Tag Archives: Amitabh Bachchan

विश्व फ़िल्म इतिहास की दो बेहद शानदार फिल्मे है आवारा और शोले!

 

 

आवारा : एक युवा मन के जिद और संकल्प से उपजी शानदार कृति.

आवारा : एक युवा मन के जिद और संकल्प से उपजी शानदार कृति.

भारतीय फिल्मो ने मई २०१३ में १०० वर्ष पूरे कर लिए. ये एक लम्बी अवधि होती है किसी भी मीडियम के गुण दोष को परखने के लिए. हमारी फिल्मो ने कई मंजिलो को तय किया लेकिन फिर भी गुणवत्ता की दृष्टि से इसकी रफ्तार बहुत धीमी है. हमारी अधिकांश फिल्मे एक ढर्रे पे बनती है जिनमे प्रयोगवादी फिल्मकारों के लिए बहुत कम स्पेस बचता है कुछ नया करने के लिए. ऐसा नहीं कि उल्लेखनीय काम नहीं हुआ पर इनकी संख्या कम है. आज भी आप देखे कि  सालाना  लगभग 800-900  फिल्मे बालीवूड में बनती है पर उनमे से कितनी याद रख भर पाने के लायक होती है?  इसी तरह फिल्मी संगीत भी खासकर वर्तमान समय में बेसुरें ताल में है कुछ एक अपवाद को छोड़कर. उस पर भी अगर विदेशी स्टैंडर्ड्स से गौर करे तो भारतीय फिल्मे अभी बहुत पीछे है. क्षेत्रीय भाषाओ जैसे बंगाली, मलयाली, इत्यादि में अच्छा काम हुआ लेकिन जिस तरह हिंदी फिल्मो में उतार आया वैसे इन भाषाओ की फिल्मो में भी गुणवत्ता के लिहाज सें गिरावट दर्ज की गयी. खैर इस लेख में मै आवारा और शोले इन दो फिल्मो का जिक्र करना चाहूँगा.

राजकपूर और गुरुदत्त मेरे पसंदीदा फिल्मकार रहे है. जिस संवेदनशीलता से इन्होने फिल्मे बनायीं उसकी मिसाल ढूंढ पाना मुश्किल है. राजकपूर जो कि ज्यादा पढ़ लिख नहीं पाए ने जब आवारा बनाने का निर्णय लिया तो वो एक बोल्ड निर्णय था. फ़िल्म की कहानी ख्वाजा अहमद अब्बास ने लिखी थी जो प्रोग्रेसिव लेखको की जमात से आते थें. फ़िल्म का शीर्षक ही विवादित था लेकिन जिद के पक्के राजकपूर ने शीर्षक बदलने से मना कर दिया. ये यकीन कर पाना मुश्किल है कि इस कम पढ़े शख्स ने भारतीय फ़िल्म इतिहास को उसकी सबसे भव्य फिल्मे दी, सबसे बेहतरीन फिल्मे दी. राजकपूर  की ये विलक्षण निशानी थी कि फ़िल्म के हर पहलू चाहे वो गीत हो या संगीत हो या एडिटिंग हो सब पे पैनी निगाह रखते थे और जितने भी संशोधन वो करते थें वे सब फ़िल्म को नयी उंचाई दे जाते थे. आवारा भी इन्ही सब प्रयोगों से लैस थी.

इतनी कम उम्र में आवारा या आग जैसी फिल्मो का बनाना ये साबित कर देता है कि बुजुर्गो की तोहमत झेलते ये ” कल के लौंडे” ही अंत में अपवाद काम करके जाते है. ये किसी भारी भरकम इंस्टिट्यूट से नहीं निकलते बल्कि जिंदगी की पाठशाला में तप कर निकलते है और ये सिद्ध कर देते है कि “कुछ लोग जो ज्यादा जानते है वो इंसान को कम पहचानते है”. आवारा में नर्गिस के बोल्ड दृश्य थें लेकिन किसी को भी मना लेने का हुनर रखने वाले राजकपूर  ने उस दृश्य को हकीकत में बदल दिया लेकिन इस प्रक्रिया में क्रिएटिविटी के उच्चतम शिखर पे हम राजकपूर को पाते है। आवारा में भारतीय फिल्मो का पहला ड्रीम सीक्वेंस भी है. जब इस पर कई लाख रुपये खर्च करने की बात आई तो सब ने राजकपूर को सनकी कहा क्योकि पूरी फ़िल्म का बजट एक तरफ और इस ड्रीम सीक्वेंस का खर्च एक तरफ रख दे तो इतना बजट काफी होता है एक अन्य फ़िल्म के निर्माण के लिए. लेकिन राजकपूर ने ड्रीम सीक्वेंस के बजट में कोई कटौती नहीं की. आज टाइम मैगज़ीन राजकपूर के आवारा में किये गए अभिनय को 10 सर्वश्रेष्ठ अभिनय कौशल जो फ़िल्म के सुनहरे परदे पे अवतरित हुई उनमे से एक मानती है और आवारा फ़िल्म इतिहास की सौ सर्वश्रेष्ठ फिल्मो में से एक है.

