गाली गलौज से भारतीयों का बड़ा याराना है, इन्हें न देने वाला चू*यम सल्फेट है!

 

अश्लील शब्द तकिया कलाम का रूप हासिल कर चुके है

अश्लील शब्द तकिया कलाम का रूप हासिल कर चुके है

मन दुखी हो जाता है जब मै भारतीयों को जरा जरा सी बात पे बार बार गाली गलौज करते हुए देखता हूँ। जो बात हम सभ्य तरीकें से कह सकते है उसको  गालीनुमा अंदाज़  में कहने के हम आदि हो गए है। मंत्र की तरह  हम इनका उच्चारण करते है। समझ में नहीं आता कि इस अंदाज़ में बात करने से क्या मिलता है। हमारी तरफ से कोई  विरोध भी नहीं होता और हम सिर्फ मुस्कुरा कर  रह जाते है क्योकि इनको बोलना सुनना हमारी नैसर्गिक आदतों में   शामिल हो गया है। जिस्म में ये हमारे लहू बन के बहती है। गाली देने का प्रचलन सिर्फ हमारे ही देश में हो ऐसा नहीं  है। कुछ गालिया ग्लोबल है। इन्हें हम गर्व के साथ बोलते है और अगर अंग्रेजी में कुछ हम गालिया दे तो हम एक माडर्न आत्मा बन के उभरते है।

दिल्ली या मुंबई के सडको पर या इन बड़े शहरों के बसों या ऑटो में सफ़र कर के देखिये आपको लोग बात बात पे गरियाते मिलेंगे और ऐसे अश्लील शब्द तकिया कलाम का रूप हासिल कर चुके है। ऐसा नहीं कि ये किसी वर्ग विशेष तक शामिल है। हर तबके के लोग शामिल है जिसमे महिलाओं से लेकर स्कूली बच्चे तक शामिल है। आप कही जा रहे हो सड़क पर आराम से और अन्जाने में ही आप कुछ अनचाहा कर बैठे तो लीजिये शुरू हो गई गालीं की बौछार। इलाहाबाद जैसे शहर में भी कुछ ख़ास फर्क नहीं मेट्रो संस्कृति से अगर हम गाली गलौज के एवरग्रीन माहौल को ध्यान में रखते हुए तुलना करे तो। यहाँ भी चाहे वकील हो या कोई रिक्शेवाला आपको बड़े अदब से गरियाते हुए मिलेंगे। पता नहीं किस ज़माने से गाली गलौज करना मर्दानगी या आधुनिक  होने का  पर्याय हो गया। 

शायद यही वजह है कि युवा वर्ग में लोकप्रिय आमिर खान को कोई संकोच नहीं होता है गाली को गीत में बदलने का। कुछ बुद्धिजीवी होने का भ्रम पाल उठे फिल्मकार जैसे अनुराग कश्यप सीना ठोककर गाली के समर्थन में उतर आते है जैसे गाली दाल में नमक हो गई हो। “लोगों को एक ही तरह का सिनेमा देखने की आदत पड़ गई है. इसलिए जब वो इस तरह की हिंसा या गालियों को देखते हैं तो घबरा जाते हैं. कई बार तो वो इसलिए नहीं घबराते कि वो गालियां नहीं सुन सकते, बल्कि उन्हें ये चिंता रहती है कि दूसरों पर क्या असर पड़ेगा. मुझे लगता है खुद के लिए अगर इंसान जिम्मेदार रहे तो गालियां इतनी बुरी नहीं लगेंगी.” (अनुराग कश्यप बीबीसी से एक मुलाकात के दौरान) शेखर कपूर की फ़िल्म “बैंडिट क्वीन” में फूलन देवी के चरित्र का गाली देना बिल्कुल नहीं अखरता क्योकि उसके साथ अन्याय हुआ है पर रानी मुखर्जी जब बड़े स्टाईल से “नो वन किल्ड जेस्सिका”में गाली का इस्तेमाल करती  है तो  क्या सन्देश गया? यही कि महिला पत्रकार अंग्रेजी की जब गाली  देती है तो वो उसके प्रोग्रेसिव और बोल्ड चरित्र की पहचान है। मर्दों को सन्देश है कि कमीनेपन में हम भी आपके समकक्ष खड़े है। पुलिसवाले जिनको गाली देने का लाइसेन्स मिला हुआ है, मै उम्मीद करता था कि महिलाओ के आगमन से कुछ माहौल बदलेगा पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। वे वैसे ही सहज भाव से गाली देती है जैसे कोई मर्द खाकीवाला।  

आप सब खुद सोचे जब आप गाली देकर किसी के आत्मा को दुखी कर रहे होते है तो आप को क्या हासिल हो रहा होता है? ये किस समाज का लक्षण है कि  जहा पे आप अपने दुखो और असफलता को सही शब्दों में ना व्यक्त कर पाए और आप को सूअर,कुत्तो, गधो या महिला यौन अंगो से सुसज्जित विकृत शब्द समूह का सहारा लेना पड़े?  

अंग्रेजी में कुछ हम गालिया दे तो हम एक माडर्न आत्मा बन के उभरते है।

अंग्रेजी में कुछ हम गालिया दे तो हम एक माडर्न आत्मा बन के उभरते है।

References:

BBC

Indowaves

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5 responses

  1. Shwetaji, California (USA) said:

    Super like :))

    Author’s Response :

    धन्यवाद श्वेता।। आप जैसे अति उत्साही पाठको की वजह से लेखन में रस है वरना क्या धरा है कागज को स्याह करने में? नोट करो श्वेता वो हर चीज़ जो कागज को नोट में न बदले वो बेकार है खासकर लिखना🙂 अब केला खाकर सोच में डूब जाओ।

  2. Few lines from author’s side for some of the readers who read this post:

    Rajesh Kumar, New Delhi:

    बहुत धन्यवाद ..वकीलों को ओफेंसिव शब्दों को प्रमोट करने के लिए पुरस्कार मिलना चाहिए🙂

    Urmila Harit, New Delhi:

    उर्मिलाजी देखिये कितनी मेहनत से अंग्रेजी में लिखे लेख का हिंदी में प्रस्तुतिकरण हो रहा है। कही अवार्ड श्वार्ड की सेट्टिंग चल रही हो तो मेरा ख्याल रखियेगा🙂 .

    Dharmendra Sharma:

    धन्यवाद… देखिये हिंदी में अंदाज़ बदल गया है। फास्ट बालिंग जो अंग्रेजी में थी स्पिन में बदल गयी🙂

    Ravi Hooda, Canada:

    उम्मीद है कठोर बात को साफ्ट तरीके से कहना आपको पसंद आया।

    Anand G.Sharma,Mumbai:

    चलिए केला बेचकर,खाकर आप को लेख पढने की सुध आ गयी।

    A few seconds ago · Like

    Yogesh Pandey, Lucknow, Uttar Pradesh :

    अंग्रेजी में हार्डकोर हो गया था। सो हिंदी संस्करण में फैमली पैक ले आया🙂

  3. बहुत धन्यवाद इन पाठको को जिन्होंने इस लेख पर नज़र डाली।

    Shashi Bhushan,Press Trust Of India, New Delhi; Prasanjit Saha, Hyderabad (Andhra Pradesh); Makarov Scongello; Rekha Pandey ,Mumbai(Maharashtra);Krishan Lal Sachdeva;Alok Chaubey,Mumbai (Maharashtra); Anjeev Pandey, Nagpur(Maharashtra); Ranbir Bahadur Singh,Kolkata (West Bengal);Dinesh Pd Sinha; Nita Pandey,Chennai(Tami Nadu); Himanshu B. Pandey,Siwan (Bihar); Harish Gupta; Manjoy Laxmi,Nagpur(Maharashtra); Gaurav Kabeer, New Delhi; Pankaj S.Pandey and Arvind Sharma, Indore(Madhya Pradesh).

  4. Aaapki baat se bilkul sahmat hu ,English me gandi gandi log gaaliya dete hai to log apne aap ko high standard samjhte hai…gaali kisi bhi bhasa me diya jaaye wo nishchit roop se ek maryadeet samaj ka hissa nahi ho sakta.

    1. जो दिखाई और सुनाई पड रहा है उसकी उपेक्षा तो नहीं की जा सकती न सुधीर जी।।। ये उनकी गलत सोच है कि अंग्रेजी में गरिया के आप स्टैण्डर्ड हो जायेंगे.

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