Category Archives: Bhojpuri Songs

कवि और कविताये: समय से परे होकर भी यथार्थ में नए आयाम जोड़ जाते है!

अदम गोंडवी: सही मायनों में जनकवि

अदम गोंडवी: सही मायनों में जनकवि

कविताओ में बहुत ताकत होती है विचारो के प्रवाह को मोड़ने की, उनको एक नया रूख देने की। ये अलग बात है कि कवि और कविताओ की आज के भौतिकप्रधान समाज में कोई ख़ास अहमियत नहीं, इनकी कोई ख़ास “प्रैक्टिकल” उपयोगिता नहीं। लेकिन उससे भी बड़ा सच ये है कि कविताओ की प्रासंगिकता सदा ही जवान रहेंगी। कवियों को समाज नकार दे लेकिन उनके अस्तित्व की सार्थकता को नकारना समाज के बूते के बस की बात नहीं। उसकी एक बड़ी वजह ये है कि कवि और कविताएं इस क्षणभंगुर संसार और पारलौकिक सत्ता के बीच एक सेतु का काम करते है। ये समाज के विषमताओ के बीच छुपे उन जीवनमयी तत्वो को खोज निकालते जो सामान्य आँखों में कभी नहीं उभरती। इसी वजह से कम से कम मुझे तो बहुत तकलीफ होती है जब कविताओ और कवियों को समाज हेय दृष्टि से देखता है या उपयोगितावादी दृष्टिकोण से इन्हें किसी काम का नहीं मानता। खैर इसे कुदरत का न्याय कहिये कि उपेक्षा की मौत मरने वाले कवि और लेखक भले असमय ही इस संसार को छोड़ कर चले जाते हो उनके शब्द अमर होकर धरा पे रह जाते है। उनके शब्द समय के प्रवाह को मोड़कर नया रास्ता बनाते रहते है। मोटरगाडी में सफ़र करने वाले तो गुमनाम हो जाते है लेकिन जीवन भर गुमनामी और उपेक्षा सहने वाले कवि/लेखक अमर हो जाते है। उनकी आभा धरा पे हमेशा के लिए व्याप्त हो जाती है।

आइये कुछ ऐसी ही कविताओ को पढ़ते है जो गुज़रे वक्त के दस्तावेज सरीखे है।

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अदम गोंडवी की ये कविता मजदूरों के अहमियत को पाठक के मष्तिष्क पटल पर वास्तविक रूप से उकेरती है । उनके यथार्थ को यथावत आपके सामने रख देती है। २२ अक्टूबर १९४७ को गोंडा जिले के आटा गाँव में जन्मे इस क्रन्तिकारी कवि ने समय के पटल पर कुछ ऐसी रचनाये रची जो संवेदनशील ह्रदय में सकारात्मक वेदना को जन्म दे देती है। वैसे इस कविता में देश में व्याप्त दुर्दशा का भी चित्रण है लेकिन प्राम्भिक पंक्तिया मजदूर पर आधारित है जिसको पढ़कर मुझे रामधारी सिंह “दिनकर” जी की ये पंक्तिया स्मरण हो आई:

‘‘मैं मजदूर हूँ मुझे देवों की बस्ती से क्या!, अगणित बार धरा पर मैंने स्वर्ग बनाये,
अम्बर पर जितने तारे उतने वर्षों से, मेरे पुरखों ने धरती का रूप सवारा’’

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वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है
उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है

इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है

कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है

रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है

 -अदम गोंडवी

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बशीर बद्र ने वैसे तो जीवन के कई रंगों का जिक्र किया लेकिन रूमानियत के रंग में डूबी इनकी ग़ज़लों को जगजीत सिंह ने स्वर देकर एक नयी ऊंचाई दे दी।ये ग़ज़ल मैंने पहल पहल जगजीत सिंह की आवाज़ में सुनी जिसे बहुत ही सधे स्वर में जगजीत जी ने गाया है। और अब पढने के बाद बहुत भीतर तक उतर गयी बशीर साहब की ये ग़ज़ल।

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सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा
इतना मत चाहो उसे, वो बेवफ़ा हो जाएगा

हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे, रास्ता हो जाएगा

कितनी सच्चाई से मुझ से ज़िन्दगी ने कह दिया
तू नहीं मेरा, तो कोई दूसरा हो जाएगा

मैं ख़ुदा का नाम लेकर पी रहा हूँ दोस्तो
ज़हर भी इसमें अगर होगा, दवा हो जाएगा

सब उसी के हैं हवा, ख़ुश्बू, ज़मीनो-आसमाँ
मैं जहाँ भी जाऊँगा, उसको पता हो जाएगा

बशीर बद्र

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रमाकांत दूबे जी का नाम शायद लोगो ने कम सुना हो लेकिन इनके द्वारा ग्रामीण लोक में बसी आत्मा में रची ये कविताये कही भी पढ़ी जाई अपना असर दिखा जाती है। ३० अक्टूबर १९१७ को जन्मे इस कवि ने अपनी जड़ो का कभी नहीं छोड़ा और आज़ादी से पहले और आज़ादी के बहुत बाद तक जो भी समय ने दिखाया उसे वैसा ही शब्दों में रच डाला। यकीन मानिए इन पंक्तियों को २०१३ में पढ़ते हुए ऐसा कभी नहीं लगा कि इनको चालीस साल पहले रचा गया होगा। इसकी प्रासंगिकता की अमरता पर हैरानी सी हो रही है। यूँ आभास हो रहा है किसी ने चालीस साल पहले ही २०१३ में क्या व्याप्त होगा ये देख लिया था। इसीलिए तो  मुझे  ये कहने में कोई संकोच नहीं कि कवि संसार में रहते हुएं भी संसारी ना होकर समय से परे रहने वाला एक विलक्षण जीव होता है।

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खाके किरिया समाजवाद के खानदानी हुकूमत चले
जैसे मस्ती में हाथी सामंती निरंकुश झूमत चले
खाके गोली गिरल परजातंतर कि मुसकिल इलाज़ हो गइल
चढ़के छाती पे केहू राजरानी, त केहू जुवराज हो गइल

– रमाकांत दूबे

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अदम गोंडवी: जो उलझ कर रह गयी है फाइलों के जाल में गाँव तक वह रौशनी आएगी कितने साल में

अदम गोंडवी: जो उलझ कर रह गयी है फाइलों के जाल में गाँव तक वह रौशनी आएगी कितने साल में!


कुछ अच्छी कवितायेँ आप यहाँ पढ़ सकते है: कविता कोष 

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Pic One 

 

MEN IN BRAS AND SKIRTS (HUMOUR)

True Feminism Would Surely Make Such Men A Regular Sight!

True Feminism Would Surely Make Such Men A Regular Sight!


During one of the conversations with close friend Carmen, who happens to be a gifted conversationalist, the idea of men wearing skirt came to haunt my imagination. She picked up the idea from some fashion show. Her casual reference to men in skirt made me remind of the famous phrase that there is “method in madness”. If anyone wishes to realize how madness has become a passion in our times, the present age is fittest time to witness the mad show. Just organize a fashion show and introduce horrible sense of dressing as a new passion among youths. No wonder men wearing skirts does not sound amusing. Anything is possible in our times. Overnight we can find “he” emerging as “she” the next day!  Now I am wondering what else could follow if men start wearing skirts?

The purpose of fashion shows also defies my sensibilities. Often the trends shown in it are not meant for masses. The dresses exhibited in it are beyond the range of common people. Still we find an unending craze for such fashion shows. Remember the movie “Fashion”? That movie disclosed the harsh realities prevalent in world of fashion. Anyway, I am talking about the craziness existing in our real world, wherein the distinction between men and women is getting reduced with each passing moment, and even in the virtual world with help of Photoshop. The write-up is merely a humorous take on the whole issue.

Notice the fact that wearing “ear rings” by the boys is new craze. My friend endorsed usage of ear rings by boys since that make guys attain a look that attracts females. I feel that in every man there is female essence and in every woman there is some male element. Only today I saw a girl riding a motor bike meant for men.  Few days back, I had seen an young girl having two girls pillioned behind her on a slender scooty! That makes it very clear that there is urge in both the sexes to give way to each other’s essence. Has anyone heard “Aake Seedhi Lagi Dil Pe” song from movie Half Ticket?  Kishore Kumar has given voice to male and female characters on whom this song has been picturized!!  Pran and Kishore Kumar have performed in mind-boggling way in this song.  And that’s why this song always makes me smile! In many Indian movies dance sequences have male actors disguised as females. The same has been the case with female actresses as well.
 

