Monthly Archives: January, 2014

My Recent Write-Ups Which Appeared In Blogosphere As Well As In Mainstream Media!

It’s quite a strenuous affair to be sandwiched between demands of social media and mainstream media. Both the mediums in our times have attained new heights. However, it’s a great accomplishment if a writer/journalist is getting sufficient space in both the mediums at the same time. Fortunately, my writings managed to appear in mainstream publications without much canvassing on my part. I never had to heed to confrontational attitude to convince the editors from mainstream media to understand the relevance of writings which had first appeared in virtual world. 

That’s because before I moved to virtual world I had already found space as Writer/Contributor/Freelancer/Letter Columnist in all leading national and International publications which include Time, Newsweek, The Hindu, The Telegraph, The Statesman, The Times of India, The Hindustan Times, India Today, Outlook, The Week, Harmony, The Sunday Indian, Hardnews, Critique, Tehelka, Northern India Patrika and Soham, to name a few. Today when I have primarily got confined to virtual space, the write-ups still appear in Northern India Patrika- a leading newspaper published from Allahabad. It’s one of the oldest newspapers published in India, being sister publication of now defunct Amrit Bazar Patrika (Kolkata) which had started in 1868.

Recent write-ups which appeared in mainstream media:

1.  Vishal Bhardwaj: A Genuine Music Composer In Times When Indian Music Directors Have Become Copycats

Appeared in Media Musings Column of Northern India Patrika On December 08, 2014.

Appeared in Media Musings Column of Northern India Patrika On December 08, 2013.

2. Unleashing Magic Of “Triple S” Of Indian Cinema: Sahir Ludhianvi, Shakeel Badayuni and Shailendra!

Appeared in Media Musings Column of Northern India Patrika On December 22, 2013

Appeared in Media Musings Column of Northern India Patrika On December 22, 2013

3. Rape Allegation That Led To Suicide of Kurshid Anwar: A Resounding Slap On The Face Of Media!

Appeared in Northern India Patrika's Editorial Column On January 07, 2014.

Appeared in Northern India Patrika’s Editorial Column On January 07, 2014.

4. Swami Vivekananda: A Spiritual Powerhouse Who Really Understood The Potential Of Youths!

Appeared in Northern India Patrika's Editorial Column On January 18, 2014.

Appeared in Northern India Patrika’s Editorial Column On January 18, 2014.

5.  News Item Related With Speech I Gave In Allahabad On January 12, 2014, At Jagat Taran Girls Degree College.

News Related With Speech I Delivered As A Guest Speaker In An Event Organized At Jagat Taran Girls Degree College To Celebrate The Birth Anniversary Of Swami Vivekananda. It's The Same Venue  Where Couple Of Days Back President Of India Pranab Mukherjee Addressed The Gathering Of Students!

News Related With Speech I Delivered As A Guest Speaker In An Event Organized At Jagat Taran Girls Degree College To Celebrate The Birth Anniversary Of Swami Vivekananda. It’s The Same Venue Where Couple Of Days Back President Of India Pranab Mukherjee Addressed The Gathering Of Students! This News Item Appeared In Northern India Patrika On January 13, 2014.

5. The Times Of India’s News Coverage

The Times Of India News Item Related With Speech I Delivered.

The Times Of India News Item Related With Speech I Delivered. This News Item Appeared On January 21,2014

6. That’s Myself Giving Speech At Jagat Taran Girls Degree College On January 12, 2014.

Giving Speech In Allahabad Is A Great Feeling. After All, It's A Place Associated With Great Thinkers, Intellectuals And Writers!  I Gave The Speech At Jagat Taran Girls Degree College On January12, 2014. That's The Same Venue Where President Of India Pranab Mukherjee Also Delivered The Speech Some Days Back.

Giving Speech In Allahabad Is A Great Feeling. After All, It’s A Place Associated With Great Thinkers, Intellectuals And Writers! I Gave The Speech At Jagat Taran Girls Degree College On January12, 2014. That’s The Same Venue Where President Of India Pranab Mukherjee Also Delivered A  Speech Some Days Back.

 

 

 

कांची के शंकराचार्य की रिहाई इस बात को दर्शाती है कि वर्तमान समय में दुष्प्रचार ज्यादा ताकतवर है बजाय सत्य के!

कांची के शंकराचार्य अंततः निर्दोष और निष्पाप होकर उभरे लेकिन इस नौ साल लम्बे ड्रामे की वजह से इस अति प्राचीन हिन्दू मठ पर जो दाग लगे उसको मिटने में कई वर्ष लगेंगे.

कांची के शंकराचार्य अंततः निर्दोष और निष्पाप होकर उभरे लेकिन इस नौ साल लम्बे ड्रामे की वजह से इस अति प्राचीन हिन्दू मठ पर जो दाग लगे उसको मिटने में कई वर्ष लगेंगे.


इस नए युग के इंडिया यानि “भारत” के अगर हाल के घटनाओ को देखे तो ये आसानी से समझ आ जाएगा कि धर्मनिरपेक्ष सरकारो ने सबसे ज्यादा जुल्म ढाया है हिन्दू संतो पर. ये धर्मनिरपेक्ष सरकारे मुग़लकाल के बाद्शाहो और ब्रिटिश काल के शासको से भी ज्यादा क्रूर रही है हिन्दू धर्मं से जुड़े प्रतीकों को ध्वस्त करने और इनसे जुड़े लोगो को अपमानित करने के मामले में. हिन्दू संतो को निराकरण ही प्रताड़ित किया जा रहा है और इन्हे यौन अपराधो से लेकर देशद्रोह जैसे जघन्य अपराधो में बेवजह घसीटा जा रहा है. बिकी हुई मीडिया इन प्रकरणो का एक पक्ष 
दिखाती  है अपने देश में और देश के बाहर विदेशी अखबारो में. ये आपको अक्सर देखने को मिलेगा कि इस प्रकार के खबरो में ज्यादातर झूठ होता है या अर्धसत्य का सहारा लेकर एक भ्रामक कहानी गाढ़ी जाती है. कोई भी मुख्यधारा का समाचार पत्र तस्वीर के दोनों पहलू दिखाने में दिलचस्पी नहीं रखता.

