अटेन्शनवा: भाई किसी को खालिस सोने के बिस्किट चाहिए तो तिवारी सर से मिले अर्जेन्टी (व्यंग्य लेख )

ये सोने के बिस्कुट मै नहीं हज़म कर पाता हूँ :P

ये सोने के बिस्कुट मै नहीं हज़म कर पाता हूँ😛

मेरे कुछ मित्र भी गजब ही है। बैठे बिठाये लिखने का मसाला दे जाते है। ये तिवारी जी, लखनऊ वाले, मेरा सौभाग्य कहिये या मेरा दुर्भाग्य कि मेरे बचपन के परम मित्रो से है। तब से लेकर आज तक मुझसे गठबंधन किया बैठे है। अब बचपन में तो अच्छे बुरे की पहचान तो होती नहीं वर्ना इस तरह के खतरनाक मित्रो को मै जरा भी लिफ्ट नहीं देता हूँ। खैर ये ‘सड़ी मूँगफली स्कूल’ के काबिल हस्ताक्षर थें। इस स्कूल का असली नाम पाठको को नहीं बताऊंगा क्योकि जिनको समझना है उनके लिए इतना इशारा काफी है। कभी किताब लिखने का मौका मिला तो इस स्कूल के सभी नमूनों के बारे में विस्तार से लिखूंगा लेकिन ये इसी स्कूल की देन है कि खुली आँखों से सोना मुझे आ गया। सुबह सुबह इतने उबाऊ पीरियड में कौन इतना उच्च चेतना संपन्न था कि वो पूरे होशो हवास में रह पाता। कम से कम मै तो नहीं था। और निगम, जो पूरी सर्दी में शायद  तीन चार बार नहाने को महान कार्य समझते थें, तो बिलकुल नहीं था क्योकि उसको तो हमी सब उठाकर स्कूल लाते थें आँखों में नींद लिए। यहाँ भी कोई गांधी थें जिनके महाऊबाऊ विश्वशान्ति वाले भाषण सुबह सुबह असेंबली लाइन में सबसे आगे खड़ा होकर सुनने के कारण कुछ कुछ “अटेंशन डिफिसिट” सा हो जाता था, कही शान्ति आये ना आये पर मेरा मन जरूर अशांत हो जाता था। लगता था कि काश इस युग में भी धरती फट जाए सोचते ही मान तो कुछ देर के लिए वहा  रेस्ट कर लूं। पर किसी शापित देव सा ना सुनने लायक भी सुनने को मजबूर था। 

तो इसी तिवारी साहब ने, मेरे तमाम अशुभ ग्रहों के एक जगह आ जाने के कारण प्रतीत तो यही होता है, मुझे फोनवा करके, आवाज बदल के खालिस भयंकर डान की माफिक एक ढोंगी पाखंडी की तरह राम राम कहने के बाद मुझे सूचित किया कि  “आपके सोने के बिस्कुट आ गए है। बताये कहा डिलिवेरी करनी है। जाहिर सी बात है इस दुष्ट आत्मा से, भाई मै कहा जानता था कि तब तिवारी आवाज बदल कर बोल रहे है गोपनीय नंबर से, पूछना पड़ा कि आप बोल कौन रहे है। उधर से जवाब आया कि अरे लीजिये “आप अपने एजेंटो को नहीं पहचानते”। मुझे फिर कहना पड़ा कि आप बताते है कि कौन बोल रहे है कि मै बंद कर दू नंबर। तब उन्होंने राज खोला अरे मै तिवारी बोल रहा हूं पहचाना नहीं। एक नया नंबर मिल गया था जिसमे फ्री टॉक टाइम था तो सोचा इसका इस्तेमाल कर लूं। अब गरिया तो सकता नहीं था क्योकि वो मेरी आदत नहीं और दूसरा वो इस बोली भाषा में हिट था। वैसे ये कई धंधे आजमा चुके है सो मुझे ऐसा प्रतीत हुआ लगता है इनके फील्ड में रिसेशन आ जाने क्या पता ससुरा गोल्ड बिस्कुट का डीलर बन गया हो । 

