Category Archives: Love

Pain Is The True Vitalizer Of My Soul!

Pain Serving As Panacea!

Pain Serving As Panacea!

Listen my beloved 
Love is never put on scale

In love do you measure the 
Worth of emotions, desires and wishes?

Why do you wish to heal the pain
Emanating from injuries you fail to see?

Pain which nature wants to heal
Shall always get healed

And sometimes unhealed injuries 
Refine the soul further 

Or let them remain unhealed 
Floating in the ocean of heart as insoluble capsules of pain!

It’s an unbearable dishonesty on your part my beloved
An act unfair to dilute the pain simmering inside

Listen I have learnt lessons
To move from one pain to another 

In the company of light 
It’s time for you my beloved to touch new horizons 

And leave me far behind 
To walk all alone on the isolated path 

For I have also learnt 
How to remain alive with no trace of life inside!

When Ways Get Separated!

When Ways Get Separated!


The same poem in Hindi with a slight  modification in style and treatment.

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सुन मेरे मीत: तू कुछ जख्मो को हरा ही रहने दे! 

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जो इश्क करते है वो 
इश्क को तराजू में नहीं तौलते 

अरमानो, ख्वाहिशों, जस्बातो 
का लेखा जोखा कैसा मीत!

जो जख्म दीखते नहीं उन 
पर मरहम लगाना कैसा? 

जिन जख्मो को भरना होता है 
वो अपने आप ही भर जाते है 

या वक़्त के साए में ढलकर 
रूह को थोडा और निखार जाते है 

या नासूर बनते है 
तो नासूर ही बन जाने दें?

सो लिहाज़ा तेरा तडपना, आज़माना 
अब बेमानी सा लगता है 

कि एक जख्म से दूसरे जख्म तक 
का फासला तय करना हमने सीख लिया है

सो बेहतर है कि तू आगे बढ़ चल 
रौशनी के कारवां संग 

और छोड़ दे पीछे मुझे 
अजनबी सी राहो पे तन्हा चलते रहने को  

कि अब मर के भी हमने
जीते सा दीखते रहने का हुनर सीख लिया है।

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Trying  To Be On A Different  Path But Like Always All Alone!

Trying To Be On A Different Path But Like Always All Alone!

Pics Credit:
 

Pic Two

Pic Three

 

फगुआ की बयार मे भीगा भीगा सा मन, जरा जरा सा बहकता हुआ, जरा जरा सा सरकता हुआ

जय राधे! बरसाने की लट्ठमार होली ..महिला शशक्तिकरण वालो के लिए :P

जय राधे! बरसाने की लट्ठमार होली ..महिला शशक्तिकरण वालो के लिए 😛


बसंत ऋतू का आगमन हो चुका है। बहकना स्वाभाविक है। गाँव में तो फगुआ की बयार बहती है। ग्लोबल संस्कृति से सजी संवरी शहरी सभ्यता में क्या होलियाना रंग, क्या दीपावली के दियो की ल़ौ की चमक। दोनों पे कृत्रिमता की चादर चढ़ चुकी है। या तो समय का रोना है या फिर महँगाई का हवाला या फिर जैसे तैसे निपटा कर फिर से घरेलु कार्यो/आफिस के कामकाज में जुट जाने की धुन। त्यौहार कब आते है कब चले जाते है पता भी नहीं चलता। ये बड़ी बिडम्बना है कि त्यौहार सब के लिए दौड़ती भागती जिंदगी में टीवी सीरियल में आने वाले दो मिनट के ब्रेक जैसे हो गए है। सब के लिए त्यौहार के मायने ही बदल गए है। अलग अलग उम्र के वर्गों के लिए त्यौहार का मतलब जुदा जुदा सा है। और मतलब अलग भले ही होता हो लेकिन उद्देश्य त्यौहार के रंग में रंगने का नहीं वरन जीवन से कुछ पल फुरसत के चुरा लेने का होता है।

इन सब से परे मुझे याद आते है कई मधुर होली के रंग। वो लखनऊ की पहली होली जिसमे कमीने तिवारी ने मेरी मासुमियत का नाजायज़ फायदा  उठाते हुए और लखनऊ की तहजीब की चिंदी चिंदी करते हुए मुझे रंग भरे टैंक में धक्का देकर गिरा दिया था। बहुत देर के बाद एक गीत उस तिवारी के लायक बजा है हर दोस्त कमीना होता है। तिवारी का नाम इस लिस्ट में पहले है। ये इतना मनहूस रहा है शनिचर की तरह कि हर अनुभव इसके साथ बुरा ही रहा है। बताइए बैंक के कैम्पस के अन्दर छुट्टी वाले दिन बैंक की चारदीवारी फांद कर हर्बेरिअम फाइल के लिए फूल तोड़ने का आईडिया ऐसे शैतानी दिमाग के आलावा कहा उपज सकती थी। गार्ड धर लेता तो निश्चित ही बैंक लूटने का आरोप लग जाता। वो तो कहिये हम लोग फूल-पत्तियों सहित इतनी तेज़ी से उड़न छू हुएं कि इतनी तेज़ी से प्रेतात्माएं भी न प्रकट होके गायब होती होंगी। गाँव की होली याद आती है जिसमे गुलाल तो कम उड़ रहे थें गीली माटी ज्यादा उड़ रही थी। पानी के गुब्बारों से निशाना साधना याद आता है। सुबह से सिर्फ पानी की बाल्टी और गुब्बारा लेकर तैयार रहते थें। याद आते है वार्निश पुते चेहरे, बिना भांग के गोले के ही बहकते मित्र, गुजिया पे पैनी नज़र। ये सब बहुत याद आता है। अपने मन को धन्यवाद देता हूँ कि मष्तिष्क का अन्दर इन यादो के रंग अभी भी ताज़े है।

स्मृतियाँ तकलीफ भी देती है और आनंद भी। इन्ही स्मृतियों में भींगकर पाठको को होली से जुड़े कुछ विशुद्ध शास्त्रीय संगीत पे आधारित ठुमरी/गीत जिनमे अपने प्यारे राधा और कन्हैय्या के होली का वर्णन है को सुनवा रहा हूँ। ये अलग बात है कि मेरे मित्रो के श्रेणी में इन गीतों को सुनने के संस्कार अभी ना जगे हो लेकिन  इन्हें स्थापित उस्तादों ने  इतना डूब कर गाया  है कि अन्दर रस की धार फूट पड़ती है। कुछ एक गीत चलचित्र से भी है, अन्य भाषा के भी है भोजपुरी सहित। इन्हें जैसे तैसे आप सुन लें अगर एक बार भी तो मुझे यकीन है कि संवेदनशील ह्रदय इनसे आसानी से तादात्म्य कर लेंगे हमेशा के लिए। और इसके बाद भी यदि शुष्क ह्रदय रस में ना भीग सके तो उनके लिए जगजीत सिंह का भंगड़ा आधारित गीत भी है। सुने जरूर। ह्रदय हर्ष के हिलोरों से हिल जाएगा।

गुजिया कम झोरते है तो क्या हुआ पैनी नज़र हमेशा रहती है इस पर :-)

गुजिया कम झोरते है तो क्या हुआ पैनी नज़र हमेशा रहती है इस पर 🙂

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1. रंग डारूंगी,  डारूंगी, रंग  डारूंगी नन्द के लालन पे (पंडित छन्नूलाल मिश्र)

