भूख और बचपन से एक साक्षात्कार !!!

अभाव में भी मुस्कुराता बचपन !!

अभाव में भी मुस्कुराता बचपन !!

कुछ दिन पहले अपने मित्र प्रखर पाण्डेय जो ग्वालिअर में बसे एक बहुत शानदार कवि है से एक संवाद के दौरान पंकज रामेन्दू मानव जी की कुछ कवितायेँ सामने उभर कर आई. पढ़ते ही ये दो कविताये मेरे मन के बहुत अन्दर तक समा गयी. तभी सोच लिया था की इसे अपने इस वेबसाइट पर इनको जगह दूंगा ताकि ये कुछ और उर्वर दिमागों तक पहुच सके. शायद आदमी को इस कदर झकझोर कर रख देने की ताकत सिर्फ कविता में ही होती है. पंकज जी की इस अति सूक्ष्म संवेदनशीलता को सराहने के लिए शब्द कम है.

ये बताना आवश्यक है कि इसमें से पहली कविता “बचपन” जो कि एक पुरस्कृत कविता है और कवि का परिचय, जो कविता के नीचे मैंने दिया है, पहले पहल हिंदी युग्म नाम के वेबसाइट पर पर प्रकाशित हुई है. हिंदी युग्म इस वजह से विशेष साभार का अधिकारी है.

*********************************************************************
    बचपन

                             ***************************

हंसता बचपन, गाता बचपन
जगता और जगाता बचपन,
धूल मिट्टी से सना हुआ
जीने के गुर सिखाता बचपन.
जोश जुनूं से भरा हुआ,
सबसे प्यार जताता बचपन।

कई और रूप हैं बचपन के
द्रवित स्वरूप हैं बचपन के
कबाड़ी बचपन, दिहाड़ी बचपन
कपड़ा सिलता बचपन, कचरा बीनता बचपन
किताब बेचता बचपन, हिसाब सीखता बचपन
हाथ फैलाता बचपन, दूत्कार खाता बचपन
पान खिलाता बचपन, चौराहे की तान सुनाता बचपन
लुटा हुआ सा बचपन, पिटा हुआ सा बचपन
दो जून की जुगाड़ में जुटा हुआ सा बचपन

बचपन रिक्शेवाला, बचपन जूतेवाला
बचपन कुल्फीवाला, बचपन होटलवाला
बचपन चने-मुरमुरेवाला, बचपन बोतलवाला
चाय बेचता बचपन, बोझा खींचता बचपन
गर्मी से लुथड़ा बचपन, सर्दी में उघड़ा बचपन
बूढ़ा बचपन बिना रीढ़ का कुबड़ा बचपन
सहमा बचपन, सिसका बचपन
पहाड़ी ज़िंदगी से बिचका बचपन

बचपन एक विवाद सा, घाव से निकले मवाद सा
बचपन एक बीमारी सा, जी जाने की लाचारी सा
बचपन थका हुआ सा, बचपन झुका हुआ सा
जीवन की पटरी पर, बचपन रुका हुआ सा

जूझता सा बचपन, टूटता सा बचपन
बिखरता सा बचपना, अखरता सा बचपन
अपने अस्तित्व को ढुंढता सा बचपन
कचरे सी ज़िंदगी में खुशिया तलाशता
हमसे कई सवाल पूछता सा बचपन ।

पंकज रामेन्दू मानव

************************************************

भूख ऐसी ही होती है

भूख की उम्र नहीं होती..जात नहीं होती..

भूख की उम्र नहीं होती..जात नहीं होती..

जब घुटने से सिकुड़ा पेट दबाया जाता है
जब मुँह खोल कर हवा को खाया जाता है
जब रातें, रात भर करवट लेती हैं
जब सुबह देर से होती है
जब चाँद में रोटी दिखती है
तब दिल में यह आवाज़ उठती है
भूख ऐसी ही होती है
भूख ऐसी ही होती है

जब गिद्ध मरने की राहें तकता है
जब कचरे में भी कुछ स्वादिष्ट दिखता है
जब कलम चलाने वाला बार-बार दाल-चावल लिखता है
जब एक वक़्त की खातिर जिगर का टुकड़ा बिकता है
जब रातें सूरज पर भारी होती हैं
तब दिल से एक आवाज़ होती है
भूख ऐसी ही होती है
भूख ऐसी ही होती है

जब हांडी में चम्मच घुमाने का कौशल दिखलाया जाता है
जब चूल्हे की आँच से बच्चों का दिल बहलाया जाता है
जब माँ बच्चों की कहानी सुना, फुसलाती है
जब सेहत की बातें बता ज़्यादा पानी पिलवाती है
जब रोटी की बातें ही आनंदित कर जाती हैं
तब दिल से एक हूक उठती है
भूख ऐसी ही होती है
भूख ऐसी ही होती है

