Monthly Archives: September, 2011

इसे अच्छी तरह समझे कि नारीवाद का पक्ष-विपक्ष समझना या पुरुष के अधिकारों की चर्चा करना स्त्री या उसके जायज अधिकारों का विरोध नहीं है !!!

 

 

ये  आपके साथ भी हो सकता है!!

ये आपके साथ भी हो सकता है!!

 

मेरे पिछले post पे प्रबुद्धजनो ने बहुत कुछ चिंतन  मनन किया. काफी कुछ समझ में आया. कुछ बाते साफ़ हुई और कुछ एक बातो का स्पष्टीकरण मै देना उचित समझता हू इतनी सारी बाते सुनने के बाद. यद्यपि ये सब बाते मै किसी ना किसी रूप में इसी पोस्ट पर टिप्पणी के रूप में पोस्ट कर चुका हूँ पर लगा कि इन्हें एक नए पोस्ट का शक्ल दे देने से शायद बात दूर तक जायेगी. एक बात तो स्पष्ट है कि जैसे ही आप नारीवादी या नारियो के बदलते स्वरूप पर चर्च शुरू करते है आपको नारी विरोधी मान लिया जाता है. पता नहीं इस तरह का सरलीकरण क्यों कर लिया जाता है ?  नारी अधिकारों की जब जब बात होती है तो उसे स्त्रियो को आगे बढ़ाने के सन्दर्भ में होता है और उनका उनको हक़ दिलाने के सन्दर्भ में ही ऐसी बातो को देखा जाता है. तो ये नहीं समझ में आता है  कि पुरुष के अधिकारों के बारे में बात करना कैसे स्त्री विरोधी हो गया जब स्त्री अधिकारों के बारे में बात करना पुरुष विरोध नहीं है तो ? दूसरी बात ये है कि किसी भी आन्दोलन या विचारधारा के पक्ष विपक्ष दोनों पहलुओ पे विचार करना क्या गलत है ? अगर आज हम नारीवाद के स्याह पक्ष या विकृत पक्ष को  व्यापक  और पूरी तरीके से  समझना चाहते  है तो इसे कैसे गलत मान कर, इसे  स्त्री विरोधी मान कर हम क्यों इतनी हाय तौबा मचाते है ? क्या दोनों पक्ष को देखना जुर्म है ? 

अब जैसे इस बात को ही देखिये कि नारियो के बिगड़ते स्वरूप को दिखाना मतलब दोनों के बीच “वैमनस्य” बढ़ाना होता है. ऐसा सोचने वाले ये भूल  जाते है कि वैमनस्य की भूमिका तो उसी दिन पड़ गयी जिस  दिन नारीवाद की अवधारणा का  इस देश में उदय हुआ. स्त्रियों के दुर्दशा की आड़ लेते हुए एक उस समाज का निर्माण शुरू हो गया जिसमे मर्द शक्ल से तो मर्द ही लगता है पर आत्मा का स्त्रीकरण हो गया. इस की आड़ में ऐसे कानूनों का निर्माण हो गया जिससे समाज में ठहराव के बजाय अराजक तत्त्वों की प्रधानता हो गयी. नतीजा ये हो गया की शादी जो आपसी  समझ और विश्वास पे टिके रहते  थे आज पूर्णतयः एक “कांट्रेक्ट” हो गया है. शादियों से पहले इस तरह के कागजात पे दस्तखत होने लगे है जैसे व्यापारिक लेन देन के वक्त होता है!!!  स्त्रियो के उनके जरुरी   अधिकार दिलाना तो चलिए समझ में आता है पर इसको एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करके समाज का खतरनाक ढंग से ध्रुवीकरण कर देना आगे आने वाले वक्त में काफी घातक होगा. क्या पता छब्बीस जनवरी को राजपथ पे स्लट मार्च भी होने लगे ? क्या पता स्लट मार्च का आगे आने वाले समय पे राष्ट्रीयकरण  हो जाए ? क्या पता “गुलाबी चड्ढी” देश का राष्ट्रीय प्रतीक बन जाए ?

बहरहाल वैमनस्य बढ़ाने वाली बात तो मुझे यही कहना है कि ““एक पारदर्शी व्यवस्था बनायीं जाये” जिसमे अगर पुरुष के कुकर्मो की व्यापक जांच पड़ताल हो तो स्त्री के दोषों का  भी सूक्ष्म परिक्षण हो. अगर पुरुष को हर चैंनल से गुज़ारा जा सकता है तो अपने को पुरुष से हर मामले में बराबर समझनेवाली फिर भी स्त्री नाम पर हर अलग सी सुविधा की डीमांड करने वाली जात को क्यों ना हर उन कठिन परिस्थितियों उन मुश्किलात से गुज़ारा जाए जिनसे एक आम पुरुष गुजरता है. तभी ना खालिस पारदर्शिता आएगी. ऐसे थोड़ी ना आएगी कि एक को विशेष सुविधाए देकर बाकियों को सड़ने के लिए छोड़ दो. ऐसे पारदर्शिता आएगी क्या कि बराबर होने का दंभ होने के बावजूद आप के लिए अलग कानून हो जिसमे आप जब चाहे झूठा आरोप लगा कर शोषण करे ?  नारी मुक्ति के नाम पे स्त्री पुरुषो के बीच ज़हर मत घोलो. ये अच्छा है कि अब पुरुषो में अपने अधिकार को लेकर और अपने सेल्फ रेस्पेक्ट को लेकर चेतना जगी है..फेमिनिस्ट वर्ग का अहम् और वर्चस्व तब टूटेगा  जब पुरुष भी अपने अधिकारों के लेकर सचेत हो और उन पर उसी चेतना से विचार विमर्श करे जैसा कि फेमिनिस्ट बिरादरी करने का दंभ पालती है (पर करती नहीं) और तब जाके एक  आदर्श पारदर्शिता स्थापित होगी. वैमनस्य तो फेमिनिस्ट बिरादरी ने बढाया है नारी मुक्ति के नाम पे औरतो को कोर्ट के दहलीज़ में खड़ा करके कुछ सही और ज्यादा गलत मुकदमो के साथ!!!!  पुरुष के अधिकारों के स्थापित होने के बाद ही एक सही संतुलन स्थापित होगा. इससें वैमनस्य बढेगा एक गलत सोच है. जब वैमनस्य बढ़ने के बारे में आपने तब नहीं सोचा जब स्त्री अधिकारों के नाम पे मनमाने कानून बनाये जा रहे थे तो पुरुष अधिकारों की बात को लेकर इस प्रकार का भय क्यों उत्पन्न किया जा रहा है ? 

