बंद करिए ये झूठ बोलना, ये प्रचार करना कि स्त्री जात लाचार, कमजोर, अबला, बेचारी और दुखियारी है!! स्त्रिया पुरुषो से बेहतर शोषण करती है!!!

 

चेहरे के पीछें जो चेहरा छुपा है उसको भी देखे

आज का युग एक विचित्र सा युग है. जब  तक आप चुप चाप सहते रहते है व्यवस्था से उपजी विकृतिया तब तक आप लायक है.  जरा सा आपने मुंह क्या खोला बस सारी व्यस्था आपके पीछे हाथ धो के पड़ जाती है.  जब तक आप स्त्री के कदमो में लोटकर उसकी हर गलत बात को सम्मानपूर्वक ग्रहण करके उसकी चरण वंदना करते रहते है तब तक ठीक और जिस दिन आपने विद्रोह किया ये कहने को प्रोग्रेसिव और समय के साथ चलने वाली व्यवस्था स्त्री के  द्वारा शोषण करने की  काबिलियत के अवलोकन के  मामले में बैकवर्ड हो जाती है.
 
स्त्री पुरुष  के संबंधो में यही व्यवस्था आज भी  स्त्री को आज भी आदिम युग के समकक्ष ही रखती है. मतलब  वह आज  भी एक लाचार, कमजोर, अबला,  बेचारी और दुखियारी है.  पर वास्तव में ऐसा   नहीं है ये सब जानते है  पर क्योकि   “कांफ्लिक्ट” या दरार पड़ने  से बहुत से हित  सध जाते  है इसलिए दोष की सही पहचान ना करके पुरुष को सीधा सीधा हर बात के लिए दोषी मान लिया जाता है.  ज़माने को प्रोग्रेसिव कम से कम मै तब मानूंगा जब ये ज़माना समझने लगेगा कि दोष की उत्पत्ति में स्त्री का भी उतना हाथ हो सकता है जितना एक पुरुष का. अभी कानून इस बात को कम समझता है और तथाकथित मर्द जो एक राजनैतिक पार्टी में ज्यादा पाए  जाते है वो तो बिल्कुल नहीं समझते अभी.
 
अमरेंद्रजी आप पे तरस  आता है पर फिर भी आप बधाई के पात्र है कम से कम आपने स्त्रियों से जुड़े उन “undercurrents” को उभारा जो सामान्यतः आज के युग जो के पुरुषो के “feminization” का  युग  है  में ज्यादा उभर के आ नहीं पाते.  आप के किसी पोस्ट में मैंने शायद ये बड़ा  अच्छा सा शेर पढ़ा था :

 
मैं चाहता भी यही था वो बेवफा निकले
उसे समझने का कोई तो सिलसिला निकले 

 

तो चलिए कम से कम एक ठोस  फायदा तो ये हुआ कि हम सब समाज की तल्ख़ सच्चाइयो से परिचित तो हुए. एक समझने का सिलसिला तो निकला कि शक्ल से भोली दिखने वाली स्त्री या भोले से दिखने वाले पुरुष  के कितने रंग हो सकते है नहीं तो सिर्फ अभी तक सब कुछ प्राइवेट ही रह जाता था. हुस्न के लाखो रंग बोलो कौन सा रंग देखोगे!!!  

कम से कम आप अपनी  “immaturity” का  शिकार होके  शोषित या घुटते रहते  तो आपको और ना हम लोगो को ये दिन देखने पड़ते  पर आपने वही ग्रामीण संस्कृति में व्याप्त भोलापन जाहिर कर दिया और आप एक  “immaturity” सें दूसरे ” “immaturity” तक वानर के नाई उछल  कूद करते रहे. पहले तो आप एक काले नागिन की पूँछ को चुहिया की  दुम  समझ के थामे रहे ये रही आपकी  पहली “immaturity ” .

दूसरी   “immaturity”  आपने ये दिखाई कि आप ने अपना कुत्तापन नहीं दिखाया. मतलब डलवा लेते गले में एक पट्टा और शोषित होते रहते जैसे आज सारे जाहिल मर्द बराबरी के नाम पे हो रहे है.. आप बगावत पे उतर आये कि भाई अब मै और शोषित नहीं होऊंगा और मामला पब्लिक “dispute ” हो गया.  आप सठिया गए और परदे के पीछे का सच आपने जाहिर कर दिया. आप ये भूल गए कि जिस आज के समाज में आप रह रहे है अगर आप स्त्री के पीछे दुम हिलाने की कला नहीं जानते  तो आप समझिये लैंड माइन पर चल रहे है.  दुम कायदे से हिला सकते हो या थूक के चाट सकते हो तब तो किसी स्त्री के पीछे पड़िये नहीं तो खामोश होके बौद्धिक जुगाली करते रहिये..

