आंधी में सोच समझकर बहे मतलब जोश में होश भी रहे!

 

 

 

 

 

जोश में होश भी रहे !

जोश में होश भी रहे !

 

जो भी वास्तव में सोच रहे है वो देख सकते है कि कौन कौन से खतरे अन्ना को नीलने के लिए खड़े है.  जैसा कि जे पी के साथ हुआ बहुत संभव है वो अन्ना के साथ भी हो . उसकी वजह यही है कि अन्ना सांपो के साथ चल रहे है जो कभी भी पलट कर डस सकते है. कमजोरी भीड़ में तो है ही जो कि सदा जोश से काम लेती है होश से नहीं पर सबसे बड़ा दोष नीतिगत है.  नीतिगत इस मामले में है कि जिनके हाथ में वास्तविक कमान है उनका लोकतान्त्रिक मूल्यों से कोई ख़ास सरोकार नहीं है. अब जब लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से आप को कोई ख़ास लगाव नहीं है तो ज़ाहिर है ये उम्मीद रखना कि भविष्य में आप लोकतान्त्रिक मूल्यों का सम्मान करते हुए आप  मर्यादित आचरण कर पाएंगे मुझे नहीं लगता.

सीधी सी बात है मजबूत ईमारत कभी कमजोर नींव पे नहीं खड़ी हो सकती. काबिल लोग जाने क्या सोचते है ये तो वो जाने  पर मै तो इतना जानता हू कि यहाँ नींव बेहद कमजोर है. कोई मुझसे कह रहा था पता नहीं वो कितना सच कह रहा था या झूठ पर उन्होंने कहा कि जो सदस्य लोकपाल की ड्राफ्टिंग में शामिल है वोही महाभ्रष्ट की श्रेणि में आते है. एक महाभ्रष्ट अग्निवेश नाम के पाखंडी को तो मै भी जानता हू. जब इस तरह के संदिग्ध आचरण वाले आपके नीतिगत फैसलों में दखल देने का अधिकार है तो समझ में नहीं आता कि लोकपाल के सन्दर्भ में लिए जा रहे फैसलों का वास्तविक स्वरूप क्या होगा.  मुझे तो जॉर्ज ऑरवेल के द्वारा रचित “एनिमल फार्म ” की याद आ रही है जिसमे सत्ता के मद में सूअर नियंत्रण से बाहर होकर तमाम कुकर्मो में लिप्त हो जाते है. ऐसा तभी होता है जब आपकी शुरुवात ही गलत तरीकें से हो. तकलीफ तो यही कि हम एक तूफ़ान को जन्म तो दे देते पर अक्सर इसकी पृष्ठभूमि में कमजोर स्क्रिप्ट होती है. अंतत: जनता ठगा सा महसूस करती है और एक नया भ्रष्ट तंत्र खड़ा हो जाता है. जनता एक बार फिर अपने विश्वास के टुकड़े टुकड़े होता देखती रह जाती है.

चूहे के पीछे बिल्ली और बिल्ली के पीछे डागी और उसके पीछे कोई और तो ऐसे तो कोई फायदा नहीं होगा. कुल मिला के चीखना चिल्लाना तात्कालिक रूप से जायज हो सकता है पर सही जीत चिंतन, मंथन और उसके समुचित क्रियान्वन से होती है. और मुझे लगता है इसका नितांत अभाव है अन्ना की आंधी में. बात ये है जब तक हम खुद व्यक्तिगत स्तर पे ईमानदार नहीं होंगे तब तक कोई भी संस्था कुछ नहीं कर पाएगी चाहे वो सुपर लोकपाल ही क्यों ना हो.  इस आन्दोलन कि दो सबसे बड़ी कमिया है. एक तो ये कि ये भी अभी तक जो जन लोकपाल का मोटा मोटा स्वरूप समझ  में आ रहा है वो तो यही है कि एक ही संस्था में असीमित शक्ति होगी और इसकी जवाबदेही किसके  प्रति और किस स्वरूप में होगी ये बिल्कुल अनिश्चित है. यही इसका सबसे बड़ा दोष है.  दूसरा सबसे मूलभूत फर्क ये है कि जनता की अपेक्षाए और उनकी अपेक्षाए जो इस जन लोकपाल नाम का तीर छोड़ रहे है उसमे बहुत फर्क है. जनता  तो शायद यही समझ रही है या उसें महसूस कराया जा रहा है कि जन लोकपाल एक ऐसी जादू की छड़ी है कि घुमाया और सब समस्या ख़त्म. 