पंडितजी को सुनने का मतलब है आत्मा में आनंद के सागर को न्योता देने का सरीखा सा है। बनारस की शान पंडितजी से आप चाहे ठुमरी गवा लीजिये, कजरी गवा लीजिये, या ख्याल वो सीधे आपके रूह पे काबिज हो जाता है। ये किसी परिचय के मोहताज़ नहीं और ईश्वर की कृपा रही है कि प्रयाग की भूमि पर इनको साक्षात सुनने का मौका मिला है। ख़ास बात ये रहती है कि ये गीत के बीच में आपको मधुरतम तरीकें से आपको कुछ न कुछ बताते चलते है। और इस तरीके से बताते है कि आप सुनने को विवश हो जाते है। खैर इस बनारसी अंग में राधा जी ने अच्छी खबर ली है कृष्ण की। मुझे नारी बनाया सो लो अब आप नाचो मेरे संग स्त्री बन के। सुने कृष्ण का स्त्री रूप में अद्भुत रूपांतरण राधाजी के द्वारा होली के अवसर पर।

 
 
 
  2. होली खेलो मोसे नंदलाल 
  
डॉ गिरिजा देवी भी बनारस घराने से सम्बन्ध रखने वाली प्रख्यात शास्त्रीय गायिका है। इनको सुनना भी आत्मा के ऊपर से बोझ हटाने सरीखा है। सुने तो समझ में आएगा कि राधाजी किस तरह से कृष्ण को भिगोने के लिए व्याकुल है कि आग्रह लगभग मनौती सरीखा बन गया है।
 
 
3. होरी खेलन कैसे जाऊं ओ री गुइयाँ 
 
शोभा गुर्टू को मैंने बहुत सुना है और जितनी बार भी सुनता हो तो लगता है कि एक बार और सुन लूँ। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में पारंगत इस गायिका को ठुमरी क्वीन भी कहते है। इनको फिल्मो में भी सुनना बहुत मधुर अनुभव है। “सैय्या रूठ गए” (मै तुलसी तेरे आँगन की) आप सुनिए तो आपको समझ में आएगा। वैसे इस मिश्र पीलू पे आधारित ठुमरी में राधा की उलझन दूसरी है। यहाँ प्यारी राधा उलझन में है कि होली खेलने कैसे जाऊं क्योकि कृष्ण सामने रास्ता छेंक कर खड़े है। इसी झुंझलाहट का चाशनी में भीगा वर्णन है। 
 
 
4. कौन तरह से तुम खेलत होली

संध्या मुखर्जी को मैंने पहले नहीं सुना। इस लेख को लिखने के दौरान इनको सुनने का सौभाग्य मिला। बंगाली संगीत में निपुण इस गायिका की आवाज़ मन में घर कर गयी। उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खान की शिष्या बंगाली फिल्मो सहित हिंदी फिल्मो के लिए भी गीत गाये। इस शास्त्रीय गीत को सुनने के बाद आपको राधाजी का किसी बात पे रूठना याद आता है। कोई शिकायत जो अभिव्यक्त होने से रह गयी उसी की खीज इस गीत में प्रकट हो रही है।  दर्द है तो प्रकट होगा ही। इसमें कौन से बड़ी बात है लेकिन ये क्या कि आप फगुआ की बयार में बहने से इन्कार कर दे? शिकायत दूर कर के होली जरूर खेले मै तो बस यही कहूँगा। 


 
5. होली खेलेछे श्याम कुञ्ज 
     
पंडित अजोय चक्रबोर्ती को सुना है शास्त्रीय संगीत को सुनते वक्त और तभी से जब कभी मौका मिलता है सुन जरूर लेता हूँ। इनकी ठहराव भरी आवाज़ मन के किसी कोने में अटक कर रह गयी है। ख्याल गायन हो या ध्रुपद या भजन गायिकी हो सब पे लगभग बराबर सा अधिकार रखते है। राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित इस गायक ने बंगाल के बाहर भी अपनी आवाज़ का जादू बिखेरा है। इतना मीठे तरीक़े से कृष्ण के होली खेलने का वर्णन किया है कि बंगाली भाषा में होने के बावजूद इसका भाव ह्रदय के तार झंकृत कर गया।

 
 
6. अरी जा रे हट नटखट    
  होली पे मुझे तो वैसे अक्सर ये गीत “होली आई रे कन्हाई” (मदर इंडिया) याद आ जाता है लेकिन ये गीत कम बजता है। बहुत मधुर गीत है। व्ही शांताराम के फिल्मो के ये विशेषता रही है कि भारतीयता के सुंदर पक्षों को उन्होंने बड़े कलात्मक तरीके से उकेरा है हम सभी के चित्तो पर। नवरंग के सभी गीत बेहद सुंदर है जैसे “श्यामल श्यामल वरन” और “आधा है चन्द्रमा रात आधी” लेकिन कृष्ण और राधा के होली प्रसंग पर आधारित गीत कालजयी बन गया। कौन कहता है कि भारतीय स्त्री बोल्ड नहीं रही? देखिये क्या कह रही है राधा इसमें जिसको जीवंत कर दिया संध्या के सधे हुए नृत्य की भाव भंगिमाओ ने। महेंद्र कपूर और आशा भोंसले ने गीत में स्वर दिया है। संगीत सी रामचंद्र का है और गीत हिंदी गीतों को शुद्ध हिंदी के शब्द देने वाले भरत व्यास का लिखा है। 

 
7. प्यार के रंग में सैय्या रंग दे मोरी चुनरिया 
 
दुर्गेश नंदिनी 1956 में प्रदर्शित हुई थी। बंगाली जगत में इसी नाम से बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय का प्रमुख बंगाली उपन्यास है। वैसे इस फिल्म के ये गीत “कहा ले चले हो बता दो ए मुसाफिर” तो बहुत बार सुना है लेकिन ये मधुर होली गीत लताजी की आवाज में कम सुना गया है। हेमंत कुमार का सौम्यता से परिपूर्ण संगीत है और राजिंदर क्रिशन का गीत है।
 
8. जोगी रे धीरे धीरे

नदिया के पार ने ऐतहासिक सफलता प्राप्त की थी भोजपुरी में होने के बावजूद। रविन्द्र जैन का गीत और संगीत मील का पत्थर बन गया। और यही से भोजपुरी संगीत ने एक नयी उंचाई प्राप्त की लेकिन ये अलग बात है उस मूल तत्त्व से भटक गया जिसके दर्शन इस फिल्मो के गीतों में हुए है।  भारतीय फिल्मो  में गाँव कभी भी असल तरीके से प्रकट नहीं हुआ। ये कुछ उन विलक्षण फिल्मो में से एक है जिसमे गाँव ने अपनी आत्मा को प्रकट किया है अपने कई मूल तत्वों के साथ।

 
9. कौन दिशा में लेके चला रे बटुहिया

 

 इस गीत को सिर्फ इसलिए सुनवा रहा हूँ कि इस गीत में मेरे गाँव का स्वरूप बिलकुल यथावत तरीकें से प्रस्तुतीकरण हुआ है। इस में दीखते रास्ते, पगडण्डीयाँ, खेत, नदी बिलकुल अपने गाँव सरीखा है। गीत के बीच में आपको पालकी पे विदा होती दुल्हन भी दिख जायेगी। क्योकि पालकी पे सवार होकर कभी दुल्हन को विदा होते हुए होते देखा था सो इस युग में जहाँ पे सजी धजी कार में दुल्हन को  भेज़ने की नौटंकी होती है वहां ये दृश्य आपको बिलकुल भावविभोर कर देता है। खैर गीत सुने जो बहुत मधुर है ऐसा शायद बताने की जरुरत ना पड़े। ये बताने की जरुरत अवश्य पड़ सकती है कि गीत को गाया  है हेमलता और जसपाल सिंह नें। 