आज स्त्रियों ने कानून के दम पे हर अवैध हरकत करना शुरू कर दिया इसके बाद भी सरकारी फाइलों में ये अबला के रूप में दर्ज है..इसके बाद भी वे किसी भी फोरम पे अपने को पीडिता दर्ज कराने में कोताही नहीं बरतती. इसका नतीजा सिर्फ ये है कि समाज धीरे धीरे टूट कर बिखर रहा है..इनके पीछे उन विदेशी ताकतों का भी हाथ है जो ये चाहती है कि भारतीय समाज में बिखराव आये. जिनकी ये सोच है कि आज भी सिर्फ स्त्रियो का भयंकर शोषण होता है एक अबला के रूप में वो शायद उस शुतुरमुर्ग की तरह है जो रेत में सिर गाड़ के बैठा है. ऐसे लोग बैठे रहे रेत के अन्दर सिर गाड़कर पर जो सच देखना चाहते है उन्हें बहुत कुछ दिखेगा.

कहा जाता है कि  भारत में स्त्री अधिकारों ने उन्हें इतनी छूट दे दी कि अब उन्हें लगने लगा है कि वे किसी की मिल्कियत नहीं.  इससें पहले उन समाजो की कडुवी सच्चाई नहीं देखी गयी जहा स्त्रिया वे किसी की मिल्कियत अब नहीं रही है  इस  भ्रम में जीती है.  उन समाजो की चिंतनीय दशा पे गौर नहीं किया गया जहा ऐसी सोच पहले से व्याप्त है. खैर  यहाँ वो किसी की मिल्कियत है ऐसा कह कर बरगलाने वालो के तमाशो  के बीच भी ये भारतीय  समाज विदेशी समाजो से बेहतर स्थिती में है जहा शादी के कुछ एक घंटो के बाद आपसे सहमती से तलाक हो जाता है . विडम्बना यही है कि तुम किसी की मिल्कियत नहीं हो कह के इस  भारतीय समाज को उन समाजो के समकक्ष लाया जा रहा है जहा मेंटल हॉस्पिटल ज्यादा है बजाय सुलझे हुए घरो के.

नारी मुक्ति के नाम पे घर मत तोडिये.  नारी मुक्ति के नाम पे तमाशा बंद करिए और ऐसे अर्धसत्य  मत शेयर करिए कि पुरुष ज्यादा स्त्रियों का शोषण करते है और स्त्रियाँ कम. तो आप क्या चाहते है कि ऐसा समाज उत्पन्न जहा दोनों एक दूसरे का बराबर शोषण करे या नारीवादियो  का बस चले तो ऐसा समाज बना दे जहा पुरुष केवल उनके तलवे चाटे.

रहा सवाल उनके सम्मान करने का या  उन्हें अधिकार देने का तो मै नहीं समझता कि भारत देश में हिन्दू संस्कृति के बीच उन्हें जितना सम्मान, इज्ज़त, प्रेम और स्नेह मिला वो किसी और संस्कृति में या किसी अन्य समाज और संस्कृति के बीच कभी मिल सकता है..यहाँ इस भारत देश में इन्हें  इतना प्रेम सम्मान मिला है कि ढूँढने निकल जाए तो हर मोहल्ले में आपको जोरू के ग़ुलाम  मिल जायेंगे जिनकी पत्निया अगर दिन को रात कह दे तो क्या मजाल उनके पति दिन कह दे..

इसलिए नारी मुक्ति के नाम पर जहर मत बाटिये बस.

पिटना और पीटना दोनों ही ना हो तो अच्छा है ना !!

पिटना और पीटना दोनों ही ना हो तो अच्छा है ना !!

Reference: 

Pics article:

बंद करिए ये झूठ बोलना, ये प्रचार करना कि स्त्री जात लाचार, कमजोर, अबला, बेचारी और दुखियारी है!! स्त्रिया पुरुषो से बेहतर शोषण करती है!!!

 

चेहरे के पीछें जो चेहरा छुपा है उसको भी देखे

आज का युग एक विचित्र सा युग है. जब  तक आप चुप चाप सहते रहते है व्यवस्था से उपजी विकृतिया तब तक आप लायक है.  जरा सा आपने मुंह क्या खोला बस सारी व्यस्था आपके पीछे हाथ धो के पड़ जाती है.  जब तक आप स्त्री के कदमो में लोटकर उसकी हर गलत बात को सम्मानपूर्वक ग्रहण करके उसकी चरण वंदना करते रहते है तब तक ठीक और जिस दिन आपने विद्रोह किया ये कहने को प्रोग्रेसिव और समय के साथ चलने वाली व्यवस्था स्त्री के  द्वारा शोषण करने की  काबिलियत के अवलोकन के  मामले में बैकवर्ड हो जाती है.
 
स्त्री पुरुष  के संबंधो में यही व्यवस्था आज भी  स्त्री को आज भी आदिम युग के समकक्ष ही रखती है. मतलब  वह आज  भी एक लाचार, कमजोर, अबला,  बेचारी और दुखियारी है.  पर वास्तव में ऐसा   नहीं है ये सब जानते है  पर क्योकि   “कांफ्लिक्ट” या दरार पड़ने  से बहुत से हित  सध जाते  है इसलिए दोष की सही पहचान ना करके पुरुष को सीधा सीधा हर बात के लिए दोषी मान लिया जाता है.  ज़माने को प्रोग्रेसिव कम से कम मै तब मानूंगा जब ये ज़माना समझने लगेगा कि दोष की उत्पत्ति में स्त्री का भी उतना हाथ हो सकता है जितना एक पुरुष का. अभी कानून इस बात को कम समझता है और तथाकथित मर्द जो एक राजनैतिक पार्टी में ज्यादा पाए  जाते है वो तो बिल्कुल नहीं समझते अभी.
 