जब पेट का आकार बड़ा सा लगता है
जब इंसान भगवान पर दोष मढ़ता है
जब भरी हुई थाली महबूबा लगती है
जब महबूबा सुंदर कम स्वादिष्ट ज़्यादा दिखती है
तब दिल से एक हूक उठती है
भूख ऐसी ही होती है
भूख ऐसी ही होती है

जब एक टुकड़ा ज़िंदगी पर भारी लगता है
जब तिल-तिल कर जीना लाचारी लगता है
जब बातें रास नहीं आती
जब हंसना फनकारी लगता है
जब एक निवाले पर लड़ती भौंक सुनाई देती है
तब दिल से एक हूक उठती है
भूख ऐसी ही होती है
भूख ऐसी ही होती है

पंकज रामेन्दू मानव

****************************************************

कवि पंकज रामेन्दू मानवजी का परिचय:

इनका जन्म मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में २९ मई १९८० को हुआ। इनको पढ़ने का शौक बचपन से है, इनके पिताजी भी कवि हैं, इसलिए साहित्यिक गतिविधयों को इनके घर में अहमियत मिलती है। लिखने का शौक स्नातक की कक्षा में आनेपर लगा या यूँ कहिए की इन्हें आभास हुआ कि ये लिख भी सकते हैं। माइक्रोबॉयलजी में परास्नातक करने के बाद P&G में कुछ दिनों तक QA मैनेज़र के रूप में काम किया, लेकिन लेखक मन वहाँ नहीं ठहरा, तो नौकरी छोड़ी और पत्रकारिता में स्नात्तकोत्तर करने के लिए माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय जा पहुँचे। डिग्री के दौरान ही ई टीवी न्यूज़ में रहे। एक साल बाद दिल्ली पहुँचे और यहाँ जनमत न्यूज़ चैनल में स्क्रिप्ट लेखक की हैसियत से काम करने लगे। वर्तमान में ‘फ़ाइनल कट स्टूडियोज’ में स्क्रिप्ट लेखक हैं और लघु फ़िल्में, डाक्यूमेंट्री तथा अन्य कार्यक्रमों के लिए स्क्रिप्ट लिखते हैं। कई लेख जनसत्ता, हंस, दैनिक भास्कर और भोपाल के अखबारों में प्रकाशित।

श्रोत: हिंदी युग्म

*********************************

चलते चलते गुलाल का ये गीत भी सुन ले..इसके बोलो की जितनी भी प्रसंशा की जाए कम है..जिस तूफानी और जोशीले अंदाज़ में गाया गया है ये गीत उसके तो क्या कहने. पियूष मिश्र जो की इस फिल्म के गीतकार और संगीतकार भी है बधाई के पात्र है कि इन्होने भारतीय फ़िल्म संगीत के इतिहास को इतना दुर्लभ गीत दिया. और पता है इस गीत को गाया किसने है ? खुद पियूष मिश्र ने :-)…इसके बोल यहाँ पे है.

श्रोत साभार:

हिंदी युग्म

चित्र साभार:

Pics One

Pics Two

17 responses

  1. Thanks Gopal S. Dandotiyaji, Mumbai and Sahil Kumar, Ghaziabad, for reading the poem…

  2. Words of Thanks For Ramchandra Pandeyji,Kanpur,:

    आपको धन्यवाद की इन कडुवे जस्बात के तह में जाकर आपने कुछ महसूस करने की कोशिश की ..

  3. Words of Thanks For Dharmendra Sharmaji, UAE, :

    धन्यवाद धर्मेन्द्र भाई..एक कोशिश रहती है सत्य के आसपास भटकने की ..आप जैसे मित्र इस भटकन को सफल बना देते है…

    ******************
    Dhanyavad Chaitanyaji..

  4. Words For ‎Priyanka Kumari, Patna, Bihar:

    कविता में व्यक्त एहसास को आत्मसात करने के लिए धन्यवाद ..बदलाव की पहल होती है इस तरह के अहसास को ग्रहण करने से..

    *****************

    Words Himanshu B. Pandey, Siwan ,Bihar:

    आप बहुत जागरूक लगते है हिमांशुजी..

  5. Rajesh Kumar Pandey, New Delhi, said:

    Sahi kaha apne, jiska pet bhara hota hai wo bhuk ke bare main nahi jan sakta..

    ********************

    Author’s Response:

    ‎बस एक संवेदनशीलता चाहिए…खलता यही है कि हम बिल्कुल संवेदना शुन्य हो गए है..

  6. Many Thanks To Rakesh Pandey,Bhopal, for reading these poems…

  7. ‎Words of Thanks for Kumar Vidrohiji, New Delhi,:

    तो चलिए आपने भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी🙂

    ***************************
    Words of Thanks for Lalita Jha, New Delhi, :

    आप की जागरूकता एवेरग्रीन है..

    ********************

    Thanks Rekha Pandey, Mumbai, for reading this poem..

    Dhanyavad Neeraj Dayalji, New Delhi, ..

