Monthly Archives: July, 2013

The Tragic Transformation Of Public Service Commission Into Yadav Service Commission!

Students Allege That Uttar Pradesh Public Service Commission Has Turned Into Yadav Selection Commission!

Students Alleged That Uttar Pradesh Public Service Commission Has Turned Into Yadav Selection Commission!


Uttar Pradesh Public Service Commission is a constitutional body, which has been assigned the task to make selections in various governments department at a State level. One expects it to discharge its duties in impartial and sound manner. However, of late, this prestigious constitutional body has become like a caged pigeon in the hands of its incompetent officials, who are acting at the behest of political masters. The latest reservation policy row provides insight into the mindset of officers working at this prestigious office. The implementation of caste-based quotas at the preliminary level of many important examinations, mainly to benefit certain “caste”, without worrying about the collateral damage caused by it is an ominous sign. It’s supposed to act in neutral manner so as to ensure that the selections take place in a fair way. However, the new mantra for it seems to be that “foul is fair”. The appeasement of political masters is more important than selection of meritorious candidates through right process.

This government agency some decades back enjoyed a good reputation of conducting examinations, and later, making final selections in honest way. It had such an impressive track record that many other government agencies sought its help in making proper selections in their own departments, granting it the authority to conduct examinations. However, the scenario inside the office has changed dramatically in last few years, especially in the regimes of Bahujan Samjwadi Party and Samajwadi Party- the political parties which were in control of Uttar Pradesh in last few years. Their casteist approach demolished the reputation of this prestigious body. In their regimes, the key positions went to officers who played havoc with the selection process.

The students who ensured that controversial reservation policy gets scrapped are absolutely right in demanding that a high level inquiry committee should be formed to take note of the irregularities made in selections during last few years. The students need to be appreciated for their act of seeking relevant information in this regard under Right to Information Act. At present two officers from Yadav community are holding key positions in this office. Isn’t it highly shameful that students now treat Uttar Pradesh Public Service Commission as ” Yadav Selection Commission”? Most of the bright students after completing the graduation go in for examinations conducted by Public Service Commission since selections to most of the the key administrative posts are made by it. Don’t these corrupt officials realize that by making selections in such arbitrary manner they are causing irreparable damage?  First, they are destroying the future of genuine applicants, and second,  they are paving way for incompetent people to act as government servants in future. What sort of decisions such government officials would make who got selected through such flawed process?

The reservation was introduced by makers of the Constitution for a specific period to enable marginalized castes attain a dignified position in the society. The sentiments of people, who introduced reservation, were really aimed at the welfare of weaker sections of society. However, that’s not the case now. It’s the most effective tool to destabilize societal structure. It’s the instrument to remain in power. It’s a weapon in the hands of dirty political minds to ensure that they remain relevant in political landscape. It’s high time courts and conscious citizens teach fitting lesson to corrupt political leaders and bureaucrats, who are demolishing the image of constitutional bodies.

Reservation should not be a tool to kill the future of bright students!

Reservation should not be a tool to kill the future of bright students!

प्रस्तावित तलाक कानून: पुरुषो की बर्बादी और हिन्दू घरो की तबाही का औजार है!

 

Flawed Amendments In Hindu Marriage Laws Are Destroying Hindu Families!

Flawed Amendments In Hindu Marriage Laws Are Destroying Hindu Families!


हिन्दू विवाह अधिनियम को संशोधित करने में कांग्रेस सरकार जो अति सक्रियता दिखा रही है वो परेशानी और अचम्भे में डालती है. इस सरकार का कार्यकाल एक साल के भीतर ही ख़त्म होने वाला है लिहाज़ा ये अति सक्रियता आत्मघाती है. सम्पति के बटवारे के बारे में इसकी टेढ़ी चाल भारतीय परिवारों के विघटन का कारण बन सकती है. प्रस्तावित क़ानून में बटवारे वाले सेक्शन को लेकर जो उहापोह वाली स्थिति उत्पन्न हो गयी है सरकार के भीतर उससे स्पष्ट है कि इस सरकार के मंत्री खुद भ्रम के स्थिति में है और इस कानून में निहित संपत्ति बंटवारे और मुआवजे से सम्बंधित बिन्दुओ पर वो एकमत रूख नहीं रखते है. हिंदू विवाह अधिनियम’ की धारा 13-बी और ‘विशेष विवाह अधिनियम’ की धारा 28 आपसी सहमति से तलाक के अंतर्गत संपत्ति बंटवारे/ मुआवज़े पर जो सरकार के भीतर अन्तर्विरोध उभर कर आये है उससे ये समझ में आता है कि इस कानून के मूल तत्वों के बारे में सरकार में शामिल मंत्रियो से लेकर अन्य पार्टी के सांसदों को ज्यादा कुछ नहीं पता है . इससे ये सहज ही समझा जा सकता है कि जनता जिसका वो प्रतिनिधित्व करते है उनमे कितना भ्रम व्याप्त होगा। फिर भी ये सरकार इस संशोधन को इतनी जल्दबाजी में कानूनी जामा पहनाना चाहती है ये हैरान करता है.

