Monthly Archives: March, 2011

India Stuns Pakistan Again In World Cup Cricket With Hopes To Kiss The World Cup Once More

India Stuns Pakistan Again In World Cup Cricket  With Hopes To Kiss The World Cup Once More

India’s victory against Pakistan in semi-final of Cricket World Cup 2011 shall be remembered for a long time. This ‘mother of all the matches’ kept millions across the globe tense and anxious. The result was quite predictable but cricket is game of glorious uncertainties.Right from the beginning, the Indian fans were convinced that Pakistan had little chance of beating India. Both records and attitude of Indian Team signaled India’s victory. The 29 run victory came to confirm the signals of optimism. It had to be 5-0 and the victory made it a reality.

There was a dubious attempt to make the match a political drama. This was sabotaged as India has reached in the final dominated the post-match celebrations. The talk of cricket diplomacy hit the pre-match discussions. This is a sinister affair to make sport a mean to  serve political ends. Why should sport be a medium to better the tense relationship? What’s the need to blend cricket with politics? The premier tournaments should maintain a safe distance from such political dramas. The game should be treated like a game and not a round table conference.

Let’s talk about role of Tendulkar as well. Many dull headed critics always accuse him of never playing a match winning innings even as the record books suggest otherwise. In the very first clash between India and Pakistan in 1992 World Cup, played in Australia, Sachin was awarded Man-of-the-match. Sachin again made India attain victory over Pakistan in 2003 World Cup clash in South Africa by his classic innings of 98 runs. Needless to state, he was once again the Man-of-the-match.

India Stuns Pakistan Again In World Cup Cricket  With Hopes To Kiss The World Cup Once More

Now at Mohali in 2011, we once again witnessed how he made Pakistan away from the door of victory. True, the lady luck made him survive four dismissal chances but can we deny the fact that his runs shaped the victory of India ? I am happy that all biased analysts will now think twice before stupidly suggesting that Tendulkar’s big innings are sometimes bad omens and counter-productive. Or, for that matter, just better his individual records! Oh yes, sounding deja vu, he became Man-of-the-match at Mohali as well!

Lastly, the Indian team has displayed a rare spirit. It’s now playing more like an organized group. It’s indicative of the fact that the Indians have gained the ability to perform better in tougher conditions.It also shows that team is learning the art to play as group and not as one man show. It’s time to deliver this collective spirit once again to make World Cup ours after we kissed it in 1983. Sri Lanka is a very good team. Let’s not blue waves commit the fatal blunder of ignoring the mighty roar of Sri Lankan lions. It’s time to tame the lions! It’s time to kiss the World Cup again!

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Does Presence Or Absence Of Sex Define Man And Woman Relationship?

Does Presence Or Absence Of Sex Define Man And Woman Relationship?

If sex enters then friendship between man and woman is not real or true! Nonsense. What’s the need to use sex as a criterion to determine whether friendship is real or not? If one says the issue relates more with friendship and not sex then what’s the need to be bothered over what others perceive about quality of friendship? I mean why one is so bothered about the type of friendship that exists between man and woman? The whole world is guided by some sorts of interests. Is that too easy to be Nishkam (selfless)? In Ramcharit Manas, it’s clearly stated right from Devas (Demigods) to human beings all are guided by some interests.

I fail to understand what’s the need to view man-woman friendship from a special angle? Are same sex relationships above interests? I have altogether a different take on this issue. Let’s not use the presence or absence of sex as the determining factor to measure the worth of man and woman relationship. No problem if sex is there. If it’s not there then treat that too as normal! In my eyes ice always melts in presence of fire. It’s natural. Why so much fuss? The only worrying factor is that the whole relationship should not get limited to sexual gestures alone. In other words, the relationship was a flawed one if it was merely preserved for sexual favours.

If that’s not the case then just enjoy the relationship singing Kishore’s hit number from Amar Prem: Kuch To Log Kahenge Logo Ka Kaam Hai Kehna!

Does Presence Or Absence Of Sex Define Man And Woman Relationship?

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किस्सा इलाहाबादी डीलिंग का ! (व्यंग्य लेख)

इलाहाबाद की जय हो:-)

हमारा इलाहाबाद विविधताओ का शहर है. यहाँ का सब कुछ एक ख़ास रंग में ढला है.  इलाहाबाद के साहित्यिक और सांस्कृतिक उपलब्धियों से तो आप परचित है ही पर आपका पाला कभी ‘ इलाहाबादी डीलिंग’ से पड़ा है ? आप चौक गए ना कि आखिर ये क्या बला है? आपका चौकना स्वाभाविक है. सबके बूते के बाहर है इसकी  महिमा को समझ पाना पर यहाँ के वाशिंदे इस कला  में पारंगत है और इसका  रस लेना खूब जानते है.  इस शहर में सफलता इस बात पे निर्भर करता है कि डीलिंग पर  पकड़ आपकी कितनी है. सही डीलिंग अगर आपको शिखर पर बैठने कि क्षमता रखती है तो गलत डीलिंग की वजह से आपकी अच्छी खासी किरकिरी भी हो सकती है.  डीलिंग में सारा कमाल आपके वाक् कौशल पर निर्भर होता है.

