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Vishal Bhardwaj: A Genuine Music Composer In Times When Indian Music Directors Have Become Copycats

Vishal Bhardwaj: The Really Talented Filmmaker And Music Composer

Vishal Bhardwaj: A Truly Talented Filmmaker And Music Composer


( Also published in  Northern India Patrika, December 08, 2013 ) 

One needs a great musical mind to appreciate the music of Vishal Bhardwaj. We are well aware of his directorial skills, having seen his ability to deal with complex themes in movies like Omkara, Maqbool, Kaminey and Saat Khoon Maaf, to name a few. In my eyes he is a music director par excellence, who still have guts to introduce original compositions in Bollywood given way to borrowed tunes. If we analyze deeply the happenings inside Bollywood’s musical landscape what prevails is recycling of works of others in most blatant manner with no credits to original composers who composed these compositions in the first place.  

Very recently I watched “Ek Thi Daayan” which dealt with supernatural elements. It was a theme which had not much scope for a romantic number. However, Vishal managed to create magic with his “Yaaram” song. Gulzar after demise of his best friend RD Burman felt a great sense of loneliness. He wasn’t all wrong in feeling that way. Only RD Burman had that capability to lend perfect musical notes to newsy type lyrics penned by Gulzar. Thanks to the arrival of Vishal Bhardwaj, which allowed Gulzar to breathe a sigh of relief. Vishal didn’t disappoint Gulzar. The chartbusters like ” Yaaram”, “Naina Thag Lenge”,  “Darling”, “Chod Aaye Hum Wo Galiyan”, “O Saathi Re”,  “Dil To Bachcha Hai Ji”, “Raat Ke Dhai Baje”, “Matru Ki Bijli Ka Mandola” and “Sapney Me Milti Hai” etc. are the ones which bear testimony to the fact he knows what treatment very sensitive verses of Gulzar actually need.

This very highly conscious music director, dealing in experimentation and improvisation in unorthodox manner, loves to introduce best of the literary works, which until now remained unexplored by Indian movie-makers. The cinematic versions of Shakespeare’s Othello, Macbeth and Hamlet really impressed all film-goers. At the same time, movie versions of Ruskin Bond’s “Susanna’s Seven Husbands” and “The Blue Umbrella’ also left the lovers of cinema spellbound. In fact, even in movie meant for kids like Makdee you can notice the variation he introduced in his music. He has received National Award for his music in Ishkiya and Godmother. Today Bollywood is dominated by musicians who first don’t know what music really means, and second, they are not musicians but technocrats depending on arrangement of music done by the computers. A reason why film music sounds so mechanical and jarring to the ears. Worse, it’s so humiliating when foreign composers make allegations that Indian music makers totally copied their compositions in the name of inspiration!

Happy That This Man Has Got So Many Awards!

Happy That This Man Has Got So Many Awards!

Against this backdrop, this genuine music composer evokes a sense of self pride within with his creativity. Let’s hope his fabulous compositions which make wonderful use of various instruments like Piano and Guitar keep enthralling music lovers. One is not against Western music and use of latest technology but against ignorance of richness present in Indian music. There is calculated attempts on part of movie makers to diminish the aura of Indian classical music. Vishal Bhardwaj is the best example of how to blend western notes with Indian classical music. This art needs to be learnt by new age Indian music directors, who, sadly, are more interested in making money instead of truly enriching the world of film music. Anyway, Vishal Bhardwaj needs to be complimented for keeping the roots of Indian classical music green and fresh.

Some of the songs composed by him: 

1. Chod Aaye Hum Wo Galiyan

2. Naina Thag Lenge

3. Maine To Maanga Tha 

4. Dil To Bachcha Hai Ji 

5. Raat Ke Dhai Baje 

6. Matru Ki Bijli Ka Mandola

Pics Credit: 

Pic One 

Pic Two

विश्व फ़िल्म इतिहास की दो बेहद शानदार फिल्मे है आवारा और शोले!

 

 

आवारा : एक युवा मन के जिद और संकल्प से उपजी शानदार कृति.

आवारा : एक युवा मन के जिद और संकल्प से उपजी शानदार कृति.

भारतीय फिल्मो ने मई २०१३ में १०० वर्ष पूरे कर लिए. ये एक लम्बी अवधि होती है किसी भी मीडियम के गुण दोष को परखने के लिए. हमारी फिल्मो ने कई मंजिलो को तय किया लेकिन फिर भी गुणवत्ता की दृष्टि से इसकी रफ्तार बहुत धीमी है. हमारी अधिकांश फिल्मे एक ढर्रे पे बनती है जिनमे प्रयोगवादी फिल्मकारों के लिए बहुत कम स्पेस बचता है कुछ नया करने के लिए. ऐसा नहीं कि उल्लेखनीय काम नहीं हुआ पर इनकी संख्या कम है. आज भी आप देखे कि  सालाना  लगभग 800-900  फिल्मे बालीवूड में बनती है पर उनमे से कितनी याद रख भर पाने के लायक होती है?  इसी तरह फिल्मी संगीत भी खासकर वर्तमान समय में बेसुरें ताल में है कुछ एक अपवाद को छोड़कर. उस पर भी अगर विदेशी स्टैंडर्ड्स से गौर करे तो भारतीय फिल्मे अभी बहुत पीछे है. क्षेत्रीय भाषाओ जैसे बंगाली, मलयाली, इत्यादि में अच्छा काम हुआ लेकिन जिस तरह हिंदी फिल्मो में उतार आया वैसे इन भाषाओ की फिल्मो में भी गुणवत्ता के लिहाज सें गिरावट दर्ज की गयी. खैर इस लेख में मै आवारा और शोले इन दो फिल्मो का जिक्र करना चाहूँगा.

राजकपूर और गुरुदत्त मेरे पसंदीदा फिल्मकार रहे है. जिस संवेदनशीलता से इन्होने फिल्मे बनायीं उसकी मिसाल ढूंढ पाना मुश्किल है. राजकपूर जो कि ज्यादा पढ़ लिख नहीं पाए ने जब आवारा बनाने का निर्णय लिया तो वो एक बोल्ड निर्णय था. फ़िल्म की कहानी ख्वाजा अहमद अब्बास ने लिखी थी जो प्रोग्रेसिव लेखको की जमात से आते थें. फ़िल्म का शीर्षक ही विवादित था लेकिन जिद के पक्के राजकपूर ने शीर्षक बदलने से मना कर दिया. ये यकीन कर पाना मुश्किल है कि इस कम पढ़े शख्स ने भारतीय फ़िल्म इतिहास को उसकी सबसे भव्य फिल्मे दी, सबसे बेहतरीन फिल्मे दी. राजकपूर  की ये विलक्षण निशानी थी कि फ़िल्म के हर पहलू चाहे वो गीत हो या संगीत हो या एडिटिंग हो सब पे पैनी निगाह रखते थे और जितने भी संशोधन वो करते थें वे सब फ़िल्म को नयी उंचाई दे जाते थे. आवारा भी इन्ही सब प्रयोगों से लैस थी.

इतनी कम उम्र में आवारा या आग जैसी फिल्मो का बनाना ये साबित कर देता है कि बुजुर्गो की तोहमत झेलते ये ” कल के लौंडे” ही अंत में अपवाद काम करके जाते है. ये किसी भारी भरकम इंस्टिट्यूट से नहीं निकलते बल्कि जिंदगी की पाठशाला में तप कर निकलते है और ये सिद्ध कर देते है कि “कुछ लोग जो ज्यादा जानते है वो इंसान को कम पहचानते है”. आवारा में नर्गिस के बोल्ड दृश्य थें लेकिन किसी को भी मना लेने का हुनर रखने वाले राजकपूर  ने उस दृश्य को हकीकत में बदल दिया लेकिन इस प्रक्रिया में क्रिएटिविटी के उच्चतम शिखर पे हम राजकपूर को पाते है। आवारा में भारतीय फिल्मो का पहला ड्रीम सीक्वेंस भी है. जब इस पर कई लाख रुपये खर्च करने की बात आई तो सब ने राजकपूर को सनकी कहा क्योकि पूरी फ़िल्म का बजट एक तरफ और इस ड्रीम सीक्वेंस का खर्च एक तरफ रख दे तो इतना बजट काफी होता है एक अन्य फ़िल्म के निर्माण के लिए. लेकिन राजकपूर ने ड्रीम सीक्वेंस के बजट में कोई कटौती नहीं की. आज टाइम मैगज़ीन राजकपूर के आवारा में किये गए अभिनय को 10 सर्वश्रेष्ठ अभिनय कौशल जो फ़िल्म के सुनहरे परदे पे अवतरित हुई उनमे से एक मानती है और आवारा फ़िल्म इतिहास की सौ सर्वश्रेष्ठ फिल्मो में से एक है.

सन 1951 में रिलीज़ आवारा कायदे से देखा जाए तो  पहली वो फ़िल्म मानी जायेगी जिसने असल अन्तराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की. चीन, सोवियत संघ, टर्की, रोमानिया, मिडिल ईस्ट और अन्य जगह ये ख़ासा लोकप्रिय रही. इसका गीत संगीत भी इतना लोकप्रिय हुआ कि  “आवारा हूँ” गीत विदेशो के उन हिस्सों में भी बजता था जहा भारतीय फिल्मो की पहुच कुछ नहीं थी. आवारा मैंने पहले पहल 1988 में देखी जब दूरदर्शन ने एक विशेष प्रसारण के तहत इन फिल्मो को दिखाया। राजकपूर जो मशहूर कपूर खानदान से होते हुए भी ने फिल्मी सफ़र की शुरुआत क्लैप बॉय से किया उस ने दिखाया कि हुनर जन्मजात ही आता है. ये किसी स्कूल की देन नहीं होती. ये फ़िल्म चाहे शंकर जयकिशन का संगीत हो, राज-नर्गिस की रूमानी केमिस्ट्री हो, शैलेन्द्र-हसरत के हृदयस्पर्शी गीत हो या राधू कर्माकर का  बेहतरीन छायांकन हो हर लिहाज़ से सर्वोत्तम थी. आवारा इस बात का प्रतीक है कि बदलाव युवा वर्ग ही लाता है अपनी सोच से और अपनी जिद से.

शोले: जिसकी आंच एवरग्रीन हो! गयी

शोले: जिसकी आंच एवरग्रीन हो! गयी!

 

शोले का भी जिक्र हो जाए. जहा आवारा बनते समय एक हलचल महसूस की गयी वही शोले के निर्माण के समय ऐसा कुछ नहीं था. बल्कि हैरान करने वाली बात ये है कि भारतीय फिल्मो के इतिहास में अनोखे आयाम जोड़ने वाली ये फ़िल्म जब प्रदर्शित हुई तो सब तरफ फीका फीका सा माहौल था. ये वो फ़िल्म थी जिसे आज विदेशी आलोचक भी मानते है कि निर्देशन, अभिनय और कैमरा वर्क के हिसाब से ये फ़िल्म बेजोड़ है. शोले की दहक को अजर अमर सरीखा बना देने वाले गब्बर सिंह का रोल पहले डैनी के हिस्से में आया था लेकिन उनके मना कर देने के बाद ये हलकी आवाज़ वाले अमजद खान के हिस्से आया. इससे बहुत से लोगो को इसके निर्माण के दौरान ये महसूस होने लगा कही ये एक वजह ना हो जाए इस फ़िल्म के ना चल पाने का . लेकिन अमजद खान ने जो संवाद अदायगी की वो इतनी बेजोड़ है कि उसके बारे में भारत का हर बच्चा भी जानता है.

आज लगभग 35 सालो बाद भी इस फ़िल्म के किरदारों का जिक्र होता है. रेडियो या टेलीविज़न खोल के देखे आपको जय-वीरू, बसंती और गब्बर के दर्शन होना तय है. मेरा रेडियो जब भी मुंह खोलता है मतलब “चालु”  होता है तो गब्बर की आवाज़ की नक़ल में कोई शख्स जरूर थोड़ी देर में कहता है ” इस घंटे का पैसा कौन दिया है रें”. यहाँ तक कि एक भारतीय बैंक के विज्ञापन में भी  “बसंती” ने ख़ासा योगदान दिया. मुझे याद आते है अपने कॉलेज के दिन. खाली वक्त में हमारे कालेज के कई प्रतिभाशाली कलाकारों से अगर कुछ परफार्म करने को कहा जाता था तो ये लगभग तय होता था कि उनमे से कोई शोले के डायलोग की मिमिक्री जरूर करेगा.  इस फ़िल्म की विलक्षण बात ये है कि इस फ़िल्म के हर किरदार ने शानदार अभिनय किया और जिसका सीधा सम्बन्ध कहानी को नया मोड़ देने सा था. इसका नतीजा ये हुआ कि एक बहुत सामान्य सा दर्शक भी अच्छी तरह याद रखता है कि किस किरदार ने किस वक्त पे क्या संवाद बोला है. सो इस फ़िल्म के मशहूर चरित्र तो लोगो ने याद रखे ही रखे लेकिन इसके गौड़ चरित्र भी उतने ही यादगार साबित हुए. अब जैसे ए के हंगल का बोल हुआ ये संवाद भी लोग बड़ी गंभीरता से याद रखते है ” इतना सन्नाटा क्यों है भाई?”  

महबूब खान दुबारा फिर ना  कभी “मदर इंडिया” जैसी कोई फ़िल्म बना पाए और ना रमेश सिप्पी “शोले” जैसी  कोई और यादगार फ़िल्म दे पाए.  कही ना कही प्रकति में चीज़े अव्यक्त भाव से छुपी रहती है और वक्त आने पे कोई ना कोई उनका माध्यम बन जाता है उनको यथार्थ के धरातल पे लाने का. कम से कम “शोले” जैसी फिल्मे इसी रहस्यमय बात की साक्षी है. शोले चाहे अपने ट्रीटमेंट में विदेशी गुणों से ओतप्रोत रही हो, संगीत भी पाश्चात्य धुनों से प्रभावित था लेकिन ये अन्तत: भारतीय परंपरा के बुराई पर अच्छाई की जीत को दर्शाती है, पवित्र  प्रेम को दर्शाती है और मित्रता के महत्व को प्रक्षेपित करती है.

 

क्यों पूछने की हिम्मत है किसी की: अब तेरा क्या होगा कालिया :P :P :P

क्यों पूछने की हिम्मत है किसी की: अब तेरा क्या होगा कालिया :P :P :P

रेफरेन्सेस:

शोले 

शोले 

आवारा 

आवारा 

पिक्स क्रेडिट:

Pic One 

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Pic Three

भारतीय फिल्मो में नायिकाओ का रोल मार्फ़त मनीषा कोईराला और उर्मिला मातोंडकर

मनीषा कोईराला: इस बेहद प्रतिभाशाली अभिनेत्री को भी खराब समझौते करने पड़े और फिर भी हाशिये में जाना पड़ा!

मनीषा कोईराला: इस बेहद प्रतिभाशाली अभिनेत्री को भी खराब समझौते करने पड़े और फिर भी हाशिये में जाना पड़ा!

भारतीय फिल्मो ने सौ सालो का फासला तय कर लिया है। ये अवधि काफी है इसके कुछ गुण दोषों पर नज़र डालने के लिये। भारतीय फिल्मी नायिकाओ के उत्थान पतन का जिक्र करना जरूरी है। भारतीय नायिकाओ के इस चरित्र को आधुनिक काल के दो अभिनेत्रियों मनीषा कोईराला और उर्मिला मातोंडकर के अभिनय ग्राफ पर नज़र डालने से बेहतर समझा जा सकता है। इसके पहले इस बात का जिक्र करना जरूरी हो जाता है कि जबसे भारतीय फिल्मे बन रही है तब से नायिकाओ का काम केवल पेड़ के आस पास टहल घूम कर नाचने कूदने का भर का ही था। अब भी कुछ नहीं बदला है। झरने की जगह स्विमिंग पूल आ  गया है। पहले नायिकाएं कूल थी अभिव्यक्ति के मामले में पर जब से “वुमन ऑफ़ सब्सटेंस” का अवतरण हुआ तब से वो और अधिक बोल्ड हो चली है। कम कपड़ो में भी शालीनता की रक्षा की वकालत हो रही है। पहले महिला निर्देशकों, गीतकारो का अकाल सा था लेकिन अब ऐसा नहीं है। लेकिन इसके बाद भी ये कहा नहीं जा सकता कि नायिकाओ के स्पेस में कोई गुणात्मक परिवर्तन आया हो। जो स्थिति पहले थी वो अब भी है। या यूँ कहे कि अब जब पैसा बनाने की हवस, कॉर्पोरेट और माफियाओ का गठजोड़ अपने चरम उफान पर है तो गुणात्मक परिवर्तन की अपेक्षा रखना तारो का दिन में उगने का ख्वाब देखने के सामान है।

उर्मिला मातोंडकर और मनीषा कोईराला के करियर पर दृष्टि डालने से फ़िल्म में नायिकाओ के महत्त्व की एक दिलचस्प तस्वीर उभर कर आती है। मै मूलतः मेनस्ट्रीम सिनेमा की बात कर रहा हूँ। कला फिल्मो में तो हम देखते है शबाना आज़मी, स्मिता पाटिल, सुहासिनी मूले इत्यादि अभिनेत्रियों ने अच्छा काम किया और इसके साथ ही मेनस्ट्रीम सिनेमा में अच्छा काम किया। ये अलग बात है स्टार वैल्यू प्रधान मुख्य धारा के सिनेमा में इनके लिए ज्यादा कुछ करने के लिए था नहीं। सुष्मिता सेन जो कि एक्टिंग टैलेंट में ऐश्वर्या  से कही आगे थी उनको तो आज के महिला निर्देशकों के उपस्थिति के बाद ज्यादा कुछ करने को नहीं मिला लेकिन फूहड़ अभिनय करने वाली ऐश्वर्या राय की झोली में कई बड़े बैनर की फिल्मे आयी। हर फ़िल्म में बकवास अभिनय करने के बाद भी आप बदन उघाड़े ऐश्वर्या को कैनंस फ़िल्म समारोह में देख सकते है। इसी से समझ में आ जाता है कि पॉपुलर सिनेमा में टैलेंट कम काम आता है कुछ और सतही समीकरण ज्यादा काम आता है।

उर्मिला ने मुमताज़ की तरह ही बचपन से फिल्मो में काम करना शुरू कर दिया। पिंजर और सत्या जैसी फिल्मो में काम कर चुकी उर्मिला एक बेहद समर्थ अभिनेत्री है लेकिन कैसी बिडम्बना है कि हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री ने इन्हें बदन प्रधान अभिनेत्रियों में अग्रिम पंक्तियों ला खड़ा किया। इसके बाद वो राम गोपाल वर्मा कैम्प तक ही सिमट के रह गयी है। लेकिन आप उर्मिला की फिल्मे देखे तो समझ में आएगा कि वेस्टर्न वर्ल्ड ने जो एक्टिंग के मापदंड तय किये है उनमे उर्मिला शानदार रूप से खरी उतरती है। बल्कि उनसे बीस ही है क्योकि डांसिंग टैलेंट में अभी विदेशी अभिनेत्रियाँ इतनी सक्षम नहीं है जितनी की उर्मिला है। ये आपको तब दिखता है जब आप  चमत्कार फ़िल्म में ट्रेन कम्पार्टमेंट में फिल्माया बिच्छू गीत देखते है।

अभिनय की जिस बारीकियो को उर्मिला ने “कौन” फ़िल्म में प्रदर्शित किया वो किसी साधारण टैलेंट से ओतप्रोत अभिनेत्री के बूते के बाहर है। इसलिए खेद होता है कि इतनी सक्षम अभिनेत्री को मुख्यधारा सिनेमा में बदन दिखाऊ दौड़ में शामिल होना पड़ा। एक सक्षम अभिनेत्री को रेस में बने रहने के लिए क्यों बदन दिखाने की कला में आगे रहना पड़ता है? ये परिपाटी किसने स्थापित की? आप कह सकते है बाज़ार की बड़ी पूँजी लगी होती है पर पूँजी तो हालीवुड की फिल्मो में हमसे अच्छी लगती है पर टैलेंट से वो तो समझौता नहीं करते! खैर आज की नयी अभिनेत्रियों को देखे तो कुछ एक नामो को छोड़ दे तो अधिकतर के पाद टैलेंट तो कुछ नहीं लेकिन बिकनी पहनने में संकोच ना करने के कारण वो मुख्य धारा में कामयाब है। यहाँ तक कि एक हाल की अभिनेत्री ने जिसने पहली फ़िल्म में साधारण औरत का किरदार किया था उसने भी अपनी अगली ही एक अन्य फ़िल्म में बिकनी में आगाज़ किया!

मनीषा कोईराला  के उदाहरण से आपको ये समझ में आ जाएगा कि हमारे यहाँ टैलेंट की समझ और परख कितनी है। मनीषा ख़ामोशी, बॉम्बे, गुप्त, मन  और अकेले हम और अकेले तुम में शानदार अभिनय करने के बाद हाशिये पर चले गयी। यहाँ तक कि उनको अपने को सुर्खियों में रहने के लिए निम्न स्तर की फिल्मो में काम करना पड़ा। साफ़ है कि उगते सूरज को सलाम करने वाली इस इंडस्ट्री ने मनीषा को तज दिया। आज कैंसर से जूझती मनीषा को इंडस्ट्री संज्ञान में लेना उचित नहीं समझती। स्पष्ट है ग्लोबल वर्ल्ड में जो पैसा पैदा कर सकता है चाहे चमड़ी बेचकर ही क्यों न बस उसी की क़द्र है। टैलेंट है तो ठीक और नहीं है तब भी ठीक अगर आप पैसा पैदा करने के समीकरण में फिट बैठते है तो। सनी लियोन और वीना मालिक का चमकता सितारा तो यही बताता है। उर्मिला और मनीषा के प्रतिभा को सलाम कि इस अंधे युग में भी टैलेंट के महत्त्व को बरकरार रखा।

उर्मिला मातोंडकर : एक अभिनेत्री जो घिसे पिटे मापदंडो में उलझ कर रह गयी!

उर्मिला मातोंडकर : एक अभिनेत्री जो घिसे पिटे मापदंडो में उलझ कर रह गयी!

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दीप्ति नवल को हम हमेशा, रैकेट चलाने वाली के रूप में नही, वरन एक बेहद प्रतिभाशाली अभिनेत्री के रूप में याद रखेंगे।

हम आपको हमेशा एक बेहद प्रतिभाशाली अभिनेत्री के रूप में याद रखेंगे।

हम आपको हमेशा एक बेहद प्रतिभाशाली अभिनेत्री के रूप में याद रखेंगे।

दीप्ति नवल प्रकरण से मुझे काफी झुंझलाहट हुई। ये समझ में आने लगा है कि मीडिया का स्तर ना सिर्फ रसातल में चला गया है बल्कि ये अब किसी के साफ़ सुथरे दामन में कीचड पोतने का सबसे कारगर तरीका बन गया है। नहीं तो मीडिया को क्या जरुरत थी कि इस बात को प्रचारित करने कि दीप्ति को  आख़िरकार “प्रोष्टिट्यूशन डेन” से मुक्ति मिली।  जबकि मामला सिर्फ ये था कि उसने अपना पुराना घर कालोनी की सोसिएटी के कर्ता-धर्ता लोगो की बदसलूकी की वजह से छोड़ा जो उसकी निजता का सम्मान नहीं कर रहे थें।

दीप्ति नवल ने शायद बातो ही बातो में अपना दुखड़ा किसी पत्रकार सें क्या शेयर किया कि उसकी बाते तोड़ मरोड़कर मीडिया की सुर्खियाँ बन गयी। आप कह सकते है कि ऐसी बात  चश्मे-बद्दूर के दौरान होने का सीधा सा मतलब ये है कि फ़िल्म को प्रमोट करने का ये स्टंट  भर था। इस सरलीकरण के पीछे तर्क सिर्फ ये हो सकता है कि पब्लिसिटी कैसी भी हो फलदायी होती है। तो क्या एक समर्थ अदाकारा के इतने बुरे दिन आ गए कि चाहे सही में या झूठ में उसे अपने अस्तित्व के लिए ऐसे खबरों के दम पर निर्भर रहना पड़े?

माना कि ये भी एक कडवी सच्चाई है कि फ़िल्म एक्ट्रेस या एक्टर्स को बुरे दिनों में हर तरह के समझौते करने पड़ते है लेकिन ये स्वीकारने में बेहद तकलीफ है कि नियति ने दीप्ति को भी गलत राहो पर धकेल दिया। दीप्ति की कठोर प्रतिक्रिया मिलने के बाद ये समझ  में आ रहा है कि ऐसा कुछ भी नहीं जैसा मीडिया दर्शा रहा है। ये मीडिया का सुर्खिया बटोरने की  कला का नमूना भर था। दीप्ति नवल हमेशा साफ़ सुथरी फिल्मो  में बहुत शशक्त अभिनय के लिए ही याद रखी जायेंगी। ये वाकई कलियुग है कि कोई किसी के उजले चरित्र से कुछ सीखता तो नहीं लेकिन उसके उजले दामन में कालिख पॊतने के सौ  बहाने ढूंढ लेता है। ऐसे पत्रकार  जो दूसरों की बदनामी पर पलते है ऐसे लोगो को पत्रकारिता जगत से बाहर कर देना चाहिए। इनसे पत्रकार नाम से उपजने वाले समस्त सरोकारों से कोई सम्बन्ध  ना रखने दिया जाए। अगर मार्कंडेय काटजू कि बात माने तो ऐसे लोगो से उनके पत्रकार सम्बन्धी लाइसेंस को खारिज कर देना चहिये। बहरहाल पत्रकारिता के नाम पर  जो तमाशे हो रहे है वो दुखद है।

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Songs For Beloved Moon Embracing Clouds: Hiding, Smiling And Crying

Moon And Romance! It's Commonplace  :P

Moon And Romance! It’s Commonplace :P


Well, for past few days, I was bit taken aback by some sad developments. I wanted to finish the English version of one of my well read posts in Hindi. However, lack of concentration on my part was delaying it. By dint of  fortune, I came to participate in conversation on a prominent Radio Forum, Shrota Biradari,dominated by oldies, which was involved in making of document related with Hindi movie songs based on moon. Moon has always appealed to my senses. I am a night watcher since childhood and to gaze at stars and moon has been my favourite past time. Even now in my village, when I am all alone, surrounded by nothing but stillness of night, penetrated by chirping of cricket etc., I sit hours in open to gaze at the moon. Neil Armstrong had to visit moon to end up as philosophical human being but my passion for moon is deep enough that it does not require a trip to moon to admire its beauty.

Anyway, the forum involved in preparation of songs missed  some of my favourite songs. I wanted to add these songs to the document but I thought let’s share the same songs for readers and friends, having taste for refined music, narrating my own personal connection with the songs. Don’t forget that popular numbers already got included in that document and these are the ones which are close to my heart, but, sadly, these did not appear in that document. The silver hairs got trapped in age which produced gems like “O  Raat Ke Musafir” (Miss Mary),  “NaYe Chand Hoga” ( Shart) and “Ye Raat Ye Chandni Phir Kaha( Jaal), to name a few. So let me include some of the songs they failed to take note of.

“I’ve tried the new moon tilted in the air
Above a hazy tree-and-farmhouse cluster
As you might try a jewel in your hair.
I’ve tried it fine with little breadth of luster,
Alone, or in one ornament combining
With one first-water start almost shining.

I put it shining anywhere I please.
By walking slowly on some evening later,
I’ve pulled it from a crate of crooked trees,
And brought it over glossy water, greater,
And dropped it in, and seen the image wallow,
The color run, all sorts of wonder follow.”

( The Freedom of the Moon by Robert Frost)

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1. Badalo Me Chup Raha Hai Chaand Kyo

That’s a charming song from movie directed by Mahesh Bhatt’s “Phir Teri Kahani Yaad Aayi”. The best thing about Mahesh Bhatt  is that no matter what’s the theme of his movies, he gives brilliant songs. The camera angles employed in his songs make the songs look so terrific. Just  remember “Tumhe apana banane ki kasam khayi hai” from Sadak – a well picturized song which depicts the state of mind of woman trapped in world of prostitution, trying to come to terms with new-found freedom. Anyway, this song is also well shot. And like always, the movie involves doomed romance. For me, the songs brings back the memories of  90s and this movie’s almost all the numbers were simply too good. Lyricist Qateel Shifai and musician Annu Malik did a wonderful  job. Interestingly, as a student, I had limited access to money, and thus, buying cassettes always meant sacrificing the last few notes found in my pocket. So I had to doubly assure whether or not all the songs were melodious in cassette. That meant taking “panga” (starting a fight) with the shopkeepers as they were often reluctant to make you listen all the numbers in bits and pieces. Anyway, these type of cassettes did full justice to few bucks (paisa vasool) which I managed to save those days.

2. Dhanno Ki  Ankhon Mein Raat  Ka  Surma 

Amazing song!  No wonder R D Burman is hailed as a true genius. Look at the sound employed in the travel song with folk touch. Talking of this sound effect, he told to Gulzar that when he first played this instrument, flanger, it produced a very harsh noise. The people around him were bit skeptical about its effect in ensuring melody. It was not so easy to make use of it. But watch this superbly picturized train song and you would realize that  how well R D Burman  used this instrument to create rhythm effect produced by train as it travelled through the valley. Hey, the song talks about Dhanno but this Dhanno is totally different from Basanti’s Dhanno! Like always imagery employed by Gulzar mesmerizes us. The song is visual delight as well. Never before train song produced such a romantic appeal. Above all, it’s “Chand Ka Chumma” (Moon’s Kiss) which kills us!

3. Chaand Chura Ke Laya Hoon

Again R D Burman and Gulzar come together to produce this great number. I like the song because the moment it refers to stealing of moon and love birds spending time behind some building like church, it brings into my mind the great buildings of British period. Although, this song does not feature Church but images of majestic buildings from previous eras appear before the eyes. By the way, tell me how many times have you seen Church being used as a spot to promote romance? But anything was possible if two souls, always out of their minds, Gulzar and R D Burman sat together to compose songs. These two always hailed themselves as crazy souls. Oh yes, crazy souls alone made some sense in world turned into hell by intelligent souls!

4. Khoobsurat Hai Wo Itna 

This song from movie “Rog” has two versions. One is sung by M M Kreem, the music director who composed this song. Another  one is sung by Udit Narayan. However, Kreem’s version is  close to my heart. I need to say few words about Kreem. This techie music composer, hugely underrated in Bollywood, is one of the few music composers, who know how to really compose a song using modern instruments, without copying anything from Western world, in name of inspiration. These are some of the hard working musicians who have kept the dignity of Bollywood music world intact. How sad, people talk about A  R Rahman but they fail to take note of gems composed by such lesser heard names. I came to hear him first in my college days, when out of curiosity, I came to buy this cassette, seeing new names on the flap of the cassette as unheard names always fascinated me. Now lend ears to  this moving number, which talks about pangs of falling in love with beloved belonging to someone else legally! That’s why the song says ” moon is dotted with rough spots yet one cannot resist its beauty”!

For movie version to notice the picturization one can visit this link.

5. Mera Chand Mujhe Aaaya Hai Nazar

The tragedy with Bollywood is that if movie bombs at the box office, the songs also fail to create impact. I am sure very few movie lovers would have heard the name of this movie released in the middle of the 90s. Mercifully, Jatin Lalit was at its peak in those days. This innovative duo managed to give some beautiful numbers, which managed to find the ears despite movie doing average business. Since this movie is by-product of Bhatt Camp, rest assured that song must be aesthetically shot! I love this song because it takes me to college days, wherein I realized that moon in youth leaves the sky and gets placed in some beautiful face!

6. Chamakte Chand Ko Toota Hua Tara Bana Daala 

Whenever Ghulam Ali came to sing for Indian movies, the song turned out to be defining moment in world of Indian movie music. Be it “Dil Ye Pagal Dil” or ” Chupke Chupke Raat Din”, the songs always managed to stay in the hearts and minds for forever. So it  was not unexpected that this song became representative song for broken dreams. What stunning lines the verses have! Just listen  to it and you would be bound to play it for more time. Anu Malik was not very popular in those days, but with such movies, he managed to build a position for himself. The  bold sequences in the this song have the stamp of Mahesh Bhatt’s vision!

7. Mere Roothe Hue Balma

This song is departure from the songs I have mentioned in  this post. It’s from a classic produced in 1950 “Bawre Nain”, featuring Raj Kapoor and Geetabali. The song would let you know that how simple and innocent gesture have given way to nothing left for imagination gestures of Sunny Leone. Anyway, this song has remarkable innocent gestures of Geetabali, who is trying to please  her moon. I am happy that silver hairs failed to mention this good number, dedicated to moon, sung by Rajkumari, and allowed me to talk about this song..ha..ha..ha. This beautiful singer sang few songs but these few songs have become unforgettable numbers.

8. Chanda Dekhe Chanda To Chanda Sharmaayein

This song has a very pleasant tune and some excellent from verses from Maya Govind- a very talented female lyricist from Lucknow.  How often we notice female lyricist in Bollywood or elsewhere? My friend Sagar Nahar, who is prominent song collector  from Hyderabad, very rightly points out that this Bappi  Lahiri’s composition sounds very similar to S D Burman’s composition in Abhiman ” Tere Mere Milan Ki  Raina”. Interestingly,  both the  movies Jhoothi and Abhiman were directed by  Hrishikesh Mukherjee. And, above all, it’s picturized on stunningly beautiful Rekha!  What else can eyes crave for!

For Rekha lovers, here is a clearer video, but unfortunately, the song is incomplete.

9. Kolaveri Di  

Well, I need not to say anything about this song. I have already written a post on it, which you can read here. I have to mention this song for one more time because first it belongs to current period, making you all know the changes that have hit the Indian film music, and secondly,  it talks about moon in hilarious way. A song meant for heart broken guys but the approach involved is refreshingly unique. Anyway, for me, it means a greater involvement with moon instead of nurturing hatred for distance moon.

References: 

Dealing With A Breakup In Love Relationship Kolaveri Di Way

Rajkumari Dubey

M. M Kreem

Maya Govind

Pics Credit:

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Yash Chopra: A Filmmaker In Love With Illicit Relationships And Flawed Romance

Yash Chopra: The Filmmaker Interested In Flawed Romance

Yash Chopra: The Filmmaker Interested In Flawed Romance


I have never been die hard fan of Yash Chopra’s movies. His romantic angles mired in illicit relationship always left me appalled. He was a noted filmmaker having Midas touch for conceiving interesting themes, hinging around three people in one single relationship, either due to providence or chance. His penchant for such complex relationships, on par with illicit love affairs, could be gauged from the fact that barring his early years of film making when he made gems like Waqt, Dharamputra, Ittefaq, Mashaal, Trishul, Deewar and Kala Patthar, nearly all his movies in later years depicted adultery in one or other form. It can be safely opined that his movies, both explicitly and implicitly, promoted illegal relationships. That’s pretty unfortunate as filmmaker of his caliber should have been more sensible in application of his mind.

He had the brilliant ability to present romance with all its elements in grand style. The grandeur and colourful imagery noticeable in his movies takes away our breath. It’s true that average cine-goer likes to flirt with unfulfilled dreams and wishes as he/she enters inside the theater, and tries to dissolve the harsh realities in the silken world appearing and disappearing on the silver screen. Any average filmmaker is not very much interested in exposing his viewers to shades of realism. Yash Chopra understood this well and so in his movies we have characters, borrowed straight from Mills and Boon novels, flirting with  their ladies against scenic backdrop. No wonder Swiss government honoured Yash Chopra for promoting tourism in Switzerland!

To make his romance stories gain some substance, he was but compelled to fall in the arms of “illicit relationship” so as to provide some shock value to his films. However, he lacked the ability to seriously contemplate over any issue, which demanded deep attention, but in the same genre  his brother B R Chopra exhibited the art of serious presentation in an effortless manner. That’s why B R Chopra’s “Gumrah”, having adultery as central theme, depicted the conflict emanating out of such relationship quite well. Yash Chopra’s movies based on the same plot stand nowhere to pathos exhibited in Gumrah. Yash was more governed by the desire to emerge as a successful director in the genre of popular cinema despite being person of immense capabilities. He was a pure entertainer, who used “arrival of third person” as perfect masala element to make his movies mint money. That’s why we cannot contrast him with likes of Raj Kapoor. He failed to attain the stature of Raj Kapoor, who was also governed by the desire to emerge as great entertainer but with a difference: Raj’s sensitivity always managed to find a suitable cause, which under his brilliant directorial treatment ripped apart our emotions. In fact, lot is said about depiction of grandeur/ style in his movies but Gulshan Rai and Feroz Khan stand miles ahead of him even in this department.

Now  That's  Called   Candyfloss Romance!

Now That’s Called Candyfloss Romance!

Let’s take into cognizance “illicit relationship” – a dominant feature of his movies. He should not have roped in this angle unless he  had enough reasons to substantiate his viewpoint. For instance, let’s take “Darr” promoted as a violent love story. What was Yash Chopra trying to demonstrate? That Sunny Deol (husband) has to be equally cunning, powerful and mad like Shah Rukh Khan (lover) to save his wife from the shrewd moves. The greatest irony is that evil gets checkmated by good doesn’t sound convincing in the end when evil enjoys the upper hand, dancing with some else’s beloved for most of the time. One of the salient features of movies made by Yash Raj Films has been that one has to be shrewd and street smart to emerge as a winner. Idealism is of little use in world dominated by market-oriented world, wherein end justifies the means. That’s the guiding principle of protagonists appearing in “Trishul” and “Deewar”. Aditya Chopra’s “Dilwale Dulhania Le Jayenge”  highlights the same trait. The protagonist even as he is reluctant to run away with his beloved, enters into ridiculousness and pathetic gestures to woo his would be wife. The success of this movie is remark on the declining standards of a viewer’s approach towards cinema.

That’s the aberration which marred the movies churned out by Yash Raj Films. The movies having candyfloss flavour, embedded in synthetic sentiments, depicted a section of society, which barely depicted the real face of India. For instance, Salaam Namaste was entirely shot in Australia, talked about reunion of two lovers, caught in problems born out of “laid-back lifestyle”. Hum Tum, Mohabbatein, Dil To Pagal Hai and etc. turned out be old wine in new bottle. Even patriotic perceptions were effectively used in  “Chak De India” to keep the cash box ringing. The point is that Yash Chopra and his successors have realized this pretty well that market forces and not the theme of the movie, which ensures success or failure. The global world, which made the boundaries meaningless, opened new markets, and, therefore, themes also got focused on people who sustained these markets. Both Bollywood and Hollywood rely on stereotyped emotions to make their movies emerge as blockbuster. So scenic landscape, stunning faces, big cars and pulsating music became the essential ingredients of romantic movies be its made by Yash Chopra or anyone else from Hollywood.

Some might find it unpalatable, and unbearable as well, to treat his movies as promoter of illegal relationships. However, it’s not a misplaced belief when one becomes aware of the fact that  cinema, life and society are intimately linked to each other. Chandni, Dhool Ka Phool,  Kabhi Kabhi, Silsila, Doosra Aadmi, Darr, Faasle, Lamhe, Daag, Aaina, Yeh Dillagi and Mere Brother Ki Dulhan to name a few, more or less, had controversial themes, wherein secret lover or illicit relationship added a complex twist to the story line. It’s a cliche to state that cinema borrows its concept from society. The ultimate truth is that it borrows the clues from society, exaggerates them, turning them into saleable scripts and, in the process, creates scope for more distorted themes. In a combined  research conducted by the ” American Medical Association, the American Psychological Association, the American Academy of Pediatrics, the American Academy of Child and Adolescent Psychiatry and the National Institute of Mental Health” to establish the negative impact of movies on youths in USA, it was clearly established that “just as every cigarette increases the chance that someday you will get lung cancer, every exposure to violence increases the chances that some day a child will behave more violently than they otherwise would.”

 The point is when you are genuinely depicting the harsh realities of life, be it centered on illegal relationship, it adds a new dimension in your understanding but when you use such themes to carve unrealistic presentation, merely to ensure commercial success, it’s altogether a different story. Yash Chopra was more conscious of commercial success then ensuring a perfect  treatment to a substantial story line. Ironically, Mahesh Bhatt  also used illicit relationship as effective plot but he ensured that he remained close to the real life. Anyway, Yash Chopra makes me realize that  attaining success is different thing than doing good work which makes difference in lives of people. He got success by promoting flawed romance, which served no greater cause other than ensuring flow of money.

Illicit Relationship Looked More Charming In His Movies

Illicit Relationship Looked More Charming In His Movies


Reference:

New York Times

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यश चोपड़ा: अवैध सम्बन्धो को प्रमोट करती इनकी भव्यतापूर्ण सफल रोमांटिक फिल्मे

यश चोपड़ा: गलत "लम्हों" के सौदागर

यश चोपड़ा: गलत “लम्हों” के सौदागर


यश चोपड़ा की फिल्मे मुझे कभी न रास आई।इनको रोमांटिक फिल्मो का बेताज बादशाह माना जाता रहा है। रूमानियत को एक सुनहरे कैनवास पर पूरे  तामझाम के साथ उतारना इन्हें खूब आता था।ये सही है कि एक औसत दर्शक सिनेमा में असल जीवन की छाप देखने नहीं जाता बल्कि अपने अधूरे सपनो को परदे पे अवतरित होते हुए देखने जैसा अनुभव बटोरने के लिए जाता है। और  दर्शको  की इसी कमजोरी को यश चोपड़ा ने अच्छी  तरह समझा और उसकी शानदार प्रस्तुति की। लेकिन मुझे  लगता है यही पे यश चोपड़ा मात खा गये। इतना समर्थ फ़िल्ममेकर सिर्फ दर्शको की चाह पूरी करने के लिए और वक़्त के साथ चलने की धुन में बेहतरीन सिनेमा  बनाने से रह  गया। यश चोपड़ा की कुछ एक फिल्मे  जैसे वक़्त, धर्मपुत्र, इत्तेफ़ाक, त्रिशूल, दीवार, काला  पत्थर, मशाल और एक दो कुछ और फिल्मे छोड़ दे तो उनके सारी फिल्मे प्रेम त्रिकोण या कुछ कुछ अवैध संबंधो जैसे टाइप की थीम पर बनी है। मै यश चोपड़ा के इसी “तीसरा कौन” रूख पर आलोचनात्मक दृष्टि  डालना चाहूँगा। “इत्तेफाक ” भी लगभग अवैध संबंधो  पर है लेकिन मै इसको एक सुंदर मर्डर मिस्ट्री मानता हूँ। राजेश खन्ना ने जितने शेड्स इस फ़िल्म में दिखायें है सहज रूप से मुझे नहीं लगता कि आगे की फिल्मो में वे वैसा कर पाए। यहाँ तक कि नंदा ने भी नई ऊँचाइयों को छुआ जो कि ज्यादातर ग्लैमरस  गर्ल ही रही है।

अब आते है “तीसरा कौन” के थीम पर। मुझे ये एंगल ही बहुत घिनौना लगता है फिर इस पर बनी फिल्मे देखना और इनसे उभरी सोच को आत्मसात करना  तो मेरे लिए बहुत दुष्कर कार्य है। खेद की बात है यश चोपड़ा ने ऐसी विकृत एंगल को बढ़ावा दिया। इस प्रोडक्शन हाउस में बनी फिल्मे अधिकतर कही न कही विकृति को ग्लोरिफाय करती मिलेंगी। बात ये है कि यश चोपड़ा के पास  किसी मुद्दे की गंभीर समझ नहीं थी जैसी बी आर चोपड़ा के पास थी। इसलिए बी आर  चोपड़ा की एक अकेली “गुमराह”  यश चोपड़ा की इसी विषय पर बनी दर्जनों बेकार फिल्मो से बेहतर है। यशजी के पास  संवेदनशीलता का अभाव था  इसीलिए राज कपूर से बहुत पीछे रह गए। भला हो साहिर साहब का कि इनके फिल्मो के लिए इतने दिल को छु लेने वाले गीत लिख गए। इनके फ़िल्म में स्टाईल का बड़ा बोलबाला था पर यहाँ भी ये फिरोज़ खान ने हमको ये बेहतर सिखाया कि स्टाईल एलिमेन्ट का कैसे इस्तेमाल करना चाहिए। यश साहब के पास बस दर्शको को बांधे रखने की कला थी भव्यता और मधुर संगीत का आवरण ओढे बेकार सी विषयवस्तु वाली थीम के साथ। 

ये कहना गलत नहीं होगा कि अवैध संबंधो को जस्टिफाय और ग्लोरिफाय या विकृति को बढ़ावा देने में इस प्रोडक्शन हाउस की फिल्मे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार है।आप नब्बे के दशक में आई “डर” देखिये। दर्शको को इससें कुछ लेना देना नहीं था कि अंत में सनी दयोल शाहरुख के किरदार पर फाईट सीन में हावी होकर उभरता है। इस फ़िल्म का सन्देश वस्तुत: इस बात को हाईलाइट करता था कि किसी भी सभ्य औरत के ज़िन्दगी में घुस कर उसे परेशान कर सकते है। अब आप सनी दयोल बन कर रोक सकते है तो रोकिये नहीं तो आपका घर तबाह। और बिडम्बना देखिये कि इस विकृति सम्पन्न हीरो को कितना रोमांटिक दिखाया गया है। तो ये थी यश साहब की काबिलियत। आगे यश साहब ने फिल्मे तो नहीं डाइरेक्ट की लेकिन आदित्य चोपड़ा और अन्य नए निर्देशकों ने इनके बैनर तले फूहड़ पर कामयाब फिल्मे बनायी। “दिल वाले दुल्हनिया ले जायेंगे” की अपार सफलता इस बात का प्रमाण है कि दर्शको को घटिया फिल्मो में भी मायने ढूँढने का चस्का लग चुका था। रास्ते कितने भी घटिया हो  पर अगर वो मंजिल तक पहुचाते है तो ठीक है। एक आदर्शवादी बाप को चालाक और धूर्त नायक के आगे झुकना पड़ सकता है और कमाल है ये सब उसने प्रेम के लिए किया, ये इसलिए किया कि  भगाना  उसे पसंद नहीं था और इसलिए झूठ बोलकर घर में नौटंकी करना जरूरी  था। दर्शको का टेस्ट और स्तर कितना गिर गया है वो हमे इन फिल्मो की सफलता से पता चलता  है।

रास्ते अपवाद स्वरूप गलत हो सकते है लेकिन सिर्फ धूर्तता और मक्कारी से कामयाबी सुनिश्चित होती अगर लोगो ने इस बात को स्वीकार कर लिया है तो निश्चित ही भारतीय समाज पतन के रास्ते पर है। भारतीय समाज इस बात को समझे या न समझे लेकिन इस प्रोडक्शन हाउस ने समय की नब्ज को पकड़ा कि अब मार्केट से फिल्मो का सीधा कनेक्शन है मूल्य या आदर्श गए तेल लेने। इसलिए इस बैनर ने तमाम बौड़म फिल्मे बनायीं ओवरसीज मार्केट को ध्यान में रखकर जैसे “हम तुम” , “सलाम नमस्ते”, तथाकथित राष्ट्रीयता का तड़का लिए “चक दे  इंडिया” इत्यादि। कुल मिला के भव्यता और दर्शकोको बांधे रखने की कला ने ऐसी फिल्मो को जन्म दिया जिनका यथार्थ से कुछ लेना देना नहीं। इनकी फिल्मे उस क्लास के लिए ज्यादा थी जिनके दिमाग  में लगभग भूसा भरा हो और साथ में पेट से भी टंच हो। इनकी बाद की फिल्मो का सामजिक मूल्य कुछ नहीं सिर्फ आत्मकेंद्रित किरदारों का ये बताना कि “बैटल फॉर सर्वाइवल” में धूर्तता और मक्कारी बहुत जरूरी है। हो सकता है “तीसरा कौन” आपके जीवन का थीम बन जाए पर इस दर्द को जिस जेन्युइन  दर्द और एहसास के साथ आप महेश भट्ट की फिल्मो या अन्य कला फिल्मो के निर्देशकों में  पाते है उनसे शायद यश साहब की  फिल्मे कोसो दूर थी। और साथ में दूर थे यश साहब के फिल्मो के शौक़ीन दर्शक वर्ग जो दूर तक सोचने को गुनाह  मानते थे। चलते चलते सिर्फ मै ये कहूँगा कि यश चोपड़ा एक कामयाब फ़िल्म निर्देशक थें पर अच्छे नहीं। यश साहब को देखकर ये समझ  में आता है कि कामयाब होना मतलब अच्छा ही हो ऐसा नहीं होता।  

 घृणा, लहू, और नौटंकी में डूबा रोमांस

घृणा, लहू, और नौटंकी में डूबा रोमांस

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वर्तमान हिंदी फिल्मी गीत यूँ कि जैसे ढेला खाए कुत्ते की चीख पुकार

मुकेश: आत्मा से उठती आवाज

मुकेश: आत्मा से उठती आवाज


कल सत्ताईस अगस्त को महान गायक मुकेश और ऋषिकेश मुखर्जी  दोनों की पुण्यतिथि थी. दोनों ही उस सादगी का प्रतिनिधित्व करते है जो आजकल के दौर में लुप्तप्राय सी हो चली है. मुकेश आत्मा में डूबकर गीत गाते थे तो ऋषिकेश दा आत्मा में डूबकर फिल्मे बनाते थे. जाहिर है इन दोनों के संगम के बाद आनंद की उत्पत्ति होनी ही थी. इस गहरी सोच को जन्म लेना ही था कि जिंदगी कैसी है पहेली. जब ऐसे लोगो कि याद रखकर हम आज के दौर में नज़र डालते है तो आनंद दुःख के सागर में विलीन हो जाता है. आज के गीतों को आप सुनिए तो लगता है जैसे किसी ने कुत्ते को ईंट का ढेला खीच कर मार दिया हो. या कोई कुत्ते का गला दबा रहा हो. या सूअर के बच्चे को बोरी में बंद कर के कही ले जा रहे हो! अजीब सी ध्वनियाँ की बोर्ड और ड्रम बीट्स के मिलन से पैदा की जा रही है जिनका कोई मतलब नहीं  सिवाय इसके कि युवा कदमो को नाईट क्लब में झूमने में आसानी हो. 

आश्चर्य इस बात पर है कि ये सब तमाशा प्रयोगवाद  के नाम पर स्पांसर हो रहा है. इस में बहुत से मूढ़ लोगो को आधुनिकता का सम्मान सा होता दिख रहा है. आप इन गीतों की आलोचना कर के देखिये तो आपको समझाया जाएगा, आप के अन्दर इस बात को जबरदस्ती ठूंसा जायगा कि वक्त बदलता है और बदलते वक्त के साथ कदम मिला के चलना ही अक्लमंदी है. तो बदलते वक्त कि मेहरबानी क्या है देखे तो? ऐसी वाहियात बोल और धुन कि आप लाख सर पटक ले आप  बहुत बार सुनने के बाद भी सही सही ना समझ पायेंगे कि गीत में आखिर है क्या. पहले जहां गीत सर दर्द की दवा की आवश्यकता को कम करते थे आज इन दवाओं की बिक्री में सहायक है. एक बात तो तय है कि आज के गीत मार्केट के हिसाब से बन रहे है और मार्केट पे युवा हावी है तो गीत भी इनके टेस्ट के हिसाब से भड़भड़िया हथौड़ाछाप  हो गए है. फिर गीत मार्केट में आये नए म्यूजिक सिस्टम के हिसाब से बन रहे है. 

ऋषिकेश मुखर्जी: सादगी की अनमोल विरासत

ऋषिकेश मुखर्जी: सादगी की अनमोल विरासत

अब ये बताये जब गीत इस प्रकार से जन्म लेंगे तो इनमे आत्मा को छूने की ताकत क्या ख़ाक पैदा होगी?  इक्का दुक्का अपवाद  गिना देने से कि साहब ये देखिये फला ने कितना बढ़िया काम किया है से काम नहीं चलने वाला. ये बात सही है कि हर युग का अपना  अलग रंग ढंग होता है, एक अलग मिजाज़ होता है, अपने प्रतीक होते है इसके बावजूद भी ये साबित नहीं किया जा सकता या ये महसूस करने के बहुत कारण नहीं है कि  आज के हिंदी फिल्मी गीत उत्कृष्ट कोटि के है. भाई जस्टिफाय करने वाले तो गालीनुमा शब्दों के समूह को भी गीत साबित कर देंगे तो क्या साबित कर देने से गीत एक अच्छे गीत या सिर्फ गीत की श्रेणि में आ जाएगा? आज के गीतों को सुन के ही समझ में आ जाएगा कि गीत पूंजीवादी संस्कृति के संरक्षक है और मुंबई के मंडी में बैठे दलालनुमा दिमागों की उपज है. तो ऐसे गीतों से तौबा जिनसे दिमाग का दही बनने में जरा भी देर ना लगे.

शाम के धुंधलके में बैठे हुए  मुझे तो आनंद का ये  गीत “कहीं दूर जब दिन ढल जाए”  याद आ रहा है जो मै मुकेश और ऋषिकेश मुखर्जी को श्रद्धांजलि स्वरूप भेंट कर रहा हूँ और ये महसूस कर रहा हूँ कि हम ये कहा आ गए है.

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मर्द तो एक कुत्ता है जिसके गले में औरत ने डाला पट्टा है..

 

 

 

 

 

 

 

मर्द तो एक कुत्ता है जिसके गले में औरत ने डाला पट्टा है..

 

अगर ये गीत इतना अश्लील ना होता तो आधुनिक गीतों की माला में शान से चमक रहा होता ..आश्चर्य है कि डेल्ही बेल्ली के गीत पे इतना हंगामा मचा पर अश्लीलता के सर्वोच्च पायदान पर खड़े इस गीत पर किसी की नज़र नहीं गयी..इससें तो यही समझ में आता है कि सेंसर बोर्ड नाम की संस्था को खल्लास कर देना चाहिए.

हा मै इस “कुत्ताप्रधान” गीत की इसलिए तारीफ करना चाहूँगा कि कम से कम इसने इस सच्चाई को सटीक शब्दों में दर्शाया कि कैसे आज की औरते /लड़किया मर्दों के गले में कुत्ते का पट्टा डाल कर कुत्ते की तरह दम हिलाने पे मजबूर कर देती है “इश्क ” नाम के हसीन फरेब में फँसाकर. वैसे आजकल के स्त्रीनुमा मर्द है ही गले में पट्टा डालने लायक.

बंध गया पट्टा, देखो बन गया कुत्ता 

बाँध इश्क का पट्टा देखो बन गया कुत्ता 

बंध गया पट्टा, देखो बन गया कुत्ता 

कुड़ी ने डाली बोटी, दूध भिगोई रोटी 

अजी प्यार से पुचकारा 

पुचु पुचु बोल पुकारा 

अजी प्यार से पुचकारा 

पुचु पुचु बोल पुकारा

तुने समझा की लव है 

तू इसका अब रब है 

कभी बजी जो घंटी 

डोंट वारी माय फ्रेंड बंटी

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वैसे गीत के बोल समूचे में आप यहाँ देख और सुन सकते है:

http://www.lyricsmint.com/2011/04/kutta-mika-singh-pyaar-ka-punchnama.html

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गीतकार: लव रंजन 

संगीतकार :क्लिंटन सेरेजो, हितेश सोनिक 

गायक : मीका सिंह 

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Face-To-Face With Kishore Kumar Via His Rare Interviews Including One To Lata Mangeshkar!

Kishore Kumar:  A Gandharva In Action

Kishore Kumar: A Gandharva In Action

It’s never an easy task to find appropriate words that come to honor the greatness of some people. I always face the shortage of expressions whenever I wish to say something about Kishore Kumar as earthly words, in my eyes, come to limit the achievements. However, the dilemma to miss the opportunity to say few things whenever time allows you to do that always haunts me and I am but just compelled to deal with unique aspects related with this man. This man was not just a mere entertainer -the nachaiyya gavaiyya soul ( mere singer and dancer).

He was a Gandharva in human form or a saint with a musical heart who lived with us to help us release our pains and frustrations and turn into better human beings with the help of notes of music.On his birth anniversary, I wish to take note of unheard aspects related with his life via him! I mean with the help of few recordings that captured him live in conversation with equally legendary figures. I think it would be the best way to shatter many myths associated with this great man.

Like in this rare video wherein I find Shammi Kapoor talking about Kishore Kumar. Though Kishore Kumar does not figure live in this video but Shammi Kapoor was one of the contemporaries who loved him lot. He was quite frustrated on not having any song to his credit in voice of Kishore. He got so identified with voice of Rafi that in his long career he didn’t get a single chance when Kishore could sing for him even as they walked together for decades. And that made Shammi restless as he loved this wonderful person very much. Remembering Kishore’s love for Madhubala he was bit sad. Shammi calls it a tragic affair but he came to shatter the falsehood that Kishore was bit casual towards Madhubala when she was seriously ill.

Shammi tells that this man did all what was humanly possible despite having tight singing schedules. Anyway, Shammi was the happiest person on earth when Kishore finally sang for him. The song turned out to be one of the biggest hits of its times and also one of the most notorious songs in history of Hindi movie songs. Remember “Saat Saheliya Khadi Khadi” from Vidhaata! Yes, this was the first song picturized on Shammi Kapoor in voice of Kishore and what a song it turned out to be!

Can you imagine Kishore in a long conversation with Lata? Yes, that’s true. These two legendary figures entered in a long conversation all in the name of interview. Kishore was so unhappy with media persons that he said if now ever he gave interview it would only be a possibility if Lata approaches him. A generosity on part of Lata made it possible for future generations to see two great people in a very intimate conversation.It was supposed to be an interview but it turned out to be more than an interview. After all, taking interviews was not Lata’s cup of tea! These two souls in name of interview revealed so many touching episodes as they laughed and smiled together. No wonder Lata went into stage of huge depression after death of Kishore Kumar.

In this so-called interview, Kishore remembers how he came to meet her for the first time in a very hilarious way when Lata misunderstood him for a man chasing him! They both went to a same studio in the same train together for two different purposes. Later the confusion got removed when it became clear that Kishore actually had an appointment with Khemchand Prakash and so he was in the studio to meet him. He held Khemchand Prakash in high esteem as this was the man who shaped his music career. Though K L Saigal was source of inspiration for both Lata and Kishore, Kishore finds the contribution of Khemchand Prakash a defining one.It was he who assured Ashok Kumar that this man had great singing talent. Ashok Kumar was bit apprehensive about the singing ability of Kishore in front of Khemchand Prakash telling him that he lacked the art of voice modulation!

In another part of this interview one finds him making candid confession before Lata that he lacked formal training in music and Lata in that regards stood miles ahead of him. One can notice the sense of embarrassment which grips Lata on this disclosure. Anyway, both felt that music has changed its face lot and singing is now no longer that beautiful affair but a strenuous affair. Kishore was really depressed over the badmouthing that portrayed a false image of his in eyes of his well wishers. Kishore made Lata uncomfortable once again when he asked her why do people enter in such loose talk? Though Lata dismissed such rumours associated with Kishore outrightly stating this was all bullshit but logical explanation came from the side of Kishore himself. Hitting the detractors below the belt  he stated that world belongs to mad people devoid of ethics of any sorts! Kishore says that people hail him as a person not in his senses but he feels that world has gone to the dogs!

True, many people accuse him of money oriented but I am pretty confused as the man who had to do so many charity shows to get rid of income tax burdens could never be a money conscious soul. In fact, look at the way he suggests Lata to stop singing and do stage shows for charity’s sake. Can this ever come out from heart of money conscious soul? At least, it’s impossible in my eyes. Anyway, let me discuss his association with a towering figure in the world of Hindi film music S D Burman. A person who played a monumental role in life of Kishore. Kishore reciprocated the kind gestures of this great man by hailing him as mentor and father figure. Nobody saw tears in eyes of lively Kishore lost in laughs all the times but the day S D Burman passed away many noticed tears in his eyes. Recalling the same experience live he says that it appeared to him as he sat near his dead body that this man would just wake up and ask him to sing! One is really touched the way Kishore unfolds his association with S D Burman.

This was the man who was conscious of Kishore the way a father is conscious of a pretty naughty child. In fact, SD Burman was himself a child hearted figure. So both enjoyed a great chemistry.Kishore remembering S D Burman says that he became hugely upset with him when he started doing so many concerts, fearing that it would deteriorate the quality of his vocal chords. He warned Kishore that if he did not stop doing concerts it would be impossible for him to give him singing assignments.

Revealing the innocence of S D Burman he tells us that when he refused to participate in practice sessions, S D Burman invited him to share food with him at his home. After enjoying great food as he was about to leave, S D Burman locked the doors and get him involved in the rigorous practice sessions. S D Burman at odd hours of night used to give rings to Kishore mainly to ensure that all is well with his vocal chords! Once as he was about to leave for important recording, he noticed S D Burman coming towards him and taking him to a long drive to an open area full of greenery. S D Burman asking him to run in open fields along with him made Kishore sing some songs for him at the end of running session!! No wonder he was in tears when S D Burman became part of the stars.

Ending this article with prophetic words he said to Lata. This man did not live for long after he said that. I notice that this great man like all exceptional soul was eager to merge in supreme consciousness. He told Lata that it’s now time to bid adieu to this temporary home as it’s good for artists that they should quit the world once they have achieved all. It’s not good that they should leave the world, when the world starts treating them with disdain! This man I find left the world after this disclosure. However, he lives in our memories in an eternal way. Such people never die.

Some of the popular songs of Kishore Kumara are here: Kishore Kumar Songs


Kishore Kumar : People Like You Never Die

Kishore Kumar : People Like You Never Die

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1. Kishore Kumar In Conversation With Lata:

2. Kishore Kumar Talks About S D Burman (Part One)

3. Kishore Kumar Talks About S D Burman (Part Two)

4. Kishore Kumar Talks About S D Burman (Part Three)

5. Shammi Kapoor Remembers Kishore Kumar

6. Kishore Kumar Live ( Pal Pal Dil Ke Paas)

7. Kishore Kumar Live ( Zindagi Ek Safar Hai Suhana)

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Some Popular Kishore Songs Are Here:  Popular Songs Of Kishore Kumar

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The Courage 2 Create

This is the story of me writing my first novel...and how life keeps getting in the way.

A Magyar Blog

Mostly about our semester in Pécs, Hungary.

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