सन 1951 में रिलीज़ आवारा कायदे से देखा जाए तो  पहली वो फ़िल्म मानी जायेगी जिसने असल अन्तराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की. चीन, सोवियत संघ, टर्की, रोमानिया, मिडिल ईस्ट और अन्य जगह ये ख़ासा लोकप्रिय रही. इसका गीत संगीत भी इतना लोकप्रिय हुआ कि  “आवारा हूँ” गीत विदेशो के उन हिस्सों में भी बजता था जहा भारतीय फिल्मो की पहुच कुछ नहीं थी. आवारा मैंने पहले पहल 1988 में देखी जब दूरदर्शन ने एक विशेष प्रसारण के तहत इन फिल्मो को दिखाया। राजकपूर जो मशहूर कपूर खानदान से होते हुए भी ने फिल्मी सफ़र की शुरुआत क्लैप बॉय से किया उस ने दिखाया कि हुनर जन्मजात ही आता है. ये किसी स्कूल की देन नहीं होती. ये फ़िल्म चाहे शंकर जयकिशन का संगीत हो, राज-नर्गिस की रूमानी केमिस्ट्री हो, शैलेन्द्र-हसरत के हृदयस्पर्शी गीत हो या राधू कर्माकर का  बेहतरीन छायांकन हो हर लिहाज़ से सर्वोत्तम थी. आवारा इस बात का प्रतीक है कि बदलाव युवा वर्ग ही लाता है अपनी सोच से और अपनी जिद से.

शोले: जिसकी आंच एवरग्रीन हो! गयी

शोले: जिसकी आंच एवरग्रीन हो! गयी!

 

शोले का भी जिक्र हो जाए. जहा आवारा बनते समय एक हलचल महसूस की गयी वही शोले के निर्माण के समय ऐसा कुछ नहीं था. बल्कि हैरान करने वाली बात ये है कि भारतीय फिल्मो के इतिहास में अनोखे आयाम जोड़ने वाली ये फ़िल्म जब प्रदर्शित हुई तो सब तरफ फीका फीका सा माहौल था. ये वो फ़िल्म थी जिसे आज विदेशी आलोचक भी मानते है कि निर्देशन, अभिनय और कैमरा वर्क के हिसाब से ये फ़िल्म बेजोड़ है. शोले की दहक को अजर अमर सरीखा बना देने वाले गब्बर सिंह का रोल पहले डैनी के हिस्से में आया था लेकिन उनके मना कर देने के बाद ये हलकी आवाज़ वाले अमजद खान के हिस्से आया. इससे बहुत से लोगो को इसके निर्माण के दौरान ये महसूस होने लगा कही ये एक वजह ना हो जाए इस फ़िल्म के ना चल पाने का . लेकिन अमजद खान ने जो संवाद अदायगी की वो इतनी बेजोड़ है कि उसके बारे में भारत का हर बच्चा भी जानता है.

आज लगभग 35 सालो बाद भी इस फ़िल्म के किरदारों का जिक्र होता है. रेडियो या टेलीविज़न खोल के देखे आपको जय-वीरू, बसंती और गब्बर के दर्शन होना तय है. मेरा रेडियो जब भी मुंह खोलता है मतलब “चालु”  होता है तो गब्बर की आवाज़ की नक़ल में कोई शख्स जरूर थोड़ी देर में कहता है ” इस घंटे का पैसा कौन दिया है रें”. यहाँ तक कि एक भारतीय बैंक के विज्ञापन में भी  “बसंती” ने ख़ासा योगदान दिया. मुझे याद आते है अपने कॉलेज के दिन. खाली वक्त में हमारे कालेज के कई प्रतिभाशाली कलाकारों से अगर कुछ परफार्म करने को कहा जाता था तो ये लगभग तय होता था कि उनमे से कोई शोले के डायलोग की मिमिक्री जरूर करेगा.  इस फ़िल्म की विलक्षण बात ये है कि इस फ़िल्म के हर किरदार ने शानदार अभिनय किया और जिसका सीधा सम्बन्ध कहानी को नया मोड़ देने सा था. इसका नतीजा ये हुआ कि एक बहुत सामान्य सा दर्शक भी अच्छी तरह याद रखता है कि किस किरदार ने किस वक्त पे क्या संवाद बोला है. सो इस फ़िल्म के मशहूर चरित्र तो लोगो ने याद रखे ही रखे लेकिन इसके गौड़ चरित्र भी उतने ही यादगार साबित हुए. अब जैसे ए के हंगल का बोल हुआ ये संवाद भी लोग बड़ी गंभीरता से याद रखते है ” इतना सन्नाटा क्यों है भाई?”  

