तिरंगा फहरे या ना फहरे भला ये भी क्या एक मुद्दा हो सकता है ?

झंडा  ऊँचा  रहे  हमारा

झंडा ऊँचा रहे हमारा

जुस्तजू जिसकी थी उस को तो न पाया हमने
इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हमने

-शहरयार  

श्रीनगर के लालचौक पर  तिरंगा फहरे या न फहरे पर इस बहाने  इतना फायदा तो जरूर हुआ कि सयंमित से लगने वालो चेहरों से उनकी असलियत जरूर झलक गयी .वो गरीबी भी भली जो हमे अपने करीबी लोगो की असलियत से वाकिफ करवा दे.इस तरह के अवसर या इन  अवसरों पर होने वाली  बहसों से तात्कलिक लाभ यही होता है कि ये समझ में आने लगता है कि सभ्य से दिखने वाले चेहरे  अन्दर से कितने मक्कार और भ्रष्ट होते है.कितने ही बेसुरे तानपुरे अपना राग अलापने लगते है. आश्चर्य है कि यह तो ख़राब लगता है कि हमारे  दृष्टिकोण  को कोई  सिरे  से खारिज कर दे पर ये  बुरा नहीं लगता कि कोई राष्ट्र के स्वाभिमान से जुड़े प्रतीकों कि ऐसी कि तैसी कर दे और हम  खामोश बैठे रहे.भावनाओ का भी विचित्र स्वरूप होता है.राष्ट्र भावना के सम्मान से जुड़ा तो  पानी समान और अपनी क़द्र से जुड़ा तो लहू सरीखा  कीमती हो  गया.


उस राष्ट्र की नियति के बारे में भी सोचिये जहा ये भी एक  मुद्दा हो  सकता है की किसी जगह  तिरंगा फहरे या ना फहरे ? वाह  रे राष्ट्र ! कितने ही बहसों  में मैंने देखा है कुछ लोग बिल्कुल समत्व की मुद्रा में आ जायेंगे और ये लगेगा कि विक्रमादित्य का न्याय ही कर  डालेंगे.लगेगा न्याय अपनी  बात स्वयम कह रहा हो.असल में ऐसे चेहरे दस सर वाले रावण से ज्यादा खतरनाक होता है जो अलग  अलग जगह सिर्फ उपस्थिति जताने के लिए असरदार तरीके से अपनी  बात कहता है. लेकिन  गौर करने पे  आपको  समझ  में आ  जायेगा  कि  वे सिर्फ और सिर्फ अलगाववादियों की भाषा ही बोल  रहे है सभ्य तरीके से ! बहुतो को लग रहा है कि मुद्दे पे राजनीति हो रही  है.सवाल यह है कि किसी मुद्दे पे राजनीति करने का अवसर आप देते ही क्यों है ?
 

तिरंगे का अपमान करने वाले अलगाववादी तो सही पर सम्मान करने  वाले गलत  !

तिरंगे का अपमान करने वाले अलगाववादी तो सही पर सम्मान करने वाले गलत !


जब कुछ करना चाहिए तो समत्व कि बात करने वाले  दोगले बुद्धिजीवी  निष्क्रिय  बैठे रहते है. तमाशाई  बने रहते है.ये कहा थे जब अलगाववादियों  कि फौज दिल्ली  में आकर  देश  के  संविधान  पर थूक  कर चली  जाती है  आप उस थूक  को चाट कर रह  जाते है ! ये महान  कृत्य  है जो  कही  भी  कोई कर सकता है.पर तिरंगा फहरे या न फहरे इस पर बड़ा मंथन हो रहा है ! वाह रे इस देश को चलाने  वालो का विवेक ? चलिए माना भाजपा तो राजनीति कर रही है तो पहले ये बताये राजनैतिक पार्टी  राजनीति न करेगी तो क्या करेगी और दूसरा ये बताये कौन सी  पार्टी है  विश्व में  जिसके अपने राजनैतिक स्वार्थ नहीं होते ?कौन से पार्टी है जो दूध  की धुली है ?

आपने क्यों ऐसे हालत पैदा किये कि किसी को राजनीति करने का अवसर मिला ? वो भ्रष्ट है तो तुम निस्वार्थता की मूर्ती अब तक क्यों मुर्दा बने हुए थे ? बस पड़ जायेगे मुद्दे में और दोगली भाषा में बोलेगे यह भी सही है वो  भी सही है. देश में शान्ति लाने का तरीका यही है की देश के गद्दारों को तो  आप खत्म ही कर दे पर ऐसे लोगो को भी  खत्म कर दे जो  किसी  भी मुद्दे को अपनी भटकाव भरी  बातो से अराजकता की स्थिति उत्पन्न कर देते है.भाजपा का भगवा लोगो को  खलता हो तो खले लेकिन कुछ लोग  शायद ये भूल  गए कि भगवा अभिन्न रूप से भारत के  ध्वज का हिस्सा है.कल को उसको भी हटा दीजियेगा यह कह के ये सांप्रदायिक है !
 

 अलगाववादियों को क्यों नहीं दरकिनार करते ?

अलगाववादियों को क्यों नहीं दरकिनार करते ?

बात सिर्फ इतनी है भगवा और तिरंगा तो एक है और रहेगा और वो भी सबसे  ऊपर.बहुत से  लोग और कुछ राजनैतिक पार्टी का रुख ये  होता है  कि जैसे सच्चाई सिर्फ उन्ही के  पास गिरवी है.सच्चाई औरो को भी पता है साहब.ये पब्लिक है सब जानती है.सुना है कि नहीं.  अगर कुछ सिरफिरे लोगो  को वहा  तिरंगा फहराना  खल रहा  है तो उनकी  सुननी चाहिए कि उनकी सुननी चाहिए जो राष्ट्रीय प्रतीकों  का पूर्ण  सम्मान चाहते है.क्यों  आपका मन नहीं है ? बताये ? कहा है आपका मन ? राष्ट्र के दलालों  के पास ? जब पाकिस्तानी झन्डा फहर रहा  था तब मन था और अब नहीं  है ?

अच्छा बड़ी  मुश्किल से शान्ति आई है. तो अब क्या करे ? सब  राष्ट्रीय प्रतीकों  को हटा दे. स्वाभिमान बेच दे. बड़ा आसान है  ऐसी बकैती करना. ऐसे लोग पता है कैसे होते है.ये ठीक उन लोगो की तरह होते है जो किसी  की दुनिया उजड़  जाए तो  उसे  धैर्य बनाये रखने  के लिए  कहेंगे मगर खुद की अगर एक सुई भी खो जाए तो कितने बेगुनाहों को जेल के सलाखों पीछे डाल देंगे. ये लेक्चरबाजी बहुत घिसी  पिटी है.

कम से कम अमेरिका की स्पष्टवादिता अच्छी लगती है. या तो आप हमारे साथ है या तो  नहीं है. बात सिर्फ  इतनी है.भारत के ज़मीन पर ऐश करने वालो से यह पूछना चाहिए कि भारतीय प्रतीकों से उन्हें आपत्ति क्यों है ?  और इनसे क्यों  खतरा है ?  क्यों ऐसा माहौल है या निर्मित्त किया जा रहा है जिसमे भारतीय तत्वों के प्रति नफरत के बीज  बोये जा रहे है.इनका आप ईमानदारी से जवाब  दे.Anyway, let’s stop glorifying the anti-national gestures.बस यही कहना है कि उन सभी लोगो को नष्ट कर दे जो राष्ट्र के स्वाभिमान से जुड़े प्रतीकों की क़द्र नहीं करते. कम से कम उन्हें इतना तो समझ में आये कि राष्ट्र के प्रति सम्मान किन्तु परन्तु का विषय नहीं है और इसके साथ खिलवाड़ करना     राष्ट्रद्रोह  से  कम नहीं.
 

झंडा प्यारा हमारा

झंडा प्यारा हमारा


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hindujagruti

Tibetsun

11 responses

  1. भाजपा तो अपनी देशभक्ति जताने को और मेहनत करनी है। कन्धार का सरेण्डर पसन्द नहीं आया था। अब कई राज्यों में भ्रष्ट सरकार का संचालन जमा नहीं। राम मन्दिर के बारे में अकर्मण्य़ता ने बड़ा मूर्ख बनाया था।
    नये समय की यह शुरुआत है, पर अपने कार्ड्स ठीक खेलने हैं भाजपाइयों को।

    1. ज्ञानदत्तजी कमेन्ट के लिए धन्यवाद.मै कोई बीजेपी का प्रवक्ता नहीं हू सो उनकी राजनीति से कुछ लेना देना नहीं.बात राष्ट्र के प्रतीकों के सम्मान के बारे में है.कोई भी इनके लिए पहल कर सकता है.ये अलग बात है मुद्दाविहीन बीजेपी ने इस मुद्दे को तकरीबन कैच कर लिया.रहा सवाल मेरा तो मेरे लिए सिर्फ ये मायने रखता है कि देश में अलगाववादियों की चलेगी या उनकी जो संवैधानिक मूल्यों ,राष्ट्र के प्रतीकों में आस्था रखते है ? इसका जवाब ईमानदारी से देने का वक्त आ गया है.

  2. […] This post was mentioned on Twitter by Arvind K.Pandey, Arvind K.Pandey. Arvind K.Pandey said: तिरंगा फहरे या ना फहरे भला ये भी क्या एक मुद्दा हो सकता है ?: http://wp.me/pTpgO-7l http://wp.me/pTpgO-7l […]

  3. Have a look at Related Post By Anil Arya :

    क्या इसी का नाम आज़ादी है कि अपने ही देश में अपने ही राष्ट्रीय झंडे को फहराने पर रोक लगा दी जाए..? क्या यही गणतन्त्र है कि जन-गण-मन की भावनाओं का पूरी बेशर्मी के साथ अपमान किया जाए….? क्या इसे ही लोकतंत्र कहते हैं कि वोट की खातिर दुश्मन के मंसूबों को पूरा करने के लिए हर वक़्त अपना पाजामा खोल के रखा जाए …? लुच्चेपन की हद हो गई है. पूरी बेशर्मी, ढिठाई और वाहियात तरीके से तिरंगा फहराने पर पाबंदी लगाने में जुटे हुए हैं उमर अब्दुल्ला और उनके इस बेसुरे ‘राग गधैया’ की संगत करने में संलिप्त हैं वो तमाम ‘उल्लू के चरखे’ जिन्हें दिन में भी ‘सूरज-चांद’ ही दिखते हैं .. पर अब यह प्रश्न केवल भाजपा की तिरंगा यात्रा का नहीं, बल्कि प्रश्न है भारत के स्वाभिमान का…तिरंगे की आन बान शान का…और उसके लिए कुछ भी करने के लिए इस देश को प्यार करने वाला हर जन-गण-मन सदैव सर्वस्व न्यौछावर करने को उद्यत रहता है.

    …हैरानी तो यह है कि श्री नगर में पाकिस्तानी झंडा तो लहराया जा सकता है, तिरंगा फहराने पर आपत्ति है…पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे तो लगाये जा सकते हैं, भारत की जय जय करने से वहां की फिजां ख़राब होने का हौव्वा दिखाया जाता है…क्या कश्मीर भारत का अभिन्न अंग नहीं है या अपने ही देश में अपना ही राष्ट्र ध्वज फहराना जुर्म है…क्या यह राष्ट्र द्रोह है …क्या इससे देश की आवाम भड़क जायेगी…अरे यदि हम अपने ही देश में अपना झंडा नहीं फहरा सकते तो धिक्कार है हमें…उमर अब्दुल्ला तुम्हारी बातों और कृत्यों से तो पाकिस्तानी बू आ रही है…अगर तुम्हें और तुम्हारे so-called धर्मनिरपेक्ष दोस्तों को इसमें भाजपा की राजनीति दिखाई देती है तो क्यों ना पहले ही दिन कह दिया होता कि ‘नहीं, भाजपा वालो तुम अकेले ही ऐसा नहीं करोगे चलो हम सब चलते हैं और लाल कुआं पर सब मिलकर गणतंत्र दिवस मनाते हैं और पूरी शान से तिरंगा फहराते हैं’.

    ..भाजपा को अपनी राजनीति चमकाने का मौका ही नहीं मिलता..समूचा देश भी तुम्हारी जैजैकार कर रहा होता….पर नहीं तुम्हें ऐसा तो करना ही नहीं था…ऐसा करते तो तुम अपना खेल कैसे खेलते…दरअसल तुम्हारी सोच ही खोटी है…लगता है या तो तुम्हारी अक्ल कहीं ‘बंधक’ है…या फिर तुम परले दर्जे के धूर्त हो…अरे श्रीमान तुम प्रदेश के मुख्यमंत्री हो और कह रहे हो कि तिरंगा फहराने से शांति भंग होने का खतरा है…कैसे CM हो…जिसके वश में अपना रास्त्र धवज फहराने के लिए कानून व्यवस्था काबू में रखने की कुव्वत भी ना हो उसे इस पद पे रहने का अधिकार ही नहीं है…सच कहूं तो कश्मीर की जनता को आतंकवाद की आग में झोंकने वाले तुम्हारे जैसे जयचंदों के अलावा भला और कौन है…तुम भले ही भाजपा को रोकने की सनक या कहूं कि पागलपन में आज अपना पूरा जोर लगा दो पर तुम तिरंगे को कैसे रोकोगे…कश्मीर के हर पहरुए के सीने पे तिरंगा है…हर सीने में तिरंगा है…
    ************

  4. Arvind Mishra Said On Facebook:

    ‎@अरविन्द जी आपने बड़ी मार्के की बात कही है -यह मुद्दा तो राजनीति के बिना और बावजूद भी एक राष्ट्रीय मुद्दा है …भारत में ही दो संविधान और दो झंडे -एक म्यान में दो तलवार ? तिरंगे का अपमान करने वाले ,उसे जला दिए जाने के दृश्य इन महानुभावों को क्यों नहीं दिख रहे -आपने बहुत सही कहा कि इतने बड़े मुद्दे से लोग मुकर जा रहे हैं मगर यह दिखाई पड़ रहा है कि किसी को कोई अपशब्द बोल दिया गया है -अभी तो कुछ नहीं बोला गया है -अभी तो इन्हें बहुत कुछ बोला जाएगा -गद्दार कहा जायेगा ,नपुंसक कहा जायेगा .और भी बहुत कुछ .

    1. अरविन्द मिश्राजी

      प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यवाद. ये बात हमको समझ में आ जानी चाहिए कि देश के गद्दारों के प्रति सॉफ्ट कार्नर रखने से बात और बिगड़ जायेगी.मित्र प्रवीण शाह ने रूस,श्री लंका और चीन का उदहारण देकर स्पष्ट कर दिया है कि लातो के भूत बातो से कभी नहीं मानते.चूँकि हमारे प्रधानमन्त्री के पास राजनैतिक इच्छा का अभाव है और कांग्रेस तो वैसे भी अल्पसंख्यको की तुष्टिकरण में सिद्ध है इसिलए अभी रौशनी आने में देर है. वैसे कांग्रेस ने ये सिद्ध कर दिया है संवैधानिक प्राविधानो की की धज्जिया उड़ना उसका परम कर्तव्य है. इसने धज्जिया उड़ाने की परंपरा को कायम रखा है.

  5. चूंकि सियासी हो गया मामला तो लोग कतरा रहें हैं. वैसे मन ही मन चप्पे चप्पे पर तिरंगा फ़हरा रहें हैं.

    1. Girishji

      सबसे पहले आपको इस बात के लिए धन्यवाद की आपने अपनी प्रतिक्रिया दी.मुझे सिर्फ यही कहना है कि किसी मुद्दे को सियासी बना देना ये भी तो एक खेल है !! क्या संवेदनशील मुद्दों को सियासी बनाना उचित है ? अमेरिका को ले या चीन को ले .ये देश प्रोग्रेस भी कर रहे है और आन्तरिक सुरक्षा की भी हिफाज़त कर रहे है क्योकि लाख मतभेद के बावजूद संवेदनशील मुद्दों को सियासी नहीं बनाते.हम उल्टा करते है. आतकंवादी हमे कुत्ते की मौत मारते है और हम सियासी गणित लगाते है.हमारे नेता हमको सिर्फ धैर्य की घुट्टी पिलाते है.तो क्या करे घुट्टी पी ले और हलाक होने के लिए तैयार हो जाये. बताये क्या करे ?

  6. Tricolour national flag should be unfurled at Lal Chowk, Srinagar on Jan. 26, 2011 : Dr. Subramanian Swamy

    The UPA government is duty bound under the Transaction of Business Rules framed under the Constitution, to officially unfurl the tricolour national flag at Lal Chowk in Srinagar, J&K. A Resolution to this effect was adopted by the Cabinet Committee on Political Affairs in January first week or thereabouts in 1991 when Chandrashekhar was Prime Minister and I was Cabinet Minister of Law &Justice besides of Commerce.

    As a senior Minister and member of CCPA, I had raised the issue in the CCPA because the V.P. Singh government had considered the matter and decided to discontinue the practice of unfurling the flag in Lal Chowk in 1990 as “it might hurt the feelings of the people of the state”.

    ************

    http://hinduexistence.wordpress.com/2011/01/26/lal-chowk-is-a-place-to-unfurl-the-tri-colour-not-the-pak-flag/

  7. Hum Laye Hai Toofan Se Kishti Nikalkar:

  8. Respect The National Symbols:

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