Monthly Archives: February, 2012

शहरयार की जिंदगी के त्रिकोण का चौथा कोण: अपने जीवन साथी से अलगाव !!


शहरयार की जिंदगी के त्रिकोण का चौथा कोण?

शहरयार की जिंदगी के त्रिकोण का चौथा कोण?


मेरे संगीत और रेडियो की दुनिया में विचरणे वाले मित्रो में से एक ख़ास मित्र अनुरागजी शर्माजी ने मुझे आज सुबह सुबह शहरयार से जुड़े एक लेख का लिंक दिया जिसमे  काफी ह्रदय विदारक घटनाओ का उल्लेख है.  इस लेख में शहरयार की पूर्व पत्नी नजमा साहिबजी  अपना दुःख प्रकट करते हुए इस बात का उल्लेख करती है कि ” शहरयार शायद एक अच्छे शायर जरूर हो सकते हैं,  अदब के आला-तरीन एजाज [सम्मान] भी मिल सकते हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं कि वे एक बा-अदब इंसान भी हों। वे एक अच्छे शौहर और एक अच्छे बाप नहीं बन सके.”

” रातों को शहरयार अमूमन क्लब में रहते थे। वहा ताश और शराब के शगल, रात में किसी भी वक्त घर लौटना, घर वालों की नींद खराब करना, बच्चों को आधी रात घर से बाहर निकालना, शराब के नशे में या बगैर नशे के चीखना-चिल्लाना, घर सर पर उठा लेना। मैं, मेरे बच्चे जिल्लत के इस अहसास से दोचार थे।किसी तरह मैं खुद पर काबू रखके जवाब नहीं देती थी। शाम से रात तक बच्चों को पढ़ाने-लिखाने और देखभाल का काम करती थी। बच्चों के जेहन पर इन हालात का बुरा असर हो रहा था और मेरे जेहन पर भी। कभी बच्चे बीमार पड़ते या मैं पड़ती तो समझते कि मैं या बच्चे पागल हो गए हैं और फौरन घर से बाहर फरार हो जाते।जब मैंने महसूस किया कि मेरा और बच्चों का जेहनी तवाजुन [मानसिक संतुलन] कायम नहीं रह पाएगा तो मैं अलग होने के बारे में सोचने लगी। तो एक दिन शहरयार बोले, ‘अलग हो गई तो लोग नोच खाएंगे तुम्हें!’ एक दिन बोले, ‘आइ वाट टु मर्डर यू.. लेकिन, तुम तो मजलूम बन जाओगी!”

Shaharyar's  Former Wife Najmaji

Shaharyar's Former Wife Najmaji

 इससें तो यही समझ में आता है कि तस्वीर के कई पहलु होते है.  मतलब त्रिकोण का चौथा कोण भी हो सकता है. लेकिन  मै पाठको का  ध्यान दूसरी तरफ दिलाना चाहूँगा और मुझे इस बात का एहसास है कि आप सब  इस पहलु से वाकिफ होगे. यद्यपि  नजमा साहिबाजी,  शहरयारजी की पत्नी, से मेरी पूरी हमदर्दी है पर क्या आपको नहीं लगता कि रचनात्मक लोगो की जो बेमेल जिंदगी होती है वो अक्सर घरेलु सांचे में फिट नहीं होती ? क्या ऐसी ही शिकायत गाँधी के आचरण से गांधी के पुत्रो को नहीं थी?  उनके बेटो ने भी उन पर परिवार की उपेक्षा का आरोप लगाया था ? मधुबाला के दिल में भी शायद इस बात कि कचोट थी कि किशोर कुमार को थोडा वक्त और देना चाहिए था और वो भी तब जब किशोर साहब ने देख रेख में कोई लापरवाही ना बरती थी. फिराक गोरखपुरी के सम्बन्ध भी अपनी पत्नी से ठीक नहीं थे और उनकी पत्नी का भी यही कहना था कि फिराक उनसे बहुत क्रूरता से पेश आते थे और उन्हें पीटते भी थे. मै किसी के गलत हरकतों को जस्टिफाय नहीं कर रहा हूँ पर यकीनन कही नहीं कही पति पत्नी के सोच में जमीन आसमान का फासला अक्सर ऐसी घटनाओ की परिणिति में खत्म होता है. अक्सर एक बेहतर सोच में अग्रसर व्यक्तित्व घरेलु संकीर्ण मान्यताओं के साथ सामान्य सम्बन्ध नहीं बना पाता.  मतलब दोनों का निर्वाह एक साथ एक समय में बराबरी से निर्वाह करना अक्सर संभव नहीं हो पाता. अब इससें क्या मतलब निकालना चाहिए ? 

लेकिन इसका एक दूसरा पहलु भी है. कितना इन पत्नियों की बात में कडुवी सच्चाई है और कितनी बनावट शामिल है ये कहा नहीं जा सकता ? बहुत संभव हो इनकी अपनी संकीर्ण सोच एक रचनात्मक ह्रदय के साथ तालमेल ना बना पायी और अपनी नाकामयाबी छुपाने के लिए पति की गैर मामूली हरकतों को बढ़ा चढ़ाकर पेश किया.. आप कभी पत्नियों की डिवोर्स याचिका देखे तो समझ में आएगा कि कैसे झूठे इल्जाम लगाती है पत्निया !!!

खैर नजमा साहिबा से मेरी पूरी हमदर्दी है और उनके दुःख को मै कम कर के नहीं आंक रहा हूँ. एक संतुलन तो होना ही चाहिए घर और बाहर की जिंदगी में. पर इस बात का निर्धारण करना बहुत कठिन है कि ऐसा इरादतन होता है या स्वाभाविक रूप से सोच और कर्त्तव्य निर्धारण की परिभाषाओ में फर्क की वजह से. सनद रहे एक रचनात्मक सोच रखने वाले इंसान  की सोच आम इंसान से भिन्न होती है. इसलिए तालमेल ना हो ऐसा बहुत संभव है. इसके लिए किसी को खासकर रूप से जिम्मेदार ठहराना ठीक नहीं क्योकि सीने में जलन यूँही नहीं पैदा होती अगर सोच या रूह सीमित होती है तो. 

तो क्यों ना सुन ले ये अमर गीत जिसने शहरयार को पहचान तो दी ही पर जयदेव के संगीत सफ़र में एक नया मोती जड़ा.

श्रोत एवम चित्र आभार:

जागरण याहू 

Pic One 

Pic Two 

शहरयार: सीने में जलन पर फिर भी जिंदगी को समझने वाला सादगीपरस्त शायर

शहरयार का यूँ चले जाना दुखी करता है....

शहरयार  का यूँ चले जाना दुखी करता है.  कुछ महीनों पहले विविध भारती पर जब उनका साक्षात्कार सुन रहा था तो महसूस कर रहा था कि एक संवेदनशील आदमी को कितनी जिल्लत और तकलीफों  का सामना करना पड़ता है और शायद यही अपमानजनक घटनाये उसकी रचनात्मकता को धार  देती  है. पर तब मुझे नहीं मालुम था कि ये आवाज़ अब परमात्मा की आवाज़ में विलीन होने वाली है. शहरयार जो जीवन से जुदा होके भी जीवन की विषमताओ पे पैनी नज़र रखते निहायत सादगीपरस्त इसान थे. इनसे जब ये पूछा गया कि आप ने मुशायरो में जाना क्यों बंद कर दिया तो जवाब आया कि साहब मुशायरो में वाह वाही लूटने वाले तौर तरीके उन्हें नहीं आते. वे उन शायरों में से थे जिन्होंने सस्ती लोकप्रियता पाने के हथकंडो से अपने को ऊपर रखा. वरना आज के इस अंधे युग में सस्ती लोकप्रियता के मोह से ऊपर उठ पाना संभव नहीं.

ये कहना गलत नहीं है कि मुज़फ्फर अली की गमन और उमराव जान ना प्रदर्शित हुई होती तो एक मास अपील जो उन्होंने विकसित की वो संभव नहीं था.  गमन और उमराव जान की ग़ज़ल ने उनको एक लोकप्रिय शायर बनाया. कुछ कुछ साहिर के साथ भी ऐसा ही था. लेकिन ये भी उतना ही सच ही है कि इनका वजूद सिर्फ इन फिल्मी ग़ज़लों से परिभाषित नहीं था वरन इन्होने जीवन की विसंगतियों को जिस इमानदारी से उकेरा इसने इन्हें एक बेमिसाल गज़लकार बनाया. अंजुमन या त्रिकोण का चौथा कोना के गीतों की  लोकप्रियता ने इनकी शायरी को एक जीवंतता सी प्रदान की. इनका जीवन किस कदर उलझाव से भरा था इनकी ग़ज़लों में साफ़ दिखता है यद्यपि इनके जीवन में भौतिक सुखो की कमी ना थी पर एक संवेदनशील प्राणी की आत्मा कब भौतिक सुखो में विलीन हो सकती है!

हम पढ़ रहे थे ख़्वाब के पुर्ज़ों को जोड़ के

आँधी ने ये तिलिस्म भी रख डाला तोड़ के

आग़ाज़ क्यों किया था सफ़र उन ख़्वाबों का
पछता रहे हो सब्ज़ ज़मीनों को छोड़ के

इक बूँद ज़हर के लिये फैला रहे हो हाथ
देखो कभी ख़ुद अपने बदन को निचोड़ के

कुछ भी नहीं जो ख़्वाब की तरह दिखाई दे
कोई नहीं जो हम को जगाये झिन्झोड़ के

इन पानियों से कोई सलामत नहीं गया
है वक़्त अब भी कश्तियाँ ले जाओ मोड़ के

शहरयार इस वर्तमान युग के साक्षी थे जिसमे मानवीय मूल्यों की कोई इज्ज़त नहीं थी. इज्ज़त थी तो सिर्फ पैसो के अश्लील खेल की. इस मूल्यों के क्षय को उन्होंने बहुत संजीदगी से व्यक्त किया है.

ख़ून में लथ-पथ हो गये साये भी अश्जार के
कितने गहरे वार थे ख़ुशबू की तलवार के

बिल्कुल बंज़र हो गई धरती दिल के दश्त की
रुख़सत कब के हो गये मौसम सारे प्यार के 

सीने में जलन पर फिर भी जिंदगी को समझने वाला सादगीपरस्त शायर

वैसे मेरी नज़रो में शहरयार मूलत: व्यक्तिगत  भावनाओं को बड़ी शिद्दत से उभारने वाले शायर थे जिनमे सभी का दर्द झलकता था. ये काबिलियत इनकी रूह की व्यापकता को दर्शाता है.

बिछड़े लोगों से मुलाक़ात कभी फिर होगी 
दिल में उम्मीद तो काफ़ी है यक़ीं कुछ कम है 

अब जिधर देखिये लगता है कि इस दुनिया में 
कहीं कुछ चीज़ ज़ियादा है कहीं कुछ कम है 

शहरयार को मै अपने से जोड़ के देखना चाहू तो शहरयार की यही लाइने मुझे अपने बहुत करीब लगती है. 

दुश्मन-दोस्त सभी कहते हैं, बदला नहीं हूँ मैं। 
तुझसे बिछड़ के क्यों लगता है, तनहा नहीं हूँ मैं। 

उम्र-सफश्र में कब सोचा था, मोड़ ये आयेगा। 
दरिया पार खड़ा हूँ गरचे प्यासा नहीं हूँ मैं। 

पहले बहुत नादिम था लेकिन आज बहुत खुश हूँ। 
दुनिया-राय थी अब तक जैसी वैसा नहीं हूँ मैं। 

तेरा लासानी होना तस्लीम किया जाए। 
जिसको देखो ये कहता है तुझ-सा नहीं हूँ मैं। 

ख्वाबतही कुछ लोग यहाँ पहले भी आये थे। 
नींद-सराय तेरा मुसाफिश्र पहला नहीं हूँ मैं।

 

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शहरयार  ने बहुत ही कम फिल्मी गीत लिखे पर जो भी लिखा खूब लिखा. ये आपको ” सीने में जलन” (गमन) और “ जिंदगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है मुझे” (उमराव  जान) जैसे गीत सुनने पर एहसास होगा पर इनका लिखा हुआ ” प्यार है अमृत कलश” (त्रिकोण का चौथा कोना) मुझे एक अजीब   सी शान्ति प्रदान करता है और ये महसूस कराता है कि मनुष्य सिर्फ अपनी इच्छाओ से ही नहीं वरन ईश्वर की मर्ज़ी से भी संचालित है.

चित्र आभार:

Pic One
Pic Two

आप  यहाँ शहरयार की कुछ अच्छी गज़ले यहाँ पढ़ सकते है : कविता कोष 

Valentine’s Day: A Day To Honour Love

Valentine's Day: A Day To Honour Love !

To say something about love in confused and distorted times of ours is not an easy task. The generation dependent on money, social networking sites and exhibitionism treats love as some sort of fast food- easy to prepare and quickly consumed. It has no patience to see it blooming in all its colour. No wonder one of my colleagues treats arrival of Valentine’s day as arrival of mating season of dogs.

One of the recent Supreme Court verdicts has made it clear that tendency on part of well educated girls from good families to enter in prostitution is quite alarming. I mean having sex in the guise of love has become one of the easiest mode to attain richness. I cannot avoid quoting such recent trends as it’s necessary to make it clear that with such murkier shades in existence the love with its gentle shades has been pushed to the fringes.

One of the controversial books released shortly that deals with sexual appetite of women suggests once again that love is nothing more than release of chemicals ” dopamine, norepinephrine and phenylethylamine ” and when women fall in love it’s more management of “resource benefits’ and “genetic benefits” than bonhomie with romantic attributes. Now who will dare to love with such sort of horrible revelations? When it’s all biology the heart of lover seems to have become a frog ready to be dissected by the sharp razor in soft hands of lady love!! It’s a tough time for people who are in real love with someone for whom” absence from those we love is self from self – a deadly banishment” (Shakespeare)

Valentine's Day: A Day To Honour Love !

Imagine the plight of lover who is in tine with ancient instincts -the idealistic instincts- which perceives his beloved a mean to knock at the door of bliss. When I refer to idealistic sense I am referring to vision which perceives love in its old mode- a gateway to totality. This totality is the result of complete identification with the beloved. To have glimpse of these idealistic portrait one needs to read the short poem by Shelly named ” To Jane”:

The keen stars were twinkling,
And the fair moon was rising among them,
Dear Jane.
The guitar was tinkling,
But the notes were not sweet till you sung them
Again.

As the moon’s soft splendour
O’er the faint cold starlight of Heaven
Is thrown,
So your voice most tender
To the strings without soul had then given
Its own.

The stars will awaken,
Though the moon sleep a full hour later
To-night;
No leaf will be shaken
Whilst the dews of your melody scatter
Delight.

Though the sound overpowers,
Sing again, with your dear voice revealing
A tone
Of some world far from ours,
Where music and moonlight and feeling
Are one.

The poetic beauty attributed to Jane makes her gain timeless appeal. This sublimity is direct result of being in love with greater emotions, which allows one to imbibe unheard emotions, enabling one to carve larger than life portrayal of the lover. This sort of attachment is missing in our times as so called notions of realism have made us away from the realm of purer emotions.

Valentine's Day: A Day To Honour Love !

Loving with animal instincts closes the opportunity to trace better perceptions. However, in our times loving the beastly way is normal now and it , in fact, has attained some sort of legitimacy. The story of break-ups, deception, cheating and torture are some of the glorious happenings that one hears whenever love makes its presence felt. By love I mean the romantic relationships which exists between two young hearts. Love has many other variations but it would not be appropriate to discuss them at this point of time as I have not seen that frequently young people buying roses for their parents as spending huge amounts of money on beer and girls on Valentine’s Day.

Well, being incapable of honouring the beastly version of love in our times, I place myself on road to refined love, abandoned by all, which takes me to days when it was easier for the heart to sense the true love often. I am recollecting those days with some classic love songs from bygone days:

1. Kabhi Kabhi Mere Dil Me Khyal Aata Hai

2. Tere Mere Sapne Ab Ek Rang Hai

3. I Will Be There

4. Nothings Gonna To Change My Love For You

5. Tere Mere Beech Mein

6. Tere Dar Pe Chale Aaye Sanam

7. Tumhe Pyar Karte Karte

8. Sad Lisa Lisa

9. Dheere Dheere Se Meri Zindagi Mein

10. Bade Achhe Lagate Hai

Valentine's Day: A Day To Honour Love !

Pic Credit:

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Pic Two

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Lawyers Should Learn To Speak Easy !!!

Indian legal system: Speak easy

The statutes need to be carved in citizen-friendly language. The problem with most of the institutions functioning in India is that they have been set up on the patterns evolved by the Britishers. Whether they are elementary guidelines for the smooth functioning of the government run bodies or legal considerations to carry out the business of justice they are more often than not coined in expressions that remain Greek to ordinary citizens.

Their makers simply forget that they are living in a country dominated by rural population. The very fact mocks at obsession to employ bombastic expression to create a statute. In fact this is something which has allowed the lawyers to exploit their clients time an again.

The common man simply choose to grope in ignorance than to get trapped in verbosity of the lawyers which going by the complicity of legal affairs appears to be a greater blunder in the eyes of former. Unless we stop evaluating a man’s standard through the prism of western perceptions nothing exceptional could be achieved.

This realization must dawn upon us that mimicking foreign accent or dealing in complex clauses is not going to benefit the underprivileged. A bond can only be established with them by being honest towards their concerns in a language that gives them the feeling of being part of the whole process in an intimate way.

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I am presenting excerpts  from a well known writer’s work that will enlighten the readers about categorization of “common man”.   It would let you know all why common man has been deliberately  kept  in ignorance to fulfill the needs of people in power.  I had to present these excerpts in order to reveal the prejudices against the common mass and only then we can understand why the road to justice for the common people is full of obstacles.

I also presenting excerpts from another well known writer’s work to establish the Gandhian truth that let’s borrow Western world’s better ideals but let’s not subject our conscience  to their rotten beliefs.  There is no point in conducting our affairs on borrowed concepts.

These excerpts I am sure would help the esteemed readers to grasp the issue raised in my post quite well.

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Democracy was born in the city states of Greece. Athenian democracy has been called a men’s club, because women were excluded from the right to vote. So were slaves. Greek citizens themselves could qualify only if both their parents were Greek. Within these limits, democracy ensured direct participation by the citizen in running the state.

From Greece to post-colonial India, we have come a long way. From Latin we got the phrase, “Vox populi, vox dei”. This was not really a pro-democracy slogan; it was part of a plea to Emperor Charlemagne from one of his associates that he should not trust those who chanted this slogan. As in other parts of the world, society was divided into haves and have-nots. The Romans institutionalized this division by  drawing a line between patricians and plebeians. A patrician was one born of a noble father. The plebs were the common people, the artisans, the workers. The dictionary equates plebeian with unrefined, coarse, and vulgar.

France became a bastion of democracy in the days of the 1789 Revolution. In place of patricians, there were the first estate or the nobility and the second estate or the clergy. The common people, including artisans, peasants and the bourgeoisie, formed the third estate. The revolution marked the rise of the third estate.

In the name of democracy, we glorify and sometimes deify the common people. Ironically, we also brand them with new names that express contempt rather than admiration.

In Shakespeare’s Merchant of Venice, the the Prince of Arragon, who has to pass a lottery to win Portia’s hand, refuses to be aligned with the common people, “the fool multitude”. He says: “I will not jump with common spirits and rank me with the barbarous multitudes.” Shakespeare brings him down to earth by rewarding him with a fool’s head instead of Portia’s hand.

If you want to pour contempt on people, use a foreign word or phrase. “Hoi polloi” is one such, an exotic-sounding Greek phrase which can be translated as “the many”. But the attitude is the same. The phrase refers condescendingly to the riff-raff or the rabble, who lack education and cultivation. No wonder the snobbish aristocrats said they wanted their children out of the company of the hoi polloi.

The language of deprecation soon came up with a phrase with greater sting in “the great unwashed”, which referred to the multitude. That is as physical as you can get with insulting people. The thesaurus is liberal with synonyms for this expression: base born, ignoble, lowly, vulgar. Unfazed by the social stigma intended by the term, two brothers, David and Hamish Kilgour, named their music band The Great Unwashed!

Like hoi polloi, the word “lumpen” was borrowed from Europe and refers to the mob. The word is a shortened form of the German-French compound, “lumpenproletariat”. Marx used the word to refer to the unemployed and unproductive sections, who lacked class consciousness. Today, the Marxian sense has been diluted into the general sense of “uneducated, unenlightened, unrefined.”

The vocabulary of vilification, expressing our prejudice against the common people, conflicts with our faith in the sovereignty of the people. It was Carl Sandburg, American poet and Pulitzer laureate, who gave the most articulate expression to the disillusionment of the people. In his poem, I am the People, the Mob, he protests the snubs and slights that the common people are exposed to. Speaking for the people, he says: “I am the working man, the inventor, the maker of the world’s food and clothes.” In an outburst of anger, he warns that the patience of the people will soon run out. Then “there will be no speaker in all the world/ say the name ‘The People’ with any fleck of a/sneer in his voice or any far-off smile of derision./The mob—the crowd—the mass—willarrive then.”

Source:   V.R. Narayanaswami’s article ” ASK MINT/WORDS TO VILIFY THE COMMON MAN ”

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Kishore Madhubani says: ” The Western mind is a huge world, but even in that huge world, you are actually trapped in a mental box. For those who live in the West, you assume that you can understand the world just by looking at it through Western perspectives, which gives you gives you a limited view of the world.”

” Let me give you an example to illustrate what I mean: You recall that one of the most successful essays that appeared immediately after the end of the Cold War was Francis Fukuyama’s essay The End of History. I found it amazing that an idea as absurd as the end of history could become so popular in the Western world. For a start, if you are going to have the thawing of the global order at the end of the Cold War, the logical result would be the return of history, not the end of history. And indeed, in the last ten years, we have seen the resurfacing of historical forces that were buried by forty years of the Cold War. Now, why did the Western mind believe that the rest of the world would transform itself to become carbon-copy replicas of Western liberal democratic societies? This is Francis Fukuyama’s underlying thesis.

But having asserted that the Western mind is trapped in a mental box, how do I document it? ”

” When you live in the West, it’s very hard to understand where the boundaries of the West are, because the natural assumption is that of   Francis Fukuyama or V.S. Naipaul, that the West is a universal civilization, that history is a one-way street, that all societies as they grow and evolve will become more and more like the West.

What separates my life from many in the room is that I have heard conversations in Western living rooms about the world, and then I have been in non-Western living rooms, in an Islamic home, in Chinese homes, and I have listened to their conversations and how they see the world. You begin to realize that there are many different perspectives.

If the other societies succeed, what you will see is modernization, but not Westernization, as they grow and change. What exactly will it mean?

In the world of tomorrow, you will wake up and switch your television from one channel that gives you a Western perspective of the world to another which will describe the same events from a completely non-Western view.

Cities like New York City, like London will be the meeting places that bring these perspectives together, and that’s why you feel, ”Hey, there’s no big difference between them.” But if you travel outside and you go into these living rooms, you will find that there are still different worlds out there.”

” On the one hand, as the result of globalization, and the explosive burst of Western technology, we are shrinking the world into a global village, and now we are now sailing in the same boat. Sometimes I mischievously say this boat may perhaps be the Titanic. We have become one world. And yet, on this one ship you have 1 billion people living in first-class cabins, in relative comfort, and 2 or 3 billion people living in various degrees of deprivation, some in hunger and starvation.

I see daily the forces of globalization are generating greater and greater interdependence. Actions in one corner of the   can affect a distant corner relatively quickly. Most people living outside the United States can feel and understand the impact of globalization. They feel the loss of autonomy each day. Most Americans do not feel this, or not yet. They live in one of the most powerful countries ever to have existed in the history of man. Sheer power and two huge oceans make Americans unaware of how the world is changing. The great paradox here is that the world’s most open society is among the worst informed on the inevitable impact of global changes. A tidal wave of change is already on its way to American shores.

In the world to come, if any force will save us, it will be the dynamism of Western civilization, which has carried the world to where it is today. All of the advances of human civilization are the result of what has happened in the West. ”

”  Let me move on to another example of what I call possible instability in the same world. If we are all in the same boat, it is in our obvious interest to ensure that all the boat’s passengers become stakeholders in peace and prosperity, rather than in misery.

The only question in my mind is: Can a shrinking population of the West, which now makes up about 10 percent of the world’s  population, carry the burden of the world on its shoulders? We need to have burden-sharing between the West and other civilizations to have stability. We need a fusion of civilizations rather than a clash of civilizations.”

” I can see the fusion of civilizations taking place in the Asia-Pacific, and my friends here can see it happening daily across the Pacific with East Asia and the United States cooperating in economics, politics and culture. I still haven’t been able to see how we are going to get fusion of civilizations between the West and the Islam, and that is where the problems will lie in the world to come.”

(The views expressed in these excerpts belong to leading thinker KISHORE MADHUBANI )

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References:

V.R. Narayanaswami’s article ” ASK MINT/WORDS TO VILIFY THE COMMON MAN ”

Kishore Madhubani’s Article

Pics Credit:

Pic Two  

Pic Three

हमे एक धुँध से आना है एक धुँध में जाना है!!!

साहिर: मेरे पसंदीदा गीतकार

साहिर: मेरे पसंदीदा गीतकार

साहिर मेरे पसंदीदा गीतकार रहे है क्योकि उनके गीतों में कोरा आदर्शवाद नहीं था  और ना ही उनमे भटकाव भरी रूमानियत  थी .  भजन भी उनके कलम से निकलता था तो ऐसा लगता था कि  जिंदगी को ही सच मानने वाले ने परम सत्ता से कैसे सम्बन्ध बना लिया ? कहने का मतलब उनके अनुभव का दायरा विशाल था और इस बात को समझना लगभग नामुमकिन है कि कैसे वे विपरीत छोरो पर विचरण कर लेते थे एक वक्त में ही.

अब ये गीत ही देखिये.  भारतीय दर्शन की एक जबरदस्त झलक दिखती है इस गीत में.  एक  प्रोग्रेसिव शायर की कलम से निकला है ये दार्शनिक गीत.  है ना ये अजूबा!!   ये गीत मुझे बहुत रूहानी सुकून देता है.  सच में ये जीवन एक साबुन का बुलबुला है कब ये फूट जाए कोई नहीं कह सकता.  कब हम अनंत की यात्रा में निकल जाए इस माया को छोड़कर जिससे हम चिपके रहते है कोई कह नहीं सकता.   इसी अनंत की रहस्यमय यात्रा की तरफ इशारा करता है साहिर का ये गीत.  ये तो सब जानते  है कि इसी अनंत की यात्रा की कहानी है हमारा भारतीय दर्शन. 

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संसार की हर शय का इतना ही फ़साना है 
एक धुँध से आना है एक धुँध में जाना है

 
ये राह कहाँ से है ये राह कहाँ तक है 

ये राज़ कोई राही समझा है न जाना है

 
एक पल की पलक पर है ठहरी हुई ये दुनिया

 एक पल के झपकने तक हर खेल सुहाना है 

 
क्या जाने कोई किस पल किस मोड़ पर क्या बीते

 इस राह में ऐ राही हर मोड़ बहाना है
 
गीतकार: साहिर
 
संगीत: रवि 

चलचित्र: धुंध (1973)



आडिओ संस्करण: 

http://smashits.com/dhund/sansar-ki-har-shae/song-72665.html 

Pic credit: साहिर 
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I follow Jesus Christ bearing the Burden of the Cross. My discipleship is predestined by the Sovereign Grace and not by my belief or disbelief, or free will.

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