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My Recent Write-Ups Which Appeared In Blogosphere As Well As In Mainstream Media!

It’s quite a strenuous affair to be sandwiched between demands of social media and mainstream media. Both the mediums in our times have attained new heights. However, it’s a great accomplishment if a writer/journalist is getting sufficient space in both the mediums at the same time. Fortunately, my writings managed to appear in mainstream publications without much canvassing on my part. I never had to heed to confrontational attitude to convince the editors from mainstream media to understand the relevance of writings which had first appeared in virtual world. 

That’s because before I moved to virtual world I had already found space as Writer/Contributor/Freelancer/Letter Columnist in all leading national and International publications which include Time, Newsweek, The Hindu, The Telegraph, The Statesman, The Times of India, The Hindustan Times, India Today, Outlook, The Week, Harmony, The Sunday Indian, Hardnews, Critique, Tehelka, Northern India Patrika and Soham, to name a few. Today when I have primarily got confined to virtual space, the write-ups still appear in Northern India Patrika- a leading newspaper published from Allahabad. It’s one of the oldest newspapers published in India, being sister publication of now defunct Amrit Bazar Patrika (Kolkata) which had started in 1868.

Recent write-ups which appeared in mainstream media:

1.  Vishal Bhardwaj: A Genuine Music Composer In Times When Indian Music Directors Have Become Copycats

Appeared in Media Musings Column of Northern India Patrika On December 08, 2014.

Appeared in Media Musings Column of Northern India Patrika On December 08, 2013.

2. Unleashing Magic Of “Triple S” Of Indian Cinema: Sahir Ludhianvi, Shakeel Badayuni and Shailendra!

Appeared in Media Musings Column of Northern India Patrika On December 22, 2013

Appeared in Media Musings Column of Northern India Patrika On December 22, 2013

3. Rape Allegation That Led To Suicide of Kurshid Anwar: A Resounding Slap On The Face Of Media!

Appeared in Northern India Patrika's Editorial Column On January 07, 2014.

Appeared in Northern India Patrika’s Editorial Column On January 07, 2014.

4. Swami Vivekananda: A Spiritual Powerhouse Who Really Understood The Potential Of Youths!

Appeared in Northern India Patrika's Editorial Column On January 18, 2014.

Appeared in Northern India Patrika’s Editorial Column On January 18, 2014.

5.  News Item Related With Speech I Gave In Allahabad On January 12, 2014, At Jagat Taran Girls Degree College.

News Related With Speech I Delivered As A Guest Speaker In An Event Organized At Jagat Taran Girls Degree College To Celebrate The Birth Anniversary Of Swami Vivekananda. It's The Same Venue  Where Couple Of Days Back President Of India Pranab Mukherjee Addressed The Gathering Of Students!

News Related With Speech I Delivered As A Guest Speaker In An Event Organized At Jagat Taran Girls Degree College To Celebrate The Birth Anniversary Of Swami Vivekananda. It’s The Same Venue Where Couple Of Days Back President Of India Pranab Mukherjee Addressed The Gathering Of Students! This News Item Appeared In Northern India Patrika On January 13, 2014.

5. The Times Of India’s News Coverage

The Times Of India News Item Related With Speech I Delivered.

The Times Of India News Item Related With Speech I Delivered. This News Item Appeared On January 21,2014

6. That’s Myself Giving Speech At Jagat Taran Girls Degree College On January 12, 2014.

Giving Speech In Allahabad Is A Great Feeling. After All, It's A Place Associated With Great Thinkers, Intellectuals And Writers!  I Gave The Speech At Jagat Taran Girls Degree College On January12, 2014. That's The Same Venue Where President Of India Pranab Mukherjee Also Delivered The Speech Some Days Back.

Giving Speech In Allahabad Is A Great Feeling. After All, It’s A Place Associated With Great Thinkers, Intellectuals And Writers! I Gave The Speech At Jagat Taran Girls Degree College On January12, 2014. That’s The Same Venue Where President Of India Pranab Mukherjee Also Delivered A  Speech Some Days Back.

 

 

 

खुर्शीद अनवर की आत्महत्या: समाज, कानून और मीडिया के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा!

गम्भीर मुद्दा ये है कि सतही मीडिया ट्रायल के चलते जिस भीषण मानसिक कष्ट से गुजरना होता है और जो सरेआम अपमान सहन करना पड़ता है क्या उसका कोई अस्तित्व नहीं? क्या इसका कोई मोल नहीं? क्या ये बिलकुल उपेक्षित कर देने वाली बात है?

गम्भीर मुद्दा ये है कि सतही मीडिया ट्रायल के चलते जिस भीषण मानसिक कष्ट से गुजरना होता है और जो सरेआम अपमान सहन करना पड़ता है क्या उसका कोई अस्तित्व नहीं? क्या इसका कोई मोल नहीं? क्या ये बिलकुल उपेक्षित कर देने वाली बात है?


खुर्शीद अनवर की आत्महत्या कई गम्भीर सवाल खड़े कर गयी आज के समाज के बारे में, पत्रकारिता के स्तर के बारे में और कानून के उपयोग और दुरुपयोग के सन्दर्भ में. खुर्शीद अनवर एक प्रसिद्ध सामजिक कार्यकर्ता थें जो नई दिल्ली में इंस्टिट्यूट फॉर सोशल डेमोक्रेसी नाम की संस्था चलाते थें. इसके अलावा वे जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय के छात्र भी थें. खुर्शीद अनवर ने पिछले साल १८ दिसम्बर २०१३ को आत्महत्या कर ली थी जब उनपे एक मणिपुरी औरत ने  अपने साथ दुष्कर्म का आरोप लगाया था. ये खबर कुछ एक समाचार चैनलों पर प्रमुखता से दिखायी गयी और इसके बाद सोशल नेटवर्किंग साईटस पर अंतहीन बहस छिड़ गयी. पहले तो खुर्शीद इस आरोप से हिल गए और इसके बाद मीडिया चैनलो द्वारा कीचड़ उछालने के बाद सदमे से ग्रस्त खुर्शीद ने आत्महत्या कर ली. बाद में उनके पास से बरामद सुसाइड नोट में इस बात का उल्लेख था कि मणिपुरी लड़की के साथ उन्होंने बलात्कार नहीं किया था बल्कि आपसी सहमति से शारीरिक सम्बन्ध बनाये थे.

इस घटना ने मुझे श्रीनिवास सिरास के आत्महत्या की याद दिला दी जो प्रोफेसर थे अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में. इस प्रकरण में न्यूज़ चैनलो नें इस प्रोफेसर के निजता के साथ खिलवाड़ किया था और उनकी गोपनीयता को सरेआम उजागर करके उनके समलैंगिक सम्बन्धो को विकृत स्वरूप दे दिया था. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस प्रकरण में सुनवाई करते हुए प्रोफेसर को थोड़ी राहत प्रदान की थी पर मीडिया चैनलो द्वारा की गयी गुस्ताखी उन पर भारी पड़ गयी और उन्होंने आत्महत्या कर लिया. कोर्ट इस तरह के मीडिया ट्रायल पर अक्सर चेतावनी देती रही है पूर्व में कि न्यूज़ चैनल जब केस ट्रायल स्टेज में हो तो किसी भी निष्कर्ष पर अपनी तरफ से पहुचने की हड़बड़ी ना दिखाए और न्यायालय की कार्यवाही को प्रभावित करने की कोशिश ना करे लेकिन बड़े कॉर्पोरेट संस्थानो द्वारा संचालित ये न्यूज़ चैनल न्यायालय के द्वारा इन पारित आदेश को सिर्फ कागज़ का एक टुकड़ा समझते है और उन्हें किसी प्रकरण में निहित संवेदनशीलता से कुछ नहीं लेना देना होता सिवाय इसके कि उसका माखौल किस तरह उड़ाया जाए. ये सही है मीडिया ट्रायल एक जटिल मुद्दा है लेकिन उससे बड़ा सच ये है कि सनसनीखेज मीडिया ट्रायल के चलते किसी के इज्जत और उसके आत्मसम्मान के साथ जो खिलवाड़ होता है और इससे जो अपूर्णीय क्षति होती है उसकी भरपाई असंभव होती है. मीडिया  किसी दोषी व्यक्ति के अधिकारो के हमेशा अतिक्रमण करती आयी है और समय आ गया है कि सही तथ्यात्मक रिपोर्टिंग और रिपोर्टिंग जो गलत इरादो से की गय़ी हो सिर्फ न्यूज़ चैनल के टी आर पी या फिर अखबार की बिक्री बढ़ाने के उद्देश्य से की गयी हो दोनों में एक स्पष्ट रेखा का निर्धारण हो.

