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बीबीसी की भ्रामक और खतरनाक रिपोर्टिंग से बच के रहे भारतीय!!

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(नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता ने विदेशी मीडिया को अचंभित कर दिया है!! इस कदर कि वे दुराग्रही हो चले है!! )

बीबीसी और वौइस् ऑफ़ अमेरिका भारत के समाचार प्रेमी लोगो के बीच अच्छी घुसपैठ रखते है. इनको पारदर्शिता के लिहाज़ से बहुत उच्च कोटि की रिपोर्टिंग का दर्जा  हासिल है. लेकिन अगर इनकी रिपोर्टिंग को ध्यान से देखा जाए तो आप पाएंगे ये सबसे ज्यादा पक्षपाती और द्वेषपूर्ण खबरे प्रकाशित करते है. इनकी मंशा सिर्फ खबर प्रकाशित करने भर की ही नहीं  रहती वरन इन खबरों के जरिये एक ख़ास प्रकार का माहौल बनाने की रहती है जिससे पाठको के बीच भ्रम और घृणा की उत्पत्ति हो. ये सारे समाचार के श्रोत अभी भी पुरानी  ब्रिटिश नीति का अनुसरण करते है कि फूट डालो और राज करो!!

इसका अनुभव मुझे एक बार फिर एंड्रू व्हाइटहेड की इस खबर  “Why Indians abroad succumb to ‘Modimania’ पढ़ने के पश्चात हुआ. एंड्रू व्हाइटहेड बीबीसी के भारत में पूर्व संवाददाता रहे है. खबर की शीर्षक देखिये ये बताता  कि विदेशो में रहने वाले भारतीयों का मोदी प्रेम एक मेनिया है ( पागलपन है )!! इसका अर्थ ये हुआ कि जो भारतीय अपने नेता के प्रति वे प्रेम दर्शा रहे है वो प्रेम का विकृत रूप है, शुद्ध प्रेम नहीं है!! ये खबर वेम्ब्ले, ग्रेट ब्रिटेन, में नरेंद्र मोदी  आगमन से ठीक कुछ समय पहले प्रकाशित हुई थी. इस आगमन को लेकर जो वहा के भारतीयों में उत्साह था और जिस  संख्या में भारतीय वहा इकट्ठा हुए, लगभग साठ हज़ार लोग, उसने ब्रिटिश नेताओ और वहा के मीडिया में एक हलचल मचा दी. हाल के वर्षो में इसके पहले किसी विदेशी नेता के आगमन पर इतनी संख्या में लोग उपस्थित नहीं हुए थे कि आयोजको को भी टिकट के लाले पड़ जाए!!

एंड्रू व्हाइटहेड का लेख उन कारणों की पड़ताल कर रहा था जिसकी वजह से विदेशो में इतनी संख्या में भारतीय लोग नरेन्द्र मोदी की सभा में उपस्थित होते है. जरा देखिये तो कितनी गन्दी नीयत से इसने कारणों की खोज खबर ली है. ये बड़े बड़े संस्थानों में ऊँची फीस देकर इस तरह के संवाददाता या प्रोफेसर्स इस तरह की ओछी मानसिकता का परिचय देते है. इस बौद्धिक धूर्तता के क्या मायने निकाले जाए? एंड्रू व्हाइटहेड का यूनिवर्सिटी ऑफ़ नाटिंघम और क्वीन मैरी, यूनिवर्सिटी ऑफ़ लंदन से भी सम्बन्ध है पर इन्होने विश्लेषण कितने निम्न तरीके से किया है. वहा बसे सी बी पटेल जो कि नरेंद्र मोदी के समर्थको में से है के हवाले से पहले तो “मेनिया” शब्द का उल्लेख किया और फिर मोदी प्रेम का कारणों का उल्लेख करते हुए ये बताया कि “भारतीय पैसे की पूजा करते है और वे अमीर होना चाहते है” और मोदी कि आर्थिक नीति इसमें सहूलियत प्रदान करती है. ये एप्रोच विदेश में बसे भारतीयों को बहुत रास आ रही है!! दोनों ही बाते  दोषपूर्ण है और हास्यास्पद भी है. पहले तो भारतीय पैसे की पूजा नहीं करते और दूसरे किसी भी राष्ट्र का नागरिक अमीर होना चाहता है तो भारत का नागरिक अगर अमीर बनना चाहता है तो तकलीफ या आश्चर्य किस बात का? पैसे की पूजा वो राष्ट्र करते है जिन्होंने सोने की चिड़िया के पर नोचे!!

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 ( ये भीड़ भारतीयों की है. किसी खास से जुडी नहीं!! ) 

सबसे खतरनाक कार्ड एंड्रू साहब तब खेलते है जब उन्होंने इस बात का उल्लेख किया कि गुजराती जो केवल पांच प्रतिशत ही है भारत में वे पंजाबियों के साथ मिलकर सबसे बड़ी संख्या संख्या में ब्रिटेन में बसे है. ये फरमाते है कि ये “गुजराती प्राइड” का जलवा है!!  “Gujarati pride is also at play.” मतलब ये  भारतीय लोगो का सामूहिक प्रेम नहीं है! ये प्रांत विशेष का प्रेम है!! किस तरह एंड्रू साहब  ने इसे एक समुदाय विशेष का प्रेम साबित कर दिया!! एंड्रू साहब यही पर ही नहीं रुके. इसके बाद वे इस बात का उल्लेख करने से भी नहीं चूके कि भारतीय एक बड़ी रकम भारत भेजते है और ये रकम भारत में राइट विंग राजनीति को पोषित करती  है!! “…academic experts say there is little doubt that right-wing movements do well from this source of funds.”  भारत में मोदी प्रधानमन्त्री क्या हुए विदेशी कूटनीति ने अपना दानवी चेहरा दिखाना शुरू कर दिया? इसी बीबीसी ने आपको कभी बताया कि मुस्लिम राष्ट्रों से खुद उनके देश में, अन्य देशो में और भारत में आतंकी घटनाओ को अंजाम देने के लिए कितना पैसा आता है!! कौन है जो मुस्लिम आतंकियों को फंड देते है? इस बात की पड़ताल कब होगी?

इसके बाद इस ब्रिटिश संवाददाता ने वही पुराना राग अलापना शुरू किया जो विदेशी मीडिया की पहचान है. ये मोदी की जीत हिंदुत्व की जीत है. ये हिन्दू वर्ग की जीत है. ठीक ऐसा ही हमारे यहाँ एक सेक्युलर आत्मा सोचती है. ये एक औसत मुस्लिम वर्ग की भी सोच है. और अब ये समझ में आता है कि एक पढ़े लिखा उन्नत विदेशी दिमाग जो कई यूनिवर्सिटी से संबद्ध है वो भी यही सोचता है. ये भारतीयों का प्रेम नहीं है. मोदी केवल हिन्दू वर्ग का प्रतिनिधित्व करते है. ये खतरनाक कार्ड तुरुप का पत्ता होता है. इस संवाददाता ने ये भी चल दिया। “While the organisers insist that Indians of all religions, regions and backgrounds will be present at Wembley, Modi’s success reflects a Hindu cultural revivalism which is at least as evident, some would say more so, among the diaspora as in India.” इस संवाददाता ने ये दर्शाना भी जरूरी समझा कि मोदी की तुलना में चीनी राष्ट्रपति का स्वागत बेहतर हुआ था और उसमे बेहतर राजनैतिक एजेंडा शामिल था!! “British government’s overture to China is seen as a bold and distinctive foreign policy initiative, there’s not the same diplomatic buzz about the Indian leader’s arrival.”  खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे!!!

इससे ये साफ़ समझ में आता है कि विदेशी मीडिया या विदेशी राजनैतिक मंच मोदी की लोकप्रियता से भयभीत है. या हम भी साफ़ साफ़ ये क्यों ना कहे कि हिन्दुओ की मजबूती बाहरी लोगो को रास नहीं आ रही है. वे हर हथकंडे अपना रहे है जिससे लोगो में गलत सन्देश जाए. ब्रिटिश शासन को खत्म हुए एक युग बीत गया लेकिन इनकी फूंट डालने वाली नीतियाँ  नहीं बदली. इस दुष्प्रचार के लिए वे किसी भी हद तक गिर सकते है. भारतीयों को इससे सजग रहना पड़ेगा! विदेशी मीडिया से प्रकाशित खबरों को ध्यान से पढ़े. बिल्कुल पढ़ना बंद करना संभव होता तो वो भी कहते लेकिन ऐसा सम्भव नहीं. सजगता से पढ़े ये कहना ज्यादा सही है. इन खबरों से तो मेरा मोह उच्च विदेशी संस्थानों से टूट सा चला है.  इतने बंद दिमाग भी ऐसे संस्थानों की उपज हो सकते है ये सोचा भी नहीं जा रहा है जो भारत के विरोध में सब गलत तरीके आजमा सकते है. भारत की उन्नति विदेशी लोगो को रास नहीं आ रही है पर भारत अब बढ़ता ही जाएगा!!

bbc

( इनसे समाचारों में पक्षपात की उम्मीद की उम्मीद हम नहीं करते लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है, ये खबरों को ख़ास विकृत स्वरुप में प्रस्तुत करते है )

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ब्लॉगर को पत्रकार बनने की कोई जरूरत नहीं !!!

ब्लॉगर को पत्रकार बनने की जरूरत नहीं!!

ब्लॉगर को पत्रकार बनने की जरूरत नहीं!!