वो बहुत खुश था शोले के गब्बर की तरह मुझको डरा समझ के। लेकिन मै जिस वजह से परेशान था उसकी वजह वो नहीं थी जो तिवारी साहब समझ  रहे थें। लेखनी की वजह से मै अपने नंबर सहित काफ़ी सर्कल्स में पहचाना हुआ हूँ जिसमे खाड़ी देशो के मित्र, अपना प्रिय पडोसी पाकिस्तान भी है, के लोग शामिल है, और इसके अलावा इंटेलिजेंस सर्विसेज के लोग भी है। इन साहब की नादान हरकत, जो क़ानूनी परिभाषा के तहत जुर्म की श्रेणी में आता है पर  इनकी बोल्ड आत्मा इस नाजुक आत्मा की  इस बात को मानने से इंकार करती थी, किसी विपत्ति को जन्म दे सकती थी। खैर इनको मुझे समझाना पड़ा कि टेक्नोलाजी के इस युग में जब भाई लोग मर्द हो के भी औरत की आवाज़ में बतिया सकते है, फर्जी स्टिंग आपरेशन होते है, मुझे इस बात की परवाह तो करनी पड़ेगी न कि उधर तिवारी ही बोल रहे थें बिना अपने किसी चमचों के। चमचा का मतलब यहाँ पे फटीचर मीडिया के लोग जो आवाज़ रिकार्ड करके खबरे बनाते है या चमचा माने वो जो फिल्मे परदे में एक मेन विलेन के पीछे पीछे चलते है। खैर मेरी बात की गंभीरता का वो आशय समझ गए पर ये बताने से नहीं चूके कि हाई प्रोफाइल नम्बरों से भी वो ऐसा ही कर सकते है और कोई उनका कुछ नहीं कर सकता या ऐसा करने से कुछ होता नहीं है। 

हां आप सही कह रहे है कि कुछ नहीं होता मगर इन्ही अफवाहों के चलते सिक्योरिटी एजेंसीज की नींद हराम हो जाती है और असली वारदात के समय ये बेचारे कुछ नहीं कर पाते, महत्त्वपूर्ण ट्रेने ऐसी ही बातो के चलते समय से चल नहीं पाती, दंगो के वक्त इस तरह की बाते शोलो को और भड़काती है। अरे साहब कुछ नहीं होता है  तो पीएमओ आफिस में डीलिंग कर लेते तो क्या पता तुम्हारे सोने के बिस्कुट इस देश की दरिद्रता कुछ कम कर देते! तिवारी जी हम जैसे मुद्रा विहीन के यहाँ तो तुम्हारी डीलिंग फ्लाप हो गयी लेकिन पीएमओ आफिस से भयंकर लोग तुम्हे उठाकर तो जरूर ही ले जाते, तुम्हारे  सोने के बिस्कुट बिकते या न बिकते। नालायक कही का ये तिवारी कभी सुधर नहीं सकता। एक बचपन के मित्र की कायदे से मदद करने के बजाय लगा उसे सोने के बिस्किट खिलाने। पता नहीं तुम सोने के बिस्कुट बेचने की हिम्मत रखते हो कि नहीं लेकिन इतनी औकात तो रखते ही हो कि कम से एक मिनी ट्रक बिस्किट ही बच्चों के लिए मेरे घर भेजवा देते। कुछ मै खाता कुछ मोहल्ले के बच्चो को बटवा देता। उनकी दुआओं से तुम्हारी ज़िन्दगी संवर जाती। लेकिन आज जब एक ब्राह्मण ही दूसरे ब्राह्मण की धोती खीचने में लगा हुआ है तो तुम कैसे अपवाद बन जाते। लगे मुझ जैसे फक्कड़ आत्मा को ही सोने के बिस्कुट बेचने जो सदा से ही यही गीत गाता  रहा हो कि “कोई सोने के दिलवाला, कोई चाँदी के दिलवाला, शीशे का है मतवाले तेरा दिल, महफ़िल तेरी ये नहीं, दीवाने कही चल”