“सनसनीखेज रिपोर्टिंग तो हमेशा होगी क्योकि सनसनीखेज घटनाये भारत में हमेशा रहती है. सुप्रीम कोर्ट इस पर लगाम लगाने में असमर्थ है. ये सही है कि रिपोर्टिंग सही होनी चाहिए पर इसका ये मतलब निकालना कि ये मीडिया के द्वारा ट्रायल है एक निन्दात्मक अभिव्यक्ति है. कोर्ट या किसी के पास कोई स्पष्ट मापदंड नहीं है जो ये निर्धारित कर सके कि मीडिया ट्रायल क्या होता है.” (सीनियर अधिवक्ता राजीव धवन, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया). खैर इस बात से इंकार करना असम्भव है कि मीडिया के द्वारा किसी भी दोषी व्यक्ति के अधिकारो का हनन और किसी के भी निजता के साथ खिलवाड़ करने के कृत्य का अपने तरफ से दूषित स्पष्टीकरण कोई भी मतलब नहीं रखता। ये सिर्फ एक व्यर्थ का  प्रलाप होता है, बेवजह अपने को सही ठहराना होता है. उसकी स्पष्टीकरण से उस अपूर्णीय क्षति की भरपाई असम्भव है जो इस वजह से होती है. इन दोनों प्रकरणो में दो व्यक्ति ने अपनी जान ले ली इस वजह से और अब हम ये कभी नहीं जान पाएंगे कि सच्चाई क्या थी. क्या ये दो जाने वापस मिल जाएंगी? क्या खोया सम्मान वापस मिलेगा? शायद कभी नहीं।

वरिष्ठ पत्रकार सईद नक़वी शायद सच के ज्यादा करीब है जब ये कहते है कि “पत्रकारिता में शायद निष्कर्षो पर पहुचने की हड़बड़ी है. ये उसी दिन किसी को मुजरिम ठहरा देता है जिस दिन किसी पे आरोप लगते है, इसके पहले कि कोर्ट किसी बात का निर्धारण करे. ये बहुत दुखी कर देने वाली बात है. कैसे मीडिया इतनी जल्दीबाज़ी में किसी निष्कर्ष पर पहुच सकती है और किसी को इतनी हड़बड़ी में दोषी करार दे सकती है? मीडिया को इस बात का इन्तजार करना चाहिए कि कम से कम प्राथमिक रिपोर्ट तो दर्ज हो, कम से कम जांच तो पूरी हो जाए” (डी एन ए न्यूज़ रिपोर्ट) ये बिलकुल चकित कर देने वाली बात है कि मीडिया कभी भी इस तरह के सनसनीखेज मीडिया ट्रायल के दौरान अपूर्णीय क्षति और इनके अंजामो के बारे में कभी भी ईमानदारी से आकलन नहीं करती. गम्भीर मुद्दा ये है कि सतही मीडिया ट्रायल के चलते जिस भीषण मानसिक कष्ट से गुजरना होता है और जो सरेआम अपमान सहन करना पड़ता है क्या उसका कोई अस्तित्व नहीं? क्या इसका कोई मोल नहीं? क्या ये बिलकुल उपेक्षित कर देने वाली बात है? ये बिलकुल स्पष्ट है कि मीडिया ट्रायल अधिकतर एकतरफा, भ्रामक और तथ्यो के साथ खिलवाड़ होता है जिसमे इस बात की बिलकुल परवाह नहीं की जाती कि कम से कम तथ्यो के असलियत का तो निर्धारण कर लिया जाए सूक्ष्मता से.

इस पूरे प्रकरण में दो बहुत गम्भीर पहलू शामिल है. पहला तो ये कि ये समाज के इस विकृत बदलाव को दर्शाता है कि समाज में हड़बड़ी में निष्कर्षो पर पहुचने की लत लग गयी है अधकचरे दिमाग के साथ. इसे चाहे वो प्रशंसा  हो या फिर आलोचना दोनों को बिना किसी आधार के आत्मसात करने की आदत सी हो गयी है. ना आलोचना का स्तर विकसित हो पाया और ना ही प्रशंसा के आयाम निर्धारित हो पाये. आलोचना अगर हो रही है तो तो वो भी तब जब कि कोई भी तथ्यात्मक या तार्किक आधार आलोचना के पक्ष में मौजूद नहीं है. दूसरा पक्ष ये है कि जिन कानूनो को स्त्री की अस्मिता की रक्षा करने के लिए बनाया गया है वे अब निर्दोष लोगो को प्रताड़ित करने का अस्त्र बन गए है. ये कितने तकलीफ की बात है कि जहा किसी स्त्री के सेक्सुअल हरस्मेंट का मामला उभरता है वही पे समाज का एकपक्षीय भेदभाव ग्रस्त दिमाग उभर कर सामने आ जाता है और मीडिया हमेशा की तरह दोषी के ऊपर हर तरह का लांछन जड़ देता है और इसके पहले वो अपने बेगुनाही को साबित करे वो मुजरिम साबित करार कर दिया जाता है. ये सर्वविदित है कि जो नए कानून की परिभाषा है सेक्सुअल हरस्मेंट को रोकने कि उसके प्रावधान इस तरह के है कि आप तकरीबन मुजरिम ही है और इस बात को गौण कर दिया गया है कि आप के पास भी बचाव के सही रास्ते होने चाहिए. और सबसे घातक ये है कि एकतरफा मीडिया ट्रायल शुरू हो जाने के बाद जो उसके पास अपने को बचाने के जो रास्ते होते है वे भी बंद हो जाते है क्योकि मीडिया आपके विपक्ष में माहौल खड़ा कर देता है हर तरफ.

“भारत में और अन्य देशो में जहा इस तरह के कानून पास हुए है औरतो के साथ होने वाले अपराधो को रोकने के लिए उसमे बर्डेन ऑफ़ प्रूफ को सुनियोजित तरीके से बदल दिया गया है. अब दोषी के ऊपर ये जिम्मा है कि वे अपनी निर्दोषता साबित करे. ये परिवर्तन निहित रूप से बहुत गलत है पर शायद ये इसलिए किया गया है कि ताकि इन प्रकार के अपराधो में स्त्री के पास सामान स्तर के अवसर हो अपने साथ हुए अन्याय के भरपाई के लिए. लेकिन जो अब नए कानून बने है सेक्सुअल हरस्मेंट रोकने के लिए उसमे ये बर्डन ऑफ़ प्रूफ इस सख्त स्वरूप में है कि जहा दोषी (पुरुष) के पास बचाव के सारे रास्ते बंद हो जाते है. अगर एक बार आप पर आरोप लगे तो इस बात की सम्भावना कम है कि आप अपने को निर्दोष साबित कर सके या आपको बेहद मशक्कत के बाद ही कोई रास्ता दिखायी पड़े. ये शायद नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत के विपरीत है.” (वरिष्ठ पत्रकार प्रेम शंकर झा, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया)

संक्षेप में समाज और मीडिया दोनों का स्तर रसातल में चला गया है क्योकि ये दोनों भावनाओ के प्रवाह में बहने के आदी हो गए है और इन दोनों को तथ्यो और तार्किक सोच से कुछ लेना देना नहीं रह गया है. दोनों को इस विकृत खेल में रस आने लगा है जहा किसी निर्दोष के भावनाओ के साथ खिलवाड़ होता है, उसके आत्मसम्मान के जब टुकड़े टुकड़े किये जाते है. लेकिन खेद कि बात ये है कि न्याय परंपरा/व्यवस्था भी इसी विकृत रस का शिकार हो गयी है, इन्ही घातक प्रवित्तियों का शिकार सा हो गयी है, खासकर उन मामलो में जहा स्त्रियों से जुड़े अपराधो के निष्पक्ष अवलोकन की बात आती है. खैर सब की जिम्मेदारी बनती है कि  भावनात्मक प्रवाह में बह कर लिए गए निर्णयो के बजाय सोच समझकर तार्किक रूप से लिए गए निर्णयो को प्राथमिकता दी जाए. ये बहुत आवश्यक हो गया है समाज के बिखराव को रोकने के लिए, एक मूल्य आधारित समाज के निर्माण के लिए.

पाठक इस लेख का अंग्रेजी संस्करण यहाँ पढ़े:

Rape Allegation That Led To Suicide of Kurshid Anwar: A Resounding Slap On The Face Of Media!

खुर्शीद अनवर की आत्महत्या: समाज, कानून और मीडिया के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा

खुर्शीद अनवर की आत्महत्या: समाज, कानून और मीडिया के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा

References:

Activist Khurshid Anwar’s suicide: Was media trial responsible?

AMU’s ‘gay’ prof commits suicide

Guilty If Charged

Dainik Bhasker

 

पिक्स क्रेडिट:

तस्वीर प्रथम 

तस्वीर दो

Rape Allegation That Led To Suicide of Kurshid Anwar: A Resounding Slap On The Face Of Media!