इस मुद्दे पे लिंक्डइन के एक प्रतिष्ठित फोरम में आयोजित चर्चा में विदेशी और देशी मीडिया के अति सम्मानित पत्रकार, मीडिया समूह के मालिको और  पारंपरिक  मीडिया से हटकर सोशल  मीडिया का प्रतिनिधत्व करते सम्मानित ब्लागरो ने गंभीर चर्चा की. इस चर्चा में  मुख्य मुद्दा ये रहा कि ब्लॉगर को पत्रकार माना जाए कि नहीं. पारंपरिक मीडिया से जुड़े अधिकांश लोगो ने सतही कारण गिनाते हुए ब्लॉगर को पत्रकार का दर्जा देने से साफ़ इनकार कर दिया. इनका ये कहना था कि इनमे  वो प्रोफेशनल दक्षता  नहीं है जो कि एक पत्रकार में पायी जाती है. इस समूह का ये भी मानना था कि पत्रकार पत्रकारिता का कोर्स करके और कार्य कुशलता हासिल करके मीडिया के क्षेत्र में आते है लिहाजा इनके पास बेहतर  आलोचनात्म्क  वृत्ति होती है, रिपोर्टिंग स्टाइल बेहतर होती है और ये किसी मुद्दे पे पर बहुत सुलझी हुई प्रतिक्रिया देते है. इस वजह से ये ब्लॉगर से कही बेहतर होते है.  पर मेरी नज़रो में चर्चा में शामिल बड़े नामो ने इस  अति महत्त्वपूर्ण  दृष्टिकोण की  उपेक्षा कर दी: एक  ब्लॉगर को एक अच्छा पत्रकार बनने की जरुरत ही क्या है ?

इस बात को  बहुत अच्छी तरह से महसूस किया जा सकता है कि ब्लागरो के लगातार बढ़ते प्रभाव ने पारंपरिक मीडिया में एक खलबली सी मचा दी है. खैर इस मुद्दे पे पारंपरिक मीडिया से जुड़े पत्रकारों से मै उलझना नहीं चाहता. मै तो उन ब्लागरो को जो कि एक अच्छा पत्रकार बनने की उम्मीद पाल कर ब्लागिंग आरम्भ करते है उनको यही सन्देश पहुचाना चाहता हूँ कि  एक अच्छे पत्रकार  के रूप में अपना सिक्का गाड़ने कि सोच से ये सोच लाख गुना बेहतर है कि ब्लागिंग में जो अद्भुत तत्त्व निहित है उनको अपना के संवेदनशील मुद्दों को बेहतर रूप से जनता के बीच पहुचाएं.  

अच्छी ब्लॉगिंग करने के लिए गज़ब की मेधा और दृढ इच्छाशक्ति चाहिए .

अच्छी ब्लॉगिंग करने के लिए गज़ब की मेधा और दृढ इच्छाशक्ति चाहिए .

मेरा ये मानना है कि पत्रकार और ब्लॉगर में भेद बना रहे. ये अलग बात है कि एक अच्छा पत्रकार और एक सिद्ध ब्लॉगर दोनों लगभग एक सी ही उन्नत सोच और लगभग एक सी ही कार्यशैली  से किसी मुद्दे पर काम करते है. लेकिन इतनी समानता के बावजूद  ब्लॉगर को आधुनिक पत्रकारिता के सांचे में नहीं ढलना चाहिए जिसमे पत्रकारिता का एक धंधे में रूपांतरण हो चुका है अपने  मिशनरी स्वरूप से. ये बात भी हमको नहीं भूलनी चाहिए कि पारंपरिक मीडिया से जुड़े पत्रकार और संपादक आज के समय में किसी भी मुद्दे पे भ्रामक और स्वार्थपरक  रूख रखते है. नीरा राडिया जैसे लोगो का दखल और प्रायोजित सम्पादकीय इसके सर्वोत्तम उदाहरण  है.

इसका दूसरा उदाहरण विदेशी अखबार और मैगजीन है. इन सम्मानित समाचार पत्रों में अगर आप भारत से जुडी खबर पढ़े तो आपको विदेशी पत्रकारों का मनमाना और पक्षपातपूर्ण रूख  द्रष्टिगोचर हो जाएगा.  इसके बाद   भी विदेशी मीडिया समूह अपनी निष्पक्षता और पारदर्शिता का हर तरफ बखान करता है. अधिकाँश ब्लॉगर किसी  बाहरी दबाव से मुक्त होते है. इनपे किसी का जोर नहीं कि किसी मुद्दे को ये ख़ास नज़रिए से देखे. इनको मुद्दे को किसी भी दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने की आज़ादी रहती  है. ये अलग बात है कि सहज मानवीय  गुण दोषों से ये भी संचालित होते है और किसी के प्रभाव में आ कर स्वार्थ से संचालित हो सकते है.  

ब्लॉग्स पर एक समझदार आदमी ज्यादा भरोसा करता है!

ब्लॉग्स पर एक समझदार आदमी ज्यादा भरोसा करता है!

इस बात को पूरी तरह से खारिज किया जा सकता है कि किसी को एक अच्छे लेखक या पत्रकार के रूप में उभरने के लिए पत्रकारिता संस्थान  से जुड़ना अनिवार्य होता है. ये विचार हास्यास्पद है कि अच्छा लिखने की कला का विकास पत्रकारिता संस्थान से जुड़कर होता है.  एक उन्नत बोध जो समाचार के तत्त्वों से वाकिफ हो उसको आप कैसे किसी के अन्दर डाल सकते है ?  इस तरह के बोध का उत्पादन थोड़े ही किया जा सकता है पत्रकारिता संस्थानों के अन्दर.  ये बताना बहुत आवश्यक है कि ये आधुनिक समय की देन है कि लोग पत्रकारिता की डिग्री को अनिवार्यता मान बैठे है. यही वजह है की कुकुरमुत्ते की तरह पत्रकारिता संस्थानों की बाढ़ आ गयी है भारत में जो पत्रकार बनने की आस लिए युवको का शोषण कर रहे है.

खैर इसका मतलब ये नहीं कि पत्रकारिता से जुड़े अच्छे संस्थानों का कोई मोल नहीं. मेरा सिर्फ ये कहना है कि सिर्फ इस आधार पे ब्लॉगर और पत्रकार में भेद किया जाना उचित नहीं कि एक के पास डिग्री है और दूसरे के पास नहीं है.ब्लॉगर के पास अनुभव का विशाल खज़ाना होता है जिसकी अनदेखी सिर्फ इस वजह से नहीं की जा सकती कि इसने  किसी पत्रकारिता संस्थान से कोर्स नहीं  किया है !

अंत में यही कहूँगा कि ब्लॉगर को  पत्रकार बनने की लालसा से रहित होकर लगातार उत्कृष्ट कार्य करते रहना चाहिए, बेहतरीन मापदंड स्थापित करते रहना चाहिए. ब्लॉगर को ये नहीं भूलना चाहिए कि वे सड़ गल चुकी पारंपरिक मीडिया से इतर एक  बेहतर विकल्प के रूप में उभरे है.  इनको  पत्रकारों के समूह और मीडिया प्रकाशनों में व्याप्त  गलत तौर तरीको से बच के रहने  की जरूरत है. ब्लॉगर ये कभी ना भूले कि उसे पत्रकार जैसा नहीं वरन पत्रकार से बेहतर बनना है.

ब्लॉगिंग के महत्त्व को सब प्रतिष्ठित प्रकाशनों ने एकमत से स्वीकार किया है.

ब्लॉगिंग के महत्त्व को सब प्रतिष्ठित प्रकाशनों ने एकमत से स्वीकार किया है.

ये लेख मेरे कैनेडियन अखबार में छपे इस अंग्रेजी लेख पर आधारित है:

A Calling Higher Than Journalist



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The Politics Of Rape In India

Mulayam Singh Yadav: Sometimes even wrong people say right things!

Mulayam Singh Yadav: Sometimes even wrong people say right things!



In early 80s one of the popular Hindi flicks revolved around a sensational theme wherein a girl accused a boy of attempting to rape her when she got caught during the seduction stage. As a result of that false accusation, the boy became victim of deep psychological disorder for lifelong. Similarly, a blockbuster Hindi movie released in early 90s shows the protagonist teaching a fitting lesson to her ladylove, who tries to take a revenge by feigning rape! The protagonist makes her very clear that a lady should not stoop down at this level wherein a sexual offence becomes a weapon to settle personal grudges. Not a long back ago the Supreme Court refused to grant relief to a girl who had feigned rape, which led to trial of two innocent youths. They had to ‘suffer the ignominy’ of being involved in such a serious offence!

The Supreme Court in his verdict, without mincing words, stated that  ‘evil of perjury’ has assumed alarming proportions and, therefore, girl deserves no sympathy for maliciously setting the law in motion. “It was a settled position in law that so far as sexual offences are concerned, sanctity is attached to a victim’s statement and that the evidence of victim alone is sufficient for the purpose of conviction if it is found to be reliable, cogent and credible.” It’s ludicrous that an absurd hue and cry is being made over Mulayam Singh Yadav’s alleged rape remarks. Before entering into interpretation of his remarks, it would not be offensive to state that there are few takers, including myself, of type of caste-ridden politics played by Mulyam Singh Yadav, Lalu Yadav and Mayawati. They are icons of regressive tendencies in Indian politics, who never allowed their followers to truly embrace progressive ideals. That’s the reason why Uttar Pradesh is still struggling hard to emerge as a developed state!

One needs to be sufficiently cautious while interpreting remarks of Mulyam Singh Yadav. True, his statement “boys…make mistakes” need to be severely condemned as it trivializes the gravity of a serious offence like rape. However, that’s not the only remark he made. One of the flaws committed by Indian and foreign journalists is that they tend to rely more on sensationalism and as a result of that they misquote and misinterpret serious remarks. That’s not only against the spirit of ethics based journalism but such tendencies also lead to volatile situation in various circles of society. I am sure that an ace politician like Mulyam Singh Yadav would have got his intent right when he pointed out a disturbing trend in Indian society, wherein sexual offences have become a tool to serve vested interests.

 If law makers are truly interested in equity based legal system then their prime task should be to make laws gender neutral!