एक सबसे बड़ी वजह ये है कि ज्यादातर  भारतीय मीडिया समूह का कण्ट्रोल विदेशी ताकतो के हाथो में है. सबके विदेशी हित कही ना कही शामिल है तब हम किस तरह से इनसे ये आशा रखे कि ये सच बोलेंगे? ये वही मुख्यधारा के समाचार पत्र है जो साध्वी प्रज्ञा के गिरफ्तारी को तो खूब जोर शोर से दिखाते है लेकिन साध्वी के साथ जेल के अंदर हुए अमानवीय कृत्यो को जो बंदियो के अधिकारो का सरासर उल्लंघन था उसको दिखाने या बताने से साफ़ मुँह मोड़ गए. ये वही मुख्यधारा के समाचार पत्र है जिन्होंने देवयानी प्रकरण में देवयानी का साथ इस तरह से दिया जैसी कि उसने भारत के नाम विदेशो में ऊँचा किया हो, जैसे उसने कोई जुर्म ही नहीं किया हो. वो इसलिए से क्योकि इसका सरकार से सीधा सरोकार है और सिस्टम इसके पक्ष में है लेकिन हर वो आदमी जिसने भी सरकार ये सिस्टम के विपक्ष में कुछ कहा उसे इस तरह की  सरकारे या सिस्टम सुनियोजित तरीको से अपराधी घोषित कर देता है.

ये कहने में कोई संकोच नहीं कि आज के युग मे सत्य से ज्यादा असरदार किसी के खिलाफ सुनियोजित तरीके से फैलायी गयी मनगढंत बाते है. समाचार पत्रो का काम होता है सत्य को सामने लाना सही रिपोर्टिंग के जरिये लेकिन हो इसका ठीक उल्टा रहा है: मीडिया आज सबसे बड़ा हथियार बन गयी है झूठ और भ्रम को विस्तार देने हेतु. इसका केवल इतना काम रहा गया है कि हर गलत ताकतो को जो सत्ता में है उनको बचाना, उनको बल देना. एक बाजारू औरत की तरह अपनी निष्ठा को हर बार बदलते रहना मीडिया का एकमात्र धर्मं बन गया है. साधारण शब्दो में ये सत्ता पे आसीन शासको की भाषा बोलता है. कांची के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी की गिरफ्तारी के प्रकरण के रौशनी में इस प्रकरण को देखे जिन्हे २००४ में बेहद शर्मनाक तरीके से शंकर रमण के हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था. शंकर रमण कांची के एक मंदिर में मैनेजेर थें. उस वक्त के तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने अपने को धर्मनिरपेक्ष साबित करने के लिए और ये जताने के लिए कि कानून से ऊपर कोई नहीं होता इनकी गिरफतारी सुनिश्चित की. कांची के शंकराचार्य के ऊपर “आपराधिक षड्यंत्र, अदालत को गुमराह करने गलत सूचना के जरिये, धन का आदान प्रदान आपराधिक गतिविधि को क्रियांवित करने के लिये” आदि आरोप लगाये गए.

इस एक हज़ार साल से भी ऊपर अति प्राचीन ब्राह्मणो के अत्यंत महत्त्वपूर्ण केंद्र के मुख्य संचालक को इस तरह अपमानजनक तरीके से एक दुर्दांत अपराधी के भांति गिरफ्तार करना और फिर मुख्यधारा के समाचार पत्रो के द्वारा अनर्गल बयानो के आधार पर उनको दोषी करार कर देना अपने आप में मीडिया की सच्चाई बयान कर देता है. ये बता देना आवश्यक रहेगा कि कांची कामकोटि पीठ हिन्दुओ का अति प्राचीन मठ है जिसको हिन्दू समुदाय में दुनिया भर में बेहद श्रद्धा के साथ देखा जाता है. कांची के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी बहुत सम्मान की दृष्टि से देखे जाते रहे है हिन्दू शास्त्रो के मर्मज्ञ होने के कारण. इन्होने  नवी शताब्दी में स्थापित कांची कामकोटि पीठ के गरिमा को नयी ऊंचाई प्रदान की, जिसकी हिन्दू समुदाय में वेटिकन चर्च सरीखी पकड़ है. जयललिता और ब्राह्मण विरोधी नेता डीएमके प्रमुख करूणानिधि के आपसी मतभेदों के चलते इस हिन्दू मठ के माथे पर कालिख लग गयी.

 ये बता देना आवश्यक रहेगा कि कांची कामकोटि पीठ हिन्दुओ का अति प्राचीन मठ है जिसको हिन्दू समुदाय में दुनिया भर में बेहद श्रद्धा के साथ देखा जाता है. कांची के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी बहुत सम्मान की दृष्टि से देखे जाते रहे है हिन्दू शास्त्रो के मर्मज्ञ होने के कारण. इन्होने  नवी शताब्दी में स्थापित कांची कामकोटि पीठ के गरिमा को नयी ऊंचाई प्रदान की, जिसकी हिन्दू समुदाय में वेटिकन चर्च सरीखी पकड़ है. जयललिता और ब्राह्मण विरोधी नेता डीएमके प्रमुख करूणानिधि के आपसी मतभेदों के चलते इस हिन्दू मठ के माथे पर कालिख लग गयी.

ये बता देना आवश्यक रहेगा कि कांची कामकोटि पीठ हिन्दुओ का अति प्राचीन मठ है जिसको हिन्दू समुदाय में दुनिया भर में बेहद श्रद्धा के साथ देखा जाता है. कांची के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी बहुत सम्मान की दृष्टि से देखे जाते रहे है हिन्दू शास्त्रो के मर्मज्ञ होने के कारण. इन्होने नवी शताब्दी में स्थापित कांची कामकोटि पीठ के गरिमा को नयी ऊंचाई प्रदान की, जिसकी हिन्दू समुदाय में वेटिकन चर्च सरीखी पकड़ है. जयललिता और ब्राह्मण विरोधी नेता डीएमके प्रमुख करूणानिधि के आपसी मतभेदों के चलते इस हिन्दू मठ के माथे पर कालिख लग गयी.