अमरेंद्रजी आप पे तरस  आता है पर फिर भी आप बधाई के पात्र है कम से कम आपने स्त्रियों से जुड़े उन “undercurrents” को उभारा जो सामान्यतः आज के युग जो के पुरुषो के “feminization” का  युग  है  में ज्यादा उभर के आ नहीं पाते.  आप के किसी पोस्ट में मैंने शायद ये बड़ा  अच्छा सा शेर पढ़ा था :

 
मैं चाहता भी यही था वो बेवफा निकले
उसे समझने का कोई तो सिलसिला निकले 

 

तो चलिए कम से कम एक ठोस  फायदा तो ये हुआ कि हम सब समाज की तल्ख़ सच्चाइयो से परिचित तो हुए. एक समझने का सिलसिला तो निकला कि शक्ल से भोली दिखने वाली स्त्री या भोले से दिखने वाले पुरुष  के कितने रंग हो सकते है नहीं तो सिर्फ अभी तक सब कुछ प्राइवेट ही रह जाता था. हुस्न के लाखो रंग बोलो कौन सा रंग देखोगे!!!  

कम से कम आप अपनी  “immaturity” का  शिकार होके  शोषित या घुटते रहते  तो आपको और ना हम लोगो को ये दिन देखने पड़ते  पर आपने वही ग्रामीण संस्कृति में व्याप्त भोलापन जाहिर कर दिया और आप एक  “immaturity” सें दूसरे ” “immaturity” तक वानर के नाई उछल  कूद करते रहे. पहले तो आप एक काले नागिन की पूँछ को चुहिया की  दुम  समझ के थामे रहे ये रही आपकी  पहली “immaturity ” .

दूसरी   “immaturity”  आपने ये दिखाई कि आप ने अपना कुत्तापन नहीं दिखाया. मतलब डलवा लेते गले में एक पट्टा और शोषित होते रहते जैसे आज सारे जाहिल मर्द बराबरी के नाम पे हो रहे है.. आप बगावत पे उतर आये कि भाई अब मै और शोषित नहीं होऊंगा और मामला पब्लिक “dispute ” हो गया.  आप सठिया गए और परदे के पीछे का सच आपने जाहिर कर दिया. आप ये भूल गए कि जिस आज के समाज में आप रह रहे है अगर आप स्त्री के पीछे दुम हिलाने की कला नहीं जानते  तो आप समझिये लैंड माइन पर चल रहे है.  दुम कायदे से हिला सकते हो या थूक के चाट सकते हो तब तो किसी स्त्री के पीछे पड़िये नहीं तो खामोश होके बौद्धिक जुगाली करते रहिये..

सुप्रीम कोर्ट क्या लंठो का समूह है जो कह रहा है कि जोरू की गुलामी करो जो अपनी खैरियत चाहते है..आप इतने बाँवरे हो गए कि आपने ये भी नहीं जाना कि आपकी लड़ाई सिर्फ बौराई स्त्री जात से ही नहीं उस मर्द जात से भी है  जो सिर्फ नाम के मर्द है.  आप इस विडम्बना को भी भूल  गए कि आज के युग में जब आप किसी स्त्री से सहानुभूति प्रकट करेंगे तो आप “sympathizer ” नहीं “womanizer ”   कहलायेंगे.  खैर इतना झेलने के बाद मै उम्मीद करता हू कि आप कुछ तो समझदार हुए ही होंगे..

जुस्तजू जिसकी थी उस को तो न पाया हमने
इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हमने… (शहरयार)

 
चलते चलते आपसे और अन्य से यही गुज़ारिश है कि ये  सूत्र कम से कम याद रखे कि अगर स्त्री नाम की मुसीबत  से बचना चाहते है तो: 

 
१. कुत्तो के  जैसे  दुम  हिलाने की कला  आती हो तो प्रेम करे वरना कुत्तो की तरह लार ना टपकाए. 
 
२. प्रेम में पड़के नागिन की पूँछ को  चुहिया की पूँछ ना समझे वरना अंजाम वोही होगा जो सिर्फ खुदाजी जानते होगे. 

 
३. स्त्री को नहीं समझेंगे उसको चाहने से पहले तो ये तय रहा कि मज़ा के बाद सजा आपसे जरूर मिलने आएगी. 

   
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जो  पाठक कुछ मिस्सिंग सा अनुभव कर रहे हो वे सन्दर्भ में दिए गए लिंक का अनुसरण करके लेख को बेहतर समझ सकते है. वैसे अमरेंद्रजी जिनका जिक्र इस पोस्ट में आया है आप इनको फेसबुक   पे पा सकते है.
मूर्खता को छोड़कर सचेत बने

मूर्खता को छोड़कर सचेत बने

सन्दर्भ:


 
Pics credit:

मर्द तो एक कुत्ता है जिसके गले में औरत ने डाला पट्टा है..

 

 

 

 

 

 

 

मर्द तो एक कुत्ता है जिसके गले में औरत ने डाला पट्टा है..

 

अगर ये गीत इतना अश्लील ना होता तो आधुनिक गीतों की माला में शान से चमक रहा होता ..आश्चर्य है कि डेल्ही बेल्ली के गीत पे इतना हंगामा मचा पर अश्लीलता के सर्वोच्च पायदान पर खड़े इस गीत पर किसी की नज़र नहीं गयी..इससें तो यही समझ में आता है कि सेंसर बोर्ड नाम की संस्था को खल्लास कर देना चाहिए.

हा मै इस “कुत्ताप्रधान” गीत की इसलिए तारीफ करना चाहूँगा कि कम से कम इसने इस सच्चाई को सटीक शब्दों में दर्शाया कि कैसे आज की औरते /लड़किया मर्दों के गले में कुत्ते का पट्टा डाल कर कुत्ते की तरह दम हिलाने पे मजबूर कर देती है “इश्क ” नाम के हसीन फरेब में फँसाकर. वैसे आजकल के स्त्रीनुमा मर्द है ही गले में पट्टा डालने लायक.