If law makers are truly interested in equity based legal system then their prime task should be to make laws gender neutral!

The mainstream media eager to cash-in-on the controversial remark failed to highlight the other portion of his speech wherein he stated that “those filing false reports will also be taken to task” so as to stop the misuse of anti-rape law. The mainstream media, controlled by the feminist forces, very shrewdly suppressed this part of the alleged speech. He was demanding a change in anti-rape law not because “boys make mistake” but because its misuse has attained alarming proportions: “Boys and girls fall in love but due to differences they fall apart later on. When their friendship ends, the girl complains she has been raped.” This statement needs to be interpreted in light of  scenario prevailing in present day Indian society marred by perverse tendencies even if one has no place for brand of politics played by likes of Mulayam and Mayawati! This time a wrong person has said a right thing. Why are we hell bent to ignore a harsh reality of present age wherein women are not hesitant to put at stake their own dignity if that suits their interests?
 

Interestingly, cinema is said to be the mirror of society. The filmmakers were far ahead unlike the lawmakers, having their mindset caught in time-warp, in anticipating the disturbing changes in approach of modern Indian women. Unlike the lawmakers who remained glued to perception of “abla nari” (a woman is too innocent and weak to commit any wrong), the filmmakers were bold enough to depict newer trends emerging among women fraternity (refer to movies like Undertrial, Aitraaz, Corporate and etc.). It’s a very recent phenomenon that Supreme Court has taken cognizance of misuse of dowry laws besides being worried about growing trend of perjury cases while dealing with sexual offences. However, it’s quite ironical and travesty of present day grim tendencies that new anti-rape law has no place for gender-neutral provisions. That’s quite shocking. That means law still believes that only men could be perpetrators! How long are the lawmakers going to behave like ostriches having their heads buried in sand?

Needless to state that nobody is suggesting, or rather no one wants that people guilty of sexual offences of serious types should remain above stringent punishment. However, at the same time, it’s also pertinent that fair sex involved in  unfair practise of misusing laws should not be allowed to get off scot free. At the same time if law makers are truly interested in equity based legal system then their prime task should be to make laws gender neutral. What’s the point in nurturing illusions of medieval ages? They need to take clue from filmmakers, who are at least honest enough to portray real face of Indian society as it is (even if they do so to ensure flow of cash)! And the journalistic circle should better restrain themselves from viewing everything from political angle. That would augur well for the welfare of Indian society. The media should be more governed by truth than by falsehood, confusion, and twisted truth sponsored by the corrupt feminist forces! It’s really pathetic that biased mainstream media is averse to anything remotely serving the cause of men and is quick to nasty interpretations of well-meaning sentiments. And it’s even more sadder to notice that even social media remained concentrated on personal attacks rather than framing a more logical perspective!

Justice Dhingra: New Anti-rape law could be misused!

Justice Dhingra: New Anti-rape law could be misused!

References:

The Times of India

New York Daily News

Anti-rape law

False Rape Case

Supreme Court On Misuse of Rape Law

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आमिर खान: गम्भीर समस्याओ को समोसा चटनी न बनाये तो बेहतर होगा!

देश की फिक्र के लिए क्या बस ऐसे ही लोग मिले थें?

देश की फिक्र के लिए क्या बस ऐसे ही लोग मिले थें?

मुझे सत्यमेव जयते कार्यक्रम के फॉर्मेट से बेहद आपत्ति है. इस तरह के कार्यक्रम जटिल समस्यायों को सिर्फ समोसा -चटनी के सामान चटपटा बनाकर पेश करने का माध्यम बन गए है. इस से गम्भीर समस्या के और जटिल संस्करण उभर के आते है. आमिर टाइप के कलाकारो का क्या नुक्सान हुआ? कुछ नहीं: महँगी फीस बटोरो और तथाकथित जागरूक इंसान का अपने ऊपर ठप्पा लगवाकर चलते बनो और जा पहुचो देश की फिक्र करने किसी कोक-शोक की दूकान पर. ठेस और चोट उनको पहुचती है जिनकी संवेदनशीलता का भद्दा मजाक बनाकर इस तरह के कार्यक्रम सफलता के पायदान चढ़ते है. आमिर टाइप के लोग कलाकारी अगर बड़े परदे पर करे वही उनको शोभा देता है. गम्भीरता का पुतला बनने की कोशिश छोड़ दे. कम से कम आमिर टाइप के कलाकार ये कोशिश ना ही करे तो बेहतर होगा.

संवेदनशील मुद्दो की या देश की फिक्र करने के लिए इस देश में वास्तविक गम्भीर दिमागो की कोई कमी नहीं. फिर ये समझ से परे है कि दूरदर्शन जैसे सम्मानित सरकारी माध्यम क्यों इस तरह के सतही लोगो को गम्भीर मुद्दो पर विचार विमर्श करने के लिए बुलवाते है? एक बात और समझना बेहद जरूरी है: क्या गम्भीर समस्याओ को ग्लैमरस रूप देना जरूरी है? क्या यही एक सार्थक तरीका बचा है गम्भीर मुद्दो के साथ न्याय करने का? कुल मिला कर इस बात को महसूस करना बेहद जरूरी है कि अगर आप वाकई देश की फिक्र करते है तो उनका सम्मान करे जो सम्मान के योग्य है. इनको बुलाये और ये आपको बताएँगे कि किसी संवेदनशील मुद्दे पर क्या रूख रखना चाहिए. और अगर सही लोगो को बुलाकर चीज़ो को सही सन्दर्भ में समझने का धैर्य नहीं है तो कम से कम आमिर जैसे लोगो को बुलाकर गम्भीरता का मज़ाक ना बनवाये. इतना तो किया जा सकता है कि नहीं?

 अगर सही लोगो को बुलाकर चीज़ो को सही सन्दर्भ में समझने का धैर्य नहीं है तो कम से कम आमिर जैसे लोगो को बुलाकर गम्भीरता का मज़ाक ना बनवाये। इतना तो किया जा सकता है कि नहीं?

अगर सही लोगो को बुलाकर चीज़ो को सही सन्दर्भ में समझने का धैर्य नहीं है तो कम से कम आमिर जैसे लोगो को बुलाकर गम्भीरता का मज़ाक ना बनवाये। इतना तो किया जा सकता है कि नहीं?

पिक्स क्रेडिट:

तस्वीर प्रथम

कांची के शंकराचार्य की रिहाई इस बात को दर्शाती है कि वर्तमान समय में दुष्प्रचार ज्यादा ताकतवर है बजाय सत्य के!

कांची के शंकराचार्य अंततः निर्दोष और निष्पाप होकर उभरे लेकिन इस नौ साल लम्बे ड्रामे की वजह से इस अति प्राचीन हिन्दू मठ पर जो दाग लगे उसको मिटने में कई वर्ष लगेंगे.

कांची के शंकराचार्य अंततः निर्दोष और निष्पाप होकर उभरे लेकिन इस नौ साल लम्बे ड्रामे की वजह से इस अति प्राचीन हिन्दू मठ पर जो दाग लगे उसको मिटने में कई वर्ष लगेंगे.


इस नए युग के इंडिया यानि “भारत” के अगर हाल के घटनाओ को देखे तो ये आसानी से समझ आ जाएगा कि धर्मनिरपेक्ष सरकारो ने सबसे ज्यादा जुल्म ढाया है हिन्दू संतो पर. ये धर्मनिरपेक्ष सरकारे मुग़लकाल के बाद्शाहो और ब्रिटिश काल के शासको से भी ज्यादा क्रूर रही है हिन्दू धर्मं से जुड़े प्रतीकों को ध्वस्त करने और इनसे जुड़े लोगो को अपमानित करने के मामले में. हिन्दू संतो को निराकरण ही प्रताड़ित किया जा रहा है और इन्हे यौन अपराधो से लेकर देशद्रोह जैसे जघन्य अपराधो में बेवजह घसीटा जा रहा है. बिकी हुई मीडिया इन प्रकरणो का एक पक्ष 
दिखाती  है अपने देश में और देश के बाहर विदेशी अखबारो में. ये आपको अक्सर देखने को मिलेगा कि इस प्रकार के खबरो में ज्यादातर झूठ होता है या अर्धसत्य का सहारा लेकर एक भ्रामक कहानी गाढ़ी जाती है. कोई भी मुख्यधारा का समाचार पत्र तस्वीर के दोनों पहलू दिखाने में दिलचस्पी नहीं रखता.

एक सबसे बड़ी वजह ये है कि ज्यादातर  भारतीय मीडिया समूह का कण्ट्रोल विदेशी ताकतो के हाथो में है. सबके विदेशी हित कही ना कही शामिल है तब हम किस तरह से इनसे ये आशा रखे कि ये सच बोलेंगे? ये वही मुख्यधारा के समाचार पत्र है जो साध्वी प्रज्ञा के गिरफ्तारी को तो खूब जोर शोर से दिखाते है लेकिन साध्वी के साथ जेल के अंदर हुए अमानवीय कृत्यो को जो बंदियो के अधिकारो का सरासर उल्लंघन था उसको दिखाने या बताने से साफ़ मुँह मोड़ गए. ये वही मुख्यधारा के समाचार पत्र है जिन्होंने देवयानी प्रकरण में देवयानी का साथ इस तरह से दिया जैसी कि उसने भारत के नाम विदेशो में ऊँचा किया हो, जैसे उसने कोई जुर्म ही नहीं किया हो. वो इसलिए से क्योकि इसका सरकार से सीधा सरोकार है और सिस्टम इसके पक्ष में है लेकिन हर वो आदमी जिसने भी सरकार ये सिस्टम के विपक्ष में कुछ कहा उसे इस तरह की  सरकारे या सिस्टम सुनियोजित तरीको से अपराधी घोषित कर देता है.

