Category Archives: Gujarat Riots

मोदी से जुडी कुछ बाते: ना पक्ष में और ना विपक्ष में !

मोदी आ जरूर रहे है लेकिन उनके लिए प्रधानमंत्री का मुकुट किसी कांटो से भरे ताज के समान ही होगा। देखना यही है कि इन विषम परिस्थितियों में वे किस तरह देश को विकास के राह पे ले जाते है. सबसे बड़ी बात यही है कि हिन्दू जनमानस के भावनाओं का वो कितना ख्याल रख पाएंगे इस तरह के माहौल में जहा सिर्फ मुस्लिम अधिकार या क्रिस्चियन अधिकार ही सेक्युलर भावना का आधार बन चुके है!

मोदी आ जरूर रहे है लेकिन उनके लिए प्रधानमंत्री का मुकुट किसी कांटो से भरे ताज के समान ही होगा। देखना यही है कि इन विषम परिस्थितियों में वे किस तरह देश को विकास के राह पे ले जाते है. सबसे बड़ी बात यही है कि हिन्दू जनमानस के भावनाओं का वो कितना ख्याल रख पाएंगे इस तरह के माहौल में जहा सिर्फ मुस्लिम अधिकार या क्रिस्चियन अधिकार ही सेक्युलर भावना का आधार बन चुके है!


चुनाव के वक्त किसी एक बड़ी लहर का होना एक विशेष घटना होती है. लहर तभी होती है जब किसी जनप्रिय नेता का अचानक निधन हो जाए दुखद तरीके से या राजनैतिक हलकों में किसी स्कैम या स्कैंडल की वजह से किसी ख़ास पार्टी की तरफ लहर का माहौल बन जाए. इसलिए मोदी के पक्ष में लहर कई कारणों से अनोखी है. एक तो ये किसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना की उपज नहीं है और दूसरी ये कि ये किसी बड़े कारण से नहीं उपजी है. इस लहर के पीछे कारण सिर्फ ये है कि लोग बदलाव चाहते है. कांग्रेस के कथनी और करनी में फर्क को देखते देखते लोग त्रस्त हो चुके है. ऐसे में नरेंद्र मोदी जिन्होंने गुजरात में अच्छा काम कर दिखाया तमाम विघटनकारी शक्तियों से सामना करते हुए वे लोगो के नज़रो में आशा की एक बड़ी किरण बन के उभरे है. और इस कदर उभरे है कि हर गली कूंचो में लोग इनके बारे में चर्चा कर रहे है. इन चर्चाओ में हर तबके के लोग शामिल है और हर उम्र वर्ग के लोग शामिल है. देहातो में आप निकल जाए वहा भी मोदी की लहर है. और ये सिर्फ सुनियोजित प्रचार के चलते संभव नहीं हुआ है बल्कि आश्चर्यजनक तरीके से मोदी में उपजे विश्वास के चलते सम्भव हुआ है.

नरेंद्र मोदी ने गुजरात में अच्छा काम किया ये तो है ही लेकिन कांग्रेस का दोहरा चरित्र लोगो ने भली भाँति समझ लिया ये एक बड़ी वजह है. लोगो ने ये समझ लिया है कि कांग्रेस राज के चलते इस देश में कुछ भी सही संभव नहीं. ये सिर्फ लोगो का शोषण करने के लिए बनी पार्टी है जिसमे नेता के नाम पर किसी एक परिवार के प्रति सम्मान रखने वाले चापलूस भरे पड़े हैं. ऐसा शायद ही कभी इस देश में हुआ हो कि किसी  प्रधानमन्त्री की छवि इतने असहाय और कमजोर व्यक्ति के रूप में उभरी हो जबकि उसके पास गुणों का भण्डार रहा हों. उसकी सबसे बड़ी वजह ये थी कि कांग्रेस ने कभी भी अच्छे आदमी को ताकत नहीं सौपी. सिर्फ उन्ही लोगो को आगे बढ़ाया जिन्होंने चमचागिरी और चाटुकारिता में यकीन रखा. अच्छे लोगो को कांग्रेस ने निकम्मा बना के छोड़ा. अब की  पीढ़ी ने ये कांग्रेस का चरित्र समझ लिया और वो बदलाव चाहती है. मोदी ना होते कोई और नेता इतने ही कद का होता तो वो भी लहर को जन्म दे देता. लेकिन नियति ने यह एक मौका मोदी को दिया है.

अगर हम मोदी के नज़रिये से देखे तो ये एक अच्छी घटना भी है और अच्छी नहीं भी है. वो इसलिए कि विरोधाभासों से भरे इस देश में जब आप किसी एक व्यक्ति पे इतना भरोसा कर लेते है और उससे इतनी सारी उम्मीदे पाल लेते है तो ऐसे में उसको अपने पोटेंशियल को आज़माना और सब की उम्मीदों पर खरे उतरना असंभव सा हो जाता है. लोगो का मोदी के प्रति उत्साह देख कर तो ये लगता है कि मोदी के आने के बाद क्रन्तिकारी बदलाव आएगा उस देश में जो पिछले साठ-सत्तर सालो क्या कई युगो से गुलामी के चक्र में पिसता चला आ रहा है. ये लोगो का इस कदर उम्मीदे पाल लेना, इतना उत्साह से लबरेज़ हो जाना खलता है. लोगो को उम्मीदे पालने में तार्किक और न्यायसंगत होना चाहिए ताकि आने वाला आदमी कुछ सही कर पाये वरना कुछ समय बाद लोग फिर चिढ़ने, कुढ़ने और गरियाने लगते है.

गुजरात के दंगो की बात करने वाले गोधरा नरसंहार पे चुप्पी साध लेते है !

गुजरात के दंगो की बात करने वाले गोधरा नरसंहार पे चुप्पी साध लेते है !

आप पहले इस देश का चरित्र देखे. जिस कांग्रेस पार्टी ने इतने सालो तक राज किया उसके पास किस तरह के नेता है. जो इनका यूथ  आइकॉन है इनकी नज़रो में और जो दुर्भाग्य से इनका प्रधानमंत्री पद का दावेदार भी है वो इतनी निकृष्ट सोच रखता है कि वे किसी की निजी जिंदगी में कीचड़ उछालने से बाज़ नहीं आता जबकि यही पार्टी महिलाओं का सम्मान करने का दम्भ पालती है! ये पार्टी युवा सोच का सम्मान करने वाली के रूप में अपने को प्रमोट कर रही है. तो क्या युवाओ की सोच इतनी सतही हो गयी है कि सत्ता का मोह किसी के निजी जिंदगी के उन किस्सों को उजागर करे जिनका वर्तमान से कुछ लेना देना ना हो?

इस देश में कांग्रेस के अलावा कुछ तथाकथित सेक्युलर पार्टिया भी है जिन्हे अपने प्रोग्रेसिव होने का दम्भ है और विगत वर्षो में ये कुछ इस कदर प्रोग्रेसिव हुई कि मुख्यधारा में शामिल राजनैतिक दलों के समूह से ही इनका लोप हो गया. बल्कि राजनैतिक दल के रूप में मान्यता भी घटे वोट प्रतिशत के कारण समाप्त हो गई. लेकिन इनके कुछ प्रकाशन अभी भी इनके नाम का भोंपू बजाते रहते है बेसिर पैर के लेखो के जरिये. सो इन प्रकाशनों के जरिये ये सन्देश दिया जा रहा है कि मोदी के आ जाने से “नरम फांसीवाद” का उदय होगा और ये कुछ ऐसा ही है जिस तरह हिटलर ने सत्ता प्राप्त की थी. इस तरह की सायकोटिक और पैरानॉयड सोच की वजह से ही भारत की जनता ने इन्हे मुख्यधारा से ही हटा दिया. इनका खुद का इतिहास ही क्रूर तानाशाहों से भरा रहा है लिहाज़ा इनका इस तरह से भयाक्रांत होना और लोगो में भी बेवजह भय उत्पन्न करना इनका एकमात्र धंधा बन गया है. ये खुद कितने साफ़ सुथरे चरित्र वाले रहे है इसका नमूना तो आप पश्चिम बंगाल में देख सकते है जहा मार्क्सवादी गुंडों ने कितने सालो तक आर्गनाइज्ड बूथ कैप्चरिंग करके किसी को सत्ता में आने ना दिया. कथनी और करनी में कितना ज्यादा फ़ासला हो सकता है ये इस पार्टी ने देश में सबको दिखाया।