बंध गया पट्टा, देखो बन गया कुत्ता 

बाँध इश्क का पट्टा देखो बन गया कुत्ता 

बंध गया पट्टा, देखो बन गया कुत्ता 

कुड़ी ने डाली बोटी, दूध भिगोई रोटी 

अजी प्यार से पुचकारा 

पुचु पुचु बोल पुकारा 

अजी प्यार से पुचकारा 

पुचु पुचु बोल पुकारा

तुने समझा की लव है 

तू इसका अब रब है 

कभी बजी जो घंटी 

डोंट वारी माय फ्रेंड बंटी

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वैसे गीत के बोल समूचे में आप यहाँ देख और सुन सकते है:

http://www.lyricsmint.com/2011/04/kutta-mika-singh-pyaar-ka-punchnama.html

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गीतकार: लव रंजन 

संगीतकार :क्लिंटन सेरेजो, हितेश सोनिक 

गायक : मीका सिंह 

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Pics Credit: Pic One

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Ghost Of Gujarat Riots: A Panacea For Secular Souls Lying On Their Death Beds

Ghost Of Gujarat Riots: A Panacea For Secular Souls Lying On Their Death  Beds

The ghost of Gujarat riots acts as panacea for secular souls lying on their death beds. The horror stories conceived by the psuedo-intellectuals still make their presence felt whenever the right wing politics makes its presence felt in this nation. The most amazing thing is that people talking about the killings of Muslims at the hands of Hindus in 2002 Gujarat riots seem to be trapped in some sort of time warp. I mean they fail to acknowledge the role of Narendra Modi in light of recent happenings.

It’s hard task for them to realize that Gujarat has become role model for growth and economic prosperity. They fail to realize that half-truths and falsehood sustained by them with help of biased Indian and foreign media are losing strength with each passing day as we come to face-to-face with new facts pertaining to the riots. They still hail Narendra Modi as “butcher” even as the butcher has now attained new heights with a clean image- an image fit enough to be in the race to emerge as new Prime minister. New heights attained by Narendra Modi has made him pain in the ass for soul indulging in secular politics.

The Gujarat riots provide us an interesting glimpse into the functioning of media and Indian politics. It shows how our media and politics are crippled by mediocre minds, who lack ability to intercept the new realities that have emerged in India and world outside. It’s very clear that politics in India has always been aimed to grasp the power and it’s never been people oriented. It’s never been growth oriented. It’s never been aimed at true “Bharat Nirman“. On the contrary the unholy nexus of power hungry politicians with slavish media always worked to materialize their vested interests. So we have likes of Teesta Setalvad who ” cooked up macabre tales of wanton killings” like “a pregnant Muslim woman Kausar Banu was gangraped by a mob, who then gouged out the foetus with sharp weapons”.

We have likes of Arundhati Roy who used their fertile imagination to talk about killings that never took place at all. The Western media believing these sincere “agents of Satan” painted Modi in all wrong colours and like always used their flawed writings to enter in India bashing. Their writings made India appear a nation that does not respect human rights of minorities!! As a result of such India bashing our secular governments learnt the right lesson and ensured that likes of Afzal and Kasab have their plates of “Biryani” behind the bars!!!

The modus operandi is now not a well guarded secret. The secular writers and media persons of this nation first churn out bullshit and then it gets spread to other parts of world, wherein such half-truths are treated as gospel truth by like minded souls who convert them into special stories. The main intention is to derail the growth of India. That’s the reason why when Karan Thapar interviews Narendra Modi it becomes necessary for him to flaunt his limited knowledge about Godhra happenings, forgetting that Gujarat has entered into new mode after the incident. However, the time has stopped for secular souls and to them the only thing that has taken place in the universe since it came into origin after the big bang is Gujarat riots!!!!

I need to appreciate Ram Jethmalani that he made realize the secular fool Karan Thapar that people like him who own American or British accent usually have a very poor IQ level. It’s pathetic to see that even likes of Romila Thapar can stoop down to an all-time low to appease the secular forces. So she can make a shrill cry that Ayodhya verdict was based on faith and not on facts without bothering to know the content of the judgment in reality. The real tragedy is that most of the other publications or electronic channels make little effort to go into details. They keep repeating the flawed opinions as that serves their vested interest quite well rather than insipid truth. Truth does not make news. However, twisted truth does manage to find many takers.

How can we forget that secular UPA government went out of the way to establish anti- constitutional Banerjee committee, which ensured that Godhra train burning looks “accidental” ? Now that’s the way secularism in India is being promoted. The lies related with minorities after given larger than life image are being presented as truths while the truths related with majority are being presented as falsehood !! What’s really stunning is that media including foreign which boasts of ensuring truth never bothers to cross check the authenticity of facts if it involves the interests of minorities but to ensure the “culpability” of Modi they can pressurize even the Apex court.

The same media never bothers to enquire as to how come so many awards were given by the Indian government to Teesta Stalvad when she had been guilty of lying on oath? How came she became part of government managed committees? Who ensured that a convict like Binayak Sen be part of Planning Commission? Why the media never sheds tears over the way UPA or secular governments misuse constitutional powers?

Ghost Of Gujarat Riots: A Panacea For Secular Souls Lying On Their Death  Beds

Why is the media so hyper conscious in targeting anything remotely serving the cause of Hindus? In other words, the way Indian media is interested in targeting Hindu forces makes it clear that it’s too agent of foreign forces, which wish to disturb the stability in South Asian region. These forces are using the tried and tested “divide and rule” method and dirty minds in UPA with help of gestures like introduction of “Prevention of Communal and Targeted Violence(Access to Justice and Reparations), 2011″ ( Communal Violence Bill) are making confrontation a reality. The Indian media is more interested in chasing myth like “Hindu Terrorism” instead of sabotaging the reality in form of Islamic terrorism which has now reached inside the corridors of Parliament and Courts!!! Well, it’s time for the conscious citizens to ensure the demise of secular media and secular government and get it replaced with a government which really thinks about their welfare in sound way with right policies.

Recently, I had a meaningful conversation with New Delhi based senior journalist Jayanta Bhattacharya over the distorted face of truth when it comes to Gujarat riots. I am presenting the conversation as it is. It has some fascinating facts including the recent findings, which makes it quite clear that media loves to portray falsehood and not truth. Let me remind the readers that conversation started when one gentleman hailed Narendra Modi as “Butcher of Gujarat” . I must make it very clear that I am no great fan of Modi but it really bothers me that making caricature of people doing good work has become a special feature of Indian minds. I also do not appreciate the way my dear friend has hailed Narendra Modi as “Mahatma Modi” but I must say he is one of the few who has the guts to speak the truth without being afraid of the repercussions.