ये कहने में कोई संकोच नहीं कि आज के युग मे सत्य से ज्यादा असरदार किसी के खिलाफ सुनियोजित तरीके से फैलायी गयी मनगढंत बाते है. समाचार पत्रो का काम होता है सत्य को सामने लाना सही रिपोर्टिंग के जरिये लेकिन हो इसका ठीक उल्टा रहा है: मीडिया आज सबसे बड़ा हथियार बन गयी है झूठ और भ्रम को विस्तार देने हेतु. इसका केवल इतना काम रहा गया है कि हर गलत ताकतो को जो सत्ता में है उनको बचाना, उनको बल देना. एक बाजारू औरत की तरह अपनी निष्ठा को हर बार बदलते रहना मीडिया का एकमात्र धर्मं बन गया है. साधारण शब्दो में ये सत्ता पे आसीन शासको की भाषा बोलता है. कांची के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी की गिरफ्तारी के प्रकरण के रौशनी में इस प्रकरण को देखे जिन्हे २००४ में बेहद शर्मनाक तरीके से शंकर रमण के हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था. शंकर रमण कांची के एक मंदिर में मैनेजेर थें. उस वक्त के तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने अपने को धर्मनिरपेक्ष साबित करने के लिए और ये जताने के लिए कि कानून से ऊपर कोई नहीं होता इनकी गिरफतारी सुनिश्चित की. कांची के शंकराचार्य के ऊपर “आपराधिक षड्यंत्र, अदालत को गुमराह करने गलत सूचना के जरिये, धन का आदान प्रदान आपराधिक गतिविधि को क्रियांवित करने के लिये” आदि आरोप लगाये गए.

इस एक हज़ार साल से भी ऊपर अति प्राचीन ब्राह्मणो के अत्यंत महत्त्वपूर्ण केंद्र के मुख्य संचालक को इस तरह अपमानजनक तरीके से एक दुर्दांत अपराधी के भांति गिरफ्तार करना और फिर मुख्यधारा के समाचार पत्रो के द्वारा अनर्गल बयानो के आधार पर उनको दोषी करार कर देना अपने आप में मीडिया की सच्चाई बयान कर देता है. ये बता देना आवश्यक रहेगा कि कांची कामकोटि पीठ हिन्दुओ का अति प्राचीन मठ है जिसको हिन्दू समुदाय में दुनिया भर में बेहद श्रद्धा के साथ देखा जाता है. कांची के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी बहुत सम्मान की दृष्टि से देखे जाते रहे है हिन्दू शास्त्रो के मर्मज्ञ होने के कारण. इन्होने  नवी शताब्दी में स्थापित कांची कामकोटि पीठ के गरिमा को नयी ऊंचाई प्रदान की, जिसकी हिन्दू समुदाय में वेटिकन चर्च सरीखी पकड़ है. जयललिता और ब्राह्मण विरोधी नेता डीएमके प्रमुख करूणानिधि के आपसी मतभेदों के चलते इस हिन्दू मठ के माथे पर कालिख लग गयी.

 ये बता देना आवश्यक रहेगा कि कांची कामकोटि पीठ हिन्दुओ का अति प्राचीन मठ है जिसको हिन्दू समुदाय में दुनिया भर में बेहद श्रद्धा के साथ देखा जाता है. कांची के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी बहुत सम्मान की दृष्टि से देखे जाते रहे है हिन्दू शास्त्रो के मर्मज्ञ होने के कारण. इन्होने  नवी शताब्दी में स्थापित कांची कामकोटि पीठ के गरिमा को नयी ऊंचाई प्रदान की, जिसकी हिन्दू समुदाय में वेटिकन चर्च सरीखी पकड़ है. जयललिता और ब्राह्मण विरोधी नेता डीएमके प्रमुख करूणानिधि के आपसी मतभेदों के चलते इस हिन्दू मठ के माथे पर कालिख लग गयी.

ये बता देना आवश्यक रहेगा कि कांची कामकोटि पीठ हिन्दुओ का अति प्राचीन मठ है जिसको हिन्दू समुदाय में दुनिया भर में बेहद श्रद्धा के साथ देखा जाता है. कांची के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी बहुत सम्मान की दृष्टि से देखे जाते रहे है हिन्दू शास्त्रो के मर्मज्ञ होने के कारण. इन्होने नवी शताब्दी में स्थापित कांची कामकोटि पीठ के गरिमा को नयी ऊंचाई प्रदान की, जिसकी हिन्दू समुदाय में वेटिकन चर्च सरीखी पकड़ है. जयललिता और ब्राह्मण विरोधी नेता डीएमके प्रमुख करूणानिधि के आपसी मतभेदों के चलते इस हिन्दू मठ के माथे पर कालिख लग गयी.

उस वक्त के प्रमुख समाचार पत्रो ने ये दर्शाया कि पुलिस इस तरह से गिरफ्तार करने का साहस बिना पुख्ता सबूतो के कर ही नहीं सकती. उस वक्त अभियोजन पक्ष के वकील इस बात से पूरी तरह आश्वस्त थे कि शंकराचार्य को दोषी साबित करने के लिए उनके पास पर्याप्त पुख्ता सबूत थें. विवेचना अधिकारी प्रेम कुमार का ये बयान प्रमुखता से छपा कि हमारे पास ठोस साक्ष्य है स्वामी जयेन्द्र सरस्वती के खिलाफ और ये कि शंकर रमण और इनके बीच करीब चार सालो से आपसी मनमुटाव था जिसको सिद्ध करने के लिए पर्याप्त सबूत इकठ्ठा किये जा रहे है.

खैर ईश्वर के यहाँ देर भले हो पर अंधेर नहीं है. सत्य की अंततः विजय हुई जब पांडिचेरी की विशेष अदालत ने सत्ताइस नवंबर २०१३ को उन सभी लोगो को जो शंकर रमण हत्याकांड में आरोपी बनाये गए थें उनको बाइज्जत बरी कर दिया. इसी के साथ नौ साल से हो रहे ड्रामे का पटाक्षेप हो गया. उन पर लगाये गए सभी आरोपो से उन्हें मुक्त कर दिया गया. जितने भी प्रमुख गवाह थें उन्होंने अभियोजन पक्ष के वर्णन को समर्थन देने से इंकार कर दिया। अभियोजन पक्ष के विरोध में करीब ८० से अधिक गवाहो ने अपने बयान दर्ज कराये।

कांची के शंकराचार्य अंततः निर्दोष और निष्पाप होकर उभरे लेकिन इस नौ साल लम्बे ड्रामे की वजह से इस अति प्राचीन हिन्दू मठ पर जो दाग लगे उसको मिटने में कई वर्ष लगेंगे. हिन्दुओ के आस्था और प्रतीक के साथ जो बेहूदा मजाक हुआ उसके निशान कई वर्षो तक संवेदनशील मनो को कटोचते रहेंगे. लेकिन हिन्दू ब्राह्मण के उदार मन को देखिये कि इतना होने के बाद भी किसी के प्रति कोई कटुता नहीं. इस परिपेक्ष्य में शंकराचार्य के वक्तव्य को देखिये जो उन्होंने बरी होने के बाद दिया: ” धर्म की विजय हुई. सत्य की जीत हुई. सब कुछ खत्म हो जाने के बाद अंत में केवल यही बात मायने रखती है. मुझे मेरे गुरु ने सब कुछ सहन करने को कहा है. इसलिए ये कहना उचित नहीं होगा कि हालात मेरे लिए असहनीय थें. हा कुछ दिक्कते जरूर आयी वो भी उस वजह सें कि हम लोग नयी तरह की परिस्थितयो का सामना कर रहे थें. हमने पूर्व में देखा है कि किस तरह आक्रमणकारियों ने हिन्दू मंदिरो पर हमले कर उनको विध्वंस किया। आज जब हम मंदिरो पर पड़े उन हमलो की निशानियाँ देखते है तो  हमे वे आक्रमणकारी और उनकी क्रूरता याद आती है. आज जो कुछ भी मठ के साथ हुआ ( मेरे पर जो  आरोप लगे) वे बहुतो की नज़र में पूर्व में किये गए आक्रमणकारियों के द्वारा किये गए विध्वंस सरीखे ही है.”

ये बहुत दुःख की बात है कि जैसे ही किसी हिन्दू संत पर कोई आरोप लगते है सारे मुख्यधारा के मीडिया समूह उस संत को बदनाम करने की कवायद में जुट जाते है पूरी ताकत से इस बात से बिल्कुल बेपरवाह होकर कि मीडिया का मुख्य काम किसी भी घटना की सही-२ रिपोर्टिंग करनी होती है ना कि न्यायिक ट्रायल करना। उससे भी बड़ी बिडम्बना ये है कि अगर संत पर लगे आरोप निराधार और झूठे पाये जाते है तो जो अखबार या फिर न्यूज़ चैनल आरोप लगने के वक्त पूरे जोर शोर से संत को दोषी ठहरा रहे थे वे ही अखबार और न्यूज़ चैनल पूरी तरह से कन्नी काट लेते है. संत को बेगुनाह साबित करने वाली खबर कब आती है और कब चली जाती है ये पता भी नहीं चलता है. यही वजह है कि कांची के शंकराचार्य की बेगुनाही और बाइज्ज़त बरी होना किसी भी शीर्ष अखबार के सुर्खियो में नहीं आया. शायद सेकुलर मीडिया ने ये सोच कर इस खबर को प्रमुखता से नहीं बताया क्योकि हिन्दुओ से जुडी कोई भली खबर सेक्युलर भावना के विपरीत होती है!