Right now, I am wondering what would follow the skirt? I am sure male bras are next hot item. Please read this excerpt borrowed from news item:

“Japanese men are getting in touch with their feminine side thanks to a new trend in male lingerie.They are hitching up their man boobs (moobs), finding out their cup sizes, and getting into male bras. Akiko is the woman behind this underwear revolution. She started selling the bras online from her Tokyo shop – The Wishroom. She said: ‘I think more and more men are becoming interested in bras.’ “

Now if that’s the case I feel new perceptions would emerge. Now men, like women, would often be found complaining: I found her staring at my assets !!! New harassment laws would also be introduced for men that would take cognizance of men’s complaints, accusing the passers by of indecent gesture !!! I feel that such tactics are very cleverly promoted by market. That makes them sell their products. That’s the reason why “Mardo wali cream” (fairness cream for men) has come in existence and actors like Shah Rukh Khan, having dark complexioned wives, are promoting it. They are making us develop guilt complexes to promote the sale of fairness cream for men!!! Anyway, for me black is beautiful.

I request the likes of Carmen not to create chaos in society by feeling excited about idea of seeing men in skirts. I love women with long hairs. I am sure not many would love to see a woman proclaiming bald is beautiful! Please be traditional, at least, in some matters. Women in long hairs are epitome of sensuality. Unfortunately, it’s age of short cuts. No wonder women love anything from short hairs to short skirts.

It's Time For Girls To Shout, Sexy Legs :-)

It’s Time For Girls To Shout , Sexy Legs 🙂

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Men In Skirts

Japanese Men

शैलेन्द्र: मायावी जगत को अर्थ देने वाला एक बेहतरीन गीतकार

सिगरेट का कश लेते शैलेन्द्र अपने मीत राजकपूर के साथ!

सिगरेट का कश लेते शैलेन्द्र अपने मीत राजकपूर के साथ!

फ़िल्म का चलना या ना चलना एक अलग मसला होता है. मूल बात ये थी कि फ़िल्म वास्तव में कैसी बनी थी. तो तीसरी कसम वाकई अच्छी बनी थी. लेकिन ये बात जरूर है कि इस फ़िल्म ने शैलेन्द्र को ये बता दिया कि फ़िल्म जगत उन जैसे सीधे अच्छे लोगो के लिए कभी नहीं बना था. इस फ़िल्म ने उनके  करीब के लोगो के चेहरे से मुखौटे को हटा दिया. शैलेन्द्र के नजदीकी लोगो की बात पढ़िए आपको पता चलेगा कि किसी ने शैलेन्द्र के लिए मुफ्त काम नहीं किया. सब ने पैसे लिए. दूसरी बात मै इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता कि राजकपूर ने हीरामन के किरदार के साथ न्याय किया. वो इस वजह से कि राजकपूर जिस परिवेश में ढले थें, उनकी अरबन इंस्टिंकट्स (urban instincts)  बहुत बड़ी बाधक थी  इस किरदार की जरूरतों के साथ. ये शैलेन्द्र की सबसे  बड़ी गलती थी राजकपूर को इस रोल के लिए चुनना.

ये अलग बात थी  राजकपूर एक अच्छे अभिनेता थे. सो उन्होंने भरसक कोशिश कि अपना सर्वोत्तम देने कि लेकिन आप इतने बड़े मिसमैच को कैसे पाट सकते थे. सो आप ध्यान से देखे राजकपूर को इस फ़िल्म में आपको उनके अभिनय में नाटकीयता जरूर दिखेगी. तो मेरी नजरो में ये एक बड़ी गलती थी शैलेन्द्र कि जो राजकपूर को उन्होंने लिया. इस बात पे गौर करना आवश्यक है कि मुम्बईया सिने जगत में ग्रामीण जगत को या भारत के गाँवों को कभी भी यथार्थ स्वरूप में परदे पे लाने की कोशिश नहीं की गयी. सब में गाँव के नाम पर मसाला तत्त्व डाला गया. जैसा मिसमैच राजकपूर का तीसरी कसम में था वैसे ही नर्गिस का मदर इंडिया में था. ये अलग बात है दोनों अच्छे कलाकारों  ने जान डाला अपने अभिनय से पर वास्तविकता से तो दूर ही था ना.