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Jayanta Bhattacharya:

Butcher of Gujarat? Who? If you are talking about Narendra Modi then I must say that you are a victim of Con-led UPA propaganda. Under Con rule in Gujarat more communal riots took place. In 2002, more Hindus died in the post-Godhra riots than Muslims, that started with the heinous murders of innocent Hindu pilgrims by blood-thirsty jihadis in the Sabarmati Express near Godhra. It was Mahatma Modi, the angel of peace who brought the riots to a stop within 48 hours thus saving the lives of many, many more Hindus. Do you have any idea what you are saying?

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Arvind K. Pandey:

Well, the recent verdict delivered by Supreme Court is a hard slap on the faces of people seeking culpability of Narendra Modi in 2002 riots. However, the dull minds refuse to accept the reality. Allan Johannes seems to be one of them for whom distorted truth and falsehood is more dear than truth!!

Though the magistrate is yet to deliver the final verdict, it can still be stated that it’s truth that ultimately shines and not the propaganda engineered by dirty secular minds.

From the news item:

The Supreme Court on Monday refused to pass any order on Gujarat chief minister Narendra Modi’s alleged inaction to contain the 2002 Gujarat riots after the Godhra carnage and referred the matter to the concerned magistrate in Ahmedabad for a decision.

“God is great!” — tweeted Gujarat chief minister Narendra Modi on Monday summed up his reaction to the Supreme Court direction in the 2002 Gulburg Society riots case in just three words.

The reaction of the 60-year-old BJP leader reflected his relief over the order as he was being accused time and again by opposition Congress and activists of culpability in 2002 riots…….

The bench made it clear that there was no need for it to further monitor the riot cases. BJP hailed Supreme Court’s order and said that it was a victory for Modi.

Source: The Sunday Indian

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Jayanta Bhattacharya:

And, it is a fact that Congress councilor from Godhra participated in the Godhra carnage, and the post-Godhra riots were carried out by mostly Youth Congress members (http://bit.ly/gJsYBU). Starting from the Godhra murders (for which an all-Muslim team was convicted with Haji Billa and some sentenced to death) to the post-Godhra riots, more Hindus were killed than Muslims. I can provide facts and figures to prove my point. The Godhra murders and the subsequent rioting was a part of well-planned scheme by ISI and its Congress agents to defame the Gujaratis and weaken Indian nationalists.

From the news item:

NEW DELHI: The Congress has been going to town over Best Bakery and other instances of the Narendra Modi government’s complicity in the anti-Muslim violence which shook Gujarat last year. But when..

Source: Cong silent on cadres linked to Guj riots

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Arvind K. Pandey:

You are damn right… Thanks for setting the records straight in this regard.. I am really upset the way Indian and world media deals with real facts. I am no lover of Modi but when is one so cocksure about the involvement of Modi as a “butcher” what’s preventing them to acknowledge the new facts, which prove that riots were the handiwork of dubious elements with whom Modi had no connection at all ? One sees the so-called “butcher” but what about the “butchers” involved in Godhra train carnage? The world ( read Indian media and biased foreign media) never discuss it openly.

Shame on secular souls who hatched a conspiracy to make the Godhara carnage appear ” accidental”. It’s a real insult to talk with such secular minds and listen their arguments ! !

I hope Jayanta has read this latest news item about one of the greatest butchers in modern times Narendra Modi, wherein ” US Congressional Research Service, a think-tank which provides support to the US Congress, has stated that Narendra Modi has streamlined economic growth in Gujarat, removed red tape in functioning of the government, curtailed corruption and given special emphasis on infrastructure in Gujarat”

Source: The Times Of India

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Jayanta Bhattacharya: ‎

I, as an Indian would like to see a better tomorrow. I want my country to be prosperous. I want my country to be free from foreign agents scheming and perniciously eating it from within. I want to see my country being respected world over. When I travel outside my country, I want to see respect for me in the eyes of the citizens/subjects of the lands I travel. I want to see poverty alleviated from my motherland. I want to see people educated in my country. I want to venture out of my house without the fear of being killed/harmed by terrorists or communal forces or any other criminal. I want to live without fear, prejudice and hatred. I want to be a truly free man in a free democracy where appeasement policies do not buy votes of religious communities. I want to be treated equally as a Muslim or a Christian or a Dalit despite being a Hindu and yet have the freedom to be proud of my faith. I want the policies of my nation to be governed by the people of nation and not by the OIC or the Vatican. I shall, therefore, do everything possible to see Mahatma Modi, the angel of peace and God’s chosen one as the Prime Minister of India. PERIOD.

Into that heaven of freedom, my Father, let my country awake. Vande Mataram!

Ghost Of Gujarat Riots: A Panacea For Secular Souls Lying On Their Death  Beds

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References:

Gujarat Riots

Economic Times

Modi On Gujarat Riots

Teesta Setalvad

Karan Thapar With Modi

Karan Thapar With Ram JethMalani

Romila Thapar On Ayodhya Verdict

Banerjee Committee

Congress and Gujarat Riots

Supreme Court Refuses To Rule On Modi

US Congressional Research Service

Delhi High Court Blast

Jayanta Bhattacharya

Pics Credit:

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हिंदी एक रुका हुआ ट्रक किसी व्यस्त रास्ते पर!

 

हिंदी: अपनों के बीच ही अजनबी सी

हिंदी: अपनों के बीच ही अजनबी सी

हिंदी दिवस पर हिंदी के उत्थान की  बात करना मुझको बेमानी बात लगती  है.  सिर्फ एक रस्म अदायगी भर लगती है.  जब साल भर इसके उत्थान के बारे में फिक्र नहीं तो एक दिन इसके बारे में बतिया लेने से कोई ख़ास फर्क आएगा ऐसा मै नहीं समझता. ये देश जिस रस्ते पर चल पड़ा है उसमे  हिंदी प्रेम के बारे में बात करना मतलब गधे की सींग तलाशना है.  फादर बुल्के कहते थे संस्कृत महारानी, हिंदी बहूरानी और अंग्रेजी नौकरानी है। आज कौन सी भाषा कौन से पायदान पर है ये बताने की जरुरत नहीं.  इस देश में चांडाल बुद्धिजीवियों  का एक ऐसा वर्ग है जो संस्कृत को एक मृत भाषा बताता है और अंग्रेजी के उत्थान को हमारे विकास के लिए आवश्यक मानता है. गाँधी बाबा लगता है  फाल्तुये बोल गए कि ” मेरा यह विश्वास है कि राष्ट्र के जो बालक अपनी मातृभाषा के बजाय दूसरी भाषा में शिक्षा प्राप्त करते हैं,  वे आत्महत्या ही करते हैं. यह उन्हें अपने जन्मसिद्ध अधिकार से वंचित करती है. विदेशी माध्यम से बच्चों पर अनावश्यक जोर पडता है . वह उनकी सारी मौलिकता का नाश कर देता है. विदेशी माध्यम से उनका विकास रुक जाता है और अपने घर और परिवार से अलग पड जाते हैं . इसलिए मैं इस चीज को पहले दरजे का राष्ट्रीय संकट मानता हू.”
 
गाँधी बाबा के हिसाब से हिंदी को ना आगे बढ़ाना एक राष्ट्रीय संकट है पर आजकल के धूर्त और मक्कार बुद्धिजीवियों की नज़र में  ऐसा कुछ नहीं बल्कि हिंदी या संस्कृत के विकास के बारे में बात करना देश को बैलगाड़ी युग में ले जाने के समान है. लिहाजा आज का युवा वर्ग चाहे वो ग्रामीण पृष्ठभूमि से हो या शहरी  टूटी फूटी अंग्रेजी में गिटपिट करना अपनी शान समझता है. हिंदी का दायरा सिमटता जा रहा है और बीबीसी  हिंदी   के प्रसारण  के सहित हिंदी को प्रोत्साहित करने वाली तमाम गतिविधियों पर लगाम लगती चली जा रही है. हिंदी को इन्टरनेट पर हो या मोबाइल पर अपनी उपस्थिति जताने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है जबकि ये विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओ में से एक है. वही स्पैनिश या अंग्रेजी का प्रचलन आधुनिक संचार माध्यमो में बढ़ा है वजनदार तरीको से. आपको यदि उच्च स्तर की  शोध सामग्री चाहिए वो अंग्रेजी में उपलब्ध है पर हिंदी में आप इन्टरनेट पे ढूँढते रह जाइए आपको नहीं मिलेगी.
 
ये तो भला हो हिंदी फिल्मो का (जिसमे अंग्रेजी में बात करने वाले कलाकार काम करते है)  जो सतही ही सही पर हिंदी को जनसामान्य में प्रचारित कर रहे है ” चिल  मारो  ” तरीकें से.  नहीं तो हिंदी का ख्याल अक्सर रेलवे स्टेशन पर याद आता है जहा पर महापुरुषों के हिंदी प्रयोग को लेकर कथन हर दीवार पर टाँगे गए है. पता नहीं वो कौन महान बन्दा है जिसको रेलवे स्टेशन पर हिंदी के बारे में बात करने का विचार जमा पर कम से कम मेरी नज़र तो एक बार ऐसे वाक्यों पर पड़ ही जाती है. हिंदी संस्थान या हिंदी के साहित्यकार आज के युग में हिंदी की कैसी सेवा कर रहे है ये हम सबको पता है. या तो ये गुटबाजी में व्यस्त है या फिर उस क्लिष्ट भाषा में बात करेंगे जो जनसामान्य की समझ से परे हो. ऐसी कहानियां लिखेंगे जिसका विषय  ही इतना अपरिचित सा होगा कि भाषा पर गौर करने की हिम्मत ही नहीं होंगी.

कवि नागार्जुन: सही मायनों में एक जनकवि

 प्रेमचंद अगर लोगो के बीच पहचाने गए तो इसकी एक वजह यह थी कि उनकी  कृतिया आम बोलचाल की भाषा में थी और “मैकू”, “होरी” और “धनिया” जैसे पात्र हमारे ही बीच के लोग थें. ये ऐसी एकेडेमिक या क्लिष्ट भाषा नहीं बोलते थें कि लोगो के पल्ले ही ना पड़े. इसका नतीजा ये हुआ है कि हिंगलिश के प्रयोग को ही वाह वाही मानकर हिंदी के बढ़ते प्रभाव के समकक्ष रख दिया गया. लिहाजा शुद्ध हिंदी जिसके बोलने से संस्कृत से घनिष्टता से प्रदर्शित हो इसकी संभावना बिल्कुल ही खत्म हो गयी है. हालात तो यह है कि अगर आप कठिन शब्दों का प्रयोग कर दे तो शायद आपको हिंदी डिक्शनरी की भी भूमिका का निर्वाहन करना पड़ सकता है.
 
चलते चलते मै इतना कहूँगा कि हिंदी की दशा किसी संस्थान के भरोसे सुधरने से रही ना कि उन हिंदी के उन साहित्यकारों से  जिनका काम है केवल दोष निकालकर हर उस प्रयोग को विफल कर देना जो कि हिंदी के प्रयोग से जुडी हो. हिंदी की दशा तब सुधरेगी जब हम खुद इसके प्रयोग को लेकर सचेत रहेंगे अन्यथा आप कितनी बड़ी बड़ी बाते कर लें हिंदी दिवस पर हिंदी एक वयस्त सड़क पर जाम ट्रक के सिवा कुछ नहीं रहेगी.
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 कुछ इधर से कुछ उधर सें. हिंदी में दो कविता भी पेश कर रहा हू. एक  तो बाबा  नागार्जुन ने लिखी  है. और दूसरी कविता श्री राकेश गुप्ताजी ने लिखी है. नितीश कुमार के द्वारा  कामिल  बुल्के   पर लिखा एक छोटा  सा  आलेख भी प्रस्तुत  है. 
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गुलाबी चूड़ियाँ

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प्राइवेट बस का ड्राइवर है तो क्या हुआ,
सात साल की बच्ची का पिता तो है!
सामने गियर से उपर
हुक से लटका रक्खी हैं
काँच की चार चूड़ियाँ गुलाबी
बस की रफ़्तार के मुताबिक
हिलती रहती हैं…
झुककर मैंने पूछ लिया
खा गया मानो झटका
अधेड़ उम्र का मुच्छड़ रोबीला चेहरा
आहिस्ते से बोला: हाँ सा’ब
लाख कहता हूँ नहीं मानती मुनिया
टाँगे हुए है कई दिनों से
अपनी अमानत
यहाँ अब्बा की नज़रों के सामने
मैं भी सोचता हूँ
क्या बिगाड़ती हैं चूड़ियाँ
किस ज़ुर्म पे हटा दूँ इनको यहाँ से?
और ड्राइवर ने एक नज़र मुझे देखा
और मैंने एक नज़र उसे देखा
छलक रहा था दूधिया वात्सल्य बड़ी-बड़ी आँखों में
तरलता हावी थी सीधे-साधे प्रश्न पर
और अब वे निगाहें फिर से हो गईं सड़क की ओर
और मैंने झुककर कहा –
हाँ भाई, मैं भी पिता हूँ
वो तो बस यूँ ही पूछ लिया आपसे
वर्ना किसे नहीं भाएँगी?
नन्हीं कलाइयों की गुलाबी चूड़ियाँ!