मेनस्ट्रीम मीडिया को प्रोपगेंडा ज्यादा रास आता है बजाय सत्य के. सेक्युलर ताकतो ने और इनके द्वारा संचालित मीडिया समूहो ने कांची के शंकराचार्य के गिरफ्तारी के वक्त ये बहुत जोरदार तरीके से ये दर्शाया कि कोई भी कानून से ऊपर नहीं होता. तो क्या यही सेक्युलर ताकते जो कानून की बात करती है शाही ईमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी को गिरफ्तार करने की हिम्मत रखते है जिन पर कई धाराओ में देश के विभिन्न थानो में एफ आई आर दर्ज है? क्या यही सेक्युलर ताकते उन क्रिस्चियन मिशनरीज को बेनकाब करने की ताकत रखती है जो देश के पिछड़े और दूर दराज के इलाको में लोगो को बहला फुसला कर उनका धर्म परिवर्तन कर रही है? लेकिन ये सबको पता है कि सेक्युलर मीडिया ऐसा कभी नहीं करेगा. ऐसा इसलिए कि इन सेक्युलर लोगो की निगाह में कानून के लम्बे हाथ केवल हिन्दू संतो के गर्दन तक पहुंचती है. ये हिन्दू संतो को केवल बदनाम करने तक ही सीमित है और हिन्दू आस्था को खंडित और विकृत करने भर के लिए है. ये दुष्प्रचार के समर्थक है सत्य के नहीं.

हिन्दू संत अपनी जाने गंवाते रहे है लेकिन ये खबरे कभी भी सेक्युलर मीडिया की सुर्खिया नहीं बनी. ये स्वामी लक्ष्मणानन्द जी की तस्वीर है जिनकी हत्या क्रिस्चियन ताकतो ने कर दी थी.

हिन्दू संत अपनी जाने गंवाते रहे है लेकिन ये खबरे कभी भी सेक्युलर मीडिया की सुर्खिया नहीं बनी. ये स्वामी लक्ष्मणानन्द जी की तस्वीर है जिनकी हत्या क्रिस्चियन ताकतो ने कर दी थी.


References:

IBN Live

The Hindu

The Hindu

Wiki


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खुर्शीद अनवर की आत्महत्या: समाज, कानून और मीडिया के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा!

गम्भीर मुद्दा ये है कि सतही मीडिया ट्रायल के चलते जिस भीषण मानसिक कष्ट से गुजरना होता है और जो सरेआम अपमान सहन करना पड़ता है क्या उसका कोई अस्तित्व नहीं? क्या इसका कोई मोल नहीं? क्या ये बिलकुल उपेक्षित कर देने वाली बात है?

गम्भीर मुद्दा ये है कि सतही मीडिया ट्रायल के चलते जिस भीषण मानसिक कष्ट से गुजरना होता है और जो सरेआम अपमान सहन करना पड़ता है क्या उसका कोई अस्तित्व नहीं? क्या इसका कोई मोल नहीं? क्या ये बिलकुल उपेक्षित कर देने वाली बात है?


खुर्शीद अनवर की आत्महत्या कई गम्भीर सवाल खड़े कर गयी आज के समाज के बारे में, पत्रकारिता के स्तर के बारे में और कानून के उपयोग और दुरुपयोग के सन्दर्भ में. खुर्शीद अनवर एक प्रसिद्ध सामजिक कार्यकर्ता थें जो नई दिल्ली में इंस्टिट्यूट फॉर सोशल डेमोक्रेसी नाम की संस्था चलाते थें. इसके अलावा वे जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय के छात्र भी थें. खुर्शीद अनवर ने पिछले साल १८ दिसम्बर २०१३ को आत्महत्या कर ली थी जब उनपे एक मणिपुरी औरत ने  अपने साथ दुष्कर्म का आरोप लगाया था. ये खबर कुछ एक समाचार चैनलों पर प्रमुखता से दिखायी गयी और इसके बाद सोशल नेटवर्किंग साईटस पर अंतहीन बहस छिड़ गयी. पहले तो खुर्शीद इस आरोप से हिल गए और इसके बाद मीडिया चैनलो द्वारा कीचड़ उछालने के बाद सदमे से ग्रस्त खुर्शीद ने आत्महत्या कर ली. बाद में उनके पास से बरामद सुसाइड नोट में इस बात का उल्लेख था कि मणिपुरी लड़की के साथ उन्होंने बलात्कार नहीं किया था बल्कि आपसी सहमति से शारीरिक सम्बन्ध बनाये थे.

इस घटना ने मुझे श्रीनिवास सिरास के आत्महत्या की याद दिला दी जो प्रोफेसर थे अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में. इस प्रकरण में न्यूज़ चैनलो नें इस प्रोफेसर के निजता के साथ खिलवाड़ किया था और उनकी गोपनीयता को सरेआम उजागर करके उनके समलैंगिक सम्बन्धो को विकृत स्वरूप दे दिया था. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस प्रकरण में सुनवाई करते हुए प्रोफेसर को थोड़ी राहत प्रदान की थी पर मीडिया चैनलो द्वारा की गयी गुस्ताखी उन पर भारी पड़ गयी और उन्होंने आत्महत्या कर लिया. कोर्ट इस तरह के मीडिया ट्रायल पर अक्सर चेतावनी देती रही है पूर्व में कि न्यूज़ चैनल जब केस ट्रायल स्टेज में हो तो किसी भी निष्कर्ष पर अपनी तरफ से पहुचने की हड़बड़ी ना दिखाए और न्यायालय की कार्यवाही को प्रभावित करने की कोशिश ना करे लेकिन बड़े कॉर्पोरेट संस्थानो द्वारा संचालित ये न्यूज़ चैनल न्यायालय के द्वारा इन पारित आदेश को सिर्फ कागज़ का एक टुकड़ा समझते है और उन्हें किसी प्रकरण में निहित संवेदनशीलता से कुछ नहीं लेना देना होता सिवाय इसके कि उसका माखौल किस तरह उड़ाया जाए. ये सही है मीडिया ट्रायल एक जटिल मुद्दा है लेकिन उससे बड़ा सच ये है कि सनसनीखेज मीडिया ट्रायल के चलते किसी के इज्जत और उसके आत्मसम्मान के साथ जो खिलवाड़ होता है और इससे जो अपूर्णीय क्षति होती है उसकी भरपाई असंभव होती है. मीडिया  किसी दोषी व्यक्ति के अधिकारो के हमेशा अतिक्रमण करती आयी है और समय आ गया है कि सही तथ्यात्मक रिपोर्टिंग और रिपोर्टिंग जो गलत इरादो से की गय़ी हो सिर्फ न्यूज़ चैनल के टी आर पी या फिर अखबार की बिक्री बढ़ाने के उद्देश्य से की गयी हो दोनों में एक स्पष्ट रेखा का निर्धारण हो.

“सनसनीखेज रिपोर्टिंग तो हमेशा होगी क्योकि सनसनीखेज घटनाये भारत में हमेशा रहती है. सुप्रीम कोर्ट इस पर लगाम लगाने में असमर्थ है. ये सही है कि रिपोर्टिंग सही होनी चाहिए पर इसका ये मतलब निकालना कि ये मीडिया के द्वारा ट्रायल है एक निन्दात्मक अभिव्यक्ति है. कोर्ट या किसी के पास कोई स्पष्ट मापदंड नहीं है जो ये निर्धारित कर सके कि मीडिया ट्रायल क्या होता है.” (सीनियर अधिवक्ता राजीव धवन, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया). खैर इस बात से इंकार करना असम्भव है कि मीडिया के द्वारा किसी भी दोषी व्यक्ति के अधिकारो का हनन और किसी के भी निजता के साथ खिलवाड़ करने के कृत्य का अपने तरफ से दूषित स्पष्टीकरण कोई भी मतलब नहीं रखता। ये सिर्फ एक व्यर्थ का  प्रलाप होता है, बेवजह अपने को सही ठहराना होता है. उसकी स्पष्टीकरण से उस अपूर्णीय क्षति की भरपाई असम्भव है जो इस वजह से होती है. इन दोनों प्रकरणो में दो व्यक्ति ने अपनी जान ले ली इस वजह से और अब हम ये कभी नहीं जान पाएंगे कि सच्चाई क्या थी. क्या ये दो जाने वापस मिल जाएंगी? क्या खोया सम्मान वापस मिलेगा? शायद कभी नहीं।

वरिष्ठ पत्रकार सईद नक़वी शायद सच के ज्यादा करीब है जब ये कहते है कि “पत्रकारिता में शायद निष्कर्षो पर पहुचने की हड़बड़ी है. ये उसी दिन किसी को मुजरिम ठहरा देता है जिस दिन किसी पे आरोप लगते है, इसके पहले कि कोर्ट किसी बात का निर्धारण करे. ये बहुत दुखी कर देने वाली बात है. कैसे मीडिया इतनी जल्दीबाज़ी में किसी निष्कर्ष पर पहुच सकती है और किसी को इतनी हड़बड़ी में दोषी करार दे सकती है? मीडिया को इस बात का इन्तजार करना चाहिए कि कम से कम प्राथमिक रिपोर्ट तो दर्ज हो, कम से कम जांच तो पूरी हो जाए” (डी एन ए न्यूज़ रिपोर्ट) ये बिलकुल चकित कर देने वाली बात है कि मीडिया कभी भी इस तरह के सनसनीखेज मीडिया ट्रायल के दौरान अपूर्णीय क्षति और इनके अंजामो के बारे में कभी भी ईमानदारी से आकलन नहीं करती. गम्भीर मुद्दा ये है कि सतही मीडिया ट्रायल के चलते जिस भीषण मानसिक कष्ट से गुजरना होता है और जो सरेआम अपमान सहन करना पड़ता है क्या उसका कोई अस्तित्व नहीं? क्या इसका कोई मोल नहीं? क्या ये बिलकुल उपेक्षित कर देने वाली बात है? ये बिलकुल स्पष्ट है कि मीडिया ट्रायल अधिकतर एकतरफा, भ्रामक और तथ्यो के साथ खिलवाड़ होता है जिसमे इस बात की बिलकुल परवाह नहीं की जाती कि कम से कम तथ्यो के असलियत का तो निर्धारण कर लिया जाए सूक्ष्मता से.