आइये इसके सूक्ष्म पहलुओ पर एक नज़र डाले. वैसे इसका स्वरूप कुछ निश्चित नहीं पर फिर  भी इसके कुछ गुण इसके आवश्यक तत्त्व के रूप में निर्धारित किये जा सकते है. जहाँ तक डीलिंग की परिभाषा का सवाल है बस इतना समझिये कि यह निरर्थक बातो का ऐसा मायाजाल है जिसमे सार कुछ भी न हो  पर आप तब भी उसका कुछ अर्थ निकलने को विवश हो जाए. जिस प्रकार ध्याता ,ध्येय और ध्यान की प्रक्रिया ध्यान का हिस्सा होती है उसी प्रकार डीलिंग प्रोसेस में डीलिंग देने वाला ,डीलिंग लेने वाला और वह विषयवस्तु जिसको आधार बनाकर डीलिंग को गति प्रदान की जाती है आवश्यक  है. सफल डीलिंग वो है जिसमे डीलिंग का शिकार या समझ ही ना पाए कि उसके साथ कुछ अनहोनी घट गयी है.  सफल डीलिंग राहू ग्रह के प्रभाव की तरह होती है. मतलब यह कि कुछ नहीं होते हुए भी आप गुब्बारे की तरह फूलने को विवश हो जाते है. असली कारण  तो  खैर  राहु की छाया की  तरह पकड़ के बाहर होता है पर आपकी सिकुड़ी शक्ल जरुर सबके सामने प्रत्यक्ष होती है.

डीलिंग किस वक्त की जाए इसका निर्णय माहौल के अनुरूप तय होता है. हवा के रुख के हिसाब से बात करने वाले कब वार्तालाप को डीलिंग में परवर्तित कर देते  है इसका आभास भी  नहीं लग पाता. डीलिंग में स्थान का कोई महत्त्व नहीं है. राह चलते ,ढाबो पर ,नुक्कड़ पर ,घर के ड्राइंग रूम में हर जगह डीलिंग सहूलियत के साथ हो सकती है  बशर्ते आप के अन्दर एक पेशेवर डीलिंगबाज़ की आत्मा विद्यमान हो. भावनात्मक और बौद्धिक  दो प्रकार की डीलिंग ज्यादातर देखने में आती है. इसी दो श्रेणियो के अंतर्गत साधारण और विशिष्ट प्रकार की भी डीलिंग आती है. अब जैसे इन्हें ही ले लीजिये.इनको आसानी से डीलिंग गुरु की संज्ञा दी जा सकती  है. कठिन  होता है ये बता पाना कि कब ये डीलिंग नहीं कर रहे होते है. भावनात्मक डीलिंग में तो इनका कोई जवाब नहीं. हर वक्त हर जगह ये डीलिंग कर लेने में ये सक्षम है. जिससें ये मिलते है वो डीलिंग ग्रस्त हो जाता है.  डीलिंग ग्रस्त माने जब आप अपने किसी ख़ास परिचित से मिले और वो आपको देखकर नाना प्रकार के विचित्र भावो में एक  साथ डूबने इतराने लगे तो समझिये वो डीलिंग का भयंकर शिकार हुआ है.

अब टाईफाईड की बिमारी की तरह उसका इस से कुछ समय तक छूट पाना असंभव है. ये जनाब प्रोफ़ेसर से लेकर पत्रकार तक सब में डीलिंग के कीटाणु डालने में सक्षम है.  मजाल है इनका कोई भी वार खाली जाए. वैसे ये खुद भी डीलिंग के शिकार कई बार हो चुके है.  ऐसे ही एक बार जब अपने मित्र के हाथ में पट्टी बंधे होने का कारण पूछा तो जवाब सूनकर ये चारो खाने चित्त हो गए.’ यार कुछ मत पूछो!  कल रात को जब मै घर वापस लौट रहा था तो कुछ अति खतरनाक गुंडों  ने मुझ पर हमला कर दिया. उन्होंने तड़ातड़ मुझपर कई फायर किया. सब गोलिया तो इधर उधर से निकल गयी पर एक कमबख्त मेरे बाजू को चीरते हुए निकल गई’.  इनके मित्र एक झोंक में सब उगलकर चलते बने. हकीकत जबकि कुछ और ही थी.  करेंट के तेज़ झटके के कारण फिसलकर गिर पड़ने के कारण इनके कंधो में साधारण सी मोच आ गई थी.  देखा आपने यथार्थ और कल्पना का ये कितना सुन्दर उदहारण है. इसी अद्भुत सम्मिश्रण की कला में पारंगत होने के कारण इन्होने डीलिंग गुरु होने का अधिकार पा लिया है.

खैर आइए देखे मेरे एक पत्रकार मित्र किस तरह बौद्धिक डीलिंग करते है. हर आधुनिक बुद्धिजीवी की तरह इन्हें भी बुद्धि का बेजा इस्तेमाल करने की बुरी आदत है.  ये इतनी अदा से बौद्धिक  डीलिंग करते है कि कलात्मकता में सचिन का चौका भी कुछ नहीं.  ऊपर से अत्यंत शांत प्रतीत होने वाले ये सज्जन शिकार की तलाश  में अंदर से  उतने ही बेचैन रहते है. आइए जरा बौद्धिक डीलिंग से रूबरू हो ले.  इनसे जब मेरी मुलाकत होती थी तो ये जनाब अंग्रेज़ी की डिक्शनरी खोल के बैठ जाते थे और उन शब्दों का अर्थ बताते थे जिसका इस्तेमाल कोई भूले से भी ना करना पसंद करे.  पर ये जरूर करेंगे क्योकि इन्हें वो सब पसंद है जो कोई नही करता. थाईलैंड जिसको सिर्फ मै एक देश के रूप में ही जानता था इनके पास जाकर ही मुझे इस थाईलैंड शब्द का एक विशिष्ट  गूढ़  अर्थ प्राप्त हुआ!  बुद्धिजीवी आज उन्हें ही माना जाता है जिनके पास इस प्रकार के शब्दों का भण्डार हो.  हा तो मै ये बता  रहा था कि ये जनाब मेरे लिए कितना कष्ट उठा रहे थे.  लगा कितनी चिंता है इन्हें मेरे अल्प शब्द भण्डार की.  मेरे वोकेब्लरी की.  पता नहीं इनकी इस उदारता का का ऋण कभी उतेरगा की नहीं. पर एक दिन मुझे एक इंस्टंट बोध हुआ और इस प्रक्रिया का सारा रहस्य सामने आ गया और फिर मुझ ये समझते देर ना लगी कि यह अपने विकृति को ट्रान्सफर करने की कवायद भर थी.