तिवारी के बारे में मेरे गाँव की पगली लड़की, और इन तिवारी साहब को इस लड़की की बात बुरी नहीं लगनी चाहिए क्योकि वो भी तिवारी ही है, बिलकुल सही कहती थी कि जब “सौ पागल मरते है तो एक तिवारी का जन्म होता है”। पता नहीं कितनी सच थी उसकी बात लेकिन तिवारी लोगो में पायी जाने वाली अराजकता को देखता हूँ तो मन इस  बात पे आकर टिक जाता है। खैर इन तिवारी साहब का निगम की ही तरह कितना बढ़िया जजमेंट सेंस है ये बताना जरूरी हो जाता है। ये बताना भी जरूरी हो जाता है कि इनको कक्षा चार से ये विलक्षण शक्ति प्राप्त थी कि कौन से लड़की किस लड़के से ज्यादा बतियाती थी। और ये न्यूज़ नमक मिर्च लगा के सब तक सर्कुलेट कर देते थें। मेरे क्लास की लड़की अगर मेरे मोहल्ले में रहती थी तो इनके पेट में दर्द जरूर होता  था। और निगम का भी होगा ये तो तय था। इन दोनों की जजमेंट शक्ति कितनी उच्च थी। अभी पता चल जाएगा। खैर मै जब अपने गाँव में जाता था तो तिवारी सिर्फ यही सूंघ पाते थें कि जैसे मै  इसी खतरनाक पगली लड़की से,जो तिवारी वर्ग में पाए जाने वाली सब महान शक्तियों से लैस थी, से बतियाने जाता था। ये तो कभी सूंघ नहीं सकते थे कि बरसात के कीचड भरे रास्ते,  भयंकर ठण्ड से भरे दिन और राते, भीषण गर्मी में बिना किसी पंखे वाले कमरे में, किसी तरह जो भी मिला वो खाकर अपने खेतो में क्या हो रहा है देखता था। हा ये उन्होंने अनुमान लगा लिया कि गंगा नदी के तट पर स्विट्ज़रलैंड की हसीन वादियों में जैसे लोग टहलते है, वैसे ही मै लेकर उसको विचरण करता हूँगा। अब लखनऊ की चमकती रोमान्टिक गलियों में पले  बढे, नाम मात्र रूप से गाँव के सामाजिक परिवेश को जानते हुए- कभी  असल ब्राह्मण बहुल्य गाँव में तो कभी रहे ना होंगे-को इससे बेहतर क्या समझ में आ सकता था। मुझे इनकी समझ से कुछ लेना देना नहीं पर तिवारी साहब ये आप जान ले कि गाँव में चाहे वो गँगा के तट हो या खेत सुबह शाम नित्य कर्म करने वाले लोगो से पटे रहते है तो कोई कैसे किसी को इस तरह रोमान्टिक तरीके से घुमा सकता  है? मै तो गाड़ी भी ड्राइव नहीं कर पता कि चल कही दूर निकल जाए ऐसा कुछ भी हो सकता। लेकिन इनको क्या और निगम को क्या। सोचने लगे तो यही सब सोच डाला। और सुनिए आप मेरे गाँव में आइये तो ये ट्राई भी मत करियेगा, हा किसी और के बारे में आप कुछ भी सोच ले ये अलग बात है, वर्ना गाँव के लोग कूट काट  डालेंगे। गाँव वाले न शहर वालो को ठीक नज़र से देखते है और शहर वाले तो शहरीपने के चलते गाँव वालो को शुरू से ही गंवार समझते रहे है।

और निगम साहब को उस उम्र में जिसमे प्यार की भावना एक नैसर्गिक प्रक्रिया होती है ये साहब तब भी भयंकर फिल्मी अंदाज़ में मुझे समझाते थे “प्यार वो करते है जिनकी जागीर होती है”। वैसे उसकी बात में कडुवी सच्चाई थी ये मै मानता हूँ पर सच नहीं थी सोचने पर। बिल्कुल सच नहीं थी। क्योकि निगम जी जागीर वाले सब कुछ कर सकते है प्रेम नहीं कर सकते। ये ज्यादा से ज्यादा इस लड़की के साथ टहलेंगे, फिर कल किसी दूसरे के साथ टहलेंगे और अंत में आपको पता चलेगा इन्होने माता पिता का सम्मान करते हुएं रीति रिवाजों के साथ किसी जागीरवाली लड़की के साथ शादी कर ली। अपवाद हो कोई वो अलग बात है पर ज्यादातर तक जागीर वालो का  इतिहास ऐसा ही रहता है प्रेम के नाम पर। वैसे निगम तिवारी से बतिया लेना क्योकि मुझसे कह रह था कि “अलीगंज सेक्टर डी”  से कपूरथला काम्प्लेक्स की दूरी कोई लन्दन से पेरिस तक जितनी नहीं थी कि जो आके अपने बचपन के मित्र का हाल चाल भी न ले सके। ये कायस्थ वर्ग के चरित्र की निशानी है कि अपने सीमित स्वार्थ से ज्यादा दूर तक नहीं सोच पाते। ये अलग बात है बाभनो से पटती भी बहुत है जो इस सोच के ठीक विपरीत होते है। 

वैसे बात सोने के बिस्किट से शुरू हुई थी तो समापन भी ऐसे ही होगा। भाई तिवारी अमीनाबाद चले जाना वहा अपने सड़ी मूंगफली स्कूल के ही एक परम मित्र रहते है अपने ही बचपन के जिनसे जब मै बातचीत करने का इच्छुक होता हूँ तो इस भय से नहीं करता हूँ कि कोई फायदा नहीं क्योकि आपने फ़ोन किया नहीं कि उधर से आवाज़ आएगी कि अरे वो तो मजलिस में गए है। बहुत अच्छा उसका बिज़नस सेन्स है। वो जरूर बिकवा देगा तुम्हारे बिस्कुट। नहीं तो इसी स्कूल के एक सज्जन खुर्रम नगर में रहते है जो फेसबुक मित्रो मे एक बेहतर क्लासिक पोज़ में मौजूद है चश्मे सहित। वहा  चले जाना तुम्हारा काम हो जाएगा। ये लोग बहुत काबिल है। मेरे जैसे साधन विहीन लेखक वर्ग के जरिये तुम अपने सोने के बिस्किट कभी नहीं बेच पाओंगे। अब ये भी धंधा चालु कर दिया है तो कम से कम धंधे में तो थोडा से बेहतर जजमेंट सेंस रखो कि कहा तुम्हारा माल बेहतर बिक सकता है। ऐसे तो तुम दिवालिया हो जाओगे। आया समझ में। और मुझसे मिलने आना तो कम से कम पारले जी वाला बिस्कुट लेते आना। बचपन से इसी बिस्कुट की लत जो लगी है। सोने के बिस्कुट हज़म  करने की लत मुझे कभी नहीं पड़ी और न पड़ेगी। और निगम तुम्हारे लिए तो यही लाइन उपयुक्त रहेगी: सोना नहीं, चांदी नहीं, अरे यार तो मिला जरा प्यार कर ले।

अपना प्यारा लखनऊ :-)

अपना प्यारा लखनऊ🙂

Pics Credit: 

Pic One

Pic Two

6 responses

  1. Yogesh Pandey, Lucknow:

    हा हा हा सत्य वचन….

    Author’s Response:

    चलिए इसी स्कूल के किसी चेहरे का चेहरा तो खिला पढने के बाद😛 वैसे काफी समय बिताया है इस स्कूल में तो आप समझ सकते थे है अगर मौका मिला तो एक किताब तय है ऐसे तमाम किस्सों सहित। वैसे गांधी नाम के जीव से हम बच्चे काफी त्रस्त थें। अपने तरीके से मैंने रिवेंज लिया। इलाहाबाद के किसी अंग्रेजी अखबार के दफ्तर में जब इन्ही का विश्व शान्ति वाला लेख का पुलिंदा देखा जो मेरे एडिटर साहब लगभग छापने को तैयार बैठे थें उसको रुकवा दिया। इस वजह से नहीं कि इनसे कोई चिढ थी पर इसलिए कि मैं नहीं चाहता था कि इनके छपने के बाद किसी की सुबह ख़राब हो दूसरा कीमती कागज़ बचाकर कम से कम गांधीजी के अनुसार स्वस्थ्य पर्यावरण की आधारशिला रख दिया। सो एक तीर दो शिकार कर दिया आदत के अनुसार। शिष्यत्व भी निभा दिया और बदला भी ले लिया सताने का सुबह सुबह। एक तो वैसे ही तिवारी गैंग से परेशान रहते ऊपर से ये गांधी की शांतिमय विचारधारा ह हा हा

    वैसे इसी स्कूल का कोई मिले तो ये लेख का प्रिंट जरूर दे दीजियेगा। अच्छी बाते दूर तक जानी चाहिए।

  2. Many thanks to these readers for having a quick look at the post…

    Mayank Mishra, Varanasi,Uttar Pradesh; Swami Prabhu Chaitanya,Patna, Bihar;Swati Kurundwadkarji,Thailand; Niranjan K. Singh, Lucknow, Uttar Pradesh; J N Sharma, Lucknow, Uttar Pradesh; Rekha Pandey, Mumbai, Maharashtra; Pandey Neeraj; Hindustanij, New Delhi; Mudit Pandey,Bangalore,Karnataka; Ravi Hooda, Canada; Ankit Sharma, Ghaziabad, Uttar Pradesh; S C Mudgal, New Delhi;Sidhant Suchit; Deewaker Pandey,New Delhi; Nita Pandey, Chennai, Tamil Nadu and Himanshu B. Pandey, Siwan, Bihar.

  3. Arvind – Clearly I have no idea what this says, but I clicked the “like” button because I’ve always appreciated what you’ve written that I can read🙂

    1. @Laurie

      I am sure if admirers like you come to grace the life of writers, then even the dead people will move out of their graves and start writing! Thanks for your wonderful words, which never misses to find me..This is one of the posts falling in the genre of humour/satire..While writing in my mother tongue, I prefer to write in this genre, since I read a lot in this section, and, above all, I am intrinsically tuned to make people laugh and smile rather than make them flirt with tears..Above all, my own people want that I should write in my own language more often to have better interaction with the masses, and thus, I found this genre most suitable to have intimate connection with the Hindi readers.

      In brief, the essence of this post comprises of a dangerous gesture on part of my childhood classmate, which he mistakenly, not being aware of law, assumed to be an innocent gesture. In my own humourous way, I make him realize that such gestures can get both of us involved in deep trouble. This person, impersonating himself to be person involved in smuggling gold biscuits, tried to bargain with me over the telephone. Naturally, it created some tense and embarrassing moments for me. I retorted in a calm way, stating that instead of choosing someone from the writer class as your potential customer, who are always in need of money, you should have better tried to make inroad into premier institution like Prime Minister’s Office (P.M.O.), and I am sure even if you would have failed to sell your gold biscuits there, the intelligence staff had ensured that you timely receive your bread and butter inside a special cell ..ha..ha.ha ..By the way, he is a hard-working computer professional but sometimes craziness overpowers him😛

      1. Oh my goodness – thank you for the wonderful translation. I thoroughly enjoyed reading this with my morning cuppa tea. Good thing I didn’t choke on my laughter!

  4. Vishal Sabharwal, New Delhi, said:

    Very Nice write up Arvind prabhu. Reminded me of Basu Bhattacharjee style comedy. Very refreshing and subtle.

    *****************

    Author’s Response:

    The real credit goes to my sensitivity, which felt the undercurrents so well…Then I need to thank the brain which didn’t wipe out memories of yesteryear..And yes, how can I forget the company of delicious friends in past, who made my bygone days such a fascinating experience and which now provides themes to write upon.. Lastly, I need to thank Lord Krishna, who provided this “insignificant being” the ability to boast of as writer in literary circles among wonderful souls like you people…

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