सुप्रीम कोर्ट क्या लंठो का समूह है जो कह रहा है कि जोरू की गुलामी करो जो अपनी खैरियत चाहते है..आप इतने बाँवरे हो गए कि आपने ये भी नहीं जाना कि आपकी लड़ाई सिर्फ बौराई स्त्री जात से ही नहीं उस मर्द जात से भी है  जो सिर्फ नाम के मर्द है.  आप इस विडम्बना को भी भूल  गए कि आज के युग में जब आप किसी स्त्री से सहानुभूति प्रकट करेंगे तो आप “sympathizer ” नहीं “womanizer ”   कहलायेंगे.  खैर इतना झेलने के बाद मै उम्मीद करता हू कि आप कुछ तो समझदार हुए ही होंगे..

जुस्तजू जिसकी थी उस को तो न पाया हमने
इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हमने… (शहरयार)

 
चलते चलते आपसे और अन्य से यही गुज़ारिश है कि ये  सूत्र कम से कम याद रखे कि अगर स्त्री नाम की मुसीबत  से बचना चाहते है तो: 

 
१. कुत्तो के  जैसे  दुम  हिलाने की कला  आती हो तो प्रेम करे वरना कुत्तो की तरह लार ना टपकाए. 
 
२. प्रेम में पड़के नागिन की पूँछ को  चुहिया की पूँछ ना समझे वरना अंजाम वोही होगा जो सिर्फ खुदाजी जानते होगे. 

 
३. स्त्री को नहीं समझेंगे उसको चाहने से पहले तो ये तय रहा कि मज़ा के बाद सजा आपसे जरूर मिलने आएगी. 

   
*************************

 
जो  पाठक कुछ मिस्सिंग सा अनुभव कर रहे हो वे सन्दर्भ में दिए गए लिंक का अनुसरण करके लेख को बेहतर समझ सकते है. वैसे अमरेंद्रजी जिनका जिक्र इस पोस्ट में आया है आप इनको फेसबुक   पे पा सकते है.
मूर्खता को छोड़कर सचेत बने

मूर्खता को छोड़कर सचेत बने

सन्दर्भ:


 
Pics credit:

20 responses

  1. A reader named Chandrapal S Bhasker on Men’s Rights Movement ( A Forum On Facebook) said :

    Arvind ji, behtareen article likha hai aapne. hamare hindustan ko aaj aap jaise sachet aur teevr naujawaon ki zaroorat hai jinke mulya auraton ke isharon par skhalit nahin hote. ishwar, allah, wahe guru, god etc etc aapko salaamat rakh aapko mardon ke haq ki ladai ladne aur kshamta pradaan kare.

    *************************

    My response:

    Dhanyavad Chandrapal S Bhaskerji for appreciating my take on this very pertinent issue…I shall remember your words…

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  2. Further exchange of views :

    Chandrapal S Bhasker Arvind ji, agar aapko aitraaz na ho to main kuch doston ki madad se aapke article ko urdu mein aunvaad kara kar urdu padne wale bhaiyon ko muhaiyyia karna chahonga.
    6 minutes ago ·

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    ‎My response:

    Yes , I have no objection at all. Please do it as early as possible. Why would I come in way of such good gesture ? Please do execute this idea.

  3. ‎Rajesh Kumar said on Men’s Rights Movement Forum said :

    Wah Arvind Jee, Aapaki Kalam ki taqat to salaam.

    चलते चलते आपसे और अन्य से यही गुज़ारिश है कि ये सूत्र कम से कम याद रखे कि अगर स्त्री नाम की मुसीबत से बचना चाहते है तो:

    १. कुत्तो के जैसे दुम हिलाने की कला आती हो तो प्रेम करे वरना कुत्तो की तरह लार ना टपकाए.

    २. प्रेम में पड़के नागिन की पूँछ को चुहिया की पूँछ ना समझे वरना अंजाम वोही होगा जो सिर्फ खुदाजी जानते होगे.

    ३. स्त्री को नहीं समझेंगे उसको चाहने से पहले तो ये तय रहा कि मज़ा के बाद सजा आपसे जरूर मिलने आएगी.

    ****************************

    My response to Rajesh Kumarji:

    आप ने सराहा ये मेरे लिए बड़ी बात है..आप खुद एक सुलझे हुए व्यक्तित्व के मालिक है सो आपकी प्रसंशा काफी मायने रखती है…ये लेख किसी के दर्द भी अभिव्यक्ति है..

    सो इस लेख में छुपे निहितार्थ बहुतो को लिए रास्ता दिखाने लायक हो सकते है इसलिए इस दर्द में डूबे अनुभव को लेख का रूप दे दिया

  4. Nice command over hindi…Mra Chetan Joshiji said on facbook…

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    हर्ष हुआ ये देखकर कि मेरी मेहनत बेकार नहीं गयी ..इस पोस्ट के पाठको की संख्या बढती जा रही है….ये पूरा लेख किसी व्यक्ति के वास्तविक प्रकरण से जुड़ा है ..

    सो अपना अनुभव आप लोगो से शेयर किया ताकि आप लोगो के अनुभव का दायरा बढे …

    एक लेखक को भले ही प्रसंशा के दो शब्द ना कहें मगर आप उसके लेख को बहुत ध्यान से पढ़ रहे है तो ये भी एक बड़ी अचीवमेंट है.