महबूब खान दुबारा फिर ना  कभी “मदर इंडिया” जैसी कोई फ़िल्म बना पाए और ना रमेश सिप्पी “शोले” जैसी  कोई और यादगार फ़िल्म दे पाए.  कही ना कही प्रकति में चीज़े अव्यक्त भाव से छुपी रहती है और वक्त आने पे कोई ना कोई उनका माध्यम बन जाता है उनको यथार्थ के धरातल पे लाने का. कम से कम “शोले” जैसी फिल्मे इसी रहस्यमय बात की साक्षी है. शोले चाहे अपने ट्रीटमेंट में विदेशी गुणों से ओतप्रोत रही हो, संगीत भी पाश्चात्य धुनों से प्रभावित था लेकिन ये अन्तत: भारतीय परंपरा के बुराई पर अच्छाई की जीत को दर्शाती है, पवित्र  प्रेम को दर्शाती है और मित्रता के महत्व को प्रक्षेपित करती है.

 

क्यों पूछने की हिम्मत है किसी की: अब तेरा क्या होगा कालिया :P :P :P

क्यों पूछने की हिम्मत है किसी की: अब तेरा क्या होगा कालिया :P :P :P

रेफरेन्सेस:

शोले 

शोले 

आवारा 

आवारा 

पिक्स क्रेडिट:

Pic One 

Pic Two

Pic Three

Kundal Lal Saigal: A Singer Who Sang Like A Divine Being

 

K.L. Saigal:  Invoking Sound Of Heaven

K.L. Saigal: Invoking Sound Of Heaven


Some souls are reflection of divinity. The great singer Kundal Lal Saigal was one such soul, who manifested divinity in a great way. In fact, true artists are never devoid of divine touch. Creativity cannot emerge from mental landscape not submerged in ocean of divinity. I belong to a generation, which believes in worshiping new icons of modernity. For them these legendary creative artists of yesteryear might not seem that appealing but anyone who have had glimpse of their creativity would certainly stand amazed. 

The noticeable thing about K. L. Saigal  was that he managed to sing straight from the heart. This phrase seems so commonplace but not many realize that how difficult it is to demonstrate it in practical terms. That’s because shades of ego block our ability to exhibit true colour of simplicity. The complex persona creates blockade. One reason why K. L. Saigal could stir the emotions was that deeper emotions were so naturally rendered by him without compromising with the raga and raginis.

It’s really surprising that at a time when Indian film music was still in its nascent stage of growth, it traced such a sensational singer, which set high standards in world of popular music, hard to emulate by future singers. The influence of his voice can be understood by the fact that even likes of Amitabh Bachchan came to praise him. The singers like Lata,  Rafi and Kishore, all treated him like demigod. Mukesh, was, in fact,  very sincere follower of his style of singing, who found it difficult to develop his own style. After mesmerizing everybody with his “Dil jalta hai to jalne de”, sung in Saigal style, Mukesh went on to develop his own style of singing.

His impact can also be felt in crude way in modern times when someone made caricature of his voice to sell a particular brand of toothpaste! Of late, I found one singer paying tribute to him in infamous movie Delhi Belly! Not many remember that Kishore Kumar treated K L Saigal as his Guru (The Master). He always practiced singing his songs and when he first met Saigal, he was asked by the legendary Saigal to sing a song. He sang one of his songs ” Man moorakh kyo deewana hai, aaj rahe kal jaana hai”. Saigal was very impressed by his singing but he suggested him that he should remove “Anga Dosha” (defects associated with body). Kishore used to sing with vigorous body movements also in action! Though Kishore Kumar did not strictly followed his advise but he managed to keep his body still while singing songs of Saigal in later days! 

Coming to myself, I have nearly heard all his popular numbers. His songs instill deep peace within me. His amazing range and soulful rendering enabled me to get above the harsh episodes of life in effortless manner. His song sung during the fag end of his career, “Gham Diye Mustaqil” (Shahjahaan, 1946), always brings tears in the eyes. The superb rendering, which also reflected his own personal sufferings, makes one attain trance like state. Another song, which left an everlasting influence on me is from movie Tansen (1943): Kahe Guman Kare. Every time I hear it, the simplistic approach adopted by Saigal in this song makes me smile. After all, the singer is trying hard to convince a beautiful woman not to take pride in her  beauty!

I still remember the day when I found a very rare album of Saigal in one lesser heard music shop of my city. That shop was not frequently visited by the buyers since the shopkeeper was not customer-friendly, who always had heated argument over the price of cassettes. The fight also started with me when he priced this cassette three times the original price on a pretext that it was a rare album. Though I had not sufficient money, I still managed to buy this album! After all, it had a soothing devotional song associated with Lord Krishna: Suno Suno Hey Krishan Kala ( Chandidas, 1934). One can notice in this song that Saigal has sung high notes in effortless manner, without compromising with the depth of the emotions.

It’s a peculiar phenomenon that souls, governed by divine instincts, often leave the earthly plane of existence in an young age. K L Saigal also proved to be no exception when he died at the age of 42. The lesser souls speak about his habit of  heavy drinking but that’s the way how worldly people treat exceptional souls. For me and others, he shall always be remembered for making songs a mean to invoke divinity.


