फगुआ की बयार मे भीगा भीगा सा मन, जरा जरा सा बहकता हुआ, जरा जरा सा सरकता हुआ
बसंत ऋतू का आगमन हो चुका है। बहकना स्वाभाविक है। गाँव में तो फगुआ की बयार बहती है। ग्लोबल संस्कृति से सजी संवरी शहरी सभ्यता में क्या होलियाना रंग, क्या दीपावली के दियो की ल़ौ की चमक। दोनों पे कृत्रिमता की चादर चढ़ चुकी है। या तो समय का रोना है या फिर महँगाई का हवाला या फिर जैसे तैसे निपटा कर फिर से घरेलु कार्यो/आफिस के कामकाज में जुट जाने की धुन। त्यौहार कब आते है कब चले जाते है पता भी नहीं चलता। ये बड़ी बिडम्बना है कि त्यौहार सब के लिए दौड़ती भागती जिंदगी में टीवी सीरियल में आने वाले दो मिनट के ब्रेक जैसे हो गए है। सब के लिए त्यौहार के मायने ही बदल गए है। अलग अलग उम्र के वर्गों के लिए त्यौहार का मतलब जुदा जुदा सा है। और मतलब अलग भले ही होता हो लेकिन उद्देश्य त्यौहार के रंग में रंगने का नहीं वरन जीवन से कुछ पल फुरसत के चुरा लेने का होता है।
इन सब से परे मुझे याद आते है कई मधुर होली के रंग। वो लखनऊ की पहली होली जिसमे कमीने तिवारी ने मेरी मासुमियत का नाजायज़ फायदा उठाते हुए और लखनऊ की तहजीब की चिंदी चिंदी करते हुए मुझे रंग भरे टैंक में धक्का देकर गिरा दिया था। बहुत देर के बाद एक गीत उस तिवारी के लायक बजा है हर दोस्त कमीना होता है। तिवारी का नाम इस लिस्ट में पहले है। ये इतना मनहूस रहा है शनिचर की तरह कि हर अनुभव इसके साथ बुरा ही रहा है। बताइए बैंक के कैम्पस के अन्दर छुट्टी वाले दिन बैंक की चारदीवारी फांद कर हर्बेरिअम फाइल के लिए फूल तोड़ने का आईडिया ऐसे शैतानी दिमाग के आलावा कहा उपज सकती थी। गार्ड धर लेता तो निश्चित ही बैंक लूटने का आरोप लग जाता। वो तो कहिये हम लोग फूल-पत्तियों सहित इतनी तेज़ी से उड़न छू हुएं कि इतनी तेज़ी से प्रेतात्माएं भी न प्रकट होके गायब होती होंगी। गाँव की होली याद आती है जिसमे गुलाल तो कम उड़ रहे थें गीली माटी ज्यादा उड़ रही थी। पानी के गुब्बारों से निशाना साधना याद आता है। सुबह से सिर्फ पानी की बाल्टी और गुब्बारा लेकर तैयार रहते थें। याद आते है वार्निश पुते चेहरे, बिना भांग के गोले के ही बहकते मित्र, गुजिया पे पैनी नज़र। ये सब बहुत याद आता है। अपने मन को धन्यवाद देता हूँ कि मष्तिष्क का अन्दर इन यादो के रंग अभी भी ताज़े है।
स्मृतियाँ तकलीफ भी देती है और आनंद भी। इन्ही स्मृतियों में भींगकर पाठको को होली से जुड़े कुछ विशुद्ध शास्त्रीय संगीत पे आधारित ठुमरी/गीत जिनमे अपने प्यारे राधा और कन्हैय्या के होली का वर्णन है को सुनवा रहा हूँ। ये अलग बात है कि मेरे मित्रो के श्रेणी में इन गीतों को सुनने के संस्कार अभी ना जगे हो लेकिन इन्हें स्थापित उस्तादों ने इतना डूब कर गाया है कि अन्दर रस की धार फूट पड़ती है। कुछ एक गीत चलचित्र से भी है, अन्य भाषा के भी है भोजपुरी सहित। इन्हें जैसे तैसे आप सुन लें अगर एक बार भी तो मुझे यकीन है कि संवेदनशील ह्रदय इनसे आसानी से तादात्म्य कर लेंगे हमेशा के लिए। और इसके बाद भी यदि शुष्क ह्रदय रस में ना भीग सके तो उनके लिए जगजीत सिंह का भंगड़ा आधारित गीत भी है। सुने जरूर। ह्रदय हर्ष के हिलोरों से हिल जाएगा।
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1. रंग डारूंगी, डारूंगी, रंग डारूंगी नन्द के लालन पे (पंडित छन्नूलाल मिश्र)
पंडितजी को सुनने का मतलब है आत्मा में आनंद के सागर को न्योता देने का सरीखा सा है। बनारस की शान पंडितजी से आप चाहे ठुमरी गवा लीजिये, कजरी गवा लीजिये, या ख्याल वो सीधे आपके रूह पे काबिज हो जाता है। ये किसी परिचय के मोहताज़ नहीं और ईश्वर की कृपा रही है कि प्रयाग की भूमि पर इनको साक्षात सुनने का मौका मिला है। ख़ास बात ये रहती है कि ये गीत के बीच में आपको मधुरतम तरीकें से आपको कुछ न कुछ बताते चलते है। और इस तरीके से बताते है कि आप सुनने को विवश हो जाते है। खैर इस बनारसी अंग में राधा जी ने अच्छी खबर ली है कृष्ण की। मुझे नारी बनाया सो लो अब आप नाचो मेरे संग स्त्री बन के। सुने कृष्ण का स्त्री रूप में अद्भुत रूपांतरण राधाजी के द्वारा होली के अवसर पर।
संध्या मुखर्जी को मैंने पहले नहीं सुना। इस लेख को लिखने के दौरान इनको सुनने का सौभाग्य मिला। बंगाली संगीत में निपुण इस गायिका की आवाज़ मन में घर कर गयी। उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खान की शिष्या बंगाली फिल्मो सहित हिंदी फिल्मो के लिए भी गीत गाये। इस शास्त्रीय गीत को सुनने के बाद आपको राधाजी का किसी बात पे रूठना याद आता है। कोई शिकायत जो अभिव्यक्त होने से रह गयी उसी की खीज इस गीत में प्रकट हो रही है। दर्द है तो प्रकट होगा ही। इसमें कौन से बड़ी बात है लेकिन ये क्या कि आप फगुआ की बयार में बहने से इन्कार कर दे? शिकायत दूर कर के होली जरूर खेले मै तो बस यही कहूँगा।
होली पे मुझे तो वैसे अक्सर ये गीत “होली आई रे कन्हाई” (मदर इंडिया) याद आ जाता है लेकिन ये गीत कम बजता है। बहुत मधुर गीत है। व्ही शांताराम के फिल्मो के ये विशेषता रही है कि भारतीयता के सुंदर पक्षों को उन्होंने बड़े कलात्मक तरीके से उकेरा है हम सभी के चित्तो पर। नवरंग के सभी गीत बेहद सुंदर है जैसे “श्यामल श्यामल वरन” और “आधा है चन्द्रमा रात आधी” लेकिन कृष्ण और राधा के होली प्रसंग पर आधारित गीत कालजयी बन गया। कौन कहता है कि भारतीय स्त्री बोल्ड नहीं रही? देखिये क्या कह रही है राधा इसमें जिसको जीवंत कर दिया संध्या के सधे हुए नृत्य की भाव भंगिमाओ ने। महेंद्र कपूर और आशा भोंसले ने गीत में स्वर दिया है। संगीत सी रामचंद्र का है और गीत हिंदी गीतों को शुद्ध हिंदी के शब्द देने वाले भरत व्यास का लिखा है।
