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मोदी का स्वाधीनता दिवस भाषण: इसमें छुपे निहितार्थ!

प्रधानमंत्री का संबोधन कई मायनो में अद्भुत था!

प्रधानमंत्री का संबोधन कई मायनो में अद्भुत था!



मोदीजी का स्वाधीनता दिवस भाषण कई मामलो में ऐतिहासिक और विलक्षण है। ये भाषण सिर्फ वाक् कौशल का  जबरदस्त नमूना नहीं था बल्कि ये एक नेता के दृढ सोच और स्पष्ट दृष्टि का आईना था। अभी तक इस तरह के अवसरों पर दिए जाने वाले भाषण सिर्फ महज एक खानापूर्ति होते थे जिसमे साधारण जनमानस की नाममात्र की दिलचस्पी होती थी। इस बार लाल किले के प्राचीर से दिए गए भाषण में मौजूद अद्भुत तत्वों ने सबका ध्यान अपनी तरफ खींचा और उन उदासीन वर्गों में भी जो अब तक नेताओ के भाषण की  खिल्ली उड़ाते थे कायदे से एक सन्देश गया कि बात निकलती है तो दूर तलक जाती है  और एक अकेला चना भी भाड़ फोड़ सकता है।

“यह भारत के संविधान की शोभा है, भारत के संविधान का सामर्थ्य है कि एक छोटे से नगर के गरीब परिवार के एक बालक ने आज लाल किले की प्राचीर पर भारत के तिरंगे झण्डे के सामने सिर झुकाने का सौभाग्य प्राप्त किया।  यह भारत के लोकतंत्र की ताकत है, यह भारत के संविधान रचयिताओं की हमें दी हुई अनमोल सौगात है।  मैं भारत के संविधान के निर्माताओं को इस पर नमन करता हूँ।” कांग्रेस सरकार के पतन के पीछे जो सबसे बड़ा कारण था वो ये था कि कांग्रेेस ने कभी भी संवैधानिक संस्थाओ का मोल नहीं समझा। सत्ता के नशे में डूबे निकम्मे कांग्रेसी नेताओ ने संविधान को ताक पर रख कर काम किया जिसका नतीजा ये हुआ कि संसद और सुप्रीम कोर्ट आपस में कई बार टकराव की मुद्रा में आ गए। राज्यपाल जैसे गरिमामय पद मोहरो की तरह इस्तेमाल होने लगे। सुप्रीम कोर्ट के फैसले कागज़ पे लिखे व्यर्थ के प्रलाप लगने लगे थे।  इस परिदृश्य में मोदी जी का संविधान के ताकत को नए मायने देना, एक संजीवनी प्रदान करना बहुत दुर्लभ घटना है। भारत ही एक ऐसा देश है जहा लोकतंत्र ने अपने को सही ढंग से विस्तार प्रदान किया है। इसका सशक्त होके उभरने में ही देश का कल्याण है।

कई बार ये लगता है कि देश में सिर्फ ब्यूरोक्रेट्स का शासन है।  ये देश उन्ही लोगो का है जो या तो सरकारी पदो पे आसीन है या उनका है जो बड़े बड़े शहरों में कॉर्पोरेट घरानो के मालिक है। इस भ्रम को मोदीजी ने बहुत बेरहमी से तोड़ दिया। इस सड़े गले से भ्रामक तथ्य को मोदी ने इस सुनहरे सच से बदल दिया कि “यह देश राजनेताओं ने नहीं बनाया है, यह देश शासकों ने नहीं बनाया है, यह देश सरकारों ने भी नहीं बनाया है, यह देश हमारे किसानों ने बनाया है, हमारे मजदूरों ने बनाया है, हमारी माताओं और बहनों ने बनाया है, हमारे नौजवानों ने बनाया है, हमारे देश के ऋषियों ने, मुनियों ने, आचार्यों ने, शिक्षकों ने, वैज्ञानिकों ने, समाजसेवकों ने, पीढ़ी दर पीढ़ी कोटि-कोटि जनों की तपस्या से आज राष्ट्र यहाँ पहुँचा है।  देश के लिए जीवन भर साधना करने वाली ये सभी पीढ़ियाँ, सभी महानुभाव अभिनन्दन के अधिकारी हैं”

मोदी जी का संविधान के ताकत को नए मायने देना, एक संजीवनी प्रदान करना बहुत दुर्लभ घटना है।

मोदी जी का संविधान के ताकत को नए मायने देना, एक संजीवनी प्रदान करना बहुत दुर्लभ घटना है।

आज़ादी से लेकर अब तक किसान प्रधान देश में किसान हमेशा हाशिये पे रहा।  इसका नतीजा ये हुआ कि किसान के लड़के दो कौड़ी की सरकारी नौकरी करने को प्राथमिकता देने लगे। आज आप गाँव में जाकर देखिये लड़के सिपाही/क्लर्क बनने की जुगाड़ में लगे रहते है और खेती के आश्रित रहने में उन्हें अपना भविष्य अंधकारमय लगता है, शर्मिंदगी महसूस होती है।  उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े प्रदेशो में तो ये हालत है कि किसानी करना मतलब लोहे के चने चबाना जैसा हो गया है।  बीज महंगा है, उर्वरक महंगे है, बिजली नहीं है, पानी का जुगाड़ नहीं है और उत्पाद का कोई ठीक खरीदार नहीं है। मोदी ने इस दर्द को महसूस किया है। वो ये जानते है कि किसान इस देश की रीढ़ है और बिना इनको मुख्यधारा में लाये आप विकास के उच्चतम सोपान को नहीं पा सकते। इसलिए उनका गाँव और किसानो के प्रति झुकाव ह्रदय को झकझोर देता है। “जवान, जो सीमा पर अपना सिर दे देता है, उसी की बराबरी में “जय जवान” कहा था।  क्यों? क्योंकि अन्न के भंडार भर करके मेरा किसान भारत मां की उतनी ही सेवा करता है, जैसे जवान भारत मां की रक्षा करता है।  यह भी देश सेवा है।  अन्न के भंडार भरना, यह भी किसान की सबसे बड़ी देश सेवा है और तभी तो लालबहादुर शास्त्री ने “जय जवान, जय किसान” कहा था”। उम्मीद है मोदी की गाँव से जुड़े संकल्प से उभरे योजनाये गाँवों का कायापलट करने में सहायक होंगी।

नौजवानो की बड़ी भीड़ है इस देश में सो इनको “स्किल्ड वर्कर ” बनाकर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को उन्नत बनाने का संकल्प एक बेहतरीन दृष्टिकोण है। ये मोदी की दूरदर्शिता दर्शाता है कि आयातित प्रोडक्ट्स पर अपनी निर्भरता को कम करना चाहते है। अभी तक तो ये होता आया है कि युवाओ को सरकारे सिर्फ दिवास्वप्न दिखती रही है। सो उम्मीद यही है कि मोदी राज में युवाओ को एक सार्थक यथार्थपरक दिशा मिलेगी। अंत में मोदी जी की उस दृष्टि को उभारना चाहता हूँ जो इस भाषण की ख़ास बात रही और वो था उनका इस देश की संस्कृति और महापुरुषों के प्रति अभिन्न श्रद्धा। श्री अरविन्द और स्वामी विवेकानंद के वचनो और संस्कृत कथनो का उल्लेख करके उन्होंने ये बता दिया कि देश की जड़ो का सम्मान किये बिना भविष्य की तरफ झांकना कोई मायने नहीं रखता। भौतिक विकास आध्यात्मिक जगत से जुड़े बिना सिर्फ भटकाव ही सुनिश्चित करता है, सिर्फ विनाश ही करता है।  सो इस देश को जरूर विकासोन्मुख बनाये मगर इस पूरी कवायद में जड़ो को ना भूल जाए।

Full speech can be read here: प्रधानमंत्री का संबोधन

श्री अरविन्द के वचनो और संस्कृत कथनो का उल्लेख करके उन्होंने ये बता दिया कि देश की जड़ो का सम्मान किये बिना भविष्य की तरफ झांकना कोई मायने नहीं रखता।

श्री अरविन्द के वचनो और संस्कृत कथनो का उल्लेख करके उन्होंने ये बता दिया कि देश की जड़ो का सम्मान किये बिना भविष्य की तरफ झांकना कोई मायने नहीं रखता।

पिक्स क्रेडिट:

तस्वीर प्रथम

तस्वीर द्वितीय

तस्वीर तृतीय

मोदी के जीत के मायने कुछ अनकहे संदर्भो के दायरे में!