इसी पार्टी की विचारधारा के लोगो ने देश और विदेश की  मेनस्ट्रीम मीडिया में अपने दलाल रख छोड़े है जिनका मुख्य काम यही है कि जहा दक्षिणपंथी सोच हावी होते हुए दिखे वहा पे तुरंत इस बात को प्रचारित करना शुरू कर दो कि देश की कल्चरल डाइवर्सिटी को खतरा है, मुसलमानो के बुरे दिन आ गए है, क्रिस्चियनस के बुरे दिन आ गए है इत्यादि. गुजरात के दंगो का जिन्न भी निकल कर बाहर आ जायेगा. याद करिये जब गुजरात में मोदी एक बार फिर बहुमत से जीत कर आये थे तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया उस वक्त किस नज़रिये से जीत को देख रही थी; ये देखे कि इस बात पे बहस हो रही थी कि मुस्लिमो का वोट प्रतिशत क्या रहा है और कहा पे मुस्लिमो ने वोट दिया और कहा नहीं दिया! मुस्लिम वोट के नाम पे होने वाले तमाशे को खुद मुस्लिम ही अगर सुलझा सके अपनी कबीलाई मानसिकता से ऊपर उठ कर तो बेहतर होगा. क्योकि बाहर से कोई इन्हे समझाए प्रेशर डाल कर तो खुद इनके भीतर और बाहर भी एक गलत सन्देश जाता है. लिहाज़ा इन्हे ही कुछ करना होगा ताकि इनके नाम पे होने वाले वीभत्स तमाशे बंद हो सके. पता नहीं क्यों मुस्लिमो ने हमेशा अपने को इस्तेमाल होते रहने देना पसंद किया है? इनके अंदर अभी भी बंद दिमागों का प्रभाव है जो इन्हे कभी भी वर्तमान में सही तरीके से जुड़ने से रोकता है और हर गलत ताकत से इनको जोड़ देता है. हो सकता है इनको अपने इस्तेमाल होते रहने में हित सधते दिखते है!

अमेरिका को ना पाकिस्तान में हुए हिन्दुओ पर अत्याचार दिखा और ना ही कभी उसे पाकिस्तान में कल्चरल डाइवर्सिटी खतरे में दिखी! केवल भारत में ही उसे ये खतरा दिखता है और वो भी चुनावो के वक्त या किसी और नाजुक समय में!

अमेरिका को ना पाकिस्तान में हुए हिन्दुओ पर अत्याचार दिखा और ना ही कभी उसे पाकिस्तान में कल्चरल डाइवर्सिटी खतरे में दिखी! केवल भारत में ही उसे ये खतरा दिखता है और वो भी चुनावो के वक्त या किसी और नाजुक समय में!

ऐसा नहीं कि हैलुसिनेशन का शिकार मेनस्ट्रीम मीडिया या राजनेता सिर्फ भारत में ही हलचल मचाते है बल्कि ऐसे नाज़ुक क्षणों में विदेशो में भी इस तरह के हैलुसिनेशन से ग्रसित लोग हर तरह की नौटंकी करने लगते है. अब अमेरिका में देखिये जैसे ही वहा के लोगो को मोदी के सत्ता में आने की संभावना दिखी वही पे अमेरिकी कांग्रेस में अच्छी खासी बहस छिड़ गयी कि मोदी के आगमन का मतलब कल्चरल डाइवर्सिटी को खतरा है जबकि भारत ही वो देश है साउथ एशिया में जहा कल्चरल डाइवर्सिटी सबसे स्थिर रही है. बिडम्बना देखिये कि रेसोलुशन ४१७ तब कभी नहीं लाया गया जब पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिन्दू और सिख संप्रदाय पे बर्बर जुल्म हुए और उनका प्रतिशत लगातार घटता रहा इनके पलायन की वजह से. खुद अपने देश में कश्मीरी पंडितो पे हुए जुल्म को किसी अमेरिकी संस्था ने संज्ञान में लेने की कोशिश नहीं की. इस रेसोलुशन में गुजरात दंगो के लिए मोदी को जिम्मेदार माना गया जो ये दर्शाता है कि निहित स्वार्थ के चलते सोचने वाले दिमाग कितने संकीर्ण हो जाते है. ये बहस तब हो रही है जब सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चले गहन इन्वेस्टीगेशन ने मोदी को क्लीन चिट दी और यहाँ तक कि गुजरात दंगो की दोबारा जांच की मांग को भी ख़ारिज कर दिया. गोधरा में ट्रेन में हुए नरसंहार को भी स्पेशल कोर्ट  ने एक संप्रदाय विशेष को ही दोषी माना और इसमें शामिल लोगो को मौत की सजा दी. अमेरिका जो ऊँची सोच का दम्भ रखता है शायद उसे भारत की न्याय परंपरा से अधिक संकीर्ण सोच से ग्रसित और गलत ताकतों द्वारा पोषित मेनस्ट्रीम मीडिया के कुछ प्रकाशनों पे ज्यादा ही भरोसा है.

 मोदी आ जरूर रहे है लेकिन उनके लिए प्रधानमंत्री का मुकुट किसी कांटो से भरे ताज के समान ही होगा. देखना यही है कि इन विषम परिस्थितियों में वे किस तरह देश को विकास के राह पे ले जाते है. सबसे बड़ी बात यही है कि हिन्दू जनमानस के भावनाओं का वो कितना ख्याल रख पाएंगे इस तरह के माहौल में जहा सिर्फ मुस्लिम अधिकार या क्रिस्चियन अधिकार ही सेक्युलर भावना का आधार बन चुके है! क्या वो विखंडित हिन्दू आस्था को  एक बेहतर मजबूती दे पाएंगे? क्या  इतनी सारी उम्मीदे पाले असंख्य लोगो की  आशाओ पे मोदी खरे उतर पाएंगे? ये तो सिर्फ अब आने वाला वक्त ही बतायेगा. बेहतर तो यही है कि इतनी सारी उम्मीदे पालने से अच्छा है कि मोदी को अपने हिसाब से चलने दिया जाए!

अमेरिका में मानवाधिकार की ऊँची ऊँची बाते करने वाली संस्थाओ ने कभी भी कश्मीरी पंडितो के दुर्दशा को संज्ञान में नहीं लिया !

अमेरिका में मानवाधिकार की ऊँची ऊँची बाते करने वाली संस्थाओ ने कभी भी कश्मीरी पंडितो के दुर्दशा को संज्ञान में नहीं लिया !

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मुजफ्फरनगर के दंगे: कुछ कडवे भयानक सच जिनका जिक्र ना हुआ!

ये सब कहा छुपा के रखे जाते है?

ये सब कहा छुपा के रखे जाते है?

अखिलेश यादव  जब भारतीय राजनीति में अहम् किरदार अदा करने वाले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो कुछ लोगो में शायद ये झूठी आस जाग उठी कि शायद एक युवा चेहरा कुछ बेहतर परिवर्तन ला दें. लेकिन सिर्फ चेहरे बदलने से चाहे वो युवा ही क्यों ना हो तब तक बात नहीं बनती जब तक आप के पास स्पष्ट नीति ना हो. हुआ भी वही लोक लुभावनी योजनाओं के दम पर बनी ये सरकार आज ना सिर्फ विवादों में फँस गयी है जहा नौकरशाह सहमे से है बल्कि नित नए दंगो ने प्रदेश को अशांत क्षेत्र बना दिया है. मुज़फ्फरनगर के दंगे वीभत्स तस्वीर पेश करते है और ये बताते है कि राजनेता किस हद तक गिर सकते है अपने प्रभाव को बचाने के लिए. 

हम कानून राज की बात करते है और दामिनी बलात्कार काण्ड पर इस देश में बहुत उबाल उठा लेकिन मुजफ्फरनगर में इस दंगे से पहले कितने बलात्कार हिन्दू औरतो के साथ मुस्लिमो ने किये उसको किसी सरकार ने संज्ञान में लेने की जरुरत क्यों नहीं महसूस की? इसकी वजह से सात सितम्बर को जाट समुदाय ने एक पंचायत बुलाई  गयी बहु बेटियों के सुरक्षा के लिए. इसमें शामिल होने के लिये जा रहे लोगो पे हमले हुए और उसके बाद स्थिति बेकाबू हो गयी.  जब किसी सरकार के पास नीति नहीं होती तो ताकतवर चेहरे कठपुतली की तरह सरकार को नचाते है. यही हाल इस वर्तमान सरकार का भी है. दंगे किस कारण से हुए ये तो कई खबरों का विषय बन गयी है लेकिन इस जरूरी तथ्य पर शायद चर्चा ना हुई हो कि किस तरह खतरनाक हथियारों का जमावाड़ा जिसमे ऐ के 47 बंदूके तक शामिल है मुस्लिम वर्ग में इकठ्ठा है! हैरानगी की बात है कि मस्जिद जो इबादत का ठिकाना होना चाहिए इन हथियारों को छुपाने का केंद्र बनती जा रही है. इंटेलिजेंस विभाग क्या सिर्फ छूरी कट्टे की तफ्तीश के लिए बनी है? 

