ईमानदार आदमी का इनाम उसकी उपेक्षा, बदनामी और मौत!

श्री मंजुनाथ: ईमानदारी का इनाम मौत होती है!!!

श्री मंजुनाथ: ईमानदारी का इनाम मौत होती है!!!


रवीश कुमारजी
का ये लेख पढने के बाद जो कि राजस्थान पत्रिका में छपा था समझ में ये आया कि ईमानदार आदमियों के लिए ये दुनिया बेगानी होती जा रही है.   ना इनकी क़द्र है और ना इनके लिए जगह है.  बात यही तक रहती तब भी ठीक था मगर अब ये दुनिया खतरनाक भी हो चली है ईमानदार आदमियों के लिए.  शायद कालिख पुते चेहरे में एक साफ़ सुथरा सा चेहरा एक भद्दा सा दाग होता है. ईमानदार आदमी एक गहरा मज़ाक होता है बेईमानो के लिए. सो उसका ना होना ही बेहतर है.  सो उसे इतना प्रताड़ित किया जाता है या तो वो विक्षिप्त हो जाता है या उस दुनिया में चला जाता है जो कि बेईमानो के पहुँच से बाहर होती है.  हम सब एक साफ़ सुथरा समाज चाहते है पर एक साफ़ सुथरे आदमी से नफरत करते है क्योकि वो सामाजिक लोगो के गणित में फिट नहीं बैठता. एक जुगाडू जनप्रतिनिधि पैसो के दम पे लोकसभा/राज्य के चुनाव में जीत जाता है पर एक ईमानदार प्रतिनिधि पहले तो खड़ा होता नहीं और यदि खड़ा होता भी है तो जमानत जब्त हो जाती है.

ठीक इसी तरह कोई कर्मचारी घोटालो के खिलाफ आवाज नहीं उठता है और यदि उठाता है तो मौत, बदनामी, उपेक्षा, प्रताड़ना इत्यादि के आलावा उसके नसीब में कुछ नहीं है. याद कीजिये उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग हुए घोटालो में जेल के अन्दर बंद लोग भी मार दिए गए.  ठीक इसी तरह एक उच्च पुलिस अधिकारी ने जब आवाज उठाई तो उसे विक्षिप्त करार देकर इलाज के लिए भरती करा दिया. निष्कर्ष साफ़ है.  जो गलत में साथ दे वो नार्मल है और जो गलत के खिलाफ आवाज उठाये वो एबनार्मल. लोग तो ये भी कहते है क्या जरुरत थी माफियायो के खिलाफ आवाज उठाने की! मतलब गलत सिस्टम का विरोध मत करिए. इसका हिस्सा बन जाईये!

आइए इस मुद्दे को बेहतर समझने के लिए रवीश कुमार जी का लेख पढ़ते है. और पढ़ के यदि हम थोडा सा भी स्पेस ईमानदार आदमी के लिए बना सके तो समाज थोडा जीने के लायक सा हो चलेगा.

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      *अकेले पड़ते ईमानदार लोग*

यह हो सकता है कि एस पी महांतेश नाम के अधिकारी के बारे में आपने नहीं सुना हो। कर्नाटक के चीफ जस्टिस के घर के सामने इस अधिकारी की धारदार हथियारों से मार कर हत्या कर दी गई। जब तक यह अधिकारी अस्पताल में ज़िंदगी और मौत से लड़ता रहा कर्नाटक के मुख्यमंत्री जो उसी विभाग के मंत्री हैं देखने तक नहीं गए। महांतेश कर्नाटक के कापरेटिव ऑडिट महानिदेशालय में उपनिदेशक थे। इनके आते ही कर्नाटक में ढेरों कोपरेटिव घोटालों का पर्दाफाश होने लगा। कई बार मारने और डराने की कोशिशों के बाद भी महांतेश का इरादा कमज़ोर नहीं हुआ। लेकिन अब यह अधिकारी हमारे बीच नहीं है क्योंकि हमारे कल के ईमानदार भविष्य के लिए लड़ते हुए मार दिया गया है। मुझे नहीं मालूम कि आप नीमच,शिवपुरी,बंगलोर,कोलकाता,गंगानगर और अलवर में महांतेश के बारे में पढ़ते हुए क्या सोच रहे होंगे। शायद यही कि सिस्टम से कौन लड़े। कोई नहीं लड़ सकता। गनीमत है कि महांतेश ने हमारी तरह नहीं सोचा। हमारी सहानुभूति की भी परवाह नहीं की। अपनी और अपने परिवार की ज़िंदगी दांव पर लगाकर एक के बाद एक घोटाले का पर्दाफाश करते चले गए।