तीसरी कसम: भारतीय फ़िल्म इतिहास में मील का पत्थर

तीसरी कसम: भारतीय फ़िल्म इतिहास में मील का पत्थर

खैर बात तीसरी कसम की हो रही है. तीसरी कसम और साहब बीवी और गुलाम दोनों फिल्मे साहित्यिक कृतियों पर बनी है. तीसरी कसम   फणीश्वरनाथ रेणु  की कहानी “मारे गए गुलफाम” और साहब बीवी और ग़ुलाम बिमल मित्र के  इसी नाम के उपन्यास पर बनी थी. एक तो हमारे हिंदी फ़िल्म जगत में   साहित्यिक कृतियों पर फिल्मे बनाने का चलन नहीं और बनती भी है तो मूल कृति के साथ न्याय नहीं करती. सो दोनों फिल्मो का कृति के साथ लगभग पूरा सा न्याय करना बहुत संतोष प्रदान करते है. हा मेरे जैसे जाहिल जो मूल कृति को पढ़ कर फ़िल्म देखने की भूल कर बैठते है वो ये हमेशा जानते रहते है कि पढने में  कृति के बहुत से पक्ष उभर कर आते है. परदे पर मामला बहुत सीमित हो जाता है. पर तीसरी कसम, गाइड, साहब बीवी और ग़ुलाम, परिणीता, काबुलीवाला कुछ एक ऐसी फिल्मे रही जिन्होंने मूल कृति के साथ बहुत अत्याचार नहीं किया.

चलते चलते शैलेन्द्र के बारे में कुछ कहना बहुत जरूरी है. शैलेन्द्र जैसा बेहतरीन इंसान फिल्मो की दुनिया में आने की गलती कर बैठा पर इनकी इसी गलती की वजह से हमे इतने अच्छे गीत सुनने को मिले. मेरे ये सबसे पसंदीदा गीतकार है और इनका कोई भी गीत चाहे वो “टूटे हुए ख्वाबो  नें” या “दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समा” या “तेरे मेरे सपने अब एक रंग है” आपको एक दूसरी दुनिया में ले जाता है.  पर रूहानी ख़ूबसूरती से लैस इस बेहद नाजुक मिजाज इंसान को तीसरी कसम के बनने के दौरान पैदा हुई कडुवी सच्चाइयो ने आखिरकार इनको विशाल  अजगर की तरह नील लिया. पैसा ही खुदा है या पैसा ही ईश्वर है इस दुनिया का इनके नाजुक ह्रदय पर गहरा आघात कर गया. फिर भी दुनिया शैलेन्द्र जैसे सुंदर आत्माओ की वजह से अस्तित्व में रहती है, दुनिया रहने के काबिल बनी रह पाती है. श्वेत श्याम सी जिंदगी में रंग भरने वाले   शैलेन्द्र  ( August 30, 1923 – December 14, 1966 ) को मेरी तरफ से विनम्र श्रद्धांजलि.

References:

फणीश्वरनाथ रेणु 

शैलेन्द्र

बिमल मित्र  

 शैलेन्द्र 

Pics credit:

Pic One

Pic Two

भोजपुरी गीतों को डुबोती अश्लीलता

Bidesiya : Sadharan Madhur Geet

Bidesiya : Sadharan Madhur Geet

ये कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा कि भारतीय समाज एक विचित्र सा समाज हो गया है जो सही को तो होने नहीं देता जिससें सही आदमी का शोषण तो होता ही है इसके साथ ही वो सही आदमी सभ्य से अमानुष बनता चला जाता है. ये हमारी सारी व्यवस्था ही आदमी का शोषण और उसकी भावनाओ का दमन करने के लिए बनी है. इसमें कोई दो राय नहीं. ये भी कहना गलत नहीं कि ना हम पुरानी दकियानूसी बातो को दरकिनार कर पाए है और ना ही हम नयी प्रवत्तियो को ठीक से अपना पाए है. हम बिल्कुल चितकबरे विचित्र वानर बन गए है. अगर आप ये मानते है कि सिनेमा या गीत- संगीत समाज का दर्पण है तो ये मानने में कोई हर्ज़ नहीं  कि भोजपुरी गीतों में अश्लीलता या नंगापन ग्रामीण समाज में व्याप्त कुंठित भावनाओ की अभिव्यक्ति है. एक दृष्टिकोण तो यह भी है कि ग्रामीण समाज दबा के रखने वाली चीजों को लेकर सहज है और शायद इसीलिए  उनको कोई खास शिकायत नहीं अश्लीलता को लेकर जिस तरह एक सभ्य वर्ग को है. 

लेकिन इसी भीड़ में अद्भुत गीत भी है जो सुनने वालो से एक गहरा तादात्म्य स्थापित कर लेते है .वो सिर्फ इसलिए कि अपनी माटी और अपनी संस्कृति कि इनमे वास्तविक झलक होती है. जिन समस्याओ को हम फिल्मी या गैर फिल्मी गीतों में नहीं सुन पाते या फिर कृत्रिम रूप से एक थोपी हुई गंभीरता के साथ सुनते है वोही सब बाते हम भोजपुरी गीतों में एक सहज और मधुर रूप से सुन लेते है. शायद तभी इनका असर देर तक रहता है. ये अलग बात है कि सब चीजों पे पैसा हावी है. मै गाँव के आज के हालात से काफी अच्छी तरह से वाकिफ हू इसीलिए ये कहने में कोई संकोच नहीं कि हर तरह की विकृति ने गाँवों में अपनी पैठ बना ली है जिसकी एक झलक हमे भोजपुरी गीतों में बढती अश्लीलता के रूप में दिखाई पड़ती है. गाँवो में सड़क और सम्पन्नता के साथ अश्लीलता भी हौले हौले चली आई है.  मै ये कहूँगा कि समस्या बहुत गंभीर है. आप जो देख रहे है वो अंग्रेजी में ऐसे कहा जाएगा :“It’s just the tip of the iceberg”.  पर इन सब से परे हट के सोचे तो भोजपुरी गीतों की बात ही कुछ और है और इसीलिए जिन्होंने  “गंगा  मैया  तोहरे  पियरी चढ़ीइबो  ” या ”  नदिया  के  पार ”   के गीत  सुने है उन्हें आज के दौर के फूहड़ गीतों से खासी चिढ होती होगी.

Baleshwar-Yadav

Baleshwar-Yadav


आज के भोजपुरी गीत तो देखे. भाई लोगो ने  कल्पनाशीलता के ऐसे ऐसे बाण छोड़े है कि माथा थाम लेने का मन करता है. आज के  भोजपुरी गीतों का चोली और लहंगा से इतना गहरा रिश्ता है कि पूछिए मत. हर गीत में  चोली लहंगे का जिक्र जरूर है और आलम ये है कि “मोरे लहंगा में आवे रे भूकम्प “, “लहंगा में सबसे बड़ा ATM ” , “हमरे लहंगा में मीटर लगा दी राजाजी ” , “तोहार लहंगा उठा देब रिमोट से”  इत्यादि गीतों कि श्रंखला शुरू हो गयी और ये किसी को नहीं पता कि ये कहा जा के रुकेगा. अगर कल्पनाशीलता में कुछ कसर  रह गयी हो तो “हाई पॉवर के चुम्बक बाटे इनका दुप्पटा के पीछे ” या “कसम से देह रसगुल्ले  बा” जैसे गीतों ने ये कमी भी पूरी कर दी. अभी कुछ महीनों  पहले अपने गाँव मै गया तो वहा जब भी किसी मोबाइल पे आप काल करिए तो ये  गीत जरूर सुनने को मिलता था “मिस काल मारत तारु किस देबू का हो” . गाँवों में किसी और स्तर पर प्रोग्रेस हुई हो या ना हुई हो पर भैस चराते हुए नंगे बदन लोगो  के पास एक अच्छा और महंगा मोबाइल सेट जरुर मिल जाएगा जिसमे इस तरह के गीत आपको बजते हुए सुनाई पड़ जायेंगे. अगर आप  गाँव में किसी तरह इन गीतों को इलेक्ट्रोनिक माध्यम से सुनने से रह गए तो चिंता ना करे कोई बहुत ही कम उम्र का बच्चा आपको वोही गीत आपको लाइव  सुना देगा!!! 