जहाँ तक  विशिष्ट प्रकार की डीलिंग का प्रश्न है इसका इस्तेमाल राजनीति और प्रशासन के आलावा धर्म के क्षेत्र में भी व्यापक इस्तेमाल होता है.  यहाँ ये बताना जरूरी है की बुद्धि और भावुकता के मिश्रण के की अग्नि पर विशिष्ट डीलिंग पकती है.  इसकी झलक पाने के लिए आपको किसी तथाकथित सिद्ध के आश्रम में जाना पड़ेगा. आपको वहां  बताया  जायेगा कि किस तरह से इन्होने अनगिनत सिद्धियाँ हासिल की.  और फिर तुरंत हिमालय से सीधे शहर में कैश कराने आ गए. शिष्य वातावरण को हिट बनाने की कोशिश में आपके पास मंडराने  लगते है. ‘ अब इनकी महिमा को कौन समझ सकता है.  पल में ये ना जाने ये किसको गद्दी पे बिठा दे’.  शिष्य विचित्र भावो को चेहरे पे बिखेरकर एक ख़ास प्राकर के  विस्मय बोध के साथ नए मुर्गो को इसी प्रकार दाना  चुगाते है. अब जो धर्म को व्यर्थ की जगह जाकर तलाशेंगे तो और क्या हाथ लगेगा ऐसे फूहड़ अनुभवों के अतिरिक्त. थुलथुल मोटे आसामी विशिष्ट डीलिंग के सबसे आसान शिकार है.  अगर कोई अचानक माला फेरने लग जाए और घोर संसारी होते हुए भी वैराग्य की बात करने लगे तो समझिये विशिष्ट डीलिंग का तीर आर पार हो गया है.

चलते चलते ये बता देना जरूरी है कि यह व्यंग्य लेख परसाई  जी की आत्मा से मुलाक़ात का परिणाम है जो इसे लिखने का टिप्स देकर हवा में विलीन हो गई!
 

इलाहाबादी चहल पहल डीलिंग  के बीच :-)

इलाहाबादी चहल पहल डीलिंग के बीच 🙂

 

(मेरा ये व्यंग्य लेख सर्वप्रथम “आज” दैनिक जो  वाराणसी से प्रकाशित होता है में १ ५ अप्रैल २००४ को छपा था )

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Exposing The Legal World!

                             

Seems To Be Favouring The Rich And Powerful!

Seems To Be Favouring The Rich And Powerful!

                                              On Attitude of Judges 

Many times despite the best efforts made by the lawyers, the judges refuse to take note of important elements all in the name of  “Privilege of Discretion”.  I mean they deliver vague decisions and we are left with no other options than to accept the verdict as it is.

The attitude of judges play a crucial role in delivering a verdict. Have you heard about this phenomenon in which lawyers wait eagerly for the favourable bench ? Now what’s favourable bench?

So even if one has got the right facts, it’s quite possible that attitude of the judges act as spoilsport.

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Satyandra Dubey: Lost His Life While Fighting With The Corrupt System!

Satyandra Dubey: Lost His Life While Fighting With The Corrupt System!

 

                                        On Lack Of Evidences 
  

It’s related with safety of whistle-blowers. The courts have always been concerned about the security of whistle-blowers. Why will anyone turn into a witness if there is lack of protection?

In my village some people are involved in anti-social activities. I have all the evidences and with the help of some good souls I am trying to uproot these people. However, the things are not that easy as local thana is hand in glove with these wrong elements.

Now tell me  who will take so many risks to provide concrete evidences? Every crime leaves its own evidences. We know that. However, the truth is that nobody will bell the cat at cost of one’s life. We know what happens to likes of  Satyendra Dubey .

 

 

 

 

 

Supreme Court: Need To Restore The Faith Of Ordinary Citizens In Legal World

Supreme Court: Need To Restore The Faith Of Ordinary Citizens In Legal World

 

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Japanese Put A Brave Face On Their Problems

Viewing The Disaster With A Hope For Better Days
Viewing The Disaster With A Hope For Better Days

Japanese have once again proved that they are different from others. They have displayed a great sense of order amidst images of devastation.  I am sure they would be face to face with normalcy quite soon.  They have provided human will a new stature. I salute their indomitable will power,  their remarkable attitude, their  unique gestures.