अन्ना लहर देखे क्या गुल खिलाती है?

अन्ना लहर देखे क्या गुल खिलाती है?

बात ये है कि इसके स्वरूप को लेकर  इसके बनाने वाले और जनता की सोच में बहुत फर्क है.  जनता एक व्यापक पैमाने पे परिवर्तन की आस को लेकर सडको पर है और वोही जनलोकपाल एक ऐसी संस्था है जिसे और संस्थाओ की तरह ही लोकतान्त्रिक दायरों में रहकर ही समस्या का निदान करना  है.  इतनी उम्मीदें एक संस्था से पालना कितना सही है और भविष्य में अपने बिखरी उम्मीदों के साथ इस संस्था से कैसे तादात्म्य रख पायेंगे ये सोचने वाली बात है. मेरे कहने का तात्पर्य ये है कि अगर जनता खुद अपने आचरण को पहले सुधार कर फिर क्रांति क्रांति करती सडको पर तो समझ में आता कि जन लोकपाल वास्तव में अलादीन का चिराग साबित होता. बिना व्यक्तिगत स्तर पे सुधार के हम सोचे कोई संस्था आकर हमारा कल्याण कर देगी बिल्कुल वाहियात की बात है. एक ढोंग है.  एक महा पाखण्ड है और कुछ नहीं. समझ में नहीं आता कि जनता को  सडको पे उतारने वाले जनता को इतना चराते क्यों है. क्यों नहीं अपने मूल उद्देश्यों को भली भाँती जनता के सामने और उनके सामने नहीं रखते जिनसे वो आग्रह रखते है अपनी बात मनवाने का. और यही पे आके सारी क्रांति और जोश का सत्यानाश हो जाता है. भ्रम या अँधेरे में रखकर या रहकर या अति उत्साह में उद्देश्यों से अनजान रहकर स्वर्णिम भविष्य की उम्मीद रखना मै नहीं समझता बहुत जायज है. 

बहरहाल जनता सडको पर है और ये हर्ष की बात है. ये भी सुखद है कि सत्ता के नशे में चूर लोगो को उनकी औकात समझ में आ गयी. मनीष तिवारी और कपिल सिब्बल जैसे लोगो को कम से कम इतना समझ में तो आया कि जनता से और जनता को लेकर चलने वालो से कैसे “जी” लगाकर बात करनी चाहिए. मुझे कोई शौक नहीं आसमान में उड़ते गुब्बारे में छेद करने का. सो चलिए इस आंधी में हम भी बहते है इस उम्मीद में कि आंधी वैसे तो कभी अच्छा फल नहीं देती पर क्या पता इस आंधी  से विध्वंस के बजाय कुछ काम का निर्माण हो जाए. पर हा फर्क यही है कि  आंधी में बहते हुए भी मैंने अपनी समझ को बहने नहीं दिया. सो ये सोचने पे मजबूर हू कि विश्वास को बार बार  टूट कर जुड़ते हुए देखना या इसकी कोशिश करना बहुत ही तकलीफदेह होता है. इस दर्द को सहज रूप से आत्मसात करना खेल नहीं. और ये खेल अफ़सोस है कि संवेदनशील भोली भारतीय जनता के साथ बार बार खेला जाता है.