नदिया के पार ने ऐतहासिक सफलता प्राप्त की थी भोजपुरी में होने के बावजूद। रविन्द्र जैन का गीत और संगीत मील का पत्थर बन गया। और यही से भोजपुरी संगीत ने एक नयी उंचाई प्राप्त की लेकिन ये अलग बात है उस मूल तत्त्व से भटक गया जिसके दर्शन इस फिल्मो के गीतों में हुए है। भारतीय फिल्मो में गाँव कभी भी असल तरीके से प्रकट नहीं हुआ। ये कुछ उन विलक्षण फिल्मो में से एक है जिसमे गाँव ने अपनी आत्मा को प्रकट किया है अपने कई मूल तत्वों के साथ।
इस गीत को सिर्फ इसलिए सुनवा रहा हूँ कि इस गीत में मेरे गाँव का स्वरूप बिलकुल यथावत तरीकें से प्रस्तुतीकरण हुआ है। इस में दीखते रास्ते, पगडण्डीयाँ, खेत, नदी बिलकुल अपने गाँव सरीखा है। गीत के बीच में आपको पालकी पे विदा होती दुल्हन भी दिख जायेगी। क्योकि पालकी पे सवार होकर कभी दुल्हन को विदा होते हुए होते देखा था सो इस युग में जहाँ पे सजी धजी कार में दुल्हन को भेज़ने की नौटंकी होती है वहां ये दृश्य आपको बिलकुल भावविभोर कर देता है। खैर गीत सुने जो बहुत मधुर है ऐसा शायद बताने की जरुरत ना पड़े। ये बताने की जरुरत अवश्य पड़ सकती है कि गीत को गाया है हेमलता और जसपाल सिंह नें।
मनोज तिवारी की आवाज में ये भोजपुरी गीत मन को भाता है। ये अलग बात है कि गीत को भोजपुरी गीतों में व्याप्त लटको झटको जैसा ही फिल्माया गया है। वही रंग बिरंगी परिधानों में कूदती फांदती स्त्रिया जो गीत के साथ न्याय नहीं करती प्रतीत होती। फिर भी हरे भरे खेत मन में उमंग को जगह तो दे हे देते है। भाग्यश्री “मैंने प्यार किया” के बाद लगभग गायब ही हो गयी। मैंने प्यार किया जैसी वाहियात फ़िल्म मैंने देखी नहीं सो बता नहीं सकता कि ये टैलेंटेड है कि नहीं लेकिन जहा तक इस गीत की बात है गीत में इनकी उपस्थिति से चार चाँद तो लग ही रहे है लुक्स की वजह सें। खैर इतने दिनों बाद देखना इस एक्ट्रेस को और वो भी एक भोजपुरी गीत में एक सुखद आश्चर्य है।
लारा लप्पा “एक थी लड़की” से बहुत ही सुंदर गीत है। इसी के खोज में ये जगजीत सिंह का ये पंजाबी गीत हाथ लग गया। इसको जगजीत सिंह ने जिस चिरपरिचित दिलकश अंदाज़ में गाया है उतने ही कमाल के तरीकें से इनके साजिंदों ने बजाया है। निश्चित ही सुनने योग्य गीत अगर आप चाहते है कि आप का दिल बल्ले बल्ले करने पे मजबूर हो उठें। वैसे इस गीत के शुरू में मजनू ने अपनी लैला को काली कहने वालो की दृष्टि को गरियाया है सभ्य तर्कों के साथ वो भी सुन लें। हम तो भाई मजनू से बस इतना ही कहेंगे कि जो बकते है उनको बकने दो काहे कि “यथा दृष्टि तथा सृष्टि” ( जैसी हमारी दृष्टि होती है, वैसी ही यह सृष्टि हमें दिखती है)
Death Is More Honest Than Life!
I met lots of people in this short life, who preached me in pompous tone that ego is bad, money is filth, ladies are evil and etc. That I have had heard umpteen times since childhood, and, interestingly, I came to live a more realistic and down-to-earth life than those who talked about such values publicly in glittering company of like minded souls! I found people, talking about life devoid of ego, the most egocentric souls, chasing name and fame with greater passion than anyone else. I met shrewdness disguised as faithfulness. Friend or beloved, they turned out to be more like poison placed in silver cup.
And still, having seen such worst contradictions, I feel life is a beautiful affair. Life’s canvas still motivates me to live life fully. May be life has some more cruel lessons to offer me! But I am now no more interested in life’s equations similar to one which we notice on chessboard-you win I lose types. In fact, its cruel maneuvers never appealed to my sense instinctively. Precisely, that’s why I have never been passionate admirer of life’s idiotic episodes. My philosophy, until now, has been to deal sincerely with whatever came to cross my path. For me, the very fact that you have arrived in this world of human beings is a big mistake- a divine joke. May be for a greater lot, these changing facets of life turn out to be as important as a life and death issue, but in my eyes, the life mired in deceptiveness at its every turn, does not evoke great concern. I find even the most beautiful episodes of life, have their genesis in some sort of deception. So as I suffer pain, when I come to hear about loss of loved ones, or when I anticipate a blissful episode, the nothingness of life keeps me in state of peace.
Sometimes back I read powerful arguments in favour of death. And one of them stated that death is very much needed since if you continued living, you would realize that people who lived around you as picture of faithfulness were nothing but beings mired in selfishness! Death arrives to retain your illusion. It does you a great favour by keeping your faith intact in flawed people. I am sure had life allowed a legitimate route to embrace death all by oneself, I am sure many would have adopted that path. India’s great revolutionary Bhagat Singh had made a remarkable comment- hanged to death by the British Government in the pre-Independence era- that had he been living, life would have heaped upon him some more chosen scandals. So he is so happy that death has embraced him in the prime of his youth; that death kept his so many vices secret. That’s why he was more happy than sad when hanged to death order was delivered to him. In my eyes, he was the ideal example of these words: “Those whom the gods love die young.”