    -Arvind K Pandey

  5. यह कमेंट बज पर दिया हूँ, यहाँ भी रख दे रहा हूँ:

    @Arvind k Pandey ji , आपके अपने प्रेक्षण हैं, ठीक भी हैं, पर दरअसल ‘नेट’ पर दिखे स्त्री-चरित्र से पूरी राय बनाना मैं अपनी तरफ से एक शीघ्रता मानता हूँ।

    इधर मैने अपनी सहृदयता का मखौल उड़ाते देखा है लोगों को, स्त्री-पुरुष दोनों को, जब मैने किसी तथ्यगत विश्लेषण की बात की तो ऐसे समझा दिया गया, कुछ यू कि ‘क्या अभी भी दिल उसी में लगा है’ , ‘क्या तुम्हें कोई और नहीं मिलती’, ‘बियाह कर लो..’ । ऐसों के समझाने में जानता हूँ कि मेरे प्रति कोई सदिच्छा नहीं है वरन ‘बड़े’ बनने का छद्म और सियासी धर्म निभाने की अदा अवश्य है।

    एक बड़ा बेसिक सा बिचार आया कल मेरे मन में, अगर किसी खाए पिये अघाए और दूसरे को टेंसन देने वाली, अपसंस्कृतियाँ फैलाने वाली को लोग खास वक्त में ‘नारी’ समझ के जेनुइन कहने लगें, तो ऐसे समय में ऐसी महिलाओं से अ-संवाद रख लेने में कोई बुराई नहीं है। नेट पर की-बोर्ड की खट-पट करने वाली महिलाओं में मैने गजब की ‘जड़ता’,‘आत्ममुग्धता’,‘स्वार्थपरकता’ और पाखंड देखा है।

    पर इन सबसे हम पूरी नारी जाति पर राय नहीं बना सकते। नारी जाति का सच आज भी तुलसीदास के शब्दों में ‘पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं’ का है। बचपन से नारी-दुर्दशा देखी है मैने, समाज नारियों के प्रति अदय रहा है जैसे दलितों के प्रति ( यथा : http://amrendrablog.blogspot.com/2011/09/blog-post_22.html
    अब इस बीडियो में देखिये, क्या कभी किसी पुरुष को इस तरह स्त्री ने मारा होगा, नहीं, पर पुरुष बड़ी परुषता से यह कार्य कर रहा है, मामला बिहार के नितीश के क्षेत्र का है: http://khabar.ibnlive.in.com/videos/59621

    ऐसी महिलाओं पर मैं भी अत्याचारी सा हो बैठूँगा अगर ‘जाति’ आधारित कोई सरलीकरण करूँगा। नेट की दुनिया की महिलाओं की बात अलग है, ये अक्सरहा वैयक्तिक स्वार्थ साधन , क्षुद्र उद्देश्य-पूर्णता और कलुष-वमन की शिकार रही हैं, यह बात मैं कठोर बन कर कह रहा हूँ क्योंकि दुर्बल और लाचार बन कर बहुत कुछ भोगा हूँ, इसलिये।

    आपने लिखा जो आपको रुचा, सबको अपनी दृष्टि की स्वतंत्रता होनी चाहिये। आपका आभारी हूँ! सादर..!

    1. @Amrendraji

      ‘नेट’ पर दिखे स्त्री-चरित्र से पूरी राय बनाना..

      कौन राय बना रहा है भाई..आप या मै🙂 जहा तक राय बनाने की बात मैंने राय सिर्फ नेट पर दिखे चरित्र से नहीं बनायीं है बेहतर है आप ये बात भली बात जान ले …वैसे मैं नहीं समझता गधा कभी आपने आपको शेर दिखा सकता है नेट पर..चरित्र चाहे नेट पर हो या रियल लाइफ में एक ही होता है.. आप “misrepresentaion ” नेट पर भी कर सकते है और रियल लाइफ में भी पर एक दिन खाल उधड जाती है और आपका धेंचुपना सबके सामने आ जाता है..अगर आप convinced है तो आप राय नेट से भी बना सकते है मेरा तो यही मानना है. पर हां फैक्ट्स आपके पास सोलिड हो तब.

      दूसरी बात है अम्रेंद्रजी आप के जवाब से जाहिर है कि आप “सॉफ्ट कॉर्नर” रखते है स्त्रियों के प्रति..रखे …हम भी रखते है पर आँखे खोल कर ताकि नागिनो जिनकी जमात आज ज्यादा है उनसे मै बचा रहू..उनकी मदद भी करने को तैयार हूँ अपने सेल्फ रेस्पेक्ट की धज्जिया उड़ने के बाद भी पर केवल सुपात्र के लिए..नागिनो के लिए मै एक ही सिद्धांत में यकीन करता हू ..कुचल डालो उनका फन..

      हम भी आपको विडियो दिखाते है..देखिये ना..आपको हमने हरका था पर आप ठहरे “सॉफ्ट कॉर्नर” वाले …जरा तस्वीर का दोनों पहलु देख लिया करिए…

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      Making you read something in Khaalis Angrezi .. Extremely sorry for that..However, sometimes few things can be better expressed in some particular language only

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      Half-truths and convoluted tales seem to have dominated the Hindi blogging world since its origin and it’s still the case is indeed worrying. Well, no amount of propaganda can dominate the truth. The present issue with so many absurd bifurcations or secondary branches would still make make its presence felt the right way despite strong efforts to deviate from the main issue. ” If you can’t convince them, confuse them.” – Harry S Truman.

      However, the greater truth is that the rays of darkness cannot win the battle with rays of light. No wonder the words of eminent lawyer Ram Jethmalani sounds so true: Repeated bullshit does not become wisdom.

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  6. Any thinking is a forced condition stared at birth and any thinking should never be taken as truth or should cause hate or love but just– hum, so much thinking with no common denominators

    One should never quote another human or that human’s mind has another notch of thought from the stronger thinker

    The problem with men, is man’s ego unable to not take blame for the why earth humans male and female have evolved to date

    The male held the pen and all gods and with that power man couldn’t even do a good job because of mans need to capture and and kill any independent thought

    बारे में मानव जीवन शक्ति नहीं है मनुष्य के बीच हो या औरत, लेकिन एक मात्र एक प्रजाति के क्रमिक विकास

    1. Justmegain

      Remember I am entitled not to publish comments.. Greater the vagueness, the greater becomes the chance for the comments not to see the light of publication.. “Any thinking is a forced condition”… A reason why I am going to avoid saying anything on your comment.. I cannot be compelled to be influenced by your thinking…

      1. When one puts their thoughts to the world, then the incoming thoughts might or might not be what the thought transmitter might want but to truly know how the world thinks the poster has no entitlement to publish or not publish unless the incoming thoughts are personal or threatening

        To post to the word, one must look at comments from a neutral point of view and not let the feelings of irritation ooze in

        Their is never right or wrong thinking but just thinking stared on it’s journey in early life by many influencing starting points

        A little tip about humans being influenced by another humans thoughts ;
        A human’s mind set takes years of reinforcement to form and so a few words or written words changes no humans thoughts

        The fact that the male in the human species is dominant and controlled cultural human life is truth that won’t go away even if humans want to close their eyes!

  7. I see my 2 comments were not published!

    Now that speaks volumes for freedom of speech and a world that only wants to hear what the controlling media wants the weak human mind to read

    Goodbye to a site that is a head with no ears!

    1. @Justmeagain

      Won’t you let me not relax also ? I was away from the net and relaxing. That’s why the comment could not be published. Please don’t be so hypersensitive while reacting and framing conclusions (flawed ones off course)

      1. Sorry for my hast !
        I thought this was like instabolg, where the comment went on instantly

        There isn’t one human ever born and lived long enough not to have flawed moments and this can be added to my pile that continues to get larger

        There was and never will be a moment that this person commenting will ever profess to be right on any earthly happenings but just sees a little light shining through the blinded window of life

      2. Stay calm and try to reflect on pleasant times when your labor of love gets stressful!

        Hypersensitive seems to be also a part of the poster’s makeup!

  8. @ Further exchange of views with Amrendraji on Buzz on this issue:

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    My response:

    @Amrendraji

    ‘नेट’ पर दिखे स्त्री-चरित्र से पूरी राय बनाना..

    कौन राय बना रहा है भाई..आप या मै🙂 जहा तक राय बनाने की बात मैंने राय सिर्फ नेट पर दिखे चरित्र से नहीं बनायीं है बेहतर है आप ये बात भली बात जान ले …वैसे मैं नहीं समझता गधा कभी आपने आपको शेर दिखा सकता है नेट पर..चरित्र चाहे नेट पर हो या रियल लाइफ में एक ही होता है.. आप “misrepresentaion ” नेट पर भी कर सकते है और रियल लाइफ में भी पर एक दिन खाल उधड जाती है और आपका ढेंचुपना सबके सामने आ जाता है..अगर आप convinced है तो आप राय नेट से भी बना सकते है मेरा तो यही मानना है. पर हां फैक्ट्स आपके पास सोलिड हो तब.

    दूसरी बात है अम्रेंद्रजी आप के जवाब से जाहिर है कि आप “सॉफ्ट कॉर्नर” रखते है स्त्रियों के प्रति..रखे …हम भी रखते है पर आँखे खोल कर ताकि नागिनो जिनकी जमात आज ज्यादा है उनसे मै बचा रहू..उनकी मदद भी करने को तैयार हूँ अपने सेल्फ रेस्पेक्ट की धज्जिया उड़ने के बाद भी पर केवल सुपात्र के लिए..नागिनो के लिए मै एक ही सिद्धांत में यकीन करता हू ..कुचल डालो उनका फन..

    हम भी आपको विडियो दिखाते है..देखिये ना..आपको हमने हरका था पर आप ठहरे “सॉफ्ट कॉर्नर” वाले …जरा तस्वीर का दोनों पहलु देख लिया करिए…

    Amrendraji said:

    @Arvind k Pandey ji , अवश्य आपकी बात विचारणीय है। इस “सोफ्ट कार्नर” ( यदि यह सोफ्ट कार्नर है तो ) को किसी गलत के प्रति किया जाने वाला कोर्नर नहीं बल्कि भविष्य में किसी निर्दोष के प्रति मेरी ओर से गलत न किये जाने की सदिच्छा/एलर्टनेस के रूप में देखें। कहीं आपके मंतव्य को न समझ पाने की स्थिति में अपनी बुद्धि की सीमा को स्वीकार करता हूँ। सादर..!

    **********************************

    My final response to Amrendraji:

    @Amrendraji

    इस पोस्ट में मेरा ये अंतिम कमेन्ट है अगर परिस्थितया मजबूर ना करे कमेन्ट के लिए दुबारा तो..एक “rejoinder ” अनिवार्य है आपके “निर्दोष के प्रति मेरी ओर से गलत न किये जाने की सदिच्छा” वाली बात सुनकर..एक बात मन में और भी उभरी आपके ” ‘नेट’ पर दिखे स्त्री-चरित्र से पूरी राय बनाना मैं अपनी तरफ से एक शीघ्रता मानता हूँ” … आप शायद भूलते है जिस लीगल वर्ल्ड से मै सम्बद्ध रखता हू उसका एक “well settled principle ” है कि “one is considered innocent until proven guilty” (Latin Ei incumbit probatio qui dicit, non qui negat ) लिहाजा निर्दोष के प्रति अन्याय ना होने पाए इसकी फिक्र या सदिच्छा कम से कम आपसे तो कमतर नहीं ही है..

    कानून और फिलोसफी का मै एक अच्छा विद्यार्थी रहा हू यह ज़ाहिर करने में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है पर ये ज़ाहिर करना यहाँ इसलिए ज़रूरी है कि आप को कही ये लगता है कि मैंने ” राय” बनाने में जो सिर्फ “नेट” से उपजी है थोड़ी “शीघ्रता” की है..पर राय अगर मैंने कोई बनायीं है तो “एक से बहुत” वाली नहीं है .उसके पहले जितने “फैक्ट्स ऑन रिकॉर्ड” हो सकते है उनका अध्ययन करने के बाद ही मै किसी राय पे पंहुचा हू.. लिहाज़ा शीघ्रता वाली बात आप पे लागू हो सकती है ( इतना झेलने के बाद भी) पर कम से कम मेरे साथ नहीं..

    हाँ मै मानवीय भूल कर सकता हूँ जो आप के ऊपर भी बराबरी से लागू है और वो है “”To Err is Human” …और इसपे किसी का वश नहीं …सो ऐसी गलतियों का मै ज़िम्मेदार नहीं चाहे मै कितना बड़ा ही विषय विशेषज्ञ क्यों ना हूँ.. बल्कि कोई भी नहीं है..डूब तो Titanic भी जाता है .आप और हम क्या कर सकते है..कोई अल्लाह मिया तो हम है नहीं…

    अंत में आपने एक नितीश के क्षेत्र का विडियो पोस्ट किया जिसमे पुलिस वाले भीड़ को जिसमे स्त्रियाँ भी शामिल है को दौड़ा दौड़ा कर पीट रहे है और आप जनाब फरमाते है ” क्या कभी किसी पुरुष को इस तरह स्त्री ने मारा होगा” ..काहे को कनफुजिया रहे है अमरेन्द्र बाबू ? इसे आप स्त्री और पुरुष के परिपेक्ष्य में देखेंगे या पुलिस की ज्यादती के रूप में देखेंगे ?..

    शायद गंदे संस्कार देर से जाते है. It’s tough task to change habit..Well, I am aware of this dilemma.. आप के मन के अन्दर भी जो गंदे संस्कार पड़े है अब वो जाए या ना जाए इसकी मुझे चिंता नहीं पर कम से कम “टाईटअल्वा या परिपेक्ष्य” के साथ तो खेलवाड़ ना करे अगर आप वाकई सीरिअस है तो..

    तर्क की भाषा में कहू तो पुलिसवाले तो रोज ही स्त्रियों से ज्यादा पुरुषो को दौड़ा दौड़ा के मारते है बाहर और हवालात में दोनों जगह और इतना मारते है कि मर भी जाते है…आप वो विडियो पोस्ट करेंगे? .लिहाज़ा ज्यादती को ज्यादती के रूप में ही देखे….महिला पुलिसकर्मी भी माँ बहन की गालिया देते हुए पीटती है और दौड़ा दौड़ा के मारती है तो कल को क्या मै इसे औरतो का अत्याचार कहूँगा पुरुषो के प्रति जैसा आप जाहिर करने की कोशिश कर रहे है?

    चलिए मै भी Men’s rights एक्टिविस्ट वालो से कहता हू ऐसे विडियो पोस्ट करो जिसमे महिला पुलिसकर्मी अच्छी अच्छी गालिया देते हुएँ पीट रही है..और सबका टाइटल वोही होगा जो अमरेन्द्रजी ने जाहिर किया है..

    ..और हमारे विडियो में तो किसी की जान चली गयी धोखा, ज्यादती, जुल्म की इन्तहा और abuse of law process के कारण ..किसका मामला ज्यादा गंभीर है बताये तो? .तो ठाकुर (त्रिपाठीजी) वो हाथ (जान) मुझे दे दो तब बतियाते है..Sorry for the dark humour at the end of response!! For the long response as well🙂

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    Amrendra Tripathiji said:

    @Arvind k Pandey जी, कहीं फ़्रीक्वेंसी न बैठ पाने से मेरी बातों का विटवीन द लाइन्स शायद संप्रेषित नहीं हो पा रहा है। आपकी सारी बातों को मैं बहुत सकारात्मक रूप में ले रहा हूँ। सविस्तार इतनी चीजें रखने के लिये मैं आपका कृतज्ञ हूँ

  9. My conversations with Vaibhav Mani Tripathiji on Facebook:

    Vaibhav Mani Tripathiji said:

    सही कहू तो अरविन्द जी आपका पहला पोस्ट है जिसका सर पैर समझ नहीं आया…

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    My response to Vaibhavji:

    ‎Vaibhav Mani Tripathiji

    बड़े आश्चर्य की बात है आपके कुछ पल्ले नहीं पड़ा🙂 .दिल ने अनुमोदन कर दिया कि वैभव भाई को कुछ ना समझ में आया पर दिमाग ये मानने से इंकार कर रहा है और कमबख्त ये अन्दर अन्दर गा भी रहा …जो ना समझे वो अनाड़ी है🙂

    वैभवजी इसी खातिर कि पाठको को कुछ मिस्सिंग सा ना लगे मैंने लेख के अंत में इस “मिस्सिंग एलेमेन्ट ” का जिक्र करते हुए पाठको के लिए दो लिंक भी दिए..शायद आप जल्दीबाज़ी में लिंक को देखना भूल गए..अमरेंद्रजी को तो आप जानते ही होंगे कायदे से ..उनका भी प्रोफाइल लिंक मैंने लेख में हाइपर लिंक कर दिया..तो तब भी आपको समझ में नहीं आया ? ..आप के पेज पे गौरव कबीरजी इस लेख को पसंद करके गए और जिस लिंक पे आप पूछ रहे है उस पर गौरव के अलावा अन्य लोगो ने लाइक किया और जहा जहा भी ये लेख पढ़ा गया वहा पे बहुत ही व्यापक प्रतिक्रिया हुई है और इसका दायरा बढ़ता जा रहा है..इसका मतलब स्पष्ट है लेख को लेके जो सूक्ष्म समस्या आपको है वो औरो को नहीं..

    खैर मैंने आपकी मन की बात को समझ लिया..मै चंद लाइनों में बताता हू क्या बात है..बात अमरेंद्रजी के पर्सनल मुद्दे से जुडी हुई है. अमरेन्द्र जी मेरे अच्छे मित्रो में से एक है और मै समझता हू आपके भी वो अच्छे मित्रो में होंगे…मै अमरेन्द्र जी के पर्सनल मुद्दे का जिक्र नहीं करूँगा क्योकि उसमे मेरी दिलचस्पी नहीं और दूसरी बात मै हिंदी ब्लोगिंग वर्ल्ड का मेम्बर नहीं जो किसी के पर्सनल मुद्दे की टांग तोड़े साइबर वर्ल्ड में और तीसरी बात मै इतना खलिहर नहीं हूँ …तो वैभवजी आप अमरेन्द्र जी ही जान लीजियेगा कि क्या पर्सनल मुद्दा है.

    पर लेख इसलिए लिखा गया क्योकि हिंदी ब्लॉगिंग वर्ल्ड में ये मुद्दा पिछले एक ढेड़ साल से बवंडर मचाये हुए है और ना जाने हिंदी वाले भाई लोग इतना वक्त कहा से निकाल कर आपस में गुत्थम गुत्था कर रहे है …एक दूसरे को नंगा कर रहे है…खैर मै कभी इस मामले में कभी ना पड़ा हां देखता जरुर रहा इस मुद्दे पर मचा घमासान. अभी एक दो दिन पहले अमरेन्द्रजी ने बज्ज़ पे इसी मुद्दे पर फिर एक लिंक पेश किया .वो लिंक में मेरे लेख के अंत में भी है…मैंने भी एक प्रतिक्रिया वहा दिया..उसी प्रतिक्रिया को मैंने एक लेख के रूप में स्त्री पुरुष के संबंधो के बनते बिगड़ते स्वरूप को दर्शाते हुए दर्ज करा दिया कुछ पैराग्राफ और जोड़कर..यहाँ भी यही ख्याल रखा कि कम से कम अमरेन्द्रजी के पर्सनल मुद्दे का जिक्र ना हो ..सिर्फ उसको एक मामूली सा आधार बनाया…कहने का मतलब ये है कि अमरेन्द्र कि जगह सुरेन्द्र भी रख दे तो चलेगा …

    उम्मीद ही अब आप समझ गए होंगे..बाकी आप अमरेन्द्र भाई से पूँछ सकते है..

    ****************************************

    Vaibhav Mani Tripathi said:

    असल में अरविन्द कि धीमे स्पीड कि वजह से आपके लिंक्स यहाँ दिखे नहीं , शायद पेज आधा अपलोड हुआ अब खोला पढ़ा और समझ रहा हूँ….

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    Arvind K.Pandey said:

    ..ये सुनकर तसल्ली हुई….अभी अभी मुझे याद आया ..जरा इस लेख के कमेन्ट बॉक्स में जाए ..अमरेंद्रजी का एक जवाब है..उसे पढ़ ले बहुत कुछ समझ में आ जाएगा ..

    *************************************

  10. डाँ.भारतेन्दु मिश्र -हिन्दी लेखक मंच्, नई दिल्ली, ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा linkedin पर कहा कि :

    ” फिर भी ज्यादातर स्त्रियाँ पुरुष के शोषण का शिकार होती हैं। असल मे वे पुरुष की मिल्कियत समझी जाती हैं।जहाँ उन्हे मौका मिलता है या आर्थिक/सामाजिक सत्ता मिलती है तो वो भी अपना रंग दिखाती हैं।इसमें बुराई क्या है?”

    *******************************

    My response to Dr. Bhartendu Mishraji:

    वैसे जहा वे किसी की मिल्कियत नहीं समझे जाने के भ्रम में जीती है पहले उन समाजो की चिंतनीय दशा पे गौर करिए ..यहाँ वो किसी की मिल्कियत है ऐसा कह कर बरगलाने वालो के बीच भी ये समाज उस समाज से बेहतर स्थिती में है..और तुम किसी की मिल्कियत नहीं हो कह के इस समाज को उन समाजो के समकक्ष लाया जा रहा है जहा मेंटल हॉस्पिटल ज्यादा है बजाय सुलझे हुए घरो के.

    तो आप पूछते है दिक्कत क्या है..दिक्कत यही है कि नारी मुक्ति के नाम पे घर मत तोडिये ..नारी मुक्ति के नाम पे तमाशा बंद करिए और ऐसे myths मत शेयर करिए कि पुरुष ज्यादा स्त्रियों का शोषण करते है और स्त्रियाँ कम..तो आप क्या चाहते है कि ऐसा समाज उत्पन्न जहा दोनों एक दूसरे का बराबर शोषण करे या आप जैसो का बस चले तो ऐसा समाज बना दे जहा पुरुष केवल उनके तलवे चाटे..

    रहा सवाल उनके सम्मान करने ये उन्हें अधिकार देने का तो मै नहीं समझता कि भारत देश में हिन्दू संस्कृति के बीच उन्हें जितना सम्मान, इज्ज़त, प्रेम और स्नेह मिला वो किसी और संस्कृति में या किसी अन्य समाज और संस्कृति के बीच कभी मिल सकता है..यहाँ इतना प्रेम सम्मान मिला है कि ढूँढने निकल जाए तो हर मोहल्ले में आपको जोरू के ग़ुलाम और henpecked husbands मिल जायेंगे जिनकी पत्निया अगर दिन को रात कह दे तो क्या मजाल उनके पति दिन कह दे..

    इसलिए नारी मुक्ति के नाम पर जहर मत बाटिये बस.

    ***************************

  11. Manu pathak on LinkedIn said:

    बिल्कुल सही है आज की औरत कानून का गलत इस्तेमाल कर रही है. खुद को अबला नारी कह के दया का पात्र समझती है.

    *******************************

    My response to Manu:

    मनुजी आप ने अपने विचार रखे ..इसके लिए धन्यवाद..आप सही है कि स्त्रियों ने कानून के दम पे हर अवैध हरकत करना शुरू कर दिया इसके बाद भी सरकारी फाइलों में ये अबला के रूप में दर्ज है..इसके बाद भी वे किसी भी फोरम पे अपने को पीडिता दर्ज कराने में कोताही नहीं बरतती. इसका नतीजा सिर्फ ये है कि समाज धीरे धीरे टूट कर बिखर रहा है..इनके पीछे उन विदेशी ताकतों का भी हाथ है जो ये चाहती है कि भारतीय समाज में बिखराव आये.

  12. Vaibhav Mani Tripathi On Facebook said:

    देखीये साथी बात बहुत सच्ची और सीधी है… यह सह अस्तित्व मानव द्वारा रचा गया सबसे बड़ा और शानदार झूठ है. या तो शासन करने वाले है या शासित होने वाले. और जा जब मजबूत हुआ तो दुसरे वर्ग में जगह बनाने के सारे कुचक्र रचता है… कई घरेलु हिंसा कि शिकार औरतों को हम दोषी नहीं मान सकते .. कितना भी स्त्री शोषक है का जय घोष करके भी ….और कई बार ऐसा भी देखा है ३ बेटियों वाले घर में बाप कि हैसियत सही को सही कहने कि नहीं है जब कि वही कमाता है, वही मुखिया है परिवार का. दलित, आदिवासी समाज के लोग जो वर्षों शोषित रहे अब वे यदि सही जगह पर है तो किसी का शोषण कर रहे हैं… और उनके पास शोषण के समर्थन में तर्क हैं…

    . जैसे एक से एक स्तापित दलित साहित्यकार फेसबुक पर टिप्पड़ी लिख रहे थे अन्ना आन्दोलन के समय कि दलित वर्गीय कोई अगर भ्रष्टाचार करता है तो दुत्कारा जाता है उच्चवर्गीय नहीं ऐसा क्यूँ? .. तो भाई इस शोषण पर चर्चा कर के आपस में वैमनस्य मत बढाइये… क्रूर सच्चाई यही है कि दुनिया में २ ही कॉमे हैं शोषक और शोषित … और कार्ल मार्क्स से आगे बढते हुए कहना चाहूँगा कि जैसी उनकी कल्पना थी एक शोषण हीन समाज कि तो वो असंभव है … हाँ एक पारदर्शी व्यवस्था बनायीं जाये …. जहाँ हर किसी को कुछ दिन शोषित होने के बाद अगले कुछ दिन शोषण करने का मौका दिया जाये….जिससे असंतोष न उपजे और सबको शोषण कि जलन और शोषण कि ठंढक दोनों का आनंद मिले भरपूर .

    **************************

    My response to Vaibhav Mani Tripathiji:

    भाई आपने पते की बात कही है अपने स्टाइल में कार्ल मार्क्स का कत्था लगाके ..वैसे मै उस बिरादरी से दूर रहता हूँ जो इस मार्क्स साहित्य में व्याप्त शब्दावली का उपयोग करते है क्योकि साफ़ बात कहू मेरी चीजों को इतने क्लिष्ट तरीके से समझने की आदत नहीं.. अब पॉइंट पे आके कुछ एक बातो पे टिप्पणी करूँगा जो आपने कही है कि सौ प्रतिशत आदर्श समाज की कल्पना करना व्यर्थ की बात है. ये समझने के लिए हमे मार्क्स को घोटने की जरुरत नहीं..ये बात आप एक विज्ञान के प्रयोगशाला में भी समझ सकते है कि एक प्रयोग के लिए आप सौ प्रतिशत आईडिअल परिस्थितियों का निर्माण नहीं कर सकते..कि ये चलने के लिए थोडा सा फ्रिक्शन आवश्यक है..

    बहरहाल बात स्त्री पुरुष संबंधो की हो रही है और आप कि इस बात से सहमत हूँ कि “एक पारदर्शी व्यवस्था बनायीं जाये” ..हम भी तो यही कह रहे है इशारो में तब से ..अगर पुरुष को हर चैंनल से गुज़ारा जा सकता है तो अपने को पुरुष से हर मामले में बराबर समझनेवाली फिर भी स्त्री नाम पर हर अलग सी सुविधा की डीमांड करने वाली जात को क्यों ना हर उन कठिन परिस्थितियों उन मुश्किलात से गुज़ारा जाए जिनसे एक आम पुरुष गुजरता है. तभी ना खालिस पारदर्शिता आएगी. ऐसे थोड़ी ना आएगी कि एक को विशेष सुविधाए देकर बाकियों को सड़ने के लिए छोड़ दो..ऐसे पारदर्शिता आएगी क्या कि बराबर होने का दंभ होने के बावजूद आप के लिए अलग कानून हो जिसमे आप जब चाहे झूठा आरोप लगा कर शोषण करे ? …

    हम भी तो यही कह रहे है कि नारी मुक्ति के नाम पे स्त्री पुरुषो के बीच ज़हर मत घोलो..और तब से क्या बक रहे है ? और ये अच्छा है कि अब पुरुषो में अपने अधिकार को लेकर और अपने सेल्फ रेस्पेक्ट को लेकर चेतना जगी है..फेमिनिस्ट वर्ग का बैंड तब बजेगा (और बजना चालु हो गया है ) जब पुरुष भी अपने अधिकारों के लेकर सचेत हो और उन पर उसी चेतना से विचार विमर्श करे जैसा कि फेमिनिस्ट बिरादरी करने का दंभ पालती है (पर करती नहीं).

    तो वैभव भाई घबराएं नहीं हमारे प्रयासों से वैमनस्य नहीं एक आदर्श पारदर्शिता स्थापित होने जा रही है..वैमनस्य तो फेमिनिस्ट बिरादरी ने बढाया है नारी मुक्ति के नाम पे औरतो को कोर्ट के दहलीज़ में खड़ा करके कुछ सही और ज्यादा गलत मुकदमो के साथ!!!!

    चलते चलते हम प्रेमी कौम के है इसलिए ये गीत अक्सर गाता रहता हूँ..हम है राही प्यार के जो भी प्यार से मिला हम उसी के हो लिए🙂 अब इस बात से भी पारदर्शिता बढती हो तो बढे🙂

    ********************************

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