 सच तो ये है कुसूर अपना है …
चाँद को छूने की तमन्ना की
आसमा को जमीन पर माँगा 
फूल चाहा कि पत्थरों  पर खिले..
काँटों में की तलाश खुशबू की 
आरजू  की कि आग ठंडक दे 
बर्फ में ढूंढते रहे गर्मी 
ख्वाब जो देखा, चाहा सच हो जाये 
इसकी हमको सजा तो मिलनी थी 
सच तो ये है कुसूर अपना है..


(जावेद अख्तर )

आप की कोशिशे रंग लाये!

आप की कोशिशे रंग लाये!

 

Related Articles: 

15 responses

  1. bahot badhiya lilha arvind ji aapne, mai aapki baat se bilul sehmat hu ki jab tak hum khud nahi sudhrenge jag nahi sudhar sakta ya yun kahe ki sabse pehle hume imandaar hona padega tabhi to hum apne sarkar se imandari ki umeed kar sakte hai, mujhe kabhi kabhi yahi lagta hai ki agar jan lokpal bil paas bhi ho gaya to waha bhi to bhrast log hi honge jo kisi na kisi tarike se apne makshad me kamyab ho jaayenge, waise bhi bharta me har cheez ki jugad hoti hai iska bhi log koi na koi jugad dhoond hi lenge…lekin ye to tai ki isase bhrastachar me kuch to kami aayegi ab ye dekhate hi ki ye praayaas kis had tak safal hota hai.

    1. @ Sudhir Dwivediji

      भाई बात ये है जब तक हम व्यक्तिगत रूप से जरा भी नहीं सुधेरेंगे तो होगा यही कि जन लोकपाल नाम की संस्था भी चरमरा जाएगी काम के बोझ के तले. आप बताये क्या हमारे देश में भ्रष्टाचार रोकने के लिए कारगर उपाय नहीं है ? क्या संस्थाएं नहीं है ? है पर वो काम क्यों नहीं कर पा रही है क्योकि भ्रष्ट लोग जाके जम गए दूसरे अगर आप का कुत्ता भी मर गया है तो आप चाहते है कि कोर्ट आपको मुआवजा दे! नतीजा! सारी संस्थाए बैठ गयी. अब आप बताये हम अपनी इस प्रवत्ति पर लगाम लगाये बिना किस जन लोकपाल को सही ढंग से काम करने देंगे ?

  2. A discussion on Facebook:

    Sharad Tripathi said:

    Its too premature to have preconceived notions of failure of Anna’s movement at this stage. If this really helps to get some strong laws which will help not to completely eradicate, which is impossible in India we all know, but atleast put some check & act as a deter for those corrupt people who are totaly fearless these days then i feel this movement achieves its goal & is successful. Can any one who questions the way & results of Anna’s movement suggest any better solution to solve this Big problem which is killing our nation. Its rightly said…” Yaa to system ko change karne ki himmat rakho aur awaaz uthao…ya uska part bano aur chup raho…Anna has courage to be the first one…” What all of us have done in decades despite suffocating on this system nothing….So wait & watch n dont dilute this movement at this stage…

    *********************************

    My Response To Sharad Tripathi:

    ‎@Sharad Tripathi

    Chill buddy…I get your point quite well..Probably, you are not aware of the fact that I am one of the persons who believe in hoping against hope. That’s the reason why couple of days back I had commented: “मन में मेरे भी बहुत दुविधा है क्योकि जिस चंडाल चौकड़ी से अन्ना घिरे है उस पर कम से मेरा यकीन तो नहीं है. पर यकीन भी ना हम करे तो क्या करे. सो छले जाने के बाद भी विश्वास तो करना पड़ेगा..अब दिल टूटना ही नियति में है तो दिल टूटेगा ही ना”

    At least, none of us is interested in failure of this uprising. However, the wishful thinking cannot be a pretext to ignore other stark realities. An issue , especially the ones capable of bringing huge change, need to be intercepted from all angles. May be you intercepted the sentiments echoed in my comment in a hurried fashion. In fact, I am more eager to see the movement gain success and that’s why just cannot avoid the impending threat ready to sabotage the movement. Rest assured there is no ill will when I talk about the apprehensions. They are just grim reminders.That’s all.

