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प्रस्तावित तलाक कानून: पुरुषो की बर्बादी और हिन्दू घरो की तबाही का औजार है!

 

Flawed Amendments In Hindu Marriage Laws Are Destroying Hindu Families!

Flawed Amendments In Hindu Marriage Laws Are Destroying Hindu Families!


हिन्दू विवाह अधिनियम को संशोधित करने में कांग्रेस सरकार जो अति सक्रियता दिखा रही है वो परेशानी और अचम्भे में डालती है. इस सरकार का कार्यकाल एक साल के भीतर ही ख़त्म होने वाला है लिहाज़ा ये अति सक्रियता आत्मघाती है. सम्पति के बटवारे के बारे में इसकी टेढ़ी चाल भारतीय परिवारों के विघटन का कारण बन सकती है. प्रस्तावित क़ानून में बटवारे वाले सेक्शन को लेकर जो उहापोह वाली स्थिति उत्पन्न हो गयी है सरकार के भीतर उससे स्पष्ट है कि इस सरकार के मंत्री खुद भ्रम के स्थिति में है और इस कानून में निहित संपत्ति बंटवारे और मुआवजे से सम्बंधित बिन्दुओ पर वो एकमत रूख नहीं रखते है. हिंदू विवाह अधिनियम’ की धारा 13-बी और ‘विशेष विवाह अधिनियम’ की धारा 28 आपसी सहमति से तलाक के अंतर्गत संपत्ति बंटवारे/ मुआवज़े पर जो सरकार के भीतर अन्तर्विरोध उभर कर आये है उससे ये समझ में आता है कि इस कानून के मूल तत्वों के बारे में सरकार में शामिल मंत्रियो से लेकर अन्य पार्टी के सांसदों को ज्यादा कुछ नहीं पता है . इससे ये सहज ही समझा जा सकता है कि जनता जिसका वो प्रतिनिधित्व करते है उनमे कितना भ्रम व्याप्त होगा। फिर भी ये सरकार इस संशोधन को इतनी जल्दबाजी में कानूनी जामा पहनाना चाहती है ये हैरान करता है.

ये बताना आवश्यक रहेगा कि सरकार ने संशोधन को पास कराने की हड़बड़ी में लॉ कमिशन और संसदीय स्थायी समिति को पूरी प्रक्रिया से बाहर रखा है. इसके खतरनाक दुष्परिणाम होंगे और इस तरह के कानूनों से भारत के युवक-युवतियों का भविष्य अँधेरे के गर्त में जा सकता है. ये निश्चित है कि अगर ये बिल अपने प्रस्तावित स्वरूप में पास हो गया तो ये एक और उदाहरण होगा गैर जिम्मेदाराना तरीके से प्रक्रियागत खामियों से लैस कानून को अस्तित्व में लाने का। पुरुषो एक अधिकारों का प्रतिनिधित्व करने वाली अग्रणी संस्था सेव इंडिया फॅमिली फाउंडेशन (SIFF) ने इस हिंदी विवाह अधिनियम (संशोधन) बिल, २०१०, को अपने वर्तमान स्वरुप में पारित कराने की कोशिशो की तीखी आलोचना करते हुए इस खतरनाक संशोधन को पूरी तरीके से नकार दिया है.

सेव इंडिया फॅमिली फाउंडेशन (SIFF) का ये भी कहना है कि न्यायधीशो को इस कानून के तहत असीमित अधिकार देना किसी तरह से भी जायज नहीं है खासकर महिलाओ से संबधित प्रतिमाह गुज़ारा भत्ता /मुआवज़े के निर्धारण में.

क्या कहता है ये कानून:

विवाह अधिनियम (संशोधन) विधेयक 2010’ “असुधार्य विवाह भंग’ को हिंदू विवाह अधिनियम 1955 और विशेष विवाह अधिनियम 1954 के तहत तलाक मंजूर करने के एक आधार के रूप में स्वीकार करता है. इसके साथ ही तलाक के मामले में अदालत पति की पैतृक संपत्ति से महिला के लिए पर्याप्त मुआवजा तय कर सकती है. विधेयक में पति द्वारा अर्जित की गई संपत्ति में से पत्नी को हिस्सा देने का प्रावधान है.

कुछ आवश्यक बिंदु:

इस कानून को महिलाओ के पक्ष में बताना खतरनाक है क्योकि भारत में सत्तर प्रतिशत परिवार गरीब वर्ग में है जो ज्यादातर क़र्ज़ में डूबे है और जिनके पास संपत्ति नाम की कोई चीज़ नहीं है, जिनके ऊपर पहले से ही बेटी बेटो के भरण पोषण और उनके शादी ब्याह जैसी जिम्मेदारियां है. ये कानून केवल एक ख़ास वर्ग में सिमटी सम्पन्न महिलाओ को ध्यान में रखकर अस्तित्व में आया है लिहाज़ा मुख्य धारा के राजनैतिक दलों को इसके विरोध में खड़े होकर इसके खिलाफ वोटिंग करनी चाहिए। ऐसा इसलिए कि इस कानून के पारित होने के बाद तलाक के प्रतिशत में अगले दस सालो में लभग तीस प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी हो सकती है.

प्रस्तावित हिन्दू विवाह संशोधन को सम्पूर्णता में देखे जाने की जरूरत है जैसे कि संयुक्त रूप से बच्चो का पालकत्व या बच्चों की जिम्मेदारियों के वित्तीय वहन से सम्बंधित कानून की इसमें क्या भूमिका रहेगी. सिर्फ मासिक भत्ते के निर्धारण में सक्रियता दिखाना उचित नहीं। क्या पति ताउम्र भत्ता गुज़ारा देता रहेगा संपत्ति बंटवारे के बाद भी जिसका हिस्सा खुद की संपत्ति और विरासत में मिली संपत्ति से मिलकर बनता है? ये कुछ अति महत्त्वपूर्ण बिंदु है जिनको संज्ञान में लेना आवश्यक है और इन्हें उनके बीच चर्चा में शामिल करना है जो इन कानूनों से प्रभावित हो रहे है. अव्यवस्थित रूप से निर्धारित बिन्दुओ को कानून बना के पास करना बेहद गलत है.

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 सेव इंडिया फॅमिली फाउंडेशन (SIFF) का सरकार को निम्नलिखित सुझाव:

सरकार इस कानून को तुरंत वापस लें और मौजूदा संसदीय अधिवेशन में इसे ना पेश करे. सरकार इस कानून की भाषा में परिवतन करे और इस लिंग आधारित भेदों से ऊपर करे जिसमे पति (husband) और पत्नी (wife) को ” जीवनसाथी” ( spouse) और स्त्री (man) और पुरुष (woman) को ” व्यक्ति” (person) में परिवर्तित किया जाए. इसके साथ ही किसी भी जीवनसाथी को तलाक़ अर्जी का विरोध करने की छूट हो कानून की समानता के रौशनी में. सरकार इस बात का भी निर्धारण करे कि अर्जित संपत्ति के निर्माण में पत्नी का क्या सहयोग रहा है या पति के परिवार के भौतिक सम्पदा के विस्तार में क्या योगदान है. इसको निर्धारित करने का सूत्र विकसित किया जाए. इसके निर्धारण में शादी के अवधि को ध्यान में रखा जाए, बच्चो की संख्या का ध्यान रखा जाए, और क्या स्त्री कामकाजी है या घरेलु. अगर स्त्री तीन बच्चो की माता है, वृद्ध सदस्यों की देखरेख का जिम्मा ले रखा है, तो उसका योगदान अधिक है बजाय उस स्त्री के जो कामकाजी है और जिसके कोई बच्चे नहीं है एक साल की अवधि में.