 

Can Deaths Caused By Vain Media Trials Be Reversed?

Can Deaths Caused By Vain Media Trials Be Reversed?

 (Also Appeared in Northern India Patrika On January 07, 2014)

The suicide by a prominent social activist Khursid Anwar, executive director of NGO Institute for Social Democracy and also a JNU scholar, has given rise to some pretty disturbing questions. Khurshid Anwar allegedly committed suicide in the aftermath of rape allegation by a Manipuri lady. This news got flashed on several news channels, followed by intense discussion on several social media networking websites including Facebook. Unable to bear this unwarranted media trial, this well known social activist committed suicide by jumping from his third floor residence in Vasant Kunj, New Delhi, on December 18, 2013. As per suicide note found at his home it was not a rape but consensual sex.

This tragic incident reminds me of suicide committed by Sriniwas Siras, who happened to be a professor at Aligarh Muslim University. In this particular case, news channels were found guilty of invading his privacy by making public his homosexual affair in blown out of proportion way. The professor was granted relief by the Allahabad High Court, but he was not able to cope up with harassment in the form of bizarre media coverage. That made him to end his life. Of late, courts have regularly come up with strict reminders for media channels not to indulge in media trials when the case is in its trial phase. However, influential media houses have always adopted care-a-damn, leading to mockery of the sensitivity involved in any issue under trial. It’s true that need to control media trial remains a complicated issue but it’s an undisputed fact that there is no dearth of cases, wherein sensational media trial caused irreparable damage to one’s reputation. The media has always taken for granted “rights of the accused” and it’s high time to make clear demarcation between accurate reporting and reporting done with malicious intent to increase the sale or ensure high TRP ratings.

“Sensational reporting will take place because sensational incidents keep happening in India. The Supreme Court will not be able to stop it. Yes, reporting must be accurate. But to say it amounted to trial by media is only a pejorative expression. Neither the court nor any one has provided parameters to define what constitutes trial by media.” (Senior Advocate Rajeev Dhavan in The Times of India) However, media’s pervert justification of its breach of privacy and rights of accused would never be enough to clear the huge mess caused by its unwanted intervention. Two lives of reputed individuals came to meet untimely end because of media trial. Can it bring them back to life? Can it restore the loss of reputation?

 In fact, senior journalist Saeed Naqvi  has framed a perfect perspective regarding media trail: ” There is a tendency in journalism – it convicts a person on the day allegation is leveled against him, even before the court convicts him. That is sad. How can media reach a conclusion so quickly and start showing one as an accused? At least, it should wait for lodging of an FIR, completion of investigation” (DNA News Report) It’s really amazing that media always never takes into account serious repercussions involved in unfair trial. Is “mental trauma and public humiliation” in the wake of seriously flawed  “media trial” is thing of lesser concern? It’s so evident in media trials that reporting is misleading and one-sided with scant respect for cross-checking of the facts.

 This whole issue involves two other serious concerns. The first one brings to the fore love of the society to reach at conclusions in one go with a prejudiced mindset. It loves to criticize or, for that matter, endorse any issue even if there are no concrete material evidence to support its beliefs. The other aspect involves abuse of laws meant to protect sexual harassment of women. It’s simply not an issue pertaining to rights of men that laws meant to protect women have lead to harassment of innocent men. It’s so pathetic that moment an issue  involving sexual harassment of women gets highlighted, the media enters in caricature of the accused, portraying him guilty. Worse, if you analyze the laws meant to prevent sexual harassment of women, it’s evident that men are virtually assumed to be guilty. Tragically, the attempt of the accused to prove himself innocent becomes further bleak in wake of such pervert media trials.

 “The disconcerting answer is that it will not matter. In India, and several other countries where laws have been passed to punish crimes against women, the burden of proof has been consciously reversed: it is the accused who has to prove his innocence. This reversal is bad in principle, but probably necessary to create a level playing field for women in cases pertaining to sex crimes. But the new rape law has carried the reversal to a point where, if implemented as drafted, it will defeat the very purpose of justice . For once a man is accused, it leaves him with no way whatever of proving his innocence.” (Senior Journalist Prem Shankar Jha in The Times Of India)
 
In nutshell, both society and media have lost the ability to be governed by reason and logic. Both of them have given way to pervert pleasure of playing havoc with the dignity and reputation of individuals. However, it’s baffling that even legal jurisprudence appears to have adopted same line of action, more so in cases involving sexual harassment of women. It’s time for everybody to upheld logical thinking over thinking governed by rash emotions. That’s essential to stop the fragmentation of society, to create a value-oriented society.

Khurshid Anwar: Another Victim Of Media Trial!!

Khurshid Anwar: Another Victim Of Media Trial!!

 
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हिंदी पत्रकारिता की धज्जिया उड़ाते आजकल के सबसे ज्यादा बिकने वाले हिंदी के समाचार पत्र!!

 हिंदी के पत्रकार और सम्पादक ना सीखना चाहते है और ना ही सीखने की तमीज रखते है.

हिंदी के पत्रकार और सम्पादक ना सीखना चाहते है और ना ही सीखने की तमीज रखते है.



हिंदी पत्रकारिता की धज्जिया उड़ाने वाले कोई और नहीं हिंदी के तथाकथित पत्रकार खुद है. ये पत्रकारिता नहीं मठाधीशी करते है. कम से कम उत्तर भारत के सबसे ज्यादा बिकने वाले एक प्रसिद्ध हिंदी दैनिक के कार्यालय में जाने पर तो यही अनुभव हुआ. अखबार देखिये तो लगता है खबर के बीच विज्ञापन नहीं बल्कि विज्ञापन के बीच खबर छप रही है. उसके बाद भाषा का स्तर देखिये वही हिंग्लिश या फिर सतही हिंदी का प्रदर्शन. और करेला जैसे नीम चढ़ा वैसी ही बकवास खबरे. मसलन बराक ओबामा को भी अपनी पत्नी से डर लगता है! इस खबर इस समाचार पत्र ने फोटो सहित प्रमुखता से छापा पर अगर इस अखबार के लोगो को पुरुष उत्पीडन जैसी  गंभीर बात को जगह देने की समझ नहीं। इसकी सारगर्भिता को समझाना उनके लिए उतना ही कठिन हो जाता है जैसे किसी बिना पढ़े लिखे आदमी को आइंस्टीन के सूत्र समझाना। बिना पढ़े लिखे आदमी को भी बात समझाई जा सकती है अगर वो कम से कम सुनने को तैयार हो मगर वो ऐसी बात सुनकर मरकही गाय की तरह दुलत्ती मारने लगे तब? हिंदी पत्रकारिता आजकल ऐसे ही लोग कर रहे है. 

हिंदी पत्रकारिता का जब इस देश में उदय हुआ था तो उसने इस देश के आज़ादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. उस युग के सभी प्रमुख क्रांतिकारियों के अपने समाचार पत्र थें. लेकिन आज के परिदृश्य में ये पूंजीपतियों के हाथो में सबसे बड़ा अस्त्र है अपने प्रोडक्ट को बेचने का, राजनैतिक रूप से अपने विरोधियो को चित्त करने का. सम्पादकीय आजकल प्रभावित होकर लिखे जा रहे है. हिंदी समाचार पत्र में छपने वाले समाचार खबरों के निष्पक्ष आकलन के बजाय अंग्रेजी अखबारों के खबरों का सतही अनुवाद भर है. मै जिस  उत्तर भारत के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले प्रसिद्ध समाचार पत्र की बात कर रहा हूँ वो अपने को सांस्कृतिक विचारो के प्रभाव को दिशा देने वाला समझता है लेकिन अपने अखबार के मिनी संस्करण के पन्नो पर विकृत हिंदी में (माने कि हिंग्लिश) में सबसे कूड़ा खबरे और वो भी “ऑय कैंडी” के सहारे बेचता है. “आय कैंडी” आखिर भारी विरोध के वजह से गायब तो हुआ पर जाते जाते बाज़ार में टिके रहने की समझ दे गया! 

बाज़ार में बने रहने का गुर इस्तेमाल करना गलत नहीं है लेकिन इसका ये मतलब ये नहीं है कि आप खबरों के सही विश्लेषण करने की कला को तिलांजलि दे दें. लेकिन हकीकत यही है. हिंदी के पत्रकार और सम्पादक ना सीखना चाहते है और ना ही सीखने की तमीज रखते है. कुएं के मेढंक बने रहना इन्हें सुहाता है. अगर यकीन ना हो तो किसी हिंदी के अखबार के दफ्तर में जाके देख लें. खासकर उत्तर भारत के सबसे ज्यादा बिकने वाले हिंदी के अखबार के दफ्तर में तो जरूर जाए. वहा आपको खुले दिमागों के बजाय दंभ से चूर बंद दिमाग आपको मिलेंगे। क्या ये दिमाग सच को उभारेंगे? समाज को बदलेंगे? 