It’s pathetic that laws of this nation-may be elsewhere too-are strange. They treat suicide a crime. However, the same lawmakers, being devoid of accountability, fail to ensure that people who abetted suicide of innocent person should not go scot-free. The policymakers take no measures to keep away those scenarios, which compel anybody to think about killing oneself. Paradoxically, aiding and abetting suicide, becomes a cause of concern only when someone brings the issue in the court. It’s easy to understand that why it’s never the case. The case in court drags for years and in the end we find the accused denied punishment in want of concrete evidences. So it’s really amusing, and tragic as well, that society first promotes crime and then the same society delivers verdicts. Isn’t that height of absurdity?
Anyway, the pretenders, who unfortunately claim to be my close friends- the ones who are guilty of complicating my simple life, dare to ask me as to why I am not a public figure, why I am not that involved in life’s silly episodes the way they are? Interestingly, they are like the conspirators, standing by your side as a mute spectator, just like you, witnessing the tragedy given birth by them. Since they often dare to ask me such a question with straight face, I need to quote these lines by well known poet Sahir Ludhianvi as a reply to these curious souls-the conspirators:
“क्या मिलिए ऐसे लोगो से जिनकी फ़ितरत छुपी रहे,
नकली चेहरा सामने आये असली सूरत छुपी रही
खुद से भी जो खुद को छुपाये क्या उनसे पहचान करे,
क्या उनके दामन से लिपटे क्या उनका अरमान करे,
जिनकी आधी नीयत उभरे आधी नीयत छुपी रहे।”
“Is there any point in meeting with people, having dubious intentions?
Who project their unreal image, but keep the real one hidden
People, who have kept secret from themselves, too, their own real image
Why should I embrace them, and seek them ?
People who half disclose their intentions, keeping close to their hearts the actual intentions.”
Another brilliant poet, Nida Fazli, has exposed the real elements, which constitute the so-called beautiful episodes of life. These verses in my eyes reveal the reality of life. For a simple person like me, I don’t think that such a cruel world can ever elicit deep attention on my part. It’s another thing that for people of the world, I might look like living, but internally I am on par with dead.
“हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी,
फिर भी तनहाइयों का शिकार आदमी,
सुबह से शाम तक बोझ ढ़ोता हुआ,
अपनी लाश का खुद मज़ार आदमी,
हर तरफ भागते दौड़ते रास्ते,
हर तरफ आदमी का शिकार आदमी,
रोज़ जीता हुआ रोज़ मरता हुआ,
हर नए दिन नया इंतज़ार आदमी,
जिन्दगी का मुक्कदर सफ़र दर सफ़र,
आखिरी साँस तक बेकरार आदमी”
“Everywhere there is sea of people
Yet a person suffers from isolation
Carrying the burdens from morning till evening
Human being has become some sort of moving tomb
Everywhere you find busy roads
Wherein one person becomes victim of other person
Every day a person wakes up only to die a bit more
And still greets each day with great expectations
The destiny of human life from its one episode to another
Is to remain anxious till last breath.”
P.S.: Translation Of The Verses Done By The Author Of This Post.
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राजेश खन्ना: सबके नैनो को सावन भादो करके चले गए तुम
राजेश खन्ना का यूँ ही अचानक क्षितिज के उस पार चले जाना दुखी करता है. अभी उनकी उम्र ही क्या हुई थी लेकिन कलाकारों की मौत का जो सिलसिला पिछले साल से शुरू हुआ है वो अब तक बना हुआ है. जगजीत सिंह, शहरयार, मशहूर संगीतकार रविजी, हिंदी के लेखक श्रीलाल शुक्ल, शम्मी कपूर, फिर हमारे चहेते हनुमान दारा सिंह और अब राजेश खन्ना. ऐसा लगता है कि देवलोक का माहौल बहुत ग़मगीन हो गया है तभी पृथ्वी के सभी बड़े कलाकार एक के बाद ऊपर के लोको में चले जा रहे है. खैर राजेश खन्ना की मौत के बाद ये एहसास मुझे हो चला है कि मौत भी कोई चीज़ होती है जो “आनंद” को भी शोक में परिवर्तित कर सकता है. हिंदी फ़िल्म जगत को पहला सुपरस्टार देने वाला अब यादो का हिस्सा बन गया है. ये सुपरस्टार क्या चीज़ होती है मुझे ज्यादा नहीं पता पर राजेश खन्ना का जादू सत्तर के दशक में यूँ चढ़ा कि माएं अपने बच्चो का नाम राजेश रखने लगी, युवतियों के अन्दर का पागलपन थोडा और बढ़ चला और नाई के दुकान पे एक और हेयर स्टाइल का उदय हो गया. बुरा हो एंग्री यंगमैन अमिताभ के अवतार का जिसने राजेश की आभा को ग्रहण लगा दिया बहुत जल्द ही पर तब तक राजेश का जादू एक अमरता को प्राप्त कर चला था.
जैसा सब अच्छे कलाकारों के साथ होता है राजेश को भी आरंभिक दिनों में सब ने नकार दिया. चोटी की अभिनेत्रियों ने काम करने से मना कर दिया. शुरुआती फिल्मे पिट गयी बाक्स ऑफिस पे. फिर जाके आराधना मिली जिसको लेके राजेश खन्ना खुद ही सशंकित थे क्योकि नायिका प्रधान फ़िल्म में इनके लिए कुछ ख़ास नहीं था. पर जब सफलता मिलनी होती है तो मिल के रहती है यूँ ही जैसे रेगिस्तान में झरने का फूट पड़ना. कम से कम बालीवुड में सफलता का सिलसिला ऐसे ही शुरू हो जाता है सब तर्कों को धता बता के. तो एक नायिका प्रधान फ़िल्म ने भारतीय रजत पटल को उसका पहला सुपरस्टार दिया.