उस वक्त के प्रमुख समाचार पत्रो ने ये दर्शाया कि पुलिस इस तरह से गिरफ्तार करने का साहस बिना पुख्ता सबूतो के कर ही नहीं सकती. उस वक्त अभियोजन पक्ष के वकील इस बात से पूरी तरह आश्वस्त थे कि शंकराचार्य को दोषी साबित करने के लिए उनके पास पर्याप्त पुख्ता सबूत थें. विवेचना अधिकारी प्रेम कुमार का ये बयान प्रमुखता से छपा कि हमारे पास ठोस साक्ष्य है स्वामी जयेन्द्र सरस्वती के खिलाफ और ये कि शंकर रमण और इनके बीच करीब चार सालो से आपसी मनमुटाव था जिसको सिद्ध करने के लिए पर्याप्त सबूत इकठ्ठा किये जा रहे है.

खैर ईश्वर के यहाँ देर भले हो पर अंधेर नहीं है. सत्य की अंततः विजय हुई जब पांडिचेरी की विशेष अदालत ने सत्ताइस नवंबर २०१३ को उन सभी लोगो को जो शंकर रमण हत्याकांड में आरोपी बनाये गए थें उनको बाइज्जत बरी कर दिया. इसी के साथ नौ साल से हो रहे ड्रामे का पटाक्षेप हो गया. उन पर लगाये गए सभी आरोपो से उन्हें मुक्त कर दिया गया. जितने भी प्रमुख गवाह थें उन्होंने अभियोजन पक्ष के वर्णन को समर्थन देने से इंकार कर दिया। अभियोजन पक्ष के विरोध में करीब ८० से अधिक गवाहो ने अपने बयान दर्ज कराये।

कांची के शंकराचार्य अंततः निर्दोष और निष्पाप होकर उभरे लेकिन इस नौ साल लम्बे ड्रामे की वजह से इस अति प्राचीन हिन्दू मठ पर जो दाग लगे उसको मिटने में कई वर्ष लगेंगे. हिन्दुओ के आस्था और प्रतीक के साथ जो बेहूदा मजाक हुआ उसके निशान कई वर्षो तक संवेदनशील मनो को कटोचते रहेंगे. लेकिन हिन्दू ब्राह्मण के उदार मन को देखिये कि इतना होने के बाद भी किसी के प्रति कोई कटुता नहीं. इस परिपेक्ष्य में शंकराचार्य के वक्तव्य को देखिये जो उन्होंने बरी होने के बाद दिया: ” धर्म की विजय हुई. सत्य की जीत हुई. सब कुछ खत्म हो जाने के बाद अंत में केवल यही बात मायने रखती है. मुझे मेरे गुरु ने सब कुछ सहन करने को कहा है. इसलिए ये कहना उचित नहीं होगा कि हालात मेरे लिए असहनीय थें. हा कुछ दिक्कते जरूर आयी वो भी उस वजह सें कि हम लोग नयी तरह की परिस्थितयो का सामना कर रहे थें. हमने पूर्व में देखा है कि किस तरह आक्रमणकारियों ने हिन्दू मंदिरो पर हमले कर उनको विध्वंस किया। आज जब हम मंदिरो पर पड़े उन हमलो की निशानियाँ देखते है तो  हमे वे आक्रमणकारी और उनकी क्रूरता याद आती है. आज जो कुछ भी मठ के साथ हुआ ( मेरे पर जो  आरोप लगे) वे बहुतो की नज़र में पूर्व में किये गए आक्रमणकारियों के द्वारा किये गए विध्वंस सरीखे ही है.”

ये बहुत दुःख की बात है कि जैसे ही किसी हिन्दू संत पर कोई आरोप लगते है सारे मुख्यधारा के मीडिया समूह उस संत को बदनाम करने की कवायद में जुट जाते है पूरी ताकत से इस बात से बिल्कुल बेपरवाह होकर कि मीडिया का मुख्य काम किसी भी घटना की सही-२ रिपोर्टिंग करनी होती है ना कि न्यायिक ट्रायल करना। उससे भी बड़ी बिडम्बना ये है कि अगर संत पर लगे आरोप निराधार और झूठे पाये जाते है तो जो अखबार या फिर न्यूज़ चैनल आरोप लगने के वक्त पूरे जोर शोर से संत को दोषी ठहरा रहे थे वे ही अखबार और न्यूज़ चैनल पूरी तरह से कन्नी काट लेते है. संत को बेगुनाह साबित करने वाली खबर कब आती है और कब चली जाती है ये पता भी नहीं चलता है. यही वजह है कि कांची के शंकराचार्य की बेगुनाही और बाइज्ज़त बरी होना किसी भी शीर्ष अखबार के सुर्खियो में नहीं आया. शायद सेकुलर मीडिया ने ये सोच कर इस खबर को प्रमुखता से नहीं बताया क्योकि हिन्दुओ से जुडी कोई भली खबर सेक्युलर भावना के विपरीत होती है!

मेनस्ट्रीम मीडिया को प्रोपगेंडा ज्यादा रास आता है बजाय सत्य के. सेक्युलर ताकतो ने और इनके द्वारा संचालित मीडिया समूहो ने कांची के शंकराचार्य के गिरफ्तारी के वक्त ये बहुत जोरदार तरीके से ये दर्शाया कि कोई भी कानून से ऊपर नहीं होता. तो क्या यही सेक्युलर ताकते जो कानून की बात करती है शाही ईमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी को गिरफ्तार करने की हिम्मत रखते है जिन पर कई धाराओ में देश के विभिन्न थानो में एफ आई आर दर्ज है? क्या यही सेक्युलर ताकते उन क्रिस्चियन मिशनरीज को बेनकाब करने की ताकत रखती है जो देश के पिछड़े और दूर दराज के इलाको में लोगो को बहला फुसला कर उनका धर्म परिवर्तन कर रही है? लेकिन ये सबको पता है कि सेक्युलर मीडिया ऐसा कभी नहीं करेगा. ऐसा इसलिए कि इन सेक्युलर लोगो की निगाह में कानून के लम्बे हाथ केवल हिन्दू संतो के गर्दन तक पहुंचती है. ये हिन्दू संतो को केवल बदनाम करने तक ही सीमित है और हिन्दू आस्था को खंडित और विकृत करने भर के लिए है. ये दुष्प्रचार के समर्थक है सत्य के नहीं.

हिन्दू संत अपनी जाने गंवाते रहे है लेकिन ये खबरे कभी भी सेक्युलर मीडिया की सुर्खिया नहीं बनी. ये स्वामी लक्ष्मणानन्द जी की तस्वीर है जिनकी हत्या क्रिस्चियन ताकतो ने कर दी थी.