    ************************

    Sharad Tripathi Said:

    @ Arvind K Pandey: I agree with you…lets hope for the best & look forward for the movements success….

    **********************

    Vaibav Mani Tripathi said:

    साथियो ऐसा देखने में आ रहा है कि ऐसे लोग जो दिन में हज़ारों के घुस के लेन देन में लिप्त है वह भी शाम को अन्ना समर्थक मशाल जुलूस का हिस्सा बन पहली कतार में हैं

    अन्ना कहीं अगले JP न बन जायें जिनका सर उनके अपने शिष्यों कि कारगुजारियों ने झुका दिया !!!!!

  3. Thanks Nishant Mishraji for liking it..

    ***********************

  4. तार्किकता और नपे-तुले विमर्श के साथ लिखी गयी लम्बी पोस्ट, पढ़कर अच्छा लगा.
    सच कहूं तो अन्ना और उनके आन्दोलन को लेकर मैं स्वयं अभी तक ऊहापोह में हूँ. सबसे पहले तो सरकारी सेवा में होने के दायित्व और अनुभव अलग तरह के हैं, दूसरी बात यह भी कि संशयवादी होने के कारण कभी भी धारा के साथ नहीं बह पाता.

    1. @Nishant Mishra

      निशांतजी आप जिस चिंतन प्रक्रिया से गुज़र रहे है वोही मेरे अन्दर भी चल रहा ..हलके शब्दों में कहू तो जो हाल दिल का उधर हो रहा है वो हाल दिल का इधर हो रहा है!!

      मैंने यही पे लिखा है कि ” आप बताये क्या हमारे देश में भ्रष्टाचार रोकने के लिए कारगर उपाय नहीं है ? क्या संस्थाएं नहीं है ? है पर वो काम क्यों नहीं कर पा रही है क्योकि भ्रष्ट लोग जाके जम गए दूसरे अगर आप का कुत्ता भी मर गया है तो आप चाहते है कि कोर्ट आपको मुआवजा दे! नतीजा! सारी संस्थाए बैठ गयी. अब आप बताये हम अपनी इस प्रवत्ति पर लगाम लगाये बिना किस जन लोकपाल को सही ढंग से काम करने देंगे?” ..”Corruption in India is seen as not just a symptom of sick society but as an element in the social process—“the system itself has become pathological.”

      हम खुद नहीं सुधेरेंगे बस चाहेंगे कि कोर्ट आके मामला सुलझा दे. जन लोकपाल आके मामला सुलझा दे? हद हो गयी. आपको बताऊ अभी एक ताज़ा केस पढ़ रहा था और आपने भी शायद पढ़ा भी हो कि पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट की एक पूर्व महिला जज निर्मल यादव जुर्म साबित होने के बाद भी सीबीआई कोर्ट में उपस्थिति से बचती रही तकरीबन साल भर से. अब आप बताये आपने क्या सन्देश दिया एक हाई कोर्ट का जज होके ? यही कि अगर आप सक्षम है तो कानून गया तेल लेने! ये इसलिए भी गंभीर मामला है कि आप एक खुद न्यायधीश है.आप ने पद पे रहते हुए कितनो को कठोर सजा दी होगी कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट के लिए मगर आप ने क्या किया? ( http://timesofindia.indiatimes.com/india/HC-stays-Justice-Yadavs-arrest-in-cash-in-bag-scam/articleshow/9659124.cms )

      खैर मै भी यही सोचता हू कि अन्ना के आन्दोलन से भ्रष्टता कुछ प्रतिशत भी कम हुई तो मै समझूंगा कि यह भी उपलब्धि ही कहलाएगी. तब भी ये तो कह ही सकते है वर्त्तमान परिदृश्य में : जय हो अन्ना बाबा की🙂 कम से कम सिब्बलो और तिवारियो का अहम् तो चूर किया.

