कब तक कसाब और अफज़ल पुलाव बिरयानी खायेंगे हमारे पैसो की?

गोधरा का सच एक झूठ है!

गोधरा का सच एक झूठ है!

ये  अक्सर खल जाता है कि बहुत सुलझे हुए लोग भी  जब शिष्टतावश गलत को खुल के गलत नहीं कह पाते. तब या तो वो चुप्पी साध लेते है या फिर एक चतुर सा वाक्य बोल कर मामले को घुमा देते है. ऐसे तो कोई  सुधार  होने से रहा. अगर हम खुल के गलत को गलत भी ना कह पाए तो कोई कैसे ये सोच सकता है कि वक्त पड़ने पर आप कोई मजबूत कदम उठा लेंगे? चलिए सब क्रान्तिकारी नहीं हो सकते. सब भगत सिंह के चेले नहीं बन सकते गृहस्थ आश्रम की बाध्यता के कारण पर ये कहा कि अक्लमंदी है कि आप गलत का मुखर होके विरोध भी ना दर्ज करा सके साफ़ स्पष्ट शब्दों में.

 अक्लमंदी ये भी नहीं कि हम सब सांप जहरीले नहीं होते तो लगे आस्तीन के सांप पालने!  जहरीलें सांपो को दूध पिलाना ये कौन सी नीति है भाई ? क्या जहरीलें सांपो को दूध पिलाने से वो पालतू हो जायेंगे या काटना छोड़ देंगे ? सब सांप जहरीलें  नहीं होते तो हम जहरीलें  सांपो को गले में लटका के घूमे भोले बाबा की तरह? मतलब आम जनता गाज़र मूली की तरह कटे और कसाब और अफज़ल हमारे ही पैसे पे मौज करे? क्या सन्देश आप दे रहे है भाई ? नतीजा यही होगा कि भीड़ अपने हिसाब से न्याय करेगी और फिर गेहू के साथ घुन भी पिस जायेंगे. उस वक्त  रेसनैलिटी की दुहाई लोग  मत ही दे .आज अन्ना हजारे या बाबा रामदेव के मांगो को ये कहकर खारिज किया जा रहा है कि ये संवैधानिक  प्रावधानों के विपरीत है. मै पूछना ये चाहता हू सत्ताधीशो से कि उन्होंने ऐसा आचरण ही क्यों किया कि संविधान के भीतर से रहकर काम करने वाली व्यवस्था से लोगो का विश्वास ही उठ गया? अब क्यों लगता है लोगो को कि संविधान से इतर व्यवस्था ही न्याय दिला पाएगी? अब बताईये केंद्र के सब बड़े मंत्री भ्रष्टाचार में लिप्त है पर वे कुछ दिनों के लिए जेल में जाकर मौज पानी लेकर बाहर निकल आते है. कई प्रदेशो के “मायावी मुख्यमंत्री सत्ता की  माया में लिप्त  होकर हर तरह का कुकर्म कर रहे है पर सब खामोश है कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे? वोही पे एक मामूली से कर्मचारी जो कुछ रकमों कि हेरफेर के खातिर पकड़ लिया गया उसके पीछे पूरी सरकारी मशीनरी हाथ धोके पीछे पड़ जायेगी जैसे इस वक्त रामदेव के पीछे केंद्र सरकार पड़ी है. लो बेटा तुम हमारी पोल खोलने चले थें अब हम तुम्हारा बैंड बजा देंगे क्योकि हम सत्तासीन है.
 