ये केंद्र सरकार और राज्य सरकार के इन विभागों से पूछा जाना चाहिए कि जब धार्मिक स्थल इस तरह के आतंकी गतिविधियों का ठिकाना बन जाए तो उसके पास क्या रास्ते है इनको समाप्त करने के? या अल्पसंख्यक वर्ग के लोग मनमानी करे और प्रशासन  खामोश रहे तो उसके क्या नतीजे होंगे? क्योकि ये तय है कि अगर कार्यवाही हुई तो वही मुस्लिमो के साथ भेदभाव हो रहा है, उन्हें सताया जा रहा है, फँसाया जा रहा है इस तरह का शोर हर तरफ से उठेगा। इसलिए अगर सरकार के पास हिम्मत ना हो तो कम से कम सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट इस तरह के भयानक सच को  स्वतः संज्ञान में लेकर केंद्र और राज्य सरकार को विवश करे ये बताने के लिए कि इसके रोकथाम के लिए इनके पास क्या तरीके है और अब तक इन्होने क्या किया है?

गुजरात के दंगो पे गोधरा का सच भुलाकर सेक्युलर मीडिया ने इस बात का बहुत रोना रोया कि गुजरात सरकार ने समय रहते कार्यवाही नहीं की तो अब उत्तर प्रदेश में जो हमने देरी देखी, तथ्यों को नष्ट करके मुस्लिम वर्ग को राहत पहुचाने की कोशिश देखी उसके क्या मतलब निकाले जाए? यहाँ तक कि केंद्र सरकार भी ये कह रही है कि दंगो के भयावहता के बारे में प्रदेश सरकार ने उसे अँधेरे में रखा. खैर इस देश की राजनीति ये हो गयी है कि महिलाओ और अल्पसंख्यको को लुभाओ। उनके हर कुकर्मो पे पर्दा डाल दो. हो सकता है तात्कालिक रूप से महिलाओ और अल्संख्यको को ये सब भला लगे. लेकिन इसका दूरगामी परिणाम ये होगा कि उन महिलाओ और मुस्लिमों को तकलीफ झेलनी पड़ेगी जिनका इस गन्दी राजनीति से कोई वास्ता नहीं होगा। और सबसे बड़ा नुक्सान तो इस देश को होगा जिसने आज़ादी के बाद इस तरह के अलगाववादी  और आसुरी नेताओ के उदय की कल्पना तक ना की होगी।  

दंगे सुनियोजित और प्रायोजित होते है

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भीड़ का मनोविज्ञान: अन्धो के देश में काने राजा बन कर उभरते है!

 इस का मतलब ये नहीं कि मै बाल ठाकरे की नीति या राजनीति का समर्थक हूँ। कतई नहीं। लेकिन एक ठाकरे को कोसना मै  जायज़ नहीं मानता क्योकि इस हमाम में कौन नंगा नहीं? तो सिर्फ ठाकरे से घृणा क्यों? सिर्फ ठाकरे से दूरी क्यों?

इस का मतलब ये नहीं कि मै बाल ठाकरे की नीति या राजनीति का समर्थक हूँ। कतई नहीं। लेकिन एक ठाकरे को कोसना मै जायज़ नहीं मानता क्योकि इस हमाम में कौन नंगा नहीं? तो सिर्फ ठाकरे से घृणा क्यों? सिर्फ ठाकरे से दूरी क्यों?


इसके पहले मै बाल ठाकरे की शोक यात्रा में उमड़ी भीड़ के बारे में कुछ कहूँ ये समझ लेना आवश्यक रहेगा कि प्रजातंत्र में  संख्या बल बड़ा मायने रखता है।प्रजातंत्र का आधार ही यही है कि जिसके पीछे जनता वही हीरो बाकी सब जीरो अब चाहे उसने नंगा करके अपने को भीड़ जुटाई है या सबको दारू रुपैय्या बाँट कर। पर भीड़ के दम पर ही लोकतंत्र चलता है अब चाहे जनप्रिय नेता की बात भीड़ के बीच में बैठे कल्लू को या मंच पे बैठे सेठ किरोड़ीमल को समझ में आ रही हो या ना आ रही हो इससें किसी को क्या मतलब। भीड़ में है यही बहुत है। यही लोकतंत्र का माडल है जिसकी लाठी उसकी भैंस, और जिसके पास सबसे ज्यादा लाठी उसके पास पूरा देश। 

इस तर्क के हिसाब से चले तो अल्पसंख्यको के दम पर राजनीति करने वालो के मुंह पर ठाकरे साहब मर कर भी कस कर तमाचा लगाने से नहीं चूँके। बाल ठाकरे का मै कोई प्रशंसक नहीं क्योकि मूलतः मै उग्र विचारधारा का समर्थक नहीं  हूँ क्योकि उग्रता इस देश का स्वभाव कभी नहीं रहा है। लेकिन आसुरी प्रवत्ति से लैस बढ़ते लोगो का झुण्ड, अल्पसंख्यको के नाम पर होते रोज तमाशे, हिन्दुओ में फैलती कायरता के चलते तहत ये आवश्यक हो गया है कि कुछ शेरदिल नेता पैदा तो हो जो अपनी दहाड़ से कम से कम हिन्दुओ का उत्साह तो कायम रख सके नहीं तो कोई लालटेन जलाकर, कोई हाथी भागकर, कोई साइकिल दौड़ाकर जनता को नित प्रतिदिन बेवकूफ बना कर भीड़ जुटा रहा है। ऐसे में कोई देश को बाटने वाली विभाजनकारी ताकतों को को उनकी ही भाषा में जवाब देकर भीड़ जुटा गया तो इसमें हो हल्ला मचाने की क्या जरूरत है। इसमें इतना आश्चर्यचकित कर देने वाली क्या बात है। 

क्या इसके पहले भीड़ जुटते नहीं देखी किसी ने? आप ने चुनाव की रैली नहीं देखी क्या? मुफ्त में लखनऊ आयेंगे और नेताजी का भाषण सुने ना सुने चिड़ियाघर में शेर के दर्शन करना नहीं भूलेंगे। अगले दिन अखबार में नेताजी का कहिन और भीड़ की फोटु दोनों मौजूद होंगे। और पीछे जाए भारत छोड़ो आन्दोलन में लगभग पूरा देश उमड़ पड़ा था। जय प्रकाश नारायण के आहवान पर क्या भीड़ नहीं उमड़ी थी? खैर उस भीड़ के तत्त्व अलग थें। इस इक्कीसवी सदी के भारत में जब सब नेता स्विस बैंक प्रेमी हो गए है, जब नेता गरीबी को नहीं गरीब को ही हटा दे रहे है, आतंकवादी नेताओ का शह पाकर सलाखों के पीछे बिरयानी काट रहे है तो ऐसे में भीड़ के होने के मायने भी बदल गए है।  

वैसे आश्चर्य है कि बहुत से लोग ठाकरे को साम्प्रदायिक राजनीति करने वाला, उकसाने वाली राजनीति करने का आरोपी मानते है इसलिए अछूत मानते हुए अल्संख्यको की नज़रो में सेक्युलर बनने के लिए शोक यात्रा में नहीं शामिल हुएँ। मै इन विवेकी नेताओ से ये जानना चाहूँगा कि कौन सा नेता सही राजनीति कर रहा है? कौन नहीं राजनीति की दूकान चला रहा है? तो शुचिता का पाठ ठाकरे या मोदी जैसे हिन्दू नेताओ पर ही क्यों लागू होता है? तो क्या  अलगाववादी नेता जो कश्मीर में पंडितो को मारकर, भगाकर आज़ादी मांग रहे है इनके नेता के शोक सभा में होना चाहिए? या इन नेताओ के शोक सभा में होना चाहिए जो सबसे मेहनती मजदूर के नाम पर राजनीति कर रहे है। मजदूर तो वही झुग्गी झोपड़ी वाले रहे लेकिन ट्रेड यूनियन के नेता एयर कंडिशन्ड केबिनो में जा पहुंचे। तो इन नेताओ के मरने पर भीड़ जुटनी चाहिये? या इन “हाथ की सफाई” वाले नेताओ के मरने पर मजमा लगना चाहिए जिनके कुकर्मो की लिस्ट इतनी  लम्बी है कि यमराज के आफिसवाले वाले भी ना पढ़ पाए अगर चाहे तो। या राम लला के नाम पर सत्ता पाने वाले वाले पर राम को ही पीछे  धकिया कर राजनीति करने वाले नेताओ के मरने पे भीड़ होनी चाहिए? तो ये बाल ठाकरे की शोकयात्रा   में उमड़ी भीड़ पर जलने वाले, कुढने वाले, दूर रहने वाले जलते रहे, कुढ़ते रहे, सर नोचते रहे है।     

