डेल्ही बेल्ली एक घटिया दिमाग से उपजी गन्दी और बकवास फ़िल्म

एक  गन्दी बकवास फ़िल्म

एक गन्दी बकवास फ़िल्म

शातिर दिमाग आमिर को ये कला अच्छी तरह आती है कि कैसे समाज में व्याप्त सड़ी गली चीजों को सजा के परोसा जाए. नकारात्मकता का सफल  व्यवयसायिक उपयोग करना ये आमिर खान जैसो की ही बस की बात है. भूमंडलीकरण ने ये काम आसान कर दिया नकरात्मक चीजों को जीवन के आकर्षक तत्त्वों में प्रतिष्ठित कर के. डेल्ही बेल्ली देखा जाए तो इसी सोच की उपज है. नकारात्मकता का जीवन में सहज रूप से स्थापित हो जाना आधार है  डेल्ही बेल्ली के अस्तित्व का.  नब्बे के दशक से नकारात्मकता के प्रति आकर्षण का जो सिलसिला आरम्भ हुआ वो डेल्ही बेल्ली में आकर लगभग पूर्णता को  प्राप्त होता है. शाहरुख की  बाज़ीगर ने जो इरा लेविन के उपन्यास ए किस्स बिफोर डाईंग से प्रेरित थी नकारात्मकता को एक ट्रेंड के रूप में स्थापित किया हिंदी चलचित्र जगत में. इस कहानी का नायक अपनी प्रेमिका का बेरहमी से क़त्ल करता है अपने हुए अत्याचारों का हिसाब चुकाने के लिए पर इस नए ट्रेंड के आगमन के तहत वो हमारी  सहानभूति प्राप्त करने में सफल हो जाता है. जहा पहले के नायक नायिकाओ के चरित्र में चाहे अच्छा हो या बुरा एक स्पष्ट विभाज़न होता था बाज़ीगर के साथ अच्छे बुरे का विभाजन धूमिल होने के साथ नायको के चरित्र में दोगलापन आ गया. इसके बाद आने वाले  नायको का मूल मंत्र हो गया सफलता किसी कीमत पर और इसके लिए मूल्यों की बलि चढ़ानी पड़े तो शौक से चढ़े. मूल्य अब  प्रेरक तत्त्व नहीं विध्नकारी तत्त्व के रूप में अवतरित हुआ इन नायको में.

इन नए नायको का आदर्शवादी चरित्र से मोहभंग और नकारात्मकता से प्रेम कितना गहरा हुआ ये इसी बात से बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि जहा अस्सी के अंत में नायक पिता के प्रति प्रेम प्रदर्शित करते हुए कहता है “पापा  कहते  है  बड़ा  नाम  करेगा  ” यही नायक अब पिता के प्रति लगाव को ये कह कर प्रदर्शित कर रहा  है ”डैडी  मुझसे  बोला  तू  गलती  है  मेरी  ” .  भारतीय समाज में जहा बच्चे का जन्म एक शुभ और पवित्र कर्तव्य रूप में मान्यता  प्राप्त है वहा पिता पुत्र को एक गलती माने ऐसा कम ही मुमकिन है. शायद ये डेल्ही बेल्ली के अन्दर दिखाए समाज में व्याप्त हो पर भारतीय समाज में अभी भी ऐसी नौबत नहीं आई है.  कुछ अति  उत्साही समीक्षकों का मानना है कि आज के युवको द्वारा इस प्रकार की बोल्ड स्वीकरोक्ति ये दर्शाता है कि भारतीय समाज पहले से परिपक्व हुआ है जिसकी वजह से आज के युवा कडुवे सच को जस का तस सब के सामने कहने में जरा भी नहीं हिचकिचाते. मेरी  नज़र में इस तरह की शर्मनाक बेबाकी भारतीय समाज के पतन को दर्शाती है  पाश्चात्य मूल्यों के प्रभाव में आकर ना कि परिपक्वता को जैसा हमारे कुछ मूढ़ समीक्षकों का मानना है.  हमने पश्चिमी देशों के अच्छे मूल्यों के साथ गठबंधन करने के बजाय उनके द्वारा चालाकी से थोपे गए निम्न कोटि के आदर्शो को सब कुछ मानकर गलत हरकतों के दास बन बैठे. इसलिए रुपयों और स्त्री के पीछे भागना हमारा परम ध्येय बन गया.