इस पूरे प्रकरण में दो बहुत गम्भीर पहलू शामिल है. पहला तो ये कि ये समाज के इस विकृत बदलाव को दर्शाता है कि समाज में हड़बड़ी में निष्कर्षो पर पहुचने की लत लग गयी है अधकचरे दिमाग के साथ. इसे चाहे वो प्रशंसा  हो या फिर आलोचना दोनों को बिना किसी आधार के आत्मसात करने की आदत सी हो गयी है. ना आलोचना का स्तर विकसित हो पाया और ना ही प्रशंसा के आयाम निर्धारित हो पाये. आलोचना अगर हो रही है तो तो वो भी तब जब कि कोई भी तथ्यात्मक या तार्किक आधार आलोचना के पक्ष में मौजूद नहीं है. दूसरा पक्ष ये है कि जिन कानूनो को स्त्री की अस्मिता की रक्षा करने के लिए बनाया गया है वे अब निर्दोष लोगो को प्रताड़ित करने का अस्त्र बन गए है. ये कितने तकलीफ की बात है कि जहा किसी स्त्री के सेक्सुअल हरस्मेंट का मामला उभरता है वही पे समाज का एकपक्षीय भेदभाव ग्रस्त दिमाग उभर कर सामने आ जाता है और मीडिया हमेशा की तरह दोषी के ऊपर हर तरह का लांछन जड़ देता है और इसके पहले वो अपने बेगुनाही को साबित करे वो मुजरिम साबित करार कर दिया जाता है. ये सर्वविदित है कि जो नए कानून की परिभाषा है सेक्सुअल हरस्मेंट को रोकने कि उसके प्रावधान इस तरह के है कि आप तकरीबन मुजरिम ही है और इस बात को गौण कर दिया गया है कि आप के पास भी बचाव के सही रास्ते होने चाहिए. और सबसे घातक ये है कि एकतरफा मीडिया ट्रायल शुरू हो जाने के बाद जो उसके पास अपने को बचाने के जो रास्ते होते है वे भी बंद हो जाते है क्योकि मीडिया आपके विपक्ष में माहौल खड़ा कर देता है हर तरफ.

“भारत में और अन्य देशो में जहा इस तरह के कानून पास हुए है औरतो के साथ होने वाले अपराधो को रोकने के लिए उसमे बर्डेन ऑफ़ प्रूफ को सुनियोजित तरीके से बदल दिया गया है. अब दोषी के ऊपर ये जिम्मा है कि वे अपनी निर्दोषता साबित करे. ये परिवर्तन निहित रूप से बहुत गलत है पर शायद ये इसलिए किया गया है कि ताकि इन प्रकार के अपराधो में स्त्री के पास सामान स्तर के अवसर हो अपने साथ हुए अन्याय के भरपाई के लिए. लेकिन जो अब नए कानून बने है सेक्सुअल हरस्मेंट रोकने के लिए उसमे ये बर्डन ऑफ़ प्रूफ इस सख्त स्वरूप में है कि जहा दोषी (पुरुष) के पास बचाव के सारे रास्ते बंद हो जाते है. अगर एक बार आप पर आरोप लगे तो इस बात की सम्भावना कम है कि आप अपने को निर्दोष साबित कर सके या आपको बेहद मशक्कत के बाद ही कोई रास्ता दिखायी पड़े. ये शायद नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत के विपरीत है.” (वरिष्ठ पत्रकार प्रेम शंकर झा, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया)

संक्षेप में समाज और मीडिया दोनों का स्तर रसातल में चला गया है क्योकि ये दोनों भावनाओ के प्रवाह में बहने के आदी हो गए है और इन दोनों को तथ्यो और तार्किक सोच से कुछ लेना देना नहीं रह गया है. दोनों को इस विकृत खेल में रस आने लगा है जहा किसी निर्दोष के भावनाओ के साथ खिलवाड़ होता है, उसके आत्मसम्मान के जब टुकड़े टुकड़े किये जाते है. लेकिन खेद कि बात ये है कि न्याय परंपरा/व्यवस्था भी इसी विकृत रस का शिकार हो गयी है, इन्ही घातक प्रवित्तियों का शिकार सा हो गयी है, खासकर उन मामलो में जहा स्त्रियों से जुड़े अपराधो के निष्पक्ष अवलोकन की बात आती है. खैर सब की जिम्मेदारी बनती है कि  भावनात्मक प्रवाह में बह कर लिए गए निर्णयो के बजाय सोच समझकर तार्किक रूप से लिए गए निर्णयो को प्राथमिकता दी जाए. ये बहुत आवश्यक हो गया है समाज के बिखराव को रोकने के लिए, एक मूल्य आधारित समाज के निर्माण के लिए.

पाठक इस लेख का अंग्रेजी संस्करण यहाँ पढ़े:

Rape Allegation That Led To Suicide of Kurshid Anwar: A Resounding Slap On The Face Of Media!

खुर्शीद अनवर की आत्महत्या: समाज, कानून और मीडिया के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा

खुर्शीद अनवर की आत्महत्या: समाज, कानून और मीडिया के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा

References:

Activist Khurshid Anwar’s suicide: Was media trial responsible?

AMU’s ‘gay’ prof commits suicide

Guilty If Charged

Dainik Bhasker

 

पिक्स क्रेडिट:

तस्वीर प्रथम 

तस्वीर दो

The Times Of India: Marriage Bill Is Anti-Men

This News Item Appeared In The Allahabad Edition Of The Times Of India On December 19, 2013.

This News Item Appeared In The Allahabad Edition Of The Times Of India On December 19, 2013.


It’s a matter of great satisfaction that prominent publications related with mainstream media have begun to embrace issues related with men in a fair way. The various bodies working for the cause of men across the nation have decided to ferociously protest against the recent amendments made in Hindu Marriage Laws which are not only anti-male but also do not augur well for the cause of society. I  must appreciate The Times of India and its correspondents some of them whom I know personally quite well  for  being sympathetic towards issues sensitive in nature. The complicated issues cannot be dealt with in a proper way unless we know both the sides of story and this type of fair reporting allows us to be more informed about aspects which remain neglected owing to lack of dissemination.  Right now  some of the well known Men’s associations based in Bangalore, Pune,  Nagpur and elsewhere are working hard to create awareness regarding misuse of laws, which they call legal terrorism. The activists right now are engaged in having dialogue with Members of Parliament with a hope to apprise them of with concerns of Men’s Associations. I am sure the day is not far when gender-neutral laws would get introduced to provide a better shape to Indian society now on the verge of disarray due to blatant misuse of power by the feminists, enjoying support of negative powers operating within the nation and in foreign lands. 

 

Beginning Of A New Era: Men’s Rights News Reports Which Featured In Newspapers Published From Lucknow And Allahabad

Author Of This Post At Fifth Men's Rights National Conference Held In Nagpur, Maharashtra,  From August 16- August 18, 2013.

Author Of This Post At Fifth Men’s Rights National Conference Held In Nagpur, Maharashtra, From August 16- August 18, 2013.


The Fifth Men’s Rights  National Conference, held in Nagpur in the second week of August 2013,  got tremendous coverage in mainstream media in Allahabad and Lucknow. It’s matter of self-pride since newspapers in this region are still not that familiar with concept of men’s rights. It’s a new phenomenon for them. In fact, issues pertaining to rights of men are still taken in lighter vein. Even the ones who are supposed to be more informed than ordinary class of people like reporters, editors and lawyers remain nonchalant when they come to hear about exploitation of men.

Fortunately, the extensive coverage of news related with Men’s Rights National Conference held in Nagpur marks a beginning of new era in this part of India. I am sure in coming days talks related with rights of men will not evoke irresponsible remarks. Have a look at the various news reports which appeared in Allahabad region’s prominent newspapers. It proved to be a herculean task to make them find meaning in talks related with men’s issues.I am happy that I was able to shatter the inertness prevalent in the minds of people who are supposed to be the custodians of human rights and made them understand the seriousness attached with cause of men.  Many thanks to those reporters, editors and lawyers who responded positively as I spoke about the rights of men. Hope the cause of men’s attain new heights in coming days

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1. The Times Of India

The Times Of India, September 01, 2013

The Times Of India, September 01, 2013

Link Related To This News Report: The Times Of India, Allahabad Edition

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2. Northern India Patrika 

Northern India Patrika: Oldest English Newspaper In Allahabad Region Gave Enough Coverage To Rights Of Men...

Northern India Patrika: Oldest English Newspaper In Allahabad Region Gave Enough Coverage To Rights Of Men…

Link To This News Report:  Northern India Patrika

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3.  Daily News Activist Published From Lucknow

Daily News Activist Published This News Report On September 26, 2013.

Daily News Activist Published This News Report On September 26, 2013.

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4. Jansandesh Times Published From Allahabad, Varanasi, Gorakhpur And Lucknow. 

This News Report  Published In  Jansandesh Times Created Huge Sensation In Various Important Circles.

This News Report Published In Jansandesh Times Created Huge Sensation In Various Important Circles.

Links Related To This News Report Published On October 03, 2013:  Visit The Archives Section Of Jandsandesh Times

And yes, many thanks to Amlesh Vikram Singh,  Correspondent associated with Jansandesh Times,  who made sincere efforts to get this news report published.  

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An Important News Item Related With Rights Of Men:

Deciphering The Significance Of Men’s Rights On Indowaves

Deciphering The  Significance Of Men’s Rights Movement Published In Northern India Patrika 

Deciphering The Significance Of Men’s Rights Movement On Website 498.in 

It's Not Bad To Aware Of One's Worth And Contributions..Many thanks to The Lord Almighty...

