Monthly Archives: September, 2014

हिंदी सिर्फ हमारी ही नहीं है: इजराइल के हिंदी प्रेमियों के संग गुज़ारे कुछ यादगार लम्हे!

शोध पत्रिका आवर्तन और हिंदी विभाग गोरखपुर के द्वारा सयुंक्त रूप से आयोजित साहित्यिक-सांस्कृतिक संवाद गोष्ठी जिसमे इजराइल से पधारे डॉ गेनादी ने अपने दल के साथ हिस्सा लिया।

शोध पत्रिका आवर्तन और हिंदी विभाग गोरखपुर के द्वारा सयुंक्त रूप से आयोजित साहित्यिक-सांस्कृतिक संवाद गोष्ठी जिसमे इजराइल से पधारे डॉ गेनादी ने अपने दल के साथ हिस्सा लिया।



इजराइल से भारत के सम्बन्ध बहुत गहरे है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार जब बनी थी तब एरियल शेरोन पहले इजराइल के प्रधानमंत्री बने भारत की यात्रा करने वाले। इसी क्रम में जसवंत सिंह भारत के पहले  विदेश मंत्री बने इजराइल की यात्रा करने वाले। इजराइल ने आज कई क्षेत्रो में भारत के साथ करार किया है जिसकी वजह से वो एशिया में भारत का एक प्रमुख आर्थिक सहयोगी बन के उभरा है और रूस के बाद मिलिट्री इक्विपमेंट्स का सबसे बड़ा सप्लायर है। इज़राइल के प्रति हमारा प्रेम यूँ ही नहीं उभरा है जो हमारे वामपंथी मित्रो को मुस्लिम तुष्टिकरण के चलते बहुत अखरता है। इजराइल अपने अस्तित्व में आने के बाद ही हमारे लिए अपने अस्तित्व और राष्ट्रीयता को बचाये रखने के एक सबसे जबरदस्त मिसाल के रूप में उभरा है। इजराइल अपनी विखंडित राष्ट्रीयता को एक मायने प्रदान करता है। इस प्रतनिधिमंडल से मुलाक़ात करने के पहले मुझे ईरान का वो वक्तव्य याद आ रहा था कि इजराइल को दुनिया के नक़्शे से मिटा दिया जाएगा लेकिन इज़राइल शायद इसी बात का प्रतीक है कि “मुद्दई लाख बुरा चाहे तो क्या होता है वही होता है जो मंजूर-ए-खुदा होता है” !  इजराइल ना आज सिर्फ दुनिया के नक़्शे पर मौजूद है वरन विकास के नए सोपानों को हासिल करता हुआ “स्वाभिमान” शब्द को नए मायने दे रहा है। इस देश के लोगो से हिंदी के बहाने मिलना मेरे लिए एक सुखद सपने का यथार्थ में परिवर्तित हो जाने जैसा था और मिलने के उपरान्त अंदर इस भावना का उठना स्वाभाविक था कि चलो मुलाक़ात सार्थक रही!

इस मुलाक़ात की आधारशिला रखी गोरखपुर से निकलने वाली शोध पत्रिका आवर्तन ने जिसने हिंदी विभाग, दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय, गोरखपुर, के सौजन्य से १८ सितम्बर 2014 को एक साहित्यिक और सांस्कृतिक परिचर्चा आयोजित की । इसमें इजराइल के तेल अवीव विश्वविद्यालय के पूर्वी एशिया अध्ययन केंद्र में कार्यरत हिंदी के प्रोफेसर डॉ गेनादी श्लोम्पर अपने छात्र-छात्राओं के दल के साथ शामिल हुए।  इस दल में शामिल ओफिर, एलेक्सांद्रा, यकीर, ताल, आदि फिशर और  मतान मसिस्का के अनुभव को सुन के तो यही लगा कि देश भले ही भौगोलिक सीमाओ में आबद्ध हो जस्बात स्वतन्त्र होते है और एक जैसे ही होते है।

