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दिल्ली सामूहिक दुष्कर्म: कुछ वो बाते जिन्हें बताने, दिखाने और समझाने सें मेनस्ट्रीम मीडिया कन्नी काट गया!

दिल्ली में 16 दिसम्बर की रात हुई सामूहिक दुष्कर्म की घटना की जितनी भी निंदा की जाए वो कम है।

दिल्ली में 16 दिसम्बर की रात हुई सामूहिक दुष्कर्म की घटना की जितनी भी निंदा की जाए वो कम है।

दिल्ली में 16 दिसम्बर की रात हुई सामूहिक दुष्कर्म की घटना की जितनी भी निंदा की जाए वो कम है। इसकी वीभत्सता और दरिंदगी का अंदाज़ लगाने में  शायद रूह भी काँप जाए अगर हम इस घटना के बारीकी में जाकर देखे जैसा समाचार पत्रों या अन्य माध्यमो से हमे पता चला है। उसके बाद इंडिया गेट और जंतर मंतर पर हुएँ प्रदर्शनों से हमे ये समझ में आया कि चलिए लोगो में रोष को स्वर देने का सलीका तो आया। लेकिन कुछ ऐसी बाते है जो मेनस्ट्रीम मीडिया में अब तक चर्चा का बिंदु नहीं बन सकी। सो एक कोशिश है प्रबुद्ध पाठको का ध्यान उन पहलुओ की  तरफ खीचना की ।

ये तो तय है कि आसुरी तत्त्वों की प्रधानता हो चली है जिसमे अराजक तत्त्व कुछ भी करके चलते बनते है और एक बड़ा वर्ग सिर्फ चुपचाप खड़ा सा देखता रहता है। सो  जवाबदेही सिर्फ उन लोगो की ही नहीं बनती है जिन्होंने इस कुकर्म को अंजाम दिया। वास्तविक जिम्मेदारी उन लोगो की बनती है जिन्होंने सिस्टम को चलाने का ठेका ले रखा है: राजनेता, प्रशासन, न्यायपालिका और समाज के विभिन्न अंगो के लोग जिनमे से शायद कुछ धरने प्रदर्शन में भी शामिल होंगे। इस मुद्दे का बहुत महीन विश्लेषण करने की जरूरत है। इसके पहले मै विश्लेषण करू इस बात पर गौर करने की जरूरत है कि अधिकतर प्रदर्शनकारी जो इंडिया गेट पर शामिल थें दुष्कर्म के आरोपियों को मौत की सजा के पक्षधर थें। जैसा कि इन विरोध प्रदर्शन के साथ होता है कुछ फेमिनिस्ट स्पॉन्सर्ड संस्थाएं और कुछ सेकुलर लोग भी अपने हित के लिए इन विरोध प्रदर्शन में शामिल हो गए। जहाँ तक आम आदमी के गुस्से की बात है वो समझ में आता है मगर इन जैसे लोगो का विरोध प्रदर्शन या तो सत्ता के लिए होता है या सिर्फ विदेशी संस्थानों से धन उगाहने के खातिर होता है। ऐसे लोग आपको मानवाधिकार की बाते इन अवसरों पर ज्यादा करते दिख जायेंगे।

सो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ इन दुष्कर्म के आरोपियों को मौत का मांग करती इन तथाकथित प्रदर्शनकारियों पर जो दबाव बना रहे है कि ऐसे कृत्यों के लिए मौत की सजा दी जाए। इस बहस में मै नहीं पड़ना चाहूँगा कि मौत की सजा कितनी जायज होगी पर ये जरूर याद दिलाना  चाहूँगा कि अभी कुछ दिनों पहले जब अजमल कसाब को मौत की सजा दी गयी थी तो हमारे  धर्मनिरपेक्ष समाचार पत्र  द हिन्दू ने हमेशा की तरह एमनेस्टी इंटरनेशनल के माध्यम से विधवा विलाप करते हुए ये जोर दे के कहा था कि मौत की सजा के प्रावधान को खत्म कर देना चाहिए। तो फिर किस मुंह से ये संस्थाएं, काफिला जैसी बकवास पत्रिकाएँ मौत की सजा का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वकालत कर रही है? ये दोहरा मापदंड क्यों? ये जानना भी जरूरी हो जाता है कि इस तरह प्रदर्शन में शामिल होने वाले अक्सर वो लोग होते है जिन्होंने सिस्टम को बदलने के लिए कोई ख़ास कवायद नहीं की होती  है। इस सेलेक्टिव चेतना पर घोर आश्चर्य भी होता है और क्षोभ भी होता है। मोहल्ले में बिजली चले जाने, तार टूट जाने पर सबसे ज्यादा शोर मचाने वाले वो लोग होते है जो पावर हाउस में कंप्लेंट दर्ज कराने में भी अपनी  तौहीन समझते है। करप्शन पर सबसे ज्यादा वजनदार लेक्चर वो देते है जिनको इस बात से कोई फर्क  नहीं पड़ता कि उनका जनप्रतिनिधि कैसा है और ये कि उनके वोट न देने से गलत लोग सिस्टम में आ रहे है। इसका नतीजा ये होता है कि कोई जातिवाद के जरिये सत्ता में आकर कुकर्म करता  है तो कोई मुस्लिम कार्ड खेलकर तो कोई  बेरोज़गारी भत्ता/लैपटाप जैसी वाहियात स्कीम से सत्ता सुख का जुगाड़ कर लेता है।

क्यों दुष्कर्म जैसे अपराध या अन्य अपराध चरम पर है उसका एक सबसे अहम कारण है कि हमारे सिस्टम में सही चीज़ के लिए या सही लोगो के लिए कोई जगह नहीं। और न्याय भी इतनी देर से मिलता है कि उसकी कोई अहमियत नहीं रह जाती। ये सिस्टम किस तरह से काम करता है ये देखिये। किसी एक समारोह में एक सज्जन व्यक्ति नें अपनी आपबीती बयान करते हुए ये बताया कि सड़क हादसे मे मृत व्यक्ति के बारे में जब सूचना देने थाने पहुचे तो दरोगाजी ने उसे मर्डर के चार्ज की धमकी देते हुए थाने पे ही रोक  लिया। बाद में वो खुद पच्चीस हज़ार की रकम को देकर किसी  तरह थाने से सकुशल घर पहुच सके। खुद इसी प्रदर्शन के दौरान हुई पुलिस कांस्टेबल की मौत का मामला देखिये।  जहा एक ओर प्रत्यक्षदर्शी, जो समाचार पत्रों  के अनुसार पत्रकारिता का छात्र है, के अनुसार मौत सहज है, पोस्टमॉर्टेम रिपोर्ट के अनुसार गहरे धारदार चोट से हुई है। इस मौत का जिम्मेदार कौन है और कौन इसकी भरपाई करेगा? सिर्फ सख्त क़ानूनी प्रावधान बना देने भर से क्या होगा जब आपका सिस्टम इतना सड़ गल चूका है कि किसी भी कानून के दुरूपयोग के सम्भावनाएं असीमित हो जाती है और सदुपयोग सीमित हो जाता है। दहेज़ हत्या के प्रावधान और एस सी एस टी एक्ट का हश्र देखिये। अपने गाँव में जो मिर्ज़ापुर जिले में पड़ता है मेरे खेत पर कुछ अनुसूचित जाति के लोगो ने अवैध रूप से झोपड़ी बनाकर कुछ हिस्से पे काबिज हो गए है। सीधी कार्यवाही से इनको हटवा सकता था मगर मुझे पता था ये एक्ट के तहत दांव खेल सकते है इसलिए न्यायालय की लम्बी प्रक्रिया के तहत मंद गति से कार्यवाही चल रही है।   

इसलिए विरोध प्रदर्शन जो “हैंग द रेपिस्ट्स” तक ही केन्द्रित हो उठा है वो खतरनाक है। इस सीमित सोच से बात नहीं बनेगी जब तक सिस्टम का हर अंग सुचारू रूप से काम न करे।  आप देखिये जिस वक्त दुष्कर्म की शिकार इस लड़की के लिए उत्तेजित भीड़  इंडिया गेट पर तख्ती, बैनर, मोमबत्ती के सहारे अपनी बात कह  रही थी ठीक उसी वक्त उत्तर  प्रदेश में  एक अभागी माँ  सामूहिक दुष्कर्म की शिकार अपनी बेटी, जिसने आत्मदाह कर लिया इस घटना के बाद , न्याय के लिए भटक रही है , धरने पर बैठी है जिलाधिकारी कार्यालय पर कोई  सुनवाई नहीं, उल्टा पुलिस ने मनगढ़ंत कहानी रच डाली है। दूसरा आप सेलेक्टिव चेतना से ऊपर उठें। क्या बात है कि गरीब  किसान क़र्ज़ में डूबकर आत्मदाह कर लेते है पर उसके लिए कभी जनाक्रोश नहीं उभरता बल्कि सरकार  खरीद मूल्य और कम कर देती है, उसके द्वारा उगाये अन्न सड़ कर गल जाए इसकी व्यवस्था सुनिश्चित कर देती है। अफज़ल गुरु की फांसी टलती जा रही है  जबकि इस प्रकरण से जुड़े शहीद परिवार के लोग संसद के आगे आत्मदाह तक कर डाल रहे है पर हम खामोश रहते है। व्यवस्था को जड़ से हटाने के लिए तब अन्ना, रामदेव या अरविन्द केजरीवाल जैसो को सामने आना पड़ता है, जिनको मिटाने और तोड़ने की हर साज़िश सरकार कर डालती है पर समाज का हमारा एक बड़ा वर्ग निश्चिंत होकर बीवी बच्चो के लिए मगन होकर अथाह पैसा सही गलत तरीके से बना रहा होता है। तब रोष या आक्रोश नहीं उभरता है। लिहाज़ा इस सामूहिक दुष्कर्म का शिकार इस लड़की के लिए उभरे आक्रोश पर ख़ुशी तो है पर  इसकी अपूर्णता का भान होते ही ख़ुशी काफूर हो जाती है।

ये बात हमको समझ में आना चाहिए कि जहा सिस्टम इतना दोषपूर्ण हो चला है कि जब तक हम सच और झूठ का फैसला कर पाते है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है वहा पर सख्त कानून बना देने भर से उलझने और समस्याएं और बढ़ सकती है। हम आज जिस समाज में रहते है वहा  दुष्कर्म भी हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, स्त्रिया भी उतनी ही अय्याश बन कर उभरी है जितने की पुरुष और उन्हें अपने मकसद के लिए नीचे गिरने में कोई संकोच नहीं है लिहाज़ा अगर आप सख्त कानून बनाते है बिना सिस्टम में उतने ही बारीक सुधार किये तो ये तय है कि इस तरह के कानून से समाज में बिखराव और बढेगा। इससे बेहतर तरीका ये रहेगा कि उपभोक्तावादी संस्कृति में स्त्री पुरुष अपने आचरण को लेकर सजग रहे बजाय हर बदलाव के लिए कानून की बैसाखी का सहारा लेने के लिए।  इंडिया गेट पर प्रदर्शन हर्ष तो देता है पर इस बात का भान तो सदा बना रहता कि स्वार्थी तत्त्व इनको अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करते है जिससे बजाय कोई अच्छा हित सधने से स्त्री-पुरुष के बीच वैमनस्य की खाई और चौड़ी हो जाती है। अगर हम इनसे ऊपर उठकर, इनसे बच कर अपनी लड़ाई लड़ सके तो समाज का सचमुच में भला हो सकेगा नहीं तो ऐसे आक्रोश स्वार्थी तत्त्वों का सिर्फ हित साधने का साधन भर बन के रह जाते है। सड़ी गली सेक्युलर संस्थाएं ऐसे ही आक्रोश को सामाज विरोधी शक्ल दे देते है। सो गुस्सा सार्थक बदलाव के लिए करे ना कि गलत लोगो का  हित साधने के लिए करे। अंत में  लोगो का आक्रोश क्या रंग लाता है  ये तो वक्त बतायेगा पर उम्मीद है कि सिंगापुर के हास्पिटल में भर्ती ये बहादुर लड़की जल्द ही स्वस्थ होकर बाहर फिर उन्मुक्त होकर विचरण कर सकेगी।  

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अजब देश की गजब कहानी: सुअरों को छप्पन भोग और संतो को काली स्याही!!

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एक तो इस देश में इस बात का रोना रोया जाता है कुछ अच्छा नहीं हो रहा है, या ये कि कुछ अच्छा होना चाहिए, या अच्छे लोग राजनीति में नहीं आ रहे है. साहब ये देश कुत्तो और सुअरों का हो गया है. इसीलिए हंसो की, गायो की या शेरो की कोई अहमियत नहीं रही गयी है.

एक बार सुअरों को प्रभु ने निमंत्रण दिया कि आओ स्वर्ग में रहो. सुअरों ने पूछा कि क्या वहा मैला खाने को मिलेगा? प्रभु ने कहा नहीं. तो सुअरों ने कहा तब तो धरती ही बेहतर है. कुछ ऐसा ही समय आजकल का है. अच्छो को हटा दो क्योकि वे आपके कुकर्म में बाधक है. गलत लोगो को राजगद्दी पर बिठा दो, उन्हें छप्पन भोग खिलाओ, उनका सम्मान करो. अच्छे लोगो को तिकडम करके हटा दो या सूली पे चढ़ा दो. अच्छे लोगो को उनकी अच्छाई का सिला ऐसा ही मिला है अनादि काल से. इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि अरविन्द केजरीवाल पर कोई हाथ चला दे या बाबा रामदेव पे कोई स्याही फ़ेंक दे. ये स्याही बाबा के चरित्र के नहीं आपके दूषित अंत:करण की निशानी है.

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ये दौर राजनैतिक पतन के चरम को दर्शाता है. आरोपियों को सरकारें सरंक्षण देती है और जो गलत से लड़ रहे है उनके पीछे पूरी सरकारी मशीनरी पड़ जाती है. आपका पूरा इतिहास खंगाला जाएगा और एक मुद्दा खोजकर आपको जेल के सलाखों के पीछे भेज दिया जायगा. स्वतंत्रता की लड़ाई आसान थी क्योकि दुश्मन का चेहरा पहचानना आसान था. आज लड़ाई कठिन है क्योकि दुश्मन दोस्त के भेष में है या अपनों के बीच कोई अपना सा है. इसलिए ये दौर कठिन सा है. वैसे जब संतो का भी अपमान होने लगे तो समझिये बुराई अब ख़त्म ही है. मुझे तो सकारात्मक होने की लत है. आशा की किरण तो कृष्ण का यही वाक्य है कि बुराई को चाहे कितनी भी बड़ी ताकतों का समर्थन प्राप्त हो उसे अच्छाई पे सफलता तो मिलने से रही. जीतेगा तो सच ही. देर होने का मतलब तम के विजय के रूप में नहीं लेना चाहिए उसके समूचे विनाश के निशानी के रूप में लेना चाहिए.

अंत में एक आदर्श चुटकुला सुनिए. सलमान रुश्दी भारत आयेंगे. इससें मुसलमानों की भावनाए आहत होंगी. मतलब जहा है वही रहे तो कही के मुसलमानों की भावनाएं नहीं आहत होंगी.

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