      और हा तारीफ के लिए धन्यवाद. वो इसलिए कि मैंने कभी नहीं चाहा कि लाखो लोग आकर मेरा पोस्ट पढ़े. यही चाहा कि अच्छे लोग, सिर्फ एक या दो ही पढ़े, मेरे लिखने का फल मुझे मिल जाएगा. आपका पढ़ना/कहना कुछ ऐसा ही है🙂

  5. मैं चाहूँगा कि करप्शन मिटे और अन्ना टीम के वास्तविक एवं शुभ आशयों का फल मिले, लेकिन यदि ऐसा नहीं हुआ तो मुझे न तो आश्चर्य होगा और न ही दुःख होगा.

    1. ……………… पर विश्वास फिर नए अन्ना में जगाना थोडा और मुश्किल हो जायेगा !

  6. अन्‍ना और किरण बेदी को छोड़ कर इस टीम मे किसी पर भरोसा नही किया जा सकता है।

    1. @Pramendra Pratap Singh

      अन्ना का कहना है कि “देश के खजाने को चोरों से नहीं उसके पहरेदारों से खतरा है और भारत को इसके दुश्मनों से नहीं, गद्दारों से घतरा है” ..मुझे लगता है उन की यही बात उनकी टीम में शामिल कुछ लोगो पर भी सटीक बैठती है!

      “भारत सरकार के Ministry of Home Affairs के Foreigners Division की FCRA Wing के दस्तावेजों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2008-09 तक देश में कार्यरत ऐसे NGO’s की संख्या 20088 थी, जिन्हें विदेशी सहायता प्राप्त करने की अनुमति भारत सरकार द्वारा प्रदान की जा चुकी थी.इन्हीं दस्तावेजों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2006-07, 2007-08, 2008-09 के दौरान इन NGO’s को विदेशी सहायता के रुप में 31473.56 करोड़ रुपये प्राप्त हुये. इसके अतिरिक्त देश में लगभग 33 लाख NGO’s कार्यरत है.इनमें से अधिकांश NGO भ्रष्ट राजनेताओं, भ्रष्ट नौकरशाहों, भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों, भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियों के परिजनों,परिचितों और उनके दलालों के है. केन्द्र सरकार के विभिन्न विभागों के अतिरिक्त देश के सभी राज्यों की सरकारों द्वारा जन कल्याण हेतु इन NGO’s को आर्थिक मदद दी जाती है.एक अनुमान के अनुसार इन NGO’s को प्रतिवर्ष न्यूनतम लगभग 50,000.00 करोड़ रुपये देशी विदेशी सहायता के रुप में प्राप्त होते हैं. इसका सीधा मतलब यह है की पिछले एक दशक में इन NGO’s को 5-6 लाख करोड़ की आर्थिक मदद मिली. ताज्जुब की बात यह है की इतनी बड़ी रकम कब.? कहा.? कैसे.? और किस पर.? खर्च कर दी गई. इसकी कोई जानकारी उस जनता को नहीं दी जाती जिसके कल्याण के लिये, जिसके उत्थान के लिये विदेशी संस्थानों और देश की सरकारों द्वारा इन NGO’s को आर्थिक मदद दी जाती है. इसका विवरण केवल भ्रष्ट NGO संचालकों, भ्रष्ट नेताओ, भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों, भ्रष्ट बाबुओं, की जेबों तक सिमट कर रह जाता है.”
      ( Network6 News Item )

      पत्रकारों के एक समूह का मानना है कि चूकी अन्ना टीम के ज्यादातर सदस्य “अरविन्द केजरीवाल, मनीष सिसोदिया,किरण बेदी, संदीप पाण्डेय ,अखिल गोगोई और खुद अन्ना हजारे भी केवल NGO ही चलाते हैं” इसी वजह से एक प्रेस कांफेरेंस में “अरविन्द केजरीवाल और प्रशांत भूषण ने साफ़ और स्पष्ट जवाब देते हुए लोकपाल बिल के दायरे में NGO को भी शामिल किये जाने की मांग को सिरे से खारिज कर दिया है. कुल मिला के मेरा कहना है कि भ्रष्टाचार कि इस टीम को और शशक्त बनने के लिए ये आवश्यक है कि ये टीम विरोधाभासो से ऊपर उठे.