 ये मोदी की भी जीत नहीं है।  ये उस युवा सोच की जीत है जो अपने राष्ट्र को सचमुच विकास के राह पे ले जाना चाहता है तिकड़मी गन्दी राजनीति से ऊपर उठा कर। ये उस हिन्दू आस्था और स्वाभिमान की जीत है जिसके दायरे में संकीर्ण हित नहीं वरन संपूर्ण विश्व आता है।

ये मोदी की भी जीत नहीं है। ये उस युवा सोच की जीत है जो अपने राष्ट्र को सचमुच विकास के राह पे ले जाना चाहता है तिकड़मी गन्दी राजनीति से ऊपर उठा कर। ये उस हिन्दू आस्था और स्वाभिमान की जीत है जिसके दायरे में संकीर्ण हित नहीं वरन संपूर्ण विश्व आता है।


मोदी के जीत में कुछ गहरे आयाम है। मोदी का जीतना एक विलक्षण घटना है।  इसको कई संदर्भो में समझना बहुत आवश्यक है। ये समझने की भूल ना करे कि ये भारतीय जनता पार्टी की जीत है।  ये मोदी की भी जीत नहीं है।  ये उस युवा सोच की जीत है जो अपने राष्ट्र को सचमुच विकास के राह पे ले जाना चाहता है तिकड़मी गन्दी राजनीति से ऊपर उठा कर। ये उस हिन्दू आस्था और स्वाभिमान की जीत है जिसके दायरे में संकीर्ण हित नहीं वरन संपूर्ण विश्व आता है। ये उसी हिन्दू आस्था की जीत है जिसे सदियों से दासता के आवरण में रखकर खत्म करने की कोशिश की गयी हर तरह के आक्रमणकारियों के द्वारा लेकिन जिसने दम तोड़ने से इंकार कर दिया। मेरी नज़रो में तो प्रथम दृष्टया मोदी की जीत इस विखंडित हिन्दू आस्था को जीवंत करने के दिशा में एक शुरुआत है जिसमे अभी कई  स्वर्णिम पड़ाव आने है।  मोदी में लोगो को इस राष्ट्र को सेक्युलर मायाजाल से ऊपर उठाकर सचमुच के विकास को मूर्त रूप में लाने और इसे गतिमान बनाये रखने की असीम संभावना दिखी। इस कारण उन्हें पूरे राष्ट्र ने कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक उन्हें हाथो हाथ ले लिया। इस आकांक्षा में मोदी कितने खरे उतरते है ये वक़्त बताएगा लेकिन खरे उतरने के अलावा उनके पास विकल्प भी कोई और नहीं है। मोदी तो भारत के राजनैतिक पटल पर एक चक्रवर्ती सम्राट बन कर आ गए लेकिन इसके पहले आसुरी शक्तियों ने चुनावी माहौल में जो करतूतें की उस पर एक नज़र डालना जरूरी हो जाता है।

लोकसभा २०१४ के चुनाव प्रचार सबसे विकृत और बिल्कुल एक व्यक्ति विशेष के विरोध पर केंद्रित थे। ये बहुत दुखी कर देने वाली बात है। आप अमेरिका के राष्ट्रपति के चुनाव को देखे। वह मुद्दो पे आधारित बहस होती है। राष्ट्र हित सबसे ऊपर होता है और कुछ छींटाकशी वहा पर भी होती है लेकिन इसके बावजूद वहाँ राष्ट्र हित से जुड़े हर संवेदनशील मुद्दो पर गंभीर बहस होती है। हमारे यहाँ  राहुल गांधी ने जिनके पास तो अपनी एक टीम भी थी पर युवा सोच के नाम पर मोदी के पत्नी को लेकर टीका टिप्पणी की! शायद हमारे यहाँ विकास इसी तरह किसी के निजी ज़िन्दगी के बारे में इस तरह की सोच रखकर होता है। किसी भी पार्टी ने देश हित से जुड़े मुद्दो पर अपनी राय स्पष्ट रखने की जरुरत नहीं महसूस की। वामदाल प्रकाशक/समर्थक तो लगता है जब तक अस्तित्व में है तब तक वे अपने गढ़े हुए निरथर्क शब्दों के जाल में उलझे रहेंगे और हर वो दंगे जिसमे उन्हें मुसलमानो का समर्थन हासिल हो सके उनकी सहानभूति बटोरकर वे उन्हें उभारते रहेंगे। ये मनहूस पलो को हरा रखते है ताकि जब जरुरत हो इनसे वोट मिल सके। अमेरिका आदि देशो में भी ऐसे ही टाइप के लोग है जो मोदी को गुजरात  दंगो के लिए जिम्मेदार ठहराने वाली बात पे बहस तभी  करते है जब भारत में चुनाव जैसे महत्वपूर्ण क्षण आते है। इसके अलावा हमारे यहाँ कुछ क्षेत्रीय दल है जिनके नेताओ के पास नीति तो कुछ नहीं सिवाय जातिगत राजनीति के विकृत मोहरो के अलावा लेकिन अकांक्षा सिर्फ यही है कि प्रधानमन्त्री कैसे बने। इनके पास भी राष्ट्र को देने के लिए कुछ नहीं सिवाय सीमित लफ़्फ़ाज़ी के कि सांप्रदायिक शक्तियों को रोकना है। जबकि सबसे गन्दी सांप्रदायिक राजनीति ये छोटे क्षेत्रीय दल खुद करते है।

सो इस बार के चुनावी संग्राम में इलेक्शन दर इलेक्शन बेहतर सोच को अपनाते मतदाताओ ने जिस तरह चादर से धूल हटाते है वैसे ही कुछ दलों को भारत के राजनैतिक नक़्शे से निकाल फेंका। ये दल अभी तक केवल विष ही बोते रहे है। इनके पास विकास के एजेंडे के नाम पर लोक लुभावन नीतियों के अलावा कुछ नहीं होता था और उसे भी ठीक से क्रियान्वित नहीं कर पाते थे। इन्होंने इतने सालो तक ना ही केवल मतदाताओ को ठगा वरन देश की संप्रुभता और अखंडता को भी तकरीबन गिरवी रख कर छोड़ा।  वाम मोर्चा के सदस्यों ने तो केवल फ़ासीवाद ना उभरे हर हिन्दू विरोधी गतिविधि को जीवित रखा कांग्रेस के छुपे सहयोग के दम से और सब हिन्दू समर्थक या राष्ट्र समर्थक नायको को हिटलर की संज्ञा देते रहे।  सही है जिस पार्टी ने सबसे बड़े तानाशाहों को जन्म दिया हो गरीब मज़दूरों के हितो के लड़ाई के नाम पर उनका इस तरह के मतिभ्रम का शिकार होना आश्चर्यजनक नहीं लगता। इस पार्टी विशेष के लोगो का आलोचना के नाम पर आलोचना करना कौवों के कर्कश कांव की तरह जगजाहिर है और इसीलिए इनके पेट में जब तक मोदी राज रहेगा तब तक रह रह कर पेट में मरोड़े उठती रहेंगी।

मोदी की जीत सोशल मीडिया की जीत नहीं पर हां ये जरूर है कि कांग्रेस के फैलाये झूठ का पर्दाफाश करने में  इसने अहम भूमिका निभायी। अब तक कांग्रेस अपने मायाजाल को,  स्व-निर्मित अर्धसत्य को लोगो पर थोपते हुए लोगो को ठगती आई।  लेकिन सोशल मीडिया के दमदार इस्तेमाल ने मेनस्ट्रीम के बिके पत्रकारों जो कांग्रेस के लिए झूठ बेचते थे की दाल न गलने दी। कांग्रेस की करतूत वैसे भी सबको मालूम  थी लेकिन सोशल मीडिया ने इस सन्दर्भ में युवा सोच को बेहतर ढंग से जागृत किया। एंटी इंकम्बैंसी भी हमेशा सक्रिय रहती है  लेकिन मोदीराज के आने में  सोशल मीडिया और  एंटी इंकम्बैंसी से भी ऊपर युवाओ की इस सोच ने कामयाबी दिलाई कि अब केवल उसी को सत्ता मिलेगी जो सच में विकास करेगा या विकास लाने में काबिल होगा। इसी वजह से सडको पे हर तरफ युवा धूप में बिना किसी प्रचार के मोदी को सुनने गए, सोशल मीडिया पर मोदी से जुडी हर गतिविधि को ट्रैक किया और फिर हर गली और मुहल्लों में चाहे शहर हो या गाँव उत्साह से भरे रहे। वंशपोषित राजनीति जो समाजवादी पार्टी और कांग्रेस करती आई रही थी उसका इन्होने इस तरह से नाश कर दिया। ये पहली ऐसी लहर थी जिसका निर्माण किसी घटना विशेष ने नहीं किया। इस राष्ट्र प्रेम से ओतप्रोत लहर ने ही हर तरह के जहरीले प्रचार कि  मुस्लिमो का पतन हो जाएगा को दबाते हुए हिन्दू सोच को सत्ता पे आसीन किया जिसने सदियों से पूरे विश्व को अपना समझा।