For Japanese it’s not an unfamiliar experience to play with fire. They have been in arms of troubles quite often.  However,  this time the disaster  crossed its limit,  leading to total collapse of normal life.   However,  the world came to witness that the Japanese didn’t enter in loot and killings as we witness in other counties during such scenario. The supermarkets are devoid of essential commodities. There is no electricity and fresh water. There is risk of even nuclear disaster.  Tell me which nation has faced such unprecedented crisis ?

However,  the Japanese people are still smiling, trying their level best to bring things back on track.  It’s time to support and help these people so that they be  in tune with happy episodes of life once  again.

From  The Washington Post News Item:

We value harmony over individualism,” said Minoru Morita, a well-known Tokyo-based political commentator. “We grow up being taught that we shouldn’t do anything we are ashamed of. It is these ideas that make us.

Human Life Vs Nature

Human Life Vs Nature

References:

The Washington Post


Images of devastation (You Tube Video)

Total collapse (You Tube Video)


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परदे के पीछे छुपे तथाकथित सभ्य, बड़े और पढ़े लिखे लोग असली दोषी है!

 इनको देखे पर जो इनके पीछे है उन्हें भी देखे और समझे

इनको देखे पर जो इनके पीछे है उन्हें भी देखे और समझे

चलिए उस  समूह के लोग जो शोषित है उनको  कुछ एक  एक बार छूट दी जा सकती है कि उन्होंने  गैर लोकतान्त्रिक तरीको से अपनी बात मनवाई पर  गिलानी, अरुंधती रॉय, कम्मुनिस्ट नेता और इसी तरह के तमाम तथाकथित पढ़े लिखे लोग जो कम से कम इतने काबिल तो है ही कि सच और झूठ का फर्क तो महसूस कर ले पर फिर ये क्यों अपने निहित स्वार्थो के लिए पहले से शोषित जनता को ना सिर्फ गुमराह करते है पर उन्हें कुत्ते के मौत मरवा भी देते  है.

आज जो नक्सली आन्दोलन का विकृत रूप देख रहे है इसके असली गुनहगार ये पढ़े लिखे लोग है वो नहीं जो बन्दूक उठा के आम आदमी या पुलिसवालों को मार रहे है. ये पढ़े लिखे दोषी है  जिनकी वजह से अफज़ल या कसाब जैसे आतंकियों को मारने से पहले दस बार सोचना पड़ता है.  सोचिये पाकिस्तान कम आंसू बहाता है इनके लिए लेकिन अरुंधती टाइप के लोग ज्यादा बिलखते है ! ये अरुंधती टाइप के लोग ही है या कहिये सेकुलर गिरोह ही है जो  आतंकवादियों  के  मानवाधिकारों की बात तो करता है पर जो बेगुनाह  पुलिसवाले नक्सली आन्दोलन में मारे गए उनको जायज़ ठहराता है.  इसको आप क्या कहेंगे ? इसी मानसिकता के चलते यह देश हर विकृत नकारात्मक  शक्तियों का केंद्र बन गया है. कोई देवी देवताओ के न्यूड चित्र बनाये वो तो क्रेअटीव अभिव्यक्ति हो गयी लेकिन  अगर  कोई पलटकर उसी  क्रेअटीव अभिव्यक्ति से उन्ही सेकुलर समूह को न्यूड कर दे तो हाय तौबा मच जाती है.

ये  पढ़े लिखे सभ्य लोग है

ये पढ़े लिखे सभ्य लोग है

ये सिर्फ इस बात के लिए दोषी नहीं है कि इन्होने गुमराह किया पर ये एक स्वस्थ्य समाज में हर उस बात को थोपेंगे जो विकृत हो या परंपरा के विरुद्ध हो.  आप कहेंगे शादी जरूरी है. ये कहंगे नहीं लिव इन सम्बन्ध सही है, लेस्बियन सही है, अवैध सम्बन्ध सही है, ग्रुप सेक्स सही है. ये सब सही है पर शादी ना भाई ना ये नहीं सही है. बस यही गलत है. बाकी सब सही है. हम सब बहुत जल्दीबाजी में रहते है सड़क पर खड़े आम आदमी को दोषी ठहराने में पर बड़ी मछलियों को गरियाने में और सजा देने में हमारे प्रधानमंत्री भी असहाय हो जाते है. एक चोर जिसने सिर्फ चैन चुरायी उसको सिर्फ लोगो ने ही नहीं धुना पर पुलिसवाले ने भी रस्सी से घसीटा.  और यहाँ बड़ी मछलिया कानून की बारीकियो का सहारा लेकर मौज  कर रहे है.  एक विनायक सेन को बचाने राम  जेठमलानी जैसे वकील जल्द उपलब्ध हो जायेंगे पर आप ये देखिये की हमारे जेलों में कितने बेगुनाह पैरवी के अभाव में सड़  रहे है उनकी कोई सुनवाई नहीं.

 
परंपराओ की हिफाज़त के बारे में कह के देखिये.  आपको आउटडेटड ना घोषित कर दे तो कहिये.  इसीलिए स्त्रियों के शोषण या अधिकारों के बारे में बात करने वाले बड़े बड़े मैगज़ीनो के लिए ये आवश्यक है कि मिलान फैशन शो या नयी फ़िल्म के प्रमोशन के बहाने एक स्त्री के कम कपड़ो में तस्वीर मुख्य या बीच के पन्नो में छपे. तो हमने शोषण की बात भी कर ली और नग्नता का प्रदर्शन कर मार्डनवादी भी हो लिए !  इसलिए मै शोषण के शिकार समूहों  को कम दोषी मानता हू.   इनके पीछे इनको रिमोट कण्ट्रोल की तरह इनको संचालित करने वाले लोग असली दोषी है.  बिना इनको ख़त्म किये आप इन तमाम समूहों का आतंक नहीं नष्ट कर सकते.