बाल ठाकरे इन धर्म निरपेक्ष नेताओ से अच्छा नेता था। कम से कम उसका असली चेहरा सामने था। उसने नकाब ओढ़कर राजनीति नहीं की। पीठ  पीछे घात लगाकर हमला  नहीं किया। जो भी किया खुल कर सामने किया। यहाँ का खाकर कठमुल्लों की तरह विदेशी ताकतों की जय नहीं करता था। धर्म निरपेक्ष बनकर बिरयानी तो नहीं काटता था उन आतंकवादियों के साथ जो निरीह लोगो को हलाक करते थें। इस का मतलब ये नहीं कि मै बाल ठाकरे की नीति या राजनीति का समर्थक हूँ। कतई नहीं। लेकिन एक ठाकरे को कोसना मै  जायज़ नहीं मानता क्योकि इस हमाम में कौन नंगा नहीं? तो सिर्फ ठाकरे से घृणा क्यों? सिर्फ ठाकरे से दूरी क्यों? 

रही भीड़ की बात। तो मेरी नज़रो में भीड़ का आना ख़ास महत्त्व नहीं। कल शाहरुख खान इलाहाबाद में रंडी टाइप का ठुमका लगा जाए तो उजड्ड नौजवानों की बेकाबू भीड़ लगेगी चीखने चिल्लाने? तो क्या शाहरूख खान को मै इस भीड़ प्रदर्शन के बल पर पर बहुत बड़ा अभिनेता मान लूं? या कल को कोई ईमानदार आदमी मर जाए और सौ पचास तो छोड़िये दस आदमी भी न शामिल हो तो क्या मै उस आदमी को कमीना मान लूं और इस शोकयात्रा को भी फ्लाप या हिट शो मानने की कवायद में जुट जाऊं ?

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गन्दी राजनीति के भंवर में डूबते हिन्दू मुस्लिम सम्बन्ध

मोदी: इनके अच्छे कार्यो का कोई महत्त्व नहीं क्योकि हमको सिर्फ गन्दा देखना है

मोदी: इनके अच्छे कार्यो का कोई महत्त्व नहीं क्योकि हमको सिर्फ गन्दा देखना है

नरेन्द्र  मोदी से ज्यादा सहानभूति नहीं मेरी. ना मै उनका कोई बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ क्योकि अतिवादिता या उग्र विचारधारा का समर्थन  मै उचित  नहीं मानता. ये अलग बात है कि इस आदमी का जिस पैमाने पे और जिस तरीकें सें विरोध होता है उसको देखते और समझते रहना आपको बहुत कुछ सिखा देता है. ये दिखा देता है कि गन्दी राजनीति किसे कहते है. ये सिखा देता है कि किसी के भूत के नुमाइश में किस तरह कुछ संस्थाएं खुद भूत जैसे सलंग्न है. अब ये आदमी कितना भी अच्छा  कर जाए कुछ लोग इसको देखते ही “गुजरात के दंगो” नाम के महामंत्र का उच्चारण शुरू कर देते है. खैर इस आदमी कि उपलब्धिया दुर्लभ है क्योकि जब केंद्र से किसी राज्य के आंकड़े छतीस के हो तो उस राज्य  का प्रोग्रेस के पैमाने पे सबसे खरा उतरना एक विलक्षण घटना है.

 

मै इस आदमी को इस मामले में अधिक रेटिंग देता हूँ, सम्मानीय मानता हूँ कि इस देश में भरे भ्रष्ट नेताओ से ये बेहतर है क्योंकि कम से कम ये आदमी अपनी बात डंके के छोट पे खरी खरी कहता है और नितीश कुमार की ही तरह इसकी सोच विकास-उन्मुख है. साफ़ साफ़ दो टूंक बात कहना आसान नहीं होता जब तक आप के अन्दर मनन करने की काबिलियत ना हो. आप विवादास्पद हिन्दू मुस्लिम समीकरण को ही लें. इस देश में आज़ादी के समय से सत्ता पे काबिज़ कांग्रेस के रूख को देखे तो समझ में आएगा कि इस पार्टी ने सेकुलर हितो के रक्षा के नाम पर कितनी घिनौनी राजनीति कि जिसका दुष्परिणाम देश में हुएँ भयानक दंगे है. आप ये विडियो देखे और आपको समझ में आ जायेंगा कि कांग्रेस और नरेन्द्र मोदी में फर्क क्या है. आप के ये समझ में आ जाएगा कि कौन है जो हिन्दू बनाम मुस्लिम बाते करता है घिनौने तरीके से. कुल मिला के प्रोग्रेस का पैमाना क्या हो? ये हो कि कुछ ख़ास नाकाबिल लोगो को उच्च पदो पे बिठा दिया जाए क्योकि वे एक वर्ग विशेष का प्रतिनिधित्व करते है?

https://www.youtube.com/watch?v=-ruZLBeelhs&feature=player_embedded

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अंत में थोडा सा हटके.. फालतू और वाहियात के कार्यो में सलंग्न लोगो को भारत रत्न देने की सिफारिश होती है क्योकि इनसे बहुत से लोगो के राजनैतिक हित सध जाते है. इस गंदे समीकरण में आनंद कुमार जैसे काबिल लोग कभी फिट नहीं बैठते. इसलिए ये उपेक्षित रह जाते है. पर क्या सूर्य को काले बादल कभी हमेशा ढके रह सकता है? कभी नहीं. आनंद  कुमार की प्रतिभा मेरा सलाम जिसने उपेक्षित प्रतिभाओ का सही सम्मान किया उन्हें उनकी सही जगह दिला कर.

आनंद  कुमार की प्रतिभा को मेरा सलाम जिसने उपेक्षित प्रतिभाओ का सही सम्मान किया

आनंद कुमार की प्रतिभा को मेरा सलाम जिसने उपेक्षित प्रतिभाओ का सही सम्मान किया

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Hindus Vs Muslims: Revealing Dirty Politics In India

Narendra Modi: When Past Is Used To Corrupt The Future!

Narendra Modi: When Past Is Used To Corrupt The Future!

I have never been sympathetic to causes supported by Narendra Modi. I have never been great admirer of this man, who has now become a key figure in national political landscape of this nation. That’s because extremism of any form or aggressive ideologies never appeal to my instincts. However, it’s highly interesting to analyze the drama of protest and opposition played in his name. His opposition by secular parties of this nation reveals what really constitutes the art of dirty politics. It lets you know how someone’s past is distorted to serve one’s vested interests, how some parties have crossed all limits to paint someone in wrong colours! This man responsible for phenomenal progress in Gujarat is best remembered for riots of Gujarat. That’s so evident the way his adversaries start accusing him of riots whenever something significant flows from his side. Anyway, it’s really unbelievable that a state can achieve such a progress rate when it’s having snake-mongoose type relationship with the Centre. This development story cannot be taken lightly.

I give high rating to this man, treat him worthy of respect, on grounds that his vision is progressive and development oriented. He has the uncanny ability to call a spade a spade in times when speaking in equivocal manner has become order of the day. Mind you ability to speak in clear terms cannot be gained by people in league with cheaper orientations. One has to be man of principles to sound honest. One cannot engage in deeper reflection unless one has got one’s imagination in right place. 

Take for instance controversial equations governing relationship of Hindus with Muslims. Take into consideration the policies unleashed by Congress regimes since India attained freedom. It played the most dirty games all in the name of restoring secular values. As a result of such divisive policies, the nation saw many terrible riots. Have a look at this video. It’s quite revealing! It reveals who is the real culprit and who are the ones really responsible for distorting the face of this nation all in the name of serving the minorities. So what should be the line of action-the vision- to ensure progress in this nation? Should it be that some incompetent people be placed in high positions just because they happen to represent a particular religion?


watch?v=-ruZLBeelhs&feature=player_embedded

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Something out of context to display how right people are being treated in this nation. In this nation lesser names involved in vain acts get recommended for prestigious awards, only because it serves the political interests of people in power. The people like Mathematician Anand Kumar, the owner of Super 30 institution, always remain marginalized. That’s because they never become part of dirty game played in the name of awards. However, sun cannot be overpowered by black clouds. Its existence is synonymous with shining brightly. Hats off to spirit of Anand Kumar, which enabled the underprivileged souls to be on the road to progress.

Anand Kumar: The Man Who Really Deserves Prestigious Award

Anand Kumar: The Man Who Really Deserves Prestigious Award

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Super 30 

Anand Kumar

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डी के बोस उर्फ़ आमिर खान: भ्रूण हत्या सत्यमेव जयते की !!

भ्रूण हत्या सत्यमेव जयते की !

भ्रूण हत्या सत्यमेव जयते की !


मै अगर कुछ कहता हूँ तो उसके आशय बहुत सारे निकल लिए जाते है.  इसलिए मै कुछ कहने के बजाय अब तक मौन ही था इस सत्यमेव जयते तमाशे पर. अखरता बहुत है जब देखता हूँ भांड टाइप के लोगो को संवेदनशील विषयो पर बोलते हुए.  उस पर भी ये और ज्यादा अखरता है कि जो मीडिया आलोचक की मुद्रा में आ जाता है जब कोई विशेषज्ञ इन विषयो पर अपनी राय प्रकट करता है आज इस सतही आयोजन को बहुत सराह रहा है गोया इसके पहले कभी किसी ने इन मुद्दों पर गौर ही ना किया हो?

मै अब भी कुछ नहीं कहता अगर मेरे पत्रकार मित्र आवेश तिवारीजी, एडिटर इन चीफ नेटवर्क सिक्स, के फेसबुक पेज पर मुझे ये शीबा असलम फहमी का लिखा हुआ सन्देश ना पढने को मिला होता. बिल्कुल ठीक प्रतिक्रिया दी है शीबा ने.  मुझे सिर्फ इतना ही कहना है कि कम से कम सतही लोग संवेदनशील मसलो   से अपने को दूर रखे क्योकि उनकी नीयत पे यकीन करना बिल्कुल असंभव काम है.  आमिर एक अच्छे अभिनेता है लिहाज़ा फिल्मो पे ध्यान दे. गंभीर विषयो पे विचार विमर्श करने के लिए अभी इस देश में विद्वानों का अकाल नहीं पड़ा   है जो हम डी के बोस टाइप के लोगो को गंभीरता से सुनने का प्रयास करे.  ये काम मीडिया में फैले दलालनुमा पत्रकार करते रहे.

शीबा असलम फहमी ने ये कहा:

” बोस डी के, आमिर!

ये वही आमिर खान हैं ना जिन्होंने अपनी एक फ़िल्म में कामयाबी का मसाला डालने के लिए महिला जननांग को दी जानेवाली भद्दी गाली पर एक गाना बनाया और उस गाने को फ़िल्म की पब्लिसिटी में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल किया था ? आमिर खान से मेरा सवाल है की कोई कैसे एक महिला का बाप या भई बनने की हिम्मत करे जब इसी कारण उसे गाली से नवाज़े जाने की संभावना बनती हो? आज वे 3 करोड़ प्रति एपिसोड की दर से नारी-चिंता में कामयाबी के झंडे गाड़ रहे हैं. महिलाओं के ज़रिये कामयाब होना है बस, ‘वैसे’ नहीं तो ‘ऐसे’! पहले गाली दे कर, अब गाली दी गई औरत पर ग्लीसरीन बहा कर! ताज्जुब ये की बड़े-बड़े पत्रकार और लेखक भी इस आमिर-गान में पीछे नहीं! बोस डी के, याद आया ! “

इस पर मधुकर पाण्डेय ने ये जोरदार टिप्पणी दी:

” अब मेरे ख्याल में इन्हें अगला एपिसोड उस विषय पर करना चाहिए जिसमें दो-दो तीन तीन बच्चे पैदा करने के बाद एक मर्द अपनी पत्नी को तलाक तलाक तलाक कह कर … उन्हें अंधेरों में भटकने को छोड़ देता है…. और किसी दूसरी औरत से शादी रचा लेता है…….

यह और कुछ नहीं बाजारवाद और राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं (राज्य सभा ) का एक खेल है…..जिसमें भोली जनता बेवकूफ बनायीं जा रही है पर अब लोग ज्यादा मूर्ख नहीं बन सकते…..क्या आमिर खान कश्मीर से पलायन को विवश हुए कश्मीरी पंडितों की समस्याओं को भी इसी शिद्दत से उठायेंगे…क्या वे गोधरा की ट्रेन में मारे गए उन ५० से अधिक मृतकों के घर जाकर हाल चाल पूछेंगे….? सब माया है…सब बाज़ार है…

Reference:

Dainik Bhaskar

Satyamev Jayate

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हिन्दुओ की अपने देश में ही क़द्र नहीं. सिर्फ मै नहीं कहता सब कह रहे है.

 

हिमालय : तुमसे है एक गहरा रिश्ता

हिमालय : तुमसे है एक गहरा रिश्ता

 

कभी कभी कुछ चीजों का समझने के लिए आपको बड़ी बड़ी किताबो के साए में  नहीं रहना पड़ता. लोगो के बीच रहिये बड़े बड़े कडुवे सच आपको सुनने को मिलेंगे. मै चाहता तो पूर्व की भाँति बौद्धिक गिटपिट कर सकता मार्क्स के चेलो की तरह ये समझाने के लिए कि किस तरह से हिन्दुओ की आस्था, उनके मूल्यों या उनके प्रतीकों को बार बार मटियामेट किया जा रहा है. बौद्धिक विमर्श की एक कमजोरी मैंने ये देखी है कि बात सिर्फ बौद्धिक लोगो के बीच ही सिमट के रह जाती है. उसका सन्देश बहुत दूर तक जनमानस में घुस नहीं पाता. लिहाजा ये जरुरी हो गया है कि आम लोगो तक बात आम तरीके से ही पहुचे. या  दूसरे  शब्दों  में उनकी ही कही हुई बात को उनके बीच साफ़ सुथरे तरीके से रखी जाए. बहुत ज्यादा बौद्धिक आंच दे देने से बात का मूल तत्त्व जल के ख़ाक हो जाता है.लिहाजा कुछ बात मै यथावत वैसे ही रख रहा हूँ जो इधर कुछ दिनों में पढने को मिले. इनको आप क्लिष्ट समस्याओं का सरलीकरण ना समझे. ये समझे कि जब एक आदमी किसी बिंदु को समझता है तो कैसे समझता है.  बौद्धिक वर्ग जो इस लेख को पढ़े वो चाहे तो इन्ही बिन्दुओ का विस्तृत रूप अपने संदर्भो की रौशनी में पढ़ सकते है. वैसे ये अच्छा है कि एक आम हिन्दू अब सचेत हो रहा है उस राजनीति को लेकर जो उसके नाम से खेली जा रही है.  हिन्दुओ के अपने अष्मिता से खिलवाड़ का बोध हो चला है.  ये देश के अस्तित्व के लिए सुखद सन्देश है. 

पढ़े और देखे कि साधारण  हिन्दू क्या प्रश्न खड़े कर रहे है जिनसे हमारा बिका हुआ मीडिया हमेशा बचता है. मीडिया में  दलालनुमा पत्रकार  या लंठ मीडिया विशेषज्ञ आश्चर्य है कि कभी इन मुद्दों पे खुल कर नहीं बोलते सिवाय परदे के पीछे छुपे भेड़ियानुमा लोगो के स्वार्थ सिद्ध करने के सिवाय. 

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अल्पसंख्यक के नाम पर चलनेवाली राजनीति  को समझना  जरूरी है.  मुसलमान या इसाई ही क्यों अल्पसंख्यक माने जाते है? 

अल्पसंख्यक किसे कहते है? जिसकी आबादी ४९% हो उसे ? जिसकी आबादी १०% से कम हो उसे या जिसकी आबादी १८% हो…

क्या है परिभाषा…. जैन लोग अल्पसंख्यक है या मुस्लिम समाज? सिख  अल्पसंख्यक है या बुद्धिस्ट ? क्या पारसी (TATA) लोग अल्पसंख्यक है? 

कौन है अल्पसंख्यक?