हिन्दू संत अपनी जाने गंवाते रहे है लेकिन ये खबरे कभी भी सेक्युलर मीडिया की सुर्खिया नहीं बनी. ये स्वामी लक्ष्मणानन्द जी की तस्वीर है जिनकी हत्या क्रिस्चियन ताकतो ने कर दी थी.


References:

IBN Live

The Hindu

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Swami Vivekananda: A Spiritual Powerhouse Who Really Understood The Potential Of Youths!

Author of this post with Swami Nihilatmanandaji, President, Ramakrishna Mission, Allahabad. Absolutely Overwhelmed That I Received His Blessings!

Author of this post with Swami Nihilatmanandaji, President, Ramakrishna Mission, Allahabad. Absolutely Overwhelmed That I Received His Blessings!


(These are excerpts from the speech delivered by Arvind K.Pandey at Jagat Taran Girls Degree College, Allahabad,  on January 12, 2014 in a programme organised by Kritisankalpa Society to celebrate birth anniversary of Swami Vivekananda. Other notable speakers who expressed their views on this occasion included Swami Nikhilatmananda, President, Ramakrsihna Mission, Allahabad; Justice Rajesh Tandon, Chairman, National Human Rights Commission, Uttarakhand;  Justice. Palok Basu (Retd.), Allahabad High Court;  Dr. Milan Mukherjee; Devendra Tiwari and Senior Advocate Ashok Mehta.)
 

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 Today we find that youths are at the receiving end of so many challenging issues.The transition phase has introduced them to complex living patterns, which has left them high and dry. They not only remain the most exploited lot but also remain frustrated and depressed. That’s because pressure to perform is at its peak in materialistic times. They are unable to choose right means of survival. Worse, imposition of outdated patterns of living by the silver hairs has made youths a sorry figure. Against this backdrop, the values shared by Swami Vivekananda seem to be last ray of hope as they infuse within the being supreme confidence and positive feelings.

Swami Vivekananda truly recognized the potential of youths. He always believed that “strong, vigorous, believing young men, sincere to the backbone” can change the face of globe. “A hundred such and the world becomes revolutionized.”  However, when we look at the state of affairs prevalent in their lives, it leaves any thinking soul quite worried and sad. Very recently, police entered inside the campus of Allahabad University and students got beaten black and blue with laathis as if they were hardcore criminals and not innocent students. If you hear about the experiences of these youths, you would be in great pain to hear about their exploitation. Acharya Manu rightly states that silver hairs alone do not constitute wisdom but in Kaliyuga the white hairs have become confirmed sign of knowledge! No wonder they are always in conflict with younger generation. They are more often than not involved in quashing the innovative spirit of youths, leading to dissipation of enthusiasm from the lives of youths.

Swami Vivekananda believed that each soul is a “potentially divine soul” but misguided silver hairs with their outdated notions have turned these younger souls, bubbling with optimism, into a potentially destructive soul. Swami Vivekananda possessed a revolutionary spirit who had dared to ask uncomfortable questions from older lot. He rightly believed that “each generation should be inspired afresh” and “men should not be taught to imitate a personal ideal, however great”. One of the fatal errors committed by older generation is that it tries to impose its views all in name of sharing experience.

Some of the well-made flicks like Three Idiots, Rang De Basanti, Bhaag Milkha Bhaag, and Paan Singh Tomar, to name a few, capture well the conflicts generated by old minds in the lives of youths. It’s evident that optimism and energy found in youths deeply impresses any conscious thinker of Vivekananda’s stature interested in creating new order of things.” My faith is in the younger generation, the modern generation, out of them will come my workers. They will work out the whole problem, like lions.” It’s another thing that in a nation which prefers argumentative tradition-something highly praised by Amartya Sen-the youths get tamed on one pretext or another.

Swami Vivekananda's Thoughts Would Never Lose Their Lustre..

Swami Vivekananda’s Thoughts Would Never Lose Their Lustre..

 

The lives of youths seem to have got trapped in ills of modernity. Or, why else are we seeing advertisements related with prevention of AIDS on National Youth Day? Isn’t this sad reminder of the fact that there has been erosion of values among the youths? Or is this indicative of fact that things have gone out of control since what was once upon a time treated as immoral has gained some sort of acceptance in Indian society? Whatever it is, it indicates crisis of values. We also need to accept that priorities of youths have changed and their role models have also changed. Their role models are the ones which do not inspire them to be do good and be good. They are the ones which encourage them to earn name and fame within short span of time. So what’s the role of a spiritual powerhouse amid this new set of perceptions?

Even if we take into account new changes that have hit the lives of youths, there is still much space left for spirituality. That’s because materialism cannot give them real peace of mind. It cannot quench the thirst which exists  inside our soul. No wonder youths have been hit hard by giant dragon called depression. Let’s also not forget that India is land of discovering inner peace. It’s not the land to multiply external source of happiness. And so likes of Swami Vivekananda would always be influencing our lives. They are the ones who keep us above from the realm of negativism. Youths are depressed because external world has limited means of satiating one’s desires, wherein seekers are more than suppliers! On the other hand, the inner world is infinite in nature and the competition to own this inner world is less. So people in race of inner peace have greater chances to remain happy than the majority which is in the race to conquer external world.

Swami Vivekananda’s views will always remain relevant among youths since they enable the youths to rectify their approach towards life. They rejuvenate our dull spirit, by making us shift attention from the external world to inner world and in the process this great truth gets revealed: “The aim of life is to realize God…He alone is real and everything else is false…Religion is realization.”  And once you attain realization you come to feel every moment that” all power is within you, you can do anything and everything.”

Other notable speakers who expressed their views on this occasion included Swami Nikhilatmananda, President, Ramakrsihna Mission, Allahabad; Justice Rajesh Tandon, Chairman, National Human Rights Commission, Uttarakhand;  Justice. Palok Basu (Retd.), Allahabad High Court;  Dr. Milan Mukherjee; Devendra Tiwari and Senior Advocate Ashok Mehta.

Other notable speakers who expressed their views on this occasion included Swami Nikhilatmananda, President, Ramakrsihna Mission, Allahabad; Justice Rajesh Tandon, Chairman, National Human Rights Commission, Uttarakhand; Justice. Palok Basu (Retd.), Allahabad High Court; Dr. Milan Mukherjee; Devendra Tiwari and Senior Advocate Ashok Mehta.