It’s Not Bad To Be Aware Of One’s Worth And Contributions..Many thanks to The Lord Almighty…

 


Does The World Really Appreciate Out-Of-The Box Thinking ?

Does The World Really Appreciate Out-Of-The Box Thinking ?

Does The World Really Appreciate Out-Of-The Box Thinking ?

( The article first appeared in The Speaking Tree Column, Jammu Plus, The Times Of India)

The world is not the right place for people endorsing out-of the-box thoughts. The world recognizes only stereotyped emotions. It’s not a pessimistic assertion but it’s a result of head on encounter with realism. It’s the essence which keeps natural earthly phenomenon in organized state.  It’s the way which has happened in the past. Socrates told truth, and was offered poison! Galileo’s ideas which supported heliocentric world system were considered violation of Catholic Church teachings that the Earth was the center of the universe. That ensured a house arrest for Galileo for rest part of his life. India has also seen episodes wherein the exceptional souls faced the same disastrous consequences.

Meera challenged the monarchy by loving Krishna. She was put on trial by the near and dear ones. The ever-present God’s hand came to her rescue. Prahlad refused to gave way to his father’s belief that he was Supreme, and instead placed his faith in the Vishnu’s mystical power. That brought him against the powerful administration run by his father but as we all know Lord’s Vishnu incarnation as Narasimha came to establish as to who exactly controlled the universe.

It would not be wrong to suggest that “the way of this world is, to praise dead saints, and persecute living ones.” The moment one tries to rope in better ideas, a rush of mass of negativism tries to annihilate it. There may be some fortunate souls whom lady luck allowed to have fertile ground for execution of their dreams but for a greater lot the story has been to move from one conventional norm to another. For average souls, the world is okay. For them it had been an easy task to imbibe all contradictions and evils in name of “practical adjustment” but that’s not the case with people having heightened sensitiveness. Their own ethics prevents them from picking up anything and treating as its own. The so-called practical souls since they stand for nothing other than having deep faith in loose irrational principles are often hailed as pragmatist. “Those who stand for nothing fall for anything.” So they emerge as successful. They are the champions of pragmatism. They are the ones who are the real heroes for people trapped in livelihood struggles.

Lord Shiva: Truly Bold Thinker. He Accepts What The World Comes To Reject!

Lord Shiva: Truly Bold Thinker. He Accepts What The World Comes To Reject!

However, life is deadly ash. That’s why Lord Shiva’s whole body is smeared with deadly ash. Once you have a real interaction, absolute deadly realization, the ability to make fraudulent dealings gets wiped out totally. Your spirit refuses to participate in worldly affairs, not imbibing everything in name of changes of time. It becomes selective in conscious way. It’s like attaining the “Sthitpragya” state – the state of absolute equanimity attained as result of identification with highest consciousness in a perfect way.  Lord Krishna has referred to it in Srimad Bhagvad Geeta:

Prajahati yada kaman sarvan partha mano-gatan
atmany evatmana tustah sthita-prajnas tadocyate

-Lord Krishna said, O Arjuna when gives up all desires  for sense gratification produced within the mind and becoming satisfied by the realization of the self in the pure state of the soul; then it is said one is properly situated in perfect knowledge.

True, once that state is attained, the person with such a state of mind refuses to sway with happenings of the world. Nothing seems to change externally but the inner being of such a person undergoes revolutionary transformation. That might make him a failure from worldly materialistic evaluation but in kingdom of souls he is the king of souls like the God principle. He refuses to endorse the worldly orientations and instead walks all alone on path built of out-of-the-box thoughts.

Like always, the worldly temptations manifest for such a soul to distract him. No wonder, Swami Vivekananda treats the path of realization akin to walking on the razor’s edge. The seeker until realization dawns upon him should need to remain highly vigilant, maintaining high level of “viveka shakti”- the sense of making wise choices. In Bhagavad Geeta, Lord Krishna warns the seekers that they should not give way to superficial attainments by worshiping lesser Gods, and thus should not pay much attention to Vedic verses aimed at appeasing him. 

Yavan artha udapane sarvatah samplutodake
tavan sarvesu vedesu brahmansya vijanatah (Chapt.2; Verse 46)

All that is served in well of water is better served by a vast lake; similarly, all the purpose in all Vedic scriptures are realized to he who knows the ultimate truth.

So let’s learn to travel alone even as the route passes through worldly happenings, under the shadow of out-of-the-box thoughts with a conscious and alert mind.

The Bhagwad Geeta: The Ultimate Source Of Out-Of-The-Box Thinking!

The Bhagwad Geeta: The Ultimate Source Of Out-Of-The-Box Thinking!

 

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अटेन्शनवा: भाई किसी को खालिस सोने के बिस्किट चाहिए तो तिवारी सर से मिले अर्जेन्टी (व्यंग्य लेख )

ये सोने के बिस्कुट मै नहीं हज़म कर पाता हूँ :P

ये सोने के बिस्कुट मै नहीं हज़म कर पाता हूँ 😛

मेरे कुछ मित्र भी गजब ही है। बैठे बिठाये लिखने का मसाला दे जाते है। ये तिवारी जी, लखनऊ वाले, मेरा सौभाग्य कहिये या मेरा दुर्भाग्य कि मेरे बचपन के परम मित्रो से है। तब से लेकर आज तक मुझसे गठबंधन किया बैठे है। अब बचपन में तो अच्छे बुरे की पहचान तो होती नहीं वर्ना इस तरह के खतरनाक मित्रो को मै जरा भी लिफ्ट नहीं देता हूँ। खैर ये ‘सड़ी मूँगफली स्कूल’ के काबिल हस्ताक्षर थें। इस स्कूल का असली नाम पाठको को नहीं बताऊंगा क्योकि जिनको समझना है उनके लिए इतना इशारा काफी है। कभी किताब लिखने का मौका मिला तो इस स्कूल के सभी नमूनों के बारे में विस्तार से लिखूंगा लेकिन ये इसी स्कूल की देन है कि खुली आँखों से सोना मुझे आ गया। सुबह सुबह इतने उबाऊ पीरियड में कौन इतना उच्च चेतना संपन्न था कि वो पूरे होशो हवास में रह पाता। कम से कम मै तो नहीं था। और निगम, जो पूरी सर्दी में शायद  तीन चार बार नहाने को महान कार्य समझते थें, तो बिलकुल नहीं था क्योकि उसको तो हमी सब उठाकर स्कूल लाते थें आँखों में नींद लिए। यहाँ भी कोई गांधी थें जिनके महाऊबाऊ विश्वशान्ति वाले भाषण सुबह सुबह असेंबली लाइन में सबसे आगे खड़ा होकर सुनने के कारण कुछ कुछ “अटेंशन डिफिसिट” सा हो जाता था, कही शान्ति आये ना आये पर मेरा मन जरूर अशांत हो जाता था। लगता था कि काश इस युग में भी धरती फट जाए सोचते ही मान तो कुछ देर के लिए वहा  रेस्ट कर लूं। पर किसी शापित देव सा ना सुनने लायक भी सुनने को मजबूर था। 

तो इसी तिवारी साहब ने, मेरे तमाम अशुभ ग्रहों के एक जगह आ जाने के कारण प्रतीत तो यही होता है, मुझे फोनवा करके, आवाज बदल के खालिस भयंकर डान की माफिक एक ढोंगी पाखंडी की तरह राम राम कहने के बाद मुझे सूचित किया कि  “आपके सोने के बिस्कुट आ गए है। बताये कहा डिलिवेरी करनी है। जाहिर सी बात है इस दुष्ट आत्मा से, भाई मै कहा जानता था कि तब तिवारी आवाज बदल कर बोल रहे है गोपनीय नंबर से, पूछना पड़ा कि आप बोल कौन रहे है। उधर से जवाब आया कि अरे लीजिये “आप अपने एजेंटो को नहीं पहचानते”। मुझे फिर कहना पड़ा कि आप बताते है कि कौन बोल रहे है कि मै बंद कर दू नंबर। तब उन्होंने राज खोला अरे मै तिवारी बोल रहा हूं पहचाना नहीं। एक नया नंबर मिल गया था जिसमे फ्री टॉक टाइम था तो सोचा इसका इस्तेमाल कर लूं। अब गरिया तो सकता नहीं था क्योकि वो मेरी आदत नहीं और दूसरा वो इस बोली भाषा में हिट था। वैसे ये कई धंधे आजमा चुके है सो मुझे ऐसा प्रतीत हुआ लगता है इनके फील्ड में रिसेशन आ जाने क्या पता ससुरा गोल्ड बिस्कुट का डीलर बन गया हो । 

वो बहुत खुश था शोले के गब्बर की तरह मुझको डरा समझ के। लेकिन मै जिस वजह से परेशान था उसकी वजह वो नहीं थी जो तिवारी साहब समझ  रहे थें। लेखनी की वजह से मै अपने नंबर सहित काफ़ी सर्कल्स में पहचाना हुआ हूँ जिसमे खाड़ी देशो के मित्र, अपना प्रिय पडोसी पाकिस्तान भी है, के लोग शामिल है, और इसके अलावा इंटेलिजेंस सर्विसेज के लोग भी है। इन साहब की नादान हरकत, जो क़ानूनी परिभाषा के तहत जुर्म की श्रेणी में आता है पर  इनकी बोल्ड आत्मा इस नाजुक आत्मा की  इस बात को मानने से इंकार करती थी, किसी विपत्ति को जन्म दे सकती थी। खैर इनको मुझे समझाना पड़ा कि टेक्नोलाजी के इस युग में जब भाई लोग मर्द हो के भी औरत की आवाज़ में बतिया सकते है, फर्जी स्टिंग आपरेशन होते है, मुझे इस बात की परवाह तो करनी पड़ेगी न कि उधर तिवारी ही बोल रहे थें बिना अपने किसी चमचों के। चमचा का मतलब यहाँ पे फटीचर मीडिया के लोग जो आवाज़ रिकार्ड करके खबरे बनाते है या चमचा माने वो जो फिल्मे परदे में एक मेन विलेन के पीछे पीछे चलते है। खैर मेरी बात की गंभीरता का वो आशय समझ गए पर ये बताने से नहीं चूके कि हाई प्रोफाइल नम्बरों से भी वो ऐसा ही कर सकते है और कोई उनका कुछ नहीं कर सकता या ऐसा करने से कुछ होता नहीं है। 