ये बताना आवश्यक रहेगा कि सरकार ने संशोधन को पास कराने की हड़बड़ी में लॉ कमिशन और संसदीय स्थायी समिति को पूरी प्रक्रिया से बाहर रखा है. इसके खतरनाक दुष्परिणाम होंगे और इस तरह के कानूनों से भारत के युवक-युवतियों का भविष्य अँधेरे के गर्त में जा सकता है. ये निश्चित है कि अगर ये बिल अपने प्रस्तावित स्वरूप में पास हो गया तो ये एक और उदाहरण होगा गैर जिम्मेदाराना तरीके से प्रक्रियागत खामियों से लैस कानून को अस्तित्व में लाने का। पुरुषो एक अधिकारों का प्रतिनिधित्व करने वाली अग्रणी संस्था सेव इंडिया फॅमिली फाउंडेशन (SIFF) ने इस हिंदी विवाह अधिनियम (संशोधन) बिल, २०१०, को अपने वर्तमान स्वरुप में पारित कराने की कोशिशो की तीखी आलोचना करते हुए इस खतरनाक संशोधन को पूरी तरीके से नकार दिया है.

सेव इंडिया फॅमिली फाउंडेशन (SIFF) का ये भी कहना है कि न्यायधीशो को इस कानून के तहत असीमित अधिकार देना किसी तरह से भी जायज नहीं है खासकर महिलाओ से संबधित प्रतिमाह गुज़ारा भत्ता /मुआवज़े के निर्धारण में.

क्या कहता है ये कानून:

विवाह अधिनियम (संशोधन) विधेयक 2010’ “असुधार्य विवाह भंग’ को हिंदू विवाह अधिनियम 1955 और विशेष विवाह अधिनियम 1954 के तहत तलाक मंजूर करने के एक आधार के रूप में स्वीकार करता है. इसके साथ ही तलाक के मामले में अदालत पति की पैतृक संपत्ति से महिला के लिए पर्याप्त मुआवजा तय कर सकती है. विधेयक में पति द्वारा अर्जित की गई संपत्ति में से पत्नी को हिस्सा देने का प्रावधान है.

कुछ आवश्यक बिंदु:

इस कानून को महिलाओ के पक्ष में बताना खतरनाक है क्योकि भारत में सत्तर प्रतिशत परिवार गरीब वर्ग में है जो ज्यादातर क़र्ज़ में डूबे है और जिनके पास संपत्ति नाम की कोई चीज़ नहीं है, जिनके ऊपर पहले से ही बेटी बेटो के भरण पोषण और उनके शादी ब्याह जैसी जिम्मेदारियां है. ये कानून केवल एक ख़ास वर्ग में सिमटी सम्पन्न महिलाओ को ध्यान में रखकर अस्तित्व में आया है लिहाज़ा मुख्य धारा के राजनैतिक दलों को इसके विरोध में खड़े होकर इसके खिलाफ वोटिंग करनी चाहिए। ऐसा इसलिए कि इस कानून के पारित होने के बाद तलाक के प्रतिशत में अगले दस सालो में लभग तीस प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी हो सकती है.

प्रस्तावित हिन्दू विवाह संशोधन को सम्पूर्णता में देखे जाने की जरूरत है जैसे कि संयुक्त रूप से बच्चो का पालकत्व या बच्चों की जिम्मेदारियों के वित्तीय वहन से सम्बंधित कानून की इसमें क्या भूमिका रहेगी. सिर्फ मासिक भत्ते के निर्धारण में सक्रियता दिखाना उचित नहीं। क्या पति ताउम्र भत्ता गुज़ारा देता रहेगा संपत्ति बंटवारे के बाद भी जिसका हिस्सा खुद की संपत्ति और विरासत में मिली संपत्ति से मिलकर बनता है? ये कुछ अति महत्त्वपूर्ण बिंदु है जिनको संज्ञान में लेना आवश्यक है और इन्हें उनके बीच चर्चा में शामिल करना है जो इन कानूनों से प्रभावित हो रहे है. अव्यवस्थित रूप से निर्धारित बिन्दुओ को कानून बना के पास करना बेहद गलत है.