 अब इन समूहों को जो पीछे से चलाये उनको  क्या कहेंगे!

अब इन समूहों को जो पीछे से चलाये उनको क्या कहेंगे!


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Images Of Devastation That Hits Japan

The 8.9 magnitude earthquake that killed thousands in Japan proves once again that fury of nature has the power to crush the institutions built by human beings within a second. Such incidents teach us a lesson that we should not boast of beauty or wealth that we possess. It takes only few minutes for the nature to collapse them all. It’s not that the Japanese had not installed measures to avoid such happenings but then there are times when such measures seem insignificant.The technology saved lives but nature had the last laugh. God bless the people of Japan! In this tragic hours, I and million other souls pray for them. May the departed souls rest in peace.

Images Of Devastation That Hits Japan

(Burning Houses In Natori City)

Images Of Devastation That Hits Japan

(Cars,Cars Everywhere)

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(Broken Homes, Damaged Cars, Shattered Human Beings)

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(When Everything Goes Up In Smoke)

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(Beautiful Things Turned Into Trash)

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(Oh! These Killer Waves)

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(Things You Enjoy Are No More)

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(Ships And Cars Both Float On Water)

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(Human Beings Are Only Mute Spectators When Nature Rules The Roost)

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I Am Hindi Movie Songs Addict!

I Am Hindi Movie Songs Addict!

I must confess that I am Hindi songs addict! I am not at all ashamed to reveal this great truth. One reason why Hindi movie songs come to stir the emotions so often is because they are based on elements defining Indian classical music. The raga and tal employed often connects us with newer plane of consciousness. In this very land, the various forms of art are ways to explore and establish our connection with the Absolute. So we can see that some addictions are good.

Listen to the “Mere Naina Sawan Bhado ” moulded in Raga Shivaranjini. It immediately makes you get lost in a strange unknown realm of a mysterious world. Listen Talat singing ” Aye Dil Mujhe Aise Jagah Le Chal”(Arzoo) and you get transported to a world embedded in total silence.

A sincere lover of Indian movie songs would also take note of the picturization of these songs. The geniuses like Gurudutt, Raj Kapoor , Vijay Anand and Manoj Kumar, to name few, had mastered the art of perfect picturization. The dream sequence songs like “Hum apki aankho me ” (Pyasa) and ” Ghar Aaya Mera Pardesi” (Awara) epitomizes song picturization. Even ”Pal Pal Dil Ke Pass ” from movie ‘Blackmail’ is a treat for the eyes. One interested in knowing how to use light and shade needs to watch “Saqiya Aaj Mujhe Neend Nahi Ayegi” (Sahib Biwi Aur Ghulam).

I Am Hindi Movie Songs Addict!

One thing more. We always tend to ignore and downsize the contributions of music directors and lyricists. The lyricist is the most unfortunate creature in terms of eliciting credit. Anyway, Shailendra, Sahir, Shakeel, Indeevar, Rajendra Krishn and Pradeep would never get lost into oblivion. The composers like Shankar-Jaikishen, SD Burman, Ravi, Kalyanji Anandji, OP Naiyyar, Laxmikant-Pyarelal and RD Burman would continue to keep providing few moments of bliss in the world gone to the dogs.

It’s time to sing for Hindi songs Chura Liya Hai Jo Tumne Dil Ko,Nazar Nahi Churana Sanam!”( You have stolen my heart and so never ignore me) .

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नारी मुक्ति का मीठा जहर !

मुझे पुरुषो से नफरत है!

मुझे पुरुषो से नफरत है!

भाई देखिये विशेषज्ञ टाइप के लोग जो भरी भरकम शब्दावली में यकीन रखते है इस लेख से दूर रहे.  एक सीधे साधे मनइ (आदमी) की हल्की सी ये कोशिश है इस गंभीर विषय को गैर पारंपरिक तरीके से समझने या समझाने की. कहने को तो नारी मुक्ति की  पटकथा रची गयी स्त्री के अस्तित्व को नए मायने देने के लिए पर अगर भारत के परिपेक्ष्य में देखा जाए तो नारी मुक्ति ने वही काम किया है कि  मर्ज़ बढ़ता ही गया ज्यों-ज्यों दवा की.   जैसे कोई बिल्ली पाल ले चूहे मारने के लिए और बिल्ली आतंकी हो जाए.   तो क्या मै यह कहना चाहता हू कि नारी मुक्ति आंदोलनों या नारी विमर्शो की भारत में कोई जरूरत नहीं थी?  ऐसा नहीं पर शायद हमको पश्चिमी मानकों पे आधारित माडल को अपनाने कि बजाय इस देश के अनुरूप ही कोई ढांचा विकसित करना चाहिए था. इसके आभाव में हुआ ये कि कहने को तो नारी मुक्ति यहाँ के औरतो की समस्यायों को सुलझाने का प्रयत्न करती है पर असलियत में माडल वही है जो पश्चिमी जगत में व्याप्त है.  इसका नतीजा यह हुआ है की आज पुरुष औरतो के सहयोगी नहीं “नैचुरल एनेमी” बन के उभर रहे है.   दोनों के रिश्तो में प्रेम नहीं प्रतिस्पर्धा बढ रही है. विश्वास की जगह संदेह ने ले ली है.   एक नारी मुक्ति प्रेमी नारी का कहना है की ये बात बिल्कुल झूठ है कि भारत  में नारी आन्दोलन का स्वरूप आयातित है.   मै कहता हू कि ये सफ़ेद झूठ है.   अगर आयातित  नहीं है तो आज जो हमारे यहाँ के औरतो में लक्षण  उभर रहे है या जो समस्याए सामने आ रही है वो बिल्कुल ठीक वैसे ही क्यों है जो कि पश्चिमी जगत वर्षो से भोग रहा है ?