 
10. गोरिया चाँद के अजोरिया 

 

मनोज तिवारी की आवाज में ये भोजपुरी गीत मन को भाता है। ये अलग बात है कि गीत को भोजपुरी गीतों में व्याप्त लटको झटको जैसा ही फिल्माया गया है। वही रंग बिरंगी परिधानों में कूदती फांदती स्त्रिया जो गीत के साथ न्याय नहीं करती प्रतीत होती। फिर भी हरे भरे  खेत मन में उमंग को जगह तो दे हे देते है। भाग्यश्री “मैंने प्यार किया” के बाद लगभग गायब ही हो गयी। मैंने प्यार किया जैसी वाहियात फ़िल्म मैंने देखी नहीं सो बता नहीं सकता कि ये टैलेंटेड है कि नहीं लेकिन जहा तक इस गीत की बात है गीत में इनकी उपस्थिति से चार चाँद तो लग ही रहे है लुक्स की वजह सें। खैर इतने दिनों बाद देखना इस एक्ट्रेस को और वो भी एक भोजपुरी गीत में एक सुखद आश्चर्य है।

 
11. लारा लप्पा ( जगजीत सिंह)

लारा लप्पा “एक थी लड़की” से बहुत ही सुंदर गीत है। इसी के खोज में ये जगजीत सिंह का ये पंजाबी गीत हाथ लग गया। इसको जगजीत सिंह ने जिस चिरपरिचित दिलकश अंदाज़ में गाया है उतने ही कमाल के तरीकें से इनके साजिंदों ने बजाया है। निश्चित ही सुनने योग्य गीत अगर आप चाहते है कि आप का दिल बल्ले बल्ले करने पे मजबूर हो उठें। वैसे इस गीत के शुरू में मजनू ने अपनी लैला को काली कहने वालो की दृष्टि को गरियाया है सभ्य तर्कों के साथ वो भी सुन लें। हम तो भाई मजनू से बस इतना ही कहेंगे कि जो बकते है उनको बकने दो काहे कि “यथा दृष्टि तथा सृष्टि” ( जैसी हमारी दृष्टि होती है, वैसी ही यह सृष्टि हमें दिखती है)

राधा कृष्ण के प्रेम की याद दिलाता होली। उनके सखा सखियों, उनके गौओं, बछड़ो सबकी याद दिलाता :-)

राधा कृष्ण के प्रेम की याद दिलाता होली। उनके सखा सखियों, उनके गौओं, बछड़ो सबकी याद दिलाता 🙂

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Facebook: Has It Turned Into Playground Of Devils?

When will human beings learn to use any forum for constructive designs?

When will human beings learn to use any forum for constructive designs?

“How I wish that somewhere there existed an island for those who are wise and of good will.” ( Albert Einstein) That’s presumably an ideal state of affairs- an utopia whose actual manifestation on earthly existence is simply not possible. Let’s understand why it’s pretty difficult to create a world, which lies above human flaws. That I would explain via the mess which prevails on Facebook. It’s a pretty awesome networking site, but marred by fake profiles and anti-social activities. The point I wish to convey is that any good forum/institution either in real world or virtual world, sooner or later, gets corrupted by wrong elements. Instead of improving the face of such institutions/ forums, the negative elements infect it with their misimpressions, and thereby considerably reduce the credibility of the forum.

Before dissecting the activities taking place on Facebook, it would not be a bad idea to analyze what’s happening in our real world. The moment a good soul appears on the stage of world, the lesser souls become hyperactive to malign his/her image, and that too for no other reason other than that this person depicts some uncommon traits. They shout at him, just the way other doggies bark at some stranger dogie, who somehow happens to stray into their domain.  And so we never find these stereotyped minds promoting such a different soul unless he/she happens to serve their vested interests. They try their level best to tame the instincts of such person and make them on par with their own so that they can be used to fulfill their narrow concerns. And when they are not able to dictate terms,  the rumour mill, like always, starts churning out all sorts of absurd details make the life hellish for such a person.

It’s not that these people running the vilification campaign are devoid of brains. They have enough intelligence, owning big degrees and enjoying good position in life, but they happen to be  devil’s advocate. High profile degrees also make them owner of big ego and complex mind. That’s why they not only make a simple issue attain a pretty complicated shape, by coining vain theories and complex terms for a simple phenomenon. The very same situation could have been easily handled by framing the perspective in simple terms but presence of worldly wise practical souls, usually from corridors of known institutions, just complicate it that proper solution becomes an impossible affair. The negative minds destroy all good relationships, forums and institutions, the way a computer virus comes to hang the system. They never offer perfect solutions, but only ways and means to corrupt the face of all simple phenomenon. Now let’s see how wrong souls have corrupted a beautiful site like Facebook. Many people harbour the wrong impression that online world is different than real world. I am afraid it’s not  true. The virtual world is simply the reflection of your real attributes which you come to unleash in real world.

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                                        *The Glory Of Facebook Status!* 

One of my friends fell ill. He is a sensible person but then even sensible person commit silly mistakes. He informed everyone about his illness, breaking this news as Facebook status. And that’s okay but its aftermath is amazing, saddening and disappointing. Besides flow of get well messages, there appeared a large section of friends who came to “like” the status! Is that a sensible application of mind? If that’s the way they are behaving on Facebook, imagine how would they be responding in real lives. I am sure had the same status been of a lady “likes” and get well messages would have flooded the thread of that status in huge number. The impression that I wish to convey is that by unleashing such false sentiments, vain application of mind, aren’t the Facebook users lowering the status of Facebook? 

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  *Is there any merit on debating over certain issue on Facebook?*

Being someone hailing from the world of legal professional, the importance of offering rational and logical rebuttals as arguments is crystal clear to me. However, I see no reason as to why any sensible person should waste time in offering appropriate arguments on Facebook amid disinterested users. Majority of the Facebook users are pretty casual as they get engaged in important conversations. As far as I am concerned, I do take all conversations on Facebook, related with minor or major issues, quite seriously as long as its required to make the issue attain perfect clarity and then give way to other important concerns. Having said that, the waywardness and chaos which prevails on Facebook during conversation on sensitive issues usually keeps sensible minds tight-lipped. 

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                 *The Existence Of Strange Groups On Facebook*

Many good for nothing souls have formed groups having dubious aims. The moderator appointed in these groups operates in strange way. It adds and removes person, without apprising the concerned person of the reason for such gestures. The moderator promotes himself as an open-minded person but it generally has hidden designs and so it edit any views which is contrary to his designs. There is also some hidden hand, operating in the group, whose only task is to give wrong colouring to all your well meaning impressions. Most of the groups remain active for some time but soon you would find them defunct, a barren land.

