक्शेवाला, बचपन जूतेवाला
बचपन कुल्फीवाला, बचपन होटलवाला
बचपन चने-मुरमुरेवाला, बचपन बोतलवाला
चाय बेचता बचपन, बोझा खींचता बचपन
गर्मी से लुथड़ा बचपन, सर्दी में उघड़ा बचपन
बूढ़ा बचपन बिना रीढ़ का कुबड़ा बचपन
सहमा बचपन, सिसका बचपन
पहाड़ी ज़िंदगी से बिचका बचपन

बचपन एक विवाद सा, घाव से निकले मवाद सा
बचपन एक बीमारी सा, जी जाने की लाचारी सा
बचपन थका हुआ सा, बचपन झुका हुआ सा
जीवन की पटरी पर, बचपन रुका हुआ सा

जूझता सा बचपन, टूटता सा बचपन
बिखरता सा बचपना, अखरता सा बचपन
अपने अस्तित्व को ढुंढता सा बचपन
कचरे सी ज़िंदगी में खुशिया तलाशता
हमसे कई सवाल पूछता सा बचपन ।

पंकज रामेन्दू मानव

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भूख ऐसी ही होती है

भूख की उम्र नहीं होती..जात नहीं होती..

भूख की उम्र नहीं होती..जात नहीं होती..

जब घुटने से सिकुड़ा पेट दबाया जाता है
जब मुँह खोल कर हवा को खाया जाता है
जब रातें, रात भर करवट लेती हैं
जब सुबह देर से होती है
जब चाँद में रोटी दिखती है
तब दिल में यह आवाज़ उठती है
भूख ऐसी ही होती है
भूख ऐसी ही होती है

जब गिद्ध मरने की राहें तकता है
जब कचरे में भी कुछ स्वादिष्ट दिखता है
जब कलम चलाने वाला बार-बार दाल-चावल लिखता है
जब एक वक़्त की खातिर जिगर का टुकड़ा बिकता है
जब रातें सूरज पर भारी होती हैं
तब दिल से एक आवाज़ होती है
भूख ऐसी ही होती है
भूख ऐसी ही होती है

जब हांडी में चम्मच घुमाने का कौशल दिखलाया जाता है
जब चूल्हे की आँच से बच्चों का दिल बहलाया जाता है
जब माँ बच्चों की कहानी सुना, फुसलाती है
जब सेहत की बातें बता ज़्यादा पानी पिलवाती है
जब रोटी की बातें ही आनंदित कर जाती हैं
तब दिल से एक हूक उठती है
भूख ऐसी ही होती है
भूख ऐसी ही होती है

जब पेट का आकार बड़ा सा लगता है
जब इंसान भगवान पर दोष मढ़ता है
जब भरी हुई थाली महबूबा लगती है
जब महबूबा सुंदर कम स्वादिष्ट ज़्यादा दिखती है
तब दिल से एक हूक उठती है
भूख ऐसी ही होती है
भूख ऐसी ही होती है

जब एक टुकड़ा ज़िंदगी पर भारी लगता है
जब तिल-तिल कर जीना लाचारी लगता है
जब बातें रास नहीं आती
जब हंसना फनकारी लगता है
जब एक निवाले पर लड़ती भौंक सुनाई देती है
तब दिल से एक हूक उठती है
भूख ऐसी ही होती है
भूख ऐसी ही होती है

पंकज रामेन्दू मानव

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कवि पंकज रामेन्दू मानवजी का परिचय:

इनका जन्म मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में २९ मई १९८० को हुआ। इनको पढ़ने का शौक बचपन से है, इनके पिताजी भी कवि हैं, इसलिए साहित्यिक गतिविधयों को इनके घर में अहमियत मिलती है। लिखने का शौक स्नातक की कक्षा में आनेपर लगा या यूँ कहिए की इन्हें आभास हुआ कि ये लिख भी सकते हैं। माइक्रोबॉयलजी में परास्नातक करने के बाद P&G में कुछ दिनों तक QA मैनेज़र के रूप में काम किया, लेकिन लेखक मन वहाँ नहीं ठहरा, तो नौकरी छोड़ी और पत्रकारिता में स्नात्तकोत्तर करने के लिए माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय जा पहुँचे। डिग्री के दौरान ही ई टीवी न्यूज़ में रहे। एक साल बाद दिल्ली पहुँचे और यहाँ जनमत न्यूज़ चैनल में स्क्रिप्ट लेखक की हैसियत से काम करने लगे। वर्तमान में ‘फ़ाइनल कट स्टूडियोज’ में स्क्रिप्ट लेखक हैं और लघु फ़िल्में, डाक्यूमेंट्री तथा अन्य कार्यक्रमों के लिए स्क्रिप्ट लिखते हैं। कई लेख जनसत्ता, हंस, दैनिक भास्कर और भोपाल के अखबारों में प्रकाशित।

श्रोत: हिंदी युग्म

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चलते चलते गुलाल का ये गीत भी सुन ले..इसके बोलो की जितनी भी प्रसंशा की जाए कम है..जिस तूफानी और जोशीले अंदाज़ में गाया गया है ये गीत उसके तो क्या कहने. पियूष मिश्र जो की इस फिल्म के गीतकार और संगीतकार भी है बधाई के पात्र है कि इन्होने भारतीय फ़िल्म संगीत के इतिहास को इतना दुर्लभ गीत दिया. और पता है इस गीत को गाया किसने है ? खुद पियूष मिश्र ने :-)…इसके बोल यहाँ पे है.

श्रोत साभार:

हिंदी युग्म

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Gulzar And Plagiarism: He Who Spits At Heaven, Spits In His Own Face !

Gulzar and Plagiarism: He Who Spits At Heaven, Spits In His Own Face !