 Simran Rock

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जरा इन  बयानों को देखिये: 

हजारों सिखों का कत्लेआम – एक गलती
कश्मीर में हिन्दुओं का नरसंहार – एक राजनैतिक समस्या

गुजरात में कुछ हजार लोगों द्वारा मुसलमानों की हत्या – एक विध्वंस 
बंगाल में गरीब प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी – गलतफ़हमी 

गुजरात में “परजानिया” पर प्रतिबन्ध – साम्प्रदायिक 
“दा विंची कोड” और “जो बोले सो निहाल” पर प्रतिबन्ध – धर्मनिरपेक्षता

कारगिल हमला – भाजपा सरकार की भूल
चीन का 1962 का हमला – नेहरू को एक धोखा

जातिगत आधार पर स्कूल-कालेजों में आरक्षण – सेक्यूलर
अल्पसंख्यक संस्थाओं में भी आरक्षण की भाजपा की मांग – साम्प्रदायिक 

सोहराबुद्दीन की फ़र्जी मुठभेड़ – भाजपा का सांप्रदायिक चेहरा
ख्वाजा यूनुस का महाराष्ट्र में फ़र्जी मुठभेड़ – पुलिसिया अत्याचार

गोधरा के बाद के गुजरात दंगे – मोदी का शर्मनाक कांड
मेरठ, मलियाना, मुम्बई, मालेगाँव आदि-आदि-आदि दंगे – एक प्रशासनिक विफ़लता

हिन्दुओं और हिन्दुत्व के बारे बातें करना – सांप्रदायिक
इस्लाम और मुसलमानों के बारे में बातें करना – सेक्यूलर

संसद पर हमला – भाजपा सरकार की कमजोरी
अफ़जल गुरु को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद फ़ाँसी न देना – मानवीयता 

भाजपा के इस्लाम के बारे में सवाल – सांप्रदायिकता
कांग्रेस के “राम” के बारे में सवाल – नौकरशाही की गलती

यदि कांग्रेस लोकसभा चुनाव जीती – सोनिया को जनता ने स्वीकारा
मोदी गुजरात में चुनाव जीते – फ़ासिस्टों की जीत

सोनिया मोदी को कहती हैं “मौत का सौदागर” – सेक्यूलरिज्म को बढ़ावा
जब मोदी अफ़जल गुरु के बारे में बोले – मुस्लिम विरोधी

क्या इससे बड़े विरोधाभास उत्पन्न किये जा सकते है ?

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Shwetank Tyagi

भारत में आतंकवाद करने के फायदे-

१.स्केच ऐसा बनेगा आपका की आप खुद ही अपनेको नहीं पहचान पाओगे..

२.अगर पकडे गए तो बिरयानी खाने को मिलेगी

३.हमारे गूंगे प्रधानमंत्री से अधिक मीडिया में दिखेंगे..!!

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In
1947
Hindu – 33 crore (94%)
Muslim – 3 crore (5%)
Others – 1 crore (1% )

In 2008:Hindu – 82 crore (75%) i.e.
growth rate in 61 years 249% @
4.07% per year
Muslim – 25 crore (23%) i.e.
growth rate in 61 years 833%
@13.7% per year
Others (Christians) – 3 crore (2%)

Situation in 2035 would be:

Muslim – 92.5 crore (46.8%)
Hindu – 90.2 crore (45.6 %) that
too if not a single convert to other
religion
Others – 7.6 crore (7.6% )

By 2040 ALL HNIDU FESTIVAL WILL
BE STOPPED
Situation in 2050 would be:
Muslim – 189.62 crore (64%)

INDIA WILL BE DECLARED ISLAMIC
COUNTRY

Hindu – 95.7 crore (32.3%)
Others -10.7 crore (3.6%)

It Doesnt include
Victims of Love Jehad.( Posted  on Facebook Wall )

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Simran Rock:मुस्लमान वन्दे मातरम न बोले तो ये उन का धार्मिक मामला है…..
नरेन्द्र मोदी टोपी ना पहने तो ये उन का सांप्रदायिक मामला है……

डेनमार्क में अगर कोई फोटो बन गयी तो उस का सर कलम ….
श्रीराम की जमीन पर अगर मंदिर बना तो हिन्दू बेशर्म. ….

गोधरा में जो ५६ हिन्दू पहले जले वो भेड़ बकरी…..
और उस बाद जो मुस्लिम मरे वो देश के सच्चे प्रहरी,,,,,

१५ साल पहले ही कश्मीर हो गयी हिन्दुओ  से खाली…..
देश की बढती मुस्लिम आबादी हमारी खुशहाली…….

पठानी सूत,, नमाजी टोपी में वो ख़ूबसूरत…
हम सिर्फ राम कह दे तो आतंक की मूरत

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PATRIOTISM OF INDIAN

MUSLIMS – A BALANCED
PERSPECTIVE1) India Muslims are so patriot
that they are worried about
Laden’s (who has declared jihad
against India) burial given by
American Government so much
so that the Muslim Newspaper of
India criticized America for it and
sent their stooge Digvijay Singh to
express their sentiments.

2) India Muslims are so patriot
that anybody who allows illegal
Bangladeshi Muslims in India they
will give their votes to them and
anybody who is against
Bangladeshi illegal immigrants
will lose their votes.

3) Anybody who supports Laden
and criticize Hindus is their
messiah like Digvijay Singh. 

4) Many Indian Muslims in

Mumbai are diehards supporters
of Dawood and Indian Mujaheddin.
Muslim ghettos or “Mini pakistan”
in Mumbai provide support to
them.

5) Indian Muslims are so patriot
that ATS of many states say that
they are not getting any support
from Indian Muslim community
and on contrary are facing
harassment from them by using
Human rights violation case
against them.

6) Indian Muslims call pakistanis
as Hum watan brothers and have
sympathies for pakistan.

7) When Pakistani terrorists
attacked Mumbai in 26/11 many
Indian Muslims leaders came with
theories that it is RSS, CIA,
MOSSAD black operations so that
their dear pakistan does not get
entangled in International Row.
Many Indian Muslim leaders
tried to force Indian Government
not to sign Nuclear Treaty with
America because their beloved
Islamic Nation Pakistan will get
weakened compared to India.

9) A Muslim Journalist himself
has revealed in his book BLACK
FRIDAY that it was Indian Muslim
Woman of Mumbai who provoked
DAWOOD to kill innocent Hindus.

10) Many Muslims Imams of UP
and Bihar openly say that they are
ISI agents.

Not every Indian Muslim is traitor
but to take Indian Muslims
Patriotism as granted is also
foolishness.

BEWARE!

by: Hindutva-Vasudhaiva Kutumbakam ********************

कहा मुसलमान खुश नहीं हैं! ??

वे गाजा में खुश नहीं हैं.
वे मिस्र में खुश नहीं हैं.
वे लीबिया में खुश नहीं हैं.
वे मोरक्को में खुश नहीं हैं.
वे ईरान में खुश नहीं हैं.
वे इराक में खुश नहीं हैं.
यमन में वे खुश नहीं हैं.
वे अफगानिस्तान में खुश नहीं हैं.
वे पाकिस्तान में खुश नहीं हैं.
वे सीरिया में खुश नहीं हैं.
वे लेबनान में खुश नहीं हैं.
……………………….. तो, जहां वे खुश हैं?

वे इंग्लैंड में खुश हैं.
वे फ्रांस में खुश हैं.
वे इटली में खुश हैं.
वे जर्मनी में खुश हैं.
वे स्वीडन में खुश हैं.
वे संयुक्त राज्य अमेरिका में खुश हैं.
वे नॉर्वे में खुश हैं.
वे हर देश है जो मुस्लिम नहीं है उसमें खुश हैं.

………………………………….. और वे किसे दोष नहीं है?

इस्लाम नहीं.
उनके नेतृत्व नहीं.
खुद को नहीं.

………… वे देशों जिसमे खुश हैं वे उसे दोष देते है

बहुत खूब और इतना सच

विरासत में मिली कट्टरता

विरासत में मिली कट्टरता

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Ghost Of Gujarat Riots: A Panacea For Secular Souls Lying On Their Death Beds

Ghost Of Gujarat Riots: A Panacea For Secular Souls Lying On Their Death  Beds

The ghost of Gujarat riots acts as panacea for secular souls lying on their death beds. The horror stories conceived by the psuedo-intellectuals still make their presence felt whenever the right wing politics makes its presence felt in this nation. The most amazing thing is that people talking about the killings of Muslims at the hands of Hindus in 2002 Gujarat riots seem to be trapped in some sort of time warp. I mean they fail to acknowledge the role of Narendra Modi in light of recent happenings.

It’s hard task for them to realize that Gujarat has become role model for growth and economic prosperity. They fail to realize that half-truths and falsehood sustained by them with help of biased Indian and foreign media are losing strength with each passing day as we come to face-to-face with new facts pertaining to the riots. They still hail Narendra Modi as “butcher” even as the butcher has now attained new heights with a clean image- an image fit enough to be in the race to emerge as new Prime minister. New heights attained by Narendra Modi has made him pain in the ass for soul indulging in secular politics.

The Gujarat riots provide us an interesting glimpse into the functioning of media and Indian politics. It shows how our media and politics are crippled by mediocre minds, who lack ability to intercept the new realities that have emerged in India and world outside. It’s very clear that politics in India has always been aimed to grasp the power and it’s never been people oriented. It’s never been growth oriented. It’s never been aimed at true “Bharat Nirman“. On the contrary the unholy nexus of power hungry politicians with slavish media always worked to materialize their vested interests. So we have likes of Teesta Setalvad who ” cooked up macabre tales of wanton killings” like “a pregnant Muslim woman Kausar Banu was gangraped by a mob, who then gouged out the foetus with sharp weapons”.

We have likes of Arundhati Roy who used their fertile imagination to talk about killings that never took place at all. The Western media believing these sincere “agents of Satan” painted Modi in all wrong colours and like always used their flawed writings to enter in India bashing. Their writings made India appear a nation that does not respect human rights of minorities!! As a result of such India bashing our secular governments learnt the right lesson and ensured that likes of Afzal and Kasab have their plates of “Biryani” behind the bars!!!

The modus operandi is now not a well guarded secret. The secular writers and media persons of this nation first churn out bullshit and then it gets spread to other parts of world, wherein such half-truths are treated as gospel truth by like minded souls who convert them into special stories. The main intention is to derail the growth of India. That’s the reason why when Karan Thapar interviews Narendra Modi it becomes necessary for him to flaunt his limited knowledge about Godhra happenings, forgetting that Gujarat has entered into new mode after the incident. However, the time has stopped for secular souls and to them the only thing that has taken place in the universe since it came into origin after the big bang is Gujarat riots!!!!

I need to appreciate Ram Jethmalani that he made realize the secular fool Karan Thapar that people like him who own American or British accent usually have a very poor IQ level. It’s pathetic to see that even likes of Romila Thapar can stoop down to an all-time low to appease the secular forces. So she can make a shrill cry that Ayodhya verdict was based on faith and not on facts without bothering to know the content of the judgment in reality. The real tragedy is that most of the other publications or electronic channels make little effort to go into details. They keep repeating the flawed opinions as that serves their vested interest quite well rather than insipid truth. Truth does not make news. However, twisted truth does manage to find many takers.

How can we forget that secular UPA government went out of the way to establish anti- constitutional Banerjee committee, which ensured that Godhra train burning looks “accidental” ? Now that’s the way secularism in India is being promoted. The lies related with minorities after given larger than life image are being presented as truths while the truths related with majority are being presented as falsehood !! What’s really stunning is that media including foreign which boasts of ensuring truth never bothers to cross check the authenticity of facts if it involves the interests of minorities but to ensure the “culpability” of Modi they can pressurize even the Apex court.

The same media never bothers to enquire as to how come so many awards were given by the Indian government to Teesta Stalvad when she had been guilty of lying on oath? How came she became part of government managed committees? Who ensured that a convict like Binayak Sen be part of Planning Commission? Why the media never sheds tears over the way UPA or secular governments misuse constitutional powers?

Ghost Of Gujarat Riots: A Panacea For Secular Souls Lying On Their Death  Beds

Why is the media so hyper conscious in targeting anything remotely serving the cause of Hindus? In other words, the way Indian media is interested in targeting Hindu forces makes it clear that it’s too agent of foreign forces, which wish to disturb the stability in South Asian region. These forces are using the tried and tested “divide and rule” method and dirty minds in UPA with help of gestures like introduction of “Prevention of Communal and Targeted Violence(Access to Justice and Reparations), 2011″ ( Communal Violence Bill) are making confrontation a reality. The Indian media is more interested in chasing myth like “Hindu Terrorism” instead of sabotaging the reality in form of Islamic terrorism which has now reached inside the corridors of Parliament and Courts!!! Well, it’s time for the conscious citizens to ensure the demise of secular media and secular government and get it replaced with a government which really thinks about their welfare in sound way with right policies.

Recently, I had a meaningful conversation with New Delhi based senior journalist Jayanta Bhattacharya over the distorted face of truth when it comes to Gujarat riots. I am presenting the conversation as it is. It has some fascinating facts including the recent findings, which makes it quite clear that media loves to portray falsehood and not truth. Let me remind the readers that conversation started when one gentleman hailed Narendra Modi as “Butcher of Gujarat” . I must make it very clear that I am no great fan of Modi but it really bothers me that making caricature of people doing good work has become a special feature of Indian minds. I also do not appreciate the way my dear friend has hailed Narendra Modi as “Mahatma Modi” but I must say he is one of the few who has the guts to speak the truth without being afraid of the repercussions.

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Jayanta Bhattacharya:

Butcher of Gujarat? Who? If you are talking about Narendra Modi then I must say that you are a victim of Con-led UPA propaganda. Under Con rule in Gujarat more communal riots took place. In 2002, more Hindus died in the post-Godhra riots than Muslims, that started with the heinous murders of innocent Hindu pilgrims by blood-thirsty jihadis in the Sabarmati Express near Godhra. It was Mahatma Modi, the angel of peace who brought the riots to a stop within 48 hours thus saving the lives of many, many more Hindus. Do you have any idea what you are saying?

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Arvind K. Pandey:

Well, the recent verdict delivered by Supreme Court is a hard slap on the faces of people seeking culpability of Narendra Modi in 2002 riots. However, the dull minds refuse to accept the reality. Allan Johannes seems to be one of them for whom distorted truth and falsehood is more dear than truth!!

Though the magistrate is yet to deliver the final verdict, it can still be stated that it’s truth that ultimately shines and not the propaganda engineered by dirty secular minds.

From the news item:

The Supreme Court on Monday refused to pass any order on Gujarat chief minister Narendra Modi’s alleged inaction to contain the 2002 Gujarat riots after the Godhra carnage and referred the matter to the concerned magistrate in Ahmedabad for a decision.

“God is great!” — tweeted Gujarat chief minister Narendra Modi on Monday summed up his reaction to the Supreme Court direction in the 2002 Gulburg Society riots case in just three words.

The reaction of the 60-year-old BJP leader reflected his relief over the order as he was being accused time and again by opposition Congress and activists of culpability in 2002 riots…….

The bench made it clear that there was no need for it to further monitor the riot cases. BJP hailed Supreme Court’s order and said that it was a victory for Modi.

Source: The Sunday Indian

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Jayanta Bhattacharya:

And, it is a fact that Congress councilor from Godhra participated in the Godhra carnage, and the post-Godhra riots were carried out by mostly Youth Congress members (http://bit.ly/gJsYBU). Starting from the Godhra murders (for which an all-Muslim team was convicted with Haji Billa and some sentenced to death) to the post-Godhra riots, more Hindus were killed than Muslims. I can provide facts and figures to prove my point. The Godhra murders and the subsequent rioting was a part of well-planned scheme by ISI and its Congress agents to defame the Gujaratis and weaken Indian nationalists.

From the news item:

NEW DELHI: The Congress has been going to town over Best Bakery and other instances of the Narendra Modi government’s complicity in the anti-Muslim violence which shook Gujarat last year. But when..

Source: Cong silent on cadres linked to Guj riots

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Arvind K. Pandey:

You are damn right… Thanks for setting the records straight in this regard.. I am really upset the way Indian and world media deals with real facts. I am no lover of Modi but when is one so cocksure about the involvement of Modi as a “butcher” what’s preventing them to acknowledge the new facts, which prove that riots were the handiwork of dubious elements with whom Modi had no connection at all ? One sees the so-called “butcher” but what about the “butchers” involved in Godhra train carnage? The world ( read Indian media and biased foreign media) never discuss it openly.

Shame on secular souls who hatched a conspiracy to make the Godhara carnage appear ” accidental”. It’s a real insult to talk with such secular minds and listen their arguments ! !

I hope Jayanta has read this latest news item about one of the greatest butchers in modern times Narendra Modi, wherein ” US Congressional Research Service, a think-tank which provides support to the US Congress, has stated that Narendra Modi has streamlined economic growth in Gujarat, removed red tape in functioning of the government, curtailed corruption and given special emphasis on infrastructure in Gujarat”

Source: The Times Of India

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Jayanta Bhattacharya: ‎

I, as an Indian would like to see a better tomorrow. I want my country to be prosperous. I want my country to be free from foreign agents scheming and perniciously eating it from within. I want to see my country being respected world over. When I travel outside my country, I want to see respect for me in the eyes of the citizens/subjects of the lands I travel. I want to see poverty alleviated from my motherland. I want to see people educated in my country. I want to venture out of my house without the fear of being killed/harmed by terrorists or communal forces or any other criminal. I want to live without fear, prejudice and hatred. I want to be a truly free man in a free democracy where appeasement policies do not buy votes of religious communities. I want to be treated equally as a Muslim or a Christian or a Dalit despite being a Hindu and yet have the freedom to be proud of my faith. I want the policies of my nation to be governed by the people of nation and not by the OIC or the Vatican. I shall, therefore, do everything possible to see Mahatma Modi, the angel of peace and God’s chosen one as the Prime Minister of India. PERIOD.