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            *Dangerous Love On Facebook Via Photoshop* 

True love is above the differences caused by caste, creed and colour. It also defies differences caused by age and nationality. That’s how real love operates in real world by rising above such vain concerns. Using the same passion and virtues, even the wrong souls also claim to be in real love in real world. However, it’s faking at its best, wherein superficial sentiments, false vows get exchanged. If that’s how true and lesser lover exists in real world, the situation is not much different in virtual world. Love in its real and wrong shades/forms also exists in online world too. On Facebook an aged person, using a fake profile, having the picture of a celebrity as profile picture, can easily dupe a teenager girl and strike an unholy alliance. In the same fashion, a worn out over-aged women can play the same trick. One of the recent surveys showed that number of fake profiles on Facebook is quite large.  So it’s pretty difficult to ascertain the genuineness of an individual on Facebook against such a scenario, wherein Photoshop allows a fat lady to have hourglass shape of Julia Roberts quite easily! 

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Well, these various aspects prevailing on Facebook ascertain that just like the real world, the virtual world is also comprised of good and evil. The precautions we take in real world to separate good from bad are also to be taken in virtual world. However, that’s not something what I wish to communicate. The real motive as I talk about making distinction between good and bad is to highlight the pain suffered by the real soul as we come to ensure that difference. The agony and humiliation faced by good souls in the process to ensure that bad gets truly marginalized always takes it toll on sensitive souls. The struggle between good and wrong people shall never stop in this world but it is not high time that good souls be prevented from being sacrificial lambs in this deadly drama? Have good souls appeared in this world merely to act as sacrificial lambs for attainment of insignificant causes powered by distorted minds? It’s time to think about it quite seriously so that good souls come to serve better cause rather than turning into sacrificial lambs.    

For Mine Eyes  Real Julia Roberts Is More Genuine Than Beauties Impersonating As Julia Roberts  Via Photoshop :-)

For Mine Eyes Real Julia Roberts Is More Genuine Than Beauties Impersonating As Julia Roberts Via Photoshop 🙂

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फेसबुक वाला इश्क: इसको बौड़मपने का माध्यम ना बनाये !!

फेसबुक: क्यों नहीं हम किसी माध्यम का सही  इस्तेमाल करते कभी?

फेसबुक: क्यों नहीं हम किसी माध्यम का सही इस्तेमाल करते कभी?

अलबर्ट आइंस्टाईन की तमन्ना थी कि एक ऐसा जहां हम बनाएं जहाँ मानवीय दुर्गुण न पहुच सके। जो इसके प्रभाव से परे हो। लेकिन शायद ये बहुत ही आदर्श स्थिति है जिसकी परिकल्पना तो ठीक है इसको असल जिंदगी में रूपांतरित करना शायद संभव नहीं। इसको फेसबुक पर व्याप्त नौटंकी से समझे।  इस  पहले ये देखे कि इस दुनिया में देखिये क्या हो रहा है। कोई भी अच्छा आदमी हो। उसके बारे में इतने सारे भ्रम फैला देंगे कि और तो और वो आदमी खुद भी भ्रमित हो जाएगा कि उसका असल चरित्र क्या है। ये दुनिया के लोग प्रमोट तो नहीं करेंगे पर हा सामूहिक रूप से मिलकर उसके इज्ज़त का चीरहरण जरूर कर देंगे। और ऐसे ही लोग किसी भी संस्था, फोरम को गिराने के पीछे भी होते। और ऐसा नहीं कि ये बिना दिमाग वाले लोग है। इनके पास बहुत दिमाग है लेकिन जैसे कि होता है कि भारी भरकम ओहदे और ऊंची डिग्री वालो के पास सिर्फ अहम होता है सो ये ना जिंदगी जी पाते है और ना ही किसी भी फ़ोरम की आदर्श स्थिति को ये बरकरार रहने देते है। मटियामेट करना ही इनको आता है, सब अच्छे खूबसूरत चेहरों और गतिविधियों को इनको सिर्फ विकृत करना ही आता है। हर साधारण चीज़ को ये जटिल बना देते है जिसको सुलझाने की तमीज इनके पास नहीं होती। आइये फेसबुक के माध्यम से समझे। लोग मानते है कि ऑनलाइन जगत सच्ची दुनिया से अलग है। बिलकुल अलग नहीं है। बल्कि ये आपके ही गुणों अवगुणों का आइना है। आप माने ये ना माने ये अलग बात है।

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                                  *फेसबुक स्टेटस की महिमा* 

मेरे एक मित्र है। थोडा बीमार पड़ गए है। पता नहीं किन ग्रह नक्षत्रो के चलते इसका उल्लेख फेसबुक पर कर दिया। कर दिया सो कर दिया पर देखता हूँ कि कई बुडबक उस स्टेटस को लाइक करके निकल गए है। इसी बेहायी के चलते फेसबुक का स्टेटस लोग गिरा रहे है। जब दिमाग का इतना वाहियात इस्तेमाल फेसबुक पर कर रहे है तो मन डरता है ये सोचकर कि असल जिंदगी में ये कितने सुलझे हुएँ होंगे। किसी भी अच्छे प्लेटफार्म/ फोरम का ऐसे लोग ही स्तर गिराने के पीछे होते है।ये तो अच्छा हुआ एक पुरुष मित्र बीमार पड़ा। स्त्री जात का स्टेटस होता तो और नौटंकी होती। लाइक्स कही अधिक होती। ठीक होने की शुभकामनाएं भी अधिक होती।

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                               *फेसबुक पर तर्कों का औचित्य* 

कानून का विद्यार्थी रहा हूँ इसलिए आर्ग्यूमेंट्स का महत्त्व औरो से बेहतर समझता हूँ लेकिन होता ये है कि जहा भेड़िया धसान सरीखा माहौल हो, कोई बुडबक कुछ भी बक सकता है वहा क्या तर्क करे और क्यों करे। खैर कुल मिला के बात सिर्फ है कि अपनी बात कहने का हौसला रखे कैसा भी माहौल हो जब तक आत्मा गंवारा करे खासकर तब जब बोलना ख़ामोशी से बेहतर हो। और उसके बाद ख़ामोशी से कट ले। हम तो यही करते है। आप का मै कह नहीं सकता।

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                                            *कैसे कैसे ग्रुप्स*  

ना जाने किन वाहियात लोगो ने कैसे कैसे ग्रुप बना रखे है और बिना अनुमति लोगो को जोड़ते घटातें रहते है। इसमें एक सनकी मॉडरेटर रहता है। जिसको ना जोड़ने की तमीज है और ना ही ग्रुप की गतिविधियों को मानिटर करने की  तमीज। कहने को ये खुले दिमाग का होता है पर ये किसी के आधीन होकर एक ख़ास तरीकें ही की बात को प्रमोट करता है। तो जब कोई गतिविधि ना हो। और एक ख़ास दिमाग-गलत दिमाग- जब आपकी सारी बातो का अनर्थ कर डाले तो ग्रुप्स का औचित्य क्या है?

