खुर्शीद अनवर की आत्महत्या: समाज, कानून और मीडिया के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा!

गम्भीर मुद्दा ये है कि सतही मीडिया ट्रायल के चलते जिस भीषण मानसिक कष्ट से गुजरना होता है और जो सरेआम अपमान सहन करना पड़ता है क्या उसका कोई अस्तित्व नहीं? क्या इसका कोई मोल नहीं? क्या ये बिलकुल उपेक्षित कर देने वाली बात है?

गम्भीर मुद्दा ये है कि सतही मीडिया ट्रायल के चलते जिस भीषण मानसिक कष्ट से गुजरना होता है और जो सरेआम अपमान सहन करना पड़ता है क्या उसका कोई अस्तित्व नहीं? क्या इसका कोई मोल नहीं? क्या ये बिलकुल उपेक्षित कर देने वाली बात है?


खुर्शीद अनवर की आत्महत्या कई गम्भीर सवाल खड़े कर गयी आज के समाज के बारे में, पत्रकारिता के स्तर के बारे में और कानून के उपयोग और दुरुपयोग के सन्दर्भ में. खुर्शीद अनवर एक प्रसिद्ध सामजिक कार्यकर्ता थें जो नई दिल्ली में इंस्टिट्यूट फॉर सोशल डेमोक्रेसी नाम की संस्था चलाते थें. इसके अलावा वे जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय के छात्र भी थें. खुर्शीद अनवर ने पिछले साल १८ दिसम्बर २०१३ को आत्महत्या कर ली थी जब उनपे एक मणिपुरी औरत ने  अपने साथ दुष्कर्म का आरोप लगाया था. ये खबर कुछ एक समाचार चैनलों पर प्रमुखता से दिखायी गयी और इसके बाद सोशल नेटवर्किंग साईटस पर अंतहीन बहस छिड़ गयी. पहले तो खुर्शीद इस आरोप से हिल गए और इसके बाद मीडिया चैनलो द्वारा कीचड़ उछालने के बाद सदमे से ग्रस्त खुर्शीद ने आत्महत्या कर ली. बाद में उनके पास से बरामद सुसाइड नोट में इस बात का उल्लेख था कि मणिपुरी लड़की के साथ उन्होंने बलात्कार नहीं किया था बल्कि आपसी सहमति से शारीरिक सम्बन्ध बनाये थे.

इस घटना ने मुझे श्रीनिवास सिरास के आत्महत्या की याद दिला दी जो प्रोफेसर थे अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में. इस प्रकरण में न्यूज़ चैनलो नें इस प्रोफेसर के निजता के साथ खिलवाड़ किया था और उनकी गोपनीयता को सरेआम उजागर करके उनके समलैंगिक सम्बन्धो को विकृत स्वरूप दे दिया था. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस प्रकरण में सुनवाई करते हुए प्रोफेसर को थोड़ी राहत प्रदान की थी पर मीडिया चैनलो द्वारा की गयी गुस्ताखी उन पर भारी पड़ गयी और उन्होंने आत्महत्या कर लिया. कोर्ट इस तरह के मीडिया ट्रायल पर अक्सर चेतावनी देती रही है पूर्व में कि न्यूज़ चैनल जब केस ट्रायल स्टेज में हो तो किसी भी निष्कर्ष पर अपनी तरफ से पहुचने की हड़बड़ी ना दिखाए और न्यायालय की कार्यवाही को प्रभावित करने की कोशिश ना करे लेकिन बड़े कॉर्पोरेट संस्थानो द्वारा संचालित ये न्यूज़ चैनल न्यायालय के द्वारा इन पारित आदेश को सिर्फ कागज़ का एक टुकड़ा समझते है और उन्हें किसी प्रकरण में निहित संवेदनशीलता से कुछ नहीं लेना देना होता सिवाय इसके कि उसका माखौल किस तरह उड़ाया जाए. ये सही है मीडिया ट्रायल एक जटिल मुद्दा है लेकिन उससे बड़ा सच ये है कि सनसनीखेज मीडिया ट्रायल के चलते किसी के इज्जत और उसके आत्मसम्मान के साथ जो खिलवाड़ होता है और इससे जो अपूर्णीय क्षति होती है उसकी भरपाई असंभव होती है. मीडिया  किसी दोषी व्यक्ति के अधिकारो के हमेशा अतिक्रमण करती आयी है और समय आ गया है कि सही तथ्यात्मक रिपोर्टिंग और रिपोर्टिंग जो गलत इरादो से की गय़ी हो सिर्फ न्यूज़ चैनल के टी आर पी या फिर अखबार की बिक्री बढ़ाने के उद्देश्य से की गयी हो दोनों में एक स्पष्ट रेखा का निर्धारण हो.