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 सेव इंडिया फॅमिली फाउंडेशन (SIFF) का सरकार को निम्नलिखित सुझाव:

सरकार इस कानून को तुरंत वापस लें और मौजूदा संसदीय अधिवेशन में इसे ना पेश करे. सरकार इस कानून की भाषा में परिवतन करे और इस लिंग आधारित भेदों से ऊपर करे जिसमे पति (husband) और पत्नी (wife) को ” जीवनसाथी” ( spouse) और स्त्री (man) और पुरुष (woman) को ” व्यक्ति” (person) में परिवर्तित किया जाए. इसके साथ ही किसी भी जीवनसाथी को तलाक़ अर्जी का विरोध करने की छूट हो कानून की समानता के रौशनी में. सरकार इस बात का भी निर्धारण करे कि अर्जित संपत्ति के निर्माण में पत्नी का क्या सहयोग रहा है या पति के परिवार के भौतिक सम्पदा के विस्तार में क्या योगदान है. इसको निर्धारित करने का सूत्र विकसित किया जाए. इसके निर्धारण में शादी के अवधि को ध्यान में रखा जाए, बच्चो की संख्या का ध्यान रखा जाए, और क्या स्त्री कामकाजी है या घरेलु. अगर स्त्री तीन बच्चो की माता है, वृद्ध सदस्यों की देखरेख का जिम्मा ले रखा है, तो उसका योगदान अधिक है बजाय उस स्त्री के जो कामकाजी है और जिसके कोई बच्चे नहीं है एक साल की अवधि में.

इस सूत्र के मुताबिक ही किसी व्यवस्था को संचालित किया जाए जीवनसाथी को प्रतिमाह भत्ते के सन्दर्भ में, मुआवज़े के सन्दर्भ में या किसी और समझौते के सन्दर्भ में. न्यायधीश महोदय इस सूत्र की रौशनी में अपने विवेक का इस्तेमाल कर उचित फैसले लें. लिहाज़ा इस सूत्र के अंतर्गत अगर स्त्री के सहयोग का अनुपात पति या उसके परिवार के संपत्ति के अर्जन में पूरी संपत्ति के मूल्य से अधिक है तो उसे पूरी संपत्ति पर हक दिया जा सकता है. अगर पत्नी इसको लेने से इनकार कर सकती है तो वो मासिक गुज़ारे भत्ते वाले विकल्प को अपना सकती है. कहने का तात्पर्य ये है कि संपत्ति में हिस्सेदारी के बाद उसका मासिक गुज़ारे भत्ते को लेते रहने का अधिकार ख़त्म हो जाता है. दोनों विकल्पों का लाभ लेने का हक जीवनसाथी को नहीं मिलना चहिये.

सरकार को इस सूत्र को अस्तित्व में लाने के लिए एक कमेटी या योजना आयोग का गठन करना चाहिए.

सरकार को सयुंक्त भरण पोषण का अधिकार बच्चे के बायोलॉजिकल अभिभावक द्वारा और बच्चे के ग्रैंड पेरेंट्स से स्थायी संपर्क को अनिवार्य कर दिया जाए, जब तक कि कोर्ट इसके विपरीत राय ना रखती हो. इसके अनुपालन के अभाव को आपराधिक जुर्म के श्रेणी में रखा जाए। अगर कोई अभिभावक इस सयुंक्त  के जिम्मेदारी से मुंह मोड़ रहा है या ग्रैंड पेरेंट्स से संपर्क में बाधा डाल रहा है तो इसको अपराध माना जाए.

सरकार ये सुनिश्चित करे कि न्यायालय को अपने विवेक के अधिकार का इस्तेमाल करने की सीमित आज़ादी हो संपत्ति बटवारे के निर्धारण में, मासिक गुज़ारे भत्ते के सन्दर्भ में और बच्चे के पालन पोषण सम्बन्धी मामलो में. बहुत ज्यादा अधिकार न्यायालय को देने का मतलब ये होगा कि कोर्ट का अवांछित हस्तक्षेप मामले को और जटिल बना देगा या कोर्ट का गैर जिम्मेदाराना रूख स्थिति को और विकृत कर देगा। अधिकतर पुरुष फॅमिली कोर्ट पे भरोसा नहीं करते, क्योकि इस तरह की कोर्ट पुरुषो के अधिकार के प्रति असंवेदनशील रही है. न्यायालय वर्षो लगा देती है पति को अपने बच्चो से मिलने का फैसला देने में और तब तक बच्चे की स्मृति पिता के सन्दर्भ में धूमिल पड़ जाती है.

सरकार ये सुनिश्चित करे कि महिला पैतृक संपत्ति और वहा अर्जित संपत्ति में जो हिस्सेदारी बनती हो उसे अधिग्रहित करे. उसे अपने कब्जे में लें. सरकार को हिन्दू विवाह अधिनियम में संशोधन करके महिला को अपने पिता के घर में रहने का स्थान सुनिश्चित करे , ताकि कम अवधि वाली शादी में अलगाव की सूरत में उसे रहने की जगह उपलब्ध हो. अगर माता पिता इस सूरत में उसे पति के घर जाने के लिये विवश करते है तो इसे अपराध की श्रेणी में रखा जाए. इसी प्रकार अगर महिला के माता पिता या महिला के भाई उसे पैतृक संपत्ति/ अर्जित संपत्ति में हिस्सा देने से इनकार करते है तो इसे असंज्ञेय प्रकार का अपराध माना जाए.

उन्होंने कहा कि अगर पति-पत्नी में से कोई भी एक व्यक्ति अगर संयुक्त आवेदन देने से इनकार करता है, तो दूसरे को आपसी सहमति के बजाय अन्य आधार पर तलाक के लिए आवेदन देने की अनुमति दी जानी चाहिए.

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इस देश में कानून बना देने ही को सब समस्यायों का हल मान लिया गया है. और इस तरह के दिशाविहीन कानून जो प्रक्रियागत कमियों से लैस है उनका अस्तित्व में आना तो और भी खतरनाक है. वो इसलिए कि न्यायालय हमारे यहाँ किन दुराग्रहो से अधीन होकर काम करते है वो सब को पता है. एक तो सिस्टम गलत तरीके से काम करता है और दूसरा न्याय के रास्ते में इतने दुराग्रह मौजूद है कि सिर्फ लिखित कानून बना देने से सही न्याय मिल जाएगा ये सिर्फ एक विभ्रम है. इस तरह के पक्षपाती कानून सिर्फ भारतीय परिवार का विनाश ही करेंगे जैसा कि  दहेज कानून के दुरुपयोग से हुआ है. सिर्फ मंशा का सही होना ही  काफी नहीं बल्कि आप किस तरह से उनका सही अनुपालन करते है ये आवश्यक है. ये तो सब थानों में बड़े बड़े अक्षरों में लिखा रहता है कि गिरफ्तार व्यक्ति के क्या अधिकार है पर क्या थानेदार साहब इन सब बातो की परवाह करके कभी थाने में काम करते है? नहीं ना!  यही वजह है कि इस तरह के अपूर्ण कानून न्याय का रास्ता नहीं वरन तबाही का मार्ग खोलते है. हिन्दू विवाह अधिनियम में इस लापरवाही से संशोधन करके पहले से इन कानूनों से त्रस्त हिन्दू परिवारों पर एक और घातक प्रहार ना करे.

( प्रस्तुत लेख सेव इंडिया फॅमिली फाउंडेशन के नागपुर शाखा के अध्यक्ष श्री राजेश वखारिया से बातचीत पर आधारित है) 

Flawed Marriage Laws Are Supporting Abusive Wives!

Flawed Marriage Laws Are Supporting Abusive Wives!

References:

विवाह कानून (संशोधन) विधेयक

आसान तलाक के लिए ‘हिंदू विवाह अधिनियम’ में बदलाव

‘दाम्पत्य जीवन की विफलता में तलाक मिले’


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कवि और कविताये: समय से परे होकर भी यथार्थ में नए आयाम जोड़ जाते है!

अदम गोंडवी: सही मायनों में जनकवि

अदम गोंडवी: सही मायनों में जनकवि

कविताओ में बहुत ताकत होती है विचारो के प्रवाह को मोड़ने की, उनको एक नया रूख देने की। ये अलग बात है कि कवि और कविताओ की आज के भौतिकप्रधान समाज में कोई ख़ास अहमियत नहीं, इनकी कोई ख़ास “प्रैक्टिकल” उपयोगिता नहीं। लेकिन उससे भी बड़ा सच ये है कि कविताओ की प्रासंगिकता सदा ही जवान रहेंगी। कवियों को समाज नकार दे लेकिन उनके अस्तित्व की सार्थकता को नकारना समाज के बूते के बस की बात नहीं। उसकी एक बड़ी वजह ये है कि कवि और कविताएं इस क्षणभंगुर संसार और पारलौकिक सत्ता के बीच एक सेतु का काम करते है। ये समाज के विषमताओ के बीच छुपे उन जीवनमयी तत्वो को खोज निकालते जो सामान्य आँखों में कभी नहीं उभरती। इसी वजह से कम से कम मुझे तो बहुत तकलीफ होती है जब कविताओ और कवियों को समाज हेय दृष्टि से देखता है या उपयोगितावादी दृष्टिकोण से इन्हें किसी काम का नहीं मानता। खैर इसे कुदरत का न्याय कहिये कि उपेक्षा की मौत मरने वाले कवि और लेखक भले असमय ही इस संसार को छोड़ कर चले जाते हो उनके शब्द अमर होकर धरा पे रह जाते है। उनके शब्द समय के प्रवाह को मोड़कर नया रास्ता बनाते रहते है। मोटरगाडी में सफ़र करने वाले तो गुमनाम हो जाते है लेकिन जीवन भर गुमनामी और उपेक्षा सहने वाले कवि/लेखक अमर हो जाते है। उनकी आभा धरा पे हमेशा के लिए व्याप्त हो जाती है।

आइये कुछ ऐसी ही कविताओ को पढ़ते है जो गुज़रे वक्त के दस्तावेज सरीखे है।

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अदम गोंडवी की ये कविता मजदूरों के अहमियत को पाठक के मष्तिष्क पटल पर वास्तविक रूप से उकेरती है । उनके यथार्थ को यथावत आपके सामने रख देती है। २२ अक्टूबर १९४७ को गोंडा जिले के आटा गाँव में जन्मे इस क्रन्तिकारी कवि ने समय के पटल पर कुछ ऐसी रचनाये रची जो संवेदनशील ह्रदय में सकारात्मक वेदना को जन्म दे देती है। वैसे इस कविता में देश में व्याप्त दुर्दशा का भी चित्रण है लेकिन प्राम्भिक पंक्तिया मजदूर पर आधारित है जिसको पढ़कर मुझे रामधारी सिंह “दिनकर” जी की ये पंक्तिया स्मरण हो आई:

‘‘मैं मजदूर हूँ मुझे देवों की बस्ती से क्या!, अगणित बार धरा पर मैंने स्वर्ग बनाये,
अम्बर पर जितने तारे उतने वर्षों से, मेरे पुरखों ने धरती का रूप सवारा’’

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वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है
उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है

इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है

कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है

रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है

 -अदम गोंडवी

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बशीर बद्र ने वैसे तो जीवन के कई रंगों का जिक्र किया लेकिन रूमानियत के रंग में डूबी इनकी ग़ज़लों को जगजीत सिंह ने स्वर देकर एक नयी ऊंचाई दे दी।ये ग़ज़ल मैंने पहल पहल जगजीत सिंह की आवाज़ में सुनी जिसे बहुत ही सधे स्वर में जगजीत जी ने गाया है। और अब पढने के बाद बहुत भीतर तक उतर गयी बशीर साहब की ये ग़ज़ल।

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सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा
इतना मत चाहो उसे, वो बेवफ़ा हो जाएगा

हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे, रास्ता हो जाएगा

कितनी सच्चाई से मुझ से ज़िन्दगी ने कह दिया
तू नहीं मेरा, तो कोई दूसरा हो जाएगा

मैं ख़ुदा का नाम लेकर पी रहा हूँ दोस्तो
ज़हर भी इसमें अगर होगा, दवा हो जाएगा

सब उसी के हैं हवा, ख़ुश्बू, ज़मीनो-आसमाँ
मैं जहाँ भी जाऊँगा, उसको पता हो जाएगा

बशीर बद्र

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रमाकांत दूबे जी का नाम शायद लोगो ने कम सुना हो लेकिन इनके द्वारा ग्रामीण लोक में बसी आत्मा में रची ये कविताये कही भी पढ़ी जाई अपना असर दिखा जाती है। ३० अक्टूबर १९१७ को जन्मे इस कवि ने अपनी जड़ो का कभी नहीं छोड़ा और आज़ादी से पहले और आज़ादी के बहुत बाद तक जो भी समय ने दिखाया उसे वैसा ही शब्दों में रच डाला। यकीन मानिए इन पंक्तियों को २०१३ में पढ़ते हुए ऐसा कभी नहीं लगा कि इनको चालीस साल पहले रचा गया होगा। इसकी प्रासंगिकता की अमरता पर हैरानी सी हो रही है। यूँ आभास हो रहा है किसी ने चालीस साल पहले ही २०१३ में क्या व्याप्त होगा ये देख लिया था। इसीलिए तो  मुझे  ये कहने में कोई संकोच नहीं कि कवि संसार में रहते हुएं भी संसारी ना होकर समय से परे रहने वाला एक विलक्षण जीव होता है।

