किस्मत के खेल निराले मेरे भईय्या !!!

ravi

कहते है वक्त किसी के लिए नहीं रुकता और ना इस वक्त की परवाह करता है किसी के उपलब्धियों की. वो नियत समय पे सबको इतिहास बना के ही छोड़ता है. इधर कई महीनों से ऐसा प्रतीत हो रहा कि जैसे किसी ने इश्वर की दुनिया में किसी ने कान्ट्रेक्ट ले लिया है मृत्युलोक से सभी रचनात्मक लोगो को एक के बाद अपनी दुनिया में वापस बुलाने को. अब इसे देखिये इस खबर से पहले कि महान संगीतकार रवि अब नहीं रहे मै उन्ही के जन्मदिन पर विविध भारती पर उन पर केन्द्रित कार्यक्रम सुन रहा था जिसमे वे अपने साहिर साहेब से संबंधो पर विस्तार से चर्चा कर रहे थे. ये कितनी बड़ी बिडम्बना है कि जिनकी बात आप कुछ देर पहले सुन रहे होते है वे कुछ ही पल के बाद हमेशा के लिए खामोश हो जाते है.

रविजी का मै कद्रदान रहा हूँ. इन्होने जब भी साज छेड़ा दिल के तारो में एक कम्पन सी पैदा हो जाती थी. जो भी इनके संगीत से परचित है उसको पता होगा कि इनके संगीत में जरा सा भी पेंच नहीं था. इनकी धुनें बहुत ही सहज होती थी हर एक खूबसूरत अफ़साने की तरह. इसलिए जब भी इनका गीत बजता है आप कुछ समय के लिए इस मायावी जगत के उलझनों से ऊपर उठ जाते है. इस तरह के कुछ गुणी संगीतकारों ने कम से कम इस बात कि पुष्टि कर दी कि अच्छे संगीत के लिए एक विशाल आर्केस्ट्रा की जरूरत नहीं होती. कम साजो के इस्तमाल से भी बहुत दुर्लभ गीत बन सकते है. रविजी उस युग का प्रतिनिधित्व करते थे जिसमे संगीत अपने शुद्धतम स्तर पे मौजूद था. मतलब एक अच्छे संगीत के तत्त्वों से लोग अच्छी तरह से परिचित थे. साठ के दौर के एक खासियत ये भी थी कि अगर अच्छे संगीतकार मौजूद थे तो उस अच्छे संगीत के सापेक्ष अच्छे गीतकार भी थे. इन दोनों के बेहतरीन मिलन ने उस दौर को कभी ना मिटा पाने वाला युग बना दिया.

जरा आज देखिये क्या होता है. नाम बड़े और दर्शन छोटे. हर कोई अजीबो गरीब प्रयोग कर रहा है उन शब्दों पर जो शायद एक वर्ग ही समझ पाता है. पर गुजरे वक्त में शायद ऐसा नहीं होता था. मानवीय भावनाओं को सही सही गीतकार व्यक्त करते थें और फिर उन पर संगीतकार कितने घंटो बैठकर उसे एक अच्छी धुन में पिरोते थे. ऐसा नहीं था कि पैसे का मोल उन्हें ना पता था पर रचनात्मकता का स्तर पैसो की जरुरत से प्रभावित नहीं था. शायद यही वजह थी कि इनका संगीत वक्त के प्रवाह के शायद बहता रहा. इनकी चमक कभी धूमिल नहीं हुई. कल ही किसी शादी में मै ” ऐ मेरी जोहराजबीं” को रीमिक्स में ढला हुआ सुन रहा था. कहने के मतलब यही है कि जिन्होंने लगन और अपनी समझ को पैसो तले गिरवी नहीं रखा वे वक्त के प्रवाह से ऊपर उठ गए. ये भी मै बता दूँ रवि ही एक ऐसे संगीतकार रहे जिन्होंने कम से कम चालीस वर्षो तक संगीत दिया पर किसी भी युग में यह नहीं लगा कि जैसे इनका संगीत चुक गया है या ये कि ये वक्त के साथ  एडजस्ट नहीं कर पा रहे है. आप साठ के दशक में आई गुमराह का संगीत सुने और अस्सी के दौर में आई इनकी फिल्मे तवायफ, निकाह,दहलीज़ और आज की आवाज़ के गीत सुनिए आप को वही मोहकता और मादकपन मिलेंगा इनके संगीत में.