Reference:

K. L. Saigal

Pics Credit:

Pic One

 

Yash Chopra: A Filmmaker In Love With Illicit Relationships And Flawed Romance

Yash Chopra: The Filmmaker Interested In Flawed Romance

Yash Chopra: The Filmmaker Interested In Flawed Romance


I have never been die hard fan of Yash Chopra’s movies. His romantic angles mired in illicit relationship always left me appalled. He was a noted filmmaker having Midas touch for conceiving interesting themes, hinging around three people in one single relationship, either due to providence or chance. His penchant for such complex relationships, on par with illicit love affairs, could be gauged from the fact that barring his early years of film making when he made gems like Waqt, Dharamputra, Ittefaq, Mashaal, Trishul, Deewar and Kala Patthar, nearly all his movies in later years depicted adultery in one or other form. It can be safely opined that his movies, both explicitly and implicitly, promoted illegal relationships. That’s pretty unfortunate as filmmaker of his caliber should have been more sensible in application of his mind.

He had the brilliant ability to present romance with all its elements in grand style. The grandeur and colourful imagery noticeable in his movies takes away our breath. It’s true that average cine-goer likes to flirt with unfulfilled dreams and wishes as he/she enters inside the theater, and tries to dissolve the harsh realities in the silken world appearing and disappearing on the silver screen. Any average filmmaker is not very much interested in exposing his viewers to shades of realism. Yash Chopra understood this well and so in his movies we have characters, borrowed straight from Mills and Boon novels, flirting with  their ladies against scenic backdrop. No wonder Swiss government honoured Yash Chopra for promoting tourism in Switzerland!

To make his romance stories gain some substance, he was but compelled to fall in the arms of “illicit relationship” so as to provide some shock value to his films. However, he lacked the ability to seriously contemplate over any issue, which demanded deep attention, but in the same genre  his brother B R Chopra exhibited the art of serious presentation in an effortless manner. That’s why B R Chopra’s “Gumrah”, having adultery as central theme, depicted the conflict emanating out of such relationship quite well. Yash Chopra’s movies based on the same plot stand nowhere to pathos exhibited in Gumrah. Yash was more governed by the desire to emerge as a successful director in the genre of popular cinema despite being person of immense capabilities. He was a pure entertainer, who used “arrival of third person” as perfect masala element to make his movies mint money. That’s why we cannot contrast him with likes of Raj Kapoor. He failed to attain the stature of Raj Kapoor, who was also governed by the desire to emerge as great entertainer but with a difference: Raj’s sensitivity always managed to find a suitable cause, which under his brilliant directorial treatment ripped apart our emotions. In fact, lot is said about depiction of grandeur/ style in his movies but Gulshan Rai and Feroz Khan stand miles ahead of him even in this department.

Now  That's  Called   Candyfloss Romance!

Now That’s Called Candyfloss Romance!

Let’s take into cognizance “illicit relationship” – a dominant feature of his movies. He should not have roped in this angle unless he  had enough reasons to substantiate his viewpoint. For instance, let’s take “Darr” promoted as a violent love story. What was Yash Chopra trying to demonstrate? That Sunny Deol (husband) has to be equally cunning, powerful and mad like Shah Rukh Khan (lover) to save his wife from the shrewd moves. The greatest irony is that evil gets checkmated by good doesn’t sound convincing in the end when evil enjoys the upper hand, dancing with some else’s beloved for most of the time. One of the salient features of movies made by Yash Raj Films has been that one has to be shrewd and street smart to emerge as a winner. Idealism is of little use in world dominated by market-oriented world, wherein end justifies the means. That’s the guiding principle of protagonists appearing in “Trishul” and “Deewar”. Aditya Chopra’s “Dilwale Dulhania Le Jayenge”  highlights the same trait. The protagonist even as he is reluctant to run away with his beloved, enters into ridiculousness and pathetic gestures to woo his would be wife. The success of this movie is remark on the declining standards of a viewer’s approach towards cinema.

That’s the aberration which marred the movies churned out by Yash Raj Films. The movies having candyfloss flavour, embedded in synthetic sentiments, depicted a section of society, which barely depicted the real face of India. For instance, Salaam Namaste was entirely shot in Australia, talked about reunion of two lovers, caught in problems born out of “laid-back lifestyle”. Hum Tum, Mohabbatein, Dil To Pagal Hai and etc. turned out be old wine in new bottle. Even patriotic perceptions were effectively used in  “Chak De India” to keep the cash box ringing. The point is that Yash Chopra and his successors have realized this pretty well that market forces and not the theme of the movie, which ensures success or failure. The global world, which made the boundaries meaningless, opened new markets, and, therefore, themes also got focused on people who sustained these markets. Both Bollywood and Hollywood rely on stereotyped emotions to make their movies emerge as blockbuster. So scenic landscape, stunning faces, big cars and pulsating music became the essential ingredients of romantic movies be its made by Yash Chopra or anyone else from Hollywood.

Some might find it unpalatable, and unbearable as well, to treat his movies as promoter of illegal relationships. However, it’s not a misplaced belief when one becomes aware of the fact that  cinema, life and society are intimately linked to each other. Chandni, Dhool Ka Phool,  Kabhi Kabhi, Silsila, Doosra Aadmi, Darr, Faasle, Lamhe, Daag, Aaina, Yeh Dillagi and Mere Brother Ki Dulhan to name a few, more or less, had controversial themes, wherein secret lover or illicit relationship added a complex twist to the story line. It’s a cliche to state that cinema borrows its concept from society. The ultimate truth is that it borrows the clues from society, exaggerates them, turning them into saleable scripts and, in the process, creates scope for more distorted themes. In a combined  research conducted by the ” American Medical Association, the American Psychological Association, the American Academy of Pediatrics, the American Academy of Child and Adolescent Psychiatry and the National Institute of Mental Health” to establish the negative impact of movies on youths in USA, it was clearly established that “just as every cigarette increases the chance that someday you will get lung cancer, every exposure to violence increases the chances that some day a child will behave more violently than they otherwise would.”

 The point is when you are genuinely depicting the harsh realities of life, be it centered on illegal relationship, it adds a new dimension in your understanding but when you use such themes to carve unrealistic presentation, merely to ensure commercial success, it’s altogether a different story. Yash Chopra was more conscious of commercial success then ensuring a perfect  treatment to a substantial story line. Ironically, Mahesh Bhatt  also used illicit relationship as effective plot but he ensured that he remained close to the real life. Anyway, Yash Chopra makes me realize that  attaining success is different thing than doing good work which makes difference in lives of people. He got success by promoting flawed romance, which served no greater cause other than ensuring flow of money.

Illicit Relationship Looked More Charming In His Movies

Illicit Relationship Looked More Charming In His Movies


Reference:

New York Times

Pic  Credits:

 Pic  One

Pic Two 

Pic  Three  

यश चोपड़ा: अवैध सम्बन्धो को प्रमोट करती इनकी भव्यतापूर्ण सफल रोमांटिक फिल्मे

यश चोपड़ा: गलत "लम्हों" के सौदागर

यश चोपड़ा: गलत “लम्हों” के सौदागर


यश चोपड़ा की फिल्मे मुझे कभी न रास आई।इनको रोमांटिक फिल्मो का बेताज बादशाह माना जाता रहा है। रूमानियत को एक सुनहरे कैनवास पर पूरे  तामझाम के साथ उतारना इन्हें खूब आता था।ये सही है कि एक औसत दर्शक सिनेमा में असल जीवन की छाप देखने नहीं जाता बल्कि अपने अधूरे सपनो को परदे पे अवतरित होते हुए देखने जैसा अनुभव बटोरने के लिए जाता है। और  दर्शको  की इसी कमजोरी को यश चोपड़ा ने अच्छी  तरह समझा और उसकी शानदार प्रस्तुति की। लेकिन मुझे  लगता है यही पे यश चोपड़ा मात खा गये। इतना समर्थ फ़िल्ममेकर सिर्फ दर्शको की चाह पूरी करने के लिए और वक़्त के साथ चलने की धुन में बेहतरीन सिनेमा  बनाने से रह  गया। यश चोपड़ा की कुछ एक फिल्मे  जैसे वक़्त, धर्मपुत्र, इत्तेफ़ाक, त्रिशूल, दीवार, काला  पत्थर, मशाल और एक दो कुछ और फिल्मे छोड़ दे तो उनके सारी फिल्मे प्रेम त्रिकोण या कुछ कुछ अवैध संबंधो जैसे टाइप की थीम पर बनी है। मै यश चोपड़ा के इसी “तीसरा कौन” रूख पर आलोचनात्मक दृष्टि  डालना चाहूँगा। “इत्तेफाक ” भी लगभग अवैध संबंधो  पर है लेकिन मै इसको एक सुंदर मर्डर मिस्ट्री मानता हूँ। राजेश खन्ना ने जितने शेड्स इस फ़िल्म में दिखायें है सहज रूप से मुझे नहीं लगता कि आगे की फिल्मो में वे वैसा कर पाए। यहाँ तक कि नंदा ने भी नई ऊँचाइयों को छुआ जो कि ज्यादातर ग्लैमरस  गर्ल ही रही है।

अब आते है “तीसरा कौन” के थीम पर। मुझे ये एंगल ही बहुत घिनौना लगता है फिर इस पर बनी फिल्मे देखना और इनसे उभरी सोच को आत्मसात करना  तो मेरे लिए बहुत दुष्कर कार्य है। खेद की बात है यश चोपड़ा ने ऐसी विकृत एंगल को बढ़ावा दिया। इस प्रोडक्शन हाउस में बनी फिल्मे अधिकतर कही न कही विकृति को ग्लोरिफाय करती मिलेंगी। बात ये है कि यश चोपड़ा के पास  किसी मुद्दे की गंभीर समझ नहीं थी जैसी बी आर चोपड़ा के पास थी। इसलिए बी आर  चोपड़ा की एक अकेली “गुमराह”  यश चोपड़ा की इसी विषय पर बनी दर्जनों बेकार फिल्मो से बेहतर है। यशजी के पास  संवेदनशीलता का अभाव था  इसीलिए राज कपूर से बहुत पीछे रह गए। भला हो साहिर साहब का कि इनके फिल्मो के लिए इतने दिल को छु लेने वाले गीत लिख गए। इनके फ़िल्म में स्टाईल का बड़ा बोलबाला था पर यहाँ भी ये फिरोज़ खान ने हमको ये बेहतर सिखाया कि स्टाईल एलिमेन्ट का कैसे इस्तेमाल करना चाहिए। यश साहब के पास बस दर्शको को बांधे रखने की कला थी भव्यता और मधुर संगीत का आवरण ओढे बेकार सी विषयवस्तु वाली थीम के साथ। 