बाबा नागार्जुन

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बड़ा ही खतरनाक रहा, बढ़ना  तेरा विकास,
मुफलिसी के तन से तूने, खींची चादर लाज की…….
झोपड़ियां मिटा के कैसे, पांच सितारा हो खड़े,
गरीबी की रोटी पे तूने, रखी नजर बाज की
हरे भरे बन काट तूने, कंक्रीट के बनाये जंगल,
है खबर इक बड़ी कीमत, हमे चुकानी है इस काज की
दूसरों का पेट भरने, खेत खटता बैल बन जो,
मुद्दत से किसान की बेटी, नही देखी शक्ल प्याज की.
सारा परिवार साथ बैठ, देखता सी ग्रेड फ़िल्में,
ये कौन सी है संस्क्रती, ये कैसी बात आज की?  

संध्या वन्दन भूल बैठे, भूल बैठे जोत बाती,

शोर को संगीत समझे, ना बात करें साज की………

बलशाली के पाँव पकड़ो, तलुवे चाटो नाक रगडो,
भूखे को लात मारो, ना फ़िक्र कोई मोहताज की………

बेशक पैर तले अपनों की लाश, बढ़ना लेकिन है जरूरी, 
तन का हो या मन का सौदा, ना बात करो राज की…


श्री राकेश गुप्ताजी
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 तुलसी के अनन्य भक्त बुल्केफादर कामिल बुल्के रामकथा के मर्मज्ञ तो थे ही, तुलसी के अनन्य भक्त भी थे। वह अपनी मातृभाषा से उतना ही प्रेम करते जितना हिंदी से। जितनी उन्हें अपनी मिट्टी से लगाव था उतना ही भारत से भी। बेल्जियम से भारत आकर मृत्युपर्यंत हिंदी, तुलसी और वाल्मीकि की भक्ति में रमे रहे। साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में उनके अप्रतिम योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने सन 1974 में पद्मभूषण से उन्हें सम्मानित किया गया। फादर का जन्म एक सितंबर 1909, बेल्जियम के प:िमी फ्लैंडर्स स्टेट के रम्सकपैले गांव में हुआ था। शिक्षा यूरोप के यूवेन विश्र्वविद्यालय से इंजीनियरिंग पास की। 1930 में संन्यासी बनने का निर्णय लिया। नवंबर 1935 में भारत, बंबई पहुंचे। वहां से रांची आ गए। गुमला जिले के इग्नासियुस स्कूल में गणित के अध्यापक बने। वहीं पर हिंदी, ब्रज व अवधी सीखी। 1938 में, सीतागढ/हजारीबाग में पंडित बदरीदत्त शास्त्री से हिंदी और संस्कृत सीखा। 1940 में हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग से विशारद की परीक्षा पास की। 1941 में पुरोहिताभिषेक हुआ, फादर बन गए। 1945 कलकत्ता विश्र्वविद्यालय से हिंदी व संस्कृत में बीए पास किया। 1947 में इलाहाबाद विश्र्वविद्यालय से एमए किया। 1949 में डी. फिल उपाधि के लिए इलाहाबाद में ही उनके शोध रामकथा : उत्पत्ति और विकास को स्वीकृति मिली। 1950 में पुन: रांची आ गए। संत जेवियर्स महाविद्यालय में उन्हें हिंदी व संस्कृत का विभागाध्यक्ष बनाया गया। सन् 1950 ई. में ही बुल्के ने भारत की नागरिकता ग्रहण की। इसी वर्ष वे बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् की कार्यकारिणी के सदस्य बने। सन् 1972 ई. से 1977 ई. तक भारत सरकार की केंद्रीय हिंदी समिति के सदस्य बने रहे। वर्ष 1973 ई. में उन्हें बेल्जियम की रॉयल अकादमी का सदस्य बनाया गया। 17 अगस्त 1982 में गैंगरीन के कारण एम्स, दिल्ली में इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हुई। फादर बुल्के कहते थे संस्कृत महारानी, हिंदी बहूरानी और अंग्रेजी नौकरानी है। एक विदेशी होने के बावजूद फादर ने हिंदी की सम्मान वृद्धि, इसके विकास, प्रचार-प्रसार और शोध के लिए गहन कार्य कर हिंदी के उत्थान का जो मार्ग प्रशस्त किया, और हिंदी को विश्र्वभाषा के रूप में प्रतिष्ठा दिलाने की जो कोशिशें कीं, वह हम भारतीयों के लिये प्रेरणा विषय है।

(नितीश कुमार**************************

हिंदी प्रेमी: कामिल  बुल्के

हिंदी प्रेमी: कामिल बुल्के

रेफेरेंस:

 

RADHAKRISHNAN: THE PHILOSOPHER’S PHILOSOPHER

Dr. Radhakrishnan: The Real Man Of  Wisdom

Dr. Radhakrishnan: The Real Man Of Wisdom

Indian soil is the home of mystics and philosophers. Their long-standing involvement with divine affairs has given rise to host of ideologies, which have always enraptured the hearts and minds of all elevated souls. When one talks about Radhakrishnan the image of an educationist, possessing a philosopher’s soul, gets stuck in our consciousness who wished to see his pupils turning into carrier of the India. After all, furtherance of great ‘argumentative tradition’ was his prime aim. This is why he was an educationist par excellence, whose ideas left an indelible impression on everyone who came in contact with him. Strange are the affairs of nature. He appeared at a time when India desperately needed a soul who could unravel the inherent intricacies of Indian philosophical system in a way which enabled the masses, especially the conscious souls, to grasp their meaning without losing sight of their essence. It was none but Radhakrishnan who could do it with ease. After all, he was the nature’s ‘beloved agent’ due to his peculiar bent if mind that intercepted philosophical truths with perfect clarity. In this piece I would like to confine myself to  his philosophical revelations.

We are living in age in which the ‘anxiety of doubt and meaningless is dominant’. In this background, the role of philosophers has gained immense importance. The philosophers bring under their contemplation ‘what time and nature have extinguished’ and thus they gain the power to predict the unpredictable. According to Radhkrishnan the humanity is on the brink of total collapse because mutual mistrust has blocked real communication. We have maintained a negatives silence that has reduced the world into mad-house. This ‘lack of understanding’ that has caused fragmentation of the society needs to be checked. But that can never be achieved if we don’t develop the capacity to look within. “If you want to be a truly loving being, it is essential for you to understand what our feelings are. How cursed mankind is?

We know the right, but we do not do it; we know the wrong, but we cannot abstain from it. It is this cursedness in human nature, which has to be got over. Love, therefore, is not a mere brilliance of intellect but it is discipline of the heart. Without discipline mere brilliance will not do.”In Geeta this inability to execute the desired despite being aware of its advantages has been explained in terms of man’s bond with previous samskaras. Desires can never be annihilated unless man rise above chain of reactions triggered by ignorance—the root cause of all desires. Radhakrishnan sounds true when he says that it needs an intense soul- searching to get above fractured intellectual knowledge and hence come in touch of ‘Intuitive knowing’, which alone makes the inward journey possible. Intuitive knowing, according to him, is unimprisoned by the divisions of space, successions of time or sequences of cause and effect. ‘Intellectual knowledge is a scattered, broken movement of the one undivided infinite life which is all –possessing and ever satisfied…It is through quieting the strivings of the will and the empirical intellect that the conditions are realized for the revelation of the Supreme in an individual soul. Therefore having calm, subdued quiet, patiently enduring and collected, one sees the Self just in the self”. Only the man who has a pure heart (read childlike nature) can know God. In one of the famous episodes in the Upanishad Sanatkumara makes Narada aware of futility of excessive learning. The encyclopedic knowledge of Narada did not make him attain tranquility of mind. Thanks to the wisdom of Sanatkumara that ultimately pushed him beyond the realm of intellect. Faust says:


” I have studied now philosophy
And jurisprudence and medicine
And even, alas theology,
With vision keen, from end to end
And yet poor fool, with all my learning
I am no wiser than before.”

 
It must be very clear from the above disclosures that ‘no amount of theoretical knowledge can serve as a substitute for the practice of life of spirit.’ In other ors, the art of swimming cannot be gained by mere articulation of its rules—it’s by getting into the alone one can turn into a perfect swimmer. One of the drawbacks of present age is that communication between individuals has totally evaporated. Even the inventions of science have not been able to reduce the distance between due to air of mistrust. Mobile flashing may have become a hot-favorite thing in Yuppie circles but it hardly evokes a fruitful dialogue. Similarly, Internet no doubt has shattered boundaries of nation but has it dissolved the loneliness, which exists within the individuals? The answer is emphatic no. Why this monstrous silence has become part of our culture, especially when we are living in a country known for its festivals? One reason for it could be that the age in which we are trapped today has been hijacked by transitions of all sorts. Prominent features of society wrapped in transition phase are ‘disintegration and renewal’. Since we are still in the process of development of society that caters to new ideas and beliefs as its own the confusion has gained upper hand.

Under this circumstances ‘the history of the new world, of one world which is rich in range and majestic in its scope’ can never be attained if we keep on fanning suicidal tendencies breeding separation and cynicism. Radhakrishnan offering a solution says, “The only attitude that we can adopt in the present context is an attitude not of exclusiveness but of comprehension, not of intolerance but of understandings, not of hatred and fanaticism but of appreciation and assimilation of whatever is valuable”. Drawing a rather unusual comparison let me say that rigidity in beliefs only produces Jihadis or, for that matter, communists. For both of them whoever falls outside rather perverse mindset doesn’t deserve a right to live further .If he does manage to survived hi is either a ‘kafir’ or ‘fascist’. Such dangerous classifications alone have turned the world into hell.


According to Radhakrishnan the goal of life should be to rise above day-to-running and get merged with the finer spiritual existence , which all the time keep surfacing form of antipathy towards earthly pursuits. But this can never be the reality so long our identification with ‘selfish ego’ that considers ‘conceptual reason ‘as ultimate doesn’t get shattered. If religion has turned into source of bitterness it’s because of wrong identification with their symbols considering ‘these relative symbols for the absolute truth’. The confusion that arises due to ‘self-confident jugglery’ with symbols and definitions makes realization of “supreme self’ a distant dream .Finally, let’s grasp this fully named perfectly that aim of life is to mould yourself in the image of divine. Radhakrisnan states that “nothing on earth is utterly perfect or utterly without perfection. Those who have the visions of perfection strive continually to increase the perfection ….Life is ever striving for its fuller creative manifestation. The life of God is the fullness of our life.” 

Finally, some thoughts from his book  ” Eastern Religions And Western Thought” : 

 With all her poverty and degradation , her suffering and subjection , India still bears witness to the cult of the spirit . It is not right to complain that India has failed to because the she has followed after things spiritual .She has failed because she has not followed after them sufficiently . She has not learned how to make spirit entirely the master of life , but has created in recent times a gulf between spirit and life and has rested in a compromise .

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 To be inspired in our thoughts by divine knowledge , to be moved in our will by the divine purpose , to mould our emotions into harmony with divine bliss , to get at the great self of truth , goodness , and beauty to which we give the name of God as a spiritual presence , to raise our whole being and life to the divine status , is the ultimate purpose and meaning of human living . Some exceptional individuals have achieved this status and harmony .They are the highest type of humanity yet reached and indicate the final shape which humanity has to assume . They are the forerunners of the new race .

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S_Radhakrishnan: The man who really knew the finer points of Indian philosophy

S_Radhakrishnan: The man who really knew the finer points of Indian philosophy

References:

” Eastern Religions And Western Thought ” by S .Radhakrishnan, Page 56-57.

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