इस सूत्र के मुताबिक ही किसी व्यवस्था को संचालित किया जाए जीवनसाथी को प्रतिमाह भत्ते के सन्दर्भ में, मुआवज़े के सन्दर्भ में या किसी और समझौते के सन्दर्भ में. न्यायधीश महोदय इस सूत्र की रौशनी में अपने विवेक का इस्तेमाल कर उचित फैसले लें. लिहाज़ा इस सूत्र के अंतर्गत अगर स्त्री के सहयोग का अनुपात पति या उसके परिवार के संपत्ति के अर्जन में पूरी संपत्ति के मूल्य से अधिक है तो उसे पूरी संपत्ति पर हक दिया जा सकता है. अगर पत्नी इसको लेने से इनकार कर सकती है तो वो मासिक गुज़ारे भत्ते वाले विकल्प को अपना सकती है. कहने का तात्पर्य ये है कि संपत्ति में हिस्सेदारी के बाद उसका मासिक गुज़ारे भत्ते को लेते रहने का अधिकार ख़त्म हो जाता है. दोनों विकल्पों का लाभ लेने का हक जीवनसाथी को नहीं मिलना चहिये.

सरकार को इस सूत्र को अस्तित्व में लाने के लिए एक कमेटी या योजना आयोग का गठन करना चाहिए.

सरकार को सयुंक्त भरण पोषण का अधिकार बच्चे के बायोलॉजिकल अभिभावक द्वारा और बच्चे के ग्रैंड पेरेंट्स से स्थायी संपर्क को अनिवार्य कर दिया जाए, जब तक कि कोर्ट इसके विपरीत राय ना रखती हो. इसके अनुपालन के अभाव को आपराधिक जुर्म के श्रेणी में रखा जाए। अगर कोई अभिभावक इस सयुंक्त  के जिम्मेदारी से मुंह मोड़ रहा है या ग्रैंड पेरेंट्स से संपर्क में बाधा डाल रहा है तो इसको अपराध माना जाए.

सरकार ये सुनिश्चित करे कि न्यायालय को अपने विवेक के अधिकार का इस्तेमाल करने की सीमित आज़ादी हो संपत्ति बटवारे के निर्धारण में, मासिक गुज़ारे भत्ते के सन्दर्भ में और बच्चे के पालन पोषण सम्बन्धी मामलो में. बहुत ज्यादा अधिकार न्यायालय को देने का मतलब ये होगा कि कोर्ट का अवांछित हस्तक्षेप मामले को और जटिल बना देगा या कोर्ट का गैर जिम्मेदाराना रूख स्थिति को और विकृत कर देगा। अधिकतर पुरुष फॅमिली कोर्ट पे भरोसा नहीं करते, क्योकि इस तरह की कोर्ट पुरुषो के अधिकार के प्रति असंवेदनशील रही है. न्यायालय वर्षो लगा देती है पति को अपने बच्चो से मिलने का फैसला देने में और तब तक बच्चे की स्मृति पिता के सन्दर्भ में धूमिल पड़ जाती है.

सरकार ये सुनिश्चित करे कि महिला पैतृक संपत्ति और वहा अर्जित संपत्ति में जो हिस्सेदारी बनती हो उसे अधिग्रहित करे. उसे अपने कब्जे में लें. सरकार को हिन्दू विवाह अधिनियम में संशोधन करके महिला को अपने पिता के घर में रहने का स्थान सुनिश्चित करे , ताकि कम अवधि वाली शादी में अलगाव की सूरत में उसे रहने की जगह उपलब्ध हो. अगर माता पिता इस सूरत में उसे पति के घर जाने के लिये विवश करते है तो इसे अपराध की श्रेणी में रखा जाए. इसी प्रकार अगर महिला के माता पिता या महिला के भाई उसे पैतृक संपत्ति/ अर्जित संपत्ति में हिस्सा देने से इनकार करते है तो इसे असंज्ञेय प्रकार का अपराध माना जाए.

उन्होंने कहा कि अगर पति-पत्नी में से कोई भी एक व्यक्ति अगर संयुक्त आवेदन देने से इनकार करता है, तो दूसरे को आपसी सहमति के बजाय अन्य आधार पर तलाक के लिए आवेदन देने की अनुमति दी जानी चाहिए.

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इस देश में कानून बना देने ही को सब समस्यायों का हल मान लिया गया है. और इस तरह के दिशाविहीन कानून जो प्रक्रियागत कमियों से लैस है उनका अस्तित्व में आना तो और भी खतरनाक है. वो इसलिए कि न्यायालय हमारे यहाँ किन दुराग्रहो से अधीन होकर काम करते है वो सब को पता है. एक तो सिस्टम गलत तरीके से काम करता है और दूसरा न्याय के रास्ते में इतने दुराग्रह मौजूद है कि सिर्फ लिखित कानून बना देने से सही न्याय मिल जाएगा ये सिर्फ एक विभ्रम है. इस तरह के पक्षपाती कानून सिर्फ भारतीय परिवार का विनाश ही करेंगे जैसा कि  दहेज कानून के दुरुपयोग से हुआ है. सिर्फ मंशा का सही होना ही  काफी नहीं बल्कि आप किस तरह से उनका सही अनुपालन करते है ये आवश्यक है. ये तो सब थानों में बड़े बड़े अक्षरों में लिखा रहता है कि गिरफ्तार व्यक्ति के क्या अधिकार है पर क्या थानेदार साहब इन सब बातो की परवाह करके कभी थाने में काम करते है? नहीं ना!  यही वजह है कि इस तरह के अपूर्ण कानून न्याय का रास्ता नहीं वरन तबाही का मार्ग खोलते है. हिन्दू विवाह अधिनियम में इस लापरवाही से संशोधन करके पहले से इन कानूनों से त्रस्त हिन्दू परिवारों पर एक और घातक प्रहार ना करे.

( प्रस्तुत लेख सेव इंडिया फॅमिली फाउंडेशन के नागपुर शाखा के अध्यक्ष श्री राजेश वखारिया से बातचीत पर आधारित है) 

Flawed Marriage Laws Are Supporting Abusive Wives!

Flawed Marriage Laws Are Supporting Abusive Wives!

References:

विवाह कानून (संशोधन) विधेयक

आसान तलाक के लिए ‘हिंदू विवाह अधिनियम’ में बदलाव

‘दाम्पत्य जीवन की विफलता में तलाक मिले’


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Gender Equality Is Like The Snake Marrying Mongoose!

Gender Equality Leads To  Snake  And Mongoose Relationship!

Gender Equality Leads To Snake And Mongoose Relationship!


The women community seeking “equality of gender”, should either accept this concept in entirety, or else, follow desirable norms. The point is why so much insistence on rights for behaving as you want, for doing whatever you want? Why not give way to responsibilities shared,  supposedly always considered as role of men since time immemorial! That includes all menial jobs requiring intense labour in tough conditions. That also means serving the men community, inside homes, for ages. The men community did that for ages, supplying money like ATM machine, despite suffering severely at hands of cruel wives. That too silently! These employed, high salaried women, should also marry unemployed youths and offer them all comforts for many centuries without feeling the pinch just the way men community did that in past! I am just trying to convey that  this drama of gender equality gained momentum in wake of the world becoming a sophisticated place to live, largely shaped by men and women in the same patriarchal mode, which the bunch of derailed feminists saw as an obstacle for the emancipation of woman.

I am not interested in narrating the consequences of feminism in other parts of the world, but in Indian context, it has given rise to new set of complexities. There was already healthy division of labour but with the rise of feminism, or call it curse of modernism, the world inside home got projected as insult to the capabilities of women. The traditional roles were projected as subservient. However, as the modern women,  shattering so-called shackles, stepped out of the confines of home, they realized that world is not bed of roses, or on par with their expectations, largely because of  limitations caused by their physicality. So another set of calculated efforts came into action, to make the outside world seem a safer domain. And for that very reason, males were advised to co-operate inside homes, doing household work, after all, that’s what true equality demands! That also meant loving  “fathers,  brothers, sons” all be presented as “potential rapists” so that a false alarm can be raised, and thus, International bodies can come to dictate us, calling it a nation, which does not respects and honours  women! The problems pertaining to women were highlighted in exaggerated way so as to ensure that hocus-pocus, called feminism, can make its presence felt in India.

It’s not that the problems related to woman community do not exist but a shrewd attempt to use them to create rift between the relationship, using the same bothering issues, is simply an attempt to hit hard at the cherished institutions called family and marriage. One never said that problems related with women be it  female foeticide, rising sexual crimes, health concerns, low literacy level and etc. should never be dealt with in a conscious way. However, why should one not be alarmed when these very issues became a part of the plot to destabilize Indian society? It’s amazing that  lesbians, drunk female girls, prostitutes not by condition but by choice, females involved in all sorts of complex relationship should be hailed as appropriate but the same women living inside the confines of home as an ideal wife is seen as insult to womanhood! I mean what sort of values are being professed in name of equality? What’s  being achieved? It leaves one in deep pain that even the most heinous crimes “rapes” are also being used as tool to ensure that gender imbalance sharpens in name of equality.

This sort of heightened false consciousness in Indian women is a necessity because the governments in future would largely be shaped by minorities and women, and so it’s necessary to appease them, to keep them ignorant about real implications of chasing imported theories related with equality. At global level, this sort of destabilized society, wherein men and women, are living highly individualistic lives, caters well to the needs of consumerist society. So why would corporate demons make women aware of consequences of aping such wayward lifestyle, which is resulting in single women, divorced couples, broken homes, fatherless children, eventually leading to rise in crime level too? It’s safer for them that women come out of their homes, work for them, leading to greater productivity.

On the other hand, political class is all prepared to use them as a tool to make their political dreams come alive with their help. Only to attain such diabolical interests, the concept called feminism-the great game of gender equality-came in effect. It’s a myth that it got introduced to make their lives better. At least, in India, it’s not the case. Indeed, women have a set of their own problems, but to remove them, was it necessary to fall in the trap of complex notions of feminism, having goals which even Western world has failed to exhibit in totality or demonstrate with perfection? However, the problem starts when New Delhi starts living the pattern of life found in New York and Washington. That’s why borrowed concepts become a necessity. That’s why “equality” also becomes a necessity. That’s why a highly reputed media publication is bound to see “Sunny Leone” as woman of exceptional talent and merit. And that’s why it’s necessary to give rise to conflicts wherein woman is equal when it comes to enjoy benefits of modern society but woman feels no longer equal when threat is directly to her body. At that point, she is woman! Be equal to enjoy benefit, but be a woman in helpless positions!

Bringing qualitative differences in lives of woman is quite a different issue than using these very issues to demonize men,  or, in fact, use the same issues to shatter the citadels of society. The positive side of this gender equality is that it has allowed men to reshape their own priorities. It has given them a huge chance to realize their own worth and get united to fight for the cause of men in a spirited way-something never done until now. This gender equality is a great phenomenon. At least, now everything related with woman shall be put on trial and it’s a great chance to shatter all stereotyped notions with them. They are no holy cows, and they are as shrewd and manipulative as men needs to be ably projected. It’s a myth that they are a weaker sex and that they were the harassed lot in past. They have always enjoyed deep respect, care, both in external world and within the four walls of home. However, it’s ironical, and diabolical too, that instead of highlighting this aspect, all the men got clubbed in one category of abusers of women. So it’s time to tell that who actually has been abusing-man or woman?  The men community should discuss their own issues in a more organized way-their concerns, their dilemmas, their worries, their pain and their sufferings etc. should get highlighted in a better way. It’s for them to decide that they have to live like a male or as a female in a male body. That’s the real agenda of feminism- to curb the instincts of men to make them in tune with absurd concerns of women.

Lastly, there is nothing like gender equality. There are honorable differences and these differences should persist for the growth of society in a better way. Radha, Seeta, Draupadi, Savitri and other such great women were the by-product of same patriarchal society. Even in modern times, the same society has produced women for whom their fathers have been the role model. Let’s not topple such a society or else the future will be more darker than one would have imagined. Agreed that women have suffered discrimination and face problems. But are the lives of men devoid of problems? Aren’t they facing host of complex problems? Some times back in Kargil War, the Indian soldiers were killed in barbaric manner. Their genitals were cut. That was simply treated as war crime. The same done with woman would not have not only been treated as a war crime but also as sexual assault, rape. Now there lies the difference. That’s the paradox. One wishing true gender equality should  treat both bodies as mere bodies! If that’s not possible then stop this nonsense about gender equality. At present, there is a difference and no difference in the name of equality. Difference when you can’t face the heat and no difference in sophisticated scenario. That’s not equality. That’s opportunism. That’s selfishness. That’s shrewdness of highest type.

And I Notice The Difference For Society's Unity!

And I Notice The Difference For Society’s Unity!

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सत्य के लिए लड़ने वालो को दुनियाई लेबल की परवाह नहीं करनी चाहिए

सत्य जरूरी है ना कि लेबल

सत्य जरूरी है ना कि लेबल



सच बोलने या सही बोलने वाले को दुनिया ने हमेशा तमाम तरीके की बौड़म उपाधियाँ दी है। सो लेबल की परवाह मुझे नहीं है। उस अवस्था से ऊपर उठ गया  हूँ जहाँ लोगो को दुनियाई तमगो की चिंता होती है। कुछ तीव्रता से महसूस करना और फिर भी खामोश रह जाना एक प्रकार का बौद्धिक जुर्म है, बौद्धिक  धोखा है। कम से कम ये मेरा तरीका नहीं है। स्त्रियों का मै  सम्मान करता हूँ मगर इसका ये मतलब नहीं है कि उनके आचरण से जुड़े गलत तौर तरीको पर आपत्ति न उठाऊं। हर संवेदनशील व्यक्ति को समय रहते स्त्रियों को उनके आपत्तिज़नक आचरण के लिए सचेत करते रहना चाहिये इस बात की परवाह किये बिना कि इसका उन्हें खामियाज़ा भुगतना पड़  सकता है।  कम से कम ये बेहतर है इससें कि आप व्यर्थ के आंसू टपकायें कुछ गलत हो जाने के बाद उसी   गलत आचरण की वजह से। ये अलग बात है कि हम कदम तभी उठाते है जब सार्थक कदम अपनी अहमियत खो चुके होते है। अब ना तो मुझे इनकी तरह  आँसू बहाने का शौक है और ना ही मै इन निष्क्रिय आत्माओ  के समूह से में अपने आपको जोड़ सकता हूँ जो व्यर्थ ही आँसू बहाने के शौक़ीन है फोकट में।इसलिए तीव्रता से विरोध करता हूँ उस अवस्था से ही जब समस्या अपने प्रारम्भिक चरण में होती है। कम से कम विरोध करना तो मेरे हाथ में ही है। अगर आप मेरा साथ देते है तो अच्छी बात है। नहीं तो मै अकेले ही अपना विरोध तीव्रता से दर्ज करता रहूँगा। जिनको जो उपाधि मुझे देना है वो स्वतंत्र है मुझे देने के लिए। 

कभी कभी हमको चीजों को मानवीय दृष्टिकोण से भी समझना चाहिए, एक संवेदनशील दिमाग से भी देखना चाहिए। दिक्कत हमारे साथ ये है कि हम सब चीजों को ओवर इंटेलेक्चुअलआइज़ कर देते है। यही सबसे बड़ी समस्या है रेडिकल फेमिनिस्ट्स के साथ जो औरतो के अधिकारों के लिए लड़ रही है। अब औरतो के पास कुछ तथाकथित अपने पर्सनल अधिकार है पर जो चीज़ इस पर्सनल राइट्स के मिलने के बाद आयी कि पुरुषो के साथ परस्पर माधुर्य से जुड़े सम्बन्ध बनाने की काबिलियत का लोप हो गया। इसीलिए मुझे जो साधारण स्तर पर विचरणने वाले स्त्री पुरुष है वो ज्यादा जीवन का रस लेने वाले है बजाय दोहरी ज़िन्दगी, उलझाव भरी ज़िन्दगी जीने वाले ये अधिकारों की लडाई लड़ते स्त्री और पुरुष।

साधारण लोग जिंदगी को शायद बेहतर जीते है।

साधारण लोग जिंदगी को शायद बेहतर जीते है।


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(अपने अभिन्न मित्र घनश्याम दास, मेडिकल प्रैक्टिसनर है, यूनाइटेड अरब अमीरात, जी से कहे हुए शब्द एक विचार विमर्श के दौरान सोशल नेटवर्किंग साईट पर)

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I AM NOT AFRAID OF LABELS: TRUTH IS MORE IMPORTANT THAN LABELS!

One should not be afraid of labels while pursuing  truth!

One should not be afraid of labels while pursuing truth!

The righteous have always been labelled as this or that. I have never worried about labels; crossed that stage when one is afraid of labels. To feel something terribly and yet not speak out that clearly is some sort of intellectual dishonesty. That’s not my attitude. I respect and admire women a lot but that does not mean I come to overlook the dangerous trend patterns associated with them. We have to warn them in advance, irrespective of the consequences, or else there is no point in shedding tears when something goes wrong because of the same flaws/tendencies. It’s another thing that we react only when the water starts flowing above the danger mark. And neither I wish to shed tears like these misguided souls nor I wish to identify myself with them. That’s why I aggressively protest, right from the nascent stage of crisis. At least, that’s in my hand.  It’s fine if you come to support me. If not, I will still aggressively protest all alone. Let them label me as they want.

Sometimes we need to look at things from human angle, from a sensitive mind. The crude thing is that we over intellectualize everything. That’s the problem with the radical feminists advocating the rights of women. Now the women have their so-called rights but they forgot the art to have a natural and intimate relationship with man. That’s why I find simple man and woman enjoying life more than these men and women living complex lives, living dual lives, in the name of personal rights.

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P.S.: These words I shared with my close friend Ghanshyam Dasji, Medical Practitioner in United Arab Emirates, on a social networking site.

Be Simple To Be Truly Intimate

Be Simple To Be Truly Intimate

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From Sally To Arvind: Thoughts Deciphering Relationship Between Man And Woman

 

It's Never Easy To Truly Understand Each Other

It’s Never Easy To Truly Understand Each Other


It’s a rare phenomenon in a virtual world to receive comments/letters, which are powerful enough to make you go in a thinking mode. The dialogues or conversations taking place between  netizens are often devoid of substance, purely for the sake of cheap thrills. Anyway, the words of my highly conscious female friend Sally, living in United Kingdom, proved to be an exception. She is an excellent blogger, who not only loves to sing but also appears to be in love with languages, being fluent in Spanish, German and French. Her views provide a deep insight about the complexities, which have begun to shatter relationship existing between man and woman. Let’s have a look at her views but before that it would be appropriate to apprise the readers of my own words which compelled Sally to have such a conscious take on this complicated issue.

And yes, Sally, when I began writing I never intended to beat the Britishers in English writing skills! I have always been interested in presentation of thoughts with not so much regards for rules of grammar. That’s what I am still doing: Learning with each passing day with greater hold on presentation of deeper thoughts, related with sensitive issues. Anyway, thanks for complimenting me on my English. They mean a lot to me. At least, they give me power to keep writing with confidence in the world of English writing, marred by fierce competitiveness.

That’s what I said:

“It’s really baffling to anticipate that women have changed a lot but the mindset that sees them as a weaker sex remains the same. We continue to treat them as sex which cannot do anything wrong. Interestingly, it had never been the reality. Not even in times when they were icons of virtue. They are equally capable of plotting in a sinister way. In fact, they are far superior in working in evil ways.

Yet we notice that when laws are framed, they are framed treating woman as a harmless creature!  Will anybody explain me what’s the rationale behind this generosity shown by the lawmakers? What prevents the lawmakers from anticipating something that’s too obvious even to a person having little knowledge of women’s behaviour? This calculated ignorance on part of lawmakers has turned Indian homes into battlefields. Clash of egos is now so commonplace. The couples suffer but the policemen, lawyers, judges, women’s organizations and feminist institutions keep making money. The fights are also good for the economy. The couple living separate lives will be viewing television separately!

The times have really changed. Women make babies suffer but forget not to save time for friends, parties and doggies. This drama is, indeed, more comic than ‘The Great Indian Laughter Challenge’, and at the same time, more tragic than disaster hitting the planet earth.”

Now pay attention to the words of my extremely sensitive friend Sally:

This is a very interesting discussion. I think where there is any extreme there must always be a backlash the other way.

In this country (the UK), when women’s rights came to the fore it wasn’t too long before the balance tipped in their favour.  Men were demonised (“all men are rapists”, etc.) and women insisted on equality in all areas, much to their own detriment in terms of the social niceties such as men standing when a woman entered the room, men opening doors for women, etc. Whereas women were fighting for the “right” to work, this has inevitably led to all women being expected to work, whilst still looking after their husbands and partners (forget the “New Man”, he doesn’t exist!) and also bring up their children.

This initially back-lashed to the emasculation of men and they were much derided in advertising campaigns and TV soap operas, etc.

The truth is there are intelligent people and not so intelligent people, there are good people and bad people, strong people and weak people – of both sexes – and gender doesn’t come into the equation. Men and women should have equal rights in law, and there should be fairness in society, and men and women should complement each other. Look at nature – in some respects the male dominates, in other respects the female does. There is balance.

We should respect each other’s gender, and work in harmony. We can rejoice in our differences.

As a visitor to India, I was aware that there were many aspects which seemed, to a Western observer, to be very old fashioned. Some attitudes towards women I encountered were quaint and charming, some I found patronising, and others downright offensive (whether I was judged, as a Western woman, to have looser morals I cannot say but on a couple of occasions I was manhandled – literally – in an unacceptable fashion). On the whole, however, I was treated with respect. I was, however, left with the impression that men had the upper hand culturally.

My impression before visiting India – mostly derived from watching “Bollywood” movies – was that the Indian male’s view of womanhood was that of a fragile flower, who should be chaste but sassy, and in need of the male’s protection,  but who might equally be a devious temptress or harridan, using womanly wiles or a strong personality to get her own way. The truth is that men and women are not so different – we laugh, we cry, we nurture, we manipulate, we love, we hate, we feel.

Just as men abuse women, women abuse men. If anything, the abuse of men is less likely to be reported since society would have it that the abused man is weak, which is not necessarily the case at all.

Even in the UK in the 21st century there are still serious issues, such as the rights of divorced and separated fathers concerning access to their children, which need addressing. Although women are said to have equality, men are still on the whole earning more than women in similar jobs.

Oh yes, and I agree with the song “Paisa bolta hai” (money speaks). Many laws are made which protect the interests those who make them. The people who make the laws are mostly men.

May I take this opportunity to congratulate you on your English, which is probably equally as good as mine, if not better, and certainly much better than my Hindi!

 

Balance  Alone Leads To Genuine Intimacy

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