Gulzar is in news again. Not for right reason this time. This brilliant poet dealing in surrealism is accused of dealing in plagiarism. Stunning and outrageous isn’t it? One of the lesser heard name from world of poetry has accused him of lifting the idea and verses from Nazım Hikmet’s, a famous Turkish poet, playwright and novelist, poem “Mera Janaza”.  Well,  it’s not a hard nut to crack to ascertain the real motive of such people who are trying to ride roughshod over his genuine achievements. They are all burning in the fire of envy.

There are two ways to attain success in literary world. Either work hard, write good pieces, or since that takes lot of energy besides needing lots of intellectual usage of brain, the easier route to fame for most of upcoming writers have been to enter into conflict with some established writer. That way you gain instant recognition. Some depressed and frustrated writers not able to gain the desired recognition try to heal themselves by painting other eminent writers into wrong colours.  It’s easy for them to give rise to vain controversies and gain quick popularity which they failed to attain via their creations.  In Indian literary landscape,   it’s commonplace to find one writer engaged in character assassination of other writer. A constant effort is made by some writers, under the aegis of fake institutions, to label the good work done by other writers as rubbish.

It’s really sad that at least, in India, it has become some sort of fashion for writers to write less and play politics more. That not only ensures them awards, cream posts in various academic institutions but also provides them a chance to be branded as successful writer! After all, what’s the point in calling Gulzar a plagiarist ?  He is an Academy Award winner for penning best song in movie ” Slumdog Millionaire”.   His poems are read across the globe for their beautiful metaphors blended with delicate lyrical construction. The free flowing loosely constructed verses not only talk about ironies of life but also direct our vision towards something beyond the normal human perceptions.  It’s ridiculous to suggest that a poet of such an evolved nature, capable of penning good poetry with such great ease, can enter in plagiarism. Why the hell would he ever do that?

The argument that there is remarkable resemblance between the two poems i.e. one penned by Gulzar, Mai Neeche Chal Ke Rahta Hun, and other penned by Nazım Hikmet, Mera Janaza, is quite laughable.  It may be that he was quiet inspired and he came to write his own version of the same feelings echoed in Mera Janaza but somehow failed to give due credit to the said poet.  However,  Gulzar has already mentioned that he always loved to read Russian writers or, for that matter, take note of great writings spread in foreign literature.

He never kept it secret that he has not read works of Russian writers. It itself is a proof that one can trace his source of inspiration!  I need to say that there are always chances that two people come to express the same views with great degree of similarity in expressions.  That’s called a rare coincidence. However,  I am ready to admit that in this case the level of similarity is of greater degree, and therefore, Gulzar should have specifically mentioned about Nazım Hikmet’s poem as footnote.

However, I raise strong objection to the efforts made by some people to make Gulzar  get branded as plagiarist. That’s only the sign of mental retardation of people making such attempts. Even the Western worlds are not above such crude attempts. Just few years back V. S. Naipaul labeled some great writer’s creations as rubbish!

I mean one can see some meaning in words of Noble Prize winner writer like Naipaul but it’s hard to understand how can writers devoid of stature can paint another writer enjoying great fame as plagiarist?  Do they have the moral courage or enough stature, attained after writing good pieces, to pass judgement on the worth of writings of their contemporary great writers?  To be honest, let those who have not attained any height stop measuring the worth of writers who have given us some excellent creations. Who has given the intellectual dwarfs to issue certificates of excellence to literary geniuses like Gulzar? Any answers?

Anyway,  listen this Gulzar’s song from movie Aandhi: Is Mode Se Jaate Hai

Gulzar and Plagiarism: He Who Spits At Heaven, Spits In His Own Face !

References:

Nazim Hikmet’s Poem/Gulzar

Gulzar

Nazim Hikmet

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Academy Award Winner Gulzar

Guest Poet CHARLES Reads The Poem MEMORIES

Guest Poet Charles  Reads The Poem Memories

Guest Poet CHARLES Reads The Poem MEMORIES

Mind has become the storehouse of memories,
Sweet memories which are mine,
Which are, of course, my prized possession,
When loneliness has gripped me,
They surround me slowly, and make their presence felt.

They neutralize the pain of wounds inflicted by the world,
Innocent charm cast by them
Even makes these wound’s pain sweeter;
Walking down memory lane
I can very clearly see those days,
The days of my childhood;
When success and failure were things of little importance
Where we knew little about morality and idealism,
But still they were part of all our actions.

With the increase in knowledge
We have become selfish and self centered,
The fire of envy has burnt down morality and idealism into ashes.
We have lost the power to express our true emotions,
An easy task for us during our childhood.

The purity of heart, which is required is no more,
Indeed a great loss;
Memories which would always be with me, like guiding star,
I wish they would never part from me,
Let them be always on my side till doomsday,
Yes, only thing I like to be surrounded by
When I find myself in the arms of death.

Poem “Memories” Read By Guest Poet Charles On A Prominent Website Dedicated To Poetry Voices Net. Click here To Listen The Reading:

Guest Poet CHARLES Reads The Poem MEMORIES

Guest Poet Charles  Reads The Poem Memories

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The great Rudolf Steiner Quotes Site

Quotes and fragments from the work of the great visionary, thinker and reformer Rudolf Steiner

Bhavanajagat

Welcome to Noble Thoughts from All Directions to promote the well-being of man through Self-Discovery.

Serendipity

Was I born a masochist or did society make me this way?

SterVens' Tales

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ज्ञान दत्त पाण्डेय का ब्लॉग (Gyan Dutt Pandey's Blog)। मैं गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर रेलवे अफसर।

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This is the story of me writing my first novel...and how life keeps getting in the way.

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