ये कहना गलत नहीं होगा कि अवैध संबंधो को जस्टिफाय और ग्लोरिफाय या विकृति को बढ़ावा देने में इस प्रोडक्शन हाउस की फिल्मे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार है।आप नब्बे के दशक में आई “डर” देखिये। दर्शको को इससें कुछ लेना देना नहीं था कि अंत में सनी दयोल शाहरुख के किरदार पर फाईट सीन में हावी होकर उभरता है। इस फ़िल्म का सन्देश वस्तुत: इस बात को हाईलाइट करता था कि किसी भी सभ्य औरत के ज़िन्दगी में घुस कर उसे परेशान कर सकते है। अब आप सनी दयोल बन कर रोक सकते है तो रोकिये नहीं तो आपका घर तबाह। और बिडम्बना देखिये कि इस विकृति सम्पन्न हीरो को कितना रोमांटिक दिखाया गया है। तो ये थी यश साहब की काबिलियत। आगे यश साहब ने फिल्मे तो नहीं डाइरेक्ट की लेकिन आदित्य चोपड़ा और अन्य नए निर्देशकों ने इनके बैनर तले फूहड़ पर कामयाब फिल्मे बनायी। “दिल वाले दुल्हनिया ले जायेंगे” की अपार सफलता इस बात का प्रमाण है कि दर्शको को घटिया फिल्मो में भी मायने ढूँढने का चस्का लग चुका था। रास्ते कितने भी घटिया हो  पर अगर वो मंजिल तक पहुचाते है तो ठीक है। एक आदर्शवादी बाप को चालाक और धूर्त नायक के आगे झुकना पड़ सकता है और कमाल है ये सब उसने प्रेम के लिए किया, ये इसलिए किया कि  भगाना  उसे पसंद नहीं था और इसलिए झूठ बोलकर घर में नौटंकी करना जरूरी  था। दर्शको का टेस्ट और स्तर कितना गिर गया है वो हमे इन फिल्मो की सफलता से पता चलता  है।

रास्ते अपवाद स्वरूप गलत हो सकते है लेकिन सिर्फ धूर्तता और मक्कारी से कामयाबी सुनिश्चित होती अगर लोगो ने इस बात को स्वीकार कर लिया है तो निश्चित ही भारतीय समाज पतन के रास्ते पर है। भारतीय समाज इस बात को समझे या न समझे लेकिन इस प्रोडक्शन हाउस ने समय की नब्ज को पकड़ा कि अब मार्केट से फिल्मो का सीधा कनेक्शन है मूल्य या आदर्श गए तेल लेने। इसलिए इस बैनर ने तमाम बौड़म फिल्मे बनायीं ओवरसीज मार्केट को ध्यान में रखकर जैसे “हम तुम” , “सलाम नमस्ते”, तथाकथित राष्ट्रीयता का तड़का लिए “चक दे  इंडिया” इत्यादि। कुल मिला के भव्यता और दर्शकोको बांधे रखने की कला ने ऐसी फिल्मो को जन्म दिया जिनका यथार्थ से कुछ लेना देना नहीं। इनकी फिल्मे उस क्लास के लिए ज्यादा थी जिनके दिमाग  में लगभग भूसा भरा हो और साथ में पेट से भी टंच हो। इनकी बाद की फिल्मो का सामजिक मूल्य कुछ नहीं सिर्फ आत्मकेंद्रित किरदारों का ये बताना कि “बैटल फॉर सर्वाइवल” में धूर्तता और मक्कारी बहुत जरूरी है। हो सकता है “तीसरा कौन” आपके जीवन का थीम बन जाए पर इस दर्द को जिस जेन्युइन  दर्द और एहसास के साथ आप महेश भट्ट की फिल्मो या अन्य कला फिल्मो के निर्देशकों में  पाते है उनसे शायद यश साहब की  फिल्मे कोसो दूर थी। और साथ में दूर थे यश साहब के फिल्मो के शौक़ीन दर्शक वर्ग जो दूर तक सोचने को गुनाह  मानते थे। चलते चलते सिर्फ मै ये कहूँगा कि यश चोपड़ा एक कामयाब फ़िल्म निर्देशक थें पर अच्छे नहीं। यश साहब को देखकर ये समझ  में आता है कि कामयाब होना मतलब अच्छा ही हो ऐसा नहीं होता।  

 घृणा, लहू, और नौटंकी में डूबा रोमांस

घृणा, लहू, और नौटंकी में डूबा रोमांस

Pics Credit:

Pic One 

Pic Two

Rajesh Khanna: The Earthly Superstar Who Now Became A Star In The Sky

Anand Never Dies!

Anand Never Dies!

The passing away of Rajesh Khanna makes all sensitive souls very sad. He should have lived for some more years on this planet. In India, they say people used  to live for more than 100 years in ancient  times. The  people are dying at a very young age nowadays. We have been witnessing the passing away of creative souls at frequent intervals since last year- Jagjit Singh, Shahryar, Ravi, Shri Lal Shukla, Shammi Kapoor, Hanuman of modern times Dara Singh and now Rajesh Khanna. It appears that heaven badly needs creative artists to entertain its own residents, and thus, be it a singer, writer or actor, all are slowly getting  placed in heaven one by one. Anyway, the death of Rajesh Khanna makes me realize that death is really the great leveler. It leaves none. It cares a damn for stature.

Rajesh Khanna provided death a new meaning in his timeless classic movie “Anand”. The movie highlighted the theme that death is an insignificant drama. However, today when he has passed away, it’s pretty hard to keep emotions in check. The Hindi movie landscape’s first superstar has now become a sweet memory as the presence now gets limited to magazines, books and movies. I really don’t know what are the elements involved in the making of a superstar but I am aware of the fact that his charishma in 70s left both young and old spellbound. Male newborns got named Rajesh, a new hair style came into existence and the frenziness found in every woman’s heart attained new height. The arrival of angry young man Amitabh Bachchan  soon eclipsed the magic of Rajesh Khanna, but by then Rajesh Khanna image has attained some sort of immortality.

 
The early phase of all great actors had been a roller coaster ride. Rajesh Khanna proved to be no exception. The leading actresses of those days refused to work with him and well known directors failed to take note of him. His early movies did not create a desired effect. When Shakti Samanta narrated him the story of Aradhana, he noticed that Rajesh Khanna did not seem to be much impressed. After all, it was a female oriented movie, in which the hero died during the middle of the movie. It was no less a herculean task for Shakit Da to make Rajesh Khanna see light at the end of the tunnel. However, very few can predict the course  of destiny. The movie, which in eyes of Rajesh Khanna, offered no better prospects not only proved to be a milestone in history of Indian movies but also gave Hindi movie world its first superstar. That’s the only logic which governs Bollywood- success appears like appearance of cascade in barren land. It defies all established rules. A female oriented movie gave Indian movie landscape its first male superstar!
 
Interestingly, the other dominant trend which defines Bollywood is that superstars rarely know real acting or, for that  matter, are  rarely offered roles that involve some real shades of acting.  That’s so evident if one has witnessed acting skills of present “Khan Brigade”. They develop some lovable styles but they  rarely come to act. The only superstar that can act a bit, Amitabh Bachchan, too feels that he never got an opportunity to reveal interesting shades of acting. All the time he remained engaged in “dhishum dhishum” (fight scenes)! Anyway, destiny smiled on Rajesh Khanna once again when he got opportunity to show his acting skills in some movies having substantial plots. It’s really curious coincidence that it was Hrishikesh Mukherjee, known for his simplistic take on serious issues, who came to provide both Rajesh Khanna and Amitabh Bachchan some good opportunities to strike a bonhomie with various shades of acting. In fact, they both came to work together under his direction in Anand and Namak Haraam. Anand turned out to be a huge success. In fact, the character played by Amitabh, Babu Moshay, became a household name. The plot of Anand revolved around the philosophy found in the Upanishads that there is no such thing as death. Death is not an end but a new  beginning. In other words, it taught the art of living, reminding us that laughter is the best medicine. After all, we rarely come to live life in a proper way.  The movie made it clear that death is final drama, which paves the way for soul’s fresh journey with new set of cloth in form of a new body! Rajesh Khanna depicted this art of living in an unforgettable way.

Anand: Now Offering Solace To People In Heaven

Anand: Now Offering Solace To People In Heaven

Rajesh Khanna’s method of acting was not full of complex elements. Like any star actor, his appeal was confined to few stylish gestures, which suited him so well. His acting mannerism was heavily dramatic, which went so well with romantic plots. But he was a good actor, who can do justice with complex themes became known to all  cinema-goers with release of “Ittefaq” which came right in the beginning of his career. The movie directed by Yash Chopra and produced by B R Chopra revolved around a painter trapped in a tragic situation, wherein people perceived him to be a murderer with an unstable mind. He  depicted the agony of such an innocent man in an impressive way. Anyway, the movies like Amar Prem, Kati Patang, Kudrat, Khamoshi, Souten, Avatar, Doli, Roti, Aan Milo Sajna, Thodi Se Bewafai, Sachha Jhootha and Dushman, to name a few, are some of his super-hit movies, which made him darling of the masses.

However, let’s not forget the role which Kishore Kumar, Mukesh, R D Burman, Salil Choudhary, Majrooh Sultanpuri, Anand Bakshi, Laxmikant Pyarelaal, Hemant Kumar, Sahir and Khaiyyam played in shaping the course of success for Rajesh Khanna. It’s an undisputed fact that Kishore Kumar played the most significant role in making Rajesh Khanna and Amitabh Bachchan careers attain starry heights. It’s also a proven fact that both of them lost their star appeal, when Kishore Kumar stopped singing for them in last stage of his singing career, due to health reasons. The romanticism demonstrated by Rajesh Khanna and machoism exhibited by Amitabh were heavily dependent on voice of Kishore Kumar! His voice acted as most suitable medium for them, which earlier provided new heights to Dev Anand. I am sure had Kishore been missing, Rajesh Khann would have failed to locate “Mere sapno ki Rani“. Tanuja would have maintained safe distance from Rajesh Khanna had Kishore not turned out to be “Dil ke Chain“. This song “Ye Jo Public Hai Ye Sab Jaanti Hai” became the most popular idiom to make a remark on the shady affairs in the world of politics and business. Another song from the same movie Roti “Gore Range Pe Na Itna Gumaan Kar” transcended generations to influence the fate of every fair skinned Indian girl.

     

May his soul rest in peace. The people who have moved ahead in this eternal  journey, never travel backwards. They simply live inside our heart and minds as sweet memories. This line which forms the part of song picturized on him expresses this sentiment so well: “Kuch Log Jo Ek Roj Bichud Jaate Hai  Wo Hazaro Ke Aane Se Milte Nahi“. Anand never dies. He always manages to be back on earth’s playground to play the game of life with a new face.That realization is bound to make one smile even as the eyes remained moist with tears. It makes reunion with Rajesh Khanna-a good soul-a great possibility. By the way, let’s not forget  Rajesh Khanna’s  words said to Pushpa In Amar Prem: ” Pushpa, I hate tears”.  

                             
These songs picturized on Rajesh Khanna are very close to my heart:

1. Mere Naina Saawan Bhado ( Mehbooba )

2. Kuch To Log Kahenge  (Amar Prem)

3. Zindagi Pyar Ka Geet Hai (Souten)

4. Hazaar Rahe Mud Ke Dekhi (Thodi Se Bewafai)

5. Vada Tera Vada (Dushman)

6.Sajna Saath Nibhana (Doli)

7. Pyaar Deewana Hota Hai (Kati Patang)

8. Ye Reshmi Zulfein  (Do Raastein)

9. Jeevan Se Bhari Teri Aankhein (Safar)

10. Zubaan Pe Dard Bhari Daastan( Maryaada)

11. Wo Shaam Kuch Ajeeb Thi  (Khamoshi)

12. Yun Hi Tum Mujhse Baat Karti Ho  (Sachha Jhootha)

13. Mere Dil Me Aaaj Kya Hai (Daag)

14. Kahin Door Jab Din Dhal Jaayein (Anand)

15. Zindagi Ek Safar Hai Suhana   (Andaaz)

A lot depends on how the song is picturized. I love this song not only for beautiful verses by Majrooh Sultanpuri, excellent composition by R D Burman, terrific singing by Kishore Kumar, but also for its mesmeric picturization. Absolutely stunning romantic song picturized in a perfect setting. A meaningful one as well. The verses are not only talking about romance in some absurd way like “Tum mujhko chand laake do” (get the moon for me) but they are having a take on it in a balanced way. The movie was full of typical Bollywood elements ( and that’s why I don’t like this movie) but the songs stand apart. 

Pics Credit:

Pic One

Pic  Two

Serendipity

Was I born a masochist or did society make me this way? I demand unconditional love and complete freedom. That is why I am terrible.

atul's bollywood song a day- with full lyrics

over ten thousand songs posted already

John SterVens' Tales

Thee Life, Thee Heart, Thee Tears

Indowaves's Blog

Just another WordPress.com weblog

Una voce nonostante tutto

Ognuno ha il diritto di immaginarsi fuori dagli schemi

Personal Concerns

My Thoughts and Views Frankly Expressed

flightattendantwithcamera

Seeking adventure with eyes wide open since 1984.

I love a lot

Just another WordPress.com site

the wuc

a broth of thoughts, stories, wucs and wit.

A Little Bit of Monica

My take on international politics, travel, and history...

Atlas of Mind

Its all about Human Mind & Behavior..

Peru En Route

Tips to travel around Perú.

Health & Family

A healthy balance of the mind, body and spirit

मानसिक हलचल

ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं यह ब्लॉग लिखने के अलावा पूर्वोत्तर रेलवे, गोरखपुर (भारत) के ट्रेन परिचालन का काम भी देखता हूं।

Monoton+Minimal

travel adventures

Stand up for your rights

Gender biased laws

The Bach

Me, my scribbles and my ego

Tuesdays with Laurie

"Whatever you are not changing, you are choosing." — Laurie Buchanan

The Courage 2 Create

This is the story of me writing my first novel...and how life keeps getting in the way.

A Magyar Blog

Mostly about our semester in Pécs, Hungary.

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

Join 563 other followers