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                                 *फेसबुक वाला इश्क़ एंड फोटोशाप* 

इश्क़ जात पाँत  का भेद नहीं देखता। उम्र का फासला भी नहीं देखता। असल जिन्दगी में इश्क के इस फ़लसफ़े का सही रूप भी देखने को मिलता है और गलत रूप भी देखने को मिलता है। फेसबुक का यही हाल है। यहाँ भी यही फ़लसफा विद्यमान है अपने सही गलत प्रकार में। सो तो फेसबुक पर भी लोग असली नकली चेहरो के साथ विद्यमान है। किस चेहरे के पीछे कौन है ये आप ठीक ठीक नहीं बता सकते है। कोई थुलथुल महिला भी जूलिया रोबर्ट्स सा फिगर पा सकती है फोटोशाप के जरिये और फील गुड कर सकती है और करा सकती है। एक अधेड़ उम्र का गया गुजरा व्यक्ति भी शाहरुख खान की तस्वीर लगा कर कुछ भी एहसास करा सकता है। जाहिर है कम उम्र की लौंडिया ही पटायेगा बकवास बात करने के लिए। अब इस तरह तो वो गहरा इश्क वाला लव करने से रहा।

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शायद असल जिंदगी की तरह ये आभासी जगत भी अच्छे बुरे लोगो से भरा है।  जो सावधानी आप असल जिंदगी में बरतते है वो ऑनलाइन में भी बरतते है। लेकिन मुद्दा ये नहीं है। सावधानी बरतने वाला। तकलीफ ये है कि इस नौटंकी मतलब अच्छे बुरे के फर्क में भेद करने के उपक्रम के चलते अच्छे लोगो का जो प्रताड़ना झेलनी पड़ती है उसकी भरपाई कोई नहीं कर सकता। अच्छे बुरे के बीच  संघर्ष तो हमेशा ही चलता आया है और चलता रहेगा। ये कब रुका है। लेकिन अच्छे लोगो की बलि देने का सिलसिला इस संघर्ष के चलते कभी रुकेगा कि नहीं। क्या अच्छे लोग सिर्फ बेवजह बलि चढ़ने के लिए दुनिया में आते है? बताएं कोई?

 

फील गुड करने के लिए ये असल जूलिया रोबर्ट्स की असल सौम्यता ही काफी है। ये फोटोशाप वाली माया की क्या जरूरत है?

फील गुड करने के लिए ये असल जूलिया रोबर्ट्स की असल सौम्यता ही काफी है। ये फोटोशाप वाली माया की क्या जरूरत है?

 

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Online Love Vs Real Life Love! A Contrast.

Online Love: For real person it is as real as real life love!

Online Love: For real person it is as real as real life love!

The point is that the wrong person shall always deceive whether it’s online world or real world. It cannot be that in online world you remain honest and in real life you are almost different- unethical and immoral. So love, whether in online world or real world, is real all the time. It has same effect in virtual world which it has in real world. Those who see the effects as different have either not loved at all or are the ones who have been bitterly deceived in online world. That’s why they have lost faith in online lovers!!

As far as I am concerned all I see whether the love is true, deep and real or not. Whether it happens in online world or virtual world, there is hardly any noticeable difference. A person with wrong set of values shall deceive both in real world and in virtual world. On the contrary, a real person shall remain real both in virtual and real world in matters pertaining to love or anything else. In lighter vein love is, at least, disease free in online world! It’s safer.   

Bottom line: For True person both online and real world are equally beneficial. For wrong person both the worlds-online/real- are playground of devil.

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Hindi Version:

होशवालो को खबर क्या ….…!!!! मनई चालू पटरी पर बैलगाड़ी/स्कूटर/फटफटिया लेकर जान की बाज़ी लगाते हुए निकल जाते है. सो इहाँ तो प्रेम की बात हो रही है. वैसे जो गहरा प्रेम करते है उन्हें पता है कि प्रेम कैसे भी हो प्रेम ही रहता है. क्या असल जीवन में प्रेम धोखा धडी, आग लगावन तत्वों से नहीं भरा रहता. सो ऑनलाइन प्रेम के लिए ही क्यों मूल्य अलग है? जो धोखा असल जीवन में देगा वो ऑनलाइन में भी देगा. और जो रस ऑनलाइन में है वो ही वास्तविक जीवन में भी है. कोई फर्क नहीं एक सही आदमी के लिए. सतही आदमी/स्त्री के लिए ऑनलाइन जगत भी घटिया है और वास्तविक जीवन भी घटिया है। कम से ऑनलाइन प्रेम हेल्थी है रोग मुक्त भी है.

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A song from the period when love songs were not all about hot bed scenes, hot kissing. A song from movie of Mahesh Bhatt, whose films not only have off-beat themes, but even the song picturization is so aesthetic and appealing.

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Pic One

वैलेंटाइन डे: लो आया मौसम प्यार के बिक्री का!

क्या प्रेम आज भी इतना ही मासूम है इस फूल की तरह?

क्या प्रेम आज भी इतना ही मासूम है इस फूल की तरह?

कल तथाकथित प्यार करने वालो का परम पुनीत दिवस है। कुछ कहने की जरूरत नहीं है कि फर्जी इमोशंस के साथ बहुत सारे गुलाबो का आदान प्रदान होगा। गुलाब का तो पता नहीं पर वो अगर समझदार लड़की होगी तो उसका काम तो लह गया क्योकि गुलाब तो मुरझा जायेंगे, चाकलेट उदर में समा जायेंगे लेकिन गिफ्ट हो सकता है अगले साल भी किसी और को देने में काम आ सकते है। क्योकि एक साल में बहुत से इस साल वैलेंटाइन डे मनाने वालो लड़कियों के बॉयफ्रेंड इनके द्वारा ऐक्स्ड (axed ) कर देने के कारण एक्स-बॉयफ्रेंड हो जाते है। एक्स- गर्लफ्रेंड भी अस्तित्व में आ जाती है। खैर ये सब पुराने प्रेमी नहीं कि जाके किसी सॉलिड रॉक के ऊपर कोई दुखांत सा गीत गाये। इतने संवेदनशील नहीं कि शोक मनाये। कुछ एक जो थोड़े दुखी होंगे वो जरूर सॉलिड रॉक कुक्कुर धुन में रचे गीत जैसे” जो भी मै कहना चाहू बर्बाद करे अल्फाज़ मेरे को गाने या सुनने के बाद “तू नहीं सही कोई और सही” को चरितार्थ करते हुएँ किसी नए के दामन से लिपट जायेंगें। अब कितने सारे आप्शन माने विकल्प  “जोड़ी ब्रेकर” के रूप में भटक रह होते है। वो तो पुराने प्रेमी थे जो बेचारे कितने साल महीने आंसू टपकाते थें प्यार की आग में तन बदन जल गया” गाते थें। अब तो आप इतने व्यापक विकल्पों वाले है कि मौका मिले तो “मेरे ब्रदर की दुल्हन” भी आपकी हो सकती है।

बाज़ार में देख रहा हूँ कि भोजपुरी गीतों के रोमांटिक एल्बम भी बहुत सारे आ गए है जिसके ऊपर “लभ” वाले चिन्ह बने हुएं है। मतलब प्यार का व्यापार ग्रामीण संस्कृति में गहनता से व्याप्त हो गया है। अहसास तो यही होता है। वर्ना ये अजंता-एलोरा की आधुनिक संस्करण तो भोजपुरी वाले “लभ” में इंटरेस्ट दिखाने से  रही। जितनी तेज़ी से भारत ग्लोबल हुआ उतनी तेज़ी से लव का ग्राफ भी बढ़ा ये तय है। दोनों में समानुपाती रिश्ता सा लगता है। खैर एक चीज़ ये है कि इंडिया ने अब इतनी फ्रीडम जरूर दी है कि अगर इतने सारे आप्शनस लॉन्ग टर्म, शार्ट टर्म, लिव-इन के बावजूद भी आप अगर अकेले रह गए तो आप अपने सेक्स के साथ भी लव कर सकते है। इससे आप का कॉन्फिडेंस लेवल तो बढेगा ही और साथ में आप सब पे धौंस जमा सकते है प्रोग्रेसिव बन कर। कम से कम लोगो को अपने अनुभव से उत्पन्न प्रोग्रेसिव लेक्चर तो झाड़ ही सकते है। थोडा अच्छा लिख लेते हो तो क्या पता आप एक दो नोवेल भी लिख दे और पुरस्कार वगैरह मिल गया, जो ऐसे थीम पे अन्तराष्ट्रीय या राष्ट्रीय जगत में कुछ न कुछ मिलना तय ही है, तो युवा वर्ग की नब्ज़ पकड़ने वाले तमगो सहित आप की लेखक के रूप में उभार तय है। 

वैलेंटाइन डे के ठीक एक दिन के बाद भट्ट कैम्प की मर्डर थ्री रिलीज़ हो रही है। ये सीरिज मैंने नहीं देखी है और ना मै चाहता हूँ कि इस सीरिज की कोई फ़िल्म देखने का सौभाग्य कभी भविष्य में बने लेकिन इस नयी फ़िल्म के पोस्टर में लिखी पंच लाइन आज के लव की हकीकत बयान कर देती है। लिखा है कि आप अपने प्रेमी को कितना जानते है? मतलब साफ़ है कि अगर आप सचेत नहीं है तो लव के बाद धोखा अवश्य है। वैसे अच्छा है वैलेंटाइन डे के ठीक एक दिन के बाद ही बहुत सारे नए नए प्रेमी भूतपूर्व प्रेमी हो जायेंगे। एक्सपीरियंस बढेगा युवाओं का। कैसी संस्कृति है कि वफ़ा की सोच भी रखना जुर्म से कम नहीं। सब में मिलावट, सब में खोट है चाइनीज़ माल की तरह। कब फुस्स हो जाए पता नहीं। एक युग था कि सरल और सीधा होना सम्मानजनक था। आज आप के नाकाबिलियत का परिचायक है। आप के विरुद्ध निकम्मेपन का तमगा है। शातिर दिमाग होना ही बुद्धिमानी बन गया है। खैर ये लव करने वाले प्रेमी उगते रहे, पनपते रहे। लेकिन चूँकि गाँव में “लभ” पाँव पसार चूका है इसलिए सरकार को जैसे शहर में लव के डाक्टर माने साइकोलोजिस्टस है जो प्यार के साइड इफेक्ट्स डिप्रेशन या टीनेज प्रेगनेंसी के केसेस को देखते है ऐसे कुछ डाक्टरों को ग्रामीण क्षेत्रो में नियुक्त किये जाए। ताकि कम से कम प्रेम के बाद जो शॉक्स झेंले पड़े उनका निदान वैज्ञानिक तरीके से हो। खैर मेरी तरफ से सब प्रेमी जनों को शुभकामनायें। 

मेरे अन्दर तो साहिर की यही पंक्तियाँ उभर रही है:

हर चीज़ ज़माने की जहाँ पर थी वहीं है,
एक तू ही नहीं है

नज़रें भी वही और नज़ारे भी वही हैं
ख़ामोश फ़ज़ाओं के इशारे भी वही हैं
कहने को तो सब कुछ है, मगर कुछ भी नहीं है

हर अश्क में खोई हुई ख़ुशियों की झलक है
हर साँस में बीती हुई घड़ियों की कसक है
तू चाहे कहीं भी हो, तेरा दर्द यहीं है

हसरत नहीं, अरमान नहीं, आस नहीं है
यादों के सिवा कुछ भी मेरे पास नहीं है
यादें भी रहें या न रहें किसको यक़ीं है

 

प्रेम का एक एक स्वरूप ये भी है!

प्रेम का एक स्वरूप ये भी है!


Reference:

Kavita Kosh

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I AM NOT AFRAID OF LABELS: TRUTH IS MORE IMPORTANT THAN LABELS!

One should not be afraid of labels while pursuing  truth!

One should not be afraid of labels while pursuing truth!

The righteous have always been labelled as this or that. I have never worried about labels; crossed that stage when one is afraid of labels. To feel something terribly and yet not speak out that clearly is some sort of intellectual dishonesty. That’s not my attitude. I respect and admire women a lot but that does not mean I come to overlook the dangerous trend patterns associated with them. We have to warn them in advance, irrespective of the consequences, or else there is no point in shedding tears when something goes wrong because of the same flaws/tendencies. It’s another thing that we react only when the water starts flowing above the danger mark. And neither I wish to shed tears like these misguided souls nor I wish to identify myself with them. That’s why I aggressively protest, right from the nascent stage of crisis. At least, that’s in my hand.  It’s fine if you come to support me. If not, I will still aggressively protest all alone. Let them label me as they want.

Sometimes we need to look at things from human angle, from a sensitive mind. The crude thing is that we over intellectualize everything. That’s the problem with the radical feminists advocating the rights of women. Now the women have their so-called rights but they forgot the art to have a natural and intimate relationship with man. That’s why I find simple man and woman enjoying life more than these men and women living complex lives, living dual lives, in the name of personal rights.

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P.S.: These words I shared with my close friend Ghanshyam Dasji, Medical Practitioner in United Arab Emirates, on a social networking site.

Be Simple To Be Truly Intimate

Be Simple To Be Truly Intimate

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Yash Chopra: A Filmmaker In Love With Illicit Relationships And Flawed Romance

Yash Chopra: The Filmmaker Interested In Flawed Romance

Yash Chopra: The Filmmaker Interested In Flawed Romance


I have never been die hard fan of Yash Chopra’s movies. His romantic angles mired in illicit relationship always left me appalled. He was a noted filmmaker having Midas touch for conceiving interesting themes, hinging around three people in one single relationship, either due to providence or chance. His penchant for such complex relationships, on par with illicit love affairs, could be gauged from the fact that barring his early years of film making when he made gems like Waqt, Dharamputra, Ittefaq, Mashaal, Trishul, Deewar and Kala Patthar, nearly all his movies in later years depicted adultery in one or other form. It can be safely opined that his movies, both explicitly and implicitly, promoted illegal relationships. That’s pretty unfortunate as filmmaker of his caliber should have been more sensible in application of his mind.

He had the brilliant ability to present romance with all its elements in grand style. The grandeur and colourful imagery noticeable in his movies takes away our breath. It’s true that average cine-goer likes to flirt with unfulfilled dreams and wishes as he/she enters inside the theater, and tries to dissolve the harsh realities in the silken world appearing and disappearing on the silver screen. Any average filmmaker is not very much interested in exposing his viewers to shades of realism. Yash Chopra understood this well and so in his movies we have characters, borrowed straight from Mills and Boon novels, flirting with  their ladies against scenic backdrop. No wonder Swiss government honoured Yash Chopra for promoting tourism in Switzerland!

To make his romance stories gain some substance, he was but compelled to fall in the arms of “illicit relationship” so as to provide some shock value to his films. However, he lacked the ability to seriously contemplate over any issue, which demanded deep attention, but in the same genre  his brother B R Chopra exhibited the art of serious presentation in an effortless manner. That’s why B R Chopra’s “Gumrah”, having adultery as central theme, depicted the conflict emanating out of such relationship quite well. Yash Chopra’s movies based on the same plot stand nowhere to pathos exhibited in Gumrah. Yash was more governed by the desire to emerge as a successful director in the genre of popular cinema despite being person of immense capabilities. He was a pure entertainer, who used “arrival of third person” as perfect masala element to make his movies mint money. That’s why we cannot contrast him with likes of Raj Kapoor. He failed to attain the stature of Raj Kapoor, who was also governed by the desire to emerge as great entertainer but with a difference: Raj’s sensitivity always managed to find a suitable cause, which under his brilliant directorial treatment ripped apart our emotions. In fact, lot is said about depiction of grandeur/ style in his movies but Gulshan Rai and Feroz Khan stand miles ahead of him even in this department.

Now  That's  Called   Candyfloss Romance!

Now That’s Called Candyfloss Romance!

Let’s take into cognizance “illicit relationship” – a dominant feature of his movies. He should not have roped in this angle unless he  had enough reasons to substantiate his viewpoint. For instance, let’s take “Darr” promoted as a violent love story. What was Yash Chopra trying to demonstrate? That Sunny Deol (husband) has to be equally cunning, powerful and mad like Shah Rukh Khan (lover) to save his wife from the shrewd moves. The greatest irony is that evil gets checkmated by good doesn’t sound convincing in the end when evil enjoys the upper hand, dancing with some else’s beloved for most of the time. One of the salient features of movies made by Yash Raj Films has been that one has to be shrewd and street smart to emerge as a winner. Idealism is of little use in world dominated by market-oriented world, wherein end justifies the means. That’s the guiding principle of protagonists appearing in “Trishul” and “Deewar”. Aditya Chopra’s “Dilwale Dulhania Le Jayenge”  highlights the same trait. The protagonist even as he is reluctant to run away with his beloved, enters into ridiculousness and pathetic gestures to woo his would be wife. The success of this movie is remark on the declining standards of a viewer’s approach towards cinema.

That’s the aberration which marred the movies churned out by Yash Raj Films. The movies having candyfloss flavour, embedded in synthetic sentiments, depicted a section of society, which barely depicted the real face of India. For instance, Salaam Namaste was entirely shot in Australia, talked about reunion of two lovers, caught in problems born out of “laid-back lifestyle”. Hum Tum, Mohabbatein, Dil To Pagal Hai and etc. turned out be old wine in new bottle. Even patriotic perceptions were effectively used in  “Chak De India” to keep the cash box ringing. The point is that Yash Chopra and his successors have realized this pretty well that market forces and not the theme of the movie, which ensures success or failure. The global world, which made the boundaries meaningless, opened new markets, and, therefore, themes also got focused on people who sustained these markets. Both Bollywood and Hollywood rely on stereotyped emotions to make their movies emerge as blockbuster. So scenic landscape, stunning faces, big cars and pulsating music became the essential ingredients of romantic movies be its made by Yash Chopra or anyone else from Hollywood.

Some might find it unpalatable, and unbearable as well, to treat his movies as promoter of illegal relationships. However, it’s not a misplaced belief when one becomes aware of the fact that  cinema, life and society are intimately linked to each other. Chandni, Dhool Ka Phool,  Kabhi Kabhi, Silsila, Doosra Aadmi, Darr, Faasle, Lamhe, Daag, Aaina, Yeh Dillagi and Mere Brother Ki Dulhan to name a few, more or less, had controversial themes, wherein secret lover or illicit relationship added a complex twist to the story line. It’s a cliche to state that cinema borrows its concept from society. The ultimate truth is that it borrows the clues from society, exaggerates them, turning them into saleable scripts and, in the process, creates scope for more distorted themes. In a combined  research conducted by the ” American Medical Association, the American Psychological Association, the American Academy of Pediatrics, the American Academy of Child and Adolescent Psychiatry and the National Institute of Mental Health” to establish the negative impact of movies on youths in USA, it was clearly established that “just as every cigarette increases the chance that someday you will get lung cancer, every exposure to violence increases the chances that some day a child will behave more violently than they otherwise would.”

 The point is when you are genuinely depicting the harsh realities of life, be it centered on illegal relationship, it adds a new dimension in your understanding but when you use such themes to carve unrealistic presentation, merely to ensure commercial success, it’s altogether a different story. Yash Chopra was more conscious of commercial success then ensuring a perfect  treatment to a substantial story line. Ironically, Mahesh Bhatt  also used illicit relationship as effective plot but he ensured that he remained close to the real life. Anyway, Yash Chopra makes me realize that  attaining success is different thing than doing good work which makes difference in lives of people. He got success by promoting flawed romance, which served no greater cause other than ensuring flow of money.

Illicit Relationship Looked More Charming In His Movies

Illicit Relationship Looked More Charming In His Movies


Reference:

New York Times

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यश चोपड़ा: अवैध सम्बन्धो को प्रमोट करती इनकी भव्यतापूर्ण सफल रोमांटिक फिल्मे

यश चोपड़ा: गलत "लम्हों" के सौदागर

यश चोपड़ा: गलत “लम्हों” के सौदागर


यश चोपड़ा की फिल्मे मुझे कभी न रास आई।इनको रोमांटिक फिल्मो का बेताज बादशाह माना जाता रहा है। रूमानियत को एक सुनहरे कैनवास पर पूरे  तामझाम के साथ उतारना इन्हें खूब आता था।ये सही है कि एक औसत दर्शक सिनेमा में असल जीवन की छाप देखने नहीं जाता बल्कि अपने अधूरे सपनो को परदे पे अवतरित होते हुए देखने जैसा अनुभव बटोरने के लिए जाता है। और  दर्शको  की इसी कमजोरी को यश चोपड़ा ने अच्छी  तरह समझा और उसकी शानदार प्रस्तुति की। लेकिन मुझे  लगता है यही पे यश चोपड़ा मात खा गये। इतना समर्थ फ़िल्ममेकर सिर्फ दर्शको की चाह पूरी करने के लिए और वक़्त के साथ चलने की धुन में बेहतरीन सिनेमा  बनाने से रह  गया। यश चोपड़ा की कुछ एक फिल्मे  जैसे वक़्त, धर्मपुत्र, इत्तेफ़ाक, त्रिशूल, दीवार, काला  पत्थर, मशाल और एक दो कुछ और फिल्मे छोड़ दे तो उनके सारी फिल्मे प्रेम त्रिकोण या कुछ कुछ अवैध संबंधो जैसे टाइप की थीम पर बनी है। मै यश चोपड़ा के इसी “तीसरा कौन” रूख पर आलोचनात्मक दृष्टि  डालना चाहूँगा। “इत्तेफाक ” भी लगभग अवैध संबंधो  पर है लेकिन मै इसको एक सुंदर मर्डर मिस्ट्री मानता हूँ। राजेश खन्ना ने जितने शेड्स इस फ़िल्म में दिखायें है सहज रूप से मुझे नहीं लगता कि आगे की फिल्मो में वे वैसा कर पाए। यहाँ तक कि नंदा ने भी नई ऊँचाइयों को छुआ जो कि ज्यादातर ग्लैमरस  गर्ल ही रही है।

अब आते है “तीसरा कौन” के थीम पर। मुझे ये एंगल ही बहुत घिनौना लगता है फिर इस पर बनी फिल्मे देखना और इनसे उभरी सोच को आत्मसात करना  तो मेरे लिए बहुत दुष्कर कार्य है। खेद की बात है यश चोपड़ा ने ऐसी विकृत एंगल को बढ़ावा दिया। इस प्रोडक्शन हाउस में बनी फिल्मे अधिकतर कही न कही विकृति को ग्लोरिफाय करती मिलेंगी। बात ये है कि यश चोपड़ा के पास  किसी मुद्दे की गंभीर समझ नहीं थी जैसी बी आर चोपड़ा के पास थी। इसलिए बी आर  चोपड़ा की एक अकेली “गुमराह”  यश चोपड़ा की इसी विषय पर बनी दर्जनों बेकार फिल्मो से बेहतर है। यशजी के पास  संवेदनशीलता का अभाव था  इसीलिए राज कपूर से बहुत पीछे रह गए। भला हो साहिर साहब का कि इनके फिल्मो के लिए इतने दिल को छु लेने वाले गीत लिख गए। इनके फ़िल्म में स्टाईल का बड़ा बोलबाला था पर यहाँ भी ये फिरोज़ खान ने हमको ये बेहतर सिखाया कि स्टाईल एलिमेन्ट का कैसे इस्तेमाल करना चाहिए। यश साहब के पास बस दर्शको को बांधे रखने की कला थी भव्यता और मधुर संगीत का आवरण ओढे बेकार सी विषयवस्तु वाली थीम के साथ। 

ये कहना गलत नहीं होगा कि अवैध संबंधो को जस्टिफाय और ग्लोरिफाय या विकृति को बढ़ावा देने में इस प्रोडक्शन हाउस की फिल्मे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार है।आप नब्बे के दशक में आई “डर” देखिये। दर्शको को इससें कुछ लेना देना नहीं था कि अंत में सनी दयोल शाहरुख के किरदार पर फाईट सीन में हावी होकर उभरता है। इस फ़िल्म का सन्देश वस्तुत: इस बात को हाईलाइट करता था कि किसी भी सभ्य औरत के ज़िन्दगी में घुस कर उसे परेशान कर सकते है। अब आप सनी दयोल बन कर रोक सकते है तो रोकिये नहीं तो आपका घर तबाह। और बिडम्बना देखिये कि इस विकृति सम्पन्न हीरो को कितना रोमांटिक दिखाया गया है। तो ये थी यश साहब की काबिलियत। आगे यश साहब ने फिल्मे तो नहीं डाइरेक्ट की लेकिन आदित्य चोपड़ा और अन्य नए निर्देशकों ने इनके बैनर तले फूहड़ पर कामयाब फिल्मे बनायी। “दिल वाले दुल्हनिया ले जायेंगे” की अपार सफलता इस बात का प्रमाण है कि दर्शको को घटिया फिल्मो में भी मायने ढूँढने का चस्का लग चुका था। रास्ते कितने भी घटिया हो  पर अगर वो मंजिल तक पहुचाते है तो ठीक है। एक आदर्शवादी बाप को चालाक और धूर्त नायक के आगे झुकना पड़ सकता है और कमाल है ये सब उसने प्रेम के लिए किया, ये इसलिए किया कि  भगाना  उसे पसंद नहीं था और इसलिए झूठ बोलकर घर में नौटंकी करना जरूरी  था। दर्शको का टेस्ट और स्तर कितना गिर गया है वो हमे इन फिल्मो की सफलता से पता चलता  है।

रास्ते अपवाद स्वरूप गलत हो सकते है लेकिन सिर्फ धूर्तता और मक्कारी से कामयाबी सुनिश्चित होती अगर लोगो ने इस बात को स्वीकार कर लिया है तो निश्चित ही भारतीय समाज पतन के रास्ते पर है। भारतीय समाज इस बात को समझे या न समझे लेकिन इस प्रोडक्शन हाउस ने समय की नब्ज को पकड़ा कि अब मार्केट से फिल्मो का सीधा कनेक्शन है मूल्य या आदर्श गए तेल लेने। इसलिए इस बैनर ने तमाम बौड़म फिल्मे बनायीं ओवरसीज मार्केट को ध्यान में रखकर जैसे “हम तुम” , “सलाम नमस्ते”, तथाकथित राष्ट्रीयता का तड़का लिए “चक दे  इंडिया” इत्यादि। कुल मिला के भव्यता और दर्शकोको बांधे रखने की कला ने ऐसी फिल्मो को जन्म दिया जिनका यथार्थ से कुछ लेना देना नहीं। इनकी फिल्मे उस क्लास के लिए ज्यादा थी जिनके दिमाग  में लगभग भूसा भरा हो और साथ में पेट से भी टंच हो। इनकी बाद की फिल्मो का सामजिक मूल्य कुछ नहीं सिर्फ आत्मकेंद्रित किरदारों का ये बताना कि “बैटल फॉर सर्वाइवल” में धूर्तता और मक्कारी बहुत जरूरी है। हो सकता है “तीसरा कौन” आपके जीवन का थीम बन जाए पर इस दर्द को जिस जेन्युइन  दर्द और एहसास के साथ आप महेश भट्ट की फिल्मो या अन्य कला फिल्मो के निर्देशकों में  पाते है उनसे शायद यश साहब की  फिल्मे कोसो दूर थी। और साथ में दूर थे यश साहब के फिल्मो के शौक़ीन दर्शक वर्ग जो दूर तक सोचने को गुनाह  मानते थे। चलते चलते सिर्फ मै ये कहूँगा कि यश चोपड़ा एक कामयाब फ़िल्म निर्देशक थें पर अच्छे नहीं। यश साहब को देखकर ये समझ  में आता है कि कामयाब होना मतलब अच्छा ही हो ऐसा नहीं होता।  

 घृणा, लहू, और नौटंकी में डूबा रोमांस

घृणा, लहू, और नौटंकी में डूबा रोमांस

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Words For Soulmate, For Moon Dipped In Tears

Do Not Shed  Tears, My Beloved!

Do Not Shed Tears, My Beloved!

Tragedies often catch people off guard. The icy hands of death take you in its grip when you are still busy chasing affairs of life  treating them as real. For past few days, my computer’s screen was bombarded with dark images dealing with death. That’s because I was reading material associated with war crimes. I waded though gory tales of unsung people lying buried in unknown cemeteries. However, it never occurred to me that I would have to deal with death in real life after few hours. After spending  few hours in  mind boggling  research, I sought some moments in isolation. However, the news of death of someone, close to my heart, filled me with pain. I had never met him in real life but impact of his passing away left me shell-shocked.

There is no point in bereaving, for you had served him so well my soulmate! His death should be a matter of celebration for you- a cherished culmination of  your sincere efforts. Death of loved ones should come as a tragedy to those, who failed in their duties towards them.  It should sadden those, who never themselves turned into towering figures of inspiration by their good  deeds, and thus,  did not  provide moments of glory to their near and dear ones. And I know quite well, how you sincerely served him even as you struggled hard to fulfill your routine obligations with your body in grip of so many life threatening diseases. I never saw you missing  single opportunity to serve him in nights when your body demanded sleep after having worked a long hard day at the office. So your tears are an insult to great efforts you made in past to provide him comforts at cost of your well being.

Do I need to say more to my soulmate flirting with tears? No. Not at all. This might be suffice that the said person needed better clothes to serve the mission of higher forces. He has not died but merely changed the role. Good people never die. They remain in our  hearts and minds as most cherished memories. Close your eyes, my beloved, and you would find him smiling in your mind’s landscape. So do not shed tears in vain. Look at myself. I am lost in all smiles, for having met such a wonderful lady like you in world chased by deception and crooks. I am sure when I would leave this world, I would have no regrets. After all,  I came to share the road of life with such exceptional souls like you-the ones who knew how to truly love and care.  


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