 ये पूंजीपतियों के हाथो में सबसे बड़ा अस्त्र है अपने प्रोडक्ट को बेचने का, राजनैतिक रूप से अपने विरोधियो को चित्त करने का. सम्पादकीय आजकल प्रभावित होकर लिखे जा रहे है.

ये पूंजीपतियों के हाथो में सबसे बड़ा अस्त्र है अपने प्रोडक्ट को बेचने का, राजनैतिक रूप से अपने विरोधियो को चित्त करने का. सम्पादकीय आजकल प्रभावित होकर लिखे जा रहे है.

पिक्स क्रेडिट: 

तस्वीर 1  

तस्वीर 2 

गुजरात के दंगो का सच: वो बाते जो सेक्युलर मीडिया नहीं बताता है या तोड़ मरोड़कर कर पेश करता है!

क्यों सेक्युलर मीडिया इस आदमी की तस्वीर का गलत इस्तेमाल करके इसका जीवन नर्क सामान बना दे रहे है?

क्यों सेक्युलर मीडिया इस आदमी की तस्वीर का गलत इस्तेमाल करके इसका जीवन नर्क सामान बना दे रहे है?


गुजरात की बात होती है तो 2002 के दंगो का जिक्र अवश्य होता है। खासकर अगर सेक्युलर मीडिया गुजरात के बारे में कुछ कह रहा हो तो। जब भी मै सेक्युलर मीडिया द्वारा प्रायोजित इन चर्चाओ को सुनता हूँ तो इस उम्मीद में कि कभी इन सेक्युलर प्रवक्ताओ की आत्मा जागेगी और ये सच बोलेंगे। लेकिन ये लकीर के फकीर जड़ मानसिकता से लैस लोग सिवाय झूठ और अर्धसत्य के कुछ नहीं बताते। असल में इनका अस्तित्व ही झूठ की बुनियाद पे खड़ा है सो सच बोलना इनके लिए आत्मघाती सरीखा सा कदम हो जाता है। इसलिए 24 प्रतिशत हिन्दू जो मारे गए इन दंगो में इनके बारे में जिक्र करना ये कभी जरूरी नहीं समझते। 

यहाँ पे मै कुछ बाते रख रहा हूँ जो मेरी बात बिलकुल नहीं है। ये बाते किसी चर्चा में मीनाक्षी लेखी ने रखी, जो  भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता है। मुझे उनकी बाते सारगर्भित लगी। कम शब्दों में उन्होंने सेक्युलर झूठ को तार तार करने की एक सफल कोशिश की है। मै उनकी बातो को ठीक वैसा ही रख रहा हूँ जैसा कि उन्होंने चर्चा में व्यक्त किया। इसके लिए मै आभारी हूँ अपने सोशल मीडिया के मित्रो का जिन्होंने मुझे इन तथ्यों से परिचित कराने में मदद की।

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1. एक अंसारी नाम  का मुस्लिम युवक जो पुलिस के सामने हाथ जोड़ रहा था,उसकी हाथ जोड़ते हुए की फोटो को  मीडिया वालो ने ऐसे प्रसारित किया जैसे वो पुलिस से अपनी जान बख्श देने की भीख मांग रहा हो जबकि वो युवक अपनी जान बचाने के लिए पुलिस का हाथ जोड़ कर धन्यवाद कर रहा था.
 

2.  गोधरा में ट्रेन में आग लगाने वाले कांग्रेस के मुस्लिम कार्यकर्ता थे पर मैं उनको मुस्लिम कम और कांग्रेसी कार्यकर्ता ज्यादा मानती हूँ.

3.  जिस तीस्ता सीतलवाड़ को लेकर आप मीडिया वाले मोदी जी पे कीचड़ उछालते हैं उसने गुलबर्ग सोसायटी से खूब माल बनाया है और इस बात को लेकर उसके ऊपर हाईकोर्ट में केस चल रहा है ये बात आप मीडिया वाले क्यों नही बताते हैं?

4.  भारत में अब तक जितने भी दंगे हुए हैं और दंगो के बाद सरकारों ने जो भी कदम उठाये हैं और गुजरात के दंगो के बाद मोदी जी ने जो कदम उठाये उनकी तुलना आप अपने मापदंडो पे करके देश को सच बताये की किस सरकार ने दंगों से निबटने के लिए सबसे ज्यादा प्रभावशाली कदम उठाये थे?

5.  1969 के गुजरात दंगो; 1984 के सिख दंगो; 1986, 1992 के मुंबई दंगो; मुरादाबाद के दंगो; बिहार के दंगो; गोपालगड, राजस्थान में हुए दंगो और अभी असम में हुए दंगो के लिए कौन सी पार्टी जिमेदार है?

साभार:  मीनाक्षी लेखी, राष्ट्रीय प्रवक्ता, भारतीय जनता पार्टी।

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और क्या सेक्युलर मीडिया ने अंसारी के बारे में इस खबर को भी उजागर किया? और अगर नहीं किया तो क्यों नहीं किया? 
 

“अंसारी का कहना है कि लोग अपने फायदे के लिए मेरे फोटो का उपयोग करते हैं। दंगों के कई साल बाद भी मुझे चैन नहीं है। लोगों ने मेरी शांति को नष्ट कर दिया है। मैंने जिंदगी में आगे बढ़ने की कोशिश की लेकिन कहीं न कहीं, कोई न कोई मेरा फोटो दिखाकर मुझे फिर पीछे मुड़कर देखने के लिए मजबूर करता है।अंसारी ने खुद को कलंक के रूप में पेश करने को लेकर फिल्म निर्माताओं को कानूनी नोटिस भी भेजा है। 38 साल के अंसारी खुद की तस्वीर को बार बार दिखाने से तंग आ चुका है। उसका कहना है कि मुझे दया के पात्र के रूप में दिखाया जाता है। मैं अपनी प्लास्टिक सर्जरी करवाना चाहता हूं ताकि लोग मुझे नहीं पहचान सके।”
 

साभार:  That’s Me

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गोधरा सेक्युलर मीडिया को कभी सही संदर्भो में क्यों नहीं याद आता?

गोधरा सेक्युलर मीडिया को कभी सही संदर्भो में क्यों नहीं याद आता?

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हत्या को आत्महत्या बताने के पीछे का खेल

पुलिस को गरियाना बिल्कुल उचित नहीं क्योकि पुलिस भी इसी सिस्टम में रहकर ही संचालित होती है। इसकी सिस्टम से अलग सत्ता नहीं है।

पुलिस को गरियाना बिल्कुल उचित नहीं क्योकि पुलिस भी इसी सिस्टम में रहकर ही संचालित होती है। इसकी सिस्टम से अलग सत्ता नहीं है।


जैसे कि अंदेशा था दिल्ली में १६ दिसम्बर की रात हुए सामूहिक दुष्कर्म के प्रमुख अभियुक्त ने आत्महत्या कर ली।  सरकारी सूत्रों की माने तो इस अति संवेदनशील प्रकरण में शामिल इस अभियुक्त ने तीन और बंदियों को अपने में समेटे हाई प्रोफाइल तिहाड़ जेल के एक बैरक में भोर के वक़्त आत्महत्या कर लिया। जाहिर है इस अभियुक्त की मौत के बाद इस गैंग रैप के असल कारण तक पहुचना असंभव हो जाएगा। किसी भी औसत दर्जे के विश्लेषक को भी ये समझने में जो अगर थोडा भी सचेत होकर इस मामले को १६ दिसम्बर की रात से ये कवर कर रहे हो समझ में आ जाएगा आसानी से अगर पहले नहीं   समझा तो अब कि ये गैंग रैप असल में पूरी तरह से सुनियोजित था। किसने इस प्रकरण को मास्टरमाइंड किया बस अब यही एक बात पहेली बन के रह जायेगी। ठीक उसी तरह जिस तरह सबूतों की छेड़छाड़ के कारण आयुषि हत्याकांड एक पहेली बन के रह गयी ये मामला भी बन के रह जाएगा। कोर्ट से दोषी सजा पा जायेंगे और इस मामले का पटाक्षेप हो जायेगा। ये मामला भी इतिहास के गर्भ में समा जाएगा।