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खाके किरिया समाजवाद के खानदानी हुकूमत चले
जैसे मस्ती में हाथी सामंती निरंकुश झूमत चले
खाके गोली गिरल परजातंतर कि मुसकिल इलाज़ हो गइल
चढ़के छाती पे केहू राजरानी, त केहू जुवराज हो गइल

– रमाकांत दूबे

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अदम गोंडवी: जो उलझ कर रह गयी है फाइलों के जाल में गाँव तक वह रौशनी आएगी कितने साल में

अदम गोंडवी: जो उलझ कर रह गयी है फाइलों के जाल में गाँव तक वह रौशनी आएगी कितने साल में!


कुछ अच्छी कवितायेँ आप यहाँ पढ़ सकते है: कविता कोष 

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गुजरात के दंगो का सच: वो बाते जो सेक्युलर मीडिया नहीं बताता है या तोड़ मरोड़कर कर पेश करता है!

क्यों सेक्युलर मीडिया इस आदमी की तस्वीर का गलत इस्तेमाल करके इसका जीवन नर्क सामान बना दे रहे है?

क्यों सेक्युलर मीडिया इस आदमी की तस्वीर का गलत इस्तेमाल करके इसका जीवन नर्क सामान बना दे रहे है?


गुजरात की बात होती है तो 2002 के दंगो का जिक्र अवश्य होता है। खासकर अगर सेक्युलर मीडिया गुजरात के बारे में कुछ कह रहा हो तो। जब भी मै सेक्युलर मीडिया द्वारा प्रायोजित इन चर्चाओ को सुनता हूँ तो इस उम्मीद में कि कभी इन सेक्युलर प्रवक्ताओ की आत्मा जागेगी और ये सच बोलेंगे। लेकिन ये लकीर के फकीर जड़ मानसिकता से लैस लोग सिवाय झूठ और अर्धसत्य के कुछ नहीं बताते। असल में इनका अस्तित्व ही झूठ की बुनियाद पे खड़ा है सो सच बोलना इनके लिए आत्मघाती सरीखा सा कदम हो जाता है। इसलिए 24 प्रतिशत हिन्दू जो मारे गए इन दंगो में इनके बारे में जिक्र करना ये कभी जरूरी नहीं समझते। 

यहाँ पे मै कुछ बाते रख रहा हूँ जो मेरी बात बिलकुल नहीं है। ये बाते किसी चर्चा में मीनाक्षी लेखी ने रखी, जो  भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता है। मुझे उनकी बाते सारगर्भित लगी। कम शब्दों में उन्होंने सेक्युलर झूठ को तार तार करने की एक सफल कोशिश की है। मै उनकी बातो को ठीक वैसा ही रख रहा हूँ जैसा कि उन्होंने चर्चा में व्यक्त किया। इसके लिए मै आभारी हूँ अपने सोशल मीडिया के मित्रो का जिन्होंने मुझे इन तथ्यों से परिचित कराने में मदद की।

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1. एक अंसारी नाम  का मुस्लिम युवक जो पुलिस के सामने हाथ जोड़ रहा था,उसकी हाथ जोड़ते हुए की फोटो को  मीडिया वालो ने ऐसे प्रसारित किया जैसे वो पुलिस से अपनी जान बख्श देने की भीख मांग रहा हो जबकि वो युवक अपनी जान बचाने के लिए पुलिस का हाथ जोड़ कर धन्यवाद कर रहा था.
 

2.  गोधरा में ट्रेन में आग लगाने वाले कांग्रेस के मुस्लिम कार्यकर्ता थे पर मैं उनको मुस्लिम कम और कांग्रेसी कार्यकर्ता ज्यादा मानती हूँ.

3.  जिस तीस्ता सीतलवाड़ को लेकर आप मीडिया वाले मोदी जी पे कीचड़ उछालते हैं उसने गुलबर्ग सोसायटी से खूब माल बनाया है और इस बात को लेकर उसके ऊपर हाईकोर्ट में केस चल रहा है ये बात आप मीडिया वाले क्यों नही बताते हैं?

4.  भारत में अब तक जितने भी दंगे हुए हैं और दंगो के बाद सरकारों ने जो भी कदम उठाये हैं और गुजरात के दंगो के बाद मोदी जी ने जो कदम उठाये उनकी तुलना आप अपने मापदंडो पे करके देश को सच बताये की किस सरकार ने दंगों से निबटने के लिए सबसे ज्यादा प्रभावशाली कदम उठाये थे?

5.  1969 के गुजरात दंगो; 1984 के सिख दंगो; 1986, 1992 के मुंबई दंगो; मुरादाबाद के दंगो; बिहार के दंगो; गोपालगड, राजस्थान में हुए दंगो और अभी असम में हुए दंगो के लिए कौन सी पार्टी जिमेदार है?

साभार:  मीनाक्षी लेखी, राष्ट्रीय प्रवक्ता, भारतीय जनता पार्टी।

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और क्या सेक्युलर मीडिया ने अंसारी के बारे में इस खबर को भी उजागर किया? और अगर नहीं किया तो क्यों नहीं किया? 
 

“अंसारी का कहना है कि लोग अपने फायदे के लिए मेरे फोटो का उपयोग करते हैं। दंगों के कई साल बाद भी मुझे चैन नहीं है। लोगों ने मेरी शांति को नष्ट कर दिया है। मैंने जिंदगी में आगे बढ़ने की कोशिश की लेकिन कहीं न कहीं, कोई न कोई मेरा फोटो दिखाकर मुझे फिर पीछे मुड़कर देखने के लिए मजबूर करता है।अंसारी ने खुद को कलंक के रूप में पेश करने को लेकर फिल्म निर्माताओं को कानूनी नोटिस भी भेजा है। 38 साल के अंसारी खुद की तस्वीर को बार बार दिखाने से तंग आ चुका है। उसका कहना है कि मुझे दया के पात्र के रूप में दिखाया जाता है। मैं अपनी प्लास्टिक सर्जरी करवाना चाहता हूं ताकि लोग मुझे नहीं पहचान सके।”
 

साभार:  That’s Me

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गोधरा सेक्युलर मीडिया को कभी सही संदर्भो में क्यों नहीं याद आता?

गोधरा सेक्युलर मीडिया को कभी सही संदर्भो में क्यों नहीं याद आता?

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Politics Over Death Is Demoniacal: It’s Happening In Uttarakhand!

Let's Not Play With The Sentiments Of Victims!

Let’s Not Play With The Sentiments Of Victims!

The flash floods and landslides caused havoc in Uttarakhand, and it’s now totally devastated. The actual number of deaths remains an unknown figure. “Tourists, migrant labourers and others had not registered on government lists, so they cannot be counted. Every time a place is cleared of debris, more bodies are found.” ( Barkha Chakrabarty, programme officer with ActionAid) That’s the state of affairs prevalent in Uttarakhand. One of the news reports says that more than 5,000 people lost their lives. Considering the lack of real picture, regarding actual number of deaths, it’s understandable that real figures could be more frightening. That’s because another news report published in The Times of India suggests that 4,028 people have gone missing, which includes high officials and government officials. Surprisingly, most number of people gone missing are from Rajasthan, 820 people; followed by Uttarakhand, 795 people.

It’s not hard to imagine that had army officials, risking their own lives, not swung into action immediately, the situation would have been terribly grim. Anyway, the flash floods and landslides once again exposed the disaster management mechanism prevalent in India. The National Policy on Disaster Management (NPDM) “mandates the State Governments inter alia to take measures for preparation of Disaster Management Plans, integration of measures for prevention of disasters or mitigation into development plans, allocation of funds and establishment of early warning systems.” It also talks about “promoting a culture of prevention, preparedness and resilience at all levels through knowledge, innovation and education” ; “encouraging mitigation measures based on technology, traditional wisdom and environmental sustainability.”

In real life- the so-called practical world- the story is altogether different. The bureaucratic machinery works in tune with interests of political masters than working for the cause of environment. In regime of Mayawati, Ganga Expressway Project got started in Uttar Pradesh, keeping at bay norms laid down in Environment Protection Act, 1986. It’s only after the intervention of Allahabad High Court, the project got stalled. Such a grand project got started without obtaining the environmental clearance certificate! One needs to ask how buildings like guest houses got constructed in flood/landslides prone areas in Uttaranachal? At the time when dams were built on rivers in Uttarakahand amidst deep protest, it was argued in its favour that such dams are vital for progress story of the state. None realized that such dams were obstructing the natural course of rivers and their ability to channelize the flood waters. No wonder, the state today is reeling under scary developments.

The Central government, which is supposed to assist the State as per Disaster Management rules, used the disaster effectively to promote Rahul and Sonia Gandhi. The relief material sent to Uttarakhand on behalf of Central government had pamphlets showcasing images of Rahul Gandhi, Sonia Gandhi and Manmohan Singh! If that’s not enough, the people refused to accept the relief packages, sent by the Central government, after they were found to be rotten! In fact, the government effectively roped in Ishrat Jahan’s encounter episode to hide its own shortcomings . It diverted the attention of media ( the paid media), and tried hard to cover its misdeeds. Well, in the age of online journalism, it’s naive to assume that blunders could be shoved under the carpet.

Anyway, let’s hope that those gone missing might have miraculous chances left to get united with their near and dear ones. May the souls of departed rest in peace. And yes, let’s hope that such tragedies teach both Central government and state governments the right way of dealing with disasters. At least, they come to realize that politics over the death signifies bleak future for democracy!

They say ‘helping hands are better than praying lips’. Let’s people come to contribute for the welfare of people trapped in unfortunate condition in Uttarakhand. They can contribute following the instructions given on this website’s appeal section of CM. The site is managed by Uttaranchal government: Relief Fund

Trapped By Fate!

Trapped By Fate!

Who Will Find Them?

Who Will Find Them?

Please Help Me :-(

Please Help Me 😦

 

Politics Over  Death With Rotten Food!

Politics Over Death With Rotten Food!

Army People: Like Always Acted As Saviours!

Army People: Like Always Acted As Saviours!

Nature's Fury!

Nature’s Fury!

Don't Mess With Water!

Don’t Mess With Nature!

Herculean Task For The Men In Uniform!

Herculean Task For The Men In Uniform!

Destruction!

Destruction!

Let's Stop The Tears!

Let’s Stop The Tears!

Water Annihilates Everything!

Water Annihilates Everything!

Everything Went Inside Water!

Everything Went Inside Water!

Trying To Get The Right Way!

Trying To Get The Right way!


References:

DNA India

National Policy on Disaster Management

The Times Of India

The Times Of India 

The Indian Express

The Daily Bhaskar 

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A Stunning Love Story That Culminated Into Suicide!

Shouldn't The Lovers Meet Better Fate?

Shouldn’t The Lovers Meet Better Fate?

“The course of true love never did run smooth.” (Shakespeare). This became evident in cruel fashion in case of Divya and Ilavarasan.  Ilavarasan and Divya belonged to different castes. Ilavarasan belonged to Dalit community and Divya came from a higher Vanniyar community. When their love story attained pinnacle, it did not evoke sweet episodes as one witnesses in Hollywood/Bollywood candyfloss movies. Last year, the girl’s father, unable to digest the vituperative remarks of people belonging to his community committed suicide. And now the news arrives that Ilavarasan, after Divya came to disown the marriage in blatant fashion, has committed suicide by jumping before the train.  

Their love story from the very beginning was marred by series of unfortunate developments. It first resulted in a typical caste bigotry, which this time did not remain confined to a small section. The mounting tension took in its grip whole Tamil Nadu. They got married amid unprecedented developments.” I was on my way to Trichy for a football match. When I was in Omalur, I got a call from Divya saying that people in her house are trying to get her married to someone else. She asked me to take her with me. We went to Andhra Pradesh and got married there.” ( Ilavarasan in an interview to Tamil Edition of India Today).

The Society's Evil Ways Had The Last Laugh!

The Society’s Evil Ways Had The Last Laugh!

When they got married, it led to huge tension in whole Tamil Nadu. A political party named Pattali Makkal Katchi entered into a campaign, triggering the impression that marriages between Dalit boys and non-Dalit brides were mainly for the purpose of extorting money. Fake cases got filed against Ilavarasan so as to block his appointment into police department in which he got newly selected. The issue further deteriorated when girl’s father committed suicide last November. Many colonies in  Naikkankottai village got burnt- the village of boy’s father.

For Divya, these developments seemed a bolt from the blue. After her father’s suicide, she went into state of depression and decided to separate from Ilavarasan. Naturally, her decision left Ilavarsan in a state of shock, who was determined to seek better days. Just a day before his suicide, it’s learnt that Divya categorically informed the reporters inside the Madras High Court campus about her decision to disown the marriage and not to return to Ilavarasan at all. Unable to withstand this dejection, the very next day Ilavarsan jumped before the train and ended his life.

Divya might have decided to disassociate with Ilavarsan but Ilavarsan remained true to her till his last breath. The only thing found in his possession, near the railway track, were the letters which he wrote to her during 2011.

 Ilavarsan:  This Courageous Boy Tried To Fight To The Finish But  Divya Proved To Be Made Of Lesser Mettle!

Ilavarsan: This Courageous Boy Tried To Fight To The Finish But Divya Proved To Be Made Of Lesser Mettle!

References: 

The Hindu 

Kafila

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