बालीवुड में वैसे सुपरस्टार को कुछ ख़ास एक्टिंग नहीं करनी पड़ती. कम से कम आज कल के तथाकथित “खान” सुपरस्टारों को देख तो यही समझ में आता है. अमिताभ का भी यही दुखड़ा रहा है कि उनसे किसी ने ढंग की एक्टिंग नहीं करवाई सिवाय ढिशुम ढिशुम के. खैर राजेश खन्ना के हाथ कुछ अच्छी फिल्मे आई जिनमे उन्हें एक्टिंग के अपने कुछ ख़ास शेड्स दिखाने का मौका मिला. ये एक महज सयोंग ही है कि ऋषिकेश मुखर्जी ने ही राजेश खन्ना और अमिताभ दोनों को कुछ फिल्मे प्रदान कि जिनमे उन्हें वास्तविक अभिनय से दो चार होना पड़ा. ये भी क्या अद्भुत संयोग है कि इन दो फिल्मो “आनंद” और “नमक हराम” में दोनों ने साथ काम किया. आनंद एक कालजयी फ़िल्म बन के उभरी. आनंद तो अमर हुआ ही पर बाबु मोशाय भी कभी ना मरने वाली लोकप्रियता को प्राप्त हो चला. आनंद उपनिषद् के इस सत्य को प्रतिपादित करता था कि इंसान कभी नहीं मरता है. मौत एक तमाशा है जिसमे आत्मा को नए कपडे लत्ते मिल जाते है. इस भाव को राजेश खन्ना ने अद्भुत तरीके से परदे पे प्रस्तुत किया.
राजेश खन्ना के एक्टिंग में एक ख़ास तरीकें की नाटकीयता थी मगर जब कभी सधा हुआ अभिनय करने का मौका मिला उन्होंने कर दिखाया. शुरुआती दौर में नंदा के साथ आई यश चोपड़ा की “इत्तेफाक” इस बात की पुष्टि करती है. खैर अमर प्रेम, कटी पतंग, कुदरत, सौतन, थोड़ी सी बेवफाई, अवतार, डोली, रोटी और आन मिलो सजना इनकी कुछ उल्लेखनीय फिल्मे है. इनकी सफलता के बारे में बात करना और किशोर कुमार, आर डी बर्मन, मजरूह, आनंद बक्षी, एस डी बर्मन, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, कल्यानजी आनंदजी, हेमंत कुमार और खैय्याम इत्यादि का जिक्र ना करना मतलब दाल में से नमक का गायब कर देना है. किशोर कुमार ने ही रूमानियत के सुपरस्टार राजेश खन्ना और यंग्री यंग मैन अमिताभ को वो दर्जा दिलवाया जो किसी के लिए दुर्लभ होता है. किशोर कुमार के चले जाने के बाद ये दोनों धडाम से नीचे आ गिरे. सोचिये अगर किशोर ना होते तो “मेरे सपनो की रानी” कहा से आती इस शानदार तरीके सें ? सोचिये अगर ”ओ मेरे दिल के चैन” के चैन किशोर ना होते तो क्या राजेश तनूजा को इम्प्रेस कभी कर पाते! और रोटी में गाया ये गीत “ये जो पब्लिक है ये सब जानती है” तो एक कालजयी मुहावरा ही बन गया. और इस फ़िल्म में किशोर कुमार का गोरे रंग पे कटाक्ष ” गोरे रंग पे ना इतना गुमान कर” सिर्फ मुमताज़ पर ही नहीं सिमट के रह गया वरन इस गीत के बाद भारत में पैदा हुई हर गोरी लड़की के व्यक्तित्व को बेधता चला गया.
खैर ईश्वर इनकी आत्मा को शांति प्रदान करे. कहते है जाने वाले कभी लौट के नहीं आते. सिर्फ इनकी याद रह जाती है. सही बात है ” कुछ लोग जो बिछुड़ जाते है वो हजारो के आने से मिलते नहीं“. पर “आनंद” कभी मरते नहीं बस इसी रंगमंच पर रूप बदल के आ जाते है और ये बोध इस दुःख में एक मुस्कान की लहर तो पैदा ही कर देता है. पुनर्मिलन की उम्मीद तो बंधा ही देता है.
मेरे कुछ पसंदीदा गीत राजेश खन्ना पे फिल्माए हुए:
१. मेरे नैना सावन भादो ( मेहबूबा)
२. कुछ तो लोग कहेंगे (अमर प्रेम)
३. जिंदगी प्यार का गीत है (सौतन)
४. हज़ार राहे मुड़ के देखी (थोड़ी से बेवफाई)
५. वादा तेरा वादा (दुश्मन)
६. सजना साथ निभाना (डोली)
७. प्यार दीवाना होता है ( कटी पतंग)
८. ये रेशमी जुल्फे ( दो रास्ते)
९. जीवन से भरी तेरी आँखें (सफ़र)
१०. जुबान पे दर्द भरी दास्ताँ( मर्यादा)
११. वो शाम कुछ अजीब थी (खामोशी)
१२. यूँ ही तुम मुझसे बात करती हो (सच्चा झूठा)
१३. मेरे दिल में आज क्या है (दाग)
१४. कही दूर जब दिन ढल जाए (आनंद)
१५. जिंदगी एक सफ़र है सुहाना (अंदाज़)
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Suresh Wadekar: A Perfect Singer
Suresh Wadekar is one my favourite singers. He is very talented and he is really someone who can sing a classical song with great perfection. I can quote many songs, which bear testimony to his exceptional singing talent. Aur Is Dil Me Kya Rakha Hai (Imandar), Meri Kismat Me Tu Nahi Shayad( Prem Rog) and Khamosh Sa Afsana (Libaas) are some of the great numbers rendered by him.
At present, I am presenting a song from movie Utsav based on two Sanskrit plays: Charudatta by Bhāsa and Mrichakatika by Śhudraka. The best thing about this song is that it produces great soothing effect, creates a perfect scenario that prevails when the sun goes down.
Another sterling feature is that it uses pure tatsam words, which is a rarity. Hats off to Laxmikant Pyarelal and Vasant Dev for producing such gems. Some music lovers are of the opinion that this song “ “Saanjh Dhale Gagan Tale” is based on Raga “Bibhas”.
सांझ ढले गगन तले हम कितने एकाकी
छोड़ चले नयनों को किरणों के पाखी
पाती की जाली से झांक रही थीं कलियां
गंध भरी गुनगुन में मगन हुई थीं कलियां
इतने में तिमिर धंसा सपनीले नयनों में
कलियों के आंसू का कोई नहीं साथी
छोड़ चले नयनों को किरणों के पाखी
सांझ ढले।।
जुगनू का पट ओढ़े आयेगी रात अभी
निशिगंधा के सुर में कह देगी बात सभी
कांपता है मन जैसे डाली अंबुआ की
छोड़ चले नयनों को किरणों के पाखी
सांझ ढले।
Audio Link: Saanjh Dhale Gagan Tale
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किस्मत के खेल निराले मेरे भईय्या !!!

कहते है वक्त किसी के लिए नहीं रुकता और ना इस वक्त की परवाह करता है किसी के उपलब्धियों की. वो नियत समय पे सबको इतिहास बना के ही छोड़ता है. इधर कई महीनों से ऐसा प्रतीत हो रहा कि जैसे किसी ने इश्वर की दुनिया में किसी ने कान्ट्रेक्ट ले लिया है मृत्युलोक से सभी रचनात्मक लोगो को एक के बाद अपनी दुनिया में वापस बुलाने को. अब इसे देखिये इस खबर से पहले कि महान संगीतकार रवि अब नहीं रहे मै उन्ही के जन्मदिन पर विविध भारती पर उन पर केन्द्रित कार्यक्रम सुन रहा था जिसमे वे अपने साहिर साहेब से संबंधो पर विस्तार से चर्चा कर रहे थे. ये कितनी बड़ी बिडम्बना है कि जिनकी बात आप कुछ देर पहले सुन रहे होते है वे कुछ ही पल के बाद हमेशा के लिए खामोश हो जाते है.
रविजी का मै कद्रदान रहा हूँ. इन्होने जब भी साज छेड़ा दिल के तारो में एक कम्पन सी पैदा हो जाती थी. जो भी इनके संगीत से परचित है उसको पता होगा कि इनके संगीत में जरा सा भी पेंच नहीं था. इनकी धुनें बहुत ही सहज होती थी हर एक खूबसूरत अफ़साने की तरह. इसलिए जब भी इनका गीत बजता है आप कुछ समय के लिए इस मायावी जगत के उलझनों से ऊपर उठ जाते है. इस तरह के कुछ गुणी संगीतकारों ने कम से कम इस बात कि पुष्टि कर दी कि अच्छे संगीत के लिए एक विशाल आर्केस्ट्रा की जरूरत नहीं होती. कम साजो के इस्तमाल से भी बहुत दुर्लभ गीत बन सकते है. रविजी उस युग का प्रतिनिधित्व करते थे जिसमे संगीत अपने शुद्धतम स्तर पे मौजूद था. मतलब एक अच्छे संगीत के तत्त्वों से लोग अच्छी तरह से परिचित थे. साठ के दौर के एक खासियत ये भी थी कि अगर अच्छे संगीतकार मौजूद थे तो उस अच्छे संगीत के सापेक्ष अच्छे गीतकार भी थे. इन दोनों के बेहतरीन मिलन ने उस दौर को कभी ना मिटा पाने वाला युग बना दिया.
जरा आज देखिये क्या होता है. नाम बड़े और दर्शन छोटे. हर कोई अजीबो गरीब प्रयोग कर रहा है उन शब्दों पर जो शायद एक वर्ग ही समझ पाता है. पर गुजरे वक्त में शायद ऐसा नहीं होता था. मानवीय भावनाओं को सही सही गीतकार व्यक्त करते थें और फिर उन पर संगीतकार कितने घंटो बैठकर उसे एक अच्छी धुन में पिरोते थे. ऐसा नहीं था कि पैसे का मोल उन्हें ना पता था पर रचनात्मकता का स्तर पैसो की जरुरत से प्रभावित नहीं था. शायद यही वजह थी कि इनका संगीत वक्त के प्रवाह के शायद बहता रहा. इनकी चमक कभी धूमिल नहीं हुई. कल ही किसी शादी में मै ” ऐ मेरी जोहराजबीं” को रीमिक्स में ढला हुआ सुन रहा था. कहने के मतलब यही है कि जिन्होंने लगन और अपनी समझ को पैसो तले गिरवी नहीं रखा वे वक्त के प्रवाह से ऊपर उठ गए. ये भी मै बता दूँ रवि ही एक ऐसे संगीतकार रहे जिन्होंने कम से कम चालीस वर्षो तक संगीत दिया पर किसी भी युग में यह नहीं लगा कि जैसे इनका संगीत चुक गया है या ये कि ये वक्त के साथ एडजस्ट नहीं कर पा रहे है. आप साठ के दशक में आई गुमराह का संगीत सुने और अस्सी के दौर में आई इनकी फिल्मे तवायफ, निकाह,दहलीज़ और आज की आवाज़ के गीत सुनिए आप को वही मोहकता और मादकपन मिलेंगा इनके संगीत में.

हमराज, दो बदन, गुमराह, वक्त, एक फूल दो माली, आँखें, आदमी और इंसान, भरोसा, घूंघट और चौदहवी का चाँद जैसी क्लास्सिक फिल्मो में अद्भुत संगीत देने वाला आज हमारे बीच से चला गया. यकीन नहीं होता मुझे. खैर इनका ही रचा एक गीत है जिसने सिर्फ मुझे ही नहीं बहुतो को विपरीत समय में भी कैसे रहना है इसकी सीख देता है आज बार बार मेरे अन्दर प्रकट हो रहा है. आज मुझे फिर इस गीत ” ना मुंह छुपा के जियो और ना सर झुका के जियो” की शरण में जाना पड़ रहा है थोड़ी सी मुस्कान के लिए. इस महान आत्मा को प्रभु शान्ति प्रदान करे.
इनके कुछ गीत जो मुझे बहुत पसंद है:
१. तुम अगर साथ देने का वादा करो
२. चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाए हम दोनों
४. हम जब सिमट के आप के बाहों में
५. बहुत देर से दर पे आँखे लगी थी
८. एक अधूरी सी मुलाक़ात हुई थी जिनसे

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शहरयार: सीने में जलन पर फिर भी जिंदगी को समझने वाला सादगीपरस्त शायर
शहरयार का यूँ चले जाना दुखी करता है. कुछ महीनों पहले विविध भारती पर जब उनका साक्षात्कार सुन रहा था तो महसूस कर रहा था कि एक संवेदनशील आदमी को कितनी जिल्लत और तकलीफों का सामना करना पड़ता है और शायद यही अपमानजनक घटनाये उसकी रचनात्मकता को धार देती है. पर तब मुझे नहीं मालुम था कि ये आवाज़ अब परमात्मा की आवाज़ में विलीन होने वाली है. शहरयार जो जीवन से जुदा होके भी जीवन की विषमताओ पे पैनी नज़र रखते निहायत सादगीपरस्त इसान थे. इनसे जब ये पूछा गया कि आप ने मुशायरो में जाना क्यों बंद कर दिया तो जवाब आया कि साहब मुशायरो में वाह वाही लूटने वाले तौर तरीके उन्हें नहीं आते. वे उन शायरों में से थे जिन्होंने सस्ती लोकप्रियता पाने के हथकंडो से अपने को ऊपर रखा. वरना आज के इस अंधे युग में सस्ती लोकप्रियता के मोह से ऊपर उठ पाना संभव नहीं.
ये कहना गलत नहीं है कि मुज़फ्फर अली की गमन और उमराव जान ना प्रदर्शित हुई होती तो एक मास अपील जो उन्होंने विकसित की वो संभव नहीं था. गमन और उमराव जान की ग़ज़ल ने उनको एक लोकप्रिय शायर बनाया. कुछ कुछ साहिर के साथ भी ऐसा ही था. लेकिन ये भी उतना ही सच ही है कि इनका वजूद सिर्फ इन फिल्मी ग़ज़लों से परिभाषित नहीं था वरन इन्होने जीवन की विसंगतियों को जिस इमानदारी से उकेरा इसने इन्हें एक बेमिसाल गज़लकार बनाया. अंजुमन या त्रिकोण का चौथा कोना के गीतों की लोकप्रियता ने इनकी शायरी को एक जीवंतता सी प्रदान की. इनका जीवन किस कदर उलझाव से भरा था इनकी ग़ज़लों में साफ़ दिखता है यद्यपि इनके जीवन में भौतिक सुखो की कमी ना थी पर एक संवेदनशील प्राणी की आत्मा कब भौतिक सुखो में विलीन हो सकती है!
हम पढ़ रहे थे ख़्वाब के पुर्ज़ों को जोड़ के
आँधी ने ये तिलिस्म भी रख डाला तोड़ के
आग़ाज़ क्यों किया था सफ़र उन ख़्वाबों का
पछता रहे हो सब्ज़ ज़मीनों को छोड़ के
इक बूँद ज़हर के लिये फैला रहे हो हाथ
देखो कभी ख़ुद अपने बदन को निचोड़ के
कुछ भी नहीं जो ख़्वाब की तरह दिखाई दे
कोई नहीं जो हम को जगाये झिन्झोड़ के
इन पानियों से कोई सलामत नहीं गया
है वक़्त अब भी कश्तियाँ ले जाओ मोड़ के
शहरयार इस वर्तमान युग के साक्षी थे जिसमे मानवीय मूल्यों की कोई इज्ज़त नहीं थी. इज्ज़त थी तो सिर्फ पैसो के अश्लील खेल की. इस मूल्यों के क्षय को उन्होंने बहुत संजीदगी से व्यक्त किया है.
ख़ून में लथ-पथ हो गये साये भी अश्जार के
कितने गहरे वार थे ख़ुशबू की तलवार के
बिल्कुल बंज़र हो गई धरती दिल के दश्त की
रुख़सत कब के हो गये मौसम सारे प्यार के
वैसे मेरी नज़रो में शहरयार मूलत: व्यक्तिगत भावनाओं को बड़ी शिद्दत से उभारने वाले शायर थे जिनमे सभी का दर्द झलकता था. ये काबिलियत इनकी रूह की व्यापकता को दर्शाता है.
बिछड़े लोगों से मुलाक़ात कभी फिर होगी
दिल में उम्मीद तो काफ़ी है यक़ीं कुछ कम है
अब जिधर देखिये लगता है कि इस दुनिया में
कहीं कुछ चीज़ ज़ियादा है कहीं कुछ कम है
शहरयार को मै अपने से जोड़ के देखना चाहू तो शहरयार की यही लाइने मुझे अपने बहुत करीब लगती है.
दुश्मन-दोस्त सभी कहते हैं, बदला नहीं हूँ मैं।
तुझसे बिछड़ के क्यों लगता है, तनहा नहीं हूँ मैं।
उम्र-सफश्र में कब सोचा था, मोड़ ये आयेगा।
दरिया पार खड़ा हूँ गरचे प्यासा नहीं हूँ मैं।
पहले बहुत नादिम था लेकिन आज बहुत खुश हूँ।
दुनिया-राय थी अब तक जैसी वैसा नहीं हूँ मैं।
तेरा लासानी होना तस्लीम किया जाए।
जिसको देखो ये कहता है तुझ-सा नहीं हूँ मैं।
ख्वाबतही कुछ लोग यहाँ पहले भी आये थे।
नींद-सराय तेरा मुसाफिश्र पहला नहीं हूँ मैं।
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शहरयार ने बहुत ही कम फिल्मी गीत लिखे पर जो भी लिखा खूब लिखा. ये आपको “ सीने में जलन” (गमन) और “ जिंदगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है मुझे” (उमराव जान) जैसे गीत सुनने पर एहसास होगा पर इनका लिखा हुआ ” प्यार है अमृत कलश” (त्रिकोण का चौथा कोना) मुझे एक अजीब सी शान्ति प्रदान करता है और ये महसूस कराता है कि मनुष्य सिर्फ अपनी इच्छाओ से ही नहीं वरन ईश्वर की मर्ज़ी से भी संचालित है.
चित्र आभार:
आप यहाँ शहरयार की कुछ अच्छी गज़ले यहाँ पढ़ सकते है : कविता कोष
Valentine’s Day: A Day To Honour Love

To say something about love in confused and distorted times of ours is not an easy task. The generation dependent on money, social networking sites and exhibitionism treats love as some sort of fast food- easy to prepare and quickly consumed. It has no patience to see it blooming in all its colour. No wonder one of my colleagues treats arrival of Valentine’s day as arrival of mating season of dogs.
One of the recent Supreme Court verdicts has made it clear that tendency on part of well educated girls from good families to enter in prostitution is quite alarming. I mean having sex in the guise of love has become one of the easiest mode to attain richness. I cannot avoid quoting such recent trends as it’s necessary to make it clear that with such murkier shades in existence the love with its gentle shades has been pushed to the fringes.
One of the controversial books released shortly that deals with sexual appetite of women suggests once again that love is nothing more than release of chemicals ” dopamine, norepinephrine and phenylethylamine ” and when women fall in love it’s more management of “resource benefits’ and “genetic benefits” than bonhomie with romantic attributes. Now who will dare to love with such sort of horrible revelations? When it’s all biology the heart of lover seems to have become a frog ready to be dissected by the sharp razor in soft hands of lady love!! It’s a tough time for people who are in real love with someone for whom” absence from those we love is self from self – a deadly banishment” (Shakespeare)

Imagine the plight of lover who is in tine with ancient instincts -the idealistic instincts- which perceives his beloved a mean to knock at the door of bliss. When I refer to idealistic sense I am referring to vision which perceives love in its old mode- a gateway to totality. This totality is the result of complete identification with the beloved. To have glimpse of these idealistic portrait one needs to read the short poem by Shelly named ” To Jane”:
The keen stars were twinkling,
And the fair moon was rising among them,
Dear Jane.
The guitar was tinkling,
But the notes were not sweet till you sung them
Again.As the moon’s soft splendour
O’er the faint cold starlight of Heaven
Is thrown,
So your voice most tender
To the strings without soul had then given
Its own.The stars will awaken,
Though the moon sleep a full hour later
To-night;
No leaf will be shaken
Whilst the dews of your melody scatter
Delight.Though the sound overpowers,
Sing again, with your dear voice revealing
A tone
Of some world far from ours,
Where music and moonlight and feeling
Are one.
The poetic beauty attributed to Jane makes her gain timeless appeal. This sublimity is direct result of being in love with greater emotions, which allows one to imbibe unheard emotions, enabling one to carve larger than life portrayal of the lover. This sort of attachment is missing in our times as so called notions of realism have made us away from the realm of purer emotions.

Loving with animal instincts closes the opportunity to trace better perceptions. However, in our times loving the beastly way is normal now and it , in fact, has attained some sort of legitimacy. The story of break-ups, deception, cheating and torture are some of the glorious happenings that one hears whenever love makes its presence felt. By love I mean the romantic relationships which exists between two young hearts. Love has many other variations but it would not be appropriate to discuss them at this point of time as I have not seen that frequently young people buying roses for their parents as spending huge amounts of money on beer and girls on Valentine’s Day.
Well, being incapable of honouring the beastly version of love in our times, I place myself on road to refined love, abandoned by all, which takes me to days when it was easier for the heart to sense the true love often. I am recollecting those days with some classic love songs from bygone days:
1. Kabhi Kabhi Mere Dil Me Khyal Aata Hai
2. Tere Mere Sapne Ab Ek Rang Hai
4. Nothings Gonna To Change My Love For You
6. Tere Dar Pe Chale Aaye Sanam
9. Dheere Dheere Se Meri Zindagi Mein

Pic Credit:
हमे एक धुँध से आना है एक धुँध में जाना है!!!
साहिर मेरे पसंदीदा गीतकार रहे है क्योकि उनके गीतों में कोरा आदर्शवाद नहीं था और ना ही उनमे भटकाव भरी रूमानियत थी . भजन भी उनके कलम से निकलता था तो ऐसा लगता था कि जिंदगी को ही सच मानने वाले ने परम सत्ता से कैसे सम्बन्ध बना लिया ? कहने का मतलब उनके अनुभव का दायरा विशाल था और इस बात को समझना लगभग नामुमकिन है कि कैसे वे विपरीत छोरो पर विचरण कर लेते थे एक वक्त में ही.
अब ये गीत ही देखिये. भारतीय दर्शन की एक जबरदस्त झलक दिखती है इस गीत में. एक प्रोग्रेसिव शायर की कलम से निकला है ये दार्शनिक गीत. है ना ये अजूबा!! ये गीत मुझे बहुत रूहानी सुकून देता है. सच में ये जीवन एक साबुन का बुलबुला है कब ये फूट जाए कोई नहीं कह सकता. कब हम अनंत की यात्रा में निकल जाए इस माया को छोड़कर जिससे हम चिपके रहते है कोई कह नहीं सकता. इसी अनंत की रहस्यमय यात्रा की तरफ इशारा करता है साहिर का ये गीत. ये तो सब जानते है कि इसी अनंत की यात्रा की कहानी है हमारा भारतीय दर्शन.
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संसार की हर शय का इतना ही फ़साना है
गीतकार: साहिर संगीत: रवि चलचित्र: धुंध (1973) आडिओ संस्करण: http://smashits.com/dhund/sansar-ki-har-shae/song-72665.html Pic credit: साहिर
Dealing With A Breakup In Love Relationship Kolaveri Di Way

Kolaveri Di song has attained some sort of celebrity status among the listeners. I wonder how many of you know what exactly Kolaveri Di means? Kolaveri Di means killer rage girl. This song depicts failure in love not in a heart rendering way but in a diametrically opposite funny style. The song has been portrayed as soup song which means a song depicting rejection!!
Once you come to know what the song is trying to convey you would really fall in love with this song. It’s a perfect song in regard to depiction of deep human emotions in a lighter vein. It’s hard to present another example wherein sense of rejection has been conveyed in such a hilarious way !! So please listen this song with refined understanding that even break-ups can be a source of comic relief!!!
Since I have referred to breakups, I would love to point strange habit prevalent in modern day lovers. It’s really amusing that everybody in teen category is eager to be in love with opposite sex. However, one rarely has the right attitude to be in love. I mean despite being devoid of romantic orientations we get engaged in love relationships. Most of us get involved in a relationship in a freaky way. They are seeking something else and not love when they develop a bond with opposite sex in name of love.
I mean they just don’t know why they are in love with someone. In such love relationships the role of attraction, which is generally short termed, attains heightened position. When this attraction fades away or when such attraction is not guided by long term plans or when there is no role of human values the breakup soon becomes a reality.
Strange are man and woman of our planet earth. They have time for nuisance values, for all things they hate like office work. On the other hand, the only thing they have for relationship close to heart is lack of care and casual attitude. The bitter truth is that they never are in love with better values. In fact, modern age lovers lack the guts to be in league with real emotions as building true relationship demands sincerity and purity of emotions-something which hi tech lovers lack. On the other hand, it’s easy for them to maintain fake relationships in name of love as it doesn’t need any effort to maintain them….

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Translation of the Kolaveri D Song:
Yo boys, I am singing song…
Soup song, flop song.
Why this killer rage, killer rage, killer rage, girl?
Why this killer rage, killer rage, killer rage, girl?
Rhythm correct.
Why this killer rage, killer rage, killer rage, girl?
Why this killer rage, killer rage, killer rage, girl?
Maintain please.
Why this killer rage, …, …, girl?
The moon is in the distance, the moon.
Moon’s colour is white.
Night’s background is white, the night,
Night’s colour is black.
Why this killer rage, killer rage, killer rage, girl?
Why this killer rage, killer rage, killer rage, girl?
She’s a fair-skinned girl, girl,
Girl’s heart is black,
Her eyes and my eyes met,
My future is now dark.
Why this killer rage, killer rage, killer rage, girl?
Why this killer rage, killer rage, killer rage, girl?
Buddy, take notes, and take the saxophone in your hand.
“pa pa paan pa pa paan pa pa paa pa pa paan”
Play it right.
Super, buddy!
Ready? Ready? 1… 2… 3… 4…
Whoa, what a difference buddy!
Alright buddy, now tune changes…
“Kaila” glass…
Only English, eh!
Glass in hand, Scotch in glass,
Tears in eyes, Life’s empty,
Girl shows up,
Life’s going downhill.
Love, love, oh my love,
You stood me up.
Cow, cow, holy cow,
I want you here now!
God, I’m dying now,
But she’s happy, how?
We don’t have a choice.
Why this killer rage, killer rage, killer rage, girl?
Why this killer rage, killer rage, killer rage, girl?
Why this killer rage, killer rage, killer rage, girl?
Why this killer rage, killer rage, killer rage, girl?
Translation source: Kolaveri Di Meaning
जगजीत सिंह: तुम चले गए तो गुमसुम सा ये जहाँ है !!!
“अब यादों के कांटे इस दिल में चुभते हैं
ना दर्द ठहरता है ना आँसूं रुकते हैं” .
इस वक्त जगजीत सिंह के सुननेवालो और चाहनेवालो का यही हाल होगा. सबको अपने गीतों, ग़ज़लों और भजनों से एक रूहानी शान्ति प्रदान करने वाले की आत्मा आज खुद इंसानी चोला छोड़कर परम शान्ति में विलीन हो गयी. इस सत्य से हम सब परिचित है कि एक दिन हम सबको जाना है पर सब के दिलो पे राज करने वाले का यूँ चले जाना तकलीफ देता है. कोई जड़ भरत की तरह इतना निर्लिप्त तो नहीं रह सकता ना कि कोई अपना चला जाए और आप की आँख से दो आंसू भी ना गिरे. गुलज़ार जी कहना बिल्कुल सही है कि “जगजीत का जाना, एक पूरी दुनिया का उठ जाना है इक पूरे दौर का उठ जाना है .” उनके चले जाने के बाद जिस रिक्तता का अनुभव हम सब को हो रहा है उसकी पूर्ती करना आसान नहीं.
जगजीत सिंह ने जब गायकी की दुनिया में प्रवेश किया तो उनको भी उन्ही मुसीबतों का सामना करना पड़ा जो हर एक सच्चे कला के पुजारी के सामने आ खड़ी होती है. नाकामी और असफलताओ से खिन्न आकर वे अपने घर जालंधर को लौट आये मुंबई से जहा पे वे उस वक्त पढ़ते थे और एक प्रोफेशनल गायक के तौर पे रेडिओ से जुड़े भी थे. पर किस्मत ने इनके लिए कुछ और ही सोच रखा था. कुछ अंतराल के बाद ये फिर मुंबई लौटे और एच एम वी के साथ कुछ एक दो गाने रिकार्ड कराने के बाद इसी कंपनी द्वारा इनका पहला एल पी ”द अनफ़ोरगैटेबल्स ” ( The Unforgettables) निकला. इसके बाद जगजीत ने पीछे मुड़ के नहीं देखा और मौत के पहले तक इतना काम किया कि गुलज़ार ने अपनी श्रद्धांजली में इस बात को महसूस किया कि शायद जगजीत सिंह ने अपने शरीर को आराम नहीं दिया.
जगजीत सिंह काफी सचेत रहते थे और इसलिए वे काफी बेबाक भी थे. उन्होंने एक विदेशी चैनल को दिए साक्षात्कार में इस बात को साफ़ साफ़ कहा कि ग़ज़ल गायिकी का स्तर भारत और अन्य जगह काफी गिर रहा है और जिस तरह से हर माध्यम से घटिया चीज़ संगीत के नाम पे बांटी जा रही है उससें समझ में आता है कि कुछ ना कुछ गलत तो है ज़रूर. वे आजकल के संगीत को शोर मानते थे. यही वजह है कि ऐ आर रहमान के यांत्रिक संगीत की उन्होंने साफ़ तौर पे आलोचना की. और ये सच भी है कि आइटम नंबर के दौर में कम्पूटर आधारित संगीत बिल्कुल टीन कनस्तर पीटने के समान हो गया है. संगीत की आत्मा लगता है इस लोक से निकलकर दूसरे लोक में चली गयी है..
चलते चलते अपने अंतर्मन में दबी गहरी संवेदनाओ को उभारना चाहूँगा जिसको निखारने में जगजीत सिंह की गज़लों ने उत्प्रेरक का काम किया. जगजीत सिंह की गज़ले सम्पूर्ण जीवन दर्शन को अच्छी तरह से परिभाषित करती है. बचपन से शुरू करे तो क्या आपको लगता है “ वो कागज़ की कश्ती” से भी बेहतर कोई संगीतमय रचना हो सकती है जो बचपन को इतना यादगार बनाती हो ? ये रचना देखी जाये तो अलग से मील का पत्थर है. यौवन काल की तरफ बढे तो उस दौर को याद करे जब हम प्रेम के पहले अहसास को महसूस करते है और उसे प्रेम पत्र के रूप में उभारते है तो क्या हमको ये ग़ज़ल नहीं याद आती “प्रेम का पहला ख़त लिखने में वक्त तो लगता है ” या ये बात नहीं याद आती “ तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है ” . दोस्ती के ही बदले हुए स्वरूप को हम याद करे तो क्या इस ग़ज़ल में जो सीख है उसकी हम उपेक्षा कर सकते है “दोस्ती जब किसी से की जाये, दुश्मनों की भी राय ली जाये” ..और जब ये दोस्ती टूट जाए तो क्या हम ये ग़ज़ल नहीं गुनगुनाते : “ तुमने दिल की बात कह दी ये बड़ा अच्छा किया, हम तुम्हे अपना समझते थे बड़ा धोखा हुआ“.
जीवन में जब हम और आगे बढ़ते है और जीवन की कडुवी सच्चाइयो से आमना सामना होने पर हमारे सपने टूट कर बिखरते है तो क्या हम ये नहीं महसूस करते “ दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है मिल जाये तो मिट्टी है खो जाये तो सोना है ” और फिर यही एहसास हमारे साथ रह जाता है “ शायद मै ज़िन्दगी की सहर लेके आ गया…अंजाम ये के गर्दे सफ़र ले के आ गया“. इन आत्माओ के संपर्क में रहने से ही शायद मै आज कह पाने में सक्षम हूँ ”बदला ना अपने आपको जो थे वोही रहे“
इस बहुत भली सी आत्मा को मेरी भावभीनी श्रद्धांजलि ..आपके लिए जगजीतजी इस वक्त मेरे मन में कुछ और नहीं बस आपकी यही ग़ज़ल कबसे गूँज रही है : “ सदमा तो है मुझे भी कि तुझसे जुदा हूँ मै“
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इसमें मैंने बहुत सी ग़ज़लों का जिक्र किया है. ये सब तो मेरे दिल के करीब है पर ये रहे कुछ और ग़ज़ल /भजन जो मुझे बहुत पसंद है.
१. या तो मिट जाइए या मिटा दीजिये
८. जय राधा माधव
९. तुम ढूंढो मुझे गोपाल
१०. अँखियाँ हरी दर्शन की प्यासी
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