P.S.: This post also appeared in Northern India Patrika On January 18, 2014.

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Acquittal of Kanchi Seers: A Sad Reminder Of The Fact That Propaganda Is More Powerful Than Truth!

The Acquittal Of Kanchi Seer: Truth has won over propaganda!

The Acquittal Of Kanchi Seer: Truth has won over propaganda!

Any close observer of the happenings in modern India would easily confirm that secular governments have unleashed a sort of war against Hindu saints. They have been framed in number of heinous crimes right from sexual crimes to crimes against national security. The paid media ensures that one-sided coverage gets highlighted not only within Indian landscape but also in International arena. In such matters wherein Hindu saints are involved, a striking feature is that news coverage is full of lies and twisted truths spread by secular press. None of the mainstream media dares to reveal both sides of the story in an impartial way.

One important reason is that most of the Indian media houses are in some way controlled by hidden powers in Western nations. How can we then expect truth to make its presence felt? After all, the mainstream media which harps about involvement of Sadhvi Pragya in blasts never found it important enough to report in same candid fashion about severe violation of rights of prisoners, about inhuman treatment meted out to her inside the jail! The same media is so hyper-sensitive about rights of Devyani who made mockery of India’s honour in West but yet she is being portrayed as if she committed no crime at all! That’s because she is part of the system. But anybody who dared to expose the misdeeds of government was branded as criminal in a well-planned manner!

What I am trying to ascertain that we have given way to era wherein propaganda has become more powerful than version close to truth. One of the most important job of media is to reveal the real picture but exactly opposite has taken place: Media has become carrier of falsehood and distorted versions. It’s main agenda has become to shield dubious powers in rule. Like a prostitute it keep changing its loyalty or, in other words, it generally speaks the language of rulers! Remember the arrest of Kanchi Shankaracharya Swami Jayendra Saraswati in year 2004 in most humiliating manner for allegedly playing a role in murder of Sankararaman, manager of the Sri Varadarajaswamy Temple. The then Chief Minister of Tamil Nadu,J Jayalalithaa, in an attempt to appear more secular than others and to give an impression that no one is above law ensured his arrest! The Kanchi seers were charged with” criminal conspiracy, misleading the court by giving false information, criminal trespass and supply of funds to carry out the criminal activity.”

The Truth Had The Last Laugh!

The Truth Had The Last Laugh!

The head of a 1,000-year-old Brahmin monastic order was presented as petty criminal in mainstream media and even before case was put to trial he was portrayed as accused. Let’s remember that Kanchi Kamakoti Peetham is one of the oldest Hindu mutts in the country and Shankarcharyas belonging to this mutt command a great respect among Hindu communities across the globe. In fact, Swami Jayendra Saraswati is a highly respected figure having profound knowledge of Hindu scriptures. He like his predecessors provided new heights to this mutt established in 9th century by Sri Adi Shankaracharya, enjoying similar status the way Vatican enjoys amid Christians. However, clash of interests between J Jayalalithaa and DMK chief Karunanidhi, who represented anti- Brahminical movments, ensured that this highly revered pontiff got disgraced.

Prominent media analysts of that period conveyed the impression that “police would not have acted unless they had sufficient evidence.” Ironically, the prosecution at that time was supremely confidant about involvement of Kanchi seers in abetting murder of Sankararaman, claiming that it had “incriminating evidence”. The investigating officer Prem Kumar came out with version that made mutt head appear guilty: “We have strong evidence about the involvement of Sri Jayendra Saraswathi in Sankararaman’s murder. There has been animosity between the two for the past four years and further investigation is on to corroborate the evidence collected on the involvement of the Kanchi Acharya.” The allegations had deepened with revelations of  Tamil magazine Nakkeeran. Amid these bizarre turn of events, the case got transferred to Pondicherry to ensure fair trial. To make the matters worse for Kanchi mutt head, even allegations of sexual exploitation surfaced. (The Hindu)

However, the truth had the last laugh when verdict delivered by a special court in Pondicherry acquitted all the accused involved in this sensational murder. The verdict was delivered on November 27, 2013 after nine years of suspense and drama of all sorts. They were acquitted of all the charges which included “criminal conspiracy, misleading the court by giving false information, criminal trespass and supply of funds to carry out the criminal activity.” The main witnesses failed to corroborate the prosecution’s theory. More than 80 witnesses went against the story presented by the prosecution.

Well, it’s true that Kanchi seers got acquitted but in the process it caused irreparable damage to the reputation of an institution, which represented the collective psyche of Hindus. This “collective psyche” of Hindus made its presence felt again the way Kanchi Mutt Head responded to this verdict: ” Dharma has prevailed. Truth has won. That is what matters…I have been trained by my Guru to bear everything. There is no question of situation being tough. Times were challenging because we were facing completely new set of situations. ..There are several invaders who vandalized our temples. Today when you see the disfigured temples you remember the invaders and their acts of vandalism. What was perpetrated on the mutt has been termed as an act of vandalism by several people.” (Kanchi Sathya Org)

Swami Shraddhanand:  Killed By A Muslim Fanatic in 1926.  He Was Part Of The Movement To Reconvert Muslims Back To Hinduism!

Swami Shraddhanand: Killed By A Muslim Fanatic in 1926. He Was Part Of The Movement To Reconvert Muslims Back To Hinduism!

It’s really saddening that moments allegations against Hindu saints surfaces, the whole mainstream media goes berserk and paints them in wrong colours, forgetting that its main task is to report the incident and not to conduct trials. Worse, when the allegations are found false and saints get acquitted the same news item does not get prominence. Acquittal is never important than false stories planted by vested interests. No wonder acquittal of Kanchi’s Shankracharya did not get the same coverage. After all, it strengthens cause of Hindus, which is antithetical to secular spirit of this nation. The mainstream media is more interested in propaganda than emergence of truth.

The secular forces always convey the impression that no one is above law.  And so will they dare to arrest Shahi Imam Syed Ahmad Bukhari against whom so many cases have been registered? Will they dare to bring in open and convict Christian missionaries involved in conversion of tribals in remote corners of India? That will never take place. The law exists only for Hindu saints. It’s an instrument of oppression for Hindus and all that which represents self-pride of Hindus. It’s there to support propaganda and not to sustain truth.

Swamy Lakshmanananda Saraswathi and four of his disciples namely Sadhvi Bhaktimayee, Baba Amritanand, Kishor Baba and Puranjan Ganthi at his Ashram in Jaleshpatta of Kandhamal district in Orissa by a group of Christian zealots on the Janmashtami day, 23 August, 2008.  But the mainstream media made no uproar!

Swamy Lakshmanananda Saraswathi and four of his disciples namely Sadhvi Bhaktimayee, Baba Amritanand, Kishor Baba and Puranjan Ganthi at his Ashram in Jaleshpatta of Kandhamal district in Orissa by a group of Christian zealots on the Janmashtami day, 23 August, 2008. But the mainstream media made no uproar!

References:

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खुर्शीद अनवर की आत्महत्या: समाज, कानून और मीडिया के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा!

गम्भीर मुद्दा ये है कि सतही मीडिया ट्रायल के चलते जिस भीषण मानसिक कष्ट से गुजरना होता है और जो सरेआम अपमान सहन करना पड़ता है क्या उसका कोई अस्तित्व नहीं? क्या इसका कोई मोल नहीं? क्या ये बिलकुल उपेक्षित कर देने वाली बात है?

गम्भीर मुद्दा ये है कि सतही मीडिया ट्रायल के चलते जिस भीषण मानसिक कष्ट से गुजरना होता है और जो सरेआम अपमान सहन करना पड़ता है क्या उसका कोई अस्तित्व नहीं? क्या इसका कोई मोल नहीं? क्या ये बिलकुल उपेक्षित कर देने वाली बात है?


खुर्शीद अनवर की आत्महत्या कई गम्भीर सवाल खड़े कर गयी आज के समाज के बारे में, पत्रकारिता के स्तर के बारे में और कानून के उपयोग और दुरुपयोग के सन्दर्भ में. खुर्शीद अनवर एक प्रसिद्ध सामजिक कार्यकर्ता थें जो नई दिल्ली में इंस्टिट्यूट फॉर सोशल डेमोक्रेसी नाम की संस्था चलाते थें. इसके अलावा वे जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय के छात्र भी थें. खुर्शीद अनवर ने पिछले साल १८ दिसम्बर २०१३ को आत्महत्या कर ली थी जब उनपे एक मणिपुरी औरत ने  अपने साथ दुष्कर्म का आरोप लगाया था. ये खबर कुछ एक समाचार चैनलों पर प्रमुखता से दिखायी गयी और इसके बाद सोशल नेटवर्किंग साईटस पर अंतहीन बहस छिड़ गयी. पहले तो खुर्शीद इस आरोप से हिल गए और इसके बाद मीडिया चैनलो द्वारा कीचड़ उछालने के बाद सदमे से ग्रस्त खुर्शीद ने आत्महत्या कर ली. बाद में उनके पास से बरामद सुसाइड नोट में इस बात का उल्लेख था कि मणिपुरी लड़की के साथ उन्होंने बलात्कार नहीं किया था बल्कि आपसी सहमति से शारीरिक सम्बन्ध बनाये थे.

इस घटना ने मुझे श्रीनिवास सिरास के आत्महत्या की याद दिला दी जो प्रोफेसर थे अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में. इस प्रकरण में न्यूज़ चैनलो नें इस प्रोफेसर के निजता के साथ खिलवाड़ किया था और उनकी गोपनीयता को सरेआम उजागर करके उनके समलैंगिक सम्बन्धो को विकृत स्वरूप दे दिया था. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस प्रकरण में सुनवाई करते हुए प्रोफेसर को थोड़ी राहत प्रदान की थी पर मीडिया चैनलो द्वारा की गयी गुस्ताखी उन पर भारी पड़ गयी और उन्होंने आत्महत्या कर लिया. कोर्ट इस तरह के मीडिया ट्रायल पर अक्सर चेतावनी देती रही है पूर्व में कि न्यूज़ चैनल जब केस ट्रायल स्टेज में हो तो किसी भी निष्कर्ष पर अपनी तरफ से पहुचने की हड़बड़ी ना दिखाए और न्यायालय की कार्यवाही को प्रभावित करने की कोशिश ना करे लेकिन बड़े कॉर्पोरेट संस्थानो द्वारा संचालित ये न्यूज़ चैनल न्यायालय के द्वारा इन पारित आदेश को सिर्फ कागज़ का एक टुकड़ा समझते है और उन्हें किसी प्रकरण में निहित संवेदनशीलता से कुछ नहीं लेना देना होता सिवाय इसके कि उसका माखौल किस तरह उड़ाया जाए. ये सही है मीडिया ट्रायल एक जटिल मुद्दा है लेकिन उससे बड़ा सच ये है कि सनसनीखेज मीडिया ट्रायल के चलते किसी के इज्जत और उसके आत्मसम्मान के साथ जो खिलवाड़ होता है और इससे जो अपूर्णीय क्षति होती है उसकी भरपाई असंभव होती है. मीडिया  किसी दोषी व्यक्ति के अधिकारो के हमेशा अतिक्रमण करती आयी है और समय आ गया है कि सही तथ्यात्मक रिपोर्टिंग और रिपोर्टिंग जो गलत इरादो से की गय़ी हो सिर्फ न्यूज़ चैनल के टी आर पी या फिर अखबार की बिक्री बढ़ाने के उद्देश्य से की गयी हो दोनों में एक स्पष्ट रेखा का निर्धारण हो.

“सनसनीखेज रिपोर्टिंग तो हमेशा होगी क्योकि सनसनीखेज घटनाये भारत में हमेशा रहती है. सुप्रीम कोर्ट इस पर लगाम लगाने में असमर्थ है. ये सही है कि रिपोर्टिंग सही होनी चाहिए पर इसका ये मतलब निकालना कि ये मीडिया के द्वारा ट्रायल है एक निन्दात्मक अभिव्यक्ति है. कोर्ट या किसी के पास कोई स्पष्ट मापदंड नहीं है जो ये निर्धारित कर सके कि मीडिया ट्रायल क्या होता है.” (सीनियर अधिवक्ता राजीव धवन, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया). खैर इस बात से इंकार करना असम्भव है कि मीडिया के द्वारा किसी भी दोषी व्यक्ति के अधिकारो का हनन और किसी के भी निजता के साथ खिलवाड़ करने के कृत्य का अपने तरफ से दूषित स्पष्टीकरण कोई भी मतलब नहीं रखता। ये सिर्फ एक व्यर्थ का  प्रलाप होता है, बेवजह अपने को सही ठहराना होता है. उसकी स्पष्टीकरण से उस अपूर्णीय क्षति की भरपाई असम्भव है जो इस वजह से होती है. इन दोनों प्रकरणो में दो व्यक्ति ने अपनी जान ले ली इस वजह से और अब हम ये कभी नहीं जान पाएंगे कि सच्चाई क्या थी. क्या ये दो जाने वापस मिल जाएंगी? क्या खोया सम्मान वापस मिलेगा? शायद कभी नहीं।

