Category Archives: National Flag

भीड़ का मनोविज्ञान: अन्धो के देश में काने राजा बन कर उभरते है!

 इस का मतलब ये नहीं कि मै बाल ठाकरे की नीति या राजनीति का समर्थक हूँ। कतई नहीं। लेकिन एक ठाकरे को कोसना मै  जायज़ नहीं मानता क्योकि इस हमाम में कौन नंगा नहीं? तो सिर्फ ठाकरे से घृणा क्यों? सिर्फ ठाकरे से दूरी क्यों?

इस का मतलब ये नहीं कि मै बाल ठाकरे की नीति या राजनीति का समर्थक हूँ। कतई नहीं। लेकिन एक ठाकरे को कोसना मै जायज़ नहीं मानता क्योकि इस हमाम में कौन नंगा नहीं? तो सिर्फ ठाकरे से घृणा क्यों? सिर्फ ठाकरे से दूरी क्यों?


इसके पहले मै बाल ठाकरे की शोक यात्रा में उमड़ी भीड़ के बारे में कुछ कहूँ ये समझ लेना आवश्यक रहेगा कि प्रजातंत्र में  संख्या बल बड़ा मायने रखता है।प्रजातंत्र का आधार ही यही है कि जिसके पीछे जनता वही हीरो बाकी सब जीरो अब चाहे उसने नंगा करके अपने को भीड़ जुटाई है या सबको दारू रुपैय्या बाँट कर। पर भीड़ के दम पर ही लोकतंत्र चलता है अब चाहे जनप्रिय नेता की बात भीड़ के बीच में बैठे कल्लू को या मंच पे बैठे सेठ किरोड़ीमल को समझ में आ रही हो या ना आ रही हो इससें किसी को क्या मतलब। भीड़ में है यही बहुत है। यही लोकतंत्र का माडल है जिसकी लाठी उसकी भैंस, और जिसके पास सबसे ज्यादा लाठी उसके पास पूरा देश। 

इस तर्क के हिसाब से चले तो अल्पसंख्यको के दम पर राजनीति करने वालो के मुंह पर ठाकरे साहब मर कर भी कस कर तमाचा लगाने से नहीं चूँके। बाल ठाकरे का मै कोई प्रशंसक नहीं क्योकि मूलतः मै उग्र विचारधारा का समर्थक नहीं  हूँ क्योकि उग्रता इस देश का स्वभाव कभी नहीं रहा है। लेकिन आसुरी प्रवत्ति से लैस बढ़ते लोगो का झुण्ड, अल्पसंख्यको के नाम पर होते रोज तमाशे, हिन्दुओ में फैलती कायरता के चलते तहत ये आवश्यक हो गया है कि कुछ शेरदिल नेता पैदा तो हो जो अपनी दहाड़ से कम से कम हिन्दुओ का उत्साह तो कायम रख सके नहीं तो कोई लालटेन जलाकर, कोई हाथी भागकर, कोई साइकिल दौड़ाकर जनता को नित प्रतिदिन बेवकूफ बना कर भीड़ जुटा रहा है। ऐसे में कोई देश को बाटने वाली विभाजनकारी ताकतों को को उनकी ही भाषा में जवाब देकर भीड़ जुटा गया तो इसमें हो हल्ला मचाने की क्या जरूरत है। इसमें इतना आश्चर्यचकित कर देने वाली क्या बात है। 

क्या इसके पहले भीड़ जुटते नहीं देखी किसी ने? आप ने चुनाव की रैली नहीं देखी क्या? मुफ्त में लखनऊ आयेंगे और नेताजी का भाषण सुने ना सुने चिड़ियाघर में शेर के दर्शन करना नहीं भूलेंगे। अगले दिन अखबार में नेताजी का कहिन और भीड़ की फोटु दोनों मौजूद होंगे। और पीछे जाए भारत छोड़ो आन्दोलन में लगभग पूरा देश उमड़ पड़ा था। जय प्रकाश नारायण के आहवान पर क्या भीड़ नहीं उमड़ी थी? खैर उस भीड़ के तत्त्व अलग थें। इस इक्कीसवी सदी के भारत में जब सब नेता स्विस बैंक प्रेमी हो गए है, जब नेता गरीबी को नहीं गरीब को ही हटा दे रहे है, आतंकवादी नेताओ का शह पाकर सलाखों के पीछे बिरयानी काट रहे है तो ऐसे में भीड़ के होने के मायने भी बदल गए है।  

