शहरयार की जिंदगी के त्रिकोण का चौथा कोण: अपने जीवन साथी से अलगाव !!


शहरयार की जिंदगी के त्रिकोण का चौथा कोण?

शहरयार की जिंदगी के त्रिकोण का चौथा कोण?


मेरे संगीत और रेडियो की दुनिया में विचरणे वाले मित्रो में से एक ख़ास मित्र अनुरागजी शर्माजी ने मुझे आज सुबह सुबह शहरयार से जुड़े एक लेख का लिंक दिया जिसमे  काफी ह्रदय विदारक घटनाओ का उल्लेख है.  इस लेख में शहरयार की पूर्व पत्नी नजमा साहिबजी  अपना दुःख प्रकट करते हुए इस बात का उल्लेख करती है कि ” शहरयार शायद एक अच्छे शायर जरूर हो सकते हैं,  अदब के आला-तरीन एजाज [सम्मान] भी मिल सकते हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं कि वे एक बा-अदब इंसान भी हों। वे एक अच्छे शौहर और एक अच्छे बाप नहीं बन सके.”

” रातों को शहरयार अमूमन क्लब में रहते थे। वहा ताश और शराब के शगल, रात में किसी भी वक्त घर लौटना, घर वालों की नींद खराब करना, बच्चों को आधी रात घर से बाहर निकालना, शराब के नशे में या बगैर नशे के चीखना-चिल्लाना, घर सर पर उठा लेना। मैं, मेरे बच्चे जिल्लत के इस अहसास से दोचार थे।किसी तरह मैं खुद पर काबू रखके जवाब नहीं देती थी। शाम से रात तक बच्चों को पढ़ाने-लिखाने और देखभाल का काम करती थी। बच्चों के जेहन पर इन हालात का बुरा असर हो रहा था और मेरे जेहन पर भी। कभी बच्चे बीमार पड़ते या मैं पड़ती तो समझते कि मैं या बच्चे पागल हो गए हैं और फौरन घर से बाहर फरार हो जाते।जब मैंने महसूस किया कि मेरा और बच्चों का जेहनी तवाजुन [मानसिक संतुलन] कायम नहीं रह पाएगा तो मैं अलग होने के बारे में सोचने लगी। तो एक दिन शहरयार बोले, ‘अलग हो गई तो लोग नोच खाएंगे तुम्हें!’ एक दिन बोले, ‘आइ वाट टु मर्डर यू.. लेकिन, तुम तो मजलूम बन जाओगी!”

Shaharyar's  Former Wife Najmaji

Shaharyar's Former Wife Najmaji

 इससें तो यही समझ में आता है कि तस्वीर के कई पहलु होते है.  मतलब त्रिकोण का चौथा कोण भी हो सकता है. लेकिन  मै पाठको का  ध्यान दूसरी तरफ दिलाना चाहूँगा और मुझे इस बात का एहसास है कि आप सब  इस पहलु से वाकिफ होगे. यद्यपि  नजमा साहिबाजी,  शहरयारजी की पत्नी, से मेरी पूरी हमदर्दी है पर क्या आपको नहीं लगता कि रचनात्मक लोगो की जो बेमेल जिंदगी होती है वो अक्सर घरेलु सांचे में फिट नहीं होती ? क्या ऐसी ही शिकायत गाँधी के आचरण से गांधी के पुत्रो को नहीं थी?  उनके बेटो ने भी उन पर परिवार की उपेक्षा का आरोप लगाया था ? मधुबाला के दिल में भी शायद इस बात कि कचोट थी कि किशोर कुमार को थोडा वक्त और देना चाहिए था और वो भी तब जब किशोर साहब ने देख रेख में कोई लापरवाही ना बरती थी. फिराक गोरखपुरी के सम्बन्ध भी अपनी पत्नी से ठीक नहीं थे और उनकी पत्नी का भी यही कहना था कि फिराक उनसे बहुत क्रूरता से पेश आते थे और उन्हें पीटते भी थे. मै किसी के गलत हरकतों को जस्टिफाय नहीं कर रहा हूँ पर यकीनन कही नहीं कही पति पत्नी के सोच में जमीन आसमान का फासला अक्सर ऐसी घटनाओ की परिणिति में खत्म होता है. अक्सर एक बेहतर सोच में अग्रसर व्यक्तित्व घरेलु संकीर्ण मान्यताओं के साथ सामान्य सम्बन्ध नहीं बना पाता.  मतलब दोनों का निर्वाह एक साथ एक समय में बराबरी से निर्वाह करना अक्सर संभव नहीं हो पाता. अब इससें क्या मतलब निकालना चाहिए ? 