मोदी आ जरूर गए है लेकिन अब इनके सामने बेहद दुष्कर कार्य है।  सो मतदाताओ को अपनी आकांक्षाओं में ना सिर्फ संयमित रहना पड़ेगा बल्कि बदलाव की अधीरता से पीड़ित ना होकर मोदी जी को अपने हिसाब से काम करते रहने देना होगा। बदलाव कोई जादू की छड़ी से नहीं आते कि आपने घुमाया और बदलाव हो गया।  वर्तमान में इस राष्ट की ये दशा ये हो गयी है कि जैसे कोई गंभीर बीमारी से पीड़ित मरीज़ अंतिम साँसे ले रहा हो।  सो ये सोचना कि सत्ता संभालते ही एक दिन के अंदर ऐसा मरीज़ दौड़ने भागने लगेगा केवल कोरी कल्पना है। हां मोदी को इस बात को समझना जरूर है कि अब उनके पास सिवाय अच्छा करने के और कोई अन्य विकल्प नहीं है। हिन्दुओ को अगर दिग्भ्रमित करने की चेष्टा करेंगे तो उन्हें भी हाशिये पर लाने में युवा ब्रिगेड देर ना करेगी। हिन्दू तो वैसे भी अपनी निष्कपट मन के कारण हर तरह का छल का शिकार होता आया है लेकिन अब और नहीं। इसी सोच ने इस अविश्वसनीय  बदलाव को जन्म दिया और यही सोच अब इस बात को भी सुनिश्चित करेगी कि राष्ट्रहित में अच्छे कार्य होते रहे। और इसीलिए ये जरूरी है कि अब आने वाले वर्षो में कोई भी हिंदू विरोधी पार्टी अस्तित्व में ही ना आये।  ये तभी संभव होगा जब मोदीराज में ईमानदारी से सार्थक बदलाव होते रहे। मोदी जी ऐसा ही करेंगे हम सब राष्ट प्रेम से जुड़े लोगो का यही मानना है।

ये जरूरी है कि अब आने वाले वर्षो में कोई भी हिंदू विरोधी पार्टी अस्तित्व में ही ना आये।  ये तभी संभव होगा जब मोदीराज में ईमानदारी से सार्थक बदलाव होते रहे। मोदी जी ऐसा ही करेंगे हम सब राष्ट प्रेम से जुड़े लोगो का यही मानना है।

ये जरूरी है कि अब आने वाले वर्षो में कोई भी हिंदू विरोधी पार्टी अस्तित्व में ही ना आये। ये तभी संभव होगा जब मोदीराज में ईमानदारी से सार्थक बदलाव होते रहे। मोदी जी ऐसा ही करेंगे हम सब राष्ट प्रेम से जुड़े लोगो का यही मानना है।

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तस्वीर प्रथम

तस्वीर संख्या दो

मोदी से जुडी कुछ बाते: ना पक्ष में और ना विपक्ष में !

मोदी आ जरूर रहे है लेकिन उनके लिए प्रधानमंत्री का मुकुट किसी कांटो से भरे ताज के समान ही होगा। देखना यही है कि इन विषम परिस्थितियों में वे किस तरह देश को विकास के राह पे ले जाते है. सबसे बड़ी बात यही है कि हिन्दू जनमानस के भावनाओं का वो कितना ख्याल रख पाएंगे इस तरह के माहौल में जहा सिर्फ मुस्लिम अधिकार या क्रिस्चियन अधिकार ही सेक्युलर भावना का आधार बन चुके है!

मोदी आ जरूर रहे है लेकिन उनके लिए प्रधानमंत्री का मुकुट किसी कांटो से भरे ताज के समान ही होगा। देखना यही है कि इन विषम परिस्थितियों में वे किस तरह देश को विकास के राह पे ले जाते है. सबसे बड़ी बात यही है कि हिन्दू जनमानस के भावनाओं का वो कितना ख्याल रख पाएंगे इस तरह के माहौल में जहा सिर्फ मुस्लिम अधिकार या क्रिस्चियन अधिकार ही सेक्युलर भावना का आधार बन चुके है!


चुनाव के वक्त किसी एक बड़ी लहर का होना एक विशेष घटना होती है. लहर तभी होती है जब किसी जनप्रिय नेता का अचानक निधन हो जाए दुखद तरीके से या राजनैतिक हलकों में किसी स्कैम या स्कैंडल की वजह से किसी ख़ास पार्टी की तरफ लहर का माहौल बन जाए. इसलिए मोदी के पक्ष में लहर कई कारणों से अनोखी है. एक तो ये किसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना की उपज नहीं है और दूसरी ये कि ये किसी बड़े कारण से नहीं उपजी है. इस लहर के पीछे कारण सिर्फ ये है कि लोग बदलाव चाहते है. कांग्रेस के कथनी और करनी में फर्क को देखते देखते लोग त्रस्त हो चुके है. ऐसे में नरेंद्र मोदी जिन्होंने गुजरात में अच्छा काम कर दिखाया तमाम विघटनकारी शक्तियों से सामना करते हुए वे लोगो के नज़रो में आशा की एक बड़ी किरण बन के उभरे है. और इस कदर उभरे है कि हर गली कूंचो में लोग इनके बारे में चर्चा कर रहे है. इन चर्चाओ में हर तबके के लोग शामिल है और हर उम्र वर्ग के लोग शामिल है. देहातो में आप निकल जाए वहा भी मोदी की लहर है. और ये सिर्फ सुनियोजित प्रचार के चलते संभव नहीं हुआ है बल्कि आश्चर्यजनक तरीके से मोदी में उपजे विश्वास के चलते सम्भव हुआ है.

नरेंद्र मोदी ने गुजरात में अच्छा काम किया ये तो है ही लेकिन कांग्रेस का दोहरा चरित्र लोगो ने भली भाँति समझ लिया ये एक बड़ी वजह है. लोगो ने ये समझ लिया है कि कांग्रेस राज के चलते इस देश में कुछ भी सही संभव नहीं. ये सिर्फ लोगो का शोषण करने के लिए बनी पार्टी है जिसमे नेता के नाम पर किसी एक परिवार के प्रति सम्मान रखने वाले चापलूस भरे पड़े हैं. ऐसा शायद ही कभी इस देश में हुआ हो कि किसी  प्रधानमन्त्री की छवि इतने असहाय और कमजोर व्यक्ति के रूप में उभरी हो जबकि उसके पास गुणों का भण्डार रहा हों. उसकी सबसे बड़ी वजह ये थी कि कांग्रेस ने कभी भी अच्छे आदमी को ताकत नहीं सौपी. सिर्फ उन्ही लोगो को आगे बढ़ाया जिन्होंने चमचागिरी और चाटुकारिता में यकीन रखा. अच्छे लोगो को कांग्रेस ने निकम्मा बना के छोड़ा. अब की  पीढ़ी ने ये कांग्रेस का चरित्र समझ लिया और वो बदलाव चाहती है. मोदी ना होते कोई और नेता इतने ही कद का होता तो वो भी लहर को जन्म दे देता. लेकिन नियति ने यह एक मौका मोदी को दिया है.

अगर हम मोदी के नज़रिये से देखे तो ये एक अच्छी घटना भी है और अच्छी नहीं भी है. वो इसलिए कि विरोधाभासों से भरे इस देश में जब आप किसी एक व्यक्ति पे इतना भरोसा कर लेते है और उससे इतनी सारी उम्मीदे पाल लेते है तो ऐसे में उसको अपने पोटेंशियल को आज़माना और सब की उम्मीदों पर खरे उतरना असंभव सा हो जाता है. लोगो का मोदी के प्रति उत्साह देख कर तो ये लगता है कि मोदी के आने के बाद क्रन्तिकारी बदलाव आएगा उस देश में जो पिछले साठ-सत्तर सालो क्या कई युगो से गुलामी के चक्र में पिसता चला आ रहा है. ये लोगो का इस कदर उम्मीदे पाल लेना, इतना उत्साह से लबरेज़ हो जाना खलता है. लोगो को उम्मीदे पालने में तार्किक और न्यायसंगत होना चाहिए ताकि आने वाला आदमी कुछ सही कर पाये वरना कुछ समय बाद लोग फिर चिढ़ने, कुढ़ने और गरियाने लगते है.

गुजरात के दंगो की बात करने वाले गोधरा नरसंहार पे चुप्पी साध लेते है !

गुजरात के दंगो की बात करने वाले गोधरा नरसंहार पे चुप्पी साध लेते है !

आप पहले इस देश का चरित्र देखे. जिस कांग्रेस पार्टी ने इतने सालो तक राज किया उसके पास किस तरह के नेता है. जो इनका यूथ  आइकॉन है इनकी नज़रो में और जो दुर्भाग्य से इनका प्रधानमंत्री पद का दावेदार भी है वो इतनी निकृष्ट सोच रखता है कि वे किसी की निजी जिंदगी में कीचड़ उछालने से बाज़ नहीं आता जबकि यही पार्टी महिलाओं का सम्मान करने का दम्भ पालती है! ये पार्टी युवा सोच का सम्मान करने वाली के रूप में अपने को प्रमोट कर रही है. तो क्या युवाओ की सोच इतनी सतही हो गयी है कि सत्ता का मोह किसी के निजी जिंदगी के उन किस्सों को उजागर करे जिनका वर्तमान से कुछ लेना देना ना हो?