“सनसनीखेज रिपोर्टिंग तो हमेशा होगी क्योकि सनसनीखेज घटनाये भारत में हमेशा रहती है. सुप्रीम कोर्ट इस पर लगाम लगाने में असमर्थ है. ये सही है कि रिपोर्टिंग सही होनी चाहिए पर इसका ये मतलब निकालना कि ये मीडिया के द्वारा ट्रायल है एक निन्दात्मक अभिव्यक्ति है. कोर्ट या किसी के पास कोई स्पष्ट मापदंड नहीं है जो ये निर्धारित कर सके कि मीडिया ट्रायल क्या होता है.” (सीनियर अधिवक्ता राजीव धवन, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया). खैर इस बात से इंकार करना असम्भव है कि मीडिया के द्वारा किसी भी दोषी व्यक्ति के अधिकारो का हनन और किसी के भी निजता के साथ खिलवाड़ करने के कृत्य का अपने तरफ से दूषित स्पष्टीकरण कोई भी मतलब नहीं रखता। ये सिर्फ एक व्यर्थ का  प्रलाप होता है, बेवजह अपने को सही ठहराना होता है. उसकी स्पष्टीकरण से उस अपूर्णीय क्षति की भरपाई असम्भव है जो इस वजह से होती है. इन दोनों प्रकरणो में दो व्यक्ति ने अपनी जान ले ली इस वजह से और अब हम ये कभी नहीं जान पाएंगे कि सच्चाई क्या थी. क्या ये दो जाने वापस मिल जाएंगी? क्या खोया सम्मान वापस मिलेगा? शायद कभी नहीं।

वरिष्ठ पत्रकार सईद नक़वी शायद सच के ज्यादा करीब है जब ये कहते है कि “पत्रकारिता में शायद निष्कर्षो पर पहुचने की हड़बड़ी है. ये उसी दिन किसी को मुजरिम ठहरा देता है जिस दिन किसी पे आरोप लगते है, इसके पहले कि कोर्ट किसी बात का निर्धारण करे. ये बहुत दुखी कर देने वाली बात है. कैसे मीडिया इतनी जल्दीबाज़ी में किसी निष्कर्ष पर पहुच सकती है और किसी को इतनी हड़बड़ी में दोषी करार दे सकती है? मीडिया को इस बात का इन्तजार करना चाहिए कि कम से कम प्राथमिक रिपोर्ट तो दर्ज हो, कम से कम जांच तो पूरी हो जाए” (डी एन ए न्यूज़ रिपोर्ट) ये बिलकुल चकित कर देने वाली बात है कि मीडिया कभी भी इस तरह के सनसनीखेज मीडिया ट्रायल के दौरान अपूर्णीय क्षति और इनके अंजामो के बारे में कभी भी ईमानदारी से आकलन नहीं करती. गम्भीर मुद्दा ये है कि सतही मीडिया ट्रायल के चलते जिस भीषण मानसिक कष्ट से गुजरना होता है और जो सरेआम अपमान सहन करना पड़ता है क्या उसका कोई अस्तित्व नहीं? क्या इसका कोई मोल नहीं? क्या ये बिलकुल उपेक्षित कर देने वाली बात है? ये बिलकुल स्पष्ट है कि मीडिया ट्रायल अधिकतर एकतरफा, भ्रामक और तथ्यो के साथ खिलवाड़ होता है जिसमे इस बात की बिलकुल परवाह नहीं की जाती कि कम से कम तथ्यो के असलियत का तो निर्धारण कर लिया जाए सूक्ष्मता से.

इस पूरे प्रकरण में दो बहुत गम्भीर पहलू शामिल है. पहला तो ये कि ये समाज के इस विकृत बदलाव को दर्शाता है कि समाज में हड़बड़ी में निष्कर्षो पर पहुचने की लत लग गयी है अधकचरे दिमाग के साथ. इसे चाहे वो प्रशंसा  हो या फिर आलोचना दोनों को बिना किसी आधार के आत्मसात करने की आदत सी हो गयी है. ना आलोचना का स्तर विकसित हो पाया और ना ही प्रशंसा के आयाम निर्धारित हो पाये. आलोचना अगर हो रही है तो तो वो भी तब जब कि कोई भी तथ्यात्मक या तार्किक आधार आलोचना के पक्ष में मौजूद नहीं है. दूसरा पक्ष ये है कि जिन कानूनो को स्त्री की अस्मिता की रक्षा करने के लिए बनाया गया है वे अब निर्दोष लोगो को प्रताड़ित करने का अस्त्र बन गए है. ये कितने तकलीफ की बात है कि जहा किसी स्त्री के सेक्सुअल हरस्मेंट का मामला उभरता है वही पे समाज का एकपक्षीय भेदभाव ग्रस्त दिमाग उभर कर सामने आ जाता है और मीडिया हमेशा की तरह दोषी के ऊपर हर तरह का लांछन जड़ देता है और इसके पहले वो अपने बेगुनाही को साबित करे वो मुजरिम साबित करार कर दिया जाता है. ये सर्वविदित है कि जो नए कानून की परिभाषा है सेक्सुअल हरस्मेंट को रोकने कि उसके प्रावधान इस तरह के है कि आप तकरीबन मुजरिम ही है और इस बात को गौण कर दिया गया है कि आप के पास भी बचाव के सही रास्ते होने चाहिए. और सबसे घातक ये है कि एकतरफा मीडिया ट्रायल शुरू हो जाने के बाद जो उसके पास अपने को बचाने के जो रास्ते होते है वे भी बंद हो जाते है क्योकि मीडिया आपके विपक्ष में माहौल खड़ा कर देता है हर तरफ.

“भारत में और अन्य देशो में जहा इस तरह के कानून पास हुए है औरतो के साथ होने वाले अपराधो को रोकने के लिए उसमे बर्डेन ऑफ़ प्रूफ को सुनियोजित तरीके से बदल दिया गया है. अब दोषी के ऊपर ये जिम्मा है कि वे अपनी निर्दोषता साबित करे. ये परिवर्तन निहित रूप से बहुत गलत है पर शायद ये इसलिए किया गया है कि ताकि इन प्रकार के अपराधो में स्त्री के पास सामान स्तर के अवसर हो अपने साथ हुए अन्याय के भरपाई के लिए. लेकिन जो अब नए कानून बने है सेक्सुअल हरस्मेंट रोकने के लिए उसमे ये बर्डन ऑफ़ प्रूफ इस सख्त स्वरूप में है कि जहा दोषी (पुरुष) के पास बचाव के सारे रास्ते बंद हो जाते है. अगर एक बार आप पर आरोप लगे तो इस बात की सम्भावना कम है कि आप अपने को निर्दोष साबित कर सके या आपको बेहद मशक्कत के बाद ही कोई रास्ता दिखायी पड़े. ये शायद नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत के विपरीत है.” (वरिष्ठ पत्रकार प्रेम शंकर झा, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया)

संक्षेप में समाज और मीडिया दोनों का स्तर रसातल में चला गया है क्योकि ये दोनों भावनाओ के प्रवाह में बहने के आदी हो गए है और इन दोनों को तथ्यो और तार्किक सोच से कुछ लेना देना नहीं रह गया है. दोनों को इस विकृत खेल में रस आने लगा है जहा किसी निर्दोष के भावनाओ के साथ खिलवाड़ होता है, उसके आत्मसम्मान के जब टुकड़े टुकड़े किये जाते है. लेकिन खेद कि बात ये है कि न्याय परंपरा/व्यवस्था भी इसी विकृत रस का शिकार हो गयी है, इन्ही घातक प्रवित्तियों का शिकार सा हो गयी है, खासकर उन मामलो में जहा स्त्रियों से जुड़े अपराधो के निष्पक्ष अवलोकन की बात आती है. खैर सब की जिम्मेदारी बनती है कि  भावनात्मक प्रवाह में बह कर लिए गए निर्णयो के बजाय सोच समझकर तार्किक रूप से लिए गए निर्णयो को प्राथमिकता दी जाए. ये बहुत आवश्यक हो गया है समाज के बिखराव को रोकने के लिए, एक मूल्य आधारित समाज के निर्माण के लिए.

पाठक इस लेख का अंग्रेजी संस्करण यहाँ पढ़े:

Rape Allegation That Led To Suicide of Kurshid Anwar: A Resounding Slap On The Face Of Media!

खुर्शीद अनवर की आत्महत्या: समाज, कानून और मीडिया के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा

खुर्शीद अनवर की आत्महत्या: समाज, कानून और मीडिया के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा

References:

Activist Khurshid Anwar’s suicide: Was media trial responsible?

AMU’s ‘gay’ prof commits suicide

Guilty If Charged

Dainik Bhasker

 

पिक्स क्रेडिट:

तस्वीर प्रथम 

तस्वीर दो

10 responses

  1. Sanchit Gaurav:

    You are right pandey ji…

    *************
    Author’s Response:

    ये समाज की वास्तविक तस्वीर है …

  2. Rekha Pandey, Mumbai, said:

    Aapki baat sahi hai aur sabko apni jimmedaari samajhni padegi apni samaj ke prati…

    ****************

    Author’s Response:

    एक अजीब समाज एक निर्माण हो रहा है जहाँ सच और झूठ दोनों एक जैसे लगते है!

  3. Pankaj Chelawat, Raipur, Chattisgarh, said:

    ARVINDJI VERY TRUE SIR PAR SAMAAJ KHUD HI BHATAK GAYA HAI JAHAN SAMAAJ KHUD HI BHATKA HU A HO WAHAAN SUDHAAR HONA MUSHKIL HAI…..GALAT MEDIA KABHI BHI BHAVNAO ME NAHI BEHTA.. BHED CHAAL ME BEHTA HAI; TRP ME BEHTA HAI AGAR MEDIA WALO KE PAAS BHAVNAYE HOTI TO PITA KE CHITA PAR PUTRA SE NAHI POOCHTE AA KAIA MEHSOO KAR RAHE HAI

    ********************
    Author’s Response:

    ये माना कि अँधेरा घना है पर कुछ दिए तो फिर भी जलाये जा सकते है ना!!

  4. बहुत धन्यवाद इन पाठको को ….

    Kripashankar Pandey, Mumbai; Manjoy Laxmi, Nagpur, Maharashtra; Vishu Dev, Mumbai; Pravin Khangar, New Delhi; Chandrodaya Shakya, Kathmandu, Nepal; Urmila Harit, Indian Institute of Mass Communication, New Delhi; Yogesh Pandey, Lucknow, Uttar Pradesh; Ajay Verma, New Delhi; Pawan Kumar Singh, Patna, Bihar; Thalappully Gopinathan; Himanshu B. Pandey, Siwan, Bihar; Abu Shariq, Jubail, Saudi Arabia, and Umesh Tailor…..

  5. Shiv Kumar Joshi, Faridabad, Haryana, said:

    Very correct… एक गुंडी / गलत औरत अगर झूठे रेप केस में कामयाब हुई तो दफा 376 IPC में पुरुष को सजा उम्र कैद तक हो सकती है और अगर कामयाब नहीं हुई और पुलिस ने झूठ पकड़ लिया तो दफा 182 IPC में सजा मात्र 6 महीने और वो भी पुलिस दफा 182 IPC का केस बनाती ही नहीं और अगर वही केस अदालत में जाकर झूठा पाया गया तो दफा 193 IPC के तहत सजा 7 साल और वो भी अदालत किसी पर भी केस नहीं बनाती……मतलब साफ़ है कि झूठे मुकद्दमे डालने वालों पर किसी का भी कोई नियंत्रण है ही नहीं….ना पुलिस का और ना ही अदालतों का.

    ***************
    Author’s Response:

    ये सबसे सार्थक और सबसे सारगर्भित टिप्पणी है. आप काबिल अधिवक्ता है ये आपके नपे तुले शानदार टिपण्णी ने बता दिया…इसके बाद कुछ कहने को शेष नहीं रह जाता है. हमारी न्याय परंपरा कही से गलत नहीं। प्रावधान हर तरीके के है लेकिन हमारा सिस्टम इतने घटिया तरीकें से काम करता है कि न्याय की उम्मीद ही सबसे बड़ा अन्याय बन जाता है. और अब उस पर से भ्रष्ट सरकारो द्वारा अपने वोट बैंक के लिए बनाये गए बेहद गलत कानून। इससे जनता पर दोहरी मार पड़ रही है जिसकी किसी को चिंता नहीं।

  6. Swami Prabhu Chaitanya, Patna, Bihar, said:

    Very sad … इस मीडिया पर कौन लगाम लगायेगा ? और इस मर्डर की सज़ा उसे कैसे मिलेगी ?

    *****************
    Author’s Response:

    स्वामीजी अगर न्याय के चौखट पर अन्याय होने लगे तो समझिये वो समाज अपने सबसे बुरे दिनों की तरफ़ बढ़ रहा है. अपने लेख के जरिये मैंने एक चेतावनी दे दी। बाकी का राम जाने। वैसे आपने पढ़ा और शेयर भी किया। बहुत अच्छा लगा.

  7. Prince Mittal, Raipur, Chattisgarh, said:

    बहुत खूब ….

    *****************

    Author’s Response:

    धन्यवाद। ये एक गम्भीर और एक जटिल मुद्दा है.

  8. Ritesh Kumar Tiwari, Pune, Maharashtra, said:

    Why now when a feminist committed suicide? Pandeyji yeh mudda salon se hum log face kar rahe hai but false 498a ya dv pe koi kuch nahi bolta….

    ***********************

    Author’s Response:

    आपके बात के मर्म को मै समझता हूँ. पहले तो आप इस भ्रम से ऊपर उठे कि ये किसी फेमिनिस्ट आत्मा के समर्थन में लिखा गया लेख है. ये एक विशुद्ध न्याययिक दृष्टिकोण से लिखा गया लेख है. ये भ्रामक मीडिया ट्रायल के खिलाफ है. आप सही कहते है कि फ़र्ज़ी दहेज़ के मुकदमो में निर्दोष पुरुष हमेशा से यही झेलते आये है. मै औरो का नहीं जानता लेकिन मैंने किसी का भी पक्ष विपक्ष ना लेते हुए सिर्फ मुद्दे की गम्भीरता को ध्यान में रखकर लिखा है वर्षो से। इस लेख को भी देखे। मैंने किसी व्यक्ति विशेष के बारे में नहीं लिखा है सिर्फ मीडिया ट्रायल और कानून की खामियों को ध्यान में रख कर लिखा है. और शायद आपको पता ना हो लेकिन अपने बारे में ये जरूर बताना चाहूंगा कि मै पुरुष अधिकारो के क्षेत्र में सलंग्न हूँ लिहाज़ा ये कहना आपका ठीक नहीं कि किसी फेमिनिस्ट के निधन पर इतना हंगामा क्यों? यहाँ मुद्दे को इतने संकीर्ण दृष्टि से देखने की जरूरत नहीं। और मैंने भी यही किया। इसको सही सन्दर्भ में आप देखे।

  9. Prakash Thakare, SIFF, Nagpur, Maharashtra, said:

    एकदम सही बात है सर आपकी।

    ************
    Author’s Response:

    सच तो है प्रकाश जी. पर कितनी दुखद बात है ये. किसी आदमी की जान की कोई कीमत ही नहीं अपने तुच्छ स्वार्थ के आगे. उम्मीद है आपने सिर्फ वही पैराग्राफ नहीं पढ़ा होगा जो फेसबुक पर दिख रहा है. पूरा लेख पढ़े तो आपको समाज के लगातार बदलते स्वरूप से घिन्न आने लगेगी।

  10. Deepak Dhabhai said:

    Arvind K Pandey जी आपने तीक्ष्ण , सटीक एवं सच्ची बातें लिखी हैं …आपका संदर्भ भी व्यापक है है और प्रशंसनीय है… आप ब्लॉग लिखे …नियमित लिखे …ताकि छ्दम बुद्धिजीवियों के ब्लोगों का अंत हो ॥ पुनः आपको साधुवाद …

    ***************

    Author’s Response:

    हां जब तक परिस्थितियां साथ दे तब तक तो लिखता ही रहूँगा वो सब जो सच के करीब है.

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