लेकिन इसका एक दूसरा पहलु भी है. कितना इन पत्नियों की बात में कडुवी सच्चाई है और कितनी बनावट शामिल है ये कहा नहीं जा सकता ? बहुत संभव हो इनकी अपनी संकीर्ण सोच एक रचनात्मक ह्रदय के साथ तालमेल ना बना पायी और अपनी नाकामयाबी छुपाने के लिए पति की गैर मामूली हरकतों को बढ़ा चढ़ाकर पेश किया.. आप कभी पत्नियों की डिवोर्स याचिका देखे तो समझ में आएगा कि कैसे झूठे इल्जाम लगाती है पत्निया !!!

खैर नजमा साहिबा से मेरी पूरी हमदर्दी है और उनके दुःख को मै कम कर के नहीं आंक रहा हूँ. एक संतुलन तो होना ही चाहिए घर और बाहर की जिंदगी में. पर इस बात का निर्धारण करना बहुत कठिन है कि ऐसा इरादतन होता है या स्वाभाविक रूप से सोच और कर्त्तव्य निर्धारण की परिभाषाओ में फर्क की वजह से. सनद रहे एक रचनात्मक सोच रखने वाले इंसान  की सोच आम इंसान से भिन्न होती है. इसलिए तालमेल ना हो ऐसा बहुत संभव है. इसके लिए किसी को खासकर रूप से जिम्मेदार ठहराना ठीक नहीं क्योकि सीने में जलन यूँही नहीं पैदा होती अगर सोच या रूह सीमित होती है तो. 

तो क्यों ना सुन ले ये अमर गीत जिसने शहरयार को पहचान तो दी ही पर जयदेव के संगीत सफ़र में एक नया मोती जड़ा.

श्रोत एवम चित्र आभार:

जागरण याहू 

Pic One 

Pic Two 

15 responses

  1. Dharmendra Sharma | Reply

    It proves only one thing, which was well expressed by Goswami Tulasidas Ji, “Sumati kumati sabke ur rahahin”.

    1. @Dharmendra Sharmaji

      It’s also prove one more thing..It’s virtually impossible to trace the designs of Maya unless you have the Grace of Lord. You cannot decipher the ironies of life unless you have the blessings of evolved souls…That’s why when viewed from lower angles the contradictions in life of Shahryar baffles us.

  2. These events can be a part of any domestic life and therefore we cannot be judgemental about the artist that Shahrayar was. He was a great artist is what matters to the art lover. He might have been a very different person in any other capacity. The two aspects of his personality cannot be necessarily looked at together!

    1. @Personal Concerns

      That’s the perspective I have carved in my article. A writer or any creative person cannot be intercepted from limited angles. Agreed he was a failure in his marital life but that angle cannot be used to determine his creative achievements. It’s logically also not appropriate as these are two different issues.

      It’s hard to imagine that he would have penned such beautiful lines with a lower level of consciousness. The truth is that he evolved to such an extent that he failed to do justice with ordinary domestic affairs. You gain something only when you lose something. True literature has its origin in pain and failures.

  3. बहुत सुन्दर गीत – आभार!

    1. @Anurag Sharmaji

      Thanks Anuragji for this appreciation…It’s your motivation in form of the link dispatched that made me pen this article.

  4. Gyasu Shaikh Said On Facebook:

    नजमा जी आप भी सही हो और शहरयार भी…

    अपने आखिरी साक्षात्कारों में उन्हों ने आपको या बच्चों को लेकर कहीं कोई गिला-शिक्वा नहीं किया था,
    न ही उनके दिल में आप लोगों के लिए कोई अवमानना थी. अपनी आखिरी व्याधियां, तक्लीफें और दुखों को
    उन्हों ने शायद अकेले झेला हो…

    वैसे भी स्वतंत्र मिज़ाज पति कम ही पसंद किए जाते हैं…

    ( In response to Gyasuji’s comment I reiterated my viewpoint addressed to Personal concerns)

  5. Sanjay Verma , site moderator of group Shrota Biradari, Facebook , said:

    तुम्हे ढेर सारा आशीर्वाद …बस ऍसे ही अच्छा काम करते रहो…..

    ***********************
    My response to Sanjayji:

    Thanks Sanjay Vermaji …Your words of appreciation means a lot…

  6. Anurag Sharmaji said on Google+:

    सिफ़्ती अमल वाली पंक्ति तो इतना ही बता रही है कि अनेक जीवन-साथियों की तरह नजमा भी अपने पति को दोषी नहीं ठहरा पा रही है और उनकी हरकतों के लिये किसी और (नारी?) के जादू को ज़िम्मेदार ठहरा रही हैं। यह बात ग़लत हो सकती है मगर रात-बेरात पीकर घर आने के बाद हुड़दंग मचाने की आदत भी सही नहीं हो सकती। एक अच्छा इंसान भी शायर होता है मगर शायरी पर अच्छे होने की शर्त लाज़मी नहीं है.

    ***********************
    My response to Anurag Sharmaji:

    ऐसे मामलो में सच क्या है कोई बता नहीं सकता..पर ये जरूर है कि थोड़ी अधिक समझदारी की जरूरत होती है ऐसे मामलो में.

    और चलते चलते ये बात … के एल सहगल बहुत शराब पीते थे पर अच्छा इसान और इसके साथ पीने वाला भी सहगल तो नहीं हो जाता ना…

  7. Thanks to Prabhu Chaitanya , Sudhir Dwivedi, Kunwar Attryji, Dubeyji and Sheo Kumar Singhji for appreciating the article.

    ********************

    Inderjit Kaur, Jalandhar said:

    Dukhad Pahlu….

    My response to Inderjit Kaurji:

    Pata nahi kyo aadmi ka jeevan aaj ke samay me balanced nahi hota hai!!

  8. Anand Sharmaji said on Google Plus:

    Sir, I beg to differ on this observation that, failure in married life and creative achievement has no direct relationship.

    On the contrary, many poets, writers, scientists, saints achieved zenith of their respective field only because of strained marital life.

    Alas, I could not become a great man, only because of my blissfully married life.

    ********************************

    My response to Anand Sharmaji:

    Well, like always , you have hit the nail on the head…True, in making of Tulsidasji the rebukes of his wife played a great role.. The strained relationships seem to have worked wonders for poets, philosophers. and others. In fact, I have stated the same that the failures attain a new dimension wherein they give birth to newer perceptions.The same failures in ordinary people cripple the lives.

    However, having said that, I must say the genesis of creativity is hard to determine. It’s quite a mysterious process and thus it’s quite possible that even a person like you enjoying “blissfully married life” can emerge as a great writer..So Anandji don’t feel disappointed🙂

  9. Some important conversations on this post on Facebook:

    Dhirendra Mishra said:

    Deciding Marital life’s sucess of a literary personality, cannot be a matter of public domain discussion. A Man so sensitive as Shaharyar must have thought himself about it, more than any other person in the world. Probably the phenomenon which failed is—DESTINY.

    ************************************
    Agreed that it cannot be discussed in public domain but after his wife’s public outburst there can be healthy discussion on the reasons that lead to collapse..It becomes imperative to discuss the whole issue albeit with some concessions which ensures that dignity of people involved remains intact. In this case a discussion is must because the allegations are of serious nature and thus there has to be a fitting explanation so as to keep tab on the vain queries.

    Against this backdrop it becomes necessary to highlight that any creative person has greater obligations towards his cause than getting trapped in narrow domestic concerns. It’s also very clear that creative souls are not negligent towards their personal life but higher consciousness does make it bit difficult for them to take care of their personal lives like any other people on street.

    One just cannot have same parameters to contrast lives of two people residing on different plane of thought.

    In nutshell, it’s very necessary to defend the cause of literary person to highlight the biases of shallow minds or in other words the marital life can be discussed as long it remains within ambit of healthy perspective. The fear of discussion being turned into caricature should not act as limitation as all such fears are subordinate to attempt to uphold the truth.

    And as far as destiny is concerned, I feel it’s a very special word and it just cannot be used to hide the incompetence of limited minds whose foolhardiness led to demise of beautiful relationships. In rarest of rare case you see the role of destiny. More often than not it’s the earthly designs, prejudices and flaws that lead to failure.

    ********************

    Dilip Kawathekarji said:

    Creative Genre in person takes him to a different plateform, perspective and plane where he is sensitive to values and traits for the characters he weaves, but he is not experiencing it with introspection.

    *****************

    My response to Dilip Kawathekarji:

    Your observation is quite interesting ..I will comment on it only after you throw more light on the purport of your words.. I need to hear more on it before I say something…Please make the essence of your words more clearer. It’s a very interesting comment so just wish to have more clarity on it !!

  10. Excerpt from the conversation with Dileep Kawathekarji:

    Dileep Kawathekarji said:

    Sorry for the delay. An artist is a humanoid, or a Human being is an artist. There can not be compartments in his operations with society or with Art & culture. When he is more lop sided on any one side, due to sensetiveness, his handling affairs become erroneous. But it is irony that he understands other’s emoting worlds by teletransporting to that character,analyses very clinically accurate, but fails to dig into his own self and his consciousness. Hence need is to travel inwardly also.

    Arvind K.Pandey said:

    Your observations are really mind blowing..After a long time I am came to read such an astonishing remark. After all, it refers to something unique.

    A writer so effectively portraying the thoughts of others just lacking the capability to trace one’s own flaws can definitely be the possibility but such coincidences in creative person is rare. Often they are as alert to their own flaws the way they come to point in others.

    That I say so because if writer is lacking the capability to honestly get engaged in real introspection his writings will never make a powerful reading.

    So in my eyes, more often than not, this duality in real creative person is missing. Do you think Dilipji a singer like Kishore Kumar could have sung tragic numbers so well without having faced deep sufferings at some point of time?

    ***************************

    Thanks to Sanjay Dixit for liking the post…

  11. Excerpt of conversation with Dhirendra Mishraji:

    Arvind K Pandeyji thanks for your lengthy reply. I did mention a role of Destiny in Failure of personal relation, but my viewed arrow was aimed at Shaharyar’s life only. I did not call all relations fail bcoz of destiny. Thanks for the elaboration, however I too am conscious of limited role of DESTINY.

    *********************

    My response to Dhirendra Misharji:

    Probably you should have read the allegations of his wife and studied the attitude exhibited by Shahryar before attributing the role of destiny in case of Shahryar.

    I need to categorically state that even in case of Shahryar it’s not “Destiny” that caused the collapse but it’s lack of mutual understanding between the couple due to each other’s flawed personalities that caused the collapse.

    May be Shahryar had a lesser role in the failure but it cannot be denied that he did not provide enough space. However, having said that, I need not to delve into details as one of them is not in the picture to defend himself and also because to establish truth in matters related with private lives of couples is not possible unless couples themselves unequivocally establish the facts.

    Dhirendra you should have read the issue thoroughly and meditated upon the facts before regrettably attributing it to “Destiny”. Please go to the link hyper-lined in my article related with Shahryar:

    शहरयार की जिंदगी के त्रिकोण का चौथा कोण: अपने जीवन साथी से अलगाव !!
    http://wp.me/pTpgO-k9

    You know what’s the risk involved in attributing the failures to destiny really is ? Our whole criminal justice system will collapse as criminals will start defending themselves in name of destiny and who knows judges too start giving verdicts in name of destiny. Well , I said that in lighter vein but just imagine the scenario if destiny becomes the ultimate parameter to define the failure and success or for that matter any happening.

    Anyway, thanks a lot for presenting your views.

    **************************

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