ये माना कि यहाँ कि औरते भी तमाम समस्यायों से ग्रस्त है पर क्या यही एक वजह काफी थी आँख मूंदकर  नारी मुक्ति के लहर में बहने की ?   मै ये जानना चाहूँगा की नारी मुक्ति के व्यर्थ प्रपंचो से भारतीय समाज को क्या उपलब्धि हासिल हुई है सिवाय इसके की समाज का बिखराव और सुनिश्चित हुआ है.   मै नहीं समझता हू कि अगर भारतीय नारिया अगर आज विभिन्न क्षेत्रो में विकसित आत्मविश्वास से काम में जुटी है तो इसमें नारी मुक्ति आन्दोलनों का कोई योगदान है.  ये भारतीय समाज का नैसर्गिक विकास क्रम है जिसमे स्त्रीयों ने हमेशा महत्वपूर्ण  भूमिका निभाई है इस तथाकथित “पितृसत्तात्मक ” समाज में.  ये सही है की बढ़ता लिंगानुपात,  भ्रूण हत्या , दहेज़ हत्या, बलात्कार या और पीछे जाए तो सती प्रथा जैसी समस्याए हमारे अपने समाज का हिस्सा है  पर सोचने की बात ये है की क्या इनके निदान के लिए हमे नारी मुक्ति जैसे विदेशी नशे का सहारा लेना पड़ेगा.   या इस विदेशी नशे के देशी ब्रांड के सहारे रहना पड़ेगा.   चलिए अगर विदेशी ब्रांड के देशी संस्करण से ही अगर  भारतीय नारी मुक्त होगी तो हमे कोई  शिकायत नहीं  पर समस्या ये है कि इसके जो भयानक साइड एफ्फेक्ट है  उनसे कौन छुटकारा दिलाएगा?

चलिए भारतीय नारी तथाकथित “पितृसत्तात्मक” पंजो से मुक्त से धीरे धीरे मुक्त हो रही है पर मुक्त होके जो नए विकार थोप रही है उनसे इस भारतीय समाज को कौन मुक्ति दिलाएगा ?  शायद ये इसी नारी मुक्ति का परिणाम है की पुरुषो को  स्त्री अत्याचार से  बचाने या पीडितो के लिए शहरो में नए नए हेल्प लाइन केंद्र खुल रहे है.  एक नारी मुक्ति प्रेमी महिला का कहना है की भारतीय नारी मुक्ति पुरुषो की भी समस्याओ का अवलोकन करता है और उनकी भी बेहतरी के रास्ते सुझाता है. डोस तो उन्होंने मीठा दिया पर है ये मीठे जहर से भी खतरनाक.  मुझे बहुत ख़ुशी होती अगर नारी मुक्ति सच में नारी की समस्यायों को हल कर रही होती. लेकिन सच्चाई कडुवी है. असल में नारी मुक्ति सेकुलर गिरोह की रखैल बन के रह गयी है.   इसका काम केवल समाज को तोड़ने का रह गया है ताकि असंतोष व्याप्त हो जो  इनके  हिसाब से  क्रांति  का माहौल   तैयार करता है.   इसी  माहौल  में इनका गेम संभव है.    स्त्रीयों को बिना बरगलाये ये काम संभव नहीं.   स्त्रीयों को बरगलाने में सिद्ध सेकुलर गिरोह ने कम से कम स्त्री जाति का महत्व इस मामले में समझा की सत्ता तक पहुचने में ये अच्छा  माध्यम बन सकती.  नारी मुक्ति से अच्छा आड़ इसे और क्या मिल सकता था.   सो अच्छे के भेष  में समाज को तोड़ने  का काम हिट हो गया.
बुरका महिलाओ की आज़ादी दर्शाता है :-)

बुरका महिलाओ की आज़ादी दर्शाता है 🙂

इसके लिए विदेशी या सेकुलर संस्थानों से  पढ़े लेखको या बुद्धिजीवियों की जमात ने पहले भारतीय समाज की भ्रामक तस्वीर पेश  की फिर नारी मुक्ति का नशा ठेल दिया.   एक तमाशा  देखिये.   अभी  इलाहाबाद में नारी मुक्ति व्याख्यान  में एक वक्ता ने निहायत वाहियात बात कही और उसे से भी मज़ेदार बात ये हुई कि अगले दिन अखबारों में यही बात बड़ी प्रमुखता से छपी.  उस वक्ता ने यह कहा  कि अभी आधी स्त्रीयों को पता ही नहीं वो बंधन में है.  अब उनको नहीं पता तो नहीं पता पर आपकी पेट में दर्द क्यों हो रहा है?  अरे भाई इसिलए दर्द हो रहा है कि नारी मुक्ति नाम के दूकान की सेल डाउन  हो रही है. सच्चाई ये है की मै इलाहाबाद में ऐसे सेकुलर आत्माओ को जानता हू जो बाहर तो स्त्री मुक्ति पर भयानक लेक्चर देते है पर घर में अपनी स्त्रीयों का  हर तरीके से शोषण करते है. मीडिया भी अपने निहित स्वार्थो के कारण इस नारी मुक्ति को अपने तरीके से कैश कर रहा है.और मार्केट के लिए तो नारी मुक्ति वरदान  बन के आया है.   सोचिये अगर मर्दों की फेयरनेस क्रीम स्त्रीयों के फेयरनेस क्रीम  से अलग हो तो मार्केट की निकल पड़ी ना.  इस नारी मुक्ति से नारियो का वास्तव में कितना कल्याण हुआ ये तो अलग बात है मगर कुछ क्षेत्र जैसे  कानून,सिनेमा,माडलिंग इत्यादि की तो चांदी हो गयी है.