इस देश में कांग्रेस के अलावा कुछ तथाकथित सेक्युलर पार्टिया भी है जिन्हे अपने प्रोग्रेसिव होने का दम्भ है और विगत वर्षो में ये कुछ इस कदर प्रोग्रेसिव हुई कि मुख्यधारा में शामिल राजनैतिक दलों के समूह से ही इनका लोप हो गया. बल्कि राजनैतिक दल के रूप में मान्यता भी घटे वोट प्रतिशत के कारण समाप्त हो गई. लेकिन इनके कुछ प्रकाशन अभी भी इनके नाम का भोंपू बजाते रहते है बेसिर पैर के लेखो के जरिये. सो इन प्रकाशनों के जरिये ये सन्देश दिया जा रहा है कि मोदी के आ जाने से “नरम फांसीवाद” का उदय होगा और ये कुछ ऐसा ही है जिस तरह हिटलर ने सत्ता प्राप्त की थी. इस तरह की सायकोटिक और पैरानॉयड सोच की वजह से ही भारत की जनता ने इन्हे मुख्यधारा से ही हटा दिया. इनका खुद का इतिहास ही क्रूर तानाशाहों से भरा रहा है लिहाज़ा इनका इस तरह से भयाक्रांत होना और लोगो में भी बेवजह भय उत्पन्न करना इनका एकमात्र धंधा बन गया है. ये खुद कितने साफ़ सुथरे चरित्र वाले रहे है इसका नमूना तो आप पश्चिम बंगाल में देख सकते है जहा मार्क्सवादी गुंडों ने कितने सालो तक आर्गनाइज्ड बूथ कैप्चरिंग करके किसी को सत्ता में आने ना दिया. कथनी और करनी में कितना ज्यादा फ़ासला हो सकता है ये इस पार्टी ने देश में सबको दिखाया।

इसी पार्टी की विचारधारा के लोगो ने देश और विदेश की  मेनस्ट्रीम मीडिया में अपने दलाल रख छोड़े है जिनका मुख्य काम यही है कि जहा दक्षिणपंथी सोच हावी होते हुए दिखे वहा पे तुरंत इस बात को प्रचारित करना शुरू कर दो कि देश की कल्चरल डाइवर्सिटी को खतरा है, मुसलमानो के बुरे दिन आ गए है, क्रिस्चियनस के बुरे दिन आ गए है इत्यादि. गुजरात के दंगो का जिन्न भी निकल कर बाहर आ जायेगा. याद करिये जब गुजरात में मोदी एक बार फिर बहुमत से जीत कर आये थे तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया उस वक्त किस नज़रिये से जीत को देख रही थी; ये देखे कि इस बात पे बहस हो रही थी कि मुस्लिमो का वोट प्रतिशत क्या रहा है और कहा पे मुस्लिमो ने वोट दिया और कहा नहीं दिया! मुस्लिम वोट के नाम पे होने वाले तमाशे को खुद मुस्लिम ही अगर सुलझा सके अपनी कबीलाई मानसिकता से ऊपर उठ कर तो बेहतर होगा. क्योकि बाहर से कोई इन्हे समझाए प्रेशर डाल कर तो खुद इनके भीतर और बाहर भी एक गलत सन्देश जाता है. लिहाज़ा इन्हे ही कुछ करना होगा ताकि इनके नाम पे होने वाले वीभत्स तमाशे बंद हो सके. पता नहीं क्यों मुस्लिमो ने हमेशा अपने को इस्तेमाल होते रहने देना पसंद किया है? इनके अंदर अभी भी बंद दिमागों का प्रभाव है जो इन्हे कभी भी वर्तमान में सही तरीके से जुड़ने से रोकता है और हर गलत ताकत से इनको जोड़ देता है. हो सकता है इनको अपने इस्तेमाल होते रहने में हित सधते दिखते है!

अमेरिका को ना पाकिस्तान में हुए हिन्दुओ पर अत्याचार दिखा और ना ही कभी उसे पाकिस्तान में कल्चरल डाइवर्सिटी खतरे में दिखी! केवल भारत में ही उसे ये खतरा दिखता है और वो भी चुनावो के वक्त या किसी और नाजुक समय में!

अमेरिका को ना पाकिस्तान में हुए हिन्दुओ पर अत्याचार दिखा और ना ही कभी उसे पाकिस्तान में कल्चरल डाइवर्सिटी खतरे में दिखी! केवल भारत में ही उसे ये खतरा दिखता है और वो भी चुनावो के वक्त या किसी और नाजुक समय में!

ऐसा नहीं कि हैलुसिनेशन का शिकार मेनस्ट्रीम मीडिया या राजनेता सिर्फ भारत में ही हलचल मचाते है बल्कि ऐसे नाज़ुक क्षणों में विदेशो में भी इस तरह के हैलुसिनेशन से ग्रसित लोग हर तरह की नौटंकी करने लगते है. अब अमेरिका में देखिये जैसे ही वहा के लोगो को मोदी के सत्ता में आने की संभावना दिखी वही पे अमेरिकी कांग्रेस में अच्छी खासी बहस छिड़ गयी कि मोदी के आगमन का मतलब कल्चरल डाइवर्सिटी को खतरा है जबकि भारत ही वो देश है साउथ एशिया में जहा कल्चरल डाइवर्सिटी सबसे स्थिर रही है. बिडम्बना देखिये कि रेसोलुशन ४१७ तब कभी नहीं लाया गया जब पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिन्दू और सिख संप्रदाय पे बर्बर जुल्म हुए और उनका प्रतिशत लगातार घटता रहा इनके पलायन की वजह से. खुद अपने देश में कश्मीरी पंडितो पे हुए जुल्म को किसी अमेरिकी संस्था ने संज्ञान में लेने की कोशिश नहीं की. इस रेसोलुशन में गुजरात दंगो के लिए मोदी को जिम्मेदार माना गया जो ये दर्शाता है कि निहित स्वार्थ के चलते सोचने वाले दिमाग कितने संकीर्ण हो जाते है. ये बहस तब हो रही है जब सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चले गहन इन्वेस्टीगेशन ने मोदी को क्लीन चिट दी और यहाँ तक कि गुजरात दंगो की दोबारा जांच की मांग को भी ख़ारिज कर दिया. गोधरा में ट्रेन में हुए नरसंहार को भी स्पेशल कोर्ट  ने एक संप्रदाय विशेष को ही दोषी माना और इसमें शामिल लोगो को मौत की सजा दी. अमेरिका जो ऊँची सोच का दम्भ रखता है शायद उसे भारत की न्याय परंपरा से अधिक संकीर्ण सोच से ग्रसित और गलत ताकतों द्वारा पोषित मेनस्ट्रीम मीडिया के कुछ प्रकाशनों पे ज्यादा ही भरोसा है.

 मोदी आ जरूर रहे है लेकिन उनके लिए प्रधानमंत्री का मुकुट किसी कांटो से भरे ताज के समान ही होगा. देखना यही है कि इन विषम परिस्थितियों में वे किस तरह देश को विकास के राह पे ले जाते है. सबसे बड़ी बात यही है कि हिन्दू जनमानस के भावनाओं का वो कितना ख्याल रख पाएंगे इस तरह के माहौल में जहा सिर्फ मुस्लिम अधिकार या क्रिस्चियन अधिकार ही सेक्युलर भावना का आधार बन चुके है! क्या वो विखंडित हिन्दू आस्था को  एक बेहतर मजबूती दे पाएंगे? क्या  इतनी सारी उम्मीदे पाले असंख्य लोगो की  आशाओ पे मोदी खरे उतर पाएंगे? ये तो सिर्फ अब आने वाला वक्त ही बतायेगा. बेहतर तो यही है कि इतनी सारी उम्मीदे पालने से अच्छा है कि मोदी को अपने हिसाब से चलने दिया जाए!

अमेरिका में मानवाधिकार की ऊँची ऊँची बाते करने वाली संस्थाओ ने कभी भी कश्मीरी पंडितो के दुर्दशा को संज्ञान में नहीं लिया !

अमेरिका में मानवाधिकार की ऊँची ऊँची बाते करने वाली संस्थाओ ने कभी भी कश्मीरी पंडितो के दुर्दशा को संज्ञान में नहीं लिया !

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गुजरात के दंगो का सच: वो बाते जो सेक्युलर मीडिया नहीं बताता है या तोड़ मरोड़कर कर पेश करता है!

क्यों सेक्युलर मीडिया इस आदमी की तस्वीर का गलत इस्तेमाल करके इसका जीवन नर्क सामान बना दे रहे है?

क्यों सेक्युलर मीडिया इस आदमी की तस्वीर का गलत इस्तेमाल करके इसका जीवन नर्क सामान बना दे रहे है?


गुजरात की बात होती है तो 2002 के दंगो का जिक्र अवश्य होता है। खासकर अगर सेक्युलर मीडिया गुजरात के बारे में कुछ कह रहा हो तो। जब भी मै सेक्युलर मीडिया द्वारा प्रायोजित इन चर्चाओ को सुनता हूँ तो इस उम्मीद में कि कभी इन सेक्युलर प्रवक्ताओ की आत्मा जागेगी और ये सच बोलेंगे। लेकिन ये लकीर के फकीर जड़ मानसिकता से लैस लोग सिवाय झूठ और अर्धसत्य के कुछ नहीं बताते। असल में इनका अस्तित्व ही झूठ की बुनियाद पे खड़ा है सो सच बोलना इनके लिए आत्मघाती सरीखा सा कदम हो जाता है। इसलिए 24 प्रतिशत हिन्दू जो मारे गए इन दंगो में इनके बारे में जिक्र करना ये कभी जरूरी नहीं समझते। 

यहाँ पे मै कुछ बाते रख रहा हूँ जो मेरी बात बिलकुल नहीं है। ये बाते किसी चर्चा में मीनाक्षी लेखी ने रखी, जो  भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता है। मुझे उनकी बाते सारगर्भित लगी। कम शब्दों में उन्होंने सेक्युलर झूठ को तार तार करने की एक सफल कोशिश की है। मै उनकी बातो को ठीक वैसा ही रख रहा हूँ जैसा कि उन्होंने चर्चा में व्यक्त किया। इसके लिए मै आभारी हूँ अपने सोशल मीडिया के मित्रो का जिन्होंने मुझे इन तथ्यों से परिचित कराने में मदद की।

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1. एक अंसारी नाम  का मुस्लिम युवक जो पुलिस के सामने हाथ जोड़ रहा था,उसकी हाथ जोड़ते हुए की फोटो को  मीडिया वालो ने ऐसे प्रसारित किया जैसे वो पुलिस से अपनी जान बख्श देने की भीख मांग रहा हो जबकि वो युवक अपनी जान बचाने के लिए पुलिस का हाथ जोड़ कर धन्यवाद कर रहा था.
 