ये एक दुःखद सत्य सत्य  है कि हम भले ही विदेशी विद्द्वानों को सुनकर हिंदी के समृद्ध होने का दावा करे लेकिन हिंदी को बढ़ावा तभी मिलेगा जब अपने देश में लोग हिंदी को सहज रूप से अपनाएंगे और ऐसा अपने देश में है नहीं। हिंदी विश्व में दूसरी सबसे ज्यादा बोले जाने वाली भाषा भले ही बन गयी हो लेकिन इसको प्रयोग करने वाले अभी भी एलीट क्लास के परिधि से बाहर माने जाते है। सरकारी आकाओ की भाषा और मानसिकता अभी भी लार्ड मैकाले नाम के प्रेत बाधा से ग्रसित है जिसकी परिकल्पना आज सच हो के उभरी है और इसीलिए देश में ऐसे लोगो की संख्या ज्यादा है जिन्हे अपनी संस्कृति और अपनी भाषा से दूरी बनाये रखने में ही गौरव का अनुभव होता है। ये कहने में कोई संकोच नहीं कि जो हिंदी के रक्षक बनते है उनकी नस्ले भी अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों और महंगे विदेशी कॉलेजो में ही पलती-बढ़ती है।

 

इजराइल का दल जिसमे आप देख सकते है सबसे बायें से एलेक्सांद्रा, यकीर (काली टीशर्ट), ताल, मतान मसिस्का और फिर मुझको :P :P

इजराइल का दल जिसमे आप देख सकते है सबसे बायें से एलेक्सांद्रा, यकीर (काली टीशर्ट), ताल, मतान मसिस्का और फिर मुझको 😛 😛



भारत के संविधान में हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए कई प्रावधानों का उल्लेख है लेकिन फिर भी हिंदी सिर्फ राजभाषा है राष्ट्रभाषा नहीं! आज भी देश के अनेक प्रान्त है जहा हिंदी के प्रयोग को बल देना मतलब भाषा के विवाद को जन्म देना है। हिंदी प्रदेशो में भी आपको हिंदी से ज्यादा तरजीह अंग्रेजी को मिलती जो संविधान के भावना के खिलाफ है।  बिडंबना देखिये कि संस्कृत जो समस्त भाषाओ की जननी है वो आज पानी से निकाली गयी मछली के समान है लेकिन उर्दू को गंगा-जमुनी संस्कृति का उदाहरण मानकर उसको बढ़ाया जा रहा है। गंगा-जमुनी संस्कृति की दुहाई देने वाले अक्सर ये भूल जाते है कि जिन्ना ने धर्म के आधार पर ही विभाजन करवाया और “सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा” के रचियता इकबाल ने पाकिस्तान के बनने में अहम भूमिका निभायी पर हम है कि अब भी गंगा-जमुनी संस्कृति के मोह में पड़े रहकर समय में ठहरकर रह से गए है।

इसका नतीजा ये हुआ है कि शुद्ध हिंदी तो दूर की कौड़ी हो गयी है और इसकी जगह हिंग्लिश ने ली है। आज आप सोशल मीडिया पे हिंदी का इस्तेमाल देखे तो वर्तनी की अशुद्धियाँ देखकर माथा पीट लेंगे। वही हिंदी फिल्मो के कलाकार परदे पे हिंदी बोलते नज़र आएंगे लेकिन बाकी समय वे काले अँगरेज़ ही है! प्रोफेसर गेनादी का ये कहना ठीक ही है कि किसी भाषा का अन्य भाषा से शब्द लेना कतई गलत नहीं लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में अपनी भाषा में जरुरत से ज्यादा अन्य भाषा के शब्दों का समावेश कर लेना गलत है। प्रोफेसर गेनादी का ये भी मानना है कि पूंजीवादी व्यवस्था से आप कटकर नहीं रह सकते और इसलिए वही भाषा अस्तित्व में टिकी रह सकती है जो समय की मांग को पूरा करे। अंग्रेजी का चलन इसलिए है क्योकि वो ज्ञान के विस्तार में सहायक बनी है। प्रोफेसर गेनादी ने ये स्वीकार किया कि इजराइल के विद्यार्थी हिंदी किसी भावनात्मक कारण के तहत नहीं सीख रहे है बल्कि रोजगार की संभावना में वृद्धि के तहत ऐसा कर रहे है। प्रोफेसर गेनादी के भी हिंदी सीखने के पीछे ये एक प्रमुख कारण है।

मीडिया ने जरुरत महसूस की हिंदी के बारे में लिखने की :-)