Into that heaven of freedom, my Father, let my country awake. Vande Mataram!

Ghost Of Gujarat Riots: A Panacea For Secular Souls Lying On Their Death  Beds

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References:

Gujarat Riots

Economic Times

Modi On Gujarat Riots

Teesta Setalvad

Karan Thapar With Modi

Karan Thapar With Ram JethMalani

Romila Thapar On Ayodhya Verdict

Banerjee Committee

Congress and Gujarat Riots

Supreme Court Refuses To Rule On Modi

US Congressional Research Service

Delhi High Court Blast

Jayanta Bhattacharya

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Godhra Verdict: A Slap In The Face Of Secular Brigade Calling Train Burning An Accident



Godhra Verdict: A Slap In The Face Of Secular  Brigade Calling Train Burning An Accident

The Special court at Ahmedabad put a seal of approval on the “conspiracy theory” involved in the 2002 Godhra train burning incident.  After Ayodhya verdict delivered by the Allahabad high court, the verdict delivered by the Special court has made the secular brigade topsy-turvy.  The Special court has convicted 31 accused while acquitting 63 others with the help of scientific evidence, statement of witnesses, circumstantial and documentary evidence placed on record.  The people involved in the Godhra carnage have been convicted of criminal conspiracy and murder in burning of the S-6 coach of the train on February 27, 2002 near Godhra, which lead to death of 59 kar sevaks returning from Ayodhya after participating in Poorna Aahuti Yagna organized there.

The verdict has brought on the fore the real face of Indian politics, proving that Indian political landscape is held hostage by ugly secular forces, which are hell bent to distort the face of reality. They are involved in sinister designs aimed at creating upheaval in various states,   something proved by the people involved in the promotion of Naxalite movement.  At this juncture,  I wish to recall the uproar which hit the nation when Allahabad high court made it clear that disputed site is Lord Rama’s birthplace.   The secular media shed lots of tears, labeling it a flawed judgment based on faith and not on evidences and reason.  In other words, it provoked the Muslim parties to challenge the verdict in the Supreme court.

It has become need of the hour to expose misdeeds of secular intellectuals -the parasites which breed on macabre.  Ironically, they are the first ones to speak in high terms about honouring the supremacy of judiciary and respecting the verdict of court. However,  this is never the case. The Ayodhya verdict made the secular forces even question the intentions and judicial sense of judges,  which is simply the case of contempt of court.  The harsh reality is that secular forces operating in India,  disguised as progressive forums,  are more interested in pursuing the hate agenda in sophisticated forms. The main purpose of debates initiated by them is not to bring clarity on any issue but to create dichotomy of sorts,  whose end purpose is to show constitutional bodies in wrong light.

Now let’s analyze some of the elements involved in the Godhra verdict.   It would still be in public memories that how eager the UPA alliance was to treat the Godhra carnage as an accident. In fact, Central government forced the State to drop Prevention Of Terrorism Ordinance (POTO) invoked against those arrested, which was later re-invoked.   It went on to form a Committee headed by former Supreme Court judge U C Banerjee to ascertain findings related with the Godhra carnage even as Commission under Commission of Inquiry Act was probing the Godhra incident.  This shows that Congress is mother of appeasement policies.  It can go to any extent to please the Muslims and Prime Minister in Congress regimes can even declare that resources belong to Muslims first.  The way UC Banerjee Commitee was formed is indicative of the fact when it comes to vote-bank politics, the dignity of constitutional bodies becomes subordinate or, for that matter, means nothing.  As expected, the U C Banerjee Committee, sounding more like a political body than a judicial body,  opined train-burning was an accident and there is hardly any evidence to suggest that there was an external attack.

Thanks to the intervention of Gujarat high court , the UC Banerjee Commitee was declared “illegal” and “unconstitutional” since Nanavati-Shah Commission was already involved in fact finding. The Gujarat high court though did not sustain the up holding of POTA and the case regarding it is still pending in the Supreme Court. After the Godhra verdict delivered by the Special court, one can clearly infer that political compulsions have made politicians brutally rape the dignity of constitutional bodies.  Prakash Javedkar sounds right when he says that ” The UPA’s efforts to give a political spin for electoral gains have been debunked. It was an eyewash of a report and completely manipulated.”

Godhra Verdict: A Slap In The Face Of Secular  Brigade Calling Train Burning An Accident

The attempts,  which try to lessen the gravity of the incidents related with Hindu forces, often leave any conscious thinker stunned.   It appears that only injustice done to minorities constitutes injustice!  Rest is mere accident and hence trivial. In fact,  any issue be it Rama Sethu or Temple at Ayodhya or mindless changes in Hindu laws the attempt is merely to humiliate the Hindu forces. The secular governments are ready to lie even under oath in Apex court to appease the minorities! The citizens of India needs to compel such secular bodies to reveal why they always work against the Hindu forces? The Hindus needs to shed their cowardice, which they often wish to be seen as decency. In complex times,  when their opponents are not ashamed to go to any extent to make mockery of Hindu beliefs and ideals,  the Hindus should stop heeding to pretensions of all sorts by being bold and straightforward in their approach.

It’s no secret that even minor incidents related with minorities is blown out of proportion and secular press be it in India or foreign lands leaves no stone unturned in painting Indian constitutional bodies in wrong colour.   Look at the Binayak Sen case. The moment Raipur Session Court held him guilty of sedition, the whole secular forces went berserk. The same shrill cries that virtually fall in the realm of contempt of court became order of the day.  We can see how protest marches , debates and campaigns are being organized to make mockery of the verdict.

Godhra Verdict: A Slap In The Face Of Secular  Brigade Calling Train Burning An Accident

It would be interesting to note that Chattisgarh High court rejected the bail plea when it was brought to its notice that Sen had strong links with the Maoists and that “the documents seized and the circumstances in totality qualify for the requirement for conviction on the charges of sedition.” The High court refused to accept the arguments, which suggested the case to be “a case of no evidence” and “political prosecution”.  However, the secular forces, barking like the mad dogs, are engaged in spreading lies and concoctions about the whole case with an appeal to exhibit Egyptian like perseverance.  True, the Indian courts have no right punish a man involved in seditious activities and , therefore, a revolution is needed to sabotage the constitutional bodies like courts.

Summing up, I wish to state that it’s time to teach a fitting lesson to all the organizations whether involved in media groups or operating in various capacities which try to create false impressions pertaining to the Hindu interests and causes.  The Godhra verdict is a slap in the face of secular brigade, which tried it to project the train burning as an “accident”.  The conscious citizens need to ponder over as to why anything remotely connected with Hindus becomes object of ridicule even when it involves brutal killings?  The world shed lot of tears over the riots that hit the Gujarat after the Godhra carnage but loss of 59 kar sevaks meant nothing.  It never became object of discussion in secular press other than that it was insignificant happening.

In fact, the secular press is not ready to digest the fact that Gujarat riots were directly triggered by Godhra carnage but at the same time the same secular minds believe that Godhra carnage was inevitable since gestures of kar sevaks gave wrong impressions. In other words, VHP’s fundamentalists policies resulted in the death. Such twisted and biased conclusions can be readily intercepted in the secular literature.  In words of one prominent journalist ,the case is simple: Hindus provoke, Muslims suffer. That’s the impression, which the secular press wishes to project all the time.

In other parts of world, the massacre is condemned in strongest terms.  Even the killings of Muslims in Gujarat generated strong response.  However, the massacre of Hindus needs not to be condemned.   It  needs to justified in subtle ways. It needs to be seen as some ‘consequence”.  It needs to be seen as mere “accident”.   How long will that be the case in India ? Any answers ?

Godhra Verdict: A Slap In The Face Of Secular  Brigade Calling Train Burning An Accident

References:

Godhra Verdict

Godhra Happenings

Ayodhya Verdict

Binayak Sen Case

Rama Sethu Controversy

Pic Credit:

Pic One

Pic Two

Pic Three (Members of families killed in the Godhra Carnage)

Pic four

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