2.  गोधरा में ट्रेन में आग लगाने वाले कांग्रेस के मुस्लिम कार्यकर्ता थे पर मैं उनको मुस्लिम कम और कांग्रेसी कार्यकर्ता ज्यादा मानती हूँ.

3.  जिस तीस्ता सीतलवाड़ को लेकर आप मीडिया वाले मोदी जी पे कीचड़ उछालते हैं उसने गुलबर्ग सोसायटी से खूब माल बनाया है और इस बात को लेकर उसके ऊपर हाईकोर्ट में केस चल रहा है ये बात आप मीडिया वाले क्यों नही बताते हैं?

4.  भारत में अब तक जितने भी दंगे हुए हैं और दंगो के बाद सरकारों ने जो भी कदम उठाये हैं और गुजरात के दंगो के बाद मोदी जी ने जो कदम उठाये उनकी तुलना आप अपने मापदंडो पे करके देश को सच बताये की किस सरकार ने दंगों से निबटने के लिए सबसे ज्यादा प्रभावशाली कदम उठाये थे?

5.  1969 के गुजरात दंगो; 1984 के सिख दंगो; 1986, 1992 के मुंबई दंगो; मुरादाबाद के दंगो; बिहार के दंगो; गोपालगड, राजस्थान में हुए दंगो और अभी असम में हुए दंगो के लिए कौन सी पार्टी जिमेदार है?

साभार:  मीनाक्षी लेखी, राष्ट्रीय प्रवक्ता, भारतीय जनता पार्टी।

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और क्या सेक्युलर मीडिया ने अंसारी के बारे में इस खबर को भी उजागर किया? और अगर नहीं किया तो क्यों नहीं किया? 
 

“अंसारी का कहना है कि लोग अपने फायदे के लिए मेरे फोटो का उपयोग करते हैं। दंगों के कई साल बाद भी मुझे चैन नहीं है। लोगों ने मेरी शांति को नष्ट कर दिया है। मैंने जिंदगी में आगे बढ़ने की कोशिश की लेकिन कहीं न कहीं, कोई न कोई मेरा फोटो दिखाकर मुझे फिर पीछे मुड़कर देखने के लिए मजबूर करता है।अंसारी ने खुद को कलंक के रूप में पेश करने को लेकर फिल्म निर्माताओं को कानूनी नोटिस भी भेजा है। 38 साल के अंसारी खुद की तस्वीर को बार बार दिखाने से तंग आ चुका है। उसका कहना है कि मुझे दया के पात्र के रूप में दिखाया जाता है। मैं अपनी प्लास्टिक सर्जरी करवाना चाहता हूं ताकि लोग मुझे नहीं पहचान सके।”
 

साभार:  That’s Me

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गोधरा सेक्युलर मीडिया को कभी सही संदर्भो में क्यों नहीं याद आता?

गोधरा सेक्युलर मीडिया को कभी सही संदर्भो में क्यों नहीं याद आता?

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Delhi Gang Rape: Important Aspects Totally Overlooked By The Paid Mainstream Media

Rape Is A Social Issue!

Rape Is A Social Issue!


India’s braveheart girl must have begun a new journey in some other mysterious world. Back in India, the land of her birth and also death in such a tragic fashion, after being gang-raped and sexually assaulted in most barbaric manner, leading to severe multiorgan failure, the protests have begun to lose momentum. That’s a typical course of action for any movement in India. It sooner or later, becomes part of fading memory and, after some years, many find it hard to recollect what exactly happened! Even in this case, eyewash gesture of setting another committee had been done, ignoring  Supreme Court’s previous directions, which talked about safety of  citizens, especially the women. In fact, constitutional provisions and Law Commission recommendations, if implemented with total sincerity, are suffice to take care of safety concerns of women, always left vulnerable to such cruel turns of destiny. One Lakshmi, researcher related with women’s issue, made a fitting remark in The Hindu: “She didn’t die of multiorgan failure, but it was the multiorgan failure of this society and the state which killed her.” 

For instance, in this case, how was this bus with illegal tinted glass windows, allowed to move freely on the streets, and that too, when it passed through many police check-posts? What were the cops doing? Even in UP, cars with illegal glass windows, usually having, illegal blue/red beacon lights are in fashion. So why is the Traffic Superintendent, a mute spectator in this regard,  when the policemen from the same department are so damn conscious about ensuring regular hafta (a form of bribery) at every crossing from the truck drivers? That’s because no body is interested in annoying the political goons, occupying the high posts as Ministers! The government and High Court wish that common citizens should act as guardians of democracy but have they ensured safety of  the whistle-blowers? Before this case,Assistant Sub Inspector Ravinderpal Singh, was shot dead allegedly by Akali Dal leader local secretary (Urban) Ranjit Singh Rana and three of his associates on December 05, 2012, in Amritsar, Punjab, who had resisted the harassment of his daughter. In the same state, a gang-rape victim committed suicide on December 26, 2012, nearly a month after alleged gang-rape, which took place on November 13, 2012, being pressed upon both by police and the society to compromise. In this alleged gang-rape, a woman, identified as Shinderpal Kaur,  played a key role. The point that’s being suggested is that popular anger which has got focused on “hang the rapists” or, for that matter, demand for more stringent punishment  is absolutely misplaced. That’s not going to yield any better result.

The paid media, having struck unholy nexus, with the government, is constantly projecting  rhetoric or misplaced popular sentiments. In United States and in other nations, despite having tough provisions, the rape incidents are quite frequent, even as the better implementation of strict provisions have ensured  lesser victimization rate. The point worth considering is that they have given to wider considerations side-by-side stricter laws, which includes concerns related with widespread denial of women as potential sexual aggressors, female-female rape, distinction between forcible and non-forcible rapes, rape of males by females and etc. The researches there also included the impact of drugs, especially alcohol. Even though timing of entering into contrasts with United States is not okay, especially at this point of time, I am but compelled to do since angry people have given way to demand for tougher laws, forgetting that stricter laws can only work wonders when we have sound and sympathetic government machinery in action. Is that the case in India, wherein all sorts of legal provisions have got limited to law books alone?  

Against this backdrop, before I deal specifically with the Delhi gang-rape, I wish to clearly state that it would be fatal to confine the urge for changes to “safety of women alone” or, for that matter, demand for stricter provisions to prevent rape. This line of action is being deliberately highlighted under pressure from feminist wings, tactically supported by Congress government, which hopes to regain power with female voters and minority card in next Parliamentary actions. The mainstream media is also singing the same tune, because in wake of fear to lose government’s aid,  it has no other option but to toe the stance taken by government. This whole drama which captured the nation’s attention from December 16, 2012, until death of gang-rape victim was a well-orchestrated show managed perfectly well by the paid media and Congress government. There are enough circumstantial evidences which give proof of it that the real story is something else and it’s more horrible than what we all came to witness in these past turbulent fifteen days. I will deal with this aspect later in this article but first let’s not ignore these pertinent points. 

Had the protests been genuine and intentions of government honest, the demand would have not been focused on safety of women or rights of women alone, it would have been focused on better safety concerns for every citizen, irrespective of gender. The most horrible thing is that this time politics was done in name of this unfortunate girl, victim of brutal gang-rape, who is no longer in this world. This protest was given vulgar and aggressive shape by the vested interests with immediate and  long-term gains in mind. The news of  nuisance created by agents of Congress, belonging to NSUI wing, at India gate have now surfaced, and this confirms the suspicion that real story is something else. Three main reasons could be deviating attention of general public from its recent failures on all fronts, diminishing the impact of victory of Narendra Modi at national level, and, above all,  an attempt to keep intact the female votes, by emerging as champion of female rights ( the way it tries to emerge as protector of minorities) in long term with some immediate steps in this direction right now.

It’s really ironical that on the one hand sponsored protesters, and foreign funded women’s organisations,  are demanding for tougher laws, and, on other hand, this case is now being under the vigilance of Delhi High Court since it has taken suo moto cognizance! Now that’s pretty disturbing! What was the need to do so? May be its apprehensive that government machinery might play foul and delay the justice, and thus, it’s intervention becomes necessary to ensure fair and speedy justice! Without debating the merit of High Court’s decision to take suo moto cognizance of this case, I wish to know will superior courts always take moto cognizance of such cases to ensure fair trial once tough laws come into operation? In other words,  we are mindlessly asking for tough laws in a nation, wherein  monitoring of cases by superior  court becomes necessary to ensure fair  justice. In the United States, we have a fair system which not only ensures that tough laws operate within a perfect apparatus but also that cases be dealt in scientific manner. Imagine the consequences of tough laws in corrupt and biased set up which India entertains, wherein right from investigation to trial stage, everything is shoddy and flawed. Does our system has ensured that those abusing the process of law do not go scot-free?

We have already witnessed what has been the fate of tough dowry provisions and SC/ST provisions and still dare to believe that tough provisions would stop rapes in current set-up? Isn’t it was the fear of misuse which led to scrapping of POTA provisions? I am afraid it would only lead to further deterioration of men-women relationships, which is the agenda of foreign sponsored feminist  institutions (weakening the institution called family and marriage) and also of secular parties, which breed on chaos and disorder. I mean we are living in times, wherein rape has become some sort of tool to settle scores, a weapon to blackmail, to an extent that even consensual sexes, after love gone sour, gets projected as rape. I am sure a little commonsense, instead of expecting everything to be achieved with the help of laws, would yield better results.

We should not forget that we are living in times, wherein, an actress, Maria Susairaj, can enter in one of the most macabre murders, ever intercepted by world of crime. That’s why instead of a knee jerk reaction, a conscious approach which ensures that cases are dealt in light of merit, not governed by biases for any particular gender shall create better days. Mere strict provisions, with ample scope of their misuse shall only make females become natural enemy of males. There are many MPs and members of state assemblies,booked under rape charges, and if they are asked about it they would let you know that they have been falsely implicated! Their versions may or may not be true, but it does give you an idea that either legal system is being used to settle scores or it’s not being used at all! Against this backdrop, how would you ensure that tough provisions would ensure justice?    Let’s have a glimpse how this system functions. The death of constable Subhash Tomar, amid the violent protests at India Gate, is now shrouded in mystery. The autopsy report suggests, that death was caused by a sharp object but the witnesses claim that death was a natural affair and no such attack was involved! See the contradiction.

But we are living in strange times. The mere appeal to women to dress properly or maintain right visiting hours is seen as some sort of curtailing their rights or independence, and not as commonsense. That’s because so-called lust for absolute freedom, on par with corrupt theories sponsored by feminists, have robbed of their ability to think in simple terms, making them see every such sound advice as insult of their beings. For instance, I  am sure even a men, however strong may he be, run the risk of being attacked and killed, if he dares to move on streets all alone during nocturnal hours! So is there any point in seeing a crime in a gender specific way and demanding safety of women alone? Check the data and you would find more number of men killed in tragic way. So should I start campaigning for safer world of men? Attack and getting killed is more failure of law and  order, instead of something born out of  gender specific cause. Another idiotic argument presented by the feminists, and modern girls, is that wearing provocative dress is no invitation to rape. That’s true and I agree whole-heartedly with the counter offered but what I totally disagree is that provocative dressing creates no impact. That defies psychological laws. It’s a common phenomenon that both female and male physiological responses i.e. erectile responses are involuntary in wake of anticipating atmosphere surcharged with sexual stimulants. 

So why are we trying to create a system, which mainly tries to accommodate demands of one sex, not in tune with common sense and  psychological aspects? Mind you even “gun-culture” would not ensure a safe scenario if some basic sociological principles get avoided. That’s the reason why gun-culture in United States has not ensured desired result. Anyway, I am not suggesting that following such simple steps, rapes would become a rarity or, for that matter, decently dressed woman would altogether be free of sexual assaults, but these simple steps would ensure a significant drop in crime against woman. That’s exactly what  Vrinda Grover, lawyer and women’s activist, is trying to say when she  says that: ” There is no evidence to suggest that the death penalty acts as a deterrent to rape…….Certainty of punishment rather than the severity of its form could act as a deterrent.” (The Hindu)

It’s also strange that gang-rape of this girl is being projected as awakening of this nation but it’s really baffling to understand what exactly are we trying to say when we say so? Are we trying to say that had this girl been not gang-raped we would have never awakened? That’s why I feel this huge protest is orchestrated or it’s totally redundant. That I say so since Delhi has already attained the infamous title of being “rape capital of the country'” long back ago. There were 568 cases of rape, registered in 2007-2011 period. So was Delhi and whole nation sleeping? The Times of India news report from where I picked this data, quoting a police official, stated:  “Former IPS officer Y P Singh said the police informally classify rape into two categories: technical and violent. ‘In case of technical rapes, there is an element of consent involved and there is no violence. Some examples are a lady caught red-handed in an act and then alleging rape; a man inducing a lady with a false promise of marriage and having intercourse. There have also been cases where departmental seniors have called for wives of suspended juniors to stop the husband being dismissed from service,” said Singh.”  

At the time when this case caught the limelight, an unfortunate mother in Uttar Pradesh, was struggling hard to get  justice in a case involving suicide of her daughter, after being gang-raped. However, neither the media nor the concerned  higher authorities including District Magistrate paid any attention to her grievances. That makes it even more important to understand the true elements constituting the protest at India Gate and Jantar Mantar. That I say so because in past we have witnessed murder most foul like Naina Sahni murder case, Madhumita Shukla murder case, Jessica Lal murder case, and brutal rapes like one involving Aruna Shanbaug and rape of a twelve year old mentally challenged girl by a drunkard in Mumbai local train even as the others remained a mute spectator, and now we pretend that after December 16 gang-rape, nation has awakened, and, thus, demand greater safety of women! 

How can we forget the brutal gang-rapes of  two Mizo women, abducted from Dhaula Kuan, Delhi, and repeatedly gang-raped in moving vehicles in 2005 and 2010? Why we did not then gave way to such awakening? In fact, they were too dumped on the street, unconscious and without clothes, very much like the December 16 tragic episode? They were not subjected to injuries of grave nature but they are still facing emotional trauma.”The condition of this woman is worse as she seems to have lost her mental balance after the incident. “I have been told she still flows into a fit of rage, bangs her head against the wall and keeps on inflicting injuries on her private parts,” informed one of the members belonging to the  Northeast Support Centre & Helpline while narrating the normalcy report of  2005 case victim.

That’s why it becomes more than necessary to intercept this December 16 gang-rape case under the lens and scrutinize its each aspect very deeply. The moment you do so, you realize that this tragic episode, was used very shrewdly to serve some vested interests and there are many dark aspects, which have not at all surfaced despite being vast media coverage in sensational way. One might differ with my conjectures/hypothesis but the very facts point towards well-planned conspiracy to first blow out of proportion such episode and later conceal or destroy the evidences so that real picture never surfaces. Let’s deal with such dubious aspects one by one. First of all, many who had gathered at India Gate/Jantar Mantar were people belonging to women’s rights association and as per unconfirmed news reports there were disturbing elements from one political party to make the protests go out of control! The same thing happened. So that means less number of people from general public-the cattle class- and more people from dubious sections of society were mourning at the India gate and Jantar Mantar -the two spots which got maximum coverage by the mainstream media- demanding safety of women, which led to killing of constable Subash Tomar! 

Secondly, we need to know who was behind the decision to carry her to  Singapore based hospital? Why was that considered necessary and that too when it not only involved additional risk to patient but also involved huge expenditure involving taxpayer’s money? Medical fraternity is absolutely sure that there was no need to get her shifted to any other hospital, involving flight journey, when she was on ventilator, struggling hard to overcome multiorgan failure  Since it appears to be more a political reason than a medical reason, isn’t  that  shows lack of insensitivity on part of political class?  And secondly, a government claiming to ensure safety of woman, entered in such a cruel gesture when the whole nation was watching! It speak volumes about the decision making ability of Congress leaders, ironically, one of them is Lady Chief Minister of  Delhi! Agreeing  that Delhi High Court had remarked about shifting the victim to a super-specialty hospital but that was subject to  advice of medical experts and limited to extreme conditions. And the medical team has already  denied that they had no role in that decision! So who made this decision and for what reasons? It’s also curious  that electronic media channels, who covered the initial sensational phase of the tragic episode, were the ones, who abstained from covering the last ceremony of the victim, wherein it’s learned that government acted with undue haste to get the last rites done quickly, much against the opposition of parents of the victim! 

Anyway, the most sensational aspect happened while recording the statement of victim in the ICU. The Sub Divisional Magistrate Usha Chaturvedi was not only prevented from video recording of the victim’s statement by three senior police officers but also  asked by them to ” use a questionnaire they prepared”. Now that says all. The episode took a serious turn, making the SDM report the matter to Deputy Commissioner (East) B.M. Mishra. The questions we need to ask and think over are: Whom was Delhi Police trying to protect? Why was it not interested in having the videography done? Who were the backstage people involved, who influenced Delhi Police to act in that fashion? As per news reports, the people involved, the six men charged with crime, are people from lower section of society and so it’s highly impossible that top level police officers would react in that fashion and be head on with a superior authority unless some big fish is involved! And that too, at a moment, when right from Prime Minister to whole nation, everyone appeared  to be damn conscious about ensuring justice for this lady! So what was the need for Police officers to prevent the SDM from following her own way? Isn’t it a stunning blow to the claims that tough laws would ensure better environment for women? With this sort of functioning style, it’s anybody’s guess that only innocents would be behind the bars, leading to weakening of the societal structure, which in turn would help the foreign agents, in tandem with anti-India forces, to create more space for their direct control of affairs in India.

Anyway, I leave upon conscious readers to frame suitable answers for these disturbing questions. Right now I just pray for that departed soul: May you always rest in eternal peace. Hope Lord gives you all, what you failed to achieve in this ephemeral world, governed by human sharks, promoting their deadly agendas. Angels like you have no room for survival in this world.

References: 

The Hindu

The Economic Times

The Hindu

The Hindu

The Hindu

The Hindu

The Hindu

The Hindu

The Hindu

India Today

Wiki

Punjab Kesari

The Times Of India

The Times Of India

Subhash Tomar

The Hindu

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गन्दी राजनीति के भंवर में डूबते हिन्दू मुस्लिम सम्बन्ध

मोदी: इनके अच्छे कार्यो का कोई महत्त्व नहीं क्योकि हमको सिर्फ गन्दा देखना है

मोदी: इनके अच्छे कार्यो का कोई महत्त्व नहीं क्योकि हमको सिर्फ गन्दा देखना है

नरेन्द्र  मोदी से ज्यादा सहानभूति नहीं मेरी. ना मै उनका कोई बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ क्योकि अतिवादिता या उग्र विचारधारा का समर्थन  मै उचित  नहीं मानता. ये अलग बात है कि इस आदमी का जिस पैमाने पे और जिस तरीकें सें विरोध होता है उसको देखते और समझते रहना आपको बहुत कुछ सिखा देता है. ये दिखा देता है कि गन्दी राजनीति किसे कहते है. ये सिखा देता है कि किसी के भूत के नुमाइश में किस तरह कुछ संस्थाएं खुद भूत जैसे सलंग्न है. अब ये आदमी कितना भी अच्छा  कर जाए कुछ लोग इसको देखते ही “गुजरात के दंगो” नाम के महामंत्र का उच्चारण शुरू कर देते है. खैर इस आदमी कि उपलब्धिया दुर्लभ है क्योकि जब केंद्र से किसी राज्य के आंकड़े छतीस के हो तो उस राज्य  का प्रोग्रेस के पैमाने पे सबसे खरा उतरना एक विलक्षण घटना है.

 

मै इस आदमी को इस मामले में अधिक रेटिंग देता हूँ, सम्मानीय मानता हूँ कि इस देश में भरे भ्रष्ट नेताओ से ये बेहतर है क्योंकि कम से कम ये आदमी अपनी बात डंके के छोट पे खरी खरी कहता है और नितीश कुमार की ही तरह इसकी सोच विकास-उन्मुख है. साफ़ साफ़ दो टूंक बात कहना आसान नहीं होता जब तक आप के अन्दर मनन करने की काबिलियत ना हो. आप विवादास्पद हिन्दू मुस्लिम समीकरण को ही लें. इस देश में आज़ादी के समय से सत्ता पे काबिज़ कांग्रेस के रूख को देखे तो समझ में आएगा कि इस पार्टी ने सेकुलर हितो के रक्षा के नाम पर कितनी घिनौनी राजनीति कि जिसका दुष्परिणाम देश में हुएँ भयानक दंगे है. आप ये विडियो देखे और आपको समझ में आ जायेंगा कि कांग्रेस और नरेन्द्र मोदी में फर्क क्या है. आप के ये समझ में आ जाएगा कि कौन है जो हिन्दू बनाम मुस्लिम बाते करता है घिनौने तरीके से. कुल मिला के प्रोग्रेस का पैमाना क्या हो? ये हो कि कुछ ख़ास नाकाबिल लोगो को उच्च पदो पे बिठा दिया जाए क्योकि वे एक वर्ग विशेष का प्रतिनिधित्व करते है?

https://www.youtube.com/watch?v=-ruZLBeelhs&feature=player_embedded

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अंत में थोडा सा हटके.. फालतू और वाहियात के कार्यो में सलंग्न लोगो को भारत रत्न देने की सिफारिश होती है क्योकि इनसे बहुत से लोगो के राजनैतिक हित सध जाते है. इस गंदे समीकरण में आनंद कुमार जैसे काबिल लोग कभी फिट नहीं बैठते. इसलिए ये उपेक्षित रह जाते है. पर क्या सूर्य को काले बादल कभी हमेशा ढके रह सकता है? कभी नहीं. आनंद  कुमार की प्रतिभा मेरा सलाम जिसने उपेक्षित प्रतिभाओ का सही सम्मान किया उन्हें उनकी सही जगह दिला कर.

आनंद  कुमार की प्रतिभा को मेरा सलाम जिसने उपेक्षित प्रतिभाओ का सही सम्मान किया

आनंद कुमार की प्रतिभा को मेरा सलाम जिसने उपेक्षित प्रतिभाओ का सही सम्मान किया

References: 

Super 30 

Anand Kumar

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Hindus Vs Muslims: Revealing Dirty Politics In India

Narendra Modi: When Past Is Used To Corrupt The Future!

Narendra Modi: When Past Is Used To Corrupt The Future!

I have never been sympathetic to causes supported by Narendra Modi. I have never been great admirer of this man, who has now become a key figure in national political landscape of this nation. That’s because extremism of any form or aggressive ideologies never appeal to my instincts. However, it’s highly interesting to analyze the drama of protest and opposition played in his name. His opposition by secular parties of this nation reveals what really constitutes the art of dirty politics. It lets you know how someone’s past is distorted to serve one’s vested interests, how some parties have crossed all limits to paint someone in wrong colours! This man responsible for phenomenal progress in Gujarat is best remembered for riots of Gujarat. That’s so evident the way his adversaries start accusing him of riots whenever something significant flows from his side. Anyway, it’s really unbelievable that a state can achieve such a progress rate when it’s having snake-mongoose type relationship with the Centre. This development story cannot be taken lightly.

I give high rating to this man, treat him worthy of respect, on grounds that his vision is progressive and development oriented. He has the uncanny ability to call a spade a spade in times when speaking in equivocal manner has become order of the day. Mind you ability to speak in clear terms cannot be gained by people in league with cheaper orientations. One has to be man of principles to sound honest. One cannot engage in deeper reflection unless one has got one’s imagination in right place. 

Take for instance controversial equations governing relationship of Hindus with Muslims. Take into consideration the policies unleashed by Congress regimes since India attained freedom. It played the most dirty games all in the name of restoring secular values. As a result of such divisive policies, the nation saw many terrible riots. Have a look at this video. It’s quite revealing! It reveals who is the real culprit and who are the ones really responsible for distorting the face of this nation all in the name of serving the minorities. So what should be the line of action-the vision- to ensure progress in this nation? Should it be that some incompetent people be placed in high positions just because they happen to represent a particular religion?


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Something out of context to display how right people are being treated in this nation. In this nation lesser names involved in vain acts get recommended for prestigious awards, only because it serves the political interests of people in power. The people like Mathematician Anand Kumar, the owner of Super 30 institution, always remain marginalized. That’s because they never become part of dirty game played in the name of awards. However, sun cannot be overpowered by black clouds. Its existence is synonymous with shining brightly. Hats off to spirit of Anand Kumar, which enabled the underprivileged souls to be on the road to progress.

Anand Kumar: The Man Who Really Deserves Prestigious Award

Anand Kumar: The Man Who Really Deserves Prestigious Award

References: 

Super 30 

Anand Kumar

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Ghost Of Gujarat Riots: A Panacea For Secular Souls Lying On Their Death Beds

Ghost Of Gujarat Riots: A Panacea For Secular Souls Lying On Their Death  Beds

The ghost of Gujarat riots acts as panacea for secular souls lying on their death beds. The horror stories conceived by the psuedo-intellectuals still make their presence felt whenever the right wing politics makes its presence felt in this nation. The most amazing thing is that people talking about the killings of Muslims at the hands of Hindus in 2002 Gujarat riots seem to be trapped in some sort of time warp. I mean they fail to acknowledge the role of Narendra Modi in light of recent happenings.

It’s hard task for them to realize that Gujarat has become role model for growth and economic prosperity. They fail to realize that half-truths and falsehood sustained by them with help of biased Indian and foreign media are losing strength with each passing day as we come to face-to-face with new facts pertaining to the riots. They still hail Narendra Modi as “butcher” even as the butcher has now attained new heights with a clean image- an image fit enough to be in the race to emerge as new Prime minister. New heights attained by Narendra Modi has made him pain in the ass for soul indulging in secular politics.

The Gujarat riots provide us an interesting glimpse into the functioning of media and Indian politics. It shows how our media and politics are crippled by mediocre minds, who lack ability to intercept the new realities that have emerged in India and world outside. It’s very clear that politics in India has always been aimed to grasp the power and it’s never been people oriented. It’s never been growth oriented. It’s never been aimed at true “Bharat Nirman“. On the contrary the unholy nexus of power hungry politicians with slavish media always worked to materialize their vested interests. So we have likes of Teesta Setalvad who ” cooked up macabre tales of wanton killings” like “a pregnant Muslim woman Kausar Banu was gangraped by a mob, who then gouged out the foetus with sharp weapons”.

We have likes of Arundhati Roy who used their fertile imagination to talk about killings that never took place at all. The Western media believing these sincere “agents of Satan” painted Modi in all wrong colours and like always used their flawed writings to enter in India bashing. Their writings made India appear a nation that does not respect human rights of minorities!! As a result of such India bashing our secular governments learnt the right lesson and ensured that likes of Afzal and Kasab have their plates of “Biryani” behind the bars!!!

The modus operandi is now not a well guarded secret. The secular writers and media persons of this nation first churn out bullshit and then it gets spread to other parts of world, wherein such half-truths are treated as gospel truth by like minded souls who convert them into special stories. The main intention is to derail the growth of India. That’s the reason why when Karan Thapar interviews Narendra Modi it becomes necessary for him to flaunt his limited knowledge about Godhra happenings, forgetting that Gujarat has entered into new mode after the incident. However, the time has stopped for secular souls and to them the only thing that has taken place in the universe since it came into origin after the big bang is Gujarat riots!!!!

I need to appreciate Ram Jethmalani that he made realize the secular fool Karan Thapar that people like him who own American or British accent usually have a very poor IQ level. It’s pathetic to see that even likes of Romila Thapar can stoop down to an all-time low to appease the secular forces. So she can make a shrill cry that Ayodhya verdict was based on faith and not on facts without bothering to know the content of the judgment in reality. The real tragedy is that most of the other publications or electronic channels make little effort to go into details. They keep repeating the flawed opinions as that serves their vested interest quite well rather than insipid truth. Truth does not make news. However, twisted truth does manage to find many takers.

How can we forget that secular UPA government went out of the way to establish anti- constitutional Banerjee committee, which ensured that Godhra train burning looks “accidental” ? Now that’s the way secularism in India is being promoted. The lies related with minorities after given larger than life image are being presented as truths while the truths related with majority are being presented as falsehood !! What’s really stunning is that media including foreign which boasts of ensuring truth never bothers to cross check the authenticity of facts if it involves the interests of minorities but to ensure the “culpability” of Modi they can pressurize even the Apex court.

The same media never bothers to enquire as to how come so many awards were given by the Indian government to Teesta Stalvad when she had been guilty of lying on oath? How came she became part of government managed committees? Who ensured that a convict like Binayak Sen be part of Planning Commission? Why the media never sheds tears over the way UPA or secular governments misuse constitutional powers?

Ghost Of Gujarat Riots: A Panacea For Secular Souls Lying On Their Death  Beds

Why is the media so hyper conscious in targeting anything remotely serving the cause of Hindus? In other words, the way Indian media is interested in targeting Hindu forces makes it clear that it’s too agent of foreign forces, which wish to disturb the stability in South Asian region. These forces are using the tried and tested “divide and rule” method and dirty minds in UPA with help of gestures like introduction of “Prevention of Communal and Targeted Violence(Access to Justice and Reparations), 2011″ ( Communal Violence Bill) are making confrontation a reality. The Indian media is more interested in chasing myth like “Hindu Terrorism” instead of sabotaging the reality in form of Islamic terrorism which has now reached inside the corridors of Parliament and Courts!!! Well, it’s time for the conscious citizens to ensure the demise of secular media and secular government and get it replaced with a government which really thinks about their welfare in sound way with right policies.

Recently, I had a meaningful conversation with New Delhi based senior journalist Jayanta Bhattacharya over the distorted face of truth when it comes to Gujarat riots. I am presenting the conversation as it is. It has some fascinating facts including the recent findings, which makes it quite clear that media loves to portray falsehood and not truth. Let me remind the readers that conversation started when one gentleman hailed Narendra Modi as “Butcher of Gujarat” . I must make it very clear that I am no great fan of Modi but it really bothers me that making caricature of people doing good work has become a special feature of Indian minds. I also do not appreciate the way my dear friend has hailed Narendra Modi as “Mahatma Modi” but I must say he is one of the few who has the guts to speak the truth without being afraid of the repercussions.

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Jayanta Bhattacharya:

Butcher of Gujarat? Who? If you are talking about Narendra Modi then I must say that you are a victim of Con-led UPA propaganda. Under Con rule in Gujarat more communal riots took place. In 2002, more Hindus died in the post-Godhra riots than Muslims, that started with the heinous murders of innocent Hindu pilgrims by blood-thirsty jihadis in the Sabarmati Express near Godhra. It was Mahatma Modi, the angel of peace who brought the riots to a stop within 48 hours thus saving the lives of many, many more Hindus. Do you have any idea what you are saying?

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Arvind K. Pandey:

Well, the recent verdict delivered by Supreme Court is a hard slap on the faces of people seeking culpability of Narendra Modi in 2002 riots. However, the dull minds refuse to accept the reality. Allan Johannes seems to be one of them for whom distorted truth and falsehood is more dear than truth!!

Though the magistrate is yet to deliver the final verdict, it can still be stated that it’s truth that ultimately shines and not the propaganda engineered by dirty secular minds.

From the news item:

The Supreme Court on Monday refused to pass any order on Gujarat chief minister Narendra Modi’s alleged inaction to contain the 2002 Gujarat riots after the Godhra carnage and referred the matter to the concerned magistrate in Ahmedabad for a decision.

“God is great!” — tweeted Gujarat chief minister Narendra Modi on Monday summed up his reaction to the Supreme Court direction in the 2002 Gulburg Society riots case in just three words.

The reaction of the 60-year-old BJP leader reflected his relief over the order as he was being accused time and again by opposition Congress and activists of culpability in 2002 riots…….

The bench made it clear that there was no need for it to further monitor the riot cases. BJP hailed Supreme Court’s order and said that it was a victory for Modi.

Source: The Sunday Indian

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Jayanta Bhattacharya:

And, it is a fact that Congress councilor from Godhra participated in the Godhra carnage, and the post-Godhra riots were carried out by mostly Youth Congress members (http://bit.ly/gJsYBU). Starting from the Godhra murders (for which an all-Muslim team was convicted with Haji Billa and some sentenced to death) to the post-Godhra riots, more Hindus were killed than Muslims. I can provide facts and figures to prove my point. The Godhra murders and the subsequent rioting was a part of well-planned scheme by ISI and its Congress agents to defame the Gujaratis and weaken Indian nationalists.

From the news item:

NEW DELHI: The Congress has been going to town over Best Bakery and other instances of the Narendra Modi government’s complicity in the anti-Muslim violence which shook Gujarat last year. But when..

Source: Cong silent on cadres linked to Guj riots

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Arvind K. Pandey:

You are damn right… Thanks for setting the records straight in this regard.. I am really upset the way Indian and world media deals with real facts. I am no lover of Modi but when is one so cocksure about the involvement of Modi as a “butcher” what’s preventing them to acknowledge the new facts, which prove that riots were the handiwork of dubious elements with whom Modi had no connection at all ? One sees the so-called “butcher” but what about the “butchers” involved in Godhra train carnage? The world ( read Indian media and biased foreign media) never discuss it openly.

Shame on secular souls who hatched a conspiracy to make the Godhara carnage appear ” accidental”. It’s a real insult to talk with such secular minds and listen their arguments ! !

I hope Jayanta has read this latest news item about one of the greatest butchers in modern times Narendra Modi, wherein ” US Congressional Research Service, a think-tank which provides support to the US Congress, has stated that Narendra Modi has streamlined economic growth in Gujarat, removed red tape in functioning of the government, curtailed corruption and given special emphasis on infrastructure in Gujarat”

Source: The Times Of India

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Jayanta Bhattacharya: ‎

I, as an Indian would like to see a better tomorrow. I want my country to be prosperous. I want my country to be free from foreign agents scheming and perniciously eating it from within. I want to see my country being respected world over. When I travel outside my country, I want to see respect for me in the eyes of the citizens/subjects of the lands I travel. I want to see poverty alleviated from my motherland. I want to see people educated in my country. I want to venture out of my house without the fear of being killed/harmed by terrorists or communal forces or any other criminal. I want to live without fear, prejudice and hatred. I want to be a truly free man in a free democracy where appeasement policies do not buy votes of religious communities. I want to be treated equally as a Muslim or a Christian or a Dalit despite being a Hindu and yet have the freedom to be proud of my faith. I want the policies of my nation to be governed by the people of nation and not by the OIC or the Vatican. I shall, therefore, do everything possible to see Mahatma Modi, the angel of peace and God’s chosen one as the Prime Minister of India. PERIOD.

Into that heaven of freedom, my Father, let my country awake. Vande Mataram!

Ghost Of Gujarat Riots: A Panacea For Secular Souls Lying On Their Death  Beds

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References:

Gujarat Riots

Economic Times

Modi On Gujarat Riots

Teesta Setalvad

Karan Thapar With Modi

Karan Thapar With Ram JethMalani

Romila Thapar On Ayodhya Verdict

Banerjee Committee

Congress and Gujarat Riots

Supreme Court Refuses To Rule On Modi

US Congressional Research Service

Delhi High Court Blast

Jayanta Bhattacharya

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