शहरयार: सीने में जलन पर फिर भी जिंदगी को समझने वाला सादगीपरस्त शायर

शहरयार का यूँ चले जाना दुखी करता है....

शहरयार  का यूँ चले जाना दुखी करता है.  कुछ महीनों पहले विविध भारती पर जब उनका साक्षात्कार सुन रहा था तो महसूस कर रहा था कि एक संवेदनशील आदमी को कितनी जिल्लत और तकलीफों  का सामना करना पड़ता है और शायद यही अपमानजनक घटनाये उसकी रचनात्मकता को धार  देती  है. पर तब मुझे नहीं मालुम था कि ये आवाज़ अब परमात्मा की आवाज़ में विलीन होने वाली है. शहरयार जो जीवन से जुदा होके भी जीवन की विषमताओ पे पैनी नज़र रखते निहायत सादगीपरस्त इसान थे. इनसे जब ये पूछा गया कि आप ने मुशायरो में जाना क्यों बंद कर दिया तो जवाब आया कि साहब मुशायरो में वाह वाही लूटने वाले तौर तरीके उन्हें नहीं आते. वे उन शायरों में से थे जिन्होंने सस्ती लोकप्रियता पाने के हथकंडो से अपने को ऊपर रखा. वरना आज के इस अंधे युग में सस्ती लोकप्रियता के मोह से ऊपर उठ पाना संभव नहीं.

ये कहना गलत नहीं है कि मुज़फ्फर अली की गमन और उमराव जान ना प्रदर्शित हुई होती तो एक मास अपील जो उन्होंने विकसित की वो संभव नहीं था.  गमन और उमराव जान की ग़ज़ल ने उनको एक लोकप्रिय शायर बनाया. कुछ कुछ साहिर के साथ भी ऐसा ही था. लेकिन ये भी उतना ही सच ही है कि इनका वजूद सिर्फ इन फिल्मी ग़ज़लों से परिभाषित नहीं था वरन इन्होने जीवन की विसंगतियों को जिस इमानदारी से उकेरा इसने इन्हें एक बेमिसाल गज़लकार बनाया. अंजुमन या त्रिकोण का चौथा कोना के गीतों की  लोकप्रियता ने इनकी शायरी को एक जीवंतता सी प्रदान की. इनका जीवन किस कदर उलझाव से भरा था इनकी ग़ज़लों में साफ़ दिखता है यद्यपि इनके जीवन में भौतिक सुखो की कमी ना थी पर एक संवेदनशील प्राणी की आत्मा कब भौतिक सुखो में विलीन हो सकती है!

हम पढ़ रहे थे ख़्वाब के पुर्ज़ों को जोड़ के

आँधी ने ये तिलिस्म भी रख डाला तोड़ के

आग़ाज़ क्यों किया था सफ़र उन ख़्वाबों का
पछता रहे हो सब्ज़ ज़मीनों को छोड़ के

इक बूँद ज़हर के लिये फैला रहे हो हाथ
देखो कभी ख़ुद अपने बदन को निचोड़ के

कुछ भी नहीं जो ख़्वाब की तरह दिखाई दे
कोई नहीं जो हम को जगाये झिन्झोड़ के

इन पानियों से कोई सलामत नहीं गया
है वक़्त अब भी कश्तियाँ ले जाओ मोड़ के

शहरयार इस वर्तमान युग के साक्षी थे जिसमे मानवीय मूल्यों की कोई इज्ज़त नहीं थी. इज्ज़त थी तो सिर्फ पैसो के अश्लील खेल की. इस मूल्यों के क्षय को उन्होंने बहुत संजीदगी से व्यक्त किया है.

ख़ून में लथ-पथ हो गये साये भी अश्जार के
कितने गहरे वार थे ख़ुशबू की तलवार के

बिल्कुल बंज़र हो गई धरती दिल के दश्त की
रुख़सत कब के हो गये मौसम सारे प्यार के 

सीने में जलन पर फिर भी जिंदगी को समझने वाला सादगीपरस्त शायर

वैसे मेरी नज़रो में शहरयार मूलत: व्यक्तिगत  भावनाओं को बड़ी शिद्दत से उभारने वाले शायर थे जिनमे सभी का दर्द झलकता था. ये काबिलियत इनकी रूह की व्यापकता को दर्शाता है.

बिछड़े लोगों से मुलाक़ात कभी फिर होगी 
दिल में उम्मीद तो काफ़ी है यक़ीं कुछ कम है 

अब जिधर देखिये लगता है कि इस दुनिया में 
कहीं कुछ चीज़ ज़ियादा है कहीं कुछ कम है 

शहरयार को मै अपने से जोड़ के देखना चाहू तो शहरयार की यही लाइने मुझे अपने बहुत करीब लगती है. 

दुश्मन-दोस्त सभी कहते हैं, बदला नहीं हूँ मैं। 
तुझसे बिछड़ के क्यों लगता है, तनहा नहीं हूँ मैं। 

उम्र-सफश्र में कब सोचा था, मोड़ ये आयेगा। 
दरिया पार खड़ा हूँ गरचे प्यासा नहीं हूँ मैं। 

पहले बहुत नादिम था लेकिन आज बहुत खुश हूँ। 
दुनिया-राय थी अब तक जैसी वैसा नहीं हूँ मैं। 

तेरा लासानी होना तस्लीम किया जाए। 
जिसको देखो ये कहता है तुझ-सा नहीं हूँ मैं। 

ख्वाबतही कुछ लोग यहाँ पहले भी आये थे। 
नींद-सराय तेरा मुसाफिश्र पहला नहीं हूँ मैं।

 

****************************************

शहरयार  ने बहुत ही कम फिल्मी गीत लिखे पर जो भी लिखा खूब लिखा. ये आपको ” सीने में जलन” (गमन) और “ जिंदगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है मुझे” (उमराव  जान) जैसे गीत सुनने पर एहसास होगा पर इनका लिखा हुआ ” प्यार है अमृत कलश” (त्रिकोण का चौथा कोना) मुझे एक अजीब   सी शान्ति प्रदान करता है और ये महसूस कराता है कि मनुष्य सिर्फ अपनी इच्छाओ से ही नहीं वरन ईश्वर की मर्ज़ी से भी संचालित है.

चित्र आभार:

Pic One
Pic Two

आप  यहाँ शहरयार की कुछ अच्छी गज़ले यहाँ पढ़ सकते है : कविता कोष 

11 responses

  1. thanks for this very nice and moving post!
    just a small correction here.
    Kabhi Kisi ko Muqammal Jahan Nahin Milta is not penned by Shahryar. It is a song written by Nida Fazli!

  2. @Personal Concerns

    Thanks for your timely rectification.. And yes yours consistency in showering compliments is quite touching…

      1. @Personal Concerns
        🙂

  3. @Personal Concerns

    I have made the necessary correction, replacing “Kabhi Kisi Ko” with ” Pyar Hai Amrit Kalash”…..Thanks a lot for making me aware of it right at the beginning🙂

  4. Thanks to both ” I am not defined” and ” Clown Ponders” for liking the post on WordPress..

    *********************

    Thanks to Nitesh Kumar, New Delhi, Prabhu Chaitanya, Patna, Gyanendra Triptahi, Asst. Professor, ITM UNIVERSITY, GURGAON, Rishabh Anand, Kashish News, Jharkahnd, and Sonu Saraf for liking it on Facebook..

  5. I thanks all my readers who came to read the post in such a large number. Some of the notable names include Akash Dusejaji,Sahil Kumarji, Gyasu Shaikh, Sanjay Vermaji,Aadesh Singhji, Sheokumar Singhji and Dharmendra Sharmaji ….

  6. शहरयार के कई गीत मेरे पसन्दीदा रहे हैं परंतु यह गीत पहली बार सुना, आभार।

    1. @Smart Indian

      अनुरागजी पहले तो इस बात के लिए धन्यवाद कि आपने अपने विचार प्रकट किये..अपना जवाब मै एक लेख के माध्यम से दे रहा हूँ..आपको नया गीत रास आया इसके लिए धन्यवाद.

      P.S. I have mentioned your name in my article as it’s your link that motivated me to write the article.

    2. @Anurag Sharmaji

      Lijiye Lekh Hajir Hai:

      शहरयार की जिंदगी के त्रिकोण का चौथा कोण: अपने जीवन साथी से अलगाव !!

      http://wp.me/pTpgO-k9

      ********************

      Aur Jara Ye Bataye Ki Jagaran Wale Lekh Mein In Line Ka Kya Matlab Hai. Is it related with black magic???

      “ये शादी नाकाम न होती, अगर शहरयार पर सिफली [जादुई] अमल न होता। जिसकी ताईद [सबूत] कई आमिलों ने की।”

  7. Thanks Anita Singh, Announcer & News Presenter at Air Raipur, for appreciating the article on Shrota Biradari, Facebook.

    *****************************

    Gyasu Shaikh said on Shrota Biradari:

    अरविंद जी,

    तुमने एक संवेदनशील व्यक्ति और शायर का सच्चाई भरा जायज़ा लिया है जो शहरयार को एक सच्ची ‘श्रद्धांजलि’ भी है.

    कुछ समय पहले मैने भी शहरयार का एक साक्षात्कार पढ़ा था.इतना प्यारा व्यक्तित्व उनका मैने उस साक्षात्कार में मैने पाया कि मन भाव विभोर हो गया. उनकी सादगी भी थी खालिस सादगी. मेरेज लाइफ में उन्हें सुख न था. पत्नी से जुदा रहते थे…पर पत्नी लिए कोई शिक्वा -शिकायत नहीं…और बच्चों का उनके प्रति स्नेह भी सहज…उस वक्त मेरी लिखी टिप्पणी के कुछ अंश:

    बारीक़ व्यक्तिगत शिनाख़्त व पड़ताल जनाब शहरयार की साक्षात्कार में हुई है. जनाब शहरयार की वर्तमान स्पष्ट सोच, उनकी नज़्में , ग़ज़लें, मुशायरों में उनकी शिरकत, अपने स्वस्थ्य को लेकर कही गई उनकी बातें, ‘उमराव जान’ के समय के सुखद कुछ लमहे, विवाहेतर संबंधों की फजीहतों को टालने वाली उनकी राय, उनके लिए माँ की अहमियत, बच्चों की उनसे मुहब्बत, अलग होने पर बीवी से कोई गिला नहीं वाली आश्वस्तता…उनकी मनःस्थिति साक्षात्कार के दौरान उनका उठाना-बैठना, हाथों की मुद्राएँ, बार-बार गला ‘तर’ करने भीतर के रूम में जाना इत्यादि भीतरी-बाहरी नई- नई सी बातों की जानकारी सारपूर्ण व दिलकश रही. एक शायर भी ऐसी शान से जी सके ! वैसी संतृप्ति जनाब शहरयार की थोड़ी सी इस सहचर्या के दौरान हुई.

    ***************************************
    My response to Gyasu Shaikhji:

    I thank Gyasu Shailkhji for his kind words from core of my heart.

    *****************************************

    Aadesh Singhji said on Facebook:

    Unke jane ki khabar se dukh hua..behad sanjeeda shayar

    ..Thanks Aadesh Singhji….

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