    Dhanyavad Satyendra Kumarji.

  8. Thanks to Inderjit Kaurji, Jalandhar, Harihar Pandey, Udaipur,Sanjay Pandey, Bakshinder Singhji, Gwalior, Shashikant R Pandey, Rakesh Pandey Gopal S. Dandotiyaji, Satyanarayan Mishra, Sandeepji,Sindh, Pakistan, and Jayprakash Singhji,

  9. Sanjay Pandeyji:

    हा बहुत सुन्दर पोस्ट है भाई एक दम यथार्थ …

    My response to Sanjay Pandeyji:

    कोशिश रहती है यथार्थ के आसपास रहने की हमेशा..

  10. @Personal Concerns

    Many thanks my dear admirer…

  11. Sudhir Jha, Bhilai, said:

    क्या यह भूखे-नंगों की है बस्ती ?
    जो दुखियारी पर दुःख है हंसती !
    भूख अगर ऐसा होता है ? …. तो,
    हे राष्ट्र-विधाता (अवाम) ! ….
    तू क्यों सोता है ?????
    सोता रहेगा जब तक तू…..
    तब तक सोती रहेगी,
    इस राष्ट्र की तकदीर — !
    जाग ज़रा और मिलकर देख,
    बदल जायेगी पूरी तरह से……
    इस राष्ट्र की तस्वीर —- !!

    ****************************
    Author said:

    कोशिश तो की जा रही है इस तस्वीर को बदलने की ..सबको अगर तरक्की में से हिस्सा मिले तो क्या बात है ..लेकिन तरक्की की राह उन लोगो के पास से गुज़र रही है जिनके पास पहले से सब है …ये अफ़सोसजनक है .

    *******************
    Sudhir Jha, Bhilai, said:

    डीयर फ्रेंड , अरविन्द के पाण्डेय साहेब ….. अपनी तरक्की और खुश -हाली के लिए दूसरों को आड़े हाथ लेकर कसूरवार ठहराना और कभी तकदीर तो कभी हालात को दोष देने की प्रवृत्ति से हमें उबरकर बाहर आने की जरूरत है —!…

    Author said:

    मेरा भी यही कहना है

  12. Rakesh Pandey said:

    यक़ीनन आपका ये पोस्ट ध्यान आकर्षित करता है …और कुछ पल के लिए एक सोच आ जाती है दिमाग में ..

    Author’s response:

    कुछ पल के लिए नहीं राकेशजी बल्कि इस सोच को स्थायी बना के कुछ रचनात्मक करे ..चलिए पाण्डेय लोगो का मान बढ़ाने के खातिर ही कुछ कर जाए …

  13. Anupam Verma, New Delhi,

    एक कडवा सच ..

    भूख ऐसी ही होती है………!!!!!!!!

    ********************
    Anupam Vermaji

    कुछ भूखे रह जाते है पर हमारे अन्न सड़ते रहते है…..

  14. @Prakhar Pandey

    ‎Prakhar Pandey, Gwalior, said:

    धन्यवाद अरविन्द जी …..

    *******************

    Poet’s response:

    Thanks Prakhar Pandeyji..I hope you are happy that I did not make fake promise of publication… I must say that this article generated huge response…

  15. Thanks Ashok Miani, Maharashtra, and Jeniffer Massi, Chandigarh, for liking it..

  16. Thanks Kumar Vidrohiji, New Delhi, and Amarnathji, Hazaribagh, Jharkhand, India…

  17. Thanks to Arav Vasava , Baroda, and Rupesh Chaddha, Kota.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

The great Rudolf Steiner Quotes Site

Quotes and fragments from the work of the great visionary, thinker and reformer Rudolf Steiner

Bhavanajagat

Welcome to Noble Thoughts from All Directions to promote the well-being of man and to know the purpose in Life.

Serendipity

Was I born a masochist or did society make me this way? I demand unconditional love and complete freedom. That is why I am terrible.

John SterVens' Tales

Thee Life, Thee Heart, Thee Tears

Indowaves's Blog

Just another WordPress.com weblog

Una voce nonostante tutto

Ognuno ha il diritto di immaginarsi fuori dagli schemi

Personal Concerns

My Thoughts and Views Frankly Expressed

I love a lot

Just another WordPress.com site

the wuc

a broth of thoughts, stories, wucs and wit.

A Little Bit of Monica

My take on international politics, travel, and history...

Atlas of Mind

Its all about Human Mind & Behavior..

Peru En Route

Tips to travel around Perú.

Health & Family

A healthy balance of the mind, body and spirit

मानसिक हलचल

ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं यह ब्लॉग लिखने के अलावा गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। रेलवे से ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर्ड अफसर।

Monoton+Minimal

travel adventures

Stand up for your rights

Gender biased laws

The Bach

Me, my scribbles and my ego

Tuesdays with Laurie

"Whatever you are not changing, you are choosing." —Laurie Buchanan

%d bloggers like this: