एक सार्थक संगीत चर्चा के झरोखे से: हम क्यों आज के शोर को संगीत समझे ?

भारतीय संगीत जो सुने तो दीपक जल उठे!

भारतीय संगीत जो सुने तो दीपक जल उठे!

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[ पाठको से अनुरोध है कि इस लेख को बेहतर समझने के लिए इस चर्चा को अवश्य देखे जो कि इस लेख पे हुई है श्रोता बिरादरी  पर :  की बोर्ड पे बोल फिट कर गीत रचने वाले ये आज के बेचारे संगीतकार.  इस लेख के कमेन्ट बॉक्स में चर्चा को डाल दिया गया है.  यदि उसे पढ़कर इस लेख को पढेंगे तो ज्यादा आनंद आएगा ] 

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इस बात को देख के मुझे बहुत हर्ष  हो रहा है कि जिस स्तर कि ये चर्चा हो रही है वो बहुत दुर्लभ है. दिलीपजी की जितनी भी प्रसंशा की जाए वो कम है क्योकि मुझे लगता है कि वो ना सिर्फ समस्या क्या है उसको  समझ रहे है या उसको बहुत इमानदारी से  समझने  की कोशिश कर रहे है  बल्कि नए नए तथ्यों के साथ और नए एंगल से चीजों को समझा  रहे है.   मै कुछ नयी बातें कहूँ इसके पहले जो कुछ बाते कही गयी है उनको समेटते हुए कुछ कहना चाहूँगा.  सजीव सारथी जी की  बातो को संज्ञान में लेना चाहूँगा. सजीवजी आप बेहद अनुभवी है और आपकी समझ की मै दाद देता हूँ.  आप बहुत नज़दीक से संगीत जगत में हो रहे  बदलाव को नोटिस कर रहे है.  लिहाजा आपकी बात को इग्नोर करना या फिर इसके वजन को कम करके तोलना किसी अपराध से कम नहीं और मै तो इस अपराध को करने से रहा.  बल्कि मै तो खुश हूँ इस बात से कि आपने कितने गंभीरता से अपनी उपस्थिति दर्ज करायी है.  मै  चूँकि किसी अन्य महत्त्वपूर्ण कार्य में व्यस्त था लिहाज़ा कमेन्ट कर नहीं पाया पर रस बहुत ले रहा था आप के, दिलीपजी,  अरुणजी और  संजयजी की बातो का.  मै कुछ बातो को अपने स्टाइल से कहूँगा जो सरसरी तौर से देखने वालो को ऊँगली करना लग सकता है पर यदि आप मनन करे तो उसके छुपे आयाम आपको नज़र आ सकते है.  कृपया सम्मानित सदस्य इसे एक हेअल्थी रेजोएँडर  (healthy rejoinder) के ही रूप में ग्रहण करे और चूँकि आप लोग बेहद काबिल है संगीत के सूक्ष्म पहलुओं  को ग्रहण करने में तो उम्मीद करता हूँ कि इन बातो को सही आँख से देखने की कोशिश करेंगे.. 

सजीवजी आपकी कुछ बातो की तरफ आपका ध्यान खीचना चाहूँगा.  एक बात तो संगीत के विविधता के सन्दर्भ में है और वो ये है कि ” उस आलेख से आप वाह वाही लूट सकते हैं पर समय के साथ हमारे संगीत में आ रही विविधताओं पर भी कुछ लिखिए “.  देखिये साहब हम बहुत युवा है इतने उम्रदराज़ नहीं हुएँ है  कि आज के बदलाव से बेखबर पुराने काल में नोस्टैल्जिया से ग्रस्त होकर भटक रहे है.  ऐसा कुछ है नहीं  और ना ही ऐसा है कि मार्क्सवादी विचारको की तरह विशुद्ध बौद्धिक बकैती करके ध्यान खीचना या वाह वाही लूटना है.  काहे कि ईश्वर की कृपा से दुनियाभर के अति सम्मानित पत्र पत्रिकाओ में, प्रतिष्ठित वेबसाइट्स पर मेरे आलेख छपे है विभिन्न विषयो पे और इतनी प्रसंशा मिली [धन नहीं🙂 ]  कि ना अपनी प्रसंशा सुनने का मन होता है और ना सिर्फ बात कहने के खातिर बात करने का मन करता है…Enough is enough ,at least, in this regard.  मै कोई बात तभी कहता हूँ  जब लगता है कि कहना बहुत जरूरी हो गया है.  मै कोई सर्वज्ञ नहीं पर मेरी भरसक कोशिश यही रहती है कि जितने भी दृष्टिकोण या बदलाव मेरे सामने हो रहे मान लीजिये संगीत के क्षेत्र में ही उनको समझने या आत्मसात करने की पूरी कोशिश करता हूँ . यही देख लीजिये कि आप लोगो अभी  इतने सारे अनछुए पहलुओं पर इतने विस्तार से प्रकाश डाला..

पूर्व में भी मै ऐसी ही चर्चाओ में के केंद्र में रहा हूँ तो सजीवजी आप इस बात बात से बेफ्रिक रहे कि संगीत की विविधता को हाशिये में रखने पर मुझे कोई दिलचस्पी नहीं. अगर हाशिये में ही लाना होता तो कम से कम मै किसी भी चर्चा को जन्म ही ना दूँ !!  सजीवजी आपने एक बहुत अच्छा काम ये किया कि कम से कम आप बहुत सकरात्मक रूख रखते है आज जो कुछ भी अच्छा हो रहा है.  पाजिटिव रूख का मै भी बहुत प्रेमी हूँ लिहाज़ा आपके इस अप्प्रोअच की मै सराहना करता हूँ. लेकिन आप सजीवजी इस बात को थोडा सा गौर करना भूल गए कि ना मै और ना ही दिलीपजी ने कभी इस बात से इंकार किया है कि आज के युग में अच्छा काम नहीं हो रहा है या फिर के आज के यूथ की पसंद ठीक नहीं है.  आप मेरे पूर्व के कमेन्ट को एक बार फिर देखे तो आप पाएंगे कि मैंने एम एम क्रीम या शंकर एहसान लोय या सन्देश शांडिल्य की बात की है. दिलीप जी की बात को गौर करे कि उन्हें भी अच्छे योगदान की खबर है : ” Certainly there are many a songs (New) which are sensetively made, composed and appreciated.The issue here is the comparison for dedication and soulful output.” ( Dilip Kawathekar )    ..” for not condemning those who are creative even today, but those who are creating a song in a day, where there is no time to most of Music Directors for any improvisation/excellence/originality.” ( Dilip Kawathekar ).  मैंने  भी  यही  कहा  है  ” I am not against the modern music but I have full right to condemn the wrong traits exhibited by the modern musicians- the arrangers in reality.” 
 
आप सजीवजी इन बातो को इग्नोर कर गए और इसलिए आप का जोर इस तरफ ज्यादा हो गया कि आज कितने अच्छे गीत बन रहे है  सिंथेसाईज़र के नोट्स का इस्तेमाल करके या फिर आज के यूथ्स कितने प्रयोग कर रहे है.  मुद्दा ये नहीं है सजीवजी .बल्कि दिलीपजी ने इस बात को बेहतर पकड़ा है कि वाकई में मुद्दा क्या है जिसको संजयजी ने रस लेके कहा है कि ” भाई लोग आप सब अभी भी असली मर्ज समझने का प्रयास पूरी तरह नही कर पा रहे है….कि आखिर ऍसा क्यों हो रहा है….” पर मजेदार बात ये है कि संजयजी ने खुद कोई कोशिश नहीं कि है इस मर्ज़ को समझ कर कुछ कहने कि🙂. सिर्फ इंगित करके इस बात को  रस ले रहे है..

बहरहाल संजयजी हम मर्ज़ को बताते है अभी. ठहरिये जरा सा.  मुद्दा ये है कि आज के गीतों में इतना सतहीपना क्यों आ गया है  गीत ना सिर्फ बेसुरे,  कानफोडू है बल्कि संगीत के साथ बलात्कार भी है.  कुछ अच्छा हो रहा है या कुछ यूथ कैसे भी हो पीछे का संगीत एन्जॉय कर रहे है , कुछ नए प्रयोग कर रहे है  ये सब ठीक है पर क्या ये पर्याप्त है कि हम आँख मूँद कर उपेक्षा कर दे जो संगीत के नाम पे शोर मच रहा है ?  ये संगीत कि ध्वनी कैसे उत्पन्न हो रही और क्या नए एफ्फेक्ट पैदा हो रहे है ये संगीत के शास्त्रीय जानकारों को भा सकता है पर जरा आम धारणा पे भी तो जाए. जिनके लिए संगीत बन  रहा है उनमे क्या सन्देश है.  हमारा क्या एक बड़ा तबका इन सतही सिंथेसाईज़र के नोट्स से उत्पन्न गीतों को अपना रहा है कि नहीं ? सीधा सा जवाब है नहीं.  दिलीपजी ने इस बात को बात को समझा है और तभी वो मूल वाद्यों के उपयोग पर बल दे रहे है.. 

इस भ्रम को ना पाले कि माडर्न बीट्स कोई बहुत लोकप्रिय है.  तकलीफ ये है कि इन्हें हमारे अन्दर ठूसा जा रहा है बदलाव के नाम पर.. संजयजी ने मर्ज को ना समझने कि बात को कह के कम से कम ये रास्ता खोल दिया कि हम पहले उस गणित को समझे जिसके चलते तहत  ए आर रहमान के एक बेहद औसत दर्जे गीत को आस्कर दे दिया गया है ? ये पूंजीवादी  संस्कृति की गहरी चाल है कि किसी भी देश कि मूल संस्कृति से काट कर उस को परोसो जो कि ग्लोबल है.  नतीजा ये हुआ कि मैनहैटन से लेकर मुंबई तक एक ही तरह का बीट्स वाला संगीत हावी हो गया. नतीजा ये हुआ कि रहमान के  औसत दर्जे के संगीत को या इनके ही समकक्ष और भी फूहड़ संगीतकारों के गीतों को जबरदस्ती ग्लोबल का नाम देके प्रमोट किया जाने लगा.  ठीक है रोजा में ठीक संगीत दिया या बॉम्बे में अच्छा संगीत दिया पर  ए आर रहमान  नब्बे के दशक के खत्म होते होते ही “मोनोटोनस” (monotonous) का  खिताब पा चुके थे और आश्चर्य है कि यही ऑस्कर कि श्रेणि में जा पहुंचे  वो भी ” जय हो ” के लिए !!!  इसका कारण आप समझने कि इमानदारी से कोशिश करेंगे तो ही समझ पायेंगे कि गीत इतने बेसुरे क्यों बन रहे है ? 

बात साफ़ है कि जहा पहले फ़िल्म संगीत के मूल में भारतीय संगीत की आत्मा बसती  थी वहा पे वेस्टर्न संगीत के तत्त्व आ गए बदलाव के नाम पे . ऐसा करने से पहले ऍम टीवी के जरिए हमारे यूथ्स को ऐसा बना दिया गया की वो बीट्स आधारित संगीत को ही असली समझे पैव्लोव के कुत्ते की तरह. पहले जहा गीत फ़िल्म के थीम को ध्यान में रखकर बनते थे. हफ्तों या महीनो लग जाते थे धुन बनाने में और फिर उतनी ही लगन से गीत में अर्थपूर्ण शव्द आते थे.. इन दोनों के बेजोड़ संस्करण से एक मधुर गीत का जन्म होता था. आज ठीक उल्टा है.. आज पहले ये देखा जाता है कि क्या बिक सकता है. कहा कहा म्यूजिक के राइट्स डिस्ट्रीबुउट  हो सकते है.  इनका आकलन करने के बात ही गीत संगीत बन पता है.  मै पूछना चाहूँगा कि क्या शंकर जयकिशन, खैय्याम या कल्यानजी आनंदजी भी इसी प्रोसेस को ध्यान में रखकर संगीत रचते थे?  क्या पूर्व में यही एक पैमाना था संगीत को रचने का ? 

सजीवजी ठीक है हम कॉन्सर्ट में जाकर मूल वाद्यों या अपनी पसंद का संगीत सुन सकते है या वो जमाना नहीं रहा कि तमाम साजिंदों को इकठ्ठा  करके सुर निकले तो क्या हम इनके आभाव में ठूसा जा रहा है उसको चुप मार के निगल ले ? कहा जाता है कि भारतीय संगीत में वो जान होती है कि रोग भाग जाते है या फिर दीपक जल उठता है और तकरीबन यही जान “हीलिंग एफ्फेक्ट” के सन्दर्भ में पुराने फिल्मी गीतों में भी होती थी. क्या आज के शोरनुमा फिल्मी गीत भी इसी “हीलिंग एफ्फेक्ट” का  दावा कर सकते है ?  वो इसलिए नहीं कर सकते क्योकि वे आपको शांति या ख़ुशी देने  के लिए नहीं वरन पैसो की झंकार से लय बनाने के लिए बने है. आपने कभी गौर किया आपने कोई अच्छी धुन की तारीफ की ये सोचकर बहुत बढ़िया बना है फिर पता चलता है अरे ये तो मूल स्पैनिश गीत की नक़ल है.  अरे ये तो फला गीत की नक़ल है इंसपिरेशन  के नाम पे.  तो ये तमाशा होता है गीत रचने के नाम पे. 

सजीवजी अच्छा अब भी हो रहा है और हो सकता है इससें किसे इंकार है.  उसकी हम भी तारीफ करते है. ये भी महसूस होता है कि सिंथेसाईज़र के नोट्स इतने प्रचलन में आ चुके है कि अतीत के गोल्डन एरा को याद करना और उसके फिर से आ जाने कि उम्मीद करना बहुत ठीक नहीं. क्योकि बदलाव फिर आखिर बदलाव है.  पर मुद्दा ये नहीं है.  मुद्दा ये है कि हम इस बदलाव को और विकृत होने से ना रोके?  वे कोशिशे करना भी बंद कर दे जिनसे कि उन तत्त्वों की वापसी की संभावना बन सके जो कभी भारतीय संगीत की जान हुआ करते थे.  एक संयमित मिलन हो पूरब का  पश्चिम से मुझे परहेज़ नहीं पर नकली को ही असली बताना इससें मुझे सख्त ऐतराज़ है.  कम से कम मै तो अपनी आपत्ति सख्त रूप से दर्ज करूंगा भले मै अकेला ही क्यों ना हूँ. 

उम्मीद करता हू की संजय वर्मा जी को अब थोडा आसानी होगी ये समझने में कि माजरा क्या है.  अंत में सजीव सारथी , दिलीप जी, अरुण सेठी जी, संजय वर्मा, प्रभु चैतन्यजी  और  मंगेश्जी  और सागर जी को विशेष धन्यवाद कि मुझे चिंतन करने का नया आधार दिया.  आशा है कि थोडा सा अंदाज़ में जो तल्खी आ जाती है इसको इग्नोर करके जो बातो का मूल सार है उसी को ध्यान में रख के आप मेरे लेख पर नज़र डालेंगे.  आप सब संगीत को परखने वाले लोग है सो किसी को कम बेसी करके आंकने का मेरा कोई इरादा नहीं और ना भविष्य में होगा.  बात संगीत से शुरू होके संगीत पे खत्म होनी चाहिए  संगीत की बेहतरी के लिए यही मेरा एकमेव लक्ष्य रहता है हर बार.  उम्मीद है आप इसको महसूस करेंगे मेरे अंदाज़ के तीखेपन से ऊपर उठकर.

  
चलते चलते इस गीत को भी सुनते चले :  चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाए हम दोनों 

संगीतकार : रवि 
गीतकार:   साहिर 
गायक:     महेंद्र कपूर 

Pic One:  Pic one

7 responses

  1. शायद आपकी बात का विरोध कोई भी नहीं कर रहा। सब इस बात से सहमत है कि उस दौर का संगीत जाजवाब था लेकिन ऐसा नहीं है कि अभी का सारा संगीत कूड़ा होता है। खैर..इस विषय पर हम काफी बातें अब तक कर चुके।
    आपकी एक बात से मैं सहमत हूँ, कि उस जमाने में जो मेहनत संगीतकारों-गायकों ने की वो अब नहीं होता। लता जी का गाया “आएगा आने वाला में ” गाने में भुतहा टच देने के लिए जो प्रयोग खेम चन्द्र जी ने किया, वो आजकल के संगीतकार क्या करेंगे; उनका कम्प्यूटर और और की बोर्ड की मदद से सब कुछ हो जाएगा लेकिन लोगों के दिलों में नया गाना नहीं उतर पाएगा।
    फिल्म हमदर्द के गीत ऋतु आए ऋतु जाए सखी री के लिए अनिल दा( विश्वास) ने मन्ना डे और लताजी को १४ दिनों तक रियाज करवाया। ना आजकल के संगीतकारों के पास इतना समय है ना ही गायकों के पास, आजकल गीत फेक्ट्री के उत्पाद की भाँति बनते हैं।
    चलते चलते उस गीत का लिंक जिसका जिक्र ऊपर हुआ है।
    चार रागों ्में ढ़ला एक सुन्दर गीत

    1. सागर साहब पहले तो पोस्ट पे आकर कमेन्ट करने के लिए धन्यवाद. ये बड़े आश्चर्य कि बात है मूल पोस्ट पे आके कमेन्ट करने में कम से कम हिंदी जगत में एक अजीब सी हिचक रहती है🙂

      ” शायद आपकी बात का विरोध कोई भी नहीं कर रहा। सब इस बात से सहमत है कि उस दौर का संगीत जाजवाब था लेकिन ऐसा नहीं है कि अभी का सारा संगीत कूड़ा होता है। खैर..इस विषय पर हम काफी बातें अब तक कर चुके।” (सागर नाहर )

      खैर सागरजी एक बार आपने फिर वोही गलती कर दी.. अपने जो एक मोटा मोटा निष्कर्ष निकाला है कि पुराने को प्रेम करते वक्त हमने आज के सब गीतों को कूड़ा कर दिया/ कह दिया ..नहीं नहीं इतनी बड़ी तोहमत हमारे मत्थे ना मढ़े ..ये कई बार साफ़ किया है अच्छे गीतों के आजकल के या जो अच्छे प्रयोग हो रहे है सजीव या अन्य के द्वारा उनका मै बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ ..बदलते युग के साथ जो सही बदलाव होते है मै उसकी क़द्र करता हूँ पर क्योकि जो गलत है उसकी मै तीखी आलोचना करता हूँ जो शायद सरसरी निगाह से पढने पे ये इम्प्रेशन दे देता है कि मैंने आज के युग के सभी अच्छी बातो को खारिज कर दिया पर ऐसा मेरा रूख कभी है नहीं.

      दूसरी बात आप को लगता है कि मैंने ऐसा लिया है कि जैसे सब मेरी बात का विरोध कर रहे है ..ऐसा नहीं है..किसी कि बात को मै विरोध के रूप में नहीं लेता हूँ ..मेरी नज़रो में बिल्कुल विपरीत विचार एक तरह का वैचारिक मतभेद होता है और वैचारिक मतभेद का मै विरोध नहीं आदर करता हूँ…ये अलग बात है कि बिल्कुल एब्सर्ड बातो को सहन करने की सहन शक्ति थोड़ी कम है और किसी के बिल्कुल भिन्न विचार के पैरलल उससे अलग एक विचार जरुर रख देता हूँ..

      आपने लता और मन्ना डे के जो इस गीत के बारे में जो जानकारी दी उससें ही समझ में आता है क़ि ये कहा आ गए है हम वक्त के प्रवाह में बहते बहते.. आपने भुतहा टच देने में जो मेहनत करनी पड़ी महल के गीत में उसका जिक्र किया है..रवि ने गुमराह के एक गीत में इको एफ्फेक्ट देने के लिए क्या जबरदस्त प्रयोग किया सीमित रिकार्डिंग सुविधा होने के बाद भी.. और देखिये क्या ग़ज़ब का गीत बन पड़ा वो..उन लोगो के इस जस्बे को मेरा नमन!!!

  2. The windows of a meaningful musical discussions are windows that were opened to the new human to earth by the cultural older humans that will be the bases of favorable musical sounds forever

    The country music sounds of a southern USA human would never be the favorable sounds of a new human whose favorite sounds were those imposed on the new human listening to the sounds of opera noise, say, in Italy

    The sounds that are used to control humans have been hijacked by commercializing and the mind forming to market the sounds for the almighty human created money

    There should never be a value put on the mind forming of sounds and the useless humans that make money from it should never be seen as any more valuable than that human who only lived one minute on earth

    These words commenting on the above comments comes with no borders and flags and with the knowledge all humans are the same species and when humans can sing that song then maybe the sharing of all things that earth offers to a soft tissue animal will be available to all with the overpowering feeling that all words spoken are songs that fill the human hearts with love

    1. @

      “The sounds that are used to control humans have been hijacked by commercializing and the mind forming to market the sounds for the almighty human created money

      There should never be a value put on the mind forming of sounds and the useless humans that make money from it should never be seen as any more valuable than that human who only lived one minute on earth”

      “…all words spoken are songs that fill the human hearts with love”

      ******************

      You got it so right Just Me Again🙂

  3. ‎@All

    एक बात जो गाहे बगाहे इस चर्चा और एक अन्य चर्चा में में हर बार थोपने की कोशिश की गयी और जो सफल नहीं हुई वो ये थी कि साहब हम आज के गानों के दुश्मन है या कि आज भी बहुत अच्छा संगीत बनता है पर हम है कि इसको संज्ञान में लेते ही नहीं.. ऐसा नहीं है ये तो मैंने हर बार बता ही दिया पर लीजिये एक प्रमाण के रूप में आज के हिंदी फ़िल्म जगत से ( गैर फिल्मी अल्बम से नहीं) कुल पांच गीतों की लिस्ट दे रहा हूँ…

    जरुरी नहीं आप भी इन्हें पसंद करते हो पर मै इन्हें पसंद करता हूँ. ..मुख्यत इस बात को दर्शाने के लिए पेश कर रहा हूँ कि अगर कुछ अच्छे गीत बन रहे है तो मेरे कानो से घुसकर वो दिल में दर्ज हो जाते है..

    १. झटक कर जुल्फ ( आरक्षण )

    2. काश यूँ होता हर शाम साथ तू होता ( मर्डर 2)

    ३. तेरी मेरी प्रेम कहानी (बाडीगार्ड)

    4. दिल ये मेरा शोर करे ( काइट्स )

    5. I want to get closer to you…( कार्तिक काल्लिंग कार्तिक)

    ( सागर साहब ( Sagar Nahar) कन्फुज़ियायें नहीं ये हिंदी गीत है..सुने धुन अगर कापी नहीं किसी विदेशी गीत की तो बहुत अच्छी है🙂 ..ये सागर साहब को खास समर्पित है हिंदी गीत जो अंग्रेजी में है🙂 ..मुझे बहुत पसंद है🙂

  4. People with anachronistic thoughts would comment about the changes take place around them, So it is natural that you have lamented about the Changing trends of Music. What you claim as culture of any art or society is bound to change as time passes. If you are that much particular about keeping up the old old and oldies…………then why do you blog here………this is also an advancement……..don’t use this new trend too. A.R.RAHMAN’S Music is THE BEST in present Bollywood my dear dude. If you don’t like the Sunlight that does not mean that Sun is bad or its light is bad. We understand what is bad. I think you too.
    Humbly
    revathy.

    1. @Revathy

      I need to appreciate the fact that you chose to comment on Hindi post, albeit English way.. I wish to inform you that being student of life and philosophy both the knowledge that change is the law of life is so commonplace for me🙂 “The old order changeth, giving place to new, Lest one good custom, should corrupt the world.” (The Passing of King Arthur).

      However, having said that, I cannot accept trash of our times as epitome of creativity. I was once great admirer of A R Rahman in Roja days when he did impressive scores in Bombay and Rangeela etc.. After that he became monotonous and sounded the same every time he gave music.. Yes, one or two songs sound good in his new movies but generally he is merely churning out mechanical beats that we have often heard in previous compositions. The biggest problem with him since Roja days is that his songs lack a smooth harmony ..There is no homogeneous appeal inherent in the songs…There is only smart arrangement of various strange sounds !! That’s not music Revathy !!!

      Listen this Mukesh Number from “Laal Bangla” and feel what music is really all about..

      http://ww.smashits.com/lal-bangla/chand-ko-kya-maloom/song-220457.html

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