bharosa 1963

हमराज, दो बदन, गुमराह, वक्त, एक फूल दो माली, आँखें, आदमी और इंसान, भरोसा, घूंघट और चौदहवी का चाँद  जैसी क्लास्सिक फिल्मो में अद्भुत संगीत देने वाला आज हमारे बीच से चला गया. यकीन नहीं होता मुझे. खैर इनका ही रचा एक गीत है जिसने सिर्फ मुझे ही नहीं बहुतो को विपरीत समय में भी कैसे रहना है इसकी सीख देता है आज बार बार मेरे अन्दर प्रकट हो रहा है. आज मुझे फिर इस गीत ” ना मुंह छुपा के जियो और ना सर झुका के जियो” की शरण में जाना पड़ रहा है थोड़ी सी मुस्कान के लिए. इस महान आत्मा को प्रभु शान्ति प्रदान करे.

इनके कुछ गीत जो मुझे बहुत पसंद है:

१. तुम अगर साथ देने का वादा करो

२. चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाए हम दोनों

३. तुझे सूरज कहू या चंदा

४. हम जब सिमट के आप के बाहों में

५. बहुत देर से दर पे आँखे लगी थी


६. ज़िन्दगी इत्तेफाक है

७. दिल ही दिल में ले लिया

८. एक अधूरी सी मुलाक़ात हुई थी जिनसे

९. दिल की ये आरजू थी

१०. गैरो पे करम अपनों पे सितम

gumrah_1963

Pics credit:

Pic One

Pic Two

Pic Three

10 responses

  1. प्रभु चैतन्य का विशेष धन्यवाद जिन्होंने श्रोता बिरादरी पर बहुत सारे सुंदर गीतों का लिंक दिया जिसमे शामिल गीत है प्यार का सागर, दिल्ली का ठग, घूघंट और टावर हाउस चलचित्रों से
    प्रभु चैतन्य जी ने उन प्रमुख फिल्मो की सूची भी दी है जिसमे शामिल है रवि का सुमधुर संगीत .

    वैसे तो रवि (शंकर शर्मा) जी ने
    तो लगभग 200 फिल्मों में संगीत दिया है
    परन्तु इन फिल्मों के
    कुछ गाने / धुन तो अप्रतिम हैं |

    एक साल (1957)
    दिल्ली का ठग (1958)
    घर संसार (1958)
    चिराग कहाँ रौशनी कहाँ (1959)
    चौदहवीं का चाँद (1960)
    घूँघट (1960)
    माडर्न गर्ल (1961)
    घराना (1961)
    नजराना (1961)
    प्यार का सागर (1961)
    राखी (1962)
    टावर हाउस (1962)
    आज और कल (1963)
    गुमराह (1963)
    नर्तकी (1963)
    उस्तादों के उस्ताद (1963)
    ये रास्ते हैं प्यार के (1963)
    भरोसा (1963)
    प्यार किया तो डरना क्या (1963)
    कौन अपना कौन पराया (1963)
    दूर की आवाज़ (1964)
    शहनाई (1964)
    काजल (1965)
    खानदान (1965)
    वक़्त (1965)
    दो बदन (1966)
    दस लाख (1966)
    फूल और पत्थर (1966)
    सगाई (1966)
    हमराज़ (1967)
    मेहरबान (1967)
    नयी रौशनी (1967)
    आँखें (1968)
    दो कलियाँ (1968)
    नील कमल (1968)
    आदमी और इंसान (1969)
    एक फूल दो माली (1969)
    धड़कन (1972)
    धुंध (1973)
    एक महल हो सपनों का (1975)
    गंगा तेरा पानी अमृत है |

    *************

    बहुत धन्यवाद उन लोगो के लिए जिन्होंने इस पोस्ट को पसंद किया..कुछ उल्लेखनीय नाम है प्रभु चैतन्य, एम आर ए अवाइडजी, धीरेन्द्र और अनुपम वर्माजी..

    *******************************

  2. कल यूनुस भाई ने फोन पर रवि साहब के निधन का समाचार बताया तो बहुत दु:ख हुआ। पिछले कुछ महीनों में जगजीत सिंहजी, सुल्तान खान साहब, भूपेन हजारिका और कितने महान कलाकारों ने इस दुनिया को अलविदा कहा और अब रवि साहब! पता नहीं भगवान को अचानक एक ही साथ इतने सारें सुरीले लोगों को एपने पास बुलाने की क्या जरूरत पड़ गई!
    रवि साहब को हार्दिक श्रद्धान्जली।
    @ अरविन्द जी,
    धूल का फूल फिल्म के संगीतकार मेरी जानकारी के हिसाब से एन दत्ता हैं, शायद मैं गलत भी हो सकता हूँ।

  3. कल यूनुस भाई ने फोन पर रवि साहब के निधन का समाचार बताया तो बहुत दु:ख हुआ। पिछले कुछ महीनों में जगजीत सिंहजी, सुल्तान खान साहब, भूपेन हजारिका और कितने महान कलाकारों ने इस दुनिया को अलविदा कहा और अब रवि साहब! पता नहीं भगवान को अचानक एक ही साथ इतने सारे सुरीले लोगों को अपने पास बुलाने की क्या जरूरत पड़ गई!
    रवि साहब को हार्दिक श्रद्धान्जली।
    @ अरविन्द जी,
    धूल का फूल फिल्म के संगीतकार मेरी जानकारी के हिसाब से एन दत्ता हैं, शायद मैं गलत भी हो सकता हूँ।

    1. @Sagar Naharji

      सागर साहब लगता है ईश्वर के लोक में अच्छी आत्माओ की कमी हो गयी है..इसलिए इन सब अच्छे लोगो को अपने पास बुला रहा है एक के बाद एक. हो सकता है जैसा कुछ लोग कह रहे है इस साल प्रलय आने वाला है लिहाजा पृथ्वी को अच्छे लोगो से विहीन कर दो. अब कौन जाने ईश्वर का अजेंडा क्या है ? हम तो केवल शोक प्रकट कर सकते है इन भले लोगो के चले जाने पर.

      सागर साहब आप बिल्कुल सही है.. धूल का फूल में तो एन दत्ता ही है.. मै साहिर साहेब के चक्कर में गड़बड़ा गया🙂 वैसे ये बहुत अच्छा लगा ये देखकर कि कुछ लोग तो है जो इस ईमानदारी से पढ़कर उनकी गलतियों को इंगित करते है. उम्मीद है आप यूँ ही पढ़कर अपना अमूल्य विचार प्रकट करते रहेंगे.

  4. Some Significant Happenings Took Place On Shrota Biradari On Facebook.

    ************************************************************************************

    I need to give special thanks to all conscious and eminent readers who came to make some very good remarks on this post.

    Prabhu Chaitanyaji came to add many beautiful songs with their video links. The songs from movies like Ek Saal, Chaudhvin Ka Chand, Dilli Ka Thug and Shehnai, Pyar Ka Sagar and Tower House.

    Prabhu Chaitanyaji said:

    गाने आपको पसंद आए !
    यही तो पुराने दिनों की खासियत है !
    उन दिनों सभी संगीतकार
    अपना सर्वोत्तम देने की कोशीश करते थे |
    ये तो रवि जी के कुछ चुने हुए नगमे हैं |

    **********************

    Sagar Nahar On Shrota Biradari said:

    दुख:द समाचारों से जुड़ी पोस्ट पर like करना बड़ा मुश्किल प्रतीत होता है।

    My response to Sagar Naharji:

    आप बिल्कुल सही है नाहरजी ..इसी कशमकश मै हमेशा रहता हूँ कि ऐसे दुखद खबरों को कैसे लाइक किया जा सकता है और खीज होती है ये देखकर कर कि फेसबुक पर एक तो लोग कैसी भी खबर हो दनादन लाइक कर देते है और दूसरा पढ़ते भी नहीं लेख को पर अपना लाइक जरूर टपका देते है.

    खैर यहाँ पर लाइक करना इस पोस्ट को मै उचित मानता हूँ क्योकि यहाँ पे रविजी के संगीत में योगदान का उल्लेख है और लाइक करके आप इनके योगदान के महत्व को दर्शा रहे है..

    आप के लिए ये दो गीत काजल (१९६५) से :

    ये जुल्फ अगर खुल के बिखर जाए तो अच्छा

    http://smashits.com/kaajal/yeh-zulf-agar-khul-ke-bikhar-jaye/song-20078.html

    छु लेने दो नाजुक होठो को :

    http://smashits.com/kaajal/chhoo-lene-do-nazuk-honthon-ko/song-20077.html

    **************

    I also need to add some names who read and appreciated the article on Shrota Biradari.

    Thanks Sulbha Amlathe, Sanjay Vermaji, Daanish Bhaartiji, Manish Joshiji and Sanjay Vermaji.

  5. Dr Ajeet Kumar, New Delhi, said:

    रवि साहब की दिवंगत आत्मा को अपनी भावपूर्ण श्रधांजलि देते हुए मैं उन्हीं का बनाया एक गीत उन्हें समर्पित करता हूँ जो मुझे अति प्रिय है.

    ********************

    My words for Dr Ajeet Kumarji:

    हमराज के गीत तो अनमोल है अजित कुमारजी ..

  6. Sanjeev Joshiji said:

    Jis subha ki taqdeer me likhi ho joodaai, us sub,ha se pehle koi mar jaye to aachha,,,ye zulf aagar,/,,ham bhi dukhi hain pandey ji,,/

    ****************

    My response to Sanjeevji:

    आप सही है ..दुखी है हम सभी.. “सब कुछ लुटा के होश में आये” एक ख़ास गीत है काहे कि इसके दो संस्करण है..एक लता वाला और दूसरा तलत वाला ..तलत वाला ज्यादा मशहूर हुआ जैसा कि अक्सर होता है दोनों संस्करण वाली स्थिति में …

  7. Sahil Kumar on Kavita Basant at Facebook:

    ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे ………..

  8. Was not Aankhein a blockbuster album by Madan Mohan and not Ravi!

    great post anyway!

    Ravi was amazing!

    1. @Personal Concerns

      आप की बात अपनी जगह सही है..पर हमरी बात भी सुनिए तनिक🙂 साहब देवेन्द्र गोयल की आँखें (१९५०) मदन मोहन की पहली फ़िल्म थी जिसमे उन्हें स्वतंत्र रूप से फ़िल्म में संगीत देने का काम मिला..इसमें बहुत हिट गीत थे..इसका तो अल्बम भी मेरे पास है🙂

      खैर उसके बाद रामानंद सागर की आँखें आई १९६८ में जिसमे रवि/साहिर थे ..क्या गीत थे इसके साहब..फिर डेविड धवन की आँखे १९९३ में खूब चमकी इतनी की ब्लाकबस्टर बन के उभरी ..बन्दर को भी धन्यवाद🙂 और उसके बाद अमिताभ वाली आँखे आई २००२ में जिसमे अक्षय कुमार और अर्जुन रामपाल भी थे..

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