मीडिया ने जरुरत महसूस की हिंदी के बारे में लिखने की 🙂

इस पूंजीवादी व्यस्था में चीन, जापान और जर्मनी जैसे देश आज बड़े खिलाडी के रूप में उभरे है और ऐसा उन्होंने बिना अंग्रेजी के बैसाखी के सहारे किया। इन देशो में हालात ये है कि अगर आप अंग्रेजी भी जानते हो तो वो किसी काम की नहीं क्योकि इनके सारे काम अपनी मूल भाषा में ही होते है।  इसराइल के छात्र-छात्राओं को मैंने देखा अंग्रेजी नहीं हिब्रू भाषा में बात कर रहे थे। अगर अपनी मातृ भाषा में बात करने या इसे इस्तेमाल करने से देश पिछड़ जायेगा तो फिर इन देशो ने कैसे सिर्फ अपनी भाषा का इस्तेमाल करके इतनी लम्बी छलांग लगा ली? इसका जवाब प्रोफेसर गेनादी के इस बात से मिल जाता है कि हिब्रू में जिन शब्दों का अभाव था तकनीकी ज्ञान या किसी अन्य चीज़ के ज्ञान को ग्रहण करने के लिए उनके लिए हिब्रू में समान शब्दों का सृजन किया गया। हमारे यहाँ तो क्योकि हिंदी आपके पिछड़ेपन का प्रतीक बन गयी ऐसी कोई कोशिश नहीं की गयी भाषा को समृद्ध बनाने के लिए।  हमारे यहाँ तो हालत ये है कि राष्ट्राध्यक्ष/ प्रधानमन्त्री/ बड़े अफसर दूसरे देशो में छोड़िये अपने ही देश में ज्यादातर सम्बोधन अंग्रेजी में देते है! इसी का नतीजा है कि जब वाजपेयी जी ने जब संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी में भाषण दिया तो वो हमारे लिए एक ऐतिहासिक क्षण था! बचपन से मै इस चीज़ पे गौर करता आया था कि चीन, जापान, रूस और जापान के बड़े नेता हमारे यहाँ अपनी भाषा में बोलते थे और हमारे यहाँ के नेता अपने और अन्य देशो में सिर्फ और सिर्फ अंग्रेजी में बोलते थे! इसी कथनी और करनी के भेद ने इस महान देश का बेडा गर्क कर दिया है!

हमारे यहाँ जितने भी कान्वेंट स्कूल है उन्होंने ये माहौल बना रखा  कि हिंदी में बोलना जुर्म है! जब अपने ही देश में हालात ऐसे है तो आप अन्य मुल्को से कैसे ये उम्मीद कर सकते है कि वे आपको सम्मान दे? मुझे अच्छी तरह याद है कि एक नामी संस्था ने मुझे फ़ोन किया जिनका कार्यालय भारत में था और जिसमे कर्मचारी भी भारत के ही थे पर बात इसलिए नहीं हो पायी कि जैसे ही मैंने उनके अंग्रेजी अभिवादन का  जवाब हिंदी में दिया तो फ़ोन कट गया! इसी का नतीजा है कि जिस प्रतिष्ठित विदेशी वेबसाइट ने मुझे अच्छी लेखनी के लिए कई बार विशेष सम्मान दिया मेरे लेखो का उल्लेख करके उसने भी हिंदी में लिखे लेखो को “स्पैम” मानते हुए स्पष्टीकरण माँगा जबकि उस देश विशेष में लोग हिंदी के लिपि से अच्छी तरह परिचित थे! खैर इन्ही परिस्थितयो में इसराइल के इस प्रोफेसर को सुनना एक सुखद अनुभव रहा। जिस समय गेनादी जी ने रूस में हिंदी सीखने का मन बनाया उस वक्त हिंदी का कोई विभाग नहीं था। इसलिए पहले उन्होंने उर्दू सीखा। भाषा कैसे अनुभव को समेटने का माध्यम बन सकती है इस प्रक्रिया को समझने में गेनादी जी को गहरी दिलचस्पी थी। इसी का नतीजा था कि इन्होने पंजाबी भी सीखी। इजराइल में गेनादी जी हिंदी की मशाल जलाने वाले पहले शख़्श है और इसका नतीजा ये हुआ कि इन्हे विश्वविद्यालय में अपने हिसाब से पाठ्यक्रम तय करने की छूट है। हिंदी का विभाग येरुशलम विश्वविद्यालय और तेल अवीव विश्वविद्यालय दोनों जगह है। संस्कृत भी उन एक भाषाओ में है जिसका अध्ययन आप कर सकते है। खैर हिंदी के ही बदौलत न्यूयॉर्क में हुए हिंदी के विश्व सम्मलेन में इन्हे सम्मानित किया गया।

इसे मै अपना सौभाग्य समझूंगा कि डॉ गेनादी से विचार विमर्श करने का मौका मिला :-)

इसे मै अपना सौभाग्य समझूंगा कि डॉ गेनादी से विचार विमर्श करने का मौका मिला 🙂

भाषा चुनने के पीछे उन्होंने ये स्पष्ट किया कि इसके पीछे कोई राजनैतिक और सांस्कृतिक कारण नहीं है। ये केवल एक आर्थिक सोच से उपजा फैसला है। राजनैतिक मुदद्दो पे गेनादी जी ने कोई वक्तव्य नहीं दिया ये कह कि भाषा के प्रोफेसर से राजनीति से जुड़े प्रश्न को जवाब देने की बाध्यता नहीं। लेकिन इसके बावजूद उन्होंने ये बताया कि जिस तरह से विदेशी मीडिया में इजराइल के अन्य देशो से युद्ध को लेकर देश के अंदर एकरसता दिखाई जाती है वैसा कुछ है नहीं। इजराइल के अंदर युद्ध का विरोध करने वाली ताकते बहुत है। कुल मिला के उनका कहना ये था कि जैसा सरकार सोचती है उससे प्रजा थोड़ी अलग ही सोचती है। हिंदी के भविष्य के वे अच्छा मानते है पर उनका यही कहना है कि हिंदी सहित इस महान राष्ट्र को अभी बहुत विकास करना है। इजराइल के छात्र छात्राओं को ध्यान से सुनना एक दिलचस्प अनुभव था। इन्हे हिंदी फिल्मो से प्रगाढ़ प्रेम तो है ही पर इसके अलावा हिंदी गीतों के माध्यम से हिंदी सीखना इनके पाठ्यक्रम में भी शामिल है। इसकी एक बानगी देखिये कि यकीर को अमरीश पुरी का “मोगेंबो खुश हुआ”  और शोले का गब्बर सिंह अच्छी तरह याद है। यकीर ने तो अमिताभ बच्चन से मिलने के जुगाड़ के उपक्रम में महंगा मोबाइल खरीदने की भी योजना बना ली है जिसमे अमिताभ से मिलाने का स्कीम है! गोरखपुर स्टेशन पे यकीर को कोई सज्जन राष्ट्र प्रेम का मायने समझने के लिए “ग़दर” फ़िल्म देखने की सलाह दे रहे थे कि यकीर उन सज्जन की बात को काटते हुए बोले “वो सनी देओल वाली”!

 

आदि फिशर ने ये समझाया कि युवाओ की जिंदगी चाहे वो इजराइल हो या भारत आर्थिक समीकरणों में उलझ कर रह गयी है और रिश्ते पैसो से तौले जाने लगे है!!!

आदि फिशर ने ये समझाया कि युवाओ की जिंदगी चाहे वो इजराइल हो या भारत आर्थिक समीकरणों में उलझ कर रह गयी है और रिश्ते पैसो से तौले जाने लगे है!!!

 

गंभीरता से सुनने पे इन नए ऊर्जावान दिमागों में वही बेचैनी दिखती है जो हमारे यहाँ के युवाओं में भी दिखती है। भ्रष्टाचार के दानव से ये भी जूझ रहे है और मंहगाई नाम की सुरसा इनके यहाँ भी रिश्तो को निगल जा रही है। भारत को ये सिर्फ ताकने नहीं निकले है।  ये यहाँ पर भारत की संस्कृति का अध्ययन करने आये है क्योकि भाषा का संस्कृति से गहरा अन्तर्सम्बन्ध है। उम्मीद करते है कि भारत से वापस जाने पर इनके दिलो पर भारतीय संस्कृति की अमिट छाप पड़ चुकी होगी। गेनादी जी मानते है कि भाषा दिलो को जोड़ती है पर हमारी भारतीय संस्कृति मन-बुद्धि के परे जाकर आत्माओ का मिलन करा देती है। उम्मीद है भारत से लौटने पर इन छात्र छात्राओं कि ना सिर्फ हिंदी बेहतर होगी बल्कि भारतीय संस्कृति के बदौलत विश्व को एक नयी दृष्टि से देखने के भी सीख विकसित हो चुकी होगी इनमे। गेनादी जी का कहना सही है कि अभी इस राष्ट्र को और ऊँचा उठना है और ये तभी संभव है जब हम संस्कृति और विकास के मायने को अपनी मातृ भाषा के छाँव में बैठकर समझे।

 

मिल के बिछड़ना भी एक रीत है!  उम्मीद है जो अनुभव हमने साझा किये वे अंदर सदा ही रहेंगे। ओफिर जिनकी हिंदी सबसे अच्छी थी वे भी है सबसे दाए किसी सूचना को पढ़ते हुए :-)

मिल के बिछड़ना भी एक रीत है! उम्मीद है जो अनुभव हमने साझा किये वे अंदर सदा ही रहेंगे। ओफिर जिनकी हिंदी सबसे अच्छी थी वे भी है सबसे दाए किसी सूचना को पढ़ते हुए 🙂

 इस अंग्रेजी लेख को भी देखे:

Gorakhpur: A City That Showed Israeli Students Ideal Merger Of Cultural And Literary Values (Photo Feature): http://wp.me/pTpgO-162

References:

A Brief Meeting With Genadi Shlomper

गोरखपुर न्यूज़ ऑनलाइन

गोरखपुर न्यूज़ ऑनलाइन

विकिपीडिया

सीएनएन

आवर्तन

A Brief Meeting With Dr. Genady Shlomper- Hindi Instructor In Israel!

 In company of an academician:  Met Dr. Genady Shlomper who happens to be a Hindi Instructor at Tel Aviv University in Israel!

In company of an academician: Met Dr. Genady Shlomper who happens to be a Hindi Instructor at Tel Aviv University in Israel!



Dr. Genady Shlomper came to Allahabad both as a tourist and as a person with purpose! He was here to attend a function organized to mark Hindi Divas on September 14. I could not be part of this function since I had to attend another event organized in a different city. As a result of that I could not meet the professor at this event, but next day I got an opportunity to meet him. It was a hurried affair since he was about to leave for Ayodhya. Anyway, it did not deter me from asking some interesting questions. Interestingly, it was a memorable experience to seek an appointment with a foreigner in my own language. The few minutes of talk over telephone in Hindi to fix time for the meeting was an unique experience.

This time too when I met someone from foreign land I noticed remarkable simplicity. Right in the beginning he confessed that he is no big guy! True, he might not be a celebrity but you need not to be a celebrity to enjoy a dignified stature! Speaking about his love for Hindi he stated that there was no emotional reason to learn Hindi. He embraced this language because he found it to be useful in scheme of things about to unfold in future. The market is growing and more and more job opportunities get concentrated in Asian countries. Therefore, it’s always going to be beneficial to learn Asian language instead of learning European language! It appears “Capitalism” has proved to be lifeline for Asian languages languishing under weight of English! 

Speaking about the influence of Hindi in Israel he said that it’s not very commonplace to notice Hindi speaking person there. However, in modern times there is always a  greater space for assimilation of newer ideas from other nations and people in Israel are not hesitant to fall in love with Hindi! On a different note, speaking about the specialties of Allahabad, he said that he found nothing fascinating about it! The only striking thing about this city was confluence of three rivers at Sangam area! Hearing this I was but compelled to ponder about one of the ills of globalization: That it’s fast making cities across the globe to lose their uniqueness! All cities are simply becoming clone of each other!

This brief meeting ended in few minutes but it gave rise to so many ideas as food for thought. That’s the plus point of being in company of academicians!

P.S. :-  Dr. Genady Shlomper is a Hindi Instructor at Tel Aviv University, Israel. 

क्या यही प्यार है?

तेज़ाब के हमले की  शिकार लक्ष्मी: हौसला जिन्दा है!

तेज़ाब के हमले की शिकार लक्ष्मी: हौसला जिन्दा है!

प्रेम के शुद्ध स्वरूप को आज के युग में वर्णन करना या उसकी तलाश करना बेमानी सा लगता है।  प्रेम कहानियो के नाम पर आज हम को दिल दहला देने वाली दास्ताने मिलती है। जहा प्रेम अपने अगले चरण तक पहुचता है मसलन शादी तक वहा भी वो यथार्थ के कडुवे सागर में विलीन हो जाता है। प्रेम या तो रुपहले परदे पे भला लगता है या तो मुंगेरीलाल की तरह मन के लैंडस्केप पर हसींन लगता है। इसके परे प्रेम एक वीभत्स अफ़साना सा है। जहा तथाकथित प्रेम मिला वहा भी तमाशा हुआ और जहा नहीं मिला वहा भी जिंदगानिया बर्बाद हुई। बहुत साल पहले मुंबई स्टेशन पर एक लड़की को ट्रैन से उतरते ही उसके प्रेमी ने चाक़ू घोप कर हत्या कर दी। इधर बीच कई खतरनाक ट्रेंड उभरे है प्रेमिका को सबक सिखाने के और उनमे से एक है तेज़ाब फ़ेंक देने का।  पता नहीं प्रेम का ये कौन सा सिद्धांत है कि प्रेमिका को प्रेम के नाम पे दिल दहला देने वाले तरीको से प्रताड़ित किया जाए !!

भारतीय सरकार ने एक कठोर कदम उठाते हुए इंडियन पेनल कोड में 326 A & 326 B दो नए प्रावधानों को जोड़ा जिसके तहत १० साल या उससे ऊपर तक के सजा की व्यवस्था है। ऐसे हादसों के शिकार लोगो को दो लाख रुपये तक के मुआवज़े का प्रावधान किया जो कि अपर्याप्त सा लगता है।  ऐसी घटनाएं ना किसी वर्ग विशेष तक सीमित है और ना ही ये किसी एक देश का मामला है। पाकिस्तान में एक संभ्रांत वर्ग (एलीट क्लास) से ताल्लुक रखने वाली एक महिला को उसके राजनीतिज्ञ पति ने तेज़ाब से इसलिए जला दिया क्योकि उसने तलाक माँगने की जुर्रत की। अब एक ही तरीका बचता है और वो है कि इनसे जुड़े कानूनों का सख्ती से पालन किया जाए, मुआवज़े की राशि बढ़ाई जाए और उसे पेंशन के समान किया जाए ताकि मेडिकल खर्च आसानी से वहन हो सके और ऐसे हादसों के शिकार लोगो को एक बेहतर स्पेस मिले जीवन जीने के लिए।

ये एक मार्मिक कविता पढ़ने को मिली जो पर्याप्त है ये बताने को कि ऐसे हादसों के शिकार लोगो पर क्या गुजरती है ! ये कविता मुझे सोशल मीडिया पे पहले पहल धीरेन्द्र पाण्डेय के मार्फ़त पढ़ने को मिली लेकिन यही कविता एसिड हमलो के प्रति जागरूकता प्रदान करने हेतु बनायी  गयी फेसबुक पेज पर भी प्रमुखता से पढ़ने को मिली।

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चलो, फेंक दिया
सो फेंक दिया….
अब कसूर भी बता दो मेरा

तुम्हारा इजहार था
मेरा इन्कार था
बस इतनी सी बात पर
फूंक दिया तुमने
चेहरा मेरा….

गलती शायद मेरी थी
प्यार तुम्हारा देख न सकी
इतना पाक प्यार था
कि उसको मैं समझ ना सकी….

अब अपनी गलती मानती हूँ
क्या अब तुम … अपनाओगे मुझको?
क्या अब अपना … बनाओगे मुझको?

क्या अब … सहलाओगे मेरे चहरे को?
जिन पर अब फफोले हैं
मेरी आंखों में आंखें डालकर देखोगे?
जो अब अन्दर धस चुकी हैं
जिनकी पलकें सारी जल चुकी हैं
चलाओगे अपनी उंगलियाँ मेरे गालों पर?
जिन पर पड़े छालों से अब पानी निकलता है

हाँ, शायद तुम कर लोगे….
तुम्हारा प्यार तो सच्चा है ना?

अच्छा! एक बात तो बताओ
ये ख्याल ‘तेजाब’ का कहाँ से आया?
क्या किसी ने तुम्हें बताया?
या जेहन में तुम्हारे खुद ही आया?
अब कैसा महसूस करते हो तुम मुझे जलाकर?
गौरान्वित..???
या पहले से ज्यादा
और भी मर्दाना…???

तुम्हें पता है
सिर्फ मेरा चेहरा जला है
जिस्म अभी पूरा बाकी है

एक सलाह दूँ!
एक तेजाब का तालाब बनवाओ
फिर इसमें मुझसे छलाँग लगवाओ
जब पूरी जल जाऊँगी मैं
फिर शायद तुम्हारा प्यार मुझमें
और गहरा और सच्चा होगा….

एक दुआ है….
अगले जन्म में
मैं तुम्हारी बेटी बनूँ
और मुझे तुम जैसा
आशिक फिर मिले
शायद तुम फिर समझ पाओगे
तुम्हारी इस हरकत से
मुझे और मेरे परिवार को
कितना दर्द सहना पड़ा है।
तुमने मेरा पूरा जीवन
बर्बाद कर दिया है।

Source Attributed To Poem: The Facebook Page Named “Stop Acid Attacks‬” Informs That This Poem Is Outburst Of Girl Who Became Victim Of Acid Attack!

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शरीर ही जलता है! रूह बच जाती है!!

शरीर ही जलता है! रूह बच जाती है!!

Reference:
Law Commission India On Acid Attacks

India Today

Laws Related To Acid Attack In India

Wall Street Journal

Hindustan Times 

The Guardian

Pics Credit:

Pic One

Pic Two: Azhar Khan And Others

That’s Strongest Example Of Divine Justice!

Army People Offering Helping Hands To People Of Jammu & Kashmir Trapped In Flood Waters!

Army People Offering Helping Hands To People Of Jammu & Kashmir Trapped In Flood Waters!

It’s the strongest evidence of divine justice that people of Jammu & Kashmir are today on the mercy of Indian Army! When they are being chased by death in form of threatening flood waters, it’s not the separatist forces, sponsored by Pakistan, which have come to their rescue. One can also not trace so-called progressive people and International Human Rights Commission who always condemned the role of India Army in J & K.

Today, in times of crisis, all we notice are efforts of Indian Army involved in rescue operation in the state. Where is Arundhati Roy who leaves no stone unturned to blame Indian Army? Her scathing attack on Indian Army, usually figment of imagination, is used by the foreign press to give rise to anti-Indian sentiments across the globe!


The chief of Lashkar-e-Taiba’s front Jamaat-ud-Dawah Hafiz Saeed treats the floods in Jammu & Kashmir some sort of conspiracy on part of Indian government! “Indian water terrorism is more lethal than its LOC violations.”  His statement gives clue about Pakistan’s instability in various spheres. After all, what else can you expect if you have these sort of blockheads  deciding fate of key issues related with nation’s growth!

Hafiz Saeed Treats Floods As "Water Terrorism" :P Pakistan is resting place of blockheads.  This statement asserts this unpleasant truth!

Hafiz Saeed Treats Floods As “Water Terrorism” 😛 Pakistan is resting place of blockheads. This statement asserts this unpleasant truth!

 

Anyway, hats off to divine spirit exhibited by the Indian Army! It’s time to salute their indomitable courage and unbiased stance. It’s also time to hate the cowardice of people who entered in malicious campaign against Indian Army.

 

Separatists in J & K Always Targeted Army People In Violent Manner! And They Are Now Seeking Help Of Army To Save Their Lives! Where Is Pakistan? Where Is Foreign Media?

Separatists in J & K Always Targeted Army People In Violent Manner! And They Are Now Seeking Help Of Army To Save Their Lives! Where Is Pakistan? Where Is Foreign Media?

Where Is International Human Rights Commission Which Always Painted India Army In Wrong Colours?

Where Is International Human Rights Commission Which Always Painted India Army In Wrong Colours?

Look At The Spirit Of Indian Army! However, The Foreign Media, Under Influence Of Wrong Sources, Always Made Indian Army Butt Of Ridicule!

Look At The Spirit Of Indian Army! However, The Foreign Media, Under Influence Of Wrong Sources, Always Made Indian Army Butt Of Ridicule!

Pic Credit:

Pic One

Pic Three

Pic Four

Pic Two & Five : Internet

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