वैसे आश्चर्य है कि बहुत से लोग ठाकरे को साम्प्रदायिक राजनीति करने वाला, उकसाने वाली राजनीति करने का आरोपी मानते है इसलिए अछूत मानते हुए अल्संख्यको की नज़रो में सेक्युलर बनने के लिए शोक यात्रा में नहीं शामिल हुएँ। मै इन विवेकी नेताओ से ये जानना चाहूँगा कि कौन सा नेता सही राजनीति कर रहा है? कौन नहीं राजनीति की दूकान चला रहा है? तो शुचिता का पाठ ठाकरे या मोदी जैसे हिन्दू नेताओ पर ही क्यों लागू होता है? तो क्या  अलगाववादी नेता जो कश्मीर में पंडितो को मारकर, भगाकर आज़ादी मांग रहे है इनके नेता के शोक सभा में होना चाहिए? या इन नेताओ के शोक सभा में होना चाहिए जो सबसे मेहनती मजदूर के नाम पर राजनीति कर रहे है। मजदूर तो वही झुग्गी झोपड़ी वाले रहे लेकिन ट्रेड यूनियन के नेता एयर कंडिशन्ड केबिनो में जा पहुंचे। तो इन नेताओ के मरने पर भीड़ जुटनी चाहिये? या इन “हाथ की सफाई” वाले नेताओ के मरने पर मजमा लगना चाहिए जिनके कुकर्मो की लिस्ट इतनी  लम्बी है कि यमराज के आफिसवाले वाले भी ना पढ़ पाए अगर चाहे तो। या राम लला के नाम पर सत्ता पाने वाले वाले पर राम को ही पीछे  धकिया कर राजनीति करने वाले नेताओ के मरने पे भीड़ होनी चाहिए? तो ये बाल ठाकरे की शोकयात्रा   में उमड़ी भीड़ पर जलने वाले, कुढने वाले, दूर रहने वाले जलते रहे, कुढ़ते रहे, सर नोचते रहे है।     

बाल ठाकरे इन धर्म निरपेक्ष नेताओ से अच्छा नेता था। कम से कम उसका असली चेहरा सामने था। उसने नकाब ओढ़कर राजनीति नहीं की। पीठ  पीछे घात लगाकर हमला  नहीं किया। जो भी किया खुल कर सामने किया। यहाँ का खाकर कठमुल्लों की तरह विदेशी ताकतों की जय नहीं करता था। धर्म निरपेक्ष बनकर बिरयानी तो नहीं काटता था उन आतंकवादियों के साथ जो निरीह लोगो को हलाक करते थें। इस का मतलब ये नहीं कि मै बाल ठाकरे की नीति या राजनीति का समर्थक हूँ। कतई नहीं। लेकिन एक ठाकरे को कोसना मै  जायज़ नहीं मानता क्योकि इस हमाम में कौन नंगा नहीं? तो सिर्फ ठाकरे से घृणा क्यों? सिर्फ ठाकरे से दूरी क्यों? 

रही भीड़ की बात। तो मेरी नज़रो में भीड़ का आना ख़ास महत्त्व नहीं। कल शाहरुख खान इलाहाबाद में रंडी टाइप का ठुमका लगा जाए तो उजड्ड नौजवानों की बेकाबू भीड़ लगेगी चीखने चिल्लाने? तो क्या शाहरूख खान को मै इस भीड़ प्रदर्शन के बल पर पर बहुत बड़ा अभिनेता मान लूं? या कल को कोई ईमानदार आदमी मर जाए और सौ पचास तो छोड़िये दस आदमी भी न शामिल हो तो क्या मै उस आदमी को कमीना मान लूं और इस शोकयात्रा को भी फ्लाप या हिट शो मानने की कवायद में जुट जाऊं ?

Pics Credit:

Pic One

The System Of Governance In India Has Gone To The Dogs !

The System Of Governance In India Has Gone To The Dogs !

Pictures always speak volumes.’A picture is worth a thousand words’ became quite evident when I came to see ‘dark images’ associated with the recent tricolour hosting attempt at Lal Chowk, Srinagar. I call these pictures “dark images” as they not only depict the brutality of police but also reveal the facets of a rotten system. A system that has nothing to offer to law-abiding citizens but has lot to offer to the corrupt souls involved in all sorts of inhuman practices.

It needs to be recalled that activists of BJP, who wished to hoist a flag at the Lal Chowk on this Republic Day to mark the culmination of Ekta Yatra were not allowed to hoist the flag, citing fears of law and order breakdown”. As per news items, the government machinery breathed a sigh of relief when it managed to keep the activists away from the Lal Chowk.

However, the other side of the story got delayed. After the emergence of these gory images, it’s quite clear that police crossed the line between human decency and barbarism in a mad attempt to prevent the hoisting of the flag. It’s not hard to imagine the plight of people who are behind the bars if that’s the treatment meted out to people engaged in harmless and noble gesture. It’s a real shame that all the human rights protection messages which one often finds posted on the walls of Police Station do mean nothing for the beasts functioning as policemen.It appears that police this time was inspired by the Pre-Independence British police!

I need to ask: Is attempt to hoist a National Flag a huge offence that should make police go berserk ? What was the need to beat the activists black and blue ? Isn’t our system promoting anarchism by allowing total liberty to the anti-national elements but at the same time dealing with iron hand activities that restore the pride of nation ?

I just don ‘t know how my readers are going to react ? However, after seeing this images, I am but convinced that our system compromising of legislature, executive and judicial branches has gone to the dogs.

The System Of Governance In India Has Gone To The Dogs !

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The System Of Governance In India Has Gone To The Dogs !
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The System Of Governance In India Has Gone To The Dogs !

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The System Of Governance In India Has Gone To The Dogs !

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The System Of Governance In India Has Gone To The Dogs !

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Reference:

Ekta Yatra


Brutality Of Police

Flag Hoisting At Lal Chowk

Pic Credit:

Deshratna

 

Hoisting The National Flag Is A Crime In India !

Hoisting The National Flag Is A Crime In India !

It’s really strange and quite baffling that on the very day when Constitution of India came in effect, the nation witnessed an unprecedented happening wherein activists belonging to BJP were not allowed to hoist the national flag at Lal Chowk in Srinagar. It’s really a huge blow to the spirit of constitution,which believes safeguarding the honour of elements inherent in it.The national symbols are representative of pride of India. The Indian government’s official website while talking about them says that “these symbols are intrinsic to the Indian identity and heritage. Indians of all demographics backgrounds across the world are proud of these National Symbols as they infuse a sense of pride and patriotism in every Indian’s heart.

Coming to the national flag, the images which depict how our revolutionaries lost their lives in an attempt to hoist the flag on the government buildings during the British are still stuck inside our memories. I remember a famous scene in Attenborough’s Gandhi,when a revolutionary is shot dead by the British official when he was about to hoist the national flag. Now come back to the present. Both Central government and State Government in Jammu and Kashmir prevented the determined souls from unfurling the national flag, which marked the culmination of BJP’s Ekata Yatra. It’s a real shame that government machinery acted like British government in Raj Era.

The whole incident has very serious repercussions. It also raises some very complex questions which admirers of national integrity apart from the intellectuals belonging to all sections need to answer in conscious and honest manner.Ridiculous reasons have been given in support of not allowing the BJP’s activist to hoist the flag.Home Minister P Chidambaram treating the whole exercise a part of confrontationist agenda requested the activists not to escalate the tension in the State. In his eyes,it was going to deteriorate the law and order situation there.The Chief Minister Omar Abdullah also felt the same stating that state which has somehow managed to regain normalcy after three long months of turbulence should not witness another volatile act.It would be interesting to know that Lal Chowk, as per the separatists, is a place where the first prime minister of India, Pandit Jawaharlal Nehru, promised referendum to Kashmiris.

Hoisting The National Flag Is A Crime In India !

These arguments sound very stupid. I am really taken aback by the reactions of the intellectuals. It’s not difficult to intercept the reactions of people falling to the progressive class. Any issue if it’s sponsored by the BJP becomes an object of hatred in eyes of the Leftists. On the contrary,they will leave no stone unturned in sponsoring the cause of people found guilty of sedition. Well ,I am no political person,much less representative of BJP or RSS. Therefore,I wish to offer an altogether different perspective. What’s the chief reason which has made Jammu and Kashmir tense ? It’s the incompetence of both Central and State governments.

Hoisting The National Flag Is A Crime In India !

The governments are being virtually guided by the whims and fancies of the separatists. I am not saying that. It’s one of the recommendations made by the interlocutors which suggests that stating “that rights and dignity of people of Jammu and Kashmir be respected by “specially training” the armed forces” and ” specified areas in Kashmir and Jammu be demarcated where people could stage peaceful protests against the government.”This Kashmir Panel is headed by Journalist Dileep Padgaonkar. That’s indeed an ideal way to deal with the likes of Yaseen Malik who enjoy the patronage of Pakistani government ! That’s indeed a great way to honour the sacrifices of brave soldiers who lost their lives while fighting with the infiltrators.

Coming back to the main issue, let me quash the bogus fears of Mr.Omar Obdullah. His fears pertaining to breakdown of normalcy is childish as few months back when Jammu and Kashmir was caught in flames of tension the separatists were not only allowed to organize a huge meeting at Lal Chowk but also allowed to hoist Pakistani flags. The separatists also raised anti India slogans. Was that a very encouraging gesture which prompted our Home Minster P Chidambaram to give a nod to it ? Were the present fears that gave rise to hallucination in minds of Chidambaram had gone missing in those times when separatists were given total freedom to get involved in anti-India gestures on September 11,2010 ? Are the scenes in this video promote peace in valley ? So what was the need to have such vague apprehensions when few enthusiastic souls wished to hoist our own national flag at Lal Chowk on Republic Day ?

Hoisting The National Flag Is A Crime In India !

A meeting titled ‘Azadi: The Only Way’ was organized in New Delhi on October 21st, 2010 in which inflammatory anti-India speeches were delivered.What was our Home Minster doing then ? Had he no time to prevent this meeting conducted by Syed Ali Shah Geelani of the Hurriyat Conference (G) ? What should common people of this nation assume when government start behaving in selective and partisan manner ? Okay. They should assume that actions sponsored by the separatists give rise to peace while the nationalistic gestures such as hoisting the national flag escalates tension !

The double standards exhibited by both Central government and Omar Obdullah government have left us stunned. The hypocritical stance that whole show is mere political drama exposes their real faces. It’s not altogether devoid of truth that there was some politics involved in it but the greater question is that why matters pertaining to national security, integrity and pride are allowed to become subject matters of political parties ? You allow political parties to create mess or gain political mileage by not taking a clear stance on sensitive issues. You keep sensitive issues pending for years, making lesser organisations to cash on it.

Hoisting The National Flag Is A Crime In India !

So people accusing BJP of playing politics should think twice before pointing accusing fingers. In fact, it has given a chance to ponder over new aspects related with Kashmir. The issue has also exposed the people masquerading as intellectuals, who are, in fact, the other side of separatists operating in Kashmir. I mean people who think that honouring the national symbols gives rise to disturbed scenario. I would love to know from them how come hoisting flag on our own land and that too on Republic Day would lead to disturbance ?

It’s not a political issue. It’s a question that’s associated with the self-respect of nation. It would be hard to find an another nation wherein the government machinery prevented its own very people to hoist its own national flag. It’s a real shame. Now don’t make it a political issue by associating BJP with it. The issue is why one cannot hoist a national flag within national boundaries? In other words, why should we allow the separatists to rule our likes and dislikes? Who are they to dictate what we should do and what we should not do? Why do we not crush them badly when they thwart attempts to restore national pride? Remember, it’s the same place where separatists burnt our national flag,making mockery of our patience.

Hoisting The National Flag Is A Crime In India !

There is talk of confidence building measures but I don’t know how would it be done when we cannot even display elements representative of national pride ? I mean right from Naxalites to separatists can openly use weapons,organize anti-India meetings but when the peace loving citizens try to enter in nationalistic gesture they are arrested on grounds of causing harm to normalcy. Ironically, ” the UPA government is duty bound under the Transaction of Business Rules framed under the Constitution, to officially unfurl the tricolour national flag at Lal Chowk in Srinagar, J&K. ”

Another important angle is to decide what’s really more important ? To find what’s making people in Jammu and Kashmir increasingly prone to anti India gestures or to kill all such attempts that try to make this state a part of mainstream India much like other states ? So are we spending hard earned money of the tax payers’ on this state to give rise to scenario wherein giving rise to nationalistic fervour is a criminal offence ? Anyway, time has come to marginalize intellectuals who love to support separatists,promote people involved in seditious activities and also create mayhem in the whole nation if something goes against their interests. So it’s really pathetic that they smell a rat in the motives of BJP or, for that matter, talk about maintaining law and order. We all know how “Bandhs” throw life out of gear in West Bengal.

It’s time to do some real soul searching. I don’t think that ideal way to curb the separatists and anti-India forces is to start talking about Hindu terrorism. The ideal way is to curb such negative forces with iron hand. It’s not at all a right way that we should compromise with national pride to keep intact fake peace in Kashmir valley. It’s hard to believe that it’s not government machinery but the will of separatists that decides what should be the course of action in valley ? So what is the Indian government waiting for ? Will it be dictated by them or is it going to tame them by hook or crook considering beasts are not used to soft measures ?

The hoisting of flag would have sent strong message to the all the negative forces that come what may we are not going to compromise with our national pride. It’s a real shame that we gave them an opportunity to laugh at our weaknesses. Let’s stop glorifying anti-India gestures unless we are interested in making cowardice a part of our national character. It’s time to give separatists strong signals that playing with the national pride would cost them dearly.

Hoisting The National Flag Is A Crime In India !

References:

BJP’s Ekta Yatra

Law To Hoist Flag At Lal Chowk

Chidambaram’s Statements

Video Sep.11,2010

Azadi:The Only Way

Pic Credit:

Pic One

Pic Two

Pic Three

Pic Four and Six


Pic Five


Pic Seven

तिरंगा फहरे या ना फहरे भला ये भी क्या एक मुद्दा हो सकता है ?

झंडा  ऊँचा  रहे  हमारा

झंडा ऊँचा रहे हमारा

जुस्तजू जिसकी थी उस को तो न पाया हमने
इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हमने

-शहरयार  

श्रीनगर के लालचौक पर  तिरंगा फहरे या न फहरे पर इस बहाने  इतना फायदा तो जरूर हुआ कि सयंमित से लगने वालो चेहरों से उनकी असलियत जरूर झलक गयी .वो गरीबी भी भली जो हमे अपने करीबी लोगो की असलियत से वाकिफ करवा दे.इस तरह के अवसर या इन  अवसरों पर होने वाली  बहसों से तात्कलिक लाभ यही होता है कि ये समझ में आने लगता है कि सभ्य से दिखने वाले चेहरे  अन्दर से कितने मक्कार और भ्रष्ट होते है.कितने ही बेसुरे तानपुरे अपना राग अलापने लगते है. आश्चर्य है कि यह तो ख़राब लगता है कि हमारे  दृष्टिकोण  को कोई  सिरे  से खारिज कर दे पर ये  बुरा नहीं लगता कि कोई राष्ट्र के स्वाभिमान से जुड़े प्रतीकों कि ऐसी कि तैसी कर दे और हम  खामोश बैठे रहे.भावनाओ का भी विचित्र स्वरूप होता है.राष्ट्र भावना के सम्मान से जुड़ा तो  पानी समान और अपनी क़द्र से जुड़ा तो लहू सरीखा  कीमती हो  गया.


उस राष्ट्र की नियति के बारे में भी सोचिये जहा ये भी एक  मुद्दा हो  सकता है की किसी जगह  तिरंगा फहरे या ना फहरे ? वाह  रे राष्ट्र ! कितने ही बहसों  में मैंने देखा है कुछ लोग बिल्कुल समत्व की मुद्रा में आ जायेंगे और ये लगेगा कि विक्रमादित्य का न्याय ही कर  डालेंगे.लगेगा न्याय अपनी  बात स्वयम कह रहा हो.असल में ऐसे चेहरे दस सर वाले रावण से ज्यादा खतरनाक होता है जो अलग  अलग जगह सिर्फ उपस्थिति जताने के लिए असरदार तरीके से अपनी  बात कहता है. लेकिन  गौर करने पे  आपको  समझ  में आ  जायेगा  कि  वे सिर्फ और सिर्फ अलगाववादियों की भाषा ही बोल  रहे है सभ्य तरीके से ! बहुतो को लग रहा है कि मुद्दे पे राजनीति हो रही  है.सवाल यह है कि किसी मुद्दे पे राजनीति करने का अवसर आप देते ही क्यों है ?
 

तिरंगे का अपमान करने वाले अलगाववादी तो सही पर सम्मान करने  वाले गलत  !

तिरंगे का अपमान करने वाले अलगाववादी तो सही पर सम्मान करने वाले गलत !


जब कुछ करना चाहिए तो समत्व कि बात करने वाले  दोगले बुद्धिजीवी  निष्क्रिय  बैठे रहते है. तमाशाई  बने रहते है.ये कहा थे जब अलगाववादियों  कि फौज दिल्ली  में आकर  देश  के  संविधान  पर थूक  कर चली  जाती है  आप उस थूक  को चाट कर रह  जाते है ! ये महान  कृत्य  है जो  कही  भी  कोई कर सकता है.पर तिरंगा फहरे या न फहरे इस पर बड़ा मंथन हो रहा है ! वाह रे इस देश को चलाने  वालो का विवेक ? चलिए माना भाजपा तो राजनीति कर रही है तो पहले ये बताये राजनैतिक पार्टी  राजनीति न करेगी तो क्या करेगी और दूसरा ये बताये कौन सी  पार्टी है  विश्व में  जिसके अपने राजनैतिक स्वार्थ नहीं होते ?कौन से पार्टी है जो दूध  की धुली है ?

आपने क्यों ऐसे हालत पैदा किये कि किसी को राजनीति करने का अवसर मिला ? वो भ्रष्ट है तो तुम निस्वार्थता की मूर्ती अब तक क्यों मुर्दा बने हुए थे ? बस पड़ जायेगे मुद्दे में और दोगली भाषा में बोलेगे यह भी सही है वो  भी सही है. देश में शान्ति लाने का तरीका यही है की देश के गद्दारों को तो  आप खत्म ही कर दे पर ऐसे लोगो को भी  खत्म कर दे जो  किसी  भी मुद्दे को अपनी भटकाव भरी  बातो से अराजकता की स्थिति उत्पन्न कर देते है.भाजपा का भगवा लोगो को  खलता हो तो खले लेकिन कुछ लोग  शायद ये भूल  गए कि भगवा अभिन्न रूप से भारत के  ध्वज का हिस्सा है.कल को उसको भी हटा दीजियेगा यह कह के ये सांप्रदायिक है !
 

 अलगाववादियों को क्यों नहीं दरकिनार करते ?

अलगाववादियों को क्यों नहीं दरकिनार करते ?

बात सिर्फ इतनी है भगवा और तिरंगा तो एक है और रहेगा और वो भी सबसे  ऊपर.बहुत से  लोग और कुछ राजनैतिक पार्टी का रुख ये  होता है  कि जैसे सच्चाई सिर्फ उन्ही के  पास गिरवी है.सच्चाई औरो को भी पता है साहब.ये पब्लिक है सब जानती है.सुना है कि नहीं.  अगर कुछ सिरफिरे लोगो  को वहा  तिरंगा फहराना  खल रहा  है तो उनकी  सुननी चाहिए कि उनकी सुननी चाहिए जो राष्ट्रीय प्रतीकों  का पूर्ण  सम्मान चाहते है.क्यों  आपका मन नहीं है ? बताये ? कहा है आपका मन ? राष्ट्र के दलालों  के पास ? जब पाकिस्तानी झन्डा फहर रहा  था तब मन था और अब नहीं  है ?

अच्छा बड़ी  मुश्किल से शान्ति आई है. तो अब क्या करे ? सब  राष्ट्रीय प्रतीकों  को हटा दे. स्वाभिमान बेच दे. बड़ा आसान है  ऐसी बकैती करना. ऐसे लोग पता है कैसे होते है.ये ठीक उन लोगो की तरह होते है जो किसी  की दुनिया उजड़  जाए तो  उसे  धैर्य बनाये रखने  के लिए  कहेंगे मगर खुद की अगर एक सुई भी खो जाए तो कितने बेगुनाहों को जेल के सलाखों पीछे डाल देंगे. ये लेक्चरबाजी बहुत घिसी  पिटी है.

कम से कम अमेरिका की स्पष्टवादिता अच्छी लगती है. या तो आप हमारे साथ है या तो  नहीं है. बात सिर्फ  इतनी है.भारत के ज़मीन पर ऐश करने वालो से यह पूछना चाहिए कि भारतीय प्रतीकों से उन्हें आपत्ति क्यों है ?  और इनसे क्यों  खतरा है ?  क्यों ऐसा माहौल है या निर्मित्त किया जा रहा है जिसमे भारतीय तत्वों के प्रति नफरत के बीज  बोये जा रहे है.इनका आप ईमानदारी से जवाब  दे.Anyway, let’s stop glorifying the anti-national gestures.बस यही कहना है कि उन सभी लोगो को नष्ट कर दे जो राष्ट्र के स्वाभिमान से जुड़े प्रतीकों की क़द्र नहीं करते. कम से कम उन्हें इतना तो समझ में आये कि राष्ट्र के प्रति सम्मान किन्तु परन्तु का विषय नहीं है और इसके साथ खिलवाड़ करना     राष्ट्रद्रोह  से  कम नहीं.
 

झंडा प्यारा हमारा

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