हां आप सही कह रहे है कि कुछ नहीं होता मगर इन्ही अफवाहों के चलते सिक्योरिटी एजेंसीज की नींद हराम हो जाती है और असली वारदात के समय ये बेचारे कुछ नहीं कर पाते, महत्त्वपूर्ण ट्रेने ऐसी ही बातो के चलते समय से चल नहीं पाती, दंगो के वक्त इस तरह की बाते शोलो को और भड़काती है। अरे साहब कुछ नहीं होता है  तो पीएमओ आफिस में डीलिंग कर लेते तो क्या पता तुम्हारे सोने के बिस्कुट इस देश की दरिद्रता कुछ कम कर देते! तिवारी जी हम जैसे मुद्रा विहीन के यहाँ तो तुम्हारी डीलिंग फ्लाप हो गयी लेकिन पीएमओ आफिस से भयंकर लोग तुम्हे उठाकर तो जरूर ही ले जाते, तुम्हारे  सोने के बिस्कुट बिकते या न बिकते। नालायक कही का ये तिवारी कभी सुधर नहीं सकता। एक बचपन के मित्र की कायदे से मदद करने के बजाय लगा उसे सोने के बिस्किट खिलाने। पता नहीं तुम सोने के बिस्कुट बेचने की हिम्मत रखते हो कि नहीं लेकिन इतनी औकात तो रखते ही हो कि कम से एक मिनी ट्रक बिस्किट ही बच्चों के लिए मेरे घर भेजवा देते। कुछ मै खाता कुछ मोहल्ले के बच्चो को बटवा देता। उनकी दुआओं से तुम्हारी ज़िन्दगी संवर जाती। लेकिन आज जब एक ब्राह्मण ही दूसरे ब्राह्मण की धोती खीचने में लगा हुआ है तो तुम कैसे अपवाद बन जाते। लगे मुझ जैसे फक्कड़ आत्मा को ही सोने के बिस्कुट बेचने जो सदा से ही यही गीत गाता  रहा हो कि “कोई सोने के दिलवाला, कोई चाँदी के दिलवाला, शीशे का है मतवाले तेरा दिल, महफ़िल तेरी ये नहीं, दीवाने कही चल”

तिवारी के बारे में मेरे गाँव की पगली लड़की, और इन तिवारी साहब को इस लड़की की बात बुरी नहीं लगनी चाहिए क्योकि वो भी तिवारी ही है, बिलकुल सही कहती थी कि जब “सौ पागल मरते है तो एक तिवारी का जन्म होता है”। पता नहीं कितनी सच थी उसकी बात लेकिन तिवारी लोगो में पायी जाने वाली अराजकता को देखता हूँ तो मन इस  बात पे आकर टिक जाता है। खैर इन तिवारी साहब का निगम की ही तरह कितना बढ़िया जजमेंट सेंस है ये बताना जरूरी हो जाता है। ये बताना भी जरूरी हो जाता है कि इनको कक्षा चार से ये विलक्षण शक्ति प्राप्त थी कि कौन से लड़की किस लड़के से ज्यादा बतियाती थी। और ये न्यूज़ नमक मिर्च लगा के सब तक सर्कुलेट कर देते थें। मेरे क्लास की लड़की अगर मेरे मोहल्ले में रहती थी तो इनके पेट में दर्द जरूर होता  था। और निगम का भी होगा ये तो तय था। इन दोनों की जजमेंट शक्ति कितनी उच्च थी। अभी पता चल जाएगा। खैर मै जब अपने गाँव में जाता था तो तिवारी सिर्फ यही सूंघ पाते थें कि जैसे मै  इसी खतरनाक पगली लड़की से,जो तिवारी वर्ग में पाए जाने वाली सब महान शक्तियों से लैस थी, से बतियाने जाता था। ये तो कभी सूंघ नहीं सकते थे कि बरसात के कीचड भरे रास्ते,  भयंकर ठण्ड से भरे दिन और राते, भीषण गर्मी में बिना किसी पंखे वाले कमरे में, किसी तरह जो भी मिला वो खाकर अपने खेतो में क्या हो रहा है देखता था। हा ये उन्होंने अनुमान लगा लिया कि गंगा नदी के तट पर स्विट्ज़रलैंड की हसीन वादियों में जैसे लोग टहलते है, वैसे ही मै लेकर उसको विचरण करता हूँगा। अब लखनऊ की चमकती रोमान्टिक गलियों में पले  बढे, नाम मात्र रूप से गाँव के सामाजिक परिवेश को जानते हुए- कभी  असल ब्राह्मण बहुल्य गाँव में तो कभी रहे ना होंगे-को इससे बेहतर क्या समझ में आ सकता था। मुझे इनकी समझ से कुछ लेना देना नहीं पर तिवारी साहब ये आप जान ले कि गाँव में चाहे वो गँगा के तट हो या खेत सुबह शाम नित्य कर्म करने वाले लोगो से पटे रहते है तो कोई कैसे किसी को इस तरह रोमान्टिक तरीके से घुमा सकता  है? मै तो गाड़ी भी ड्राइव नहीं कर पता कि चल कही दूर निकल जाए ऐसा कुछ भी हो सकता। लेकिन इनको क्या और निगम को क्या। सोचने लगे तो यही सब सोच डाला। और सुनिए आप मेरे गाँव में आइये तो ये ट्राई भी मत करियेगा, हा किसी और के बारे में आप कुछ भी सोच ले ये अलग बात है, वर्ना गाँव के लोग कूट काट  डालेंगे। गाँव वाले न शहर वालो को ठीक नज़र से देखते है और शहर वाले तो शहरीपने के चलते गाँव वालो को शुरू से ही गंवार समझते रहे है।

और निगम साहब को उस उम्र में जिसमे प्यार की भावना एक नैसर्गिक प्रक्रिया होती है ये साहब तब भी भयंकर फिल्मी अंदाज़ में मुझे समझाते थे “प्यार वो करते है जिनकी जागीर होती है”। वैसे उसकी बात में कडुवी सच्चाई थी ये मै मानता हूँ पर सच नहीं थी सोचने पर। बिल्कुल सच नहीं थी। क्योकि निगम जी जागीर वाले सब कुछ कर सकते है प्रेम नहीं कर सकते। ये ज्यादा से ज्यादा इस लड़की के साथ टहलेंगे, फिर कल किसी दूसरे के साथ टहलेंगे और अंत में आपको पता चलेगा इन्होने माता पिता का सम्मान करते हुएं रीति रिवाजों के साथ किसी जागीरवाली लड़की के साथ शादी कर ली। अपवाद हो कोई वो अलग बात है पर ज्यादातर तक जागीर वालो का  इतिहास ऐसा ही रहता है प्रेम के नाम पर। वैसे निगम तिवारी से बतिया लेना क्योकि मुझसे कह रह था कि “अलीगंज सेक्टर डी”  से कपूरथला काम्प्लेक्स की दूरी कोई लन्दन से पेरिस तक जितनी नहीं थी कि जो आके अपने बचपन के मित्र का हाल चाल भी न ले सके। ये कायस्थ वर्ग के चरित्र की निशानी है कि अपने सीमित स्वार्थ से ज्यादा दूर तक नहीं सोच पाते। ये अलग बात है बाभनो से पटती भी बहुत है जो इस सोच के ठीक विपरीत होते है। 

वैसे बात सोने के बिस्किट से शुरू हुई थी तो समापन भी ऐसे ही होगा। भाई तिवारी अमीनाबाद चले जाना वहा अपने सड़ी मूंगफली स्कूल के ही एक परम मित्र रहते है अपने ही बचपन के जिनसे जब मै बातचीत करने का इच्छुक होता हूँ तो इस भय से नहीं करता हूँ कि कोई फायदा नहीं क्योकि आपने फ़ोन किया नहीं कि उधर से आवाज़ आएगी कि अरे वो तो मजलिस में गए है। बहुत अच्छा उसका बिज़नस सेन्स है। वो जरूर बिकवा देगा तुम्हारे बिस्कुट। नहीं तो इसी स्कूल के एक सज्जन खुर्रम नगर में रहते है जो फेसबुक मित्रो मे एक बेहतर क्लासिक पोज़ में मौजूद है चश्मे सहित। वहा  चले जाना तुम्हारा काम हो जाएगा। ये लोग बहुत काबिल है। मेरे जैसे साधन विहीन लेखक वर्ग के जरिये तुम अपने सोने के बिस्किट कभी नहीं बेच पाओंगे। अब ये भी धंधा चालु कर दिया है तो कम से कम धंधे में तो थोडा से बेहतर जजमेंट सेंस रखो कि कहा तुम्हारा माल बेहतर बिक सकता है। ऐसे तो तुम दिवालिया हो जाओगे। आया समझ में। और मुझसे मिलने आना तो कम से कम पारले जी वाला बिस्कुट लेते आना। बचपन से इसी बिस्कुट की लत जो लगी है। सोने के बिस्कुट हज़म  करने की लत मुझे कभी नहीं पड़ी और न पड़ेगी। और निगम तुम्हारे लिए तो यही लाइन उपयुक्त रहेगी: सोना नहीं, चांदी नहीं, अरे यार तो मिला जरा प्यार कर ले।

अपना प्यारा लखनऊ :-)

अपना प्यारा लखनऊ 🙂

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ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर रेलवे अफसर।

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