अप्रैल के महीने में दिल्ली में रवींदर बलवानी की हत्या हो गई। पुलिस दुर्घटना बताती रही है। परिवार के लोग हर दूसरे दिन हाथ में बैनर लिये खड़े रहते हैं कि आर टी आई कार्यकर्ता रवींदर बलवानी की हत्या हुई है। उनकी बेटियां समाज और सरकार से गुहार लगाती फिर रही हैं मगर सौ पांच सौ लोगों के अलावा किसी का कलेजा नहीं पिघलता। जुलाई 2010 में गुजरात हाई कोर्ट के करीब आर टी आई कार्यकर्ता अमित जेठवा की गोली मार कर हत्या कर दी गई। ईमानदार अफसरों के सिस्टम से लड़ने और मारे जाने की घटनाएं 2003 में शैलेंद्र दूबे हत्याकांड और 2005 में एस मंजूनाथ हत्याकांड के बाद से मीडिया में जगह तो पा जाती हैं मगर सरकारों पर असर नहीं पड़ता। ईमानदारी का बिगुल बजाने वाले अफसरों को सुरक्षा देने का कानून अटक-लटक कर ही चल रहा है। अगर हम अपने ईमानदार सिपाहियों के प्रति इतने ही सजग होते तो एक मज़बूत कानून बनने में दस साल न लगते।

संसद में व्हिसिल ब्लोअर विधेयक पड़ा हुआ है। इसमें शिकायत करने वाले को सताए जाने के लिए कोई सज़ा नहीं दी गई है। यहां तक कि बिल में सताने यानी उत्पीड़न को भी विस्तार से नहीं बताया गया है। गुमनाम शिकायत को स्वीकार न करने की बात कही गई है और भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल बजाने वाले को पीड़ित करने वाले अफसरों के लिए दंड की कोई व्याख्या नहीं की गई है। इस कानून की खामियों पर कई बार सार्वजनिक चर्चा हो चुकी है। दरअसल किसी बिगुल बजाने वाले को सुरक्षा देने के लिए कानून का इंतज़ार करना भी ठीक नहीं है। 2004 में ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कानून बनने से पहले भी सुरक्षा का प्रावधना होना चाहिए। इसके बाद भी एस पी महांतेश को कोई सुरक्षा नहीं दी गई।

यह सबक हमने सीखा है शैलेंद्र दूबे और मंजूनाथ की हत्या के बाद। लोगों के भावनात्मक उबाल का फायदा उठाने के लिए सरकारें उस वक्त तो वायदे कर देती हैं मगर जल्दी ही भूल जाती हैं। उन मामलों का भी पता नहीं चलता जिनके बारे में खुलासा करते हुए ये अफसर जान देते हैं। कुछ मामलों में अपराधियों को पकड़ कर सज़ा तो दे दी जाती है मगर बड़ा ओहदेदार पकड़ा नहीं जाता है। क्या आप जानते हैं कि शैलेंद्र दूबे ने स्वर्णिम चतुर्भुज योजना में तीस हज़ार करोड़ रुपये के घोटाले की बात कही थी। क्या आपको पता है कि उन आरोपों का क्या हुआ? कौन लोग थे जिन्होंने तीस हज़ार करोड़ रुपये का घोटाला किया? क्या शैलेंद्र दूबे की मौत का इंसाफ सिर्फ इसी बात से मिल जाता है कि कुछ लोगों को पकड़ा गया और उन्हें आजीवन कैद की सज़ा दिला दी गई। हमारे सिस्टम ने ऐसा क्या किया जिसके चलते किसी शैलेंद्र दूबे को जान जोखिम में डालने की नौबत ही न आए।वही हाल गुजरात के अमित जेठवा मामले की है। खनन माफियों की कारस्तानियों को उजागर करने वाले उनके आरोपों की जांच पर अभी तक कोई फैसला नहीं आया है। शहेला मसूद का मामला कहां अटका है सबको पता है।

इतना ही नहीं हमारा ध्यान ऐसे लड़ाकों पर तभी जाता है जब वो मार दिये जाते हैं। मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूं जिन्होंने बैंक से लेकर कापरेटिव तक के बड़े घोटाले ज़ाहिर किये हैं मगर उनके विभाग ने तरह तरह से प्रताड़ित कर मानसिक रूप से विक्षिप्त कर दिया है। आर टी आई ने बिगुल बजाने वालों को हथियार तो दे दिया मगर भ्रष्टाचार के इस जंग में जान बचाने का कोई सेफगार्ड नहीं दिया। जो भ्रष्ट हैं वो बुलेटप्रूफ जैकेट में चल रहे हैं और जो भ्रष्टाचार से लड़ रहे हैं वो दिन दहाड़े मारे जा रहे हैं। दरअसल अब मान लेना चाहिए कि भ्रष्टाचार को लेकर समाज और सियासत का पक्का गठजोड़ है। जब तक इस गठजोड़ को नहीं तोड़ा जाएगा, महांतेश और मंजूनाथ मारे जाते रहेंगे।

ब्हिसिल ब्लोअर यानी बिगुल बजाने वाला, सचमुच सिस्टम से लड़ना किसी जंग के एलान से कम नहीं है। मध्यप्रदेश में ही लोकायुक्त के ज़रिये ढाई सौ करोड़ से अधिक की संपत्ति ज़ब्त हो चुकी है। जिस स्तर के अधिकारी पकड़े गए हैं उससे पता चलता है कि भ्रष्टाचार की लूट में सिस्टम के कौन कौन लोग शामिल हैं। जब नीचे के स्तर पर यह हाल है तो ऊपर के स्तर पर भ्रष्टाचार का क्या हाल होगा। और एक सवाल खुद से कीजिए। क्या आपको पता नहीं कि यह सब हो रहा है। क्या आप अपने सामाजिक जीवन में ऐसे भ्रष्ट लोगों से नहीं मिलते हैं। आपकी सहनशीलता तब क्यों नहीं टूटती जब ऐसे लोग सामने होते हैं। तब आप सवाल क्यों नहीं करते। तभी क्यों करने का ढोंग करते हैं जब एक युवा आईपीएस अफसर नरेंद्र कुमार कुचल कर मार दिया जाता है क्योंकि वो खनन माफियाओं पर लगाम लगाना चाहता था।

दरअसल हम ईमानदारों के इस जंग में ईमानदारी से शामिल नहीं हैं। यह कैसा समय और समाज है कि नरेंद्र कुमार और महांतेश के मार दिये जाने के बाद कहीं कोई प्रतिक्रिया नहीं है। कोई चित्कार नहीं है। राजनीति भी तो इसी समाज से आती है। तभी तो व्हिसिल ब्लोअर्स को सुरक्षा देने वाला विधेयक लोकसभा में पास हो जाने के बाद राज्य सभा में पेश होने का इंतज़ार ही कर रहा है। जल्दी न राजनीति को है न समाज को। हम अपनी पसंद के दल के भ्रष्टाचार से आंखें मूंद लेते हैं और विरोधी दल पर सवाल करते हैं। अपना बचाकर दूसरे का दिखाने से सवाल का जवाब नहीं मिलता। नरेंद्र कुमार और महांतेश का अपराधी कौन है? समाज या सरकार? अगर समाज नहीं है तो उसने सरकार से जवाब मांगने के लिए क्या किया? हम आईपीएल जैसे तमाशे में पैसा देकर भीड़ बन जाते हैं मगर इन अफसरों के लिए सड़कों पर नहीं निकलते। हमारे इसी दोहरेपन की दुधारी तलवार पर ईमानदार अफसरों की गर्दनें कट रही हैं।

(साभार : रवीश कुमार,  जाने-माने टीवी पत्रकार व एंकर,  का लेख राजस्थान पत्रिका से)

श्री नरेन्द्र कुमार सिंह: सिंह जो नहीं झुका!!!

श्री नरेन्द्र कुमार सिंह: सिंह जो नहीं झुका!!!

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Pics credit:  

Pic One

Pic Two 

12 responses

  1. Rajendra Nath Mehrotra,Vadodara(Gujarat), said:

    Very true. By and large, except a few who have undaunted mental strength, 99 % become victim due to public apathy.

    Author’s response:

    The gap between theory and practice is proving to be disastrous for good souls..

  2. Neetu Singh, Bangalore (Karnataka), said:

    ईमानदारी की सजा.. हा अरविन्द सर ,,,इन बेईमान आदमियों का क्या करे? ….क्यों करते है यह लोग ऐसा? …सभी लोग चैन से जिए ऐसा क्यों नहीं होता? ईमानदार लोग एक हो और गलत लोगो के खिलाफ काम करे.

    Author’s response:

    कब तक यूँ ही ऐसा होता रहेगा.. हंस पहले दाना चुग के संतोष कर लेता था..अब तो इतना भी नहीं होने दिया जा रहा है..कम से कम जो सही लोग है वो एक होके रहे उम्मीदों के दिए के साथ तो जरूर वक़्त बदलता है ..

  3. Thanks Dharmendra Sharma, UAE ; Shiv Dewangan, Hong Kong; Pankaj Anand Mishra, Patna, Sanjay Kaushik, Rakesh Malhotra, Amritsar, and Dubeyji, Ranchi (Jharkhand) for reading the article….

  4. Rajendra Nath Mehrotra,Vadodara(Gujarat), said:

    Gap is still almost the same but its pinch is felt more due to increasing numbers and not percentage.

    World wide, only up to 2% remain ‘Self motivated and uncorruptible’.

    90% remain under check with a proper effective and efficient system.

    5% can still find system loop holes and exploit them and hence; need a stronger deterrent.

    2% are hard core and need very harsh punishments and deterrents.

    1% can’t be improved by any system or methods known to us.

    Author’s response:

    That’s quite interesting…Better laws and their effective implementation acts as deterrent..

  5. Thanks Rajneesh Tripathi, City Reporter at Haribhoomi, Raipur, and Sudhir Dwivedi, New Delhi, for reading the article..

  6. Anupam Verma, Mumbai, said:

    बेईमानो की मेजारिटी इतनी ज्यादा हो गयी है कि ईमानदार लोग कुछ करने का सहस ही नहीं कर पाते ..

    Author’s response:

    फिर भी ये याद रखे रौशनी की एक किरण अन्धेरें की विशाल सत्ता को भेद सकती है..

  7. धन्यवाद प्रिंसिपल भूपिंदर जी ( प्रोफ़ेसर सुस इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट, चंडीगढ़ ) की आपने इस जरुरी आलेख को पढ़ा ..

    ************
    धन्यवाद प्रवीण त्रिवेदीजी,फतेहपुर( उत्तर प्रदेश) …ये देख के अच्छा लग रहा है कि अकेडमिक संस्थानों से जुड़े लोगो ने इसे पढने की जरुरत महसूस की..क्या टीचर्स ज्यादा ईमानदार होते है या ईमानदारी की वजह से सबसे ज्यादा उपेक्षित होते है?

    ************

    धन्यवाद सतीशजी, नासिक (महाराष्ट्र), इस लेख को पढने के लिए…

  8. Nipun Rathee:

    Our society sustaining on contradictory thinking. This is the reason why honest people are not liked and eliminated. Instead of honoring them, they are insulted, brutally attacked and in last killed. Then we say our society have lot of patience! Guys can we change our attitude? Please!

    Author’s Response:

    Contradictions and conflicts are part of any society. However, when they alone come to exist life becomes tough for principled people. Honest people do not need much from majority. A little encouragement and words of appreciation conveyed to them in honest way are enough to make them part and parcel of our society. However, we have stopped doing even that. The evil vrittis lurking inside us prevent us from promoting goodness of such souls..

    However, let’s not be discouraged. Remember, a ray of light is enough to penetrate the darkest corner. Let’s play our role to perfection and I hope it would definitely bring better days for right people.