एक नामी सेक्युलर पब्लिकेशन का भी यही मानना है कि ये हत्या है आत्महत्या नहीं पर जैसा सेक्युलर प्रकाशकों के साथ होता है इस मामले को ख़ास रुख देने की कोशिश की गयी है। ये बताया गया इस सेक्युलर मैगज़ीन के द्वारा कि ये पुलिस की मिलीभगत या पुलिस की भूमिका इस सामूहिक दुष्कर्म में ना पते चले इसलिए इस प्रमुख अभियुक्त को सुनियोजित तरीके से खत्म कर दिया गया। ये तय है कि इस सेक्युलर प्रकाशक के अलावा जितने और मेनस्ट्रीम मीडिया के प्रकाशक है वे भी यही सतही कारण देंगे या फिर ये राग अलापेंगी कि भारतीय जेल सुरक्षित नहीं है। लेकिन यही मेनस्ट्रीम प्रकाशक और ऐसी सेक्युलर पत्रिकाएँ खामोश रह जाती है जब नक्सली समर्थक बिनायक सेन को सुप्रीम कोर्ट ने इस आधार पर जमानत दे दिया कि जेल के अन्दर सख्त सुरक्षा के चलते किसी तरह के खतरनाक चिट्ठी पत्री का आदान प्रदान नहीं हो सकता। जबकि ये असलियत सबको पता है कि जेल के अन्दर ही माफिया जिन्हें वी आई पी कैदी कहा जाता है ना सिर्फ हर तरह के ऐशो आराम भोगते है बल्कि जेल के अन्दर रह कर ही हर तरह की अवांछित गतिविधियों को अंजाम देते है। 

ये तो उसी वक़्त समझ में आ गया था कि मामला उस तरह का है नहीं जैसा कि दर्शाया जा रहा है जब पुलिस के अधिकारियो ने अपने से उच्च अधिकारी को लड़की का बयान सही तरह से लेने में बाधा डाल दिया। इस सन्दर्भ में आप घटना के तुरंत बाद ही लिखा गया ये लेख पढ़ सकते है जिसमे मैंने उसी वक़्त ये स्पष्ट कर दिया था कि ये सिर्फ सामूहिक दुष्कर्म का मामला नहीं है। फिर लड़की को सिंगापुर ले जाने का उपक्रम और उसके बीच इंडिया गेट या अन्य जगहों पर प्रायोजित धरना प्रदर्शनों ने पूरे मामले के गौड़ तत्त्वों को उभार कर रख दिया। इससें दो बाते समझ में आती है एक तो ये कि भारतीय लोगो को नौटंकी रास आती है और दूसरा ये कि जुर्म को सिर्फ जुर्म के दायरे में रख कर समझ पाने की कला अभी भारतीयों के समझ से बाहर है। इसलिए मोमबत्ती जुलूस, बेकार की हाय तौबा में सरकार ने दो हित साधे जो सीधे उसके सत्ता बचाने से सम्बन्ध रखता था। एक तो महिलाओ के सुरक्षा से सम्बन्धी कानून में संशोधन करके महिलाओ का वोट बैंक पक्का कर लिया। दूसरा नरेन्द्र मोदी की गुजरात में हुई जीत की चमक को बाँध दिया। ये नहीं भूलना चाहिए कि सत्ता में बने रहने के मोह के लिए कांग्रेस का ही क्या किसी भी पार्टी का इतिहास घृणित और घिनौना रहा है। ये तय है कि गैंग रैप अगर मोहरा ना बनता तो कुछ और मोहरा बनता। लेकिन बनता जरूर।

इसलिए इस पूरे मामले में पुलिस को गरियाना बिल्कुल उचित नहीं क्योकि पुलिस भी इसी सिस्टम में रहकर ही संचालित होती है। इसकी सिस्टम से अलग सत्ता नहीं है। मालिक का कुत्ता है। जब चाहा मालिक ने काट लेता है। नहीं चाहेगा तो नहीं काटेगा। अब इस १६ दिसम्बर की रात को वास्तव में क्या हुआ और किस तरह और क्यों  इस घटना को उभारा गया ये तो सिर्फ ईश्वर ही बता सकता है। पुख्ता सबूतों के अभाव में मै भी बेवजह व्यर्थ ही दिमाग के घोड़े नहीं दौड़ाउंगा लेकिन कुछ केस ऐसे होते है कि जहा पुख्ता सबूतों से ज्यादा घटना के हालात ही सारी स्थिति बयान कर देते है। इसलिए ये अब आपके ऊपर है कि आप वो सच मानते है जो सत्ता के मोह में लिप्त सरकार दर्शाना चाह रही है या जो हालात चीख चीख कर बता रहे है पर आप है कि देखना और समझना ही नहीं चाहते है।

 

प्रायोजित धरना प्रदर्शनों ने पूरे मामले के गौड़ तत्त्वों को उभार कर रख दिया। इससें दो बाते समझ में आती है एक तो ये कि भारतीय लोगो को नौटंकी रास आती है और दूसरा ये कि जुर्म को सिर्फ जुर्म के दायरे में रख कर समझ पाने की कला अभी भारतीयों के समझ से बाहर है

प्रायोजित धरना प्रदर्शनों ने पूरे मामले के गौड़ तत्त्वों को उभार कर रख दिया। इससें दो बाते समझ में आती है एक तो ये कि भारतीय लोगो को नौटंकी रास आती है और दूसरा ये कि जुर्म को सिर्फ जुर्म के दायरे में रख कर समझ पाने की कला अभी भारतीयों के समझ से बाहर है

References:

The Economic Times

Delhi Gang Rape: Important Aspects Ignored By Paid Media

Kafila

Supreme Court Grants Bail  To Binayak Sen

Business Standard

Ayushi Murder Case


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When Murder Becomes Suicide

We Also Demand  Real Justice!

We Also Demand Real Justice!

The Chief accused in the Delhi gang-rape case, Ram Singh, committed suicide.

“The main accused in the Delhi gang-rape case, Ram Singh was found dead in Tihar Jail on Monday morning in mysterious circumstances….A police guard found Singh hanging from the grill of his prison cell at 5:45 am, while there were three other inmates in the cell. They claimed they were asleep and had heard nothing…..Home minister Sushil Kumar Shinde said the death was a major security lapse on the part of prison authorities, saying the preliminary probe indicated it was suicide. “There were three other inmates in the cell in which Singh was found hanging,” Shinde said.” ( The Economic Times)

So the government wants us to believe in simplistic terms that it was confirmed case of “suicide” in  presence of three other inmates. A  prominent secular publication treats this as murder. And, in my eyes too, it’s also a well planned killing but I have my own reasons than the ones stated by this publication, which primarily treats it to be unholy nexus between “prisons, crime and the police”. It has also failed to ascertain the exact motive other than trying to impress upon the mind of readers that this was murder committed by police to prevent him from confessing dirty secrets related with involvement of police in the whole episode. However, such an assertion on part of this publication is also a clever attempt on part of this magazine, to limit the imagination of the conscious readers.

Agreed that Indian prisons have become operational centers for organized crime and death inside prison is a commonplace affair, which is often sponsored by police with the help of inmates. The fact that Indian prisons are breeding ground for henious crimes  was the point I had highlighted when Supreme Court  granted bail to Binayak Sen on the ground that “Visitors are screened and searched by the jail staff. Jailors are there to oversee all these things. So, the question of passing letters or documents doesn’t arise.” I had strongly objected to such a misplaced stand of Supreme Court in my article devoted to granting of bail, wherein I stated: “Anybody who knows the Indian jails know quite well that all big criminals are operating from inside the jails. The contract to kill (Supari) is being ordered from inside the jails via the mobile. A surprise raid in any Indian jail would always lead to discovery of drugs, weapons, mobile phones and other prohibited things.”  However, for Supreme Court and other paid media publications the prison at that time was no less than temple wherein visitors came with noble intentions. 
      
After the murder of  prime accused in Delhi gang-rape, once again the whole episode would be projected in one particular way with   talks related to security within jails gaining prominence. Some conspiracy theories by paid media shall also be highlighted that would project police as the chief villain. However, for a conscious mind, that’s merely tip of the iceberg. In fact, when the Delhi gang-rape incident took place, and the paid media side-by-side huge number of protesters demanded justice for the unfortunate girl with candles and placards having slogans “Hang the rapists”, the author had suspected that there is more than meets the eye. However, being a lone voice, the feeling got suppressed even as this writer along with other thinking souls tried to point out the murkier game played behind the curtains with dubious role of police.

The piece that I wrote immediately after the Delhi gang-rape incident stated: 

 “I wish to clearly state that it would be fatal to confine the urge for changes to “safety of women alone” or, for that matter, demand for stricter provisions to prevent rape. This line of action is being deliberately highlighted under pressure from feminist wings, tactically supported by Congress government, which hopes to regain power with female voters and minority card in next Parliamentary actions. The mainstream media is also singing the same tune, because in wake of fear to lose government’s aid,  it has no other option but to toe the stance taken by government. This whole drama which captured the nation’s attention from December 16, 2012, until death of gang-rape victim was a well-orchestrated show managed perfectly well by the paid media and Congress government. There are enough circumstantial evidences which give proof of it that the real story is something else and it’s more horrible than what we all came to witness in these past turbulent fifteen days. I will deal with this aspect later in this article but first let’s not ignore these pertinent points.”

The readers can have a look at that article to ascertain what could be the reasons, which indicate at involvement of hidden players in the orchestrated drama, which took place in the wake of gang rape. Now after the suicide of the main accused, which is apparently cold blooded murder, it would be quite obvious to thinking minds that real picture is indeed a “dirty picture”. And like always the real mastermind-the real villains-shall have the last laugh. I do not wish to shoot arrow in darkness since in absence of concrete facts there is always risk of arriving at flawed conclusions. However, there are enough circumstantial evidences to prove that police is merely a puppet in the hand of chief villain. The police was no more than a puppet when the gang rape occurred, and even now in the aftermath of the suicide of Ram Singh-the prime accused- is nothing but a puppet. 

 It has now become certain that we would not come to know what exactly happened in the name of gang-rape. All we know that a beautiful girl came to lose her life in a painful way. This case would remain an unresolved dilemma like the Ayushi murder case.  It’s a painful scenario that conscious citizens can do nothing much other than being mute spectators. However, the citizens can remain alert by beginning to see beyond the obvious. That way they would begin to become aware of the great politics played in their name. That would be the beginning of making better changes in the system from the top to the bottom.

Light Of  Real Information Is Needed For Justice..

Light Of Real Information Is Needed For Justice..

References:

The Economic Times

Delhi Gang Rape: Important Aspects Ignored By Paid Media

Kafila

Supreme Court Grants Bail  To Binayak Sen

Business Standard

Ayushi Murder Case

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Population Explosion Is More Dangerous Than Nuclear Explosion

That's Commonplace In  India!

That’s Commonplace In India!


The governments, across the globe, have become highly suspicious about the activities taking place in the world of social media. In some circles, especially among the bureaucratic class, which in my eyes are comprised of dullest minds, look with disdain at people involved in world of social media. For instance, Facebook for them is still some sort of time pass, when it has emerged as a powerful medium to shape vision of present and coming generations. It’s highly amusing that if the activities on Facebook are such harmless affair then what’s the need to monitor it? The truth is that it has become a powerful weapon to shatter the lies spread by government. It’s shattering their propaganda, with better version of any critical issue, haunting the society.

Anyway, this post is not intended to discuss about the influence of social media. It’s about one of the worst problems faced by India: Population Explosion. I am presenting the excerpts from a thought-provoking conversation that we had on Facebook. I must thank the participants that by giving way to such lively well-meaning thoughts, they added a new dimension in the stature of Facebook. Few participants expressed their views in Hindi. I have added English version of their comments, which highlights the essence of what they expressed in Hindi.

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Deewaker Pandey, New Delhi:

ये जनसँख्या असंतुलन देश की समस्याओं को बढ़ा रहा है केवल.. क्यूंकि संसाधन तो बढ़ नही रहे.. वो घट रहे बस और लोग बढते जा रहे.

[The growing population imbalance is merely adding new problems. Resources are decreasing but population is increasing with each passing day.]

Arvind K. Pandey, Media Analyst and Writer:

Well, one of my close friends, Carmen, living in a different nation, always feels as if she has seen/faced the worst. I ask her to visit  India and travel in over crowded compartment of train, no less than a Nazi torture cell. I am sure, after having such rough travelling experience, she would start imagining combis of her nation were better,  and she would then, definitely, run away to her nation, shedding all romantic notions aka Taj Mahal.

Nadeem Akhtar, Chief Copy Editor, The Public Agenda, Ranchi, Jharkhand:

अरविंद जी, पूरे सम्मान के साथ इस विषय पर मेरी असहमति है। मैं इस मसले को सामाजिक मानता हूं और इस पर कानून के पक्ष में नहीं हूं। आपको पता होगा कि चीन में भी जनसंख्या नियंत्रण के लिए नीति लागू हुई थी, वन चाइल्ड पॉलिसी लेकिन वहां भी सरकार ने कोई कानून नहीं बनाया था। हां, इसके बावजूद चीन में बेतरह अत्याचार हुए। एक नीति मात्र बन जाने से किस प्रकार आम जन पर अत्याचार किया जा सकता है, यह चीन की निरंकुश शासन प्रणालि के कर्ता-धर्ताओं से सीखना चाहिए। भारत, एक वैविध्य सांस्कृतिक चेतना वाला राज्य है। यहां राजसत्ता अगर ऐसे संवेदनशील मामले पर कानून का चाबुक चलायेगी, तो समाज के बिखरने का पूरा अंदेशा रहेगा। बेहतर यही होगा कि इस समस्या को नैतिक रूप से सुलझाया जाये। जैसे प्रथम मातृत्वोपरांत महिला बंध्याकरण पर माता को तीसरे और चौथे दर्जे की सरकारी नौकरी दी जाये या फिर पुरुषों की नसबंदी पर किसी भी रेलवे की परीक्षा में कट ऑफ मार्क्स पर 40 नंबर का ग्रेस दिया जाये, तो यह ज्यादा आकर्षित करेगा। कानून का चाबुक तो सिर्फ समाज में वैमनस्यता फैलायेगा। इसे इस नजरिये से भी देख सकते हैं कि हत्या के खिलाफ कड़ा कानून है, लेकिन क्या हत्याएं रुक गयी हैं?

[ Arvindji, having due respect for your views, I beg to differ. I treat this issue as a social ill and do not subscribe to the view that this can be handled well if tough laws come in origin. No specific law is needed to control growth of population. You must be aware of the fact that China implemented one child policy, but it did not give way to any tough law to execute this policy. Despite absence of law, the government agencies gave way to cruel means to make this policy attain logical culmination. The point is even a simple policy is capable of triggering such cruel gestures on part of government. That we need to learn from inhuman treatment of people at the hand of dictatorial government agencies in China. India, on the other hand, is a Pluralistic society. I am sure, a tough stand on part of government, would lead to disintegration of society. I suggest a moralistic approach, for instance, women opting for Tubectomy, after their first pregnancy, should be offered Class Three/ Class Four government jobs. Men, on other hand, opting for Vasectomy, should be given concession in cut off marks set for qualifying in Railway Examinations. The whip of law would only increase tension within the different layers of society. Let's see it from this angle: Do tough laws that we have to control murder, stopped murders?]

Arvind K.Pandey, Media Analyst and Writer:

नदीमजी पहले तो इस बात के लिए आपको धन्यवाद कि इतने दिनों के बाद कोई पुराना मित्र दमदार तरीके से वापस आया। फेसबुक को सरकार और कुछ मीडिया के लोग बड़ी तिरछी नज़रो से देखते है पर आप जैसो लोगो की उपस्थिति इस मीडियम की सार्थकता बढाती है। मुद्दे पे आते है मेरा रूख थोडा सा अलग है। चीन में लोकतंत्र नहीं है इसलिए वहा से तुलना बेमानी है। ये समस्या विकट है। क्योकि अगर आप भीड़ बढाकर काम नहीं देंगे तो समाज में जुर्म का ग्राफ बढेगा। अराजकता बढ़ेगी कि बिहारी बिहार में रहे और मराठी सिर्फ महाराष्ट्र में।आप देखिये आज जो भी समस्या है इसके मूल में जंगली घास की तरह बढती आबादी ही है। तो मेरी नज़रो में एक स्पष्ट नीति होनी ही चाहिए भले ही सख्त कानूनी स्वरूप उसका ना हो। इसके बाद भी अगर कंट्रोल मे ना आये तो सख्त कानून अनिवार्य है। आप इस देश में कर ही क्या सकते है जब एक बड़ा वर्ग इस बात को मानता है कि जितने हाथ उतना मुनाफा! उनको क्वालिटी आफ लाइफ से क्या लेना देना। आप पोलियो की ड्राप पिलाने में जूझ जाते है तो इस गंभीर समस्या को आप सिर्फ समझा बुझा के कुछ कर पायेंगे मुझे संदेह है। चलिए पहले आप के पाले में बाल डालते हुए पहले समझाने वाला, कुछ साथ में लाभ देने वाला विकल्प ही ट्राई किया जाए। ये अलग बात है कि पानी सर से ऊपर बह रहा है।

[ In the very beginning, I must thank you, Nadeem, for making your presence felt, after such a huge gap,  with such a powerful response. The government is not pretty happy with activism, which prevails on Facebook. Even many circles in traditional media make mockery of journalists involved in world of Facebook. However, I must say such a conscious take on this critical issue on Facebook, makes it clear that people targeting social media are, in actuality, afraid of its ever-increasing influence in deciding the fate of any issue. Let's come at issue at hand. I have slightly a different perspective than yours, Nadeem. China does not have a democratic set-up and so I don't think we can contrast our situation with what's happening there. This is a very serious issue. If you would not create scope for jobs, but keep on increasing the population, then it would automatically increase the crime rate. It will lead to chaotic situation as one state will start rejecting people belonging to a different state: Biharis should live in Bihar and Marathis should remain caged in Maharashtra type conflict would become order of the day! I mean analyze any issue and you would find surging population, spreading like wild grass, as its root cause. That's why in my eyes, a strict policy has become the need of the hour, whether or not you have a rigorous legal sanctity. If such a policy fails, then there is no other way left other than to give way to tough laws.

You know well that simple measures, devoid of legal force, more often than not, have failed to bear proper results in India. There is a big section in Indian society, belonging to particular community, which believes greater the number of hands, greater is the profit. They care a damn about quality of life. Let's know that government agencies faced huge difficulties in ensuring smooth  implementation of pulse polio drive, which had no controversial aspect at all. Anyway, you have made good suggestions. There is no harm in giving way to them before experimenting with tough measures. The truth is that water is already flowing above the danger mark.]

Ghanshyam Das, Medical Practitioner, U. A. E.:

Unless everybody is educated, this problem cannot be solved. We can see that thirty years back the average number of children in a middle class family was 4 or 5. And now if we see it is 2. The problem is mainly in the lower class of the society, which is uneducated, and open to accept any level of living and any work (legal/illegal), and that is the class which is a deciding factor in Indian politics. By deciding, I mean, they are easily lured by corrupt politicians, and being in large number make them an important factor. And it will take another 20-30 years, to control the rate of reproduction in this particular sector of society.

Arvind K.Pandey, Media Analyst and Writer:

Thanks for a thought provoking reply, Ghanshyam Dasji. The seriousness of the issue can be felt in exchange of views between me and Nadeem.

Since childhood, I have been reading this slogan “Hum do Humare do” (We Two, Our Two) but I don’t think it has brought any desired impact. And one reason why population graph has gone down in upper middle class, I think, it’s because of high cost of living rather than education. Still, one cannot deny educated families have better approach in this regard. Interestingly, it’s easier to convey messages in modern times. So let’s see what a vigorous campaign comes to yield. But in my eyes, we need to have a clear-cut policy in this regard. Simply messaging and giving concessions would not yield desired result.

Swami Prabhu Chaitanya, Patna, Bihar:

देश का दुर्भाग्य संजय गाँधी ने गलत ढंग से मगर अच्छी पहल की थी. संजय गाँधी की असामयिक मौत ने देश को वर्षों पीछे धकेल दिया। सारे अवसरवादी,वोट के ठेकेदार इस महान अवसर को भुनाने में लगे हैं कि  कैसे अपनी जाति बिरादरी की संख्या को अधिकतम किया जाये। जीवन की गुणवत्ता से इनका क्या वास्ता इनकी तो गद्दी सुरक्षित रहनी चाहिए। पढ़े लिखे (गधों) से इन राजनीतिज्ञों को कोई अपेक्षा नहीं। उन में से अधिकतर तो वोट देते नहीं। उन्हें TV  पर मनोरंजक चर्चाएँ /बहस आदि देखना पसंद है तो जो वोट बैंक हैं उनके उसकी संख्या को तो वे (Politician) बढ़ते देखना चाहेंगे न ?आखिर गणतंत्र (भीड़तन्त्र) चलेगा कैसे ? गुणतन्त्र की बात कोई यहाँ कैसे उठाये ?और चौथा स्तम्भ भी सुनते हैं बिक गया है। एक खास दल जिसके पास अकूत धन है शायद, तंत्र उसीके हिसाब से चलता है।

[ Ironically, Sanjay Gandhi made a good move in this direction, although appropriate methodology was not adopted. The untimely death of Sanjay Gandhi put the nation again in medieval times. The opportunists are now making all efforts to cash-in-on the chaos, which prevails in this nation on this particular issue. Let the tribe of their caste increase is their only motto. They are not interested in quality of life, being solely interested in keeping their bonhomie with power intact. They are not afraid of educated class since it never uses its voting rights, being all the time swayed by cheap thrills of life. Probably, that's why, politicians are pretty much  interested in greater number of heads in lower sections of society, who constitute their vote bank. How else mobocracy would sustain its presence? Who will dare to ensure quality of life amid this lust for power? Even the Fourth Estate has compromised with its credibility. It appears that this country is ruled by a party, which has amassed huge wealth.]

Arvind K.Pandey, Media Analyst and Writer:

जनसँख्या बढ़ेगी तो वोट बैंक बढेगा …और क्या पता बढ़ते बढ़ते एक अलग देश फिर पैदा हो जाए तो एक नया भ्रष्ट केंद्र बिंदु पैदा हो जाए। इसलिए जनसँख्या बढ़ने दो। और कम पड़ जाए तो बांग्लादेश से बुला लो।

[ Definitely, increase in population would increase the vote bank. And who knows, this ever-increasing population gives birth to another nation, which may give rise to new centers of corruption. So let the population swell! And if they still need more people, invite Bangladeshis!]

Ghanshyam Das, Medical Practitioner, U. A. E.:

Arvind K Pandey ji, you are right in stating that “it’s because of high cost of living rather than education”, but the poor section of the society is equally exposed to the same harshness of high cost of food and clothes, but they fail to realize that it’s due to less developed intellect and go on reproducing mindlessly. That’s because of lack of awareness/education (mere school certificate is not eligible to be called as education until unless it instills the mind with wisdom and intellect). And it is equally true that the population would continue to increase as long as green revolution comes to absorb all the pressure. A time will come when even the best efforts to ensure the food safety will fail to satisfy all of them, the cost of food will rise very high, and there will be no availability of the jobs/or very less paying jobs. That will compel even the lower class of the society to stop breeding further.

It is all about the minimum requirements of the life of a particular individual, which matters. For upper middle class a respectful status in the society is equally important for life as are the foods and clothes. Therefore, they stopped early. For lower section of society, the minimum need is only food and clothes, which will be under risk soon with this rate of their growth, and they will be forced to follow the middle class.

Arvind K.Pandey, Media Analyst and Writer:

One of the advantages in modern society is that messages can be spread easily. So let’s try to increase the level of awareness.

Ghanshyam Das, Medical Practitioner, U. A. E.:

True, otherwise, it will be too late. And the society may collapse. Serious consequences are in store–like increase in crime. If awareness program fails, a binding law is a wise decision. “bhay binu hohi na preeti” (fear factor is necessary to elicit love/respect). Giving way to harsh decisions to prevent a greater disaster, is right in my opinion- something that you have already mentioned above. That’s because the government has not enough resources/employment to lure them. So the alternative way as suggested by Nadeemji does not look feasible in current situation.

Arvind K.Pandey, Media Analyst and Writer:

Finally, Ghanshyamji took a big U turn and felt that “a binding law” is needed. So let’s see what the result of your way, which is recommended by Nadeem as well, yields. I have no problem with this idea, but given the way this nation functions, unless there is well regulated proper policy which supports this vision, I am apprehensive about the success of vision you both collectively share.

Ghanshyam Das, Medical Practitioner, U. A. E.:

So, finally, we arrived at the root cause of all the rot in our society: Poor governance and political scenario!

Arvind K.Pandey, Media Analyst and Writer:

Ghashyamji, you got the bottom-line! This is one of the few conversations on Facebook which took place so well with such a perfect bottom-line. No chaos and confusion in presentation of ideas at all. Hats off to all wonderful participants, for engaging in a thought-provoking discussion in such a well-coordinated manner.

 

And Life Goes On In India!!

And Life Goes On In India!!

 

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A Discussion On Future Of Journalism

What's The  Future Of Print Media?

What’s The Future Of Print Media?

Very recently, some of the writers and journalists furiously got involved in a discussion related with future of journalism on LinkedIn website. Most of us were of the opinion that arrival of newer mediums like Internet has hit hard practices related with old school of journalism. In my eye own eyes, the future doesn’t seem bright unless it prepares itself well to imbibe new changes. The old mindset must give way to better one in league with recent patterns. The problem is that journalists and media groups, belonging to previous generations, treat the rise of bloggers and citizen journalism as wrong phenomenon in the world of journalism. They are not   open to create a balance between the old forms of journalism with newer methods of news presentation. That does not seem to be the case since old heads continue to remain skeptical.

However, my main concern in the debate was related with the survival of people seriously involved in the field of journalism. It’s harsh reality that even after introduction of dynamic medium like Internet, the economic scenario for talented souls remains grim.   So if we are not paying them well, I wonder who would dare to be methodical and research oriented? Who would really bother to add new dimensions in the qualitative standards? So my point of view is that let’s not only provide these new methods appropriate space but also ensure that financially they enjoy a stable position, if not strong.