  7. Sharing an interesting article with all of you:

    Jan Lok Pal is no solution

    *************************************

    If the ‘Jan Lok Pal’ presides over the same system that has corrupted civil servants, politicians, anti-corruption watchdogs, judges, media, civil society groups and ordinary citizens, why should we expect that the ombudsman will be incorruptible? Because the person is handpicked by unelected, unaccountable ‘civil society’ members? Those who propose that Nobel Laureates (of Indian origin, not even of Indian citizenship) and Ramon Magsaysay Award winners should be among those who pick the Great Ombudsman of India — who is both policeman and judge — insult the hundreds of millions of ordinary Indian voters who regularly exercise their right to franchise. For they are demanding that the Scandinavian grandees in the Nobel Committee and the Filipino members of the Magsaysay foundation should have an indirect role in selecting an all-powerful Indian official.

    The argument that people should be involved in drafting legislation is fine, even if it misses the point that the Government is not a foreign entity but a representative of the people. It is entirely another thing to demand that the legislation drafted by an self-appointed, unaccountable and unrepresentative set of people be passed at the threat of blackmail. If we must have representatives of the people involved in law-making, we are better off if they are the elected ones, however flawed, as opposed to self-appointed ones, whatever prizes the latter might have won.

    The ‘Jan Lok Pal’ will become another logjammed, politicised and ultimately corrupt institution, for the passionate masses who demand new institutions have a poor record of protecting the existing institutions. Where were the holders of candles, wearers of Gandhi topis and hunger-strikers when the offices of the Chief Election Commissioner, the Central Vigilance Commissioner and even the President of the Republic were handed out to persons with dubious credentials? If you didn’t come out to protest the perversion of these institutions, why are you somehow more likely to turn up to protest when a dubious person is sought to be made the ‘Jan Lok Pal’?

    -Nitin Pai
    http://www.dailypioneer.com/330414/Jan-Lok-Pal-is-no-solution.html

  8. i think in democracy diversity of thoughts is expected and indeed we should be honest our self but
    i think janlokpal bill will help to grow this because being honest is the ultimate solution ,is right .but it so difficult to implement because for this we have to control our self ,our thinking and it should be at every level. But good rules will make this easy. THERE IS NO END OF DEBATE OVER IT AND DUE TO THIS THE SYSTEM WILL GO AS IT IS. FIRST LET THE PEOPLE AND GOVT TO REACH AT A CONCLUSION AT THIS TIME THIS WILL SAVE THE CONFIDENCE OF PEOPLE FROM DETERIORATION.

    1. मनीष भाई आप क्या कहना चाहते है मै उसे समझ रहा हू..इसलिए आप देखेंगे कि तमाम संशयो के बाद भी मै भ्रष्टाचार के खिलाफ इस आन्दोलन का समर्थक हू और चाहता हू कि कुछ सार्थक निकले जनता के इस विस्फोटक समर्थन का. रहा सवाल अंतहीन बहस का तो भाई मनीष विधेयक आने से पहले या किसी भी नियम के क्रियान्वन से पहले एक स्वस्थ्य बहस आवश्यक है. ये लोकतांत्रिक सिस्टम की पहचान है एक एक हद तक आपको किसी भी मुद्दे पर अपनी बात कहने का आप को मौका देता है. सो यहाँ जन लोकपाल के सन्दर्भ में भी एक स्वस्थ्य बहस नितांत आवश्यक है. कुल मिला के ये उम्मीद सभी को है कि जनता के इस पहल का कुछ ना कुछ तो सकारात्मक नतीजा निकलेगा.

      आप ने अपनी बात रखी इसके लिए मनीष भाई आपको धन्यवाद.

  9. अच्छा लगता है जब ब्यौरेवार ढंग से बात रखी जाय। आपने तार्किकता से अपनी बात रखी है, काबिले-तारीफ है यह। अति-घोष के खतरे होते हैं कि उसमें आत्मसमीक्षा का स्पेस कम हो जाता है, यह मैं इस आंदोलन के साथ भी देख रहा हूँ। पर चाहूँगा कि बेलगाम सरकार पर लगाम अवश्य लगे।

    1. @Amrendra Tripathi

      आपने पते की बात कही कि “आत्मसमीक्षा” का दायरा घट जाता है..भेड़ियाँ धँसान की भाँति परानुकरण के बहुत खतरे होते है अमरेन्द्र भाई.. पर दिक्कत ये है कि हम इस बात की अनदेखी नही कर सकते के किस तरह भ्रष्टता की लहर हर तरफ हिलोरे मार रही है..सो इस आन्दोलन की अनदेखी करना हमारे लिए संभव नही..सो अगर कुछ अच्छा निकल कर आये तो बेहतर ही रहेगा..बाद में संशोधन वगैरह तो होते रहेंगे. ये अलग बात है कि इस आन्दोलन की कमान जिस अन्ना टीम के पास है उस पर मुझे कतई भरोसा नही..इस आन्दोलन की नींव बहुत कमजोर है..नितिन पाई के लेख का लिंक मैंने कमेन्ट सेक्सन में दिया है उस पर भी एक नज़र डाल ले.

      खैर मजेदार बात ये है कि कम्मुनिस्ट बिरादरी गुप्त तरीके से वही दलितों और माइनोरिटी नाम के जिन्न से अपने बड़े बड़े शब्दावली के साथ रुदन कर रही है..ये तो करेंगे ही क्योकि शोषितों के असली हिमायती होने के बाद भी ये हाशिये पे जो आ गए है…सो इनसे कब बर्दाश्त हो कि मध्यम वर्ग इतनी तादाद में एक तरफ खिसक जाए..सो लिहाजा इस आन्दोलन को सिर्फ मध्यम वर्ग का मध्यम वर्ग के द्वारा प्रायोजित बता रहे है..कमीनापन और दोगलापन अगर सीखना हो तो कम्मुनिस्ट पार्टी में शामिल हो जाए!! जैसे भ्रष्टता अगर कम हुई तो उससें फायदा दलितों और माइनोरिटी को तो बिल्कुल नही होगा..अमरेन्द्र भाई इस पर आप का क्या कहना है🙂

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

The great Rudolf Steiner Quotes Site

Quotes and fragments from the work of the great visionary, thinker and reformer Rudolf Steiner

Bhavanajagat

Welcome to Noble Thoughts from All Directions to promote the well-being of man and to know the purpose in Life.

Serendipity

Was I born a masochist or did society make me this way? I demand unconditional love and complete freedom. That is why I am terrible.

John SterVens' Tales

Thee Life, Thee Heart, Thee Tears

Indowaves's Blog

Just another WordPress.com weblog

Una voce nonostante tutto

Ognuno ha il diritto di immaginarsi fuori dagli schemi

Personal Concerns

My Thoughts and Views Frankly Expressed

I love a lot

Just another WordPress.com site

the wuc

a broth of thoughts, stories, wucs and wit.

A Little Bit of Monica

My take on international politics, travel, and history...

Atlas of Mind

Its all about Human Mind & Behavior..

Peru En Route

Tips to travel around Perú.

Health & Family

A healthy balance of the mind, body and spirit

मानसिक हलचल

ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं यह ब्लॉग लिखने के अलावा गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। रेलवे से ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर्ड अफसर।

Monoton+Minimal

travel adventures

Stand up for your rights

Gender biased laws

The Bach

Me, my scribbles and my ego

Tuesdays with Laurie

"Whatever you are not changing, you are choosing." —Laurie Buchanan

%d bloggers like this: