मधुर शुद्ध हिंदी का हम शील हरण करना बंद करे

शुद्ध  हिंदी का सम्मान करे!

शुद्ध हिंदी का सम्मान करे!


ये आज किसी से गुप्त  नहीं है कि आज की पीढ़ी किस तरह की हिंदी बोल रही है. अशुद्ध हिंदी के अलावा हिंदी का अंग्रेजी संस्करण “हिंगलिश” जिस तरह से सर्वव्याप्त हो चली है इस वातावरण में  शुद्ध हिंदी शब्दों के प्रयोग के बारे में बात करना बेकार का ही उपक्रम लगता है. खासकर तब जब कि आज के युग के कई तथाकथित विद्वान् लोगो का ये कहना है कि हिंदी का इस तरह से जिद छोड़कर नयी भाषाओ  को अपनाना इसके  विस्तार के लिए ठीक है.  इस तरह से भाषा का अस्तित्व बना रहता है और भाषा समृद्ध भी होती है.  मै ऐसे विद्वान् लोगो की बातो से पूरी तरह से असहमत हू. मेरी दृष्टि में भाषा का इस तरह से विकास नहीं नाश होता है.

कुछ इसी तरह की समस्या पर हुई चर्चा में इस बात पर चर्चाकारो में एक राय थी कि हिंदी का इस तरह से अंग्रेजी या अन्य भाषाओ के शब्दों का अपने में समाहित किया जाना तत्सम शब्दों की बलि  देकर  सुनियोजित षड़यंत्र से कम नहीं हिंदी के शुद्ध स्वरूप को विकृत कर देने का.  मै इस विवाद में नहीं पडूँगा कि हिंदी का स्वरूप प्रान्त दर प्रान्त अलग है लिहाज़ा किसी एक मुख्य स्वरूप पर बल देना बुद्धिमानी नहीं. या फिर कि ये पुनः पुनः अभिव्यक्त करना कि हिंदी आदिकाल से जन्म के उपरांत ही अन्य भाषाओ के मेल से एक खिचड़ी स्वरूप को  प्राप्त थी जिसमे  उर्दू या फारसी शब्दों का शशक्त प्रभाव था.  कहने का अभिप्राय ये है कि जब कभी हिंदी संस्कृत से जन्मे शब्दों का समूह नहीं रही है तो आज इस बात पर बल देने का कोई मतलब नहीं कि हिंदी तत्सम शब्दों के प्रभाव में रहे. इसको दूसरे शब्दों में कहें कि हम इस बात की कतई आलोचना ना करे कि मीडिया या चलचित्रों में हिंदी के साथ किस तरह से शील हरण किया जा रहा है क्योकि इस शील हरण से हिंदी  समृद्ध हो रही है.  इस से ये भी सिद्ध हो रहा है कि हिंदी के पास एक अद्धभुत शक्ति है दूसरे भाषाओ को अपने में विलीन कर लेने की. इन सब कथनों को सुनकर बहुत क्षोभ होता है और तीव्र क्रोध भी आता है. 

ये भी नौटंकी देखिये कि बजाय उन प्रयासों के समर्थन के जिससें हिंदी अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त हो हमने हमेशा से उन प्रयासों को बल दिया जिससें हिंदी अपने मूल स्वरूप को सदा के लिए खो दे. आप देखिये गीतों में या चलचित्रों में या मै कहूँ अपने आसपास के वार्तालाप में शुद्ध हिंदी के शंब्दो का प्रयोग करने वालो को एक अजीब सी दृष्टि से देखा जाता है. या उनके प्रति हमेशा एक उपहासात्मक भाव रखा जाता है. कितनी विचित्र बात है ना कि शुद्ध हिंदी का उपयोग करने वालो पर व्यंग्य के बाण छोड़े जाते है मगर विकृत हिंदी या गलत टूटी फूटी अंग्रेजी बोलने वालो को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है.  जो ये कहते है कि हिंदी में अन्य भाषाओ के शब्द का प्रयोग करना उचित है शायद वे उन लोगो में से है जो अपने शुद्ध शब्दों के प्रति अज्ञानता पर एक आवरण सा डाल रहे है. वे इस वैज्ञानिक तथ्य की भी उपेक्षा कर रहे  है कि जिस वस्तु या नियम को हम उपयोग में लाना बंद कर देते है वो शने: शने या तो विलुप्त हो जाती है या फिर अपनी उपयोगिता खो देती है. 

मै ये नहीं समझता कि विधवा विलाप करने से हिंदी अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त हो जायेगी. इस बात से मै अनभिज्ञ नहीं हूँ कि यदि वर्तमान युग के माता पिता ने अपने बच्चो को ये संस्कार दिए होते कि वे समझ पाते कि मधुर हिंदी में बात करना श्रेयष्कर है इस कि अपेक्षा कि हम टूटी फूटी अंग्रेजी में संवाद कर के आधुनिक होने का आभास दे तो ये निश्चित था कि हिंदी इस शोचनीय स्थिति को ना प्राप्त हुई होती.  मै अब भी मानता हूँ कि कुछ देर नहीं हुई है. हम अगर आने वाली पीढ़ी को इस सांचे में ढाले कि वे शुद्ध हिंदी में संवाद करने का महत्त्व समझ सके और यदि हम उन लोगो का अभिनन्दन और सम्मान करे जो ईमानदारी से अपनी  संस्कृति का विस्तार करने में लगे है  तो मुझे विश्वास है कि हिंदी अपनी खोयी गरिमा अवश्य ही प्राप्त कर लेगी.

अच्छी हिंदी की उपेक्षा ना करे

अच्छी हिंदी की उपेक्षा ना करे

 

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6 responses

  1. वन्दे मातरम्
    सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्
    शस्यशामलां मातरम् ।
    शुभ्रज्योत्स्नापुलकितयामिनीं
    फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीं
    सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीं
    सुखदां वरदां मातरम् ।। १ ।। वन्दे मातरम् ।
    कोटि-कोटि-कण्ठ-कल-कल-निनाद-कराले
    कोटि-कोटि-भुजैर्धृत-खरकरवाले,
    अबला केन मा एत बले ।
    बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीं
    रिपुदलवारिणीं मातरम् ।। २ ।। वन्दे मातरम् ।
    तुमि विद्या, तुमि धर्म
    तुमि हृदि, तुमि मर्म
    त्वं हि प्राणा: शरीरे
    बाहुते तुमि मा शक्ति,
    हृदये तुमि मा भक्ति,
    तोमारई प्रतिमा गडि
    मन्दिरे-मन्दिरे मातरम् ।। ३ ।। वन्दे मातरम् ।
    त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
    कमला कमलदलविहारिणी
    वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्
    नमामि कमलां अमलां अतुलां
    सुजलां सुफलां मातरम् ।। ४ ।। वन्दे मातरम् ।
    श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषितां
    धरणीं भरणीं मातरम् ।। ५ ।। वन्दे मातरम् ।

    -Bankim Chandra Chattopadhyay

  2. Bahut hi behtar lekh ikha hai. Aaj Hindi ki jo halat hai wo kisi se chupi bhi nahi hai. par mera bhi manna hai ki -हिंदी का इस तरह से जिद छोड़कर नयी भाषाओ को अपनाना इसके विस्तार के लिए ठीक है. इस तरह से भाषा का अस्तित्व बना रहता है और भाषा समृद्ध भी होती है

    1. धन्यवाद गौरव प्रतिक्रिया देने के लिए..सवाल अपनाने का नहीं है गौरव भाई ..सवाल ये है कि आप किस कीमत पर चीजों को अपना रहे है ?..अगर अपनाने का मतलब ये है कि हम अपनी विरासत को ही नकार दे तो ऐसी समृद्धि का क्या लाभ ? अपनाने का मतलब ये है कि “न्यूज़” तो लोग जानते है पर “समाचार” का अचार बन गया!

      चलते चलते ..लेख की प्रशंसा के लिए धन्यवाद.

  3. Hej from Sweden,

    Wow your blog is really interesting! I love seeing your native language in print, it’s beautiful. I really enjoyed the video clips, how way cool is that?
    Thank you for visiting my blog and I will return regularly to view your blog.

    1. @GullringstorpGoatGal

      I must really thank you for showing deep interest in an issue expressed in one’s native language. It shows your curiosity and great understanding as well. Though I am an English writer, it’s my habit to express something in my native language as well. After all, there is not only great emotional attachment involved but also the issue reaches out to wider segment of people. Anyway, the issue that I have referred to in my this post is of huge significance for you as well. In my article, I have talked about the distortion of standard Hindi in the face of negative impact of globalization and commercialization. The high dosage of English words while speaking Hindi has given to strange fusion “Hinglish” ( Hindi+English). I must say that this is happening worldwide. Globalization has caused huge damage to a nation’s unique assets. Native language is no exception. The languages are either fast becoming redundant or losing their original form. Ironically , some hail that as evolution of language. In my eyes that’s distortion of language.

      Think over it and I am sure you would identify yourself with this grave issue that I have expressed in my own language.

      Thanks for loving the videos. The videos are representative of various emotions in form of various moods from romantic fervour to moments of sadness. These are from Indian movies and you know Indian movies have lots of song and dance sequences on par with the theme of the movie.They make the plot more watchable, dramatic and meaningful.

      Thanking you once again. Keep visiting goat girl🙂 . Keep posting nice pics and you would always find me on your blog page. And yes, where is your pic goat girl ?

      -Arvind K. Pandey

  4. अपने फेसबुक मित्र सुधीर से संवाद के दौरान :

    सुधीर इस प्रशंसा के लिए धन्यवाद. मैंने ये बात सौम्या से भी कही और आप से भी यही कह रहा हू कि मेरी अच्छी हिंदी लिखने के पीछे वजह प्रयाग से होना है. फिर ऐसे मित्र मिले जो खुद हिंदी बहुत अच्छी बोलते है और फिर प्रयाग से होने की वजह से साहित्यिक हिंदी की तरफ रुझान बहुत स्वभाविक बन पड़ा. अंग्रेजी से प्रेम तो इसलिए हुआ कि एक तो आप दूर देश में अपरचित से आसानी से वार्ता में सलंग्न हो सकते है और दूसरे ये कि हमारे देश में या अन्य देश में उच्च पदो पर जो लोग बैठे है उन तक बात तभी पहुचती है जब आप अंग्रेजी में भौकते है🙂 इसलिए मजबूरन प्रेम करना पड़ा अंग्रेजी से.

    लेकिन हिंदी से प्रेम पहला पहला है. और जाहिर है पहले प्रेम की तरह स्वभाविक और माधुर्य परिपूर्ण है. और यही वजह है कि मेरी कोशिश यही रहती है कि ज्यादा से ज्यादा हिंदी का प्रयोग करू. अंग्रेजी का इस्तेमाल तभी करता हू जब कोई अपरिहार्य स्थिति हो. हिंदी का अस्तित्व तभी बना रहा सकता है जब हम खुद इसके प्रयोग के प्रति सचेत हो. अन्यथा हिंदी के विस्तार की बात सिर्फ हवाई रह जाएगी.

    मुझे याद आता सी एम एस (विद्यालय का नाम जो लखनऊ में है) के दिन जब भोजनावकाश के वक्त भी हिंदी का प्रयोग वर्जित था और मै उन चुने बदनाम लोगो में से था जो इस आज्ञा का कई बार उल्लंघन करने के कारण कई बार जुर्माने की राशि भर चुके थे. इस बात का प्रतिशोध आज अच्छी हिंदी बोल और लिख और प्रसार कर के लेता हू. और सी एम एस के दिनों में सबसे ज्यादा हिंदी में अंक लाकर🙂

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