That’s what some of us said on the prestigious   “Online  Reporters And Editors” forum.

Arvind K.Pandey, Writer/Freelancer, Allahabad, India:   

“Time changes everything except something within us which is always surprised by change.” (Thomas Hardy) The future is surely bright, only if journalists learn to maintain pace with changes taking place in the world of news and views! Sadly, we waste our precious time in mindless criticism of the recent trends, unleashed by the intervention of Internet. And why are we not discussing about the exploitation of journalists? They are paid so less by the media houses even as they come to deliver quality reports in short time. In fact, reporters, belonging to both online and print section, are the most harassed lot in term of monetary benefits. For media houses, it appears such a pathetic situation means nothing as they have kept deepening the insecurities in media sector.

How can future be bright when there is a sword hanging over your head in terms of job security? 

One should not forget that journalists working for NYT, CBS, CNN, Fox News Channel and etc. are the ones exhibiting high journalistic standards! Yet they compromise with truth, and give way to biases of all sorts! Against this backdrop, when we start hating new alternatives, the future of journalism becomes more complicated and grave.

Paul Ivice, Writing Coach And Editor For Freelancers, Palm City, Florida, USA:


Arvind, the fact that you mention Fox News Channel in the same breath with the others indicates that you lack an understanding of both high journalistic standards and the way that media people can insert bias into their reporting, because FNC has taken biased reporting to an entirely new and shameful level.

Arvind K.Pandey, Writer/Freelancer, Allahabad, India:

@ Paul

I have taken note of the situation from Indian eyes! The subtle difference that you highlight is not of much importance to me just the way difference between Star TV India’s approach and Zee TV’s approach remains unnoticed by you, and, above all, is not of much importance to you unless you are based in India! And yes, you missed something very important. When I placed all of them in one category, it was to show that even when trained journalists from old school of journalism are involved the chances are high that news reports could be biased, twisted and incomplete. If that’s the case, there is little merit in condemning people belonging to new forms of news presentation.

Paul Ivice, Writing Coach And Editor For Freelancers, Palm City, Florida, USA:

@Arvind

I am familiar with neither Star TV nor Zee TV in Indian, but if you say the difference between them is subtle, then you have no clue about the difference between Fox News Channel and almost every other mainstream media outlet in the USA, biased or not.

Arvind K.Pandey, Writer/Freelancer, Allahabad, India:

@Paul

The operative part of my comment is not my so-called ignorance about US media. The question that really matters is that how come trained journalist having faith in objectivity, accuracy and other fine values created such a mess of extraordinary type, which has compelled all of us to discuss the future of journalism? It’s their biases and partisan approach, which eroded the faith of readers/viewers in print media/news channels.

Simon Morice, Media Production,Southampton, United Kingdom:

The truth, Arvind, is that news journalism is expensive, and unless it has the luxury of a hands off sponsor then the power of ownership will influence it. There is a wider context and this is no new development. In the dying days of the nineteenth century, Adolph Ochs purchased an ailing New York Times. He turned it around on the strength of great journalism and producing ‘All the news that’s fit to print’. People would happily pay for good, not just sensational, information about human affairs. And advertising revenues followed too. The NYT went on to achieve preeminence in the world beyond New York, and other papers copied its example. 

But then the news, which had honestly monitored and spoken to power for so long became power itself. Advertising revenue began to exceed that which was derived from serving its audience with integrity and excellent journalism. The audience became a market, a conflict was born between fiduciary responsibility and integrity, the newsroom and marketing department began sharing elevators – and the mess which you perceive was made – all over again. 

Recently, we have seen the rise of Al Jazeera as, probably, the world’s most respected news organisation. In the same epoch, the leadership aspirations of both the NYT and the Guardian appear to hark back to the values of great journalism. But while Al Jazeera may depend on the stringless resources of Emir Sheikh Hamad bin Khalifa al-Thani, the Guardian and the New York Times must trade their way to the high ground again. Audiences and journalists alike live in an interregnum of chaos.

Paul Ivice, Writing Coach And Editor For Freelancers, Palm City, Florida, USA:

Arvind, the “mess” you refer to is almost entirely attributed to electronic media’s pursuit of the almighty dollar, though with some exceptions I don’t consider electronic media to be journalists as much as entertainers. What biases show up in the reporting of print media, I think, resulted mostly from their misguided effort to pander to the same nitwits among the populace who think a combination of celebrity news and opinion is journalism. It is an unfortunate path that is taken when profits outweigh principle.

Some hate the rise  of newer alternatives!

Some hate the rise of newer alternatives!

Reference:

Online  Reporters And Editors

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Pic One
  
 Pic Two

The journalistic fraternity should learn to truly honour the bloggers

Traditional Media vs Blogosphere

Traditional Media vs Blogosphere

Well, it appears emergence of bloggers have really unsettled journalists and media groups. I say so because they love to indulge in snide insinuations about the bloggers, which speak volume about their insecurities. I had been part of journalistic fraternity and, therefore, know quite well about the type of work done inside newspaper office. I agree that journalists follow a refined work culture, which lays stress on “accuracy, a critical sense, balance “and divergent view-points.  However, it’s really tough to understand how come presence of certain aspects in one circle leads to absence of same aspects in other circle following a different modus operandi? It really defies logic that while highlighting the good features of traditional media, it’s been assumed that media in its new avatara (emergence of blogosphere) lacks credibility and substance. 

The truth is that bloggers have emerged as better alternative because traditional media betrayed the faith imposed on them by the readers. It’s now very clear that newspapers/electronic media take stand according to their political affiliations. Most news is now sponsored news. And that’s the reason why bloggers emerged on the surface. You cannot fool all the people all the time. Okay, the journalists are taking total care of language errors, factual accuracy and etc. but these are of little use if the end product is flawed one! I think none of the gentlemen participating in the debate came to throw light on the unholy nexus between journalists, politicians and business tycoons. True,  great power is always in tandem with great responsibility and I am pretty sure that bloggers would learn all the tricks necessary to present news items in better way. In fact, they have already done some wonderful work. It’s now undeniable that citizens have finally found a medium to express views close to the reality. Or else, they were left at the mercy of big media brands who offered only half truths in name of truth! 

Anyway, when I appreciate the good work done by the bloggers, I do not assume (like my friends in newspaper world) that everything is wrong about the traditional media and people associated with them. They have certainly set good precedents. But my main worry is that will the bloggers be able to keep themselves above the flaws found in traditional media landscape? Will they be able to use in fair way privileges enjoyed by them? Or will they become monkey with a razor blade? Let’s leave it on time. In the end, I must inform my friends that in many countries, including India, new IT laws have been introduced to make bloggers more responsible.  In other words, they are being tamed in name of acting with responsibility.    

 

 If bloggers have still to learn a lot from journalists, if they are still novice and if they are still inexperienced I wish to know why all prominent magazines, newspapers, websites and web editions of prominent magazines are placing views of bloggers side-by-side views of their own writers/journalists on important pages? In India nearly all news papers have either introduced regular columns for bloggers or they are borrowing articles from them. If bloggers or blogging still lack required credibility, I wish to know why many journalists have become bloggers?  Why are they playing the role of blogger? Why blog columns have been introduced by prominent magazines like Time, Newsweek, New York Times and etc.? 

Lastly, it really sounds ludicrous when I notice that veteran journalists speak aloud about superiority of their ilk only because they have received certain training and they have got few qualifications. That gives them right not to acknowledge the traces of good writer and journalist in a person who did not become like them but instead became a blogger! In other words, if one becomes a blogger one loses the right to emerge as person of substance; after all, how dare one wrote beautiful articles, prepared brilliant news reports without qualification and training! This rigid insistence is a weak (and shrewd as well) attempt to maintain their superiority complex and monopoly, which in any case is destined to be crashed in new scenario that has emerged.  

Anyway, I am just trying to establish that qualifications and training are not the only or ultimate parameter to measure the worth of a blogger. The ultimate parameter is the qualitative output a blogger delivers even as the blogger is devoid of critical resources, key infrastructure, financial gain and reward. On the contrary, a journalist enjoys all this advantages. The blogger, on the other hand, is most of time, a selfless crusader. So it really hurts that instead of being honoured, the blogger’s good work is ignored citing absence of training/qualification. I wish to know will they dare to dismiss the greatest  performances of many actors, singers, sportsmen and businessmen, to name a few,  only because they did all that not with help of  training and qualification but  with help of  natural talent provided by the almighty Lord? Will the future generations refuse to acknowledge their worth only because they did not attend Business College, Acting College, Fine Arts College and etc? Please think over it carefully.     

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