वरिष्ठ पत्रकार सईद नक़वी शायद सच के ज्यादा करीब है जब ये कहते है कि “पत्रकारिता में शायद निष्कर्षो पर पहुचने की हड़बड़ी है. ये उसी दिन किसी को मुजरिम ठहरा देता है जिस दिन किसी पे आरोप लगते है, इसके पहले कि कोर्ट किसी बात का निर्धारण करे. ये बहुत दुखी कर देने वाली बात है. कैसे मीडिया इतनी जल्दीबाज़ी में किसी निष्कर्ष पर पहुच सकती है और किसी को इतनी हड़बड़ी में दोषी करार दे सकती है? मीडिया को इस बात का इन्तजार करना चाहिए कि कम से कम प्राथमिक रिपोर्ट तो दर्ज हो, कम से कम जांच तो पूरी हो जाए” (डी एन ए न्यूज़ रिपोर्ट) ये बिलकुल चकित कर देने वाली बात है कि मीडिया कभी भी इस तरह के सनसनीखेज मीडिया ट्रायल के दौरान अपूर्णीय क्षति और इनके अंजामो के बारे में कभी भी ईमानदारी से आकलन नहीं करती. गम्भीर मुद्दा ये है कि सतही मीडिया ट्रायल के चलते जिस भीषण मानसिक कष्ट से गुजरना होता है और जो सरेआम अपमान सहन करना पड़ता है क्या उसका कोई अस्तित्व नहीं? क्या इसका कोई मोल नहीं? क्या ये बिलकुल उपेक्षित कर देने वाली बात है? ये बिलकुल स्पष्ट है कि मीडिया ट्रायल अधिकतर एकतरफा, भ्रामक और तथ्यो के साथ खिलवाड़ होता है जिसमे इस बात की बिलकुल परवाह नहीं की जाती कि कम से कम तथ्यो के असलियत का तो निर्धारण कर लिया जाए सूक्ष्मता से.

इस पूरे प्रकरण में दो बहुत गम्भीर पहलू शामिल है. पहला तो ये कि ये समाज के इस विकृत बदलाव को दर्शाता है कि समाज में हड़बड़ी में निष्कर्षो पर पहुचने की लत लग गयी है अधकचरे दिमाग के साथ. इसे चाहे वो प्रशंसा  हो या फिर आलोचना दोनों को बिना किसी आधार के आत्मसात करने की आदत सी हो गयी है. ना आलोचना का स्तर विकसित हो पाया और ना ही प्रशंसा के आयाम निर्धारित हो पाये. आलोचना अगर हो रही है तो तो वो भी तब जब कि कोई भी तथ्यात्मक या तार्किक आधार आलोचना के पक्ष में मौजूद नहीं है. दूसरा पक्ष ये है कि जिन कानूनो को स्त्री की अस्मिता की रक्षा करने के लिए बनाया गया है वे अब निर्दोष लोगो को प्रताड़ित करने का अस्त्र बन गए है. ये कितने तकलीफ की बात है कि जहा किसी स्त्री के सेक्सुअल हरस्मेंट का मामला उभरता है वही पे समाज का एकपक्षीय भेदभाव ग्रस्त दिमाग उभर कर सामने आ जाता है और मीडिया हमेशा की तरह दोषी के ऊपर हर तरह का लांछन जड़ देता है और इसके पहले वो अपने बेगुनाही को साबित करे वो मुजरिम साबित करार कर दिया जाता है. ये सर्वविदित है कि जो नए कानून की परिभाषा है सेक्सुअल हरस्मेंट को रोकने कि उसके प्रावधान इस तरह के है कि आप तकरीबन मुजरिम ही है और इस बात को गौण कर दिया गया है कि आप के पास भी बचाव के सही रास्ते होने चाहिए. और सबसे घातक ये है कि एकतरफा मीडिया ट्रायल शुरू हो जाने के बाद जो उसके पास अपने को बचाने के जो रास्ते होते है वे भी बंद हो जाते है क्योकि मीडिया आपके विपक्ष में माहौल खड़ा कर देता है हर तरफ.

“भारत में और अन्य देशो में जहा इस तरह के कानून पास हुए है औरतो के साथ होने वाले अपराधो को रोकने के लिए उसमे बर्डेन ऑफ़ प्रूफ को सुनियोजित तरीके से बदल दिया गया है. अब दोषी के ऊपर ये जिम्मा है कि वे अपनी निर्दोषता साबित करे. ये परिवर्तन निहित रूप से बहुत गलत है पर शायद ये इसलिए किया गया है कि ताकि इन प्रकार के अपराधो में स्त्री के पास सामान स्तर के अवसर हो अपने साथ हुए अन्याय के भरपाई के लिए. लेकिन जो अब नए कानून बने है सेक्सुअल हरस्मेंट रोकने के लिए उसमे ये बर्डन ऑफ़ प्रूफ इस सख्त स्वरूप में है कि जहा दोषी (पुरुष) के पास बचाव के सारे रास्ते बंद हो जाते है. अगर एक बार आप पर आरोप लगे तो इस बात की सम्भावना कम है कि आप अपने को निर्दोष साबित कर सके या आपको बेहद मशक्कत के बाद ही कोई रास्ता दिखायी पड़े. ये शायद नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत के विपरीत है.” (वरिष्ठ पत्रकार प्रेम शंकर झा, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया)

संक्षेप में समाज और मीडिया दोनों का स्तर रसातल में चला गया है क्योकि ये दोनों भावनाओ के प्रवाह में बहने के आदी हो गए है और इन दोनों को तथ्यो और तार्किक सोच से कुछ लेना देना नहीं रह गया है. दोनों को इस विकृत खेल में रस आने लगा है जहा किसी निर्दोष के भावनाओ के साथ खिलवाड़ होता है, उसके आत्मसम्मान के जब टुकड़े टुकड़े किये जाते है. लेकिन खेद कि बात ये है कि न्याय परंपरा/व्यवस्था भी इसी विकृत रस का शिकार हो गयी है, इन्ही घातक प्रवित्तियों का शिकार सा हो गयी है, खासकर उन मामलो में जहा स्त्रियों से जुड़े अपराधो के निष्पक्ष अवलोकन की बात आती है. खैर सब की जिम्मेदारी बनती है कि  भावनात्मक प्रवाह में बह कर लिए गए निर्णयो के बजाय सोच समझकर तार्किक रूप से लिए गए निर्णयो को प्राथमिकता दी जाए. ये बहुत आवश्यक हो गया है समाज के बिखराव को रोकने के लिए, एक मूल्य आधारित समाज के निर्माण के लिए.

पाठक इस लेख का अंग्रेजी संस्करण यहाँ पढ़े:

Rape Allegation That Led To Suicide of Kurshid Anwar: A Resounding Slap On The Face Of Media!

खुर्शीद अनवर की आत्महत्या: समाज, कानून और मीडिया के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा

खुर्शीद अनवर की आत्महत्या: समाज, कानून और मीडिया के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा

References:

Activist Khurshid Anwar’s suicide: Was media trial responsible?

AMU’s ‘gay’ prof commits suicide

Guilty If Charged

Dainik Bhasker

 

पिक्स क्रेडिट:

तस्वीर प्रथम 

तस्वीर दो

Rape Allegation That Led To Suicide of Kurshid Anwar: A Resounding Slap On The Face Of Media!

 

Can Deaths Caused By Vain Media Trials Be Reversed?

Can Deaths Caused By Vain Media Trials Be Reversed?

 (Also Appeared in Northern India Patrika On January 07, 2014)

The suicide by a prominent social activist Khursid Anwar, executive director of NGO Institute for Social Democracy and also a JNU scholar, has given rise to some pretty disturbing questions. Khurshid Anwar allegedly committed suicide in the aftermath of rape allegation by a Manipuri lady. This news got flashed on several news channels, followed by intense discussion on several social media networking websites including Facebook. Unable to bear this unwarranted media trial, this well known social activist committed suicide by jumping from his third floor residence in Vasant Kunj, New Delhi, on December 18, 2013. As per suicide note found at his home it was not a rape but consensual sex.

This tragic incident reminds me of suicide committed by Sriniwas Siras, who happened to be a professor at Aligarh Muslim University. In this particular case, news channels were found guilty of invading his privacy by making public his homosexual affair in blown out of proportion way. The professor was granted relief by the Allahabad High Court, but he was not able to cope up with harassment in the form of bizarre media coverage. That made him to end his life. Of late, courts have regularly come up with strict reminders for media channels not to indulge in media trials when the case is in its trial phase. However, influential media houses have always adopted care-a-damn, leading to mockery of the sensitivity involved in any issue under trial. It’s true that need to control media trial remains a complicated issue but it’s an undisputed fact that there is no dearth of cases, wherein sensational media trial caused irreparable damage to one’s reputation. The media has always taken for granted “rights of the accused” and it’s high time to make clear demarcation between accurate reporting and reporting done with malicious intent to increase the sale or ensure high TRP ratings.

“Sensational reporting will take place because sensational incidents keep happening in India. The Supreme Court will not be able to stop it. Yes, reporting must be accurate. But to say it amounted to trial by media is only a pejorative expression. Neither the court nor any one has provided parameters to define what constitutes trial by media.” (Senior Advocate Rajeev Dhavan in The Times of India) However, media’s pervert justification of its breach of privacy and rights of accused would never be enough to clear the huge mess caused by its unwanted intervention. Two lives of reputed individuals came to meet untimely end because of media trial. Can it bring them back to life? Can it restore the loss of reputation?

 In fact, senior journalist Saeed Naqvi  has framed a perfect perspective regarding media trail: ” There is a tendency in journalism – it convicts a person on the day allegation is leveled against him, even before the court convicts him. That is sad. How can media reach a conclusion so quickly and start showing one as an accused? At least, it should wait for lodging of an FIR, completion of investigation” (DNA News Report) It’s really amazing that media always never takes into account serious repercussions involved in unfair trial. Is “mental trauma and public humiliation” in the wake of seriously flawed  “media trial” is thing of lesser concern? It’s so evident in media trials that reporting is misleading and one-sided with scant respect for cross-checking of the facts.

 This whole issue involves two other serious concerns. The first one brings to the fore love of the society to reach at conclusions in one go with a prejudiced mindset. It loves to criticize or, for that matter, endorse any issue even if there are no concrete material evidence to support its beliefs. The other aspect involves abuse of laws meant to protect sexual harassment of women. It’s simply not an issue pertaining to rights of men that laws meant to protect women have lead to harassment of innocent men. It’s so pathetic that moment an issue  involving sexual harassment of women gets highlighted, the media enters in caricature of the accused, portraying him guilty. Worse, if you analyze the laws meant to prevent sexual harassment of women, it’s evident that men are virtually assumed to be guilty. Tragically, the attempt of the accused to prove himself innocent becomes further bleak in wake of such pervert media trials.

 “The disconcerting answer is that it will not matter. In India, and several other countries where laws have been passed to punish crimes against women, the burden of proof has been consciously reversed: it is the accused who has to prove his innocence. This reversal is bad in principle, but probably necessary to create a level playing field for women in cases pertaining to sex crimes. But the new rape law has carried the reversal to a point where, if implemented as drafted, it will defeat the very purpose of justice . For once a man is accused, it leaves him with no way whatever of proving his innocence.” (Senior Journalist Prem Shankar Jha in The Times Of India)
 
In nutshell, both society and media have lost the ability to be governed by reason and logic. Both of them have given way to pervert pleasure of playing havoc with the dignity and reputation of individuals. However, it’s baffling that even legal jurisprudence appears to have adopted same line of action, more so in cases involving sexual harassment of women. It’s time for everybody to upheld logical thinking over thinking governed by rash emotions. That’s essential to stop the fragmentation of society, to create a value-oriented society.

Khurshid Anwar: Another Victim Of Media Trial!!

Khurshid Anwar: Another Victim Of Media Trial!!

 
Pics Credit:
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