मै इस बात से सख्त असहमति जताता हूँ कि मुख्यधारा में शामिल व्यवयसायिक सिनेमा जो मारधाड़ और घिनौने विचारो से भरी पड़ी है हमारे भारतीय समाज का असल आइना है. हकीकत ये है कि इस पॉपुलर सिनेमा का सब कुछ मायावी है जिसमे तथ्य कम और फतांसी ज्यादा है जिसका सिर्फ इतना सा काम है कि सिक्को की झंकार ना रुके. बॉक्स ऑफिस की ज्यादा फिक्र है इस सिनेमा को बजाय विषयवस्तु की विश्वसनीयता और प्रमाणिकता की. मेलोड्रामा की प्रचुरता और एक भव्य लटके झटको से भरी स्क्रिप्ट भारतीय व्यवयसायिक सिनेमा की जान है जिसमे नायक पानी की टंकी पर दौड़ता हुआ चढ़ जाता है. अब इन जैसी फिल्मो को भारतीय समाज का आइना कहना कहा की अक्लमंदी है. इनको भारतीय समाज को समझने का माध्यम  नहीं माना जा सकता और ना ही ये आदर्श माध्यम है भारतीय समाज का असली चेहरा देखने समझने का.

एक धूर्त और शातिर अभिनेता और फ़िल्म निर्माता

इस तरह की फिल्मे  नकारात्मक गन्दी सोच, मूल्यों और अवधारणओ को प्रक्षेपित करने में सहायक साबित हुई है  बजाय समाज को कुछ देने या समाज का असली रूप सब के सामने लाने में कारगर सिद्ध होने के. इनका मुख्य उद्देश्य केवल दर्शको का पूरा पूरा मनोरंजन करना और नोट काटना होता है. इसलिए मै डेल्ही बेल्ली के बनाने वालो के इस मिथ्या प्रचार का जोरदार विरोध करता हू कि डेल्ही बेल्ली में जो दिखाया गया है वो हमारे समाज से ही  लिया गया है. इस बात को समझने के बाद कि इस तरह की फिल्मो का मुख्य ध्येय पैसा कमाना होता है इस बात में कोई दम नहीं की हम डेल्ही बेल्ली जैसी फिल्मो में  दिखाई गयी विचारधाराओ को सहज रूप से स्वीकार कर ले. मुझे कहने में ये कोई संकोच नहीं कि ये हमारे समाज के सच को तो कम ऐसी घटिया फ़िल्म बनाने वालो के खोखले दिमाग में बसे शैतानी सोच को ज्यादा दिखाती है.

इस बात का भी  जोर शोर से डंका पीता जाता है कि डेल्ही बेल्ली जैसी बकवास फिल्मे यथार्थवाद पर आधारित होने के कारण गन्दी और अश्लील हो गयी है. कहने का मतलब डी के बोस जैसा गीत यथार्थवादी सोच की परिचायक है. भाई वाह कितना गूढ़ यथार्थवाद है! क्या ऐसे ही अश्लील गालियों से भरे गीतों और संवादों से यथार्थवाद का सम्मान होता है ? ऐसे ही फिल्मो में यथार्थ का प्रवेश होता है? जो ऐसे यथार्थ पे लट्टू   हो रहे  है उन्होंने  शायद ना  तो यथार्थ को भोग है और ना ऐसी फिल्मो से उनका वास्ता रहा है जो की वाकई में यथार्थ का सही चित्रण करती है. ऐसे फिल्मकारों में गुरुदत्त, बिमल रॉय , गुलज़ार ,शेखर कपूर और ऋषिकेश दा के नाम उल्लेखनीय है. इन्होने यथार्थ को बहुत संवेदनशील तरीके से प्रस्तुत किया नाकि आज के निर्देशकों की तरह ठूंस दी अश्लीलता और गली गलौज यथार्थ के नाम पर. इनको क्यों नही आखिर जरूरत पड़ी इस तरह के  भौंडे तमाशे की अपनी फिल्मो में  जिसको ये फिल्मकार आवश्यक मानते है  यथार्थ के नाम पर और क्यों इन्होने ये ख्याल रखा कि सामाजिक मर्यादाओ की धज्जिया ना उड़े यथार्थ के नाम पे ? राज कपूर जरूर कुछ सीमाओ का उल्लंघन कर गए पर क्योकि उनकी फिल्मो की स्क्रिप्ट इतनी जोरदार होती थी और प्रस्तुतिकरण इतना कलात्मक कि उनका उल्लंघन करना कभी ज्यादा खला नहीं.

एक  महान  फ़िल्म  निर्माता  जिसने  अपनी  कमियों  को  सबके  सामने  स्वीकार

एक महान फ़िल्म निर्माता जिसने अपनी कमियों को सबके सामने स्वीकार

 

लेकिन राज कपूर की महानता देखिये कि कोई दबाव ना होते हुए भी बड़ी शालीनता से उन्होंने स्वीकारा कि कही ना कही अतिश्योक्ति का शिकार वे भी हुए और ये भी इन्होने बताया कि क्यों ऐसा हुआ उनसे. इसके ठीक विपरीत आचरण है आज के फिल्मकारों का जो कि उजड्डता  और दर्प की मूर्ती है. ये ना अपने सतही आचरण को सही साबित करेंगे बल्कि आप पर भी दबाव डालेंगे की आप इन्हें इनके सड़े गले विचारो के साथ अपनाये. आप गुलजार को देखे.  क्या इन्होने आंधी और हू तू तू में भारतीय राजनीति के विकृत स्वरूप को नहीं दिखाया है बिना किसी बकवास ट्रीटमेंट के साथ? आप ऋषिकेश दा की फिल्मे देखे और पाएंगे कि  उन्होंने असल भारतीय सोच को कितनी सादगी के साथ लगभग हर फ़िल्म में दर्शाया है कि मुस्कुरा के हर मुसीबत का सामना करो और कभी भी उम्मीद ना हारो. अब आज देखिये कि आज का यथार्थवादी  चरित्र गा  रहा है “गोली मार भेजे में कि भेजा शोर करता है”. ये है आज के नायक का आशावादी  चरित्र उस भारतीय समाज में जहा आशावाद का हर युग में सम्मान  हुआ और हम ही आज इस बात को प्रचारित कर रहे है कि अवसाद जीवन का सत्य है नहीं तो भेजे को भूनने (भेजा फ्राई ) की जरुरत क्यों  आन पड़ी ?

सच है कि वक्त बदल गया है. नयी टेक्नोलाजी के आगमन से एक नयी सोच और नए तौर तरीको का आगमन हुआ है. ये भी बिल्कुल सच है कि इस युग की अपनी कुछ नयी सी समस्याए है जो पहले के लोगो ने शायद नहीं देखी और इसलिए इन समस्याओ से पुराने तौर तरीको से नहीं निबटा जा सकता. इनका प्रस्तुतिकरण भी रूपहले परदे पर नए तरीको से ही संभव है मतलब नए प्रतीकों के जरिए.  अब बैलगाड़ी युग के लटको झटको  को बाइक युग में तो नहीं दिखा सकते ना ? पर इसकी आड़ लेकर कि युग बदल गया है क्या हम शैतानी विचारधाराओ को जो विकृत सोच का समर्थन करती है उनको अपना ले? शाहरुख़ खान की दो फिल्मो पे गौर करे डर और अंजाम और देखे कि किस तरह एक नायक दुष्टता का अवतार बन के उभरा है. इस फ़िल्म से सन्देश यही गया कि कैसे अपने स्वार्थ की खातिर आप किसी की दुनिया तबाह कर दे.

एक ऐसे ही शैतानी फ़िल्म और आई “रहना है तेरे दिल में” में और ये जान के आश्चर्य ये हुआ कि ये युवाओ की पसंदीदा फ़िल्म है. इसमें दिखाया  ये गया है कि कैसे एक दिलफेंक नौजवान एक युवती को धोखे में रखकर जिसकी शादी किसी और से तय हो चुकी है उसको अपने जाल में फसा कर उससें तथाकथित सच्चा प्यार करने लगता है. इसका अंत इसके बहिष्कार के रूप में नहीं होता बल्कि ऐसे होता है कि  धोखे में रखी गयी युवती से इसकी शादी हो जाती है और जिससें होने वाली होती वो अपने हक की कुर्बानी देकर महान बन जाता है.  मजेदार बात देखिये चरित्र का असली नाम है माधव पर ये नाम “मैड्डी” में परवर्तित हो जाता है. जाहिर है ऐसी ओछी हरकत करने वाला “मैड्डी” ही हो सकता है माधव नहीं. इस नाम परिवर्तन से ही जाहिर है कि हर वस्तु या नाम के अपने संस्कार होते है.मैड्डी से त्याग और समपर्ण के बारे में सोचना मूर्खता ही कहलाएगी ना!  बाहरी मूल्यों पे चल के आप शानदार सफलता के  मालिक तो हो जायेंगे पर बहुत मुमकिन है कि यशः आपके पहुच से बाहर हो जाये.

मेरा मन तो अभी भी उसी युग में रमा है जिसमे नायक अपने बेटे के लिए ये  गाता  है:

तुझे सूरज कहू या चंदा तुझे दीप कहूँ  ये तारा
मेरा नाम करेगा रौशन जग में मेरा राजदुलारा

मैंने इस ख्याल को मन में जरा भी प्रवेश नहीं करने दिया कि पुत्र भी कभी पिता के द्वारा एक गलती करार दिया जा सकता है. यह एक बहुत बड़ी वजह है कि हमे शाहरुखो और आमिरो का पूरी तरह से बहिष्कार करना पड़ेगा जो खेद की बात है हर दूषित विचारधारा को भारतीय समाज में थोपने के दोषी है अपने आचरण और फिल्मो के द्वारा. ये घमंड की  जीती जागती शिलाए है जो ना  सिर्फ अपनी उजड्डता को उचित ठहराते है बल्कि ऐसे फूहड़ तौर तरीको से उपजी सफलता में चूर होकर मौज मानते है. अब समय आ गया है कि डी के बोस का कत्ल करके उन चरित्रों को लाये जो हमारे संस्कृति में छुपे संस्कार रूपी रत्नों को दुनिया के सामने लाये ताकि आने वाले लोगो के लिए एक अच्छे आदर्शमय भविष्य की कल्पना एक सच के रूप में उभर कर आये.

एक शानदार आंधी!

एक शानदार आंधी!

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