तकलीफ की बात ये  है कि आप चाहे तो भी कुछ नहीं कर सकते. किसी के माता पिता से आप शिकायत करे तो या तो वो खीस निपोर के रह जाते है या फिर उल्टा आपको ही एक अच्छा खासा लेक्चर सुना देंगे. गाँव में जरा सी बात का बतंगड़ बनते देर थोड़ी ना लगती है. खैर मै गीतों के स्तर में गिरावट की बात कर रहा था. लोकगीतों की हमारे यहाँ समृद्ध परंपरा रही है और अवधी, बृजभाषा या भोजपुरी के गीतों की धूम रही है जिनमे एक से बढ़कर एक गीत जीवन के हर मोड के लिए है बिरह से लेकर मिलन तक. यहाँ तक कि मौसम के हिसाब से भी लोकगीत है जैसे होली, चैती और कजली.  लोकगीत गायकों जैसे  शारदा सिन्हा, भरत शर्मा, मनोज तिवारी और बालेश्वर यादव जैसे गायकों ने इन गीतों को एक नया ही आयाम दिया है.  अगर मै ये कहू तो गलत नहीं होगा कि देश के आप किसी कोने में चले जाए तो तरह तरह के लोकगीतों की भरमार है और इनके गाने वाले भी इनको खूब रस में डूबकर गाते है. इन सब को देखते हुए इन अश्लील गीतों का हर तरफ छा जाना मुझे बहुत खलता है. आप आंचलिक क्षेत्रो में किसी भी सीडी शॉप पे जाए तो आपको एक भी ढंग के गानों की सीडी नहीं मिलेगी पर हा ऐसे बेकार के गीतों की वो  हज़ार सीडी आपको वो दुकानदार थमा देगा. अब इन गीतों की बाढ़ क्यों इतनी आ गयी वो तो राम जाने पर चलते चलते मै ये दो अपनी पसंद के भोजपुरी गीत जरूर सुनवाना चाहता हू. सुनने से डरे मत इनमे लहंगा ,चोली और रसगुल्ले का जिक्र नहीं.  निश्चिंत रहे आप लोग.  मै यही तो बताना चाहता हू कि इस तिकड़ी के अभाव के बाद भी गीत  जियरा को मस्त कर सकता  है.

Aaj Ke Tathakathit Bhojpuri Geet

Aaj Ke Tathakathit Bhojpuri Geet

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पटना से बैद बुलाय द …( शारदा सिन्हा)

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रेलिया बैरन पिया को लिए जाए रे- मनोज तिवारी

 

गोरिया नैहर में सपना सजावत रहे

एक बरस एक दिनमां बितावत रहे

जहिया गौना कें दिनलवा बतवली सखी

वही दिनवा से हरदी लगावत रहे

आइल जाइय के लेले टिकसवा पिया

गिरल बिजुली करेजवा पर फाटल हिया

तब बढ़ के भिनुसरहे उठके के नहा धो के हो

लोर भरके मनौती मनावत रहे

रेलिया बैरन पिया को लिए जाए रे……४

अरे जौने टिकसवा से पिया मोरे जइहें-४

बरसे पनिया टिकस गली जाइ रे—२

जौने शहरिया में पिया मोरे जइहें-२

लाइगे अगिया शहर जरी जाय रे-२

जौने मलिकवा के पिया मोरे नौकर-२

परी जाए छापा पुलिस लिए जाए रे—२

जौने सवतिया के पिया मोरे आशिक-२

गिर जाए बिजुली सवत मरी जाए रे-२

अरे गिरधर गोरिया रे तोर पिया अइहें-२

विनती करिहें मनोज घर आए रे—२

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ज्ञान दत्त पाण्डेय का ब्लॉग (Gyan Dutt Pandey's Blog)। मैं गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर रेलवे अफसर।

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