  9. Baijnath Pandey, Editor, Associate Editor at Instamedia, said:

    “हम सब एक साफ़ सुथरा समाज चाहते है पर एक साफ़ सुथरे आदमी से नफरत करते है क्योकि वो सामाजिक लोगो के गणित में फिट नहीं बैठता.”……यही मूल और निर्णायक कारण है । इस अकेले वाक्य मे भारतवर्ष मे गिने-चुने बचे हुए ईमानदार लोंगों की सारी कहानी समाहित है । मै इसपर कुछ नहीं कह सकता क्योंकि मुझे पता चल गया है समाज नहीं बदल सकता । समाज क्या, अब तो आप कल के पैदा हुए बच्चे को भी कुछ सही नहीं सीखा सकते । यहाँ सभी लोग अत्याचार और भ्रष्टाचार की बातें करते हैं और खुद मौका पाकर किसी भी हद तक गिरने से नहीं कतराते । सब चाहते हैं की कोई मशाल लेकर उनकी लड़ाई लड़े और वो टी बी पर बैठकर खबरें सुनें । यही नहीं अगर तकलीफ मे फसे तो उसे भी न छोड़ें। लोग यह चाहते हैं की वो चौक चौराहों पर सच्चाई और ईमानदारी की बातों का मज़ाक उड़ाए और समाज मे ईमानदार लोग भी पैदा हों । अपने घर मे ईमानदार बच्चा आज कोई नहीं चाहता और यह आशा भी रखता है की हमेशा ईमानदार आदमी ही प्रधानमंत्री हो ।

    Arvind K Pandey जी,
    इस देश के लोंगों को मरने दीजिये। अभी इनहोने गुलामी का दुख देखा ही कहाँ है ……. जबतक ये चरम सीमा तक तबाह नहीं हो जाते, इनकी अंतरात्मा नहीं जग सकती । कोई व्यर्थ hin हर किसी के भाग्य का दुख क्यूँ झेले, क्या इसीलिए कि जीवन के बाद मरणोपरांत भी उसकी दुर्दशा हो । मुझे आज बहुत पहले पढे हुए किसी अङ्ग्रेज़ी राइटर के शब्द याद आ गए,
    ” If you can’t make them see the light, let them feel the heat.”
    maine yah article padhi. Very moving ….

    Author’s response:

    आपकी सधी हुई प्रतिक्रिया के बाद कुछ कहने को शेष नहीं..ये सही बात है कि हम ग्रहण करने के मामले में कमजोर है..सीखते तभी है जब पानी सर से ऊपर गुजर जाता है.. इतिहास के सबक दुबारा गलती होने तक याद नहीं आते..खैर निराश या नाउम्मीद होना मेरा स्वभाव नहीं है..इसलिए जो बन पड़ता है वो करता चलूँगा ..बाकी का राम जाने..अभी..अभी मैंने किसी से ये कहा इसको भी पढ़ते चले…

    “Contradictions and conflicts are part of any society. However, when they alone come to exist life becomes tough for principled people. Honest people do not need much from majority. A little encouragement and words of appreciation conveyed to them in honest way are enough to make them part and parcel of our society. However, we have stopped doing even that. The evil vrittis lurking inside us prevent us from promoting goodness of such souls..

    However, let’s not be discouraged. Remember, a ray of light is enough to penetrate the darkest corner. Let’s play our role to perfection and I hope it would definitely bring better days for right people.”

  10. Thanks Urmila Haritji, New Delhi; Girish Anjanji, Human rights activist at B.S.2, Agra; Vinod Dubey, Mumbai, Sanjay Singh Chaudharyj, Pramod Kumar, Lucknow, Swami Prabhu Chaitanya, Patna,Himanshu B.Pandey, Siwan(Bihar), Gaurav Kabeer, New Delhi,Vijay Singh Paliwal, Kota, Arpit Mehtaj and Neelam Sharma, Udaipur, for appreciating the article..

  11. Anand G.Sharma, Mumbai, said:

    या बेईमानी तेरा आसरा – क्योंकि – पापी पेट का सवाल है |

    Author’s response:

    जय बोलो बेईमान की…जय बोलो…

  12. Rajendra Nath Mehrotra said:

    Kamjor per Imandaar aadmi tabhi theek thaak raah sakta hai jaab mazboot aur Imandar log unki madaad aur raksha karen per aisa hota nahi aur kamjor logon ke liye aaj ki duniya mein sukoon ke layak koi jagah nahi hai.

    Sirf imandari bina pahiye ki car hai jo khud chaal nahi sakti.

    Author’s Response:

    आप थोडा पहले जाए तो प्राचीन व्यवस्था में ऐसे लोग राजा के विशेष सरंक्षण के दायरे में रहते थें..आज के ज़माने में लोग ईमानदार क्यों रहे जब उनकी हालत इस ईमानदारी की चलते फटे कपडे जैसी हो जाए जिसमे पैबंद लगाने की भी गुंजाइश ना बची रही..

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