कोर्ट कचहरी में जाए तो भूमि विवाद के बाद स्त्रीयों से जुड़े विवाद ही अधिक है.  चलिए सेकुलर इतिहास ने तो भारतीय इतिहास की सब  अच्छाईयो को खारिज किया.  मसलन हिन्दुओ की पितृसत्तात्मक व्यवस्था में हमेशा स्त्री की उपस्थिति की अवहेलना हुई.   उस हिन्दू  समाज में  जिसने अर्धनारीश्वर जैसी अदभूत सोच दी.  मै मान लेता हू कि सेकुलर इतिहास ने सच बताया.  पर मै जानना चाहता हू कि इस सेकुलर गिरोह के द्वारा प्रायोजित नारी मुक्ति ने क्या दिया सिवाय बिखराव के जिसमे स्त्रिया मोहरा बन के रह गयी है  आत्मविश्वास सहित.  ये  इतने उदारवादी हो गए है कि इनको हिन्दू व्यस्था के अंतर्गत विवाह से तो खिन्नता है या स्त्रीयों के रोल से खिन्नता है इस हिन्दू व्यस्था के अन्दर मगर इस व्यवस्था से परे अगर कोई ” हाई प्रोफाइल रंडी ” भी है तो वो इनकी नज़र में पूर्ण आजाद और वास्तविक स्त्री है.   यही है इनका खतरनाक दोहरा चरित्र.   आप ये देखिये की हर सहज व्यवस्था में इनको दोष दिखाई पड़ता है.   मैंने कहा ना नारी मुक्ति को तो ये भारतीय समाज के लिए अपरिहार्य बताता है क्योकि हिन्दुओ ने  इतनी गलत परंपराओ को जन्म दिया कि स्त्रिया तो दोयम दर्जे की चीज़ हो गयी. पर असल में इसे भारतीय समाज में स्त्रीयों की दशा से  कुछ लेना देना नहीं.   इनको मतलब है अपने उद्देश्य  से.   और वो है  अस्थिरता और असंतोष  की उत्पत्ति.   आपको एक उदहारण दू तो समझ में आएगा की नारी मुक्ति के नाम पे कौन सी विचारधारा को धीरे से सरका दिया जाता है हौले हौले.

तनु वेड्स मनु के रिव्यू को  एक सेकुलर  मैगजीन में पढ़ा. लेखिका ने वहा तक तो तनु को प्रोग्रेसिव माना जब तो अपने मित्र के साथ तकरीबन लेस्बियन की तरह जुडी थी मगर इस लेखिका  को फ़िल्म से आपति  कहा हुई जब  नायिका  चुपचाप विवाह  कर लेती है.  यह  चुचाप विवाह को नियति मान  लेना इस लेखिका  को बहुत अखरा.  मै कुछ नहीं कहूँगा.  अब पाठक खुद  ही  समझे मेरा इशारा.   इसी  प्रकार अब एक दूसरी खबर देखे. एक महिला  की  लाश बोरे में मिलती है स्टेशन पर.  तकलीफ हुई खबर पढ़कर.  मगर सेकुलर खबर ने ये तो बताया कि सुशिक्षित और बोल्ड महिला कि हत्या हुई  पर ये  नहीं बताया कि  उसी सुशिक्षित स्त्री के कई  पुरुषो से सम्बन्ध थे और पति के ऐतराज़  करने पे  वो हिंसक  हो उठती थी.  कई बार उसने ब्लेड से पति  के चेहरे पे वार भी किया.  चलिए शराब वगैरह भी पीती थी इसको मै  नहीं बताता.  कोई  ये ना समझे  कि मै  पति को जस्टिफाय कर रहा हू!  मै सिर्फ इस बात पे आपत्ति  प्रकट कर रहा कि अगर आप समाचार दे रहे है तो तथ्यों के साथ खेलवाड़ करके भ्रामक  तस्वीर क्यों पेश  कर रहे  है. और मीडिया को तो केवल मसाला चाहिए. अजीब तमाशा लोगो ने बना रखा है  जिसमे अवैध सम्बन्ध तो जायज है  मगर विवाह जैसे संस्था  को निभाना एक  मजबूरी या  गुलामी का  प्रतीक है.   हैरानगी इस बात पर भी है कि इसी सेकुलर मीडिया या नारी मुक्ति के ठेकेदारों को   मुस्लिम  समाज में  व्याप्त  महिलाओ  की बदतर स्थिती से कोई शिकायत नहीं.   अभी अरब जगत में हुए एक भीषण अग्निकांड में बहुत से स्कूली  छात्राओ की मौत हो गयी.   क्योकि कठमुल्लों में उन्हें कमरे में बंद कर दिया.वजह. सर पे दुप्पटा नहीं था और चेहरा खुला था. सेकुलर कुत्ते वहा नहीं भौकते जहा भौकना चाहिये.

अंत में मै यही कहूँगा आप बेशक स्त्रीयों की दशा को सुधारिए.कौन  नहीं चाहता कि उनकी दशा सुधरे. पर नारी मुक्ति के नाम पे समाज में बिखराव ना  पैदा करे. उस समाज को ना जन्म दे जिसमे विकृत  सम्बन्ध स्वीकार्य पारंपरिक  संबंधो पे हावी जो जाए.  एक सम्मानित महिला  सम्पादक अवैध संबंधो की वकालत करती है तो तकलीफ होती है.मतलब वैध बोझ है और अवैध जायज.   कुल मिला के नारी मुक्ति के मीठे नशे से बचे.  क्योकि हर तरह  का नशा सिर्फ उतरने पर तकलीफ ही देता है.  और फिर सब कुछ  लुटा के होश में आये तो क्या   फायदा .   समय रहते हम  सब  चेत जाए तो बेहतर रहेगा. वरना दुष्परिणाम बहुत भयानक है जिनका अफ़सोस कोई इलाज़ नहीं.   नारी मुक्ति नाम के छलावे से बचे.   यही बेहतर रहेगा.
महिला कभी गलत नहीं होती!

महिला कभी गलत नहीं होती!

References:

सेकुलर  मैगजीन

महिला  की  लाश

अग्निकांड

महिला  सम्पादक

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अरुंधती रॉय नग्न चित्र विवाद: अब क्यों नही बजाते पूर्ण अभिव्यक्ति का झुनझुना ?

अरुंधती रॉय: पूर्ण अभिव्यक्ति का हनन ?

अरुंधती रॉय: पूर्ण अभिव्यक्ति का हनन ?

मै  इस बात से शतप्रतिशत सहमत हू कि अरुंधती को सिर्फ नारी होने का खामियाजा नहीं भुगतना चाहिए.  लेकिन  यहाँ एक दूसरा भी महत्वपूर्ण पहलू  है.  और वो यह है कि स्त्री पुरुष के दायरे से उठे और अभियव्यक्ति की बात को उन संदर्भो में समझे जिन संदर्भो में लेखिकाजी हमेशा मुखर रही है. क्या बात है कि लेखिका का नाम बीच में आते ही पूर्ण  अभिव्यक्ति की आज़ादी के बजाय स्त्री जाति के सम्मान की बात याद आ गयी कुछ लोगो को ?

जब हिन्दू देवियों की नग्न तस्वीरे बनायीं गयी तब यही सम्मान की भावना पूर्ण अभिव्यक्ति की आज़ादी से कमतर हो गयी.  अरुंधती देवी का नाम आते ही स्त्री जाति के सम्मान की बात आ गयी और पूर्ण अभिव्यक्ति तेल लेने चली गयी !  क्या गज़ब का विरोधाभास है,  भाई वाह!  मुझे  तो यह नहीं समझ में आ रहा कि अब इस कृति को  सिर्फ  कलाकार  की  रचना क्यों नहीं माना जा रहा है ? इसमें स्त्री पुरुष का फर्क घुसाने की क्या जरूरत है.  बस यह तो एक कृति है और कुछ नहीं.  ऐसा क्यों नहीं हम समझते? असल में  हुआ यह  यह है कि किसी ने गज़ब का साहस दिखाते हुए उस समूह को जो मनमाने तरीके से हर चीजों की व्याख्या करने  का आदी है उन पाखंडियो को उन्ही के बनाये उसूलो से निर्मित एक कृति उनके मुह पे दे मारी है.  यहाँ स्त्री पुरुष कैसा ?

यहाँ तो हुआ यह है कि अब तक तो हम तुम्हे सभ्य लोगो की भाषा में जवाब दे रहे थे तो आप लोगो के पल्ले नहीं पड़ रहा था. तो अब जवाब उस भाषा में और उन  प्रतीकों के जरिए दे दिया जिसे  आप समझते है.तो काहे अब बौखला गए है? अब काहे ये आपको अभिव्यक्ति का हनन लग रहा है ? हमने तो वोही किया जो आपने हमे समझाया.

बहुत अच्छा हो कि हमारी जनता भी इसी भाषा में नौकरशाहों और राजनेताओ को इसी लहजे में समझाना शुरू कर दे.  सब अपने आप लाइन में आ जायेंगे.  अब जो इतने देर से “civilized world” की परिभाषाओ से परे अपने   उल  जलूल परिभाषाये गढ़ रहे थे और हमसे उम्मीद कर रहे थे कि हम सब अज्ञानी बन्दे  उन परिभाषाओ को  ग्रहण  करे.  तो किसी हमारे जैसे अज्ञानी बन्दे ने उसी ज्ञान को ग्रहण करके के  एक कृति को जन्म दे दिया तो अब स्त्री पुरुष की बात क्यों हो रही है ? अब बात सिर्फ पूर्ण अभिव्यक्ति की क्यों नहीं हो रही?  इसमें स्त्री पुरुष का भेद कहा से आ गया?  In  my eyes,  the issue is simple: Take it or leave it.
मकबूल फिदा हुसेन: संपूर्ण अभिव्यक्ति के पुजारी !

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Mid Day Article

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