इस वक्त कुछ सिरफिरे लोग हिन्दू आतंकवाद के नाम से “शैडो बाक्सिंग” कर रहे है ? काहे?  इसीलिए कि एक तो असली तस्वीर छिप जायेगी और फिर सत्ता के मद में अंधे लोग अल्पसंख्यको के पास जाकर वोट मांग सके. इसीलिए बाहरी बड़े लोगो से हम हिन्दू आतंकवाद पर चर्चा तो करते है पर इस्लामी आतंकवाद के बढ़ते कदमो पर मौन साध लेते है. उसी अमेरिका से हम हिन्दू आतंकवाद की चर्चा करते है जिसने इस्लामोफोबिया के जड़ में जाकर अपने देश में हर वो कानून लागू किया जो उसे इस्लामी आतंक से मुक्ति दिला सके. अपने दुश्मनों को घुस के मारा चाहे वो कही भी छुपे हो. हम केवल हिन्दू आतंकवाद का झुनझुना बजा रहे है और कसाब और अफज़ल को बिरयानी पुलाव खिला रहे है जेल में!  हमारे यहाँ के बुद्धिजीवी तो बस ये साबित करने तुले है कि अगर कुछ है तो हिन्दू आतंकवाद बाकी सब इस्लामोफोबिया है!  अरे भाई  इस्लामोफोबिया का उदय क्यों हुआ इस पर सोचिये बजाय इसके कि लोग इस्लामोफोबिया से ग्रस्त क्यों है अगर इस्लामोफोबिया जैसी चीज़ वाकई में कुछ है तो!  इस फोबिया के आधार में कोई इलूसनरी कारण नहीं बल्कि कटु सच्चाई है. जरुरत है इन कारणों की ईमानदारी से अवलोकन करने की और हो सके तो दूर करने की कठोर कदमो से  बजाय सच्चाई से मुह मोड़ने की. ये वक्त “पोलेटकली करेक्ट साउंड” होने का नहीं कठोर कदमो का है एक वास्तविक समीक्षा के साथ. जो इस्लामोफोबिया से बचने की दुहाई देते है वो भूल जाते है कि अमेरिका या मुंबई या विश्व के हर कोने में हो रहे हमले एक सच्चाई है कोई सपना नहीं.

 

 आप देखिये कि आतंकवाद निरोधक  कानून सख्त करने के बजाय और ढीला कर दिया गया. पोटा लागु होने के बाद लोगो ने शोर मचाना कर दिया गया कि भाई  बड़ा दुरूपयोग हो रहा है. मामला फिर टाय टाय फिस्स हो गया और पोटा  पिट  गया मतलब हटा लिया गया. अब भाई लोग मतलब कानूनविद एक बार फिर सठिया गए है. अब फिर कह रहे है कि सख्त कानून की सख्त  जरुरत है अगर हमे आतंक का जड़ से सफाया करना है तो.  तो यही नौटंकी हमारे यहाँ होती है. ढंग का काम इस देश में कतई नहीं हो सकता. एक आधार प्रोजेक्ट बना है. बड़ा प्रचार हो रहा है कि एक जादुई नंबर मिलेगा पर भाईलोग ये बताने को तैयार नहीं कि जिस देश में डाटा थेफ्ट इतना आसान है उस देश में किसी के ख़ास डीटेल्स लीक नहीं होंगे और उनका दुरुपयोग नहीं होगा.लेकिन इससें  आपको क्या आपको जादुई नंबर मिल रहा है कि नहीं. नंबर लो और खुश हो जाओ बस.  ज्यादा भेजा फ्राय मत करो ये कहना है माई बाप मतलब सरकार का. 

लेकिन हमारे यहाँ उलटी गंगा बहती है.  नेशनल एडवायजरी काउंसिल नाम कि एक विचित्र संस्था है.  इसने एक विधेयक का मसौदा का मसौदा तैयार किया है जिसका सार ये है कि  दंगे हमेशा बहुसंख्यक फैलाते है और पीड़ित पक्ष केवल अल्पसंख्यक होता है.  अब अगर वोट बैंक सॉलिड रखना है तो ऐसा विधेयक आ जाए  कोई आश्चर्य नहीं. मतलब गुजरात में गोधरा करने वाले ने जो किया वो कुछ नहीं था बस केवल जरा सा गरबा नृत्य था. हां जो दंगे हुए गुजरात में  वो वीभत्स थे अपनी सेकुलर देशी विदेशी मीडिया और सरकार दोनों के लिए लेकिन गोधरा नहीं. ऐसा मै नहीं ये विधेयक कहता है. अब तीस्ता  सीतलवाड़ जिन्होंने इस मसौदे को तैयार  किया है जैसो से क्या उम्मीद रख सकते है. ये जनाब जाहिर शेख  झूठी गवाही के मामले में सुप्रीम कोर्ट के द्वारा जम के  लताडी जा चुकी है और दोषी करार दी चुकी है. आश्चर्य मुझे ये सोचकर होते है कि ऐसे  संदिग्ध लोग एक महत्त्वपूर्ण संस्था में कैसे शामिल हो सकते है ? क्यों नहीं हो सकता. बिनायक सेन जब प्लानिंग कमीशन में हो सकते है तो तीस्ता क्यों नहीं? अब क्या कहें ? जब दरिन्दे  हिफाज़त करने लगे तो मासूमो  को तो मरना ही है ना!  सच है इस देश को भगवान् ही चला रहे है या सिर्फ भगवान् ही चला सकते है.

मौज कसाब और अफज़ल ही उठाते है और पल पल मरता है आम आदमी

मौज कसाब और अफज